08 मार्च, 2017

पुत्र पैदा होने की गारंटी

ब भी कहीं थाली बजती है तो पास-पड़ौस को पता चलता है कि फलां के घर लॉटरी लगी है। हमारे देश के लोग भी कितने भले हैं। अपने सुख की सूचना गला फाड़-फाड़ कर देते हैं और दुख को भीतर ही भीतर दबा लेते हैं। बेटी जन्म पर रोनी-सी सूरत लिए घर के सब समवेत ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं कि लगता है जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा है। मातमी ऐसा भयावह दृश्य इक्कीसवीं सदी में भी वही का वही है। भले बेटियों ने कितने ही गढ़ जीत लिए हो, फिर भी उनके प्रति हमारे मन का मैल घुला नहीं। शिक्षा और आधुनिकता के पास भी कोई ऐसा साबुन नहीं है कि इस मैल को धो दे। पुत्र-रत्न की आमद पर छत चढ़ कर थाली बजने का रिवाज जिसने भी आरंभ किया होगा, बड़ा समझदार रहा होगा। बिना समझदारी के भला ऐसा और इतना फर्क कैसे हो पाता। ऐसे में कुछ सिरफिर हैं जो बेटी के जन्म पर भी थाली ले कर छत पर चढ़ जाते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं। बेटियों को बेटों का दर्जा देना और बेटों जैसे ठाठ-बाट से पालना कहां का इंसाफ है। वे पराई अमानत होती हैं और ऐसा करना तो उन से मोह करना हुआ। हमारी इतनी विशाल परंपरा है कि बेटियों के लिए मां-बाप निर्मोही रहे। उन्हें पराया धन समझें और जिसमें हिम्मत देखे, उसे सौंप कर गंगा नहा लें।
          यह सनातन चक्र है। बेटे या बेटी की शादी के बाद इंतजार करते हैं कि कब थाली बजाने का अवसर आए। यह अवसर अगर नियत समय पर हाथ लगने के आसार दिखाई देता है, तो चेहरों पर मुस्कान आती है- बड़ी जल्दी की। और इसके विपरीत देरी होने पर इस अवसर का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हुए कहते सुना जाता सकता है- कब होगा, या होगा ही नहीं। बड़ी देर कर दी। इसने साथ जिन-जिन की शादियां हुई थी, सबके घर थाली बज गई। हमारे घर कब बजेगी? ऐसे में बसंत के बीतने के बाद फिर से बसंत को लाने में कई बार वर्षों के वर्ष लग जाते हैं, और कई बार तो बादल बिन बरसे ही रूठे रहते हैं।
          निसंतान दंपति निराश होकर आशा करते हैं कि कुछ भी हो जाए, पर हो जाए। अभी भारत देश में कई सदियां लगेगी, बांझ को अथाह अपमान से इक्कीसवीं सदी भी नहीं बचा सकती है। खोट भले खुद के लड़के में हो पर गालियां तो बहू के हिस्से ही आएगी। परिवार नाम की इस मिली-जुली सरकार में सदैव महिलाएं ही प्रताड़ित होती है। आश्चर्य यह कि महिलाओं द्वारा इस क्रम जारी रखा जा रहा है। ऐसे झगड़ों में पाखंडी तांत्रिक और ढोंगी साधू बाबाओं की लॉटरी लग जाती है। कहा है- या तो रोगी ठगाता है, या भोगी। ये रोगी-भोगी बाकायदा ऐसे-ऐसे रास्ते निकालते हैं कि सब कुछ लुटा के होश में आते हैं। जब आंखें खुलती हैं, बहुत देर हो चुकी होती है। बेटे की उम्मीद में बेटियों की हर बार आमद वालों को पुत्र पैदा होने की गारंटी देकर उनकी जान भी मांग सकते हैं। यह बात जुदा है कि पुत्र की आशा रखने वालों का अंतिम धेय यही होता है कि मरने पर कोई तो मुखाग्नि देने वाला चाहिए। पंच काका कहते हैं कि पुत्र पैदा होने की गारंटी छोड़िए। इस संसार में मरने के बाद हम सभी की गति और दिशा एक ही होनी है।
 ० नीरज दइया 

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