22 मार्च, 2017

जाकेट की सर्दी और गर्मी

काफी दिनों से सोच रहा था कि मैं भी माननीय प्रधानमंत्री जैसी जाकेट खरीद लूं। जब अधिक इच्छा हो गई तो कीमत जान कर ही होश उड़ गए। उड़े हुए होश को जल्दी से संभाला और दुकानदार से बोला- प्रधानमंत्री जी को छोड़ो, किसी दूसरे किस्म की दिखाओ भैया। वह बोला- साहित्यकारों वाली दिखानी है या बाबाओं वाली। मैंने जिज्ञासावश कह दिया- दोनों ही दिखा दो। पास खड़ी श्रीमती जी कान के पास आ कर फुसफुसाई- बाबाओं वाली नहीं लेनी। आप लिखते हो इसलिए साहित्यकारों वाली जचेगी। मैंने मुस्कुरा कर हां की निगाहों से उसे देखा। उसके अधरों पर मुस्कान खिल उठी। मेरा मानना है कि कपड़े अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए ही हम पहनते हैं। दूसरों को अच्छे दिखने के लिए पहनने वाली साहित्यकारों वाली जाकेट की कीमत बजट में थी, सो खरीद कर हंसी-खुशी घर आए।
            अगले दिन जाकेट पहन कर आइने के सामने खड़ा हुआ तो लगा जाकेट में मैं नहीं कोई दूसरा दिखाई दे रहा है। सुंदर चीजें सभी को आकर्षित करती हैं। बहुत से मित्रों से मेरे जाकेट में जचने को स्वीकारा और मुझे बधाइयां मिली। न्यू पिंच का सुखद अहसास तब सौ गुना बढ़ गया जब हैडमास्टर ने पहले ही कालांश में आकर कहा- कैसे कहूं, क्या कहूं, कहूं या नहीं कहूं। बहुत सोच में पड़ गया हूं। मैं खुशी खुशी बोला- कहिए जो भी कहना है, आपको सब कुछ कहने का हक है। तब वे बड़े संकोच से बोले- आज क्या है कि फोटोग्राफर को बुलवाया है। हमारी प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के साथ फोटो खींची जानी है। अगर आपको बुरा नहीं लगे तो एक घंटे के लिए अपनी जाकेट दीजिए, फोटोग्राफर का फोन आ गया है कि वह आने वाला है। जीवन में अनेक मांगने वालों से वास्ता पड़ा था पर यह अनुभव पहला-पहला था। मैंने जाकेट उतारते हुए सोचा कि मैं कर्ण हूं और यह भगवान हैडमास्टर बन कर आया है। मैं संकोच में तो था कि जाकेट के चक्कर में शर्ट को ढंग से प्रेस नहीं किया था और जाकेट उतारते ही यह रहस्य भी खुलना था।
            एक घंटे का कह कर ले गए थे फिर दो घंटे में हो गए और वे लौटाने नहीं आए तो मैं खुद लेने पहुंचा गया। वे बोले- मैं तो भूल ही गया था। जाकेट आपसे अधिक मुझ पर फबती है। लिजिए आपकी जाकेट। और हां थेंक्यू। मैंने मुस्कुराते हुए अपनी जाकेट लेकर पहन ली। गनीमत रही कि शर्ट के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा। बुरा तो उसके अगले दिन हुआ जब मैं जाकेट पहन कर प्राथमिक विभाग से गुजर रहा था कि कुछ छोटे बालकों ने आ कर मुझे घेर लिया। पहले तो मैं समझ नहीं पाया कि माजरा क्या है। बच्चे मन के सच्चे होते हैं और उन्होंने सच्चाई जाहिर कर दी कि मैंने उनके हैडमास्टर जी का जाकेट क्यों पहन रखा है? बड़े बच्चे ऐसे सवाल करने वाले भोले नहीं होते, मैं भी कहां भोला था। मैंने बच्चों को यह कह कर टरकाया कि यह जाकेट मैंने हैडमास्टर जी की खरीद ली है। वे अब अपने लिए नई लाएंगे।
            पंच काका कहते हैं कि साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है। ये सर्दी-गर्मी को रोकने के लिए नहीं, बस ऐसी ही त्रासदियां भोगने और दिखाने के लिए होती हैं। समझ में नहीं आता कि लोग साहित्यकारों वाली जाकेट पहनते क्यों है? क्या बस दिखाने के लिए कि हमारे पास भी है या यह कोई ड्रेस-कोड है?

० नीरज दइया
 

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