29 फ़रवरी, 2016

नीरज दइया की कविताएं

रिश्ते
आप कहते हैं-
हमें नाकारा-नालायक
काम के नहीं किसी भी
मगर हम, जब भी पुकारोगे
होंगे हाजिर जैसे भी हैं
दूजे कहां से आएंगे?
कहां से लाओगे?
ले भी आए तो
धो देने से नहीं धुलेंगे
रिश्ते हैं जो भी।

जहां कहीं मन लगे
जिस घर में मन लगे
      जहां-कहीं मन लगे
      जीना मन से
            सुख से।

जीना होता है-
      - सुख से रहना
      - दुख भी सुख से भोगना
      - मौन को देखते रहना उत्साह से
      - हर दिन जीना हर्ष से

घर जीने के लिए होता है
बेमन जीना
अपने ही घर में
      मरना होता है।

यदि मरना ही है
      घर मसान क्यों बनें
बदल लें घर- जीने के लिए
      जीना मन लगा कर
जिस घर में मन रमे
      जहां-कहीं मन जमे।

नंगे पैर ऊंट
समय के
पहाड़ पर
संस्कार विहीन ऊंट
घूमता है-
मुंहबाए
अभी तक नंगे पांव।

ठीक ऐसे ही
बिना भाषा के
घूमते हम नंगे पांव।

भाषा है संजीवनी
आप देखते नहीं
या दिखाई नहीं देता आपको।
बिना भाषा के

वस्त्रों के रहते हुए
हम निर्वस्त्र-नंगे।

नित्य तिल-तिल मरते
भीतर ही भीतर
दिन-रात घुट-घुट कर जीते
बोलते ही लड़खड़ाती है जुबान
इसी के रहते तो-
यह हठ किए हैं।

लाइए!
हम मरणासन्नों को भाषा दे दें
भाषा है संजीवनी।
(राजस्थानी से अनुवाद : कवि स्वयं)
“दुनिया इन दिनों” साहित्य विशेषांक-2 में प्रकाशित