29 नवंबर, 2017

समस्या-समाधन गीता

 आज देश में समस्याएं बहुत सारी है। यहां मैं समस्याएं गिनाने लगूं तो गिनाते-गिनाते रात हो जाएगी। इतना समय ना आपके पास है और ना मेरे पास। आपका बस थोड़ा सा समय लूंगा। अधिक कुछ कहने या सुनने की यह बात भी नहीं है। बात बस इतनी सी है जो मैं कहना चाहता हूं कि अगर आज ढेरों समस्याएं है तो उनके लिए ढेरों समाधान ढूंढ़ने की जरूरत ही नहीं है। आप कहेंगे ऐसा कैसे? तो भाइयों और बहनों ऐसा ही है। इतनी सारी समस्याओं जब भगवान ने इस संसार में बनाई है तो वे अंतर्यामी हैं। उन्होंने इन सब का समाधन पहले बनाया है। आज पढ़े-लिखे लोग धर्म से कटते जा रहे हैं। अरे मनुष्य है तो उसका अपना धर्म भी है। बिना धर्म के कोई आदमी हो ही नहीं सकता। धर्म की बात करते ही विपक्ष वाले शोर करते हैं, कुछ लोग इसे धार्मिक कट्टरता कहते हैं। मेरा कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। हम सब भाई-भाई है। यह देश हम सब भाइयों का है तब अगर किसी को यहां रहना है तो वे भाई बनकर रहें। अगर यह बात भी जिनके गले नहीं उतरती वे गद्दार है। छोड़िए इन सब बातों को फिर कभी.... अभी तो मैं मुद्दे की बात बता रहा हूं। मुद्दा यह है कि हमारी सारी समस्याएं एक तरफ और एक तरफ गीता। आज के दौर में हमें बचना है या कहें संभलना है तो बस एक समाधान है गीता। हमारा हाथ थामने या हमें बचाने के लिए कोई बाहर से नहीं आएगा। हमें बस गीता ही बचा सकती है। और पूरा पांडाल करतल ध्वनी से गूंज उठा।
माननीय नेता जी फिर गीता-रहस्य समझाने लगे। मैं कहना चाहता हूं- आप और हम गीता को भूलाकर कभी आगे बढ़ ही नहीं सकते। हमें आगे बढ़ना है और देश को आगे बढ़ना है तो गीता ही हल है। प्रगति का पथ है गीता। आपको और हमको किसी दूसरे तीसरे की तरफ झांकने या मुंह करने की जरूरत नहीं है। क्या समझे, हमारी सारी समस्याएं सारे झगड़े और जो भी कुछ है उन सब का समाधान है गीता। कुछ लोग फिर इसे राजनीति का रंग देंगे। भाइयों और बहनों इसमें कोई राजनीति नहीं है। इसमें दूर दूर तक राजनीति नहीं है। पर यह सारी राजनीति का भी समाधान है। जिन समस्याओं की बात हम कर रहे हैं उनमें राजनीति भी एक समस्या है। अब समय आ गया है कि हमें खुल कर बोलना होगा। मैं आप सब के भले की बात कर रहा हूं। अपना भला ही देश का भला होता है। यह स्वार्थ नहीं है। भैया जब यहां का आम आदमी तरक्की करेगा तभी तो देश तरक्की करेगा। आम आदमी की सारी समस्याओं का हल है गीता। चलिए आप में से कोई आदमी खड़ा हो जाए और वह कोई एक समस्या यहां रखें तो अभी हल हो जाता है।
आम आदमी एक खड़ा होकर हाथ जोड़ते हुए बोला- ब्लू व्हेल.... उसका इतना कहना था कि पांडाल तालियों से गूंज उठा। नेताजी के चेहरे पर चिर मुस्कान कुछ अधिक ही फैलने लगी। वे बनावटी हंसी के साथ फिर कहने लगे- ब्लू व्हेल जैसे खेल के विनाश से गीता ही बचा सकती है।... बच्चे और बड़े-बूढ़े सब अपनी अपनी समस्या का समधान गीता में खोज सकते हैं। कहीं आने-जाने या फिर किसी से कहने-सुनने की जरूरत नहीं है।...भाषण जारी था, यह समाधान रहस्य लिए लौट आया। अब समस्याओं के समाधन गीता में खोज रहा हूं।
० डॉ. नीरज दइया
 

22 नवंबर, 2017

हम बड़े गली संकरी

यह समझना इतना आसान नहीं है कि देखा और समझ आ जाए। बड़े और छोटे का खेल निराला है। लो इधर देखो, यह लाइन देखो और बताओ यह छोटी है या बड़ी? क्या बोले, तुम इसे छोटी लाइन कहते हो भैया। नहीं भैयाजी देखो.... और उन्होंने उस लाइन के पास एक दूसरी लाइन खींच कर उसे छोटी लाइन को बड़ा साबित कर दिया। वे मुस्कुराते हुए बोले- यह मायाजाल है, दुनिया का भ्रम है। धोखा है। भैया, वास्तव में कोई छोटा-बड़ा होता ही नहीं है। सब अपने अपने कर्मों का लेखा-जोखा है कि यहां कोई छोटा दिखाई देता है और कोई बड़ा। ध्यान से सुनो, बताता हूं- बहुत बड़े-बड़े लोग, खूब पैसे टक्के कमाने वाले बड़े लोग... क्या समझते हैं- हम बड़े गली संकरी। पर भैया टेम-टेम की बात है, आज जो गली संकरी लग रही है वो समय बदलने पर बड़ी भी लग सकती है और ऐसा भी हो सकता कि बिल्कुल छोटी हो जाए। नाली जैसी। नहीं समझे.... उन्होंने कहा और मैंने अपना आपा खो दिया- नहीं तो ये सब बातें आप मुझे क्यों समझा रहे हैं। आप अपना ज्ञान अपने पास रखिए। मेरे पास खुद अपना ही ज्ञान बहुत है, मुझे क्या समझ रखा है? अपना काम करो।
फिर वे मुस्कुराते हुए बोलने लगे- नहीं भाई, तुम तो नाराज हो गए। तुम लेखक हो और ऐसी गहन गंभीर बातों पर तुम नाराज नहीं हो सकते। तुम्ही तो हो जो रहस्य समझ सकते हो। भाई साहब ऐसे तमतमाओ मत। चलो बताओ, मुझे कुछ पूछने-जानने का तो अधिकार है ना? तो मैं उसी अधिकार के नाते तुमसे जानना चाहता हूं कि कबीरजी ने लिखा था- ‘प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय!’ यह शब्द संकरी है या सांकरी? माना की संकरी और सांकरी का एक ही अर्थ है और मात्रा से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। पर मात्रा से अंतर तो पड़ता है ना मेरे भाई। जैसे नर में मात्रा बढ़ाओ तो नारी बन जाता है। अरे केवल अ को आ की मात्रा में बदलने का मजा देखो कि गली से शब्द गाली बन जाता है।...
- नहीं तो जब मैंने कह दिया कि आप ज्ञानी हो और मुझे आपका ज्ञान नहीं चाहिए। फिर आप जबरदस्ती क्यों लादते जा रहे हैं। माना कि यह आपका अधिकार है कि कोई सवाल पूछ सकते हैं, पर यह क्या ऊट-पटांग जो जी में आता है, बकते जा रहे हो। लाइन छोटी-बड़ी और फिर कबीर... ये सब क्या है? मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? उनके चेहरे की मुस्कान पर कोई ब्रेक नहीं लगा। उनकी मधुर मुस्कान और बकबक जारी रही। वे कह रहे थे- मेरा उद्देश्य आपको परेशान करना कतई नहीं है भैयाजी। मैं एक चिंतनशील प्राणी हूं और जाहिर है कि आप लेखक हैं तो आप भी चिंतनशील प्राणी हैं। जब दो चिंतनशील प्राणी मिल-बैठे तो आस-पास वालों को लगना चाहिए कि कोई गंभीर विषय पर चर्चा हो रही है। क्या मैं गलत कह रहा हूं...?
मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा- भैया मेरे लेखक के पास बहुत सारी समस्याएं और चिंतन के विषय पहले से है। आप नाहक परेशान हो रहे हैं, आपको जो करना है करें और मुझे जो करना है वह मैं करता हूं। वे फिर बीच में बोल पड़े- अरे जब सब अपना-अपना काम करेंगे तो यह चिंतन-मनन-मंथन कौन करेगा। शब्द तो ब्रह्म है। हमारी इस विरासत और देश का क्या होगा?... वे बोलते चले जा रहे थे।
डॉ. नीरज दइया


14 नवंबर, 2017

गिनीज़ विश्व कीर्तिमान की कढ़ी

अरे जनाब, जब पूरा देश दौड़ में शामिल है फिर आप पीछे कैसे रह सकते हैं। आपको भी दौड़ना होगा। हम आपका भ्रम तोड़ देंगे। फिर यह नाम दर्ज करवाने की दौड़ है। गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। आपको भी लालायित होना चाहिए। वैसे मेरा मानना है- यह हो नहीं सकता। आप जरूर भीतर ही भीतर लालायित हैं, पर अपनी लालायित-लालिमा को प्रगट नहीं कर रहे। चलिए देश में खिचड़ी बनी और एक कीर्तिमान अर्जित हो गया। वैसे हमारे यहां खिचड़ी पहली बार नहीं पकी, रिकार्ड के लिए तो लोग वर्षों से खिचड़ी पकाते रहे हैं। यह अब सार्वजिक हो गया कि हम खिचड़ी बड़े स्तर पर पका सकते हैं। ऐसी अनेक सफलताएं हम अर्जित करेंगे और पूरे गिनीज विश्व कीर्तिमान की कढ़ी कर देंगे। कढ़ी से याद आया हम खिचड़ी की तुलना में कढ़ी बनाने में ज्यादा उस्ताद हैं।
कुछ लोग वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने में जी-जान लगा देते हैं और हमें तो जी-जान लगाने की जरूरत नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि हमारा ‘जी’ तो टीवी और न्यूज वालों ने ले चुरा लिया है। अब हमारी ‘जान’ बिना ‘जी’ के है। हमारी किसी को परवाह नहीं है। यह पूरा सत्य नहीं है। क्यों कि जान है तो जहान है। फिर जान-जहान में हम योग गुरु जो ठहरे। हमने माननीय प्रधानमंत्री जी को आगे किया और राजपथ पर योग कर डबल गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। पहला तो 35 हज़ार से ज़्यादा लोगों के एक साथ योग करवाने का और दूसरा 84 देशों के नागरिकों के एक साथ एक जगह योग करवाने का। काश! हम खिचड़ी खाने के लिए भी 84 देशों के नागरिकों को आमंत्रित कर लेते तो यह भी डबल हो जाता। हम यह कसर कढ़ी बनाते वक्त पूरी करेंगे।
हमारे कढ़ी प्रोग्राम में जिनको नहीं आना उनके लिए बता दें कि हमने जब दुनिया में सबसे बड़ी जलेबी और इमरती बनाकर रिकॉर्ड बनाया था तब भी आपको बुलाना भूल गए थे। इसलिए कढ़ी के कार्यक्रम में आप जरूर पधारें। वैसे नहीं आ सकें तो चिंता भी नहीं करें। हम रुकने वाले नहीं। फिर मौका देंगे। हमारे पास खूब विचार है। हम विचारों की खान हैं। हम आपको टांग खींचने का रिकॉर्ड बनाते वक्त याद करेंगे। वैसे तो हम यहां दूर बैठे हुए भी आपकी टांग खींच सकते हैं। आपकी इज्जत उतार सकते हैं। इज्जत की बात पर याद आया कि इटली के सिल्वियो साबा ने महज 30 सेकेंड में 13 अंडरवियर पहनकर अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करा लिया। हमें इतनी उछल कूद की जरूरत नहीं। भारत का वर्ल्ड रिकॉर्ड यह भी है कि पढ़ने वाले और देखने-सुनने वालों में अंडरवियर जैसे विषयों में अपरोक्ष रुचि बड़े शर्म के साथ हम दर्शाते हैं। पहले हमारे यहां ऐसे विषयों पर प्रतिबंध था, अब हमने भी सारे पर्दे हटा दिए हैं।
० डॉ. नीरज दइया

12 नवंबर, 2017

पांच कविताएं ० नीरज दइया


अंजाम

सत्य वचन है श्रीमान
यूज एंड थ्रो आइटम हूं मैं
यह बाजार है श्रीमान
मुझे यूज करें....

जानता हूं मैं
मेरा अंजाम
फिर भी कहता हूं-
श्रीमान! यूज करें मुझे..

‘थ्रो’ से पहले
क्या यह स्मृति काफी नहीं
‘यूज’ किया गया मैं
श्रीमान के द्वारा!
००००

अधूरी कहानी

चलता जा रहा हूं मैं
जैसे चलती है पेन की रिफिल
लिखता जा रहा हूं मैं
जैसे कोई कहानी....

और एक दिन
यानी किसी आखिरी दिन
पेन से नहीं लिख सकूंगा मैं
कैसे करूंगा पूरी कहानी...
००००

निवेदन

जीवन के दो छोर हैं-
‘यूज’ और ‘थ्रो’।

मेरे ‘यूज’ में तुम साथ रहे,
‘थ्रो’ से ठीक पहले
नजर बचा के निकल जाना
थोड़ी देर के लिए ही सही
मैं तुम्हें दुखी नहीं देख सकूंगा।
००००

एक जैसी बातें नहीं

‘यूज’ किया तुमने मुझे
‘यूज’ हुआ मैं तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुमने मुझे ‘थ्रो’ किया
मैं ‘थ्रो’ हुआ तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुम्हें भ्रम है
मुझे भी भ्रम है
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुमने मुझे प्रेरणा दी
मैंने तुमसे प्रेरणा ली
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
००००

तिल भर जगह
 
किसे बचा कर रखूं
क्या बचा कर रखूं
रखने को कोई कोना नहीं मेरा
यहां तिल भर जगह भी नहीं है मेरी
सब कुछ है तुम्हारा....
००००
राजस्थान पत्रिका समूह के प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ‘डेली न्यूज़’, जयपुर के 12-11-17 रविवारीय साहित्य पृष्ठ 'हमलोग' में
 

11 नवंबर, 2017

भटकती आत्माएं

प आत्मा में विश्वास करें या ना करें। मुझे तो पूरा विश्वास है कि आत्मा होती है। मेरी आत्मा है और मुझ को मेरी आत्मा में आस्था है। आप क्या कहते हैं, क्या मानते हैं या मानते भी है कि नहीं मानते, इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी आस्था पर अडिग हूं। अडिग होना बड़ा कठिन काम है। पूरा पार्टी इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कोई किसी पार्टी में अडिग नहीं रहा है। वे अस्थिर होते हैं, कहते हैं- बदलाव प्रकृति का नियम है। अडिग रह कर क्या झंडे गाड़ने हैं। अडिग तो यह जीवन भी नहीं। सब चला चली का दो दिन का खेला है। इस खेले में जितन हंस खेल लें, खा-पी लें वही बस अपना है। बंद मुठ्ठी आए थे और खाली हाथ जाना है। ये इतनी ज्ञान की बातें करने वाले बड़े स्याणे होते हैं। बाते बड़ी बड़ी करते हैं और हरकतें छोटी-छोटी। मुंह में राम और बगल में छुरी की बातें ऐसे महानुभाव ही पुष्ट करते हैं। इन के लिए कुछ कहना खतरा मोल लेना है। इसलिए अपनी तो चुप है जी।
    हां तो मैं बता रहा था कि मेरा मानना है- आत्माएं होती हैं और वे भटकती रहती हैं। आपको सच कह रहा हूं कि भटकती आत्माएं बेचैन होती है। भटकन और बेचैनी परस्पर एक दूसरे को हस्ट-पुष्ठ करती है। अगर इस बीमारी को चैन मिल जाए तो वे सुखी हो जाए। सुख में भला कौन भटकता है। दुनिया में सारा खेल बस सुख-चैन का है। जिसको सुख-चैन मिला की ठहर कर बैठ जाते हैं। सुख में सुमरिन भी कहां होता है। दुखी और बेचैन भटकता भटकता भी सुमरिन करता है। उसे जिस जिस की याद आती है वह उस उस के पास भटकता भटकता पहुंच जाता है इसलिए उसे भटकती आत्मा कहा जाता है। जगत में रावण की आत्मा भटकने में विख्यात है। एक रावण दस सिर और उसकी आत्माएं कितनी थी यह पता नहीं। फिर उसके भाई-बंधु और वंशज भी तो उसी नस्ल की आत्मा को लिए हुए थे।
    रावणी आत्माओं का आजादी के इतने वर्षों बाद भी इलाज नहीं हुआ तो अब क्या होगा! रामजी भी रुष्ठ हो गए हैं कि अबकी बार जब माननीय प्रधानमंत्री जी ने रावण के सामने धनुष की प्रत्यंचा से निशाना साधाने का प्रयास किया तो बिना आवाज के वह टूट गया। विपक्ष की आत्माओं अट्टहास हुआ। अदृश्य आत्माएं और मौन अट्टहास। प्रत्यक्ष में तो इस टूटने पर पास खड़े पूरे व्यवस्था-विभाग को सांप सूंध गया। निकट खड़े पूर्व प्रधानमंत्री जी को वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने देख हल्की सी स्मित विखेरी और कहा- रावण को नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने तीर को भाले की तरह रावण की दिशा में फेंका। बात बस इतनी थी। रावणी आत्माओं को मौका मिल गया। बात का बतंगड़ बना। जाने खबरों और अपवाहों का जाल कैसे रचा, किसने रचा। पर आजाद देशवासियों ने इस घटना को तूल दिया। इसे सफेद बालों वाले 56 इंची छाती से संपन्न युवा नरेंद्र के हाथों रावण का मरने से इनकार बताते हुए, अनिष्ट और अपशकुन का प्रमाण बताया गया। पंच काका कहते हैं- राजस्थानी में एक कहावत है- रांडे रोती रहेंगी और जवांई जीमते रहेंगे। भटकती आत्माएं रांडे हैं जिनको रोना है और जवांई कौन है यह कहने की जरूरत नहीं है। थोड़ी बहुत समझ तो रखते हैं आप। अब सब कुछ काका के मुंह से ही सुनोगे कि अपना मुंह भी कुछ खोलोगे...। 
००००

08 नवंबर, 2017

परख / पंच काका के जेबी बच्चे

यशवंत कोठारी
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कवि-आलोचक नीरज दइया इन दिनों व्यंग्य में सक्रिय है। इस पोथी में उनके ताजा व्यंग्य संकलित है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं हेतु लिखे हैं। इन व्यंग्य रचनाओं के बारे में सुपरिचित व्यंग्यकार-संपादक सुशील सिद्धार्थ ने एक लंबा, सचित्र ब्लर्ब लिखा है जो उनके फोटो के साथ अवतरित हुआ है। संकलन में नीरज के चालीस व्यंग्य हैं, भूमिका महेश चंद्र शर्मा ने लिखी है जो स्वयं एक बड़े संपादक हैं। वर्तमान की विसंगतियों पर नीरज की पैनी नजर है, वे चीजों को बहुत ध्यान से देखते हैं फिर पूरी शालीनता के साथ व्यंग्य के रूप में रियेक्ट करते हैं, यहीं आज के व्यंग्य की मूलभत आवश्यकता है, जिसे लेख लिखने वाले भूल जाते हैं, मगर कविमना नीरज सब कुछ संजो कर पाठकों के साथ ताल मेल बिठा कर अपनी बात कहते हैं। व्यंग्य की यही विशेषता होती है। पाठक आपको मिल जाए।
अधिकांश रचनाएं कलेवर में छोटी है, काश नीरज पूरी लंबाई की रचना लिखते फिर संपादित कर अखबारों को देते , क्योंकि अखबारों में आजकल जगह खत्म, लेख खत्म, प्रभारी ज्यादा मेहनत नहीं करते। नीरज पाठकों को गुमराह नहीं करते, वे सीधा संवाद करते हैं। वे लंबी-चौड़ी नहीं हांकते, बस काम की बात करते हैं। लगभग सभी रचनाओं में पंच काका उपस्थित है, यह पंच हिंदी का तो है ही अंग्रेजी का भी पंच है। हर रचना में पंच है जो पाठक को झकझोर देता है। मास्टरजी का चोला इस संकलन का सबसे अच्छा व्यंग्य है। सेल्फी पर भी लेखन ने अच्छा लिखा है। लेखक का वर्तमान परिवेश से अच्छा नाता है, वे बार-बार समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।
दाढ़ी पर भी उन्होंने खूबसूरत व्यंग्य लिखा है। नीरज का कवि रूप भी इन रचनाओं में विचरता रहता है। साहित्य संबंधी व्यंग्यों में कटु यथार्थ के दर्शन होते हैं। नीरज के इन व्यंग्यों में बिम्ब है, प्रतीत है, वक्रता है, वे इन औजारों का जम कर इतेमाल करते हैं। ‘अपने अपने भूत’ ऐसा ही व्यंग्य है। काश वे कुछ और रचनाओं को शामिल करते, पुस्तक का कलेवर छोट है, मूल्य अधिक।
पुस्तक का शीर्षक व्यंग्य- पंच काका के जेबी बच्चे कुछ आत्म व्यंग्य की तरह शुरू होता है फिर जाकर सार्वजनिक हो जाता है। यह कला कम ही लेखक साध पाते हैं। नीरज ने यह कर दिखाया है। कई जगहों पर राजस्थानी मुहावरे हैं, जो मन को खुश कर देते हैं पिताजी के जूते ऐसा ही व्यंग्य है।
अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक एक साहित्यिक व्यंग्य है जिसे लगभग हर लेखक ने जिया है। मानदेय हर सच्चे लेखक की दुखती रग है। साहित्यिक मेलों प्र भी लेखक ने कलम तोड़ कर रख दी है। कुल मिलाकर सुधि पाठक इस संकलन का स्वागत करेंगे। अब कुछ बात कालम लेखक की। नीरज के ये व्यंग्य किसी कॉलम की मर्यादा के साथ चलते हैं, कॉलम का अनुशासन या संपादक का अनुशासन मानना ही पड़ता है लेखक को अपनी मजबूरियों को नजर अंदाज कर कॉलम की मजबूरियों के साथ जीना पड़ता है या जीना सिखना पड़ता है। यही है वो कारण जो एक क्लासिक रचना को रोक देता है।
मैं इस रचना का स्वागत करता हूं। वे खूब लिखें। पुस्तक का कवर प्रतीकात्मक है मगर सुंदर है। इस संकलन को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि राजस्थान का हिंदी व्यंग्य लेखन का भविष्य उज्ज्वल है। वे रांगेय राघव, अशोक शुक्ल, भगवती लाल व्यास की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। आमीन।
००००
पंच काका के जेबी बच्चे / डॉ. नीरज दइया / व्यंग्य संग्रह / वर्ष 2017 / मूल्य 200/- / पृष्ठ 96 / सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर-334001
(मधुमती : अक्टूबर, 2017)

06 नवंबर, 2017

सच और झूठ की लड़ाई

डॉ. नीरज दइया
राम और रावण की लड़ाई सच और झूठ की लड़ाई थी। कौरवों और पांडवों की लड़ाई भी सच और झूठ की लड़ाई थी। किंतु ये बहुत पुरानी कहानियां है। सच और झूठ की ऐसी अनेक कहानियां है। कहानियां अब भी चल रही है, पर समस्या यह है कि सच और झूठ की जो लड़ाई की ये कहानियां नई-नई है। कहानियां अभी चल रही है इसलिए कोई फैसला देना जल्दबाजी होगा। सच और झूठ की ये कहानियां अब चुनाव चिह्नों के साथ जुड़ गई है। अपने पायदे के लिए कोई सच-झूठ भी पार्टी बदल सकता है। बदल रहे हैं। भीड़ का क्या है, आज सच के साथ है सच को जिंदाबाद कहती है, कल सच को झूठ से टिगट मिल गया तो उसके अनुगामी झूठ के साथ हो जाएंगे और दम लगाकर कहेंगे- झूठ जिंदाबाद।
असल में यह छद्म युद्ध है। यहां नाम-काम सब दाम के सहारे अदल-बदल होते हैं। ऐसी चालें और घातें पहले नहीं थी। जिसे देखो सच का झूठ और झूठ का सच करने में लगा है। दोनों का चेहरा इतना बदल गया है कि इन्हें आम आदमी अब पहचाना ही नहीं सकता। वह अपनी धुन में रहता है। सच आम आदमी के पास गया और बोला- मैं सच हूं। आम आदमी ने कहा- मैं क्या करूं? वह बोला- बस यूं ही बता रहा हूं। आप को ध्यान होना चाहिए कि मैं सच हूं। मुझे वोट देना। आम आदमी ने रूखाई से कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। मैं आम आदमी हूं और मेरा वोट गोपनीय है। मैं अपना काम करूंगा, तुम अपना करो। फिर झूठ भी आम आदमी के पास पहुंचा और बोला- मैं झूठ हूं। वोट मुझे देना। आम आदमी ने रटा-रटाया जबाब दिया- मैं क्या करूं? मेरा वोट गोपनीय है। झूठ ने प्रतिवाद किया- अभी तुम्हारे पास जो आया था, वह क्या कह रहा था? आम आदमी ने सिर नीचे किए रखा, उसे सिर उठाने की फुर्सत नहीं थी। उसने उसकी तरफ देखे बिना ही कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। तुम जब मतलब होता है तभी आते हो। तुम जा सकते हो।
आम आदमी की त्रासदी है कि उसने सच और झूठ दोनों को नहीं देखा। वे भेस बदल बदल कर उसे प्रभावित करते रहे हैं। उसे अब अरुचि हो गई है। वह बस चाहता है कि उसे दाल-रोटी मिल जाए। उसे इन पड़पंचों में नहीं उलझना। उसे ना इस से सरोकार है ना उस से तकरार है। वह हर बार सुनता है कि जबरदस्त मुकाबला चल रहा है। कोई उससे कहता है कि यह लड़ाई आम आदमी के लिए है, कोई उसे कहता है देखना अब हालात बदल जाएंगे। वह सुनता है कि वह यानी आम आदमी जिसे चाहेगा वह जीतेगा। आम आदमी एक फीकी मुस्कान के साथ इस पंचवर्षीय योजना में मूक बना हुआ है।
पंच काका कहते हैं- यह तो अच्छा है कि आम आदमी अपने कामों में खोया है। उसे फुर्सत नहीं है कि वह पार्टियों के सच-झूठ को देखे-सुने और फैसला करे। अगर देख भी लेगा तो वह क्या कर सकता है? उसके पास कुछ नहीं है बस केवल एक वोट है। सच और झूठ की लोकतांत्रिक लड़ाई में खेल-भावना का बड़ा महत्त्व है। अंत में सब गले मिलते हैं और फिर शीत-समाधि के बाद समय आने पर ही मोर्चा संभालते हैं। आम आदमी की जान इस मुखौटा-युग में सही सलामत रह जाए यही बहुत है।
००००