16 मार्च, 2017

मंचस्थ अध्यक्ष का सुख-दुख

ध्यक्ष का पदनाम बहुत बड़ा है, इसलिए इस पर विराजित होना छोटे-मझले किस्म के लोगों के बस की बात नहीं। छोटे और मझले किस्म के लोग अध्यक्ष को आजीवन ताकते हुए सपना संजोते हैं कि हम भी कभी इस पद को पा सकेंगे। वैसे अध्यक्ष पद के दावेदार बहुत बड़े किस्म के खूब लोग होते हैं, परंतु केवल बड़ा होना ही अध्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती है। लोकसभा, विधानसभा से लेकर किसी भी पार्टी का अध्यक्ष होना अपने आप में महत्त्वपूर्ण होना है। अध्यक्ष में आकार-प्रकार और आयु के बंधन नहीं होते। अध्यक्ष का पद सभी बंधनों और सीमाओं से परे होता है। ममता, जयललिता, मुलामसिंह और सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद को इतनी गरिमा प्रदान कर दी है कि बस एक बार अध्यक्ष पद को पाते ही व्यक्ति उम्र भर के लिए विशिष्ट-जन की श्रेणी में शामिल हो जाता है। अध्यक्ष पर जब किसी छोटे अथवा मझले किस्म के व्यक्ति को पदस्त कर दिया जाता है, तब वह तत्काल बड़ा हो जाता है।
किसी सभा-गोष्ठी और पार्टी सभी में अध्यक्ष का आसन महत्त्वपूर्ण होता है। पार्टी के सदस्य या किसी सभा के श्रोता आप हैं तो जरूरी नहीं कि आपका फोटो अखबारों में छपे, पर अध्यक्ष होना इस बात की गारंटी देता है कि इसकी संभावनाएं बहुत है कि फोटो छपेगा। अध्यक्ष होने के अनेक सुखों में यह भी है कि प्रत्येक वक्ता और सदस्य आपका नाम जान जाता है। सभी अपनी बात आप को संबोधित करते हैं, कोई अनुमति चाहिए तो अध्यक्ष अनुमति देता है। अध्यक्ष बनते ही हल्का-पुलका आदमी भी धीर-गंभीर बन जाता है। बिना गंभीरता के कोई अध्यक्ष बहुत बार अध्यक्ष-सा लगाता ही नहीं। उसके साथियों के समझाना पड़ता है- आप अध्यक्ष है और गंभीर बने रहना अध्यक्षता के लिए जरूरी आभूषण है। जब कोई एक बार अध्यक्ष बन जाता है और कालांतर में अध्यक्ष पद नहीं रहता तब भी वह स्वयं को अध्यक्ष समझने की भूल अनेक बार करता है। इसी भूल के कारण वह परामर्शक की मुद्रा धारण कर यदा-कदा हर किसी को कुछ कहने-सुनने का अधिकार मान बैठता है। पर अध्यक्ष का सबसे बड़ा दुख होता है कि पद छूटता नहीं। एक बार अध्यक्ष का आसन मिल जाए तो उस पर बैठे रहने का मन करता है। अध्यक्ष पद मन को सबल और बलवान बनाता रहता है। जो जितना पुराना और उम्रदराज अध्यक्ष होता है, उसमें बैठे रहने की शक्ति बहुत होती है। मंचस्थ अध्यक्ष का दुख होता है कि उसके बोलने की बारी सबसे अंत में आती है। कुछ अध्यक्ष चालाक होते हैं, जो कोई न कोई बहाना बना कर कहते हैं कि जल्दी जाना है, और उन्हें बीच में ही संबोधन करने का सुख प्राप्त होता है। जो मचस्थ अध्यक्ष ऐसे बहाने नहीं बनाते अथवा जिन्हें बहाने बनाने की छूट नहीं होती है, उन्हें तो समारोह के अंत तक रूकना होता है।
पंच काका कहते हैं कि अध्यक्ष-पद सदा शंकाओं से धिरा रहता है। किस्म-किस्म की शंकाएं लोग करते हैं। अध्यक्ष को सब कुछ संभालना होता है। उसे अपनी शंका भूल, दूसरों को समाधान देना होता है। त्रासदी तब होती है जब स्वयं अध्यक्ष दीर्घ या लघु-शंका से ग्रसित हो जाता है। चालू संवाद में उसकी बेताबी में रूकना-रोकना सबसे बड़ा दुख है। कुछ शर्म और लिहाज, थोड़ा इंतजार करते कराते जब शंका बेकाबू होने की स्थिति में पहुंचने को होती है, तो वह मुस्कान के साथ उठता है और दुर्भाग्य सभी उसी को ताकते हैं।
० नीरज दइया

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