07 जून, 2012

राजस्थानी कहानी- रजाई

कहानीकार : डॉ नृसिंह राजपुरोहित      
अनुवाद : नीरज दइया
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ठंड कड़ाके की थी। बूढ़े-बुजुर्ग कहते हैं कि ऐसी ठंड पिछले पचास वर्षों में भी नहीं पड़ी। दिन ढलते ही आकाश से जैसे ठंड टपकने लगती। पाला ही गिरता है। तेज हवाएं ऐसी चलती है कि हड्डियां कांपने लगे। ताजा अंगारे भी देखते-देखते राख की परतों में डूब कर स्वाह हो जाते हैं।
पर केवल ठंड को ही दोष क्यों दें? इस वर्ष जैसा अकाल भी कब रहा? पिछले वर्षों थोड़ी-बहुत तो बूंदे आकाश से गिरी थी लेकिन इस बार तो एक बूंद भी नहीं गिरी। पीने के पाने को भी तरस गए।
पेट का गड्डा भरने के लिए दाने नहीं और तन ढकने को साबुत कपड़े नहीं। तिस पर कोढ़ में खाज यह कि कलेजा निकालने वाली यह भयंकर ठंड। ठंडी हवाएं तीर की तरह चलती है। शरीर में घुस कर हड्डियों को हिला डालती है। बिस्तरों में सोए-सोए भी बत्तीसी बजती है।
रावतसिंह झोंपड़ी के आगे बाहरी गवाड़ में सोया था। टूटी खाट, फटा बिस्तर-कम्बल और सनसनाती सर्द हवाएं। रह रह कर कंपकंपी छूटती है। घुटनों को छाती से सटा कर जलेबी बन कर सोने की कोशिस करता है तो क्षण भर तो गरमास लगता है लेकिन अगले ही क्षण वापस वही हालत हो जाती है। सोया-सोया सोचता है कि मनुष्य जन्म लेकर व्यर्थ गंवाया। आधी उम्र ढल गई तो भी सिर डालने के लिए ठीक-सा घर नहीं बना सका। रजाई-गद्दे तो आगे कि बात पर जिंदगी बसर के लिए सर्दी निकालने जैसे गूदड़े भी बना सकता तो आत्मा को संतोष होता।
वह मन में हंसने लगा- मां का तो पता नहीं और मौसी की चाहना करता है! पेट का खड्डा तो भरा जाता ही नहीं और रजाई-गद्दे की बात सोचने चला। दो-तीन अकाल एक साथ ही आ बने। अनाज का दाना भी नहीं पक्का। घर में छोटे-बड़े आठ सदस्य। नाडी की खुदाई और सड़क का काम शुरु हो गया नहीं तो मरने की नौबत आ पहुंची थी। यह तो भगवान की महरबानी ही समझनी चाहिए कि पेट भरने का इंतजाम तो बन गया। खैर, जीएगा नर तो बसाएगा घर। सांस सांस में रहा तो ढंग का घर भी बनाएंगे और रजाई-गद्दे भी। अभी तो जान पर बनी है सो जैसे-तैसे ही दिन निकलने ही हैं। बुरा वक्त भी निकल जाएगा।
पैरों की तरफ से कम्बल फटी हुई थी सो छेद से होकर ठंड का एक ऐसा झोंका आया कि वह शरीर के चारों तरफ कम्बल लपेट कर खाट पर बैठ गया। फिर आकाश की तरफ देख कर अंदाजा लगाने लगा कि रात कितनी ओर बाकी होगी? पूर्व दिशा में देखने से भोर का तारा दिखाई दिया। रात घड़ी तीनेक बाकी। इतनी रात तो बैठे-बैठे भी बिता सकता है। वह गठरी बना बैठा रहा। थोड़ी ही देर में बैठे बैठे को ही झपकी आने लगी। …………सपनों की मधुर दुनिया सामने थी……बड़ी बहन सुगन का विवाह हो रहा है……दहेज दिया जा रहा है……वह एक एक कर दहेज का सामान बाहर ला लाकर रखे जा रहा है। सब के बाद अंत में चारपाई और रजाई-गद्दे बाहर आए। रंगीन सूत की बनी निवार से बुनी चारपाई, रंगीन ही पाए जिन पर हाथीदांत का शानदार काम, दोहरी अदांवण जिसे खींच कर एकदम टंच किया हुआ। कीमती गद्दा, सुंदर तकिए और रेसमी रजाई का तो कहना ही क्या। चटक रंगाई, पूरी लम्बाई और शानदार भराई। ताजा तली हुई पूरी जैसे फूली हुई। दहेज का सामान देखकर बाराती बखान करने लगे तो उसका सीना फूल गया। लेकिन थोड़ी ही देर में आंख खुल गई और उसकी फूली हुई छाती पिंक्चर हुए ट्यूब सी जैसी थी वैसी ही वापस बैठ गई।
वह अंगुलियों पर गिनने लगा……सतरे, अठारे, उगणीस…बीस। सुगना पूरे बीस वर्षों की हो गई। पिछले वर्ष ही उसके पीले हाथ करने थे पर एक के बाद एक अकाल के रहते बात बन नहीं पाई। ईश्वर ने अगर चाहा तो अगले वर्ष उसकी शादी जरुर करनी है। लड़की बड़ी हो जाए और उसके हाथ पीले हों जाएं तो छाती का भार उतरता है।
दिन निकलने को था। विचार आया कि घट्टी की वेला हो गई पत्नी को जगा दूं किंतु याद आया कि घर में अनाज तो कल ही खत्म हो गया था इसलिए उठेगी तो पीसेगी क्या? मजदूरी के पैसे मिले तब ही अनाज आ सकता है। परंतु बच्चों को तो भूखा रखा भी कैसे जाए? भाई-बंधु से उधार आटा लाकर इन्हें तो दाना-चुग्गा देना ही होगा। ऐसे समय बच्चे एक समय भी भूखे रह गए तो गजब हो जाएगा। दिन बीत जाएंगे और बातें रह जाएंगी।

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दिन होते ही रावतसिंह खाट छोड़ कर धूप में आ गया। उसकी पत्नी ज्वार उधार लेने की खातिर पड़ौस में गई और बच्चे भी बाहर निकल गए। थोड़ी ही देर में गांव के किसी छोर से मोटर की आवाज सुनाई दी और गलिओं में इधर-उधर आदमी आते-जाते दिखाई दिए। इतने में ही रावतसिंह का सबसे छोटा लड़का तेजी से दौड़ता हुआ घर में आया और हांफते हुए कहने लगा, “जीसा! जीसा! चौक में चलिए!”
“क्यों बेटा! क्या बात है?”
“चौक में सेठों की एक मोटर आई है और रजाइयां-कम्बलें बांट रहे है।”
लड़के का सांस भर आया था सो थोड़ा-सा दम भर कर बोला, “जीसा! आदमी तो चौक में समाते ही नहीं, इतनी भीड़ है……कि जल्दी चलिए नहीं तो बद में कुछ हाथ नहीं आएगा। रंग-बिरंगी सुंदर रजाइयां और अलग-अलग तरह कि कम्बलें मिलेंगी और किसनिये ने तो रजाई हथिया ली……… तो चलिए हम भी जल्दी से चलें।”
“चल भाई चल!” और ठाकुर रावतसिंह घुटनों पर हाथ रख कर मुश्किल से खड़े हुए।
बच्चे पूछने लगे कि कितनी रजाइयां लाएं है?
“मोटर एकदम भर कर लाएं हैं जीसा, अलग-अलग तरह की सुंदर रजाइयां। अपने पटवारी जी जैसी ओढ़ते है वैसी।” बच्चे की आंखों में उमंग और उत्साह का सागर हिलोरे ले रहा था।
रावतसिंह अपने लड़के की अंगुली थामें बाहर की तरफ निकलने हुए इतने में पल्ले में ज्वार लिए उनकी पत्नी सामने मिल गई। कहने लगी, “एक टंक के लिए तो मैं ज्वार प्रेमजी के यहां से ले आई हूं, आप कहां जा रहे है?”
“नारायण कह रहा है कि चौक में मोटर आई है और रजाइयां-कम्बलें बांट रह हैं। मैं भी देख आता हूं।” ठाकर शर्मसार होकर बोला।
“देखना क्या है वहां?”
“देखता हूं कि कैसी रजाइयां हैं?”
“क्यों एक-दो लाने का विचार है क्या?”
“ले आएं तो हर्ज क्या है?”
“हर्ज? दान के चिथड़े लाने में आपको कोई हर्ज नहीं लगता है? कहते शर्म नहीं आती?”
“इस में लाज-शर्म की क्या बात है? पूरा गांव ही ले रहा है तो क्या हम रूपयाचंदजी है?”
“गांव की बात छोड़िए। मैं आप से पूछती हूं! आप धर्म के चिंथड़े ओढ़ कर सर्दी निकालेंगे?”
“आपतकाले मर्यादा नास्ती।”
“यह आफत पहली बार आप पर ही आई है या फिर कभी किसी पर भी आई होगी………? मारवाड की धरती पर अकाल-दुकाल तो परंपरा से साथ ही रहे हैं। सात-सात अकाल झेलने के बाद भी मनुष्यों ने पत नहीं छोड़ा। मेहनत-मजदूरी कर ली, भूखे मरना मंजूर किया पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया या फिर चोरी-चकरी भी नहीं की।”
“लेकिन रजाइयां तो…………”
“फिर वापस वही बात? मैं पूछती हूं कि मेहनत-मजदूरी किस लिए करते हो? क्यों दिन भर सड़कों पर मिट्टी की कड़ाइयां उठाते हो? मुझे और बच्चों को हाथ में कटोरा भीख मांगने के लिए थमा दीजिए। पेट तो ऐसे भी भर जाएगा।”
“तुम मेरी बात को बिल्कुल नहीं समझीं।”
“क्या समझूं आपकी बात को? सूरज के उजास जैसे बात साफ है कि कोई सेठ अपनी पाप की कमाई से दान-पुन्न कर के धर्म से पाप हल्का कर रहा है और आप जैसे त्यार हैं हाथ फैलाएं। धिक्कार है आप पर। इस से तो बेहतर है कि मुंह बांध कर कहीं जा कर मर जाएं।”
“तो तुम कहती हो तो मैं नहीं जाता।”
“मैं क्या कहूं? आपको दिखाई नहीं देता भले आदमी! दुर्दिन मनुष्यों पर ही आते हैं। असली मनुष्य तो वही है जो दुर्दिन में भी अपनी मर्यादा कायम रखे। मेहनत-मजदूरी में किसी का कहना-सुनना नहीं पर भीख मांगने से तो मरना भला। हमें रजाई बनवानी है तो दो-चार सप्ताह की मजदूरी से पैसे बचा कर अवश्य बनवाएंगे। वह अपने पसीने की कमाई होगी। रावतसिंह चौकी पर चढ़ धूप में बैठ गया।

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सर्दियों के दिन धीरे-धीरे बीतते गए और रावतसिंह पटे हुए कम्बल में सोया ठंड से जूझता रहा। प्रत्येक सप्ताह थोड़ी-थोड़ी बचत करने से पांचवे सप्ताह इअतने पैसे एकत्र हो गए कि जिन से रजाई बन सके। पैसे पति के हाथों में देती हुई उसकी पत्नी बोली, “फेमिन कैंप की गाड़ी में बैठ कर एक दिन शहर जा कर एक सुंदर सी रजाई ले आइए।”

उस ने बाजार में चार-पांच दुकानों में घूम कर रजाइयां देखी पर एक भी पसंद नहीं आई। कही माल पुराना तो कहीं भाव बहुत ज्यादा। बात बनी नहीं। अंत में अपनी पसंद का कपड़ा और रूई ले कर रजाई तैयार करवाई। चीज तबियत से बनवाई तो चीज भी शानदार बनी। नई डिजाइन वाली चटकदार छींट, लम्बाई-चौड़ाई में भी भरपूर, गद्देदार भराई अर चतुराई से धागे डाले हुए।
घर पहुंचने पर जिसने भी रजाई देखी तारीफ की। दिन भर बच्चे कोमल-कोमल रजाई पर लौटते रहे और उस पर अपने गाल रगडते रहे। सांझ ढले रजाई रावतसिंह की खाट पर पहुंची तो उसने अपनी पत्नी को बुला कर कहा, “रजाई तो भीतर ले जाओ, इसे तुम और बच्चे ओढ़ना। मेरे तो ओढ़ने को खूब है। सर्दियां आधी तो गई समझो अब अधिक से अधिक एक महीना सर्दी ओर पड़ेगी। ……
पत्नी कुछ देर विचार कर के बोली, “रजाई यदि आप नहीं ओढ़ेंगे तो बच्चे भी नहीं ओढ़ेंगे। इसे तो सहेज कर घर में रख देते हैं। शानदार चीज है सो अगले वर्ष सुगना के दहेज में काम आ जाएगी।”
रावतसिंह खुसी में उछलते हुए बोला, “बात तो तुमने लाख रुपए की कही है। रजाई तो दहेज में दी जाए ऐसी ही है। कोई नई बोरी में डाल कर इसे भीतर रख दे और वह फटा कम्बल इधर ला दे। मैं तो सर्दियां इस में मजे से निकाल लूंगा और वह ओढ़ कर सो गया। उस रात उसे नींद इतनी शानदार आई कि दिन चढ़ने पर ही जगा।    
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