01 मार्च, 2017

चीं-चपड़, गटर-गूं और टीं-टा-टू

स बदलते समय में बहुत कुछ वदल रहा है। आए दिन कुछ न कुछ देखने-सुनने और भोगने को मिल रहा है। किसे सही कहें, और किसे गलत? सही और गलत दोनों पक्ष साथ-साथ चलते हैं। सवाल यह है कि हम किसे सही मानते हैं। यह सोचना होगा कि हम जिसके पक्ष में हैं, उसके पक्ष में क्यों है। कई बार हमारी आंखें, खुली होते हुए भी बंद होती है। जानबूझ कर आंखें बंद कर लेने वाले भी हमीं हैं। सही को सही और गलत को गलत बोलना चाहिए। मूक-दर्शकों की वजह से गलत अंततः लाइलाज बीमारी बन जाता है और हम बेबस हो जाते हैं।
           वही राजे-महाराजे हैं। अब बस राजा का चेहरा बदल गया है। घृतराष्ट-युग में लोग बहुत चीं-चा करते थे। आज भी चीं-चा करने का सिलसिला जारी है। सभी इस चीं-चीं और चीं-चा में शामिल होते हैं, पर जहां करना होता है वहां ‘चूं’ नहीं करते हैं। आवाज उठाने से कतराते हैं। डरते हैं। हम समूह-गान तो गा लेते हैं, पर एकल-गान जैसे हमारे बस की बात नहीं। लोग क्या कहेंगे? ऐसा सोचते हुए अपनी ‘चूं’ को भीतर का भीतर रखते हैं। गलत होता है तो ‘चूं’ होनी चाहिए। एक ‘चूं’ होने से संभव है दूसरे भी ‘चूं’ में शामिल हो जाएं। हमें संगठित होकर अपनी ‘चूं’ को समवेत सुर में गूंज बना देना होता है। पंच काका कहते हैं- हे निरीह प्राणियों! लोकतंत्र में ‘चूं’ का महत्त्व समझो। अपनी चूं को भीतर दबा लेना लोकतंत्र की हत्या है।
           जब चूहों की चूं-चा सुनाई देती है तो हम तुरंत उन्हें पकड़ कर घर से बाहर कर देना चाहते हैं। पिंजरा केवल चूहों के लिए नहीं हम सभी के लिए अलग-अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है। घर में कबूतर आते हैं और अपना गाना- ‘गटर-गूं, गटर-गूं’ के स्थाई अंतरे में सुनाते हैं। उनके गाने को हम सुनना नहीं चाहते, और उन्हें उड़ा देते हैं। वे फिर से आते हैं, और अपना पुराना छूटा हुआ राग गुनगुनाते हैं। हम चूं-चा और गटर-गूं जैसी कोई आवाज पसंद नहीं करते हैं। यह हमारी पसंद है कि कुछ कुत्तों-बिल्लियों की हाऊ-हाऊ और म्याऊ-म्याऊ पसंद है। जीवन के आस-पास अनेक जीवन है। मच्छर, मक्खी से लेकर ऊंट-हाथी तक के अनेक जीव-जंतु और पेड़-पौधों से हमारा परिचय सिमटता जा रहा है।
           यह आत्मबोध मुझे कल ही हुआ जब पंच काका ने सैर करते समय एक पेड़ के पास रूक कर अचानक पूछ लिया- जानते हो यह किसका पेड़ है? मैं बगले झांकने लगा। उस पेड़ को ऊपर-नीचे से गौर से देखते हुए सोच रहा था- काश! यह पेड़ खुद बोल पाता। काका हंसे और बोले- वाह बाहदुर, तुम्हारी पीढ़ी के क्या कहने। दिन-रात ना जाने किस-किस ‘टीं-टा-टू’ में खोए रहते हो। अपनी झेंप मिटाते हुए मैंने काका से कहा- हम प्रकृति से कट से गए हैं। बहुत से पेड़-पौधों के नाम हमें ध्यान नहीं। अनेक जीव-जंतुओं के नाम नहीं जानते हैं। काका बोले- नहीं जानते तभी तो पूछ रहा हूं। अब की पीढ़ी सो रही है। मैं पूछता हूं कि तुम लोग कब तक सोते रहोगे। कभी खुद से खुद को बाहर निकलो। अपने आस-पास को पहचानों। दुनिया बहुत बड़ी है। तुमने दुनिया को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया। जेब में बंद कर लिया है। ये क्या तुम्हारा इंटरनेट जो है, दिन-रात लगे रहते हो। सुनो, ये ‘शिरीष का पेड़’ है। कल तुम हजारी प्रसाद जी का निबंध पढ़ रहे थे।
 ० नीरज दइया

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