09 मार्च, 2017

गंभीरता की खोज

डॉ. नीरज दइया
    आज सुबह-सुबह एक अजीब बात हुई। जब मैं छत पर कपड़े सूखाने जा रहा था तो मेरा लड़का मेरे पीछे-पीछे लगभग दौड़ते हुए आया और बोला- ‘आप रहने दो। मैं कर लूंगा। आप ये सब क्यों करते हैं?’
    मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही, पहली बात तो आज वह इतना जल्दी कैसे उठ गया? दूसरा वह कपड़े सूखाने के लिए छत पर क्यों जा रहा है? मैं पूछे बिना नहीं रह सका- ‘माजरा क्या है?’
    वह तपाक से बोला- ‘आप समझते नहीं। लोग मजाक बनाते हैं।’
    दिन का आगाज ही कुछ अजीब सा हो रहा था, मेरा लड़का कह रहा है कि मैं समझता नहीं हूं। मैं इसका बाप हूं और इस सदी में जन्मा यह बेटा, मुझे मेरी ‘समझ’ के बारे में प्रमाण-पत्र जारी कर रहा है। मैं इस बात को किसी गम की तरह निगल गया और उससे पूछा- ‘लोग क्या मजाक बनाते है?’
    ‘अरे रहने दीजिए ना, आप कोई दूसरा काम देखिए। यह मैं कर दूंगा।’
    ‘नहीं, मुझे भी तो पता चले कि क्या मजाक बनाया जा रहा है?’
    ‘वे कहते हैं कि तम्हारे पापा कपड़े धोते हैं। हमने अपनी आंखों से उन्हें तुम्हारी मम्मी के कपड़े सूखाते देखा है।’
    ‘कौन कहते हैं ऐसा? वे ऐसा कहने वाले कौन होते हैं?’
    ‘अरे ऐसा मजाक होता है। मैंने कहा ना- आप छोड़िए और इसे भूल जाओ। अब से मैं जल्दी उठूंगा और कपड़े मैं सूखाने जाया करूंगा या फिर खुद मम्मी। आप हर्गिज नहीं जाएंगे। कपड़े सूखाने जाते आपको शर्म नहीं आती ?’
    ‘अरे इसमें शर्म कैसी? यह तो घर का काम है। मिल कर कर लेते हैं। तेरी मम्मी कपड़े धोती है और मैं छत पर उन्हें डालने चला जाता हूं। इसमें ऐसी कौनसी आफत आ जाती है। मिलजुल कर काम करना क्या बुरी बात है।’
    ‘आप भाषण मत दिया करो। मैं जैसा कहता हूं, वैसा कीजिए। वर्ना मेरी बहुत इंसल्ट होती है।’
    मैं मन ही मन इक्कीसवीं सदी की संतानों और उनके संस्कारों को लानत भेजता हूं। खुद को खुद ही कोसता हूं। कैसे नगीने पैदा किए हैं, जो अपने समझ पर शक करते हैं और नेक बातों को भाषण समझते हैं। सुबह-सुबह की जल्दबाजी में इस मुद्दे को छोड़ना ही ठीक था। वैसे किसे दोष दिया जाए। अपने लाडले को हमने अपने सिर पर खुद ही चढ़ाया है, और अब यह इतना ऊपर चढ़ चुका है कि कभी-कभी लगता है कि सिर पर बैठ कर जूते मार रहा है। मुझे लगा कि इसके साथी समझदार नहीं बेवकूफ हैं। यह भला क्या मजाक हुआ ! कौन अपने घर में क्या करता हूं और क्या नहीं, इन सब बातों से उन्हें क्या लेना-देना? अगर गली के पीछवाड़े अपनी पत्नी की साड़ी सूखाने में ऐसी आफत टूटती है, तो आगे से यह काम बंद। एक फिल्म आई थी- ‘नौकर बीबी का’ जिसमें गाना था जमाना तो है नौकर बीबी का...। मुझे लगा आज घर में फिल्म का नया संस्करण जारी हो गया है। मैं उसके दोस्तों के मजाक में मजाक बन कर रह गया हूं। 
    मैं अपने पुराने दिनों की यादों में खो गया। मजाक और होली का कितना पुराना संबंध रहा है। पर अब वे दिन कहां। अब तो होली हो या दीपावाली सब के सब ऐसे हो गए है कि पुरानी सब बातें तो भूलने में ही भला है। मन बार-बार बीते दिनों को याद करता है। वे भी क्या दिन थे। हम भी कभी मजाक किया करते थे और कोई हम से भी मजाक किया करता था। ससुराल और जीजा-साली की मजाक का आनंद अब किताबों की बातें बन कर रह गया है। जनसंख्या के कंटोल में जैसे वे सब मजाक भी कंटोल हो गए हैं। अब ससुरल जाओ तो सास मिलती है। सास से मजाक नहीं किया जा सकता है। मजाक तो घरवाली से भी कहां किया जा सकता है। दोस्तों से करें मजाक करे तो वे नाराज हो जाते हैं। लगता है कि लोग मजाक समझना ही भूल गए हैं। दूसरी तरफ यह नई पीढ़ी है जो मजाक बनाती है तो कैसे-कैसे। ऐसे मजाक के चलते मैं अपने घर में कपड़े सूखाने में बीबी की मदद भी नहीं कर सकता। यह विषय जरा गंभीर हो गया है। संपादक जी ने कहा कि कुछ हल्का-फुल्का व्यंग्य हो। संपादक जी का व्यंग्य है कि भारी व्यंग्य आजकल कोई समझता नहीं। सोचने की बात तो यह है कि क्या चारों तरफ गंभीरता का राज्य स्थापित हो गया है?  
    संयोग ऐसा बना कि ऑफिस पहुंचा तो वहां एक किस्सा हाथ लगा। मुझे लगा मजाक और गंभीरता दोनों की बातें फिकी पड़ गई हैं। हो ना हो अब गंभीरता की खोज करनी ही होगी। बॉस ने मिस्टर के. एल. राठौड़ को बुला कर कहा कि मिस्टर राठौड़ आप बिल्कुल सिरियस नहीं हैं।
    मि. राठौड़ बोले- ‘जी सर, मैं बिल्कुल सिरियस नहीं हूं। अगर सिरियस होता तो ऑफिस क्यों आता। होस्पिटल में जा कर एडमिट नहीं हो जाता।’ इतना कहना था कि बॉस का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। भला ऐसा भी कोई कर्मचारी होता है जो साहब की जरा-सी बात नहीं समझे। यह तो बात का बतंगड़ बनाना हुआ। यूनियन लीडर बीच में बोल रहा था कि हरेक बॉस का पारा सातवें आसमान पर रहता है और वर्करस के पारे को तो जैसे पाला मार गया है। राठौड़ जैसे दो-चार हों तो कुछ बात बने। काम सभी करते हैं फिर भेद-भाव क्यों? मुझे यह सवाल गंभीर लगा।
    मैं गंभीर चिंतन में खो गया। विचार करने लगा कि पूरे सिस्टम में गंभीर कौन है? कौन है जो अपने काम की गंभीरता नहीं समझता, कौन है जो हर वक्त मजाक-मस्ती में खोया रहता है? काम के समय काम होना चाहिए और मजाक-मस्ती का भी अपना समय होना चाहिए। कुछ का मानना है कि मजाक-मस्ती में दिन-रात निकल जाए और जिंदगी गुजर जाए तो अच्छा है। कुछ मानते हैं कि मजाक-मस्ती से जरूरी काम को मानना चाहिए। जीवन में काम ही सब कुछ होना चाहिए। यहां फिर मजाक करना चाहिए। जीवन में अब केवल ‘काम’ ही रास आता है। यह सस्ता मजाक है। गंभीर लोगों का मजाक भी गंभीर होना चाहिए। ये क्या हुआ कि मजाक मस्ती करते रहें। ये तो कभी भी कर लेंगे। ‘काम’ का अपना समय होता है और अगर वह निकल जाए तो लौटकर नहीं आता। जिंदगी के इस गणित को समझते-समझते अब मैं तो मजाक मस्ती को जैसे भूल ही गया हूं। पूरी गंभीरता से घर में काम करता हूं और दफ्तर में भी काम करता हूं। मैं तो दिन-रात बस काम में ही खोया रहता हूं। यह माना कि बिना अपनी उम्र का लिहाज किए काम में खोए रहना ठीक नहीं। मेरे काम में खोए रहने और कड़ी मेहनत के बाद जब ग्रेड देनी की बारी आती है तो साहब लिखते हैं- ‘गुड’। तेल और मक्खन लगाने वाले चम्मच भले कोई भी काम में करें, उन्हें देखने कहने सुनने वाला कोई नहीं। आज ऐसे लोगों का ही बोलबाला है।
    हमारे समय की त्रासदी है कि हर कोई समझता है कि सिर्फ वह गंभीर है, बाकी सब तो यूं ही झख मार रहे हैं। बस गाड़ी चल रही है। मैं नहीं चला रहा, तुम नहीं चला रहे और वे भी कुछ कर नहीं रहे। फिर समझ में नहीं आता कि देश किस के भरोसे चल रहा है। सत्ता पार्टी को भ्रम है कि वे देश को चला रहे हैं, किंतु विपक्ष कहता है कि देश चल नहीं रहा, रुक गया है। सुनता हूं कि देश के कर्णधार गंभीर नहीं है। सोचता हूं कि विज्ञान ने इतनी प्रगति की है तो काश ऐसा संभव हो जाए कि कोई दवाई गंभीरता की इजाद कर ली जाए। फिर जो गंभीर नहीं लगे, उन्हें गंभीरता की दवा दे कर गंभीर बना दिया जाएगा और देश गतिशील हो जाएगा। अपने काम और व्यवहार के प्रति गंभीर होना ही देश की तरक्की का मूल-मंत्र है। जब हम सब गंभीर होंगे तो किसी घर के या पराए देश तक की हिम्मत नहीं हो सकती कि हमारे गंभीरता को जरा भी कम कर दे।
    मैंने पंच काका से बात की तो वे बोले- भारत में गंभीरता नाम की एक चिड़िया थी। जिसे सब लोग सोने की चिड़िया कहा करते थे। सोने की चिड़िया उड़ गई और गंभीरता हमारे देश से गायब हो गई। अब तो ऊपर से लेकर नीचे तक सारे मजाकिया लोग इक्कठे हो गए हैं। स्कूल में बच्चे पढ़ते नहीं। मास्टर पढ़ाते नहीं। शिक्षा और संस्कार चौपट। सभी सरकारी दफ्तरों का बुरा हाल है। अस्पतालों में मरीजों के लिए माकूल व्यवस्था नहीं है। पुलिस का हाल बेहाल है। सब खाने में लगे हैं। कोई काम के प्रति गंभीर नहीं है। काम हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो भी ठीक। बच्चे गंभीरता को खोजोगे तो खोजते रह जाओगे। अगर गलती से गंभीरता कहीं मिल भी जाए तो मुझे बताना। उसकी जांच करनी होगी कि असली गंभीरता है या कि ओढ़ी हुई छद्म गंभीरता है।


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