25 सितंबर, 2017

किस्म-किस्म के लोकार्पण

डॉ. नीरज दइया
    मुझे लोकार्पण बहुत अच्छे लगते हैं। मैं अत्यधिक पुस्तक प्रेमी हूं। कोई लोकार्पण हो, कहीं लोकार्पण हो, मेरी इच्छा रहती है कि पहुंच कर मैं शुभकामनाएं दूं। शुभकामनाओं में अपना क्या लगता है। फ्री की शुभकामनाएं मैं सब को देता हूं पर सामने वाला प्रायः फ्री में नहीं लेता। मुझे मेरी शुभकामनाओं को बदले चाय-पानी-ठंडा मिलना तो सामन्य बात है, कभी भरपेट नाश्ता और कभी-कभार भर पेट भोजन का जुगाड़ हो जाता है।
    जब मुझे मालूम चल जाता है कि फलां कार्यक्रम में भोजन भी है तो मैं घर के बच्चों और उनकी अम्मा को साथ लेकर पहुंचना फायदेमंद मानता रहा है। इससे फायदा यह होता है कि घर में चूल्हा जलाना नहीं पड़ता। सुबह ऐसा कोई कार्यक्रम होता है तो सब को पहले से समझाकर ले जाता हूं कि शाम को घर पर उपवास रहेगा जो खाना है वहीं खा लेना। कार्यक्रम अगर शाम का होता है तब हम सभी अगले दिन सुबह उपवास का कार्यक्रम रखते हैं।   
    साहित्य और खासकर पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में भव्य भोज का कार्यक्रम मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैं ऐसे आयोजनों में सपरिवार अक्सर थोड़ी देरी से पहुंचता हूं। दूरदृष्टि पक्का इरादा लिए मैं ऐसे आयोजनों के भरपूर ज्ञान से बचता हूं। मैं वक्ता की औकात जानता हूं। अगर कार्यक्रम के आयोजकों ने वक्ताओं को अच्छा पेमेंट किया होगा तो वे बहुत अच्छा अच्छा बोलते हैं। लोकार्पण कार्यक्रम असल में असत्य कार्यक्रम होता है। सच्ची और असली बात कोई प्रायः कहता नहीं। कुछ विद्वान तो लोकार्पण को पुत्र अथवा पुत्री के जन्मोत्सव की भांति केवल बधाई कार्यक्रम मानते हैं। पुस्तकों की विक्री की कमी को देखते हुए प्रकाशकों और आयोजकों को चाहिए कि वे पुस्तक का संस्करण जब तक पूरा बिक ना जाए तब तक बारबार लोकार्पण करें। अब मैं इतना एक्पर्ट हो गया हूं कि पुस्तकें भेंट लेने लगा हूं। कोई भेंट देना नहीं चाहे तो भी जो मैं ठान लेता हूं कर दिखाता हूं। देने वाला कब तक मुझसे बचेगा? मैं उसके सामने बीस बार ऐसे डोरे डालता हूं, कशीदे पढ़ता हूं और साथ खड़ा होकर मुस्कुराता हूं कि उसे शर्म आने लगती है। वह किताब भेंट कर ही देता है। कभी ऐसा भी होता है कि कुछ बेशर्मों के कारण बेशर्म मुझे बनना पड़ता है। किसी एक किताब की कीमत सौ या दो सौ रुपये से भला कम क्या होती है। फिर किताब देने वाला जल्दी में यदि उस पर दो शब्द भेंट के नहीं लिखता तो मैं उसे बेचने का प्रयास भी कर लेता हूं। ऐसी भेंट मिली किताबें जब अधिक  हो जाती है तो घरवाली झगड़ा करती है। घर में इतनी रद्दी किस काम की, बेच दो इन सब को।
    आजकल कुछ लेखक-कवि मेरे जैसे गुणी दर्शक-श्रोता के साथ घोखा करने लगे हैं। वे चुपचाप लोकार्पण कर लेते हैं और भनक लगने नहीं देते है। यह तो सुबह-सुबह अगले दिन अखबार से पता चलता है कि फलां की फलां किताब का फलां जगह लोकार्पण हुआ और फलां-फलां लोग थे।
    पंच काका कहते हैं कि ऐसा लोकार्पण जिसमें चार-पांच मित्र मिलकर फोटो ले लेते हैं और झूठी खबर से लोकार्पण प्रचारित करते हैं उन पर जुर्माना लगना चाहिए! बिना चाय-पानी और मिठाई के लोकार्पण को अवैध करार देकर कड़े नियम बनाने चाहिए। गुपचुप और चुपचाप ऐसे लोकार्पण संज्ञान में आने पर जुर्माने के तौर पर लोकार्पण रिपीट की सजा होनी चाहिए, जिसमें भर पेट भोजन अनिवार्य हो।
००००


24 सितंबर, 2017

विद्रूप चित्रण से ज्यादा प्रभावी प्रहार

० अरविंद तिवारी
    बीकानेर न केवल साहित्य की उर्वर भूमि है बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पूरे भारत में जाना जाता है। रंगकर्म से लेकर आर्ट गैलरी में समय-समय पर लगने वाली प्रदर्शनियों को मैंने निकट से देखा है। एक दर्ज़न से अधिक साहित्यकारों की ख्याति अखिल भारतीय स्तर की है। हिंदी साहित्य वास्तव में बीकानेर का ऋणी है। फ़िलहाल वहाँ के तेजी से उभर रहे व्यंग्य लेखक डॉ. नीरज दइया के दूसरे व्यंग्य संग्रह "टांय टांय फिस्स" के बारे में कुछ कहने-लिखने का मन है। बीकानेर वह धरा है जहाँ मालीराम शर्मा, डॉ. मदन केवलिया, बुलाकी शर्मा, हरदर्शन सहगल जैसे दिग्गज व्यंग्यकारों ने व्यंग्य साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। मालीराम शर्मा का स्तम्भ लेखन बेहद पठनीय और लोकप्रिय रहा है। ऐसे वातावरण वाले शहर में व्यंग्यकारों का उभरना सामान्य बात है। नए व्यंग्यकारों के लिए अपने इन दिग्गजों से सीखने के विपुल अवसर रहते हैं। चुनौतियाँ भी इन्हीं के लेखन से हैं।
    नीरज दइया के दूसरे व्यंग्य संग्रह "टांय टांय फिस्स" में कुल 40 व्यंग्य संकलित हैं। उनका शुरुआती व्यंग्य संग्रह- ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ से यह व्यंग्य संग्रह काफी परिपक्व है। वैसे अन्य अनुशासनों में डॉ. नीरज दइया का नाम बेहद जाना-पहचाना है, खासकर राजस्थानी साहित्य में। उनके पिताजी स्व. सांवर दइया राजस्थानी साहित्य के चर्चित साहित्यकार हुए हैं। डॉ. नीरज दइया ने यह संकलन राजस्थानी और हिंदी के साहित्यकार डॉ. मंगत बादल को समर्पित किया है। मंगत जी व्यंग्य भी लिखते हैं। भूमिका जाने-माने व्यंग्य कवि भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने बेहद भावुक होकर लिखी है। प्रशन्सात्मक भूमिका नीरज जी को अच्छा और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेगी।
    'ये मन बड़ा पंगा कर रहा है' व्यंग्य में लेखक कहता है- 'एक दिन सोचा मन की फ़ोटो प्रति कर ली जाय मगर मन है कि पकड़ में नहीं आता। 'फन्ने खाँ लेखक नहीं' में लेखक कहता है- लेखक होना अपने आप में अमर होना है। इस अमरता के लिए ही लेखक मरे जा रहे हैं। "सबकी अपनी अपनी दुकानदारी" में नीरज जी लिखते हैं- 'अच्छे दिन हैं कि सभी घास खाएं और सोएँ।’ ‘वी आई पी की खान’ व्यंग्य में वी आईं पी कल्चर पर प्रहार किया गया है। ‘साहित्य माफिया’ में वह लिखते हैं- साहित्य भी एक धंधा बन चुका है। आज किसके पास समय है कि साहित्य जैसे फक्कड़ धंधे में हाथ आजमाए। ‘चीं-चपड़, गटर-गूं और टीं-टा-टू’ व्यंग्य में कहा गया है- पिंजरा केवल चूहों के लिए, हम सभी के लिए अलग अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है।
    इस व्यंग्य संग्रह में आक्षेप, भर्त्सना, कटाक्ष आदि व्यंग्य रूप प्रचुरता में विद्यमान हैं लेकिन विट, आइरनी, ह्यूमर आदि न के बराबर है। विद्रूप चित्रण से ज्यादा प्रभावी प्रहार हैं। यदि इन सशक्त प्रहारों के साथ विद्रूपता को साध लिया जाय तो नीरज जी का लेखन ऐतिहासिक हो जायेगा। भाषा साधारण किन्तु प्रवाहमयी है। पंच काका की हर व्यंग्य में उपस्थिति से शैलीगत प्रयोग नहीं हो पाये हैं। इस सन्दर्भ में मुझे अपना प्रतिदिन का नवज्योति में कॉलम लिखना याद आ गया। ढाई साल तक मैंने रोजाना व्यंग्य कॉलम लिखा था- "गयी भैंस पानी में" शीर्षक से। शुरुआती दिनों में मैं हर व्यंग्य में भैंस को ले आता था, जिससे व्यंग्य की धार कुंद हो जाती। दस दिनों बाद संपादक और मित्रों के टोकने पर मैने शैली बदल दी थी। बहरहाल इस संग्रह के बाद व्यंग्य जगत को नीरज जी से उम्मीदें बढ़ गयीं हैं।
००००
टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003


20 सितंबर, 2017

घूमाते रहें दिमाग

जार्ज बर्नार्ड शा ने कहा था कि जो अपना दिमाग नहीं बदल सकत वे कुछ भी नहीं बदल सकते। वे बड़े लेखक जरूर थे पर यह नहीं जानते थे कि इस पृथ्वी पर ऐसा समय आएगा जब दिमाग बदलना बाएं हाथ का खेल होगा। वे यह जानते भी होंगे तो उन्होंने निश्चित तौर पर यह तो सोचा नहीं होगा कि इक्कीसवी सदी में दिमाग बदल कर भी कुछ नहीं बदल सकेंगे। चुनाव में हम बहुत बार दिमाग बदलते हैं। फिर पता चलता है कि हम कुछ भी बदल नहीं पाए। अब देखिए ना हमारे कुछ मित्र कहते हैं- अच्छे दिन दिन आ गए। कुछ कहते हैं- नहीं आए। मित्रों के इस मतभेद को हल कौन करेगा?
सरकारी दावा है कि सब कुछ बदल गया है। देश तेजी से विकास कर रहा है। जब सब कुछ बदल गया है तो हमें दिखाई क्यों नहीं देता। क्या बदलाव से हमारे आंखें चुंधिया गई है कि हम कुछ देख नहीं पा रहे। जब हम रेलगाड़ी में बैठते हैं तो खिड़की से बाहर स्थिर पेड़ और जमीन भागती हुई दिखाई देती है। आंखें जो देखती है, मन जिसे महसूस करता है वह गलत कैसे हो सकता है। मरा यह दिमाग इस सत्य को स्वीकार क्यों नहीं करता। आंखों देखे सत्य को जो नकार रहे हैं वे विपक्ष के आदमी हैं। हमने देश को विकास की गाड़ी में रवाना कर दिया है और आप अपना पुराना-बासी दिमाग लिए चल रहे हैं। विकास की गाड़ी द्रुत गति से चला रही है। आप कहते हैं कि नहीं-नहीं कुछ नहीं बदला। आपको बस अपने वाला बदलाव और विकास दिखाई देता है। यह सारासर गलत है कि आप अपने विकास को विकास मानें और हमारे विकास को पप्पू। पप्पू तो अपा है कि सब कुछ आपको स्थिर और गर्त में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।
हमारे माननीय और माननीय इतनी दौड़-भाग कर रहे हैं। उनकी गतिशीलता आपको निर्थक लगती है! अब समझ आ गया है कि आप राष्ट्रविरोधी हैं। सांप्रदायिक हैं। आतंकवादी है। राष्ट्रद्रोही है। ऐसे जितने भी जो कुछ हो सकते हैं, वे सब आप हैं। हम आप के कार्य-व्यवहार और हर बात-बात पर टांग खींचने की आदद से परेशान हो गए हैं। अब एक प्रस्ताव पारित होगा। देश में जिन जिन नागरिकों को बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है उन्हें अनिवार्य रूप से अपने दिमाग के बारे में घोषणा-पत्र देना होगा। आप लिखकर देंगे कि आपने अपने दिमाग को बदला है अथवा अभी बदलना शेष है। यदि बदलना शेष है तो आप कब तक दिमाग बदल लेंगे। आपका खुद का दिमाग देश की प्रगति में बाधा है। आपको इक्कतीस दिसम्बर तक एक अंतिम अवसर दिया जाता है।
पंच काका कहते हैं कि हम सभी के पास दो दिमाग होते हैं। एक लेफ्ट और दूसरा राइट। यह सारा झगड़ा लेफ्ट-साइट का है। लेफ्ट वाला कहता है कि मैं सही हूं और राइट वाला कहता है मैं। दोनों मत एक नहीं है। जरूरत इस बात कि है अब हम सकारात्मक सोचें। स्थिर दिमाग अपनी स्थिरता के कारण अवरूद्ध हो जाता है। दिमाग को स्थिर रखना गलत है। दिमाग को स्थिर अथवा खाली नहीं रखें, उसे घुमाते रहें। आप खुद घूमते रहें और दिमाग भी घूमाते रहें। यही एक कारगर तरीका है जिससे कुछ बदल सकते हैं और कुछ बदला हुआ देख सकते हैं। यह भूल जाएं कि कोई आएगा और आपका दिमाग बदलेगा, यदि बदलाव चाहते हैं तो आपको अपना दिमाग बदलना होगा।
डॉ. नीरज दइया 

18 सितंबर, 2017

सदा असत्य बोलो अधिनियम

डॉ. नीरज दइया
कोई माने ना माने पर देश में असत्य के प्रयोग हो रहे हैं। कहा जाता था- सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला। अब इतने काले मुंह देख लिए कि सभी के चेहरे सफेद हो चुके हैं। काले मुंह वाले भी खुद से अधिक काले मुंह वालों की तरफ अंगुली कर दिखाने लगे हैं। कहते हैं कि हम उनसे तो ठीक है। समझ ने काम करना बंद कर दिया। अब ठीक-गलत सब गड़मड़ है। दाढ़ी-मूछों में बाबा लोग काला मुंह छिपा कर रखते रहे। अब उनकी काली करतूतें कोर्ट से प्रमाणित हो रही है। संदेह है कि इतनी कालिख क्या स्वच्छता अभियान साफ कर पाएगा।
हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं। जो दिलवाले हैं वे ही काले-काले नजर आते हैं। हे ढोंगी बाबाजी! अब सब साफ हो गया है कि आपकी पूरी दाल काली थी। काली दाल खाकर सब कुछ काला हो गया। यहां तक कि गांठ का धन भी काला हो गया। नोटबंदी के बाद काले और सफेद धन में ऐसी कुश्ती हुई कि देश की जनता मूर्ख बनी। अगली-पिछले सारी बातें भूल गए। किसने क्या कहा और कब कहा? हमने जान लिया कि हिसाब रख कर परेशान होने में लाभ नहीं है। आज लाठी आपके पास है तो भैंस आपकी है, कल को अगर यही लाठी हमारे हाथ आ जाएगी तो फिर भैंस भी हमारी ही होगी। दुनिया इसी का नाम है, यहां तो चला चली का खेला है। कभी धूप तो कभी छांव। कहते हैं काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती पर जानता का मन भी अजीब है। वह खुद की तुलना में देश का लाभ अधिक देखती है।
देश को लाभ हो तो जनता को लाभ हो। कहते हैं कि देश में नोटबंदी के बाद करदाताओं की संख्या में विरोधाभास है। जो ऐसा कहते हैं वे देश के विकास को रोकना चाहते हैं। माना यह सच्चाई है- आंकड़ों को अलग-अलग श्रोत, एक जैसा नहीं दे पा रहे हैं। हमें इन चक्करों में उलझना नहीं चाहिए। हमारे लिए बस इतना जानना काफी है कि नए व्यक्तिगत करदाताओं की संख्या में अधिक इज़ाफा हुआ है। अब प्रधानमंत्रीजी ने कितना बताया और वित्तमंत्रीजी ने क्या कहा को छोड़ देना चाहिए। हमें इस बात में सुख की अनुभूति करनी चाहिए कि देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या भारी मात्रा में बढ़ गई है। देखिए अधिक कर आएगा तो विकास भी अधिक होगा। इसमें हमारा लाभ ही लाभ होगा।
पंच काका का सुझाव है- देश को सदा-सदा के लिए आंकड़ों के जाल से मुक्त करने के लिए ‘सदा असत्य बोलो अधिनियम’ बनाया जाना चाहिए। जिसके अंतर्गत सब को यह छूट दी जानी चाहिए कि आगे कहीं किसी प्रसंग में आंकड़ों की बात होगी तो आंकड़ा लिखा ही नहीं जाए। बस उस आंकड़े की जगह डेस-डेस-डेस लिख दिए जाएगा। ये तीन डेस देकर देश की जनता को छूट होगी कि वे अपनी मर्जी से आंकड़ा भरे। यह देश हम सब का है। इसके विकास को हम सब बताएंगे। लोकतंत्र सबका है इसलिए विकास को सभी देखें। यह ठीक रहेगा कि सब अपने-अपने हिसाब से आंकड़े भरें। सारी जिम्मेदारी और जबाबदेही मंत्रियों पर क्यों हो? ऐसा करने से फायदा ही फायदा होगा और कोई किसी को यह नहीं सकेगा कि सर आंकड़ों में फर्क है। अगर इसके बाद भी कोई कहता है तो कह सकते हैं कि भैया तेरे डेस-डेस-डेस में तू अपने हिसाब से सही आंकड़ा भर कर चुप बैठ।
००००

हॉट सीट की हॉट कथा

नुमति है और अनुमति नहीं है के बीच बस एक ओब्लिक रहता है। अधिकारी की मर्जी है कि वह इन दोनों में से किसे चुने। कभी वह खुश कर देता है तो कभी दुखी कर देता है। हरे पेन की इंक बर्बाद करते हुए कुछ अधिकारी एक तरफ टिक लगाते हैं तो दूसरे विकल्प को पूरा काटना नहीं भूलते। माना छुट्टी किसी कर्मचारी का अधिकार नहीं है, फिर इसे आप अधिकार में लेते हुए आपनी इच्छा हो दिया करें। आपका मूड हुआ कि आज फलां कर्मचारी को छुट्टी देनी है, तो उसे पहले ही सूचित कर दिया जाना चाहिए कि आज तुम आराम करो। हो तो यह भी सकता है कि कर्मचारी दफ्तर आए और जैसे ही वह हाजरी रजिस्टर के हाथ लगाने के हो आप उसे कह दें- आज आपको छुट्टी दी जाती है।
हे अफसर देवता! छुट्टी देने अथवा नहीं देने का आपका फैसला सदा सुरक्षित है तो इसमें कर्मचारियों को भी हो-हल्ला नहीं करना चाहिए। यह कैसी लीला है कि अफसर देवता के ऊपर भी कोई दूसरा देवता या सरकार विरजमान है। यह तो जैसे को तैसा वाली बात हो गई। बिदाई संभाषण वाली तीसरी शक्ति अब भी सक्रिय है। सभी छोटे-बड़े सभी कर्मचारियों को अपने से ऊपर के अधिकारियों की अनुमति लेनी होती है। मैं तो अनुमति लेने का इतना आदि और अभ्यस्त हो गया हूं कि लघुशंका भी साहब को पूछ कर करता हूं। वे मना कर देते हैं तो इंतजार करता हूं, थोड़ी देर बाद फिर निवेदन करता हूं- साहब जोर की लगी है, आप का हुकम हो तो फारिग हो आऊं? ऐसे निवेदन पर साहब पसीजते हैं। वे मुस्कान के साथ पूरे दांत दिखाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि सब से बड़ा साहब मैं ही हूं। मेरी भी इच्छा हुई कि कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में हिस्सा लूं, पर साहब ने रोक दिया और मैं रुक गया।
छत्तीसगढ़ का समाचार पढ़ कर मुझे बड़ा सुख मिला कि वहां की एक ट्रेनी डिप्टी कलक्टर अनुराधा अग्रवाल को 'कौन बनेगा करोड़पति' में भाग लेना की अनुमति नहीं है का पत्र देरी से मिला। यह तो अच्छा हुआ वे कार्यक्रम कर चुकी थी। कानून और अफसर दोनों को अंधा रहना चाहिए। संवेदनशीलता जाग्रत होने की जरा भी संभवना नहीं रखनी चाहिए। भले ही अनुराधा जी विकलांग हो और वॉकर के सहारे चलती हो। भले ही वे कार्यक्रम से जीती हुई रक़म से अपने भाई की किडनी का इलाज़ करना चाहती हो। वैसे यह उनके घर का निजी मामला है। और देखिए कार्यक्रम की शूटिंग के एक दिन पहले उनकी मां का निधन हो गया तो यह भी ईश्वर की मर्जी है, इसमें सरकार का कहां कोई दोष है। यह ईश्वर का संकेत था कि तुमको कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं मिलने वाली। पंगा होगा, रुक जाओ पर अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बैठना किसे अच्छा नहीं लगता। आप गई तो देखिए कितनी बातें हो गई ऊपर से लेकर नीचे तक।
पंच काका कहते हैं कि अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बड़े अफसर नहीं बैठ सके तो वे अपने से छोटे अधिकारियों को बैठने का भला अवसर क्यों देने लगे। नेताओं को मुद्दा मिलना चाहिए कि वे किस तरह किस को घेर सकते हैं। वैसे यह भी ठीक है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल होने की अनुमति प्रशासनिक अधिकारियों को बाकायदा अधिसूचना जारी कर दी जाती है और हॉट सीट को इतना हॉट कर दिया जाता है।
० डॉ. नीरज दइया
 

12 सितंबर, 2017

टॉलस्टॉय की टोपी

मैं लेखक हूं पर दिखता नहीं हूं। मुझे देखकर कोई भी लेखक नहीं कहता। देखने में मैं बिल्कुल आम आदमी जैसा हूं। जो भी मुझे से मिलता है यही कहता है कि मैं लेखक जैसा दिखता नहीं हूं। अपनी ऐसी तारीफ सुन-सुन कर कोई कब तक धीरज रखेगा। आखिरकार धीरज को जबाब देना था दे दिया। मुझे महसूस होने लगा कि जब मैं लेखक हूं तो लेखक जैसा दिखाई क्यों नहीं देता हूं। अगर लेखक जैसा दिखाई दूं तो हर्ज ही क्या है? सभी समकालीन लेखक तो लेखक जैसे दिखते हैं फिर मैं आम आदमी जैसा क्यों बना रहूं। वैसे यह गलत भी तो है कि कोई लेखक हो और वह देखने में लेखक जैसा दिखाई ही नहीं दे। इस गलती को मेरे अलावा कौन सुधार सकता है। अब मैं लेखक की तरह दिखना चाहता हूं।
    मुझे खुद के लिए कुछ भी करूंगा। मैं जो हूं वही तो दिखाई देना चाहिए। समस्या यह भी है कि इधर के आलोचक भी मुझे लेखक कम और आम आदमी अधिक मानते हैं। अब आप ही बताएं कि कोई इतने वर्षों से कोई लिख रहा हो और उसे लेखक नहीं माना जाए तो वह क्या करे! यह तो सरासर नाइंसाफी हुई ना। आपको और मुझे ही नहीं वैसे सबको पता है कि सबके अपने-अपने ग्रुप हैं। मैं उनके ग्रुप में नहीं हूं तो मेरा यह हाल है। वैसे मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और अगर पड़ता भी है तो मैं प्रत्यक्ष में यही कहूंगा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं लेखक हूं और किसी आलोचक के कुछ कहने-सुनने से आम आदमी नहीं हो जाऊंगा। ऐसी साहित्य विरोधी घटनाओं और गतिविधियों से आहत होकर मैं लिखना-पढ़ना बंद नहीं कर सकता। मैं तो यहां तक छाती ठोक कर कहता हूं कि कोई पाठक भी अगर मुझे रिजेक्ट करता है तो कर दे मेरी बला से। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे किसी पाठक ने लेखक नहीं बनाया है। फिर यहां यह भी बता दूं जो पाठक मुझे लेखक नहीं मानते हैं, मैं उन्हें पाठक भी नहीं मानता हूं।
    भारतीय लेखकों को देखता हूं तो सब अलग-अलग मिजाज के दिखाई देते हैं। उनमें ऐसी कोई उभयनिष्ठ चीज है ही नहीं कि मैं अपना लूं। अब मेरी दूरदृष्टि का कमाल देखिए। लगभग सारे विदेशी लेखक हेट लगया करते थे और लगते हैं। मैंने भी हेट लगाने की सोच ली। तीन-चार नेहरू टोपी ले तो आया पर बात जमी नहीं। देशी टोपी की यही औकात है कि उन्हें लगाते ही लोग मुझसे पूछने लगे कि क्या अबकी चुनाव में खड़े होने का इरादा है? कहलाना चाहता था लेखक और लोग कहने लगे नेताजी। लेखक को नेताजी कहें तो गाली जैसा लगता है।
    पंच काका की शरण में गया। उनसे सारी कथा कही। उन्होंने संदूक से एक टोपी निकाल कर मुझे देते हुए कहा- इसे पहन कर अब ठाठ से घूम। यह टॉलस्टॉय की टोपी है। कोई पूछे तो नाम बता देना। सबकी बोलती बंद हो जाएगी। फिर उन्होंने काम की बात बताई कि लेखक होने या दिखने से जरूरी है हमारा चिंतन-मनन। ईश्वर ने हम सब को पांच तत्त्वों से बनाया है पर कोई किसी के जैसा नहीं। ऐसी होती है रचना की मौलिकता। शब्द सभी के पास समान हैं पर उनको रचना में अपनी मौलिकता के साथ प्रयुक्त करना आना चाहिए। एक लेखक को अपनी भाषा गढ़नी और कमानी होती है, तभी वह लेखक कहलाता है।

नीरज दइया

10 सितंबर, 2017

बड़े लोगों की बड़ी बातें

   जो आसानी से समझ आ जाए, वह छोटी बात होती है। जो आसानी से समझ नहीं आए, वह बड़ी बात होती है। छोटी बात छोटे लोग करते हैं। बड़ी बात बड़े लोग। छोटे लोगों की छोटी-छोटी बातें करने वाले लेखक छोटे होते हैं और बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लेखक बड़े। बड़ा लेखक और बड़े लोग कभी नहीं चाहते कि वे छोटे लोगों के समझ में आने लायक कोई छोटी बात करें, किंतु छोटे लेखक और छोटे लोग हमेशा इसी अभिलाषा में मरते हैं। वे चाहते हैं कि कुछ बड़ी बात हो जाए, वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में पहुंच जाएं। उनका जीवन भी धन्य हो जाए। पर नहीं होता।
    मैं बहुत चाहता हूं कि कुछ ऐसी बात करूं जो आपके बिल्कुल समझ में नहीं आए। सिर के ऊपर से निकल जाए। आप उसे लेकर पहले तो खूब माथा-पच्ची करें कि कहीं कोई पेंच मिल जाए और बाद में उसे साझा करते हुए अपने दोस्तों को भी परेशान करें कि समझाओ इसका अर्थ। मैं छोटा वाक्य लिखता हूं और आप तक बात पहुंच जाती है। मैं बड़ा वाक्य लिखता हूं तब भी आप अर्थ समझ जाते हैं। मैं करूं क्या? ऐसा कैसे क्या लिखूं कि आप अटक जाएं, भटक जाएं। 
    वैसे गुणी जनों का मानना है कि कोई बड़ी और ना समझ में आने वाली बात हमें छोड़ देनी चाहिए। उसे समझने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। जो बड़े हैं और जो बड़ी बातें है, उन्हें बिना समझे ही बड़ी बात मान कर उन्हें बड़ी बात बने रहने देना चाहिए। ऐसी बड़ी बातें लिखने वाले बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी किताबें बड़े-बड़े प्रकाशक प्रकाशित करते है। वे बिकते हैं। उनका नाम बिकता है। उन्होंने क्या और कैसा लिखा है? इसकी चिंता वे नहीं करते। जो बिकता है उसे समझने-समझाने की जरूरत ही क्या है? वे बाजार की नब्ज पहचानते हैं। उनके जुमले चलते हैं। उन्हें बाजार की गति और लय का पुराना अनुभव होता है। वे अपनी बड़ी बातों के लिए बाजार बनाना जानते हैं। उनके संस्थान और उनसे उपकृत संस्थानों में खेल चलता है। पैसों का खेल है और खेल सारा पैसों के लिए है। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपया।
    बड़े लोग कभी नाक को सीधी पकड़ते हैं और कभी घुमा कर पकड़ते हैं। जब जरूरत होती है अपने नाक-कान सब पकड़ लेते हैं। इनके नाक का कमाल है कि उन्हें पहले से खुशबू आ जाती है कि नाक कटने वाली है। परिस्थियों को देखते हुए वे अपनी नाक लंबी कर लेते हैं और नाक कटा भी लेते हैं। नाक कट चुकने के बाद भी देखने में नाक की लंबाई पहले जितनी ही नजर आती है। वे कहते हैं कि देखो नाक तो सही सलामत है। उनके नाक लंबी करने और कट जाने पर भी सामान्य आकार के रहस्य को हर कोई जान नहीं सकता। यह रहस्य भी उनके अर्थ से परे होता है। अर्थ होता है तो भी दिखाई नहीं देता। उनकी ऐसी महिमा अपरमपार है।
    पंच काका कहते हैं कि बड़े लोग अर्थ लेना जानते हैं, देना जानते ही नहीं! बड़े लोग बड़े पदों पर रहे होते हैं। सबके लिए तीन शब्द शक्तिया होती हैं पर उनके लिए ऐसी चार। यह चौथी शब्द-शक्ति ही है जिसमें वे अर्थ को गायब कर चुके होते हैं। वे जीवन पर्यंत अनेक शक्तियों से तीन-पांच करते इतना निचोड़-निचोड़ कर अर्थ प्राप्त कर चुके होते हैं कि आम भी गायब और गुठलियां भी गायब। यानी अर्थ और रस सफाचट्ट !
० डॉ. नीरज दइया

09 सितंबर, 2017

हम सब बैलों की कथा

हले गायें और भैंसे बोलती नहीं थी। ऐसा नहीं कि पहले उनके मुंह में जुबान नहीं थी। जुबान तो थी पर कोई कानून ऐसा नहीं था कि वे बोलें। सामाजिक चेतना आने से धीरे-धीरे गायें-भैंसें मुख्य धारा में आने लगी। आजकल गायों-भैंसों का जमाना है। ऐसा कोई क्षेत्र बचा ही नहीं है जहां गायों-भैंसों ने एंट्री ना ले ली हो। जहां देखो वहां कोई न कोई गाय-भैंस नजर आ ही जाएगी। अब कहने वाले भले कहते रहें कि कुछ सिरफिरे गधों का ये सब किया धरा है। हो गया सो हो गया, अब क्या किया जाए?
घर के नमक-मिर्च और खाने के चक्कर बेचारा बंधा बैल में रहता है। कोल्हू के बैलों को समय ही नहीं कि वे इस बारे में सोचे। आजाद धूमते सांड भला इस विषय पर ध्यान क्यों देंगे? खुला सांड मंडी में आजादी से घूमता है, कहीं भी कुछ भी खाता है। वह जम कर पीता भी है। जो बहुत तगड़ा है वह दिनोंदिन तगड़ा होता जा रहा है। जो इस रेखा के नीचे हैं उसको तो रोने की आदत है। वह बस रोता रहेगा। वैसे रोने-धोने वाले बैलों के लिए आज खुशी का दिन है। वे बड़े खुश हो रहे है कि केंद्र सरकार ने अदालत में चल रहे 'मैरिटल रेप' के मामले में कह दिया है कि इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। भला हो केंद्र सरकार कि उसने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी- मैरिटल रेप को अपराध मानने से विवाह संस्था अस्थिर हो जाएगी और पतियों को परेशान करने का ये एक नया हथियार मिल जाएगा।
हथियार किसी के पास हो वह काम के समय काम आए, तभी उसकी सार्थकता है। बैलों के पास सींग होते हैं पर वे भला खुले सांड जैसे उनका प्रयोग कहां कर सकते हैं। बैल जब कोल्हू में जोता जाता है तो उसके गले में घंटी बांध दी जाती है। आंखों के आगे गांधारी स्टाइल में पट्टी बांध दी जाती है। बेचारा खोल भी नहीं सकता। कहते हैं कि चूहे बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकते। यहां तो दर्द ही दूसरा कि ऐसे-ऐसे कानून बना दिए गए हैं कि अब बैल चूं भी नहीं कर सकते। गनीमत केंद्र सरकार ने इस बार तो बचा लिया। कितने भले दिन थे जब मनोज कुमार ने अपनी फिल्म में सुनहरे दिन दिखाए थे। बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं, गम कोसों दूर हो जाता है, खुशियों के कमल मुस्काते हैं। हाय री किस्मत, आज खुशियों के कमल ने बचा लिया। पर कहां गई खुशियां!
गायों और भैंसों से पीड़ित-प्रताड़ित बैलों ने अनेक संघ हैं। एक स्वर में वे गाते हैं- जाने कहाँ गये वे दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछाएंगे। कुछ मजाक-मस्ती करते हैं। दुखी आत्माओं का यही तो सुख है कि थोड़ी मजाक-मस्ती से जी बहला लेते हैं। चूहा ने सारी विस्की पी कर एक बार बोला- कहाँ है बिल्ली। और फिर क्या था दुम दबा के बिल्ली भागी। उस दिन भले बिल्ली भागी हो पर आज तक किसी चूहे की फूटी किस्मत नहीं जागी। कोल्हू में बंधना एक रिस्की खेल होता है। इस बार बेड़ा पार हो गया, पर हलाल करने वाली तलवार अब भी लटक रही है।
पंच काका का कहना है कि इस युग का एक ही यथार्थ है- हैंडल विथ केयर। जिसकी लाठी उसकी भैंस भूल जाओ, अब तो जिसकी भैंस उसी की लाठी। जरा संभल कर काम लो इनसे। काका ने मुझे कहा कि मैं अपना उपनाम ‘चंडीदास’ रख लूं! 


डॉ. नीरज दइया

01 सितंबर, 2017

भोग और उपभोग में दर्शन

 डॉ. नीरज दइया
    जीवन बड़ा अनमोल है। बार बार नहीं मिलता। ना जाने कितने-कितने जन्म लगते हैं। कितने-कितने पुण्य करने पड़ते हैं। फिर कहीं जाकर यह जीवन मिलता है। मनुष्य जीवन पूरी पुण्य-प्रक्रिया का प्रसाद है। योगी और भोगी दोनों मानते हैं- मनुष्य योनी बार बार नहीं मिलनी। मिली है तो भोग लो भैया! नहीं तो मन की मन में रह जानी है। मनुष्य की यही अवस्था श्रेष्ठ है।     इससे भी जरूरी और असली बात- कल किसने देखा? जो भी है बस यही इक पल है। किसी पल में जैसा-कैसा प्यार मिले, ग्रहण कर लेना चाहिए। पल चला जाता है फिर गाना गाते रहो- पल भल के लिए कोई हमें प्यार करले, झूठा ही सही। गाने-बजाने से कुछ नहीं होता।
    जीवन में सब कुछ करना पड़ता है। आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। भारतीय के पास तो जहां देखो दार्शनिकता भरी पड़ी है। वस उसे सच्चाई के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए अपाने सुना होगा- कल हो ना हो। यह कोई नई और ताजा बात नहीं। इस नाम से फिल्म भी बनी पर कबीर ने तो वर्षों पहले लिखा छोड़ा था- काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। यह गूढ़ रहस्य जान लेना चाहिए कि कवि सदा सच लिखते हैं और सच के सिवाय कुछ नहीं लिखते हैं। या फिर ऐसे समझ लें कि वे जो भी लिखते हैं, सच हो जाता है। जैसे कवि प्रदीप ने लिखा था- राम के भक्त रहीम के बंदे, रचते आज फ़रेब के फंदे। कितने ये मक्कर ये अंधे, देख लिये इनके भी धंधे। इन्हीं की काली करतूतों से बना ये मुल्क मशान। देखिए मिल गया ना सूत्र।
    सूत्र यह है कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें भोग को सीधे-सीधे ग्रहण करना खतरनाक है। भोग तो राम और रहीम सभी करते हैं। जो भोग बचा रहता है उसे उपभोग उनके चेले-चेलियां करते हैं। सच्चाई तो यह भी है कि भोग पर पुण्य का आवरण अनिवार्य है। ऐसा कौन मूर्ख है जो यह नहीं मानता कि मनुष्य योनी भोग और उपभोग का समुच्चय है। यह बात अलग है कि बहुत बार भोग और उपभोग की श्रेणियां इतनी घुल-मिल जाती है कि उन्हें पृथक-पृथक नहीं कर सकते हैं। नेमी-धर्मी और ज्ञानी आदमी इन चक्करों में नहीं उलझता। वह तो वह ग्रहण करता है। कभी भोग को उपभोग बनाकर और कभी उपभोग को भोग बनाकर।
    पंच काका कहते हैं- जिंदगी चार दिन की है। रोज-रोज की किच-किच किस काम की। जीवन ठाठ भोग और उपभोग में है। बिना ठाठ-बाट के लोग आदमी को आदमी समझते नहीं। अनुभव की बात बता रहा हूं- कभी कभी तो आदमी भी खुद को आदमी नहीं समझता। यह कोई दर्शन नहीं हकीकत है- कभी कभी तो घर में घरवाली तक अपने आदमी को भेड़िया की संज्ञा दे डालती है। अगर घरवाली ऐसा कहेगी तो आदमी अपनी औकात पर आ जाता है। वह उसे कुतिया जैसे घटिया शब्द से विभूषित करता है, बदले में आदमी भेडिये से कुत्ते की श्रेणी में आ जाता है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि उन दोनों की यह दर्शनिकता है कि वे अलगा-पिछला सब कुछ देख लेते हैं। इतनी योनियां पार करते हुए अब मनुष्य जीवन मिला है तो क्या हुआ, कभी कुत्ते-कुतिया और भेडियों के संग रहे हैं। ऐसे में इस जीवन में उनके कुछ लक्षण तो अटके-भटके आ ही गए होंगे। तभी तो ऐसा है।