29 अगस्त, 2016

रचना की तमीज

चना का आलोचना और समाज का व्यंग्य में असली रंग-रूप दिखाई देना चाहिए। अब जब से नकली और डुपलीकेट का चलन चला है मामला गडमड हो गया है। बिना रंग-रूप की रचनाएं आजकल रचनाकार लिख रहे हैं। आलोचक का इसमें दोष क्या है? जब कोई रंग-रूप उसे दिखाई ही नहीं देता, तब वह असली रंग-रूप के नाम पर क्या दिखाएगा। बेहतर है कि वह चुप रहे। समाज का हाल तो इससे भी बुरा है। वह बेहद फास्ट हो गया है और रुकने का नाम नहीं ले रहा। देखो ना, पलक झपकते ही समाज अपना रंग-रूप बदल लेता है। कोई व्यंग्यकार किसी रंग-रूप के बारे में लिखने की सोचता है कि उसे पता चलता है कि वह जो सोचा था वह तो बदल गया। ऐसे में व्यंग्य रचनाओं का आरंभ हो जाता है और पूर्ण नहीं हो पाने के कारण वे अधूरी रहती हैं। मुझे डर है यह व्यंग्य पूरा होगा या नहीं। चलिए प्रयास करते हैं।
    बड़बोले लेखक स्वामी चेतनांदन जी कहते हैं कि समृद्ध साहित्य के लिए समर्थ लेखक मित्रो,
एकजुट होकर इतनी विधाओं में उत्कृष्ट लेखन करो कि दुनिया को पता लग जाये साहित्य की वास्तविक तासीर क्या है? हमें जुदा-जुदा गुटबंदियों में रह कर वर्तमान को नष्ट नहीं करना है। भाषा-साहित्य अगर समाज में स्थापित होगा तो स्वत: ही हमारी जय-जयकार होने लगेगी।
    स्वामी जी के एक भक्त ने सवाल किया- महाराज, एकजुट होकर उतकृष्ट लेखन नहीं होता, लेखन के लिए तो अकेलापन और एकांत चाहिए। कड़ी मेहनत और खून-पसीना एक करना पड़ता है।
    सवाल सुनकर स्वामी जी तिलमिला गए और बौखलाहट में बोले- रचना की तमीज होनी चाहिए। ऐसे किसी बात की कमीज नहीं उतारा करते। संकेत समझो। अगर संकेत नहीं समझते तो खुद को बुद्धिजीवी क्यों कहते हो? कला क्षेत्र ऐसे अज्ञानियों के लिए जगह नहीं। पहले तो यह जानना चाहिए कि एक लेखक अपनी रचना से जाना-पहचाना जाता है। वह बड़ी से बड़ी विचारधारा, संस्कृति, वांग्मय को आत्मसात करने के उपरांत ही किसी बड़े संगठन या संस्थान में पहुंचता है। ऐसे में यही कहेंगे- रचना की तमीज असल में लेखक के रूप में हमारे जीने की जमीन है। चेतनांदन जी ने आगे कहा कि आज साहित्य में रचना तो अच्छी या खराब होने की बात छोड़िए, ज्यादातर लेखकों का जीवन ही अविश्वसनीय है। इसे क्या कहेंगे?
    सब की बोलती बंद हो गई। स्वामी जी का यह रंग-रूप भी समझ नहीं आया। इसलिए इसकी भी कोई आलोचना नहीं हुई। लिखने वाले जल्दबाजी नहीं करेंगे तो समाज का असली रंग-रूप रचना में आ ही नहीं सकता। अगर लिखना है तो चौबीसों घंटों समाज पर पैनी नजर रखो। इस बीच जब समय मिले झट से लिख डालो, जो कुछ लिखने का मन करे। समकालीन सजृन में ऐसे लेखन की आलोचना नहीं हो सकती। इन दिनों व्यंग्य लेखक भी बेहद जल्दी में विषय उठाते हैं और समाज का उनमें रंग-रूप दिखई देने को होता है कि अगले व्यंग्य में रंग-रूप फिर से बदला हुआ दिखाई देने लगता है। ऐसे में कौनसा रंग-रूप असली और कौनसा नकली है। यह जबरदस्त संघर्ष है। असल में नकली-डुपलीकेट तो कुछ है ही नहीं।
    पंच चाचा ने कहा है- रचना लिखो तो आलोचना की परवाह मत करो और व्यंग्य लेखन में चिकनी-चुपड़ी के साथ लूखी भी मिक्स करो। नकली और डुपलीकेट अपनी-अपनी जगह पर असली और ओरिजनल ही है। यही नहीं तो बहुत बार नकली-डुपलीकेट को देखने के बाद, असली-ओरिजनल को ही नकली-डुपलीकेट समझा लिया जाता है। मेरा पक्का दावा है कि बड़बोले लेखक स्वामी चेतनांदन जी नकली-डुपलीकेट श्रेणी में रखने योग्य और सवाल करने वाला अनाम भक्त रचना की तमीज का असली-ओरिजनल चेहरा है।
- नीरज दइया
  

26 अगस्त, 2016

न कुछ कहना ही बेहतर कहना है

किन्हीं दो संदिग्ध व्यक्तियों ने बीती रात हमारे घर की तरफ पत्थर फेंके तो पंच काका नींद से जाग गए। उन्होंने खिड़की से बाहर देखते हुए उन्हें पहचाने की कोशिश की, पर वे अपने इन दो भतीजों को पूरा पहचान नहीं सके। एक तो आधी रात का वक्त और अब आंखें भी पहले जैसी कहां रही पंच चाचा की।
पर काका के कान अब भी दूर की सुन लेते हैं।
            वे बता रहे हैं कि पत्थर फेंकने वाले जोर जोर से चिल्ला रहे थे-
            पहला : तू कहानीकार नहीं है समझे।
            दूसरा : तू आलोचक नहीं है समझे।
            नए पत्थरों को नीचे से उठा कर फेंकते हुए समवेत : तू कवि भी नहीं है समझे, और हां अनुवादक तो बिल्कुल नहीं है।
            फिर इन्हीं स्वरों में पंच चाचा के कानों तक दो-चार गालियां भी पहुंची, उन उखड़े हुए भतीजों की वे गालियां पंच चाचा कहते हैं दोहराने योग्य नहीं है।
            उन्होंने ऊपर के वाक्यों की पुनरावर्ती के साथ नए वाक्य भी सुने :
            - अबे तू संपादक नहीं है।
            - समझे ले तू कुछ भी नहीं है।
            - हम तुम्हें आदमी भी नहीं मानते कमीने आलोचक। तू हम पर क्यों नहीं लिखता।
            पंच चाचा के धैर्य ने भी इतना सब देख-सुन कर साथ छोड़ दिया, उन्होंने अपनी लाठी उठाई और गेट तक पहुंचे। उनको देखते ही उनके फर्जी भतीजे भाग गए।
            पंच चाचा बड़े ज्ञानी-ध्यानी है। वे मुझे से कह रहे हैं कि तुमने मेरे उन दो फर्जी भतीजों की कितनी भैंसे खोल ली हैं, जो वे नाराज है और गालियां भी निकाल रहे हैं। नहीं तो आज कौन किसको गालियां निकालता है। अब जा ऐसा कर बाड़े में उन्हीं की भैंसों का दूध निकाल कर ला। मैं उनकी भैंसों का दूध पी कर उन भतीजों के नाम अपनी विद्या से जान लूंगा।
            मैंने कहा- नाम जान कर क्या करेंगे।
            पंच चाचा बोले- मैं कुछ भी करूं या ना करूं, ऐसे गुणी भतीजों के नाम तो जानने ही चाहिए ना।
            भैंसों के बाड़े में मैं जा तो रहा हूं पर मेरी समस्या यह है कि मैंने भैंसे तो चाचा के काफी रिस्तेदारों की खोल कर अनजाने में अपना बाड़ा भर लिया है। अब मैं पहचान कैसे करूं कि किस की भैंस कौनसी है?
       हां तो अब सुनो चाचा के अनाम भतीजो! मेरी और आपकी कोई लड़ाई नहीं है। मैंने कभी किसी से लड़ाई नहीं की है। अगर फिर भी आपकी निगाह में हमारी ऐसी कोई लड़ाई है, जिसे आप याद कर रहे हैं तो मेरा निवेदन है अब सब भूल-भाल जाओ। किसी दिन मिल-बैठ कर बात करते हैं।
      अब मैं थोड़े दिनों के लिए आलोचना का काम स्थगित कर रहा हूं। जिस काम से चारों तरफ नाराजगी ही नाराजगी हो उसे करने से क्या फायदा। मैं जब भी कुछ कहता हूं सही समझ कर कहता हूं। आलोचना को लेखक के लिए हितकर मानते हुए कहता हूं। पर यहां तो यदि किसी के लिए अच्छा लिख दिया, तो दूसरे भाई-बंधु नाराज हो जाते हैं। और कुछ ऊपर-नीचे लिख दिया तो भी नाराजगी जाहिर है। कुछ नहीं लिखा तो भी नाराज कि मेरे लेखन पर कुछ क्यों नहीं लिखा। अब सच में मुझे लगने लगा है कि न कुछ कहना ही बेहतर कहना है।
- नीरज दइया
17.11.2016 को गंगानगर दैनिक अर्जुन में

23 अगस्त, 2016

बिना विपक्ष का एक पक्ष

र्षों से भरतीय जनमानस कभी धूप, कभी छांव की संकल्पना से जुड़ा है। हरेक भारतीय जानता है कि कभी सुख और कभी दुख। वह सुख में भले दुख का इंतजार न करता हो, पर दुख में सुख का इंतजार जरूर करता है। मजे की बात यह भी कि दुख के बाद सुख बेहद सुहाता आता है। जब कोई सुखी जीवन जी राहा हो तो भला किसी दुख की कल्पना क्यों करे। दुख को जब जहां जिस रास्ते आना है आ जाए। वह अगर रोकने से रूकने वाला हो तो चिंता भी की जाए। सुख के इंतजार में दुख के दिन काटते हैं और सुख में आने वाले दुख से बेपरवाह जीवन भले जीते हो किंतु यह विषय शोध का है।
    इस नायब विषय पर किसी ने ध्यान नहीं दिया पर हमारे पंच चाचा ने गहनता से इस पर विचार-विमर्श किया। फेसबुक पर सक्रिय चाचा के एक भतीजे को श्रेय जाता है जिसने लिखा कि दूसरे पक्ष तक मेरी पहुंच नहीं है। पंच चाचा बोले- सभी तो मेरे भतीजे हैं फिर ये पहला और दूसरा क्या हुआ। एक तक पहुंच अर दूसरे तक पहुंच नहीं। यह तो निरा वहम है। आज इतने आने-जाने और पहुंचने के साधनों के बाद भी अगर पहुंच नहीं तो कब होगी। भैया तुमको चांद पर तो जाने का कहा नहीं। जब एक ही शहर में एक पक्ष और दूसरा पक्ष किए बैठे हो तो मोबाइल काहे लिए घूमते हो। अरे झट से लगाओ नंबर और करो पहुंच में सब को। तुम्हें किसी दूसरे ने नहीं, तुम्हारे लक्ष्णों ने ही डूबोया है।
    मान की जब कोई एक है तो कोई दूसरा और तीसरा भी होगा। पर बात पंच चाचा के भतीजे की फिर कभी, अभी तो हम एक ऐसे पक्ष की कल्पना करें जिसका कोई विपक्ष नहीं हो। यह देखने में जरूर कुछ पेचीदा लगता है। भैया जहां पक्ष होगा वहां विपक्ष होगा ही जैसे संसार में सुख है तो दुख भी होगा ही। बस यहीं तो इस बात का चाबी है। यहां सब सुख चाहते हैं। चाहना भी चाहिए, अब कबीर का जमाना तो रहा नहीं और वहां भी देखिए- ‘सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥’ संसार के सुखी होने का इस से बड़ा क्या प्रमाण चाहिए। पंच चाचा कहते हैं- अब कबीर जैसे दुखी होने का समय नहीं है। जागने और रोने की जगह खाना और सोना ही उचित है। खाने और सोने में अब भी अगर कोई बाधक है या हो सकता है तो वह है विपक्ष। इस विपक्ष को क्या हम पक्ष में नहीं ला सकते हैं। अधिक से अधिक कहना ही तो है कि भैया विपक्ष, तू अपने नाम को बदल ले यार। ये वी का तगमा उतार कर पक्ष बन जा। तुझे भी फायदा और हमें तो फायदा ही फायदा।
    पंच चाचा कह रहे हैं- ये समझदार लोग फर्जी फेसबुक आईडी क्यों बनाते हैं? फेस टू फेस बात करो। बिना किसी बात के कोई बात ले बैठे हो। भैसा क्या रखा है- पक्ष और विपक्ष में। सब एक हो जाओ। चारों तरफ हमारा पक्ष ही पक्ष होना चाहिए। फर्जी आईडी से जली-बुझी को हवा देते हो। ट्विटर हो भले फेसबुक इन में कुछ सार नहीं है। कभी कुछ कहते हो कभी कुछ कहते हो। कभी खुद कहते हो, कभी दूसरे-तीसरे से कहलवाते हो। छोड़ो ये सब और अपनी पहुंच का विस्तार करो। किसी को विपक्ष मानो ही मत। कुछ करने से पहले मानना जरूरी है। मन का वहम निकालो और हो जाओ चालू। इतनी गंभीर और ज्ञान की बात को अगर बेसर करना हो तो फेसबुक में खोये रहो। दिन-रात, सुबह-शाम बस फेस बुक ही फेस बुक।
    अब तो भैया अपनी फेक-बुक को छोड़ो, पंच चाचा ने खाना खा लिया है। अब बे चूरी खाते हुए कह रहे है- “हाँ भई भाइड़ो ! फेसबुक से पेट नहीं भरेगा, कुछ खाना होगा। जो होगा देखा जाएगा। अब फेसबुक में बेसी दीदै ना लागाओ। जीमण जीमो और सुपारी-चूरी जो है, खा कर फुल मस्त हो जाओ।”
- नीरज दइया 

18 अगस्त, 2016

मीठी आलोचना का मीठा फल!!

पंच चाचा आज सुबह जल्दी उठ गए और मुझे समझाने में लगे हैं कि अब से जितने भी बड़े-बड़े संपादक, प्रकाशक और पुरस्कार समितियों से जुड़े लेखक-कवि हैं, उनकी किताबों की विस्तार से मीठी-मीठी आलोचनाएं मैं लिखा करूं। उनका कहना है भले इसे दूसरे लेखक प्रशंसा कहे, पर भविष्य में मुझे आलोचना बस मीठी-मीठी और जायकेदार ही लिखनी है।
ऊपरी तौर पर यह सलाह भले कठिन लगे पर इतनी भी कठिन नहीं है कि मानना असंभव हो। फिर इसे मानने से किसी का दम थोड़े ही निकलता है। आलोचना का तो मूलतः स्वभाव ही सामयिक और सोचने योग्य बातों से जुड़ना है। मधुरता को प्रचारित-प्रसारित करना है। यदि रसगुल्लों के लिए प्रसिद्ध शहर बीकानेर में भी रहकर भी मैं मीठी-मीठी आलोचना नहीं लिख सका, तो मेरा यहां रहना बेमानी है। ऐसा करने में लाभ ही लाभ है, यदि आलोचना ज्यादा मीठी हो जाए तो थोड़ी नमकीन खाने की भी सुविधा है।
पंच चाचा का तो कहना है कि जब भी कोई किसी की आलोचना लिखे, साथ में रसगुल्ले और भुजिया लेकर ही बैठना चाहिए। चलते-चलते कलम गलत दिशा में जाने लगे तो झट एक रसगुल्ला मुंह में डालो और कलम को संभालो। और कभी लगे कि मीठे से जी उकता रहा तो भुजिया फाक के स्वाद को पटरी पर ले आओ। पंच चाचा कहते हैं कि जरूरी नहीं हर कहानी संपादक को पसन्द आए और यह भी जरूरी नहीं कि हर किताब पर आलोचक लिखे। भाई संपादक को कोई कहानी पसंद करवाने के लिए कुछ खास तरकीबें हैं और आलोचक को खुश करने के तो बहुत से तरीके हैं।
मैंने कहा कि खास तरकीबों और बहुत से तरीकों से साहित्य का बेड़ा गर्क हो रहा है। अब तो स्वच्छता अभियान चल रहा है। साहित्य में फैलती जा रही गंदगी को अगर आलोचना साफ नहीं करेगी तो कौन करेगा। ये आपकी मीठी-मीठी आलोचना का ही असर है कि हर कोई लेखक-कवि होने का तगमा लगाए घूमता है। ऐसे में एक आलोचना ही है, जिसमें स्व-विवेक से आलोचक को तो बढ़ते रहना है। भाषा जानने-समझने वाले साथी लेखकों-आलोचकों की आलोचना अथवा पाठक-मित्रों के आग्रह से बेखबर। बाखबर यह स्व-विवेक ही है जो किसी आलोचक को स्थापित करता है। यदि मीठी-मीठी आलोचना होती रही तो एक खतरा यह भी है कि अंततः एक दिन ऐसा आएगा जब लोगों का आलोचना नाम से ही भरोसा उठ जाएगा।
पंच चाचा कहां हारने वाले थे, बोले- ‘मीठी आलोचना का मीठा फल!! कभी चखा हो तो जानो। कभी लिखो मीठी आचोलना तब पता चले कि यह मीठा फल क्या होता है। आलोचना लिखना जानते हो तो लेखकों की किताबों में सुंदर-सुंदर भूमिकाएं लिखो, ब्लर्ब लिखो। इससे मधुर संबंध बनते हैं। कभी वे आपके घर मीठा लेकर आते हैं तो कभी आप जाओ मीठा लेकर। इन संबंधों के कारण अनेक बिगड़े या बिगड़ते काम बन जाते हैं। कुछ लोग इसे एक दूसरे के संबंध भुनाना भी कहते हैं। ऐसी बातों से मन खराब नहीं करना चाहिए। हमें बस अपनी किताबें प्रकाशित करवानी है तो जो प्रकाशक करेंगे, उन से हमारे संबंध मधुर होने चाहिए। हमें पुरस्कार चाहिए तो ऐसे निर्णायक ही यह सच्चा और पुनीत कार्य करेंगे जिनसे हमारे संबंध मधुर हो। बिना मधुरता के कुछ भी संभव नहीं भतीजे। कान खोल के सुन ले- यह मधुरता ऐसे नहीं आती है, कई उपाय करने पड़ते हैं। मेरी भतिजियां तो फिर भी नैन-मटका कर के कुछ न कुछ हासिल कर ही लेती हैं पर तू ठहरा खूसट। तुझे मेरी बात माननी ही होगी। तू राजी हो तो ऐसा भी हो सकता है कि तेरी आलोचना के लिए कोई रेट फिक्स कर दूं, मतलब कुछ मीठा-मीठा अग्रिम ले लेते हैं। जैसा जो देने में सक्षम है, उस से वही कुछ लेने में बुराई कहां है। यूं सिर झुकाए मत बैठ। बोल, कुछ तो बोल।’
- नीरज दइया

12 अगस्त, 2016

हियै तराजू तोल के चक्कर में

र बात दो प्रकार की होती है। अंदर की और बाहर की। कहने वाले कहते हैं कि बाहर की बात अंदर जाती है और अंदर की बात बाहर आती है। बात के अंदर-बाहर आने-जाने के कई बार बात बदल जाती है। असली बात बीच राह कहीं खो जाती है। बात चाहे अंदर की हो या बाहर की, मगर बात लगातार होनी चाहिए। बात के समर्थकों का मानना है कि बिना बात के भी बात होनी चाहिए। यह सुन कर मुझे संदेह होता है कि जब बात होगी ही नहीं तब वह अंदर-बाहर कैसे आएगी-जाएगी। बात होती है तब हर जगह की बात अलग-अलग होती है, होनी भी चाहिए। बात पर स्थानीयता का प्रभाव अनेक स्तर पर होता है। किंतु क्या बात नहीं है तब भी ये स्थानीयता पीछा नहीं छोड़ती और दो अलग अलग जगहों पर बिना बात भी अलग-अलग बात संभव होती है। बात का होना या नहीं होना हमारे अंदर-बाहर होने या नहीं होने पर निर्भर करता है। हम एक जगह संतुष्ट नहीं होते इसिलिए कभी अंदर होते हैं और कभी बाहर। जब बात के अंदर होते हैं तब बाहर निकलना चाहते हैं और इसके विपरीत जब हमें बात से बाहर रख दिया जाता है तब बात के ऐन मध्य पहुंच कर नहीं मालूम क्या हासिल करना चाहते हैं।
फिल्म आनंद में राजेश खन्ना जब किसी अनजान आदमी से बात कर सकता है और हम जो जान-पहचान वाले से ही बात करने में कतराते हैं। घर पर कोई सगा-संबंधी आ जाए तो दो-चार सावल-जबाब के बाद सोचते हैं- आगे क्या बात करें? हम इधर-उधर की नहीं मूल बात जानना चाहते हैं कि कोई किस काम से आया है। कभी कहीं आप बिना काम ऐसे ही चले जाएं और यह कह भी दे कि ऐसे ही आ गया मिलने, तो सामने वाला विश्वास नहीं करेगा। उसे अंत तक यही लगता रहेगा कि किसी न किसी काम से ही आप उसके यहां पहुंचे हैं। आज के युग में इतनी जटिलताएं है कि बिना काम के कोई किसी के यहां आता-जाता नहीं। कहीं कहीं तो ऐसा भी है कि कहीं काम हो तो भी समयाभाव है। हम चाह कर भी कहीं आने-जाने में बहुत बार खुद को फसा हुआ पाते हैं और निकल नहीं पाते। इस समय में कोई खाली नहीं। सभी अपने में व्यस्त हैं। कुछ ने व्यस्ताएं ओढ़ रखी है। और कुछ नहीं तो इंटरनेट जो है हमारा बहुत सारा समय खा जाता है। आज जब हम कुछ नहीं, बस समय ही सब कुछ है। मैं सोचता जरूर हूं कि समय पर सही बात करूं पर अक्सर नहीं होता। कुछ समय तो ऐसे सोचते बीत जाता है कि अंदर की बात करूं या बाहर की। बात करता हूं पर बहुत आगे बात का सिरा खो जाता है और सोचने लगता हूं कि बात का आगाज ही गलत कर दिया था। पर मुंह से निकली हुई बात और कमान से निकला हुआ तीर भला वापस कब होते हैं।
‘हियै तराजू तोल के तब मुख बाहर आनी’ के चक्कर में बहुत बार बात तराजू पर तुलती नहीं और मैं चुप रहता हूं। कुछ ऐसे माहिर होते हैं जो बिना बात के भी ढेर सारी बातें कर सकते हैं। मसलन- कैसे हो? क्या कर रहे हो? कहां रहते हो? घर का मकान है या किराये का? इन दिनों क्या कर रहे हो? नौकरी में गुजारा हो जाता है क्या? बच्चे कितने हैं? बेटियों के लिए कोई लड़का देखा क्या? क्यों जमाना बहुत खराब है? तबियत कैसी है? कोई बीमारी तो नहीं? थके-थके उदास क्यों नजर आते हो? तुम्हारा शर्ट बहुत सुंदर है, कहां से खरीदा? हाथ में अंगूठी शनि की पहन रखी है क्या? क्या तुम ग्रहों पर विश्वास करते हो? अखाबार में सब लोग झूठा राशिफल क्यों पढ़ते हैं? मैं तो भूत-प्रेत को नहीं मानता, तुम मानते हो क्या?
ऐसी ढेर सारी बातें को करने से क्या फायदा जो किसी काम की नहीं हो। जो भीतर हो वहीं बाहर मुख पर होनी चाहिए। बातों के बवंडर को देख पंच चाचा कहते हैं- अंदर और बाहर की बात में फर्क क्यों?

09 अगस्त, 2016

वह खेत में उपजाता है कविता-कहानी

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले का एक छोटा-सा गांव है- परलीका। यह गांव अब आधुनिक राजस्थानी साहित्य में बहुत बड़ा मुकाम बना चुका है। पहली बात तो इस गांव ने कहानी-ग्राम की अवधारणा को साकार कर दिखाया है। दूसरा सच यह है कि इस गांव ने आधुनिक राजस्थानी कहानी को कई प्रमुख कहानीकार दिये हैं, वहीं कहानी-आंदोलन को समर्पित 'कथेसर' जैसी पत्रिका भी यहीं से वर्ष 2012 से प्रकाशित हो रही है। वर्षों पहले हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था- 'जय जवान, जय किसान।' यह नारा परलीका के एक सीमान्त काश्तकार जिनका नाम रामस्वरूप किसान है, के संदर्भ में सार्थक सिद्ध हो रहा है। सच में यह किसान ही है, जो खेत में अपना पसीना बहाकर खेती करता है। किंतु आश्चर्य इस बात का है कि यह किसान अपने खेत में पिछले बीस वर्षों से बीजों के स्थान पर शब्द डाल रहा है। इतना ही नहीं खेत में कविताएं-कहानियां उपजाता है। अथक मेहनती किसान के विषय में उल्लेखनीय है कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के बांग्ला नाटक 'रक्त करबी' का इसने राजस्थानी अनुवाद 'राती कणेर' नाम से किया, जिस पर साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार- 2003 अर्पित किया। इतना ही नहीं साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली की ओर से 'राइटर्स इन रेजीडेंसी' के तहत डेढ़ लाख रुपये की स्कॉलरशिप भी रामस्वरूप किसान को दी गई, जिसके अंतर्गत 'तीखी धार' कहानी-संग्रह प्रकाशित हुआ है। साथ ही इसी किसान की रचनाएं राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा कई विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों में शामिल हो चुकी हैं।                 
                  वर्षों से खेती और साहित्य में संलग्न रामस्वरूप किसान की रचनाएं और बाल अब पक चुके हैं। आप का जन्म परलीका में राजेराम बेनीवाल के छोटे से घर में 14 अगस्त, 1952 को हुआ। उनके ही गांव में रहने वाले मित्र कवि-कथाकार डॉ. सत्यनारायण सोनी लिखते हैं- 'किसी व्यक्ति को बढ़ी दाढ़ी व घिसे कपड़ों में ऊंटगाड़े पर बैठ नित्य खेत जाते देख कर कौन कह सकता है कि यह राजस्थानी का बड़ा कथाकार और कवि है।' इस बड़े कवि-कथाकार ने वर्तमान में बदल रहे ग्रामीण जन-जीवन का यर्थाथ जिस बारीकी से प्रकट करने का उपक्रम अपनी रचनाओं में किया है, उसे देख हर कोई विस्मित होता है। बहुत सरलता-सहजता से कुछ ही शब्दों में ऐसी मार्मिक बात किसान की रचनाओं में आती है कि वह सीधे दिल और दिमाग पर छा जाती है। 'घर में रमती कवितावां' नामक सीरीज की एक कविता देखें-'छत पर चढ़'र/ हेलौ मारदयौ/ कोई नीं सुणै/ छात रै लटक ज्यावौ/ सगळौ गांव/ भेळौ हुज्यै'। (छत पर चढ़ कर / आवाज़ देने से / कोई नहीं सुनता / छत से लटक जाने पर / पूरा गांव / एकत्रित हो जाता है।) 
                  किसान की कविता की मार्मिकता मूल भाषा राजस्थानी में कहीं अधिक गहराई के साथ उद्घाटित होती है। वे जिस टकसाली राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हैं, वह परलीका क्षेत्र में बोली जाने वाली स्थानीय भाषा है। वे श्रृंगारिक शब्दों से सुसज्जित और कलात्मक भाषा के विरोधी नहीं है, किंतु ऐसी भाषा और कविता किस काम की जो संप्रेषित ही नहीं हो, इसी स्थिति के लिए उनकी 'कांई कै'णौं चावै' की ये पंक्तियां उल्लेखनीय हैं- 'थांरी/ सिणगरयोड़ी भासा रै/ कामणगारै सबदां रो अरथ/ कोनी आवै/ खोल'र/ बता कवि/ कांईं कै'णो चावै?' (तुम्हारी / श्रृंगारित भाषा के / जादुई शब्दों का अर्थ / नहीं समझता / खुल कर / बता कवि / कहना क्या चाहता है?) यहां संवाद की जीवंत भाषा उनको सीधा जन-जन से जोड़ती है।
                   साहित्य में पहला कदम रामस्वरूप किसान ने राजस्थानी काव्य-कृति 'हिवड़ै उपजी पीड़' से रखा। इस कृति में सात सौ से अधिक दोहें हैं। यह रेखांकित करने योग्य है कि राजस्थानी भाषा अपनी मान्यता के लिए संघर्षरत है और प्रकाशन व्यवसाय नाजुक हालत में है। राजस्थानी पुस्तकों की पहुंच पाठकों तक नहीं है या कहें कि खरीद कर पढ़ने वाले पाठक बहुत कम हैं। ऐसी विकट स्थितियों में भी किसान की इस पुस्तक के अब तक तीन संस्करणों का छपना एक कीर्तिमान है। कवि ने परम्परागत दोहा छंद में आधुनिक भावबोध के साथ मर्मस्पर्शी व्यंजनाओं में अपने अनुभवों-अनुभूतियों को यहां साझा किया है। वहीं चित्रात्मक भाषा द्वारा भावों की सरस प्रस्तुति भी। अपनी लघु-पुस्तिका 'कूक्यो घणो कबीर' में 'कीड़िया' को संबोधित सोरठा-प्रयोग किसान ने किया है, तो 'आ बैठ बात करां' में उनकी छंद-मुक्त राजस्थानी कविताएं हैं। मूल हिंदी में एक लम्बी कविता के रूप में कृति 'गांव की गली-गली' का भी प्रकाशन हुआ है। जिसके विषय में वरिष्ठ कवि विजेन्द्र ने लिखा है- 'किसान ने हिंदी को राजस्थानी की ऊर्जा से सींचकर हिंदी को समृद्ध किया है- यह इस कविता की बड़ी उपलब्धि है।' 
                  आधुनिक संदर्भों में संबोधन काव्य का अति आत्मीय रूपांतरण अथवा कहें नव-प्रयोग कृति 'आ बैठ बात करां' में हुआ है। कवि किसान ने जिस अंतरंता से अपने घर में पत्नी से बात करने का उद्घोष किया है, वह बेहद मर्मस्पर्शी और अद्वितीय है। मामूली से मामूली बात को कविता में मार्मिकता के साथ रूपांतरित कर देना उल्लेखनीय है- 'पतझड़ री/ छाती पर/ पग धर पूगां/ बसंत रै घरां/ आ बैठ/ बात करां।' (पतझड़ की/ छाती पर/ पैर रख कर पहुंचे/ बसंत के घर/ आ बैठ/ बात करें।) 
                  ऐसा कहने की क्षमता रखने वाले इस विरल संवेदना के कवि में अक़सर मित्र फैसला नहीं कर पाते कि ये किसान बड़ा कवि है, या बड़ा कहानीकार। और तो और, इसमें किसी बड़े साहित्यकार से भी बड़ा एक इंसान बसता है। जिसे गांव की गली-गली प्यार करती है और जो मित्रों-परिजनों को देखते ही खिल उठता है। दुश्मन के लिए भी बांहें फैलाए चौड़ी छाती सामने करने वाले ऐसे इंसान को ठीक से समझ पाना सरल नहीं है। 
                  'जद-जद/ खाली हाथ/ बा'वड्यो म्हैं घरां/ हांस'र जेब में हाथ मारयौ/ थूं म्हारी/ देखयो तो कविता लाधी/ रिपियां सूं घणौं मान दियौ/ थूं म्हारी कविता नै।' (जब-जब/ खाली हाथ लिए/ मैं घर लौटा/ हंस कर/ जेब टटोलती तुम मेरी/ देखा तो मिली कविता/ रुपयों से अधिक मान दिया/ तुमने मेरी कविता को।) यह रहस्योद्घाटन है जिसमें किसान अपनी अर्द्धांगिनी आनंदी जी को अपनी कविता के निरंतर परिष्कृत होने का श्रेय देते हैं। उनका पूरा परिवार और गांव स्वयं को आनंदित महसूस करता है। किसान मूलत: कवि हैं और कहीं भी हो वह सदा अपनी दुनिया में खोये रहते हैं। जब कभी अपने बेटे की दुकान में बैठने का अवसर आता है, तब भी वे वहां कविता की संभावना तलाश लेते हैं। उनकी एक मूल हिंदी कविता है- 'बेटा जब कभी बाहर जाता है/ अपनी लोह-रछ की दुकान में/ मुझे बैठा जाता है।/ सामान से ठसाठस दुकान/ लिखने का कमरा बन जाती है।/ जिसमें बैठा मैं/ वहां होते हुए भी वहां नहीं होता,/ ग्राहक खाली हाथ लौट जाते हैं।/ बेटा जब लौटता है/ कविता आगे रख कहता हूं-/ आज की कमाई।/ उसके चेहरे से फिसलकर/ एक फीकी मुस्कान/ दुकान में तैरने लगती है।' जिस आदमी ने ठान लिया हो कि उसे बस कवितामय ही रहना है, तो उस के लिए सर्वत्र कविता ही कविता है। वह सोता है जब तक आंख खुली रहती है तब तक छत को ताकते हुए कविताएं ही कविताएं सोचता है। 
                  रामस्वरूप किसान कवि के साथ-साथ निर्भीक संपादक भी हैं। अपनी त्रैमसिक पत्रिका 'कथेसर' के संपादकीय में लेखन, लेखक और जीवन के गूढ़ विर्मश बड़ी सहजता से लिखते हैं। किसी भी मुद्दे पर वे बेबाक लिखने से नहीं चूकते। राजस्थानी कहानी 'दलाल' से रामस्वरूप किसान चर्चा में आये, जिसे 'कथा' संस्था द्वारा पुरस्कृत किया गया और अंग्रेजी अनुवाद द्वारा यह पूरे देश में राजस्थानी कहानी के कीर्तिमान के रूप में चर्चित रही। बेहद छोटे से कथानक व थोड़े से संवादों के बल पर जिस कलात्मकता से किसान ने पशु-दलाल के चरित्र में मानवीय दृष्टिकोण को व्यंजित किया है, वह निसंदेह अविस्मरणीय है। किसान के अब तक तीन राजस्थानी कहानी-संग्रह- 'हाडाखोड़ी', 'तीखी धार', 'बारीक बात' तथा एक लघुकथा-संग्रह- 'सपनै रो सपनो' प्रकाशित हो चुके हैं। किसान की राजस्थानी कहानियों का हिंदी अनुवाद डॉ. सत्यनारायण सोनी ने किया है, जो जल्द ही पुस्तकाकार प्रकाशित होने वाला है। निश्चय ही इस प्रकाशन से किसान के भीतर बसने वाले महान कहानीकार को भारतीय कहानीकर के रूप में पहचाना जाएगा। 
                   किसान की रचनाएं अपनी लौकिक भाषा स्वरूप में अनेक संभावनाएं लिए हुए हैं। वे अपनी रचनाओं में किसी शब्द के लिए शब्दकोश के बजाय गांव परलीका के जन-जन के कंठों से पोषित भाषा का प्रयोग महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके इन दिनों चर्चित कहानी-संग्रह 'बारीक बात' के संदर्भ में कवि मोहन आलोक ने अद्भुत भाव-भंगिमा की बेजोड़ यात्रा का क्लासिकल पड़ाव मानते हुए राजस्थानी में लिखा- 'किसान की कहानियां अपने शिल्प को साथ लेकर प्रगट होती हैं। यह एक ऐसा शिल्प है जिसे शिल्प नहीं, उनका भाषाई स्वभाव कहना उपयुक्त होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक अपने लेखन में 'मचान' पर खड़ा होकर आपने खेत की रखवाली कर रहा है, और भाषा के बुलबुले उसके चहुंदिस तैर रहे हैं।' 
                  खेत में कड़ी मेहनत के बल पर जीवनयापन करने वाले राजस्थानी के इस अनूठे साहित्यकार रामस्वरूप किसान का भाषा मान्यता आंदोलन में भी सक्रिय योगदान रहा है। इन्हें राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर के मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा पुरस्कार सहित अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार एवं सम्मान मिल चुके हैं। साथ ही इनकी अनेक रचनाएं कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।
  
दुनिया इन दिनों  15 अगस्त, 2016 अंक में प्रकाशित। ब्लॉग पोस्ट लिंक

01 अगस्त, 2016

फन्नेखां लेखक नहीं

जिस तरफ जिंदा आदमी की पहचान है उसकी सांसें, उसी तरह किसी लेखक की पहचान क्या होनी चाहिए? सीधा सा इसका जबाब है- उसका लेखन। अगर कोई आदमी सांस नहीं ले रहा या कहें जिसकी सांसें पूरी हो चुकी होती है, वह मृत कहलाता है। इसी तर्ज पर पन्नेखां को मृत लेखक मानना चाहिए। जो लेखन से थक-हार कर वर्षों से कलम को दूर फेंके बैठा हो, उसे मरा हुआ लेखक माने जाने में हर्ज ही क्या है? माना पन्नेखां जिंदा है, वह रोज उठता है खाता-पीता और सोता है। यह काम तो हर इंसान करता है, लेखक का होता यानी हमेशा नहीं तो दो-चार दिन से, या फिर महीने-साल में कभी तो लिखना होना चाहिए या कि नहीं। पन्नेखां की आखरी किताब बीस साल पहले छपी। मान एक नहीं पांच-सात छपी और कई पुरस्कार मान-सम्मान भी मिल गए या ले लिए तो क्या हुआ। वे तब लेखक थे अब नहीं है। पर उनके भक्त हैं कि अब तक उनकी अर्थी को ढोते चले जा रहे हैं। आखिर कब तक ढोता रहेंगा कोई किसी की अर्थी। जाहिर है कि या तो फन्नेखां को मर जाना चाहिए या फिर अर्थी पर ही यकायक बैठ जाना चाहिए। गला फाड़ कर चिल्लाना चाहिए- अरे भैया, नीचे उतारो। मैं अब लिखना चाहता हूं।
      पंच चाचा के विचार हैं- लेखक अमर होता है। कोई लेखक संसार से चला भी जाता है तो भी वह अपने शब्दों के सांसार में जिंदा रहता है। फन्नेखां ने जब कभी लिखा और खूब लिखा, तभी तो वह लेखक है। जो एक बार जो लेखक हो गया, वह तो हमेशा के लिए लेखक रहेगा। लेखक को लेखक मानना पड़ेगा, उसकी मरजी है कि वह लिखे या नहीं लिखे। किताब छपाए या नहीं छपाए। किताब तो जब छपेगी छप जाएगी। हो सकता है वह लिख-लिख रियाज कर रहा हो। रियाज बहुत जरूरी है। क्या पता इसी रियाज से आगे चल कर वह ऐसा कुछ रचे जिस पर नोबल पुरस्कार मिल जाए।
      मैंने पंच चाचा से कहा कि हमारे राजस्थान से नोबल के लिए नामित लेखक विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने भी खूब रियाज किया था। बताते है कि तीन सौ कहानियां और तेरह सौ कविताएं लिखी फिर संकल्प किया अपनी मातृभाषा में लिखने का। वे रवीन्द्र को अपना एक गुरु मानते थे और अपने गुरु की तरह नोबल लाने की पूरी इच्छा थी। तभी तो उस दरवाजे तक पहुंचे। मैंने माना पंच चाचा ठीक और लोग गलत कहते हैं। हो सकता है कि पिछले बीस वर्षों से फन्नेखां जी भी रियाज करते रहे हो। रियाज के कई प्रकार है और उसमें गुप्त रियाज का बड़ा महत्त्व है। ऐसा रियाज जिसे जीते-जी जाहिर नहीं किया जाता।
      हमारे बिज्जी ने रियाज किया था और उसे जाहिर भी किया। अपने आत्मकथ्य और साक्षात्कार में बिज्जी बोले कि उन्होंने तीन सौ कहानियां और तेरह सौ कविताएं लिखी थी। जो बिज्जी से परिचित हैं वे जानते हैं कि वे खुद को खुली किताब की तरह रखते थे। बोरूंदा में उनके पत्राचार, लेखन-विमर्श सभी खुली किताब की तरह उनके जीवन काल में रहे और आज जब वे संसार में नहीं है तब संकट आ गया कि तीन सौ में से तीन कहानियां और तेरह सौ में से एक कविता भी किसी की आंखों के सामने नहीं आ पा रही है। नोबल के लिए नामित लेखक के आरंभिक-सफर को जानने को पाठक-लेखक की उत्सुकता और बेताबी स्वभाविक है। काश ऐसा होता कि बिज्जी के जीवनकाल में यह रहस्य उजागर हो जाता। आज यह संकट देखना-सहना नहीं पड़ता। खैर हुआ सो हुआ। जो होता है वह अच्छे के लिए ही होता है। इस पाठ से हमें सबक लेना है कि ऐसी साधना से हमारा पाठक-वर्ग वंचित नहीं रहे। पन्नेखां विषयक चिंता वाजिब है। फन्नेखां लेखक नहीं है, ऐसा आरोप उनकी गुप्त-साधना के जग-जाहिर होने से ही निराधार हो सकेगा। 
१६-१२-२०१६ नया अर्जुन श्रीगंगानगर में