16 जनवरी, 2018

राजस्थानी कविताएं / नीरज दइया / अनुवाद: मदन गोपाल लढ़ा

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माँ के लिए कविता
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एक शब्द लिखता हूँ
कागज पर- माँ
                 और आगे कुछ नहीं लिखा जाता।
किसी पंक्ति के बीच
जब कभी किसी शब्द के साथ आ जाता है माँ
तब अटक जाती है पंक्ति, आगे कुछ नहीं लिखा जाता।


माँ शब्द से जो यात्रा शुरू होती है
वह यात्रा वहीं हो जाती है संपूर्ण।
जीवन में जैसे सब कुछ परोट लेती है
ठीक वैसे ही कविता-
                    माँ के आगे कुछ नहीं...।
बस टाबर के लीक-लकोळिया
माँ के लिए कविता होते हैं।
००००

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रक्त में मिली हुई भाषा
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राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
                                              तो कोई बात नहीं है...
कविता से ज्यादा जरूरी होती है भाषा की संभाल
भाषा की हेमाणी लेकर खड़ा हूँ मैं...

आपके मुख से फूल बरसे-
‘मर गई है राजस्थानी भाषा, जला दिया राज ने उसे सालों पहले
नहीं है राजकीय मान्यता।’

कोई बात नहीं है-
जब मर गई है मेरी भाषा
फूल चुगने के लिए दूसरा कौन आएगा
यह पक्का है कि आप अपनी जीवंत भाषा से उतने नहीं जुड़े
                                                         जितना मैं अपनी भाषा से।

यदि यह बात नहीं होती सच
तो ऐसी विकट घड़ी में
फूल बरसाने से बचते आप।
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
तो कोई बात नहीं है...
राजस्थानी भाषा राजस्थानियों के रक्त में घुली हुई है।
००००

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घर
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तुमने और मैंने पाला
हजार-हजार रंगो का
एक सपना।

तुम्हारी और मेरी निगाहों का
तुम्हारे और मेरे ख्वाबों का
एक घर हो
जो अब धरती पर
नहीं बनेगा कभी।

मां कहती है-
बेवकूफी है
घर होते बियावान में भटकना।
आग लगा दो-
ऐसे नुगरे सपनों को
जो थका डालते हैं
और करवाते हैं
व्यर्थ यात्रा।
००००
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रचाव के रंग

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रचाव के रंग
खतम नहीं हुए हैं अभी।

अभी तक बाकी है आनी
दुनिया की
कई कालजयी
कविताएँ।

यह छोडो
कि कौन लिखेगा
उनको।
मगर भरोसा रखो
कि अभी तक लिखी जानी है
दुनिया की
कुछ और कविताएँ।

कवियों के इर्द-गिर्द
घूम रही है
उनकी आत्माएँ।

अवश्य देंगी वे
रचाव को
नई राग
नए रंग।
क्योंकि वे
आज भी हैं मुक्त
जीवन और मरण से।
००००
(वागर्थ, जनवरी 2018)
 
 

उठा-पटक लेखक संघ / डॉ. नीरज दइया

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता इस उक्ति से प्रेरित होकर उन्होंने प्रस्तावित किया- सभी लेखको ! एकजुट हो जाओ। वे समझाने लगे- देखिए एक हाथ से ताली नहीं बजती, इसलिए मिलकर रहेंगे तो खुशियां मनाएंगे। वे ऐसा समझा ही रहे थे कि एक लेखक जैसा दिखने वाला आदमी खड़ा हुआ और ताली बजाने लगा। उसे देख कर कुछ दूसरे लेखक-कवि यानी वहां उपस्थित लोग उठ खड़े हुए। सभी तालियां बजाने लगे। बाद में पता चला कि उन्होंने ‘उठा लेखक संघ’ बना लिया है। इस उठा लेखक संघ का उद्देश्य रखा गया- अपनों को उठाओ और ऊंचा उठाओ। इतना ऊंचा उठाओ कि सब हमारे संघ के लेखक-कवियों को उठे हुए यानी कुछ ऊंचे दर्जे के मानने को विवश हो जाए। चारों तरफ अपनों की धूम होनी चाहिए।
    दो-चार सिर-फिरे नियम-कानून मानने वाले सिरफिरे लेखक-कवि उठा लेखक संघ के इस सिलसिले से रुष्ट हो गए। विरूद्ध हुए लेखक बयान देने लगे- कविता-कहानी का ‘क’ तक नहीं जानते, और चले हैं लेखक बनने। ये दो कोड़ी के लोग हैं, कोई लेखक-कवि लोग ऐसे होते हैं क्या? ऐसी हल्की और अशोभनीय बातें सुनकर भी ‘उठा लेखक संघ’ वाले एकजुट रहे। उन्होंने घोषणा कर दी हम एक ही थेली के चट्टे-बट्टे और पक्के रहे। जब एक चना भाड़ नहीं फोड़ सकता तो ये दो चार लोग क्या कर सकते हैं। हमे हमारे संघ के मूल मंत्र पर अडिग रहना है। अपने भाई-बहन यनी संघ के संगी-साथी साहित्य में कुछ भी टूटा-फूटा लिखे या कहीं कोई कुछ बात कहे, बोले तो बस हमें ‘वाह-वाह, बहुत शानदार’ ‘क्या बात कहीं है सर’ जरूर कहना और लिखना है। इन जलों को इतना जलाएंगे कि ये जल कर राख हो जाएंगे। यानी केवल हम ही हम रहेंगे।
    जब ‘उठा लेखक संघ’ के सदस्यों और पदाधिकारियों ने जोर-शोर से अपनी गतिविधियां आरंभ कर दी तो अखबारों में कभी फोटो-रहित, तो कभी फोटो-सहित समाचार छपने लगे। ऐसे में जले भुनों के लिए उनका सामना करने के लिए दूसरे दल का निर्माण करना आवश्यक लगा। फिर क्या था, दूसरा दल अपने दल-बल के साथ उद्घाटित हुआ। जब प्यार किया तो डरना की तर्ज पर उन्होंने ‘जब विरोध किया तो डरना क्या...’ उक्ति से प्रेरणा ली। विरोधिरों ने नाम भी खुल कर प्रतिरोध का रखा। विरोध हो तो जाहिर भी होना चाहिए। उन्होंने नाम रखा- ‘पटक लेखक संघ’। उठा के सामने पटक का मेल तो अद्वितीय होना ही था। इस पटक लेखक संघ ने अपने उद्देश्यों में एक परम उद्देश्य गुप्त रखा। गुप्त आजकल नाम का ही गुप्त है, वैसे वह जगजाहिर ही होता है। ऐसा कोई गुप्त रहस्य नहीं देश में फिर आर टी आई का जमान है तो जाहिर उद्देश्यों में गुप्त उद्देश्य था- उठा उठा के उठा लेखक संघ वालों पटको। ऐसी पटखनी लगाओ कि पूरे उठ जाएं या फिर उठने और उठाने का नाम ही भूल जाएं।
    यह पुराना रिवाज है कि एक संघ वाला दूसरे संघी को पटकनी देता है, तो उसकी हूट दूर तलक जाती है। इतनी दूर तलक कि कोई अगली बार उसे मंच के करीब आते हुए भी डर लगने लग जाता है। हमारा भारत महान तो है ही, इसमें प्रांत और छोटे छोटे शहरों में ऐसी अनेक उठा-पटक तो चलती ही रहती है। जिधर हाथ करो उधर कोई न कोई कबड़ा उजागर हो ही जाता है। वैसे यह जिस शहर की कथा है वह शहर छोटा था और छोटे शहर में चूहा दौड़ होने लगी। थोड़े ही दिनों में उठा की पटक और पटक की पटक दिखने लगी।
    ‘उठा लेखक संघ’ त्रिदिवयी कार्यक्रम करता तो उसकी घोषणा के दूसरे ही दिन ‘पटक लेखक संघ’ वाले पांच दिवसीय कार्यक्रम घोषित करते। वे एक दूसरे से सवाया घोषित करने की उधेड़-बुन में लगे रहते। ऐसे में कभी पटक संघ वाले आगे, तो कभी उठा संघ वाले बाजी मार ले जाते। शहर के बुद्धिजीवियों को ग्रहण लग गया। उनकी इस दौड़ से उनके गले आफत बढ़ती गई। नित नए कार्यक्रमों की बाहर। एक दिन में दो-दो तीन-तीन कार्यक्रम होने लगे। आम आदमी श्रोता यानी दर्शक-श्रोता का दुखी होना ऐसे में जायज था। एक दुखिया आम आदमी इतना दुखी हुआ था कि वह ‘उठा लेखक संघ’ के कविता-पाठ कार्यक्रम में दुखी मन से पहुंच गया, और उसे भी कवि के रूप में अवसर मिल गया। उसने सुनया साहिर लुधियानवी का गीत- ‘जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां, दर्द भरे दिल की जुबां।’ वहां तो कमाल हो गया, सब उपस्थित जनों ने खूब तालियां बजाई और उससे अनुनय करने लगे- ‘हमारे संघ में आ जाओ। आपका गला बहुत अच्छा है। आपने बहुत अच्छा गीत लिखा है। आपके गीत को तो किसी फिल्म में होना चाहिए। हम सब मिलकर प्रयास करेंगे।’
    आम आदमी को शरारत सूझी, उसने यही प्रयोग दूसरे संघ के कार्यक्रम में जाकर किया। ‘पटक लेखक संघ’ फिर से अपना दर्द साहिर से उधार लेकर सुनाया- ‘जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां, दर्द भरे दिल की जुबां।’ यहां भी खूब तालियां बजी। वाह-वाही हुई। समवेत स्वर में फिर आमंत्रण मिला- ‘खूब लिखते हो मेरे भाई, हमारे संघ में आ जाओ। खूब तरक्की करोगे। आपके जैसा शब्दों का जादूगर हमें मिल जाए तो देखना हम क्या से क्या करते हैं। आपको कहां से कहां पहुंचा देंगे। आज ही हमें अपना मानो।’
    शहर में हर दिन कोई न कोई कार्यक्रम हो रहा था। एक  पंथ दो काज, ठाले लोग साहित्य लेखन की सेवा में जुड़ते चले जा रहे थे। लोग मिलते रहें और कारवां कवियों का जुड़ता गया। साठोत्तरी कविता तो बहुत पुरानी हो गई यहां साठोत्तरी बंधु-बांधवों का मिलाप हुआ और उनका अच्छा टाइम पास होने लगा। या ऐसा भी कह सकते हैं कि वे अपना अपना और सबका टाइम पास करने लगे। ऐसे में कोई ऐसा तीर चलाया जाना था कि जिससे एक तीर में कई शिकार हो जाए। एक तीर कहीं से आए और उठा लेखक संघ घायल हो जाए और फिर वही तीर पटक लेखक संघ को धरती पटकने में कामयाब हो जाए। आजकल सभी को उठा-पटक पसंद है तो ऐसे में कोई दूर किनारे बैठा कर साहित्य-साधना कैसे करे? आपको कोई दूसरा ज्ञानी लगता तो उससे बतियाना मैंने तो डूबती नैया पंच काका के भरोसे छोड़ दी।
    पंच काका बोले- इस समय में सच कहना-सुनना जरा कठिन है। सचाई यह है कि ये सारे लेखक संघ एक की दो कहने वाले हैं। करते-कराते कुछ नहीं, भड़ास और छपास रोग के मारे मरे जा रहे हैं। गाल बजाना या गला फाडऩा कभी कविता होती है क्या? शहर में साहित्यिक क्रांति नहीं शांति की जरूरत है। शांति के लिए दोनों संघों को मिलाकर संयुक्त गठबंधन में मैं नए संघ का निर्माण करूंगा। संघ का नाम होगा- ‘उठा-पटक लेखक संघ’। साहित्य में केवल उठाने और बस उठते जाने से काम नहीं चलता, और ना ही यह दुकानदारी फकत पटकने और पटकाने से चलने वाली है। किसी भी संघ के उद्देश्यों में सभी पक्षों को शामिल करना जरूरी होता है। वैसे बिना उठा-पटक के तो एकदम शांति हो जाती है। अंत में आम आदमी से काका बोले- निकालो पांच सौ रुपये, मैं तुम्हें ‘उठा-पटक संघ’ का सदस्य बना रहा हूं। अब आम आदमी का मुंह बिल्कुल आम जैसा हो गया था।
००००

डॉ. नीरज दइया
(हास्य-व्यंग्य मासिक “अट्टहास” (संपादक श्री अनूप श्रीवास्तव) जनवरी, 2018 राजस्थान व्यंग्य विशेषांक में प्रकाशित)

12 जनवरी, 2018

केन्द्रीय साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत आलोचक डॉ. नीरज दइया से बातचीत

मैं प्रयास करूंगा कि पाठकों का भरोसा कायम रखूं
• लगभग तीस से अधिक वर्षों की साधान के बाद साहित्य अकादेमी का मुख्य पुरस्कार पा कर कैसा लग रहा है?
• मुझे इसकी कोई उम्मीद नहीं थी। जब मुझे मालूम चला खुश हुआ किंतु मुझे बेहद आश्चर्य भी हुआ।
• आश्चर्य क्यों, पुरस्कार तो हर बार किसी न किसी को मिलता ही है?
• हां, मगर विगत दो वर्षों से मुख्य पुरस्कार बीकानेर के खाते था। कहानीकार बुलाकी शर्मा और उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ के बाद इस बार यह आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक निर्णय है। इससे प्रमाणित होता है कि अकादेमी की निगाह में कृति पर रहती है।
• कृतियां तो अन्य भी बहुत रही फिर आपकी ‘बिना हासलपाई’ में ऐसा क्या खास है?
• ‘बिना हासलपाई’ आधुनिक कहानी के सिलसिले में मेरा आलोचनात्मक प्रयास है। राजस्थानी कहानी के विकास, बदलते स्वरूप और उतार-चढ़ाव का पच्चीस कहानीकारों के संदर्भ में मैंने विशेष अध्ययन प्रस्तुत किया है। वैसे यह पुरस्कार महज इस बात का प्रमाण है कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच प्रकाशित कृतियों में निर्णयाकों ने इसे अति-उत्तम माना है। अन्य कृतियां जो अंतिम चयन में रहीं, वे भी महत्त्वपूर्ण हैं।
• मेरी और अनेक अन्य कहानीकारों की बात ‘बिना हासलपाई’ में नहीं की गई है। ऐसा क्यों है?
• प्रत्येक काम की अपनी एक सीमा होती है। राजस्थानी में अनेक कहानीकार हैं और सब पर पृथक आलेख लिखे जाने चाहिए, किंतु क्या यह काम केवल मुझे ही करना चाहिए? मैंने अगाज किया है और ‘बिना हासिलपाई’ में किसी कहानीकार विशेष पर आलेख लिखने की तुलना में मेरा ध्येय कहानी आलोचना के लिए एक नई दृष्टि विकसित करने का रहा है। चयनित कहानीकार तो महज उदाहरण स्वरूप देखें जाने चाहिए। रही बात आप की तो मैंने ‘देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां’ का संपादन करते हुए आप पर लिखा है। अन्य कहानीकारों पर भी काम करूंगा।
• आप अनेक विधाओं में लिखते हैं फिर आपका आलोचक रूप इतना प्रमुख क्यों है?
• यह तो आप जैसे विद्वान रचनाकार बता सकते हैं कि मेरी प्रमुखता क्या है। मैं तो पूरी ईमानदारी से बस अपना लेखन करता हूं। मुझे लगता है कि मैं बेबाक हूं, सही को सही लिखता हूं। मुझ पर पाठकों का यह भरोसा है। मैं प्रयास करूंगा कि उनका भरोसा कायम रखूं।
• उपन्यास विधा पर भी कुछ आलोचना का काम आने वाला है?
• हां, राजस्थानी उपन्यास-यात्रा पर मेरी किताब नई कृति ‘आंगळी-सीध’ लगभग तैयार है। मैं प्रयास करूंगा कि इस वर्ष वह पाठकों के हाथों में पहुंच जाए। राजस्थानी में संकट लिखने से अधिक उसके प्रकाशन का है। बहुत से रचनाकारों की कृतियां समय पर प्रकाश में नहीं आती है। यह महत्त्वपूर्ण है कि राजस्थानी उपन्यास विधा का पर्याप्त विकास रचनाकारों ने संभव बनाया है। इस क्षेत्र में आपका भी बड़ा योगदान रहा है।
• आपको आलोचना के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान मिल रहा है, राजस्थानी में आलोचना की स्थिति कैसी है।
• आलोचना एक गंभीर कार्य है। इसमें पहले पर्याप्त अध्ययन, चिंतन-मनन के साथ विशेष दृष्टि की आवश्यकता होती है। रचनाकार के प्रति सम्मान भावना के साथ मैं निर्मम तुलनात्मक अध्ययन का पक्षधर हूं। राजस्थानी भाषा में तुलना यहां की परिस्थितियों को देख-समझ कर करेंगे तो बेहतर रहेगा। कहानी आलोचना में समग्र रूप से डॉ. अर्जुनदेव चारण के बाद मेरा काम आया है। अभी इस दिशा में अन्य काम भी सामने आने वाले हैं। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि आलोचना की स्थिति बहुत अच्छी है किंतु निराशाजनक भी नहीं है।
• राजस्थानी भाषा की मान्यता के विषय में क्या मनना है?
• मान्यता इसी वर्ष मिल जाएगी। आप जैसे वरिष्ठ रचनाकारों का इसके लिए पूरा संघर्ष रहा है। अब जब सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी है, मैं मानता हूं कि माननीय प्रधानमंत्री जी शीतकालीन सत्र में संवैधानिक मान्यता की घोषणा करेंगे।
- देवकिशन राजपुरोहित

दैनिक नवज्योति 11-01-2018

07 जनवरी, 2018

आलोचना विधा में पढ़ना पहली शर्त है : डॉ दइया

साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार 2017 से सम्मानित डॉ. नीरज दइया से डॉ. गौरीशंकर प्रजापत की बातचीत

साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्ति निसंदेह एक बड़ा सम्मान माना जाता है, ऐसे शुभ अवसर पर आप कैसा अनुभव कर रहे हैं?
सम्मान की घोषणा से निसंदेह हर्षित हुआ हूं, किंतु साथ ही मैं आश्चर्यचकित हूं। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस बार यह सम्मान मुझे मिलेगा। गत वर्ष हमारे ही शहर के श्री बुलाकी शर्मा और उनसे पहले श्री मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह सम्मान मिला था, इसलिए सभी का यह विचार लगभग पक्का था कि इस बार राजस्थान के किसी अन्य क्षेत्र का कोई लेखक होगा। किंतु यह घोषणा इस बात को प्रमाणित करती है कि साहित्य अकादेमी के मूल्यांकन का आधार कोई क्षेत्र अथवा लेखक नहीं होकर कृति होती है। ‘बिना हासलपाई’ राजस्थानी कहानी आलोचना के संदर्भ में बड़ी मेहनत और लगन से किया हुआ मेरा काम है। मैं समझता हूं कि यह मेरे आलोचना-कार्य का सम्मान है। मेरा मानना है कि इस सम्मान से मेरी जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ी है।  
लेखन धर्मिता एवं साहित्य अकादेमी पुरस्कार के संदर्भ में आपके प्रेरणा स्रोत क्या रहे हैं?
मैं लेखक के रूप में कार्य करता रहा हूं और मेरा मानना है कि लेखक को पुरस्कार की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए। हमारा काम बस बेहतर लिखना होता है, पुरस्कार तो लेखन और प्रकाशन के बाद की महज एक प्रक्रिया है। यह कहना भी आपका गलत नहीं है कि पुरस्कार से प्रेरणा मिलती है। मेरे पिता श्री सांवर दइया को साहित्य अकादेमी सम्मान 1985 में मिला था। संभव है कि कहीं अवचेतन में ऐसे बीज रहे भी हो किंतु मैंने अपने पिता से सतत लेखन की प्रेरणा ग्रहण की है।  
ऐसा माना जाता है कि रचनाधर्मिता पर परिवेश का प्रभाव पड़ता है, परिवेश को अगर व्यापक संदर्भों में देखें तो पारिवारिक परिवेश भी सम्मिलित होता है। इस विषय पर क्या कहना चाहते हैं?
परिवेश का व्यापक प्रभाव पड़ता है। मेरा आरंभिक लेखन पिता के पद्चिह्नों पर चलते हुए हुआ। विधाता को उनका अधिक साथ मंजूर नहीं था इसलिए वे 1992 में इस संसार से विदा हो गए। उनके रहते मेरी केवल एक किताब 1989 में श्री सूर्यप्रकाश बिस्सा ने प्रकाशित की थी। उनके नहीं रहने पर मैंने निश्चय किया कि पहले उनका साहित्य प्रकाश में आएगा। जब उनका अधिकांश लेखन लगभग पांच वर्षों में प्रकाशित हो गया तब मैंने अपना पहला कविता संग्रह ‘साख’ 1997 में प्रकाशित किया। पिता की स्मृति में नेगचार पत्रिका के तीन अंक भी प्रकाशित किए और प्रकाशन से जुड़ना उस समय की मांग थी।
तो क्या आप स्वीकार करते हैं कि स्मृतिशेष सांवर दइया साहब के रचना-संसार से आपकी लेखनी प्रभावित हुई है?
एकदम। मैंने सदा उन्हें एक आदर्श लेखक के रूप में पाया है। मुझे याद आता है बचपन का वह दिन जब प्रार्थना-सभा में मेरे पिता के बारे में घोषणा हो रही थी। यह वह दिन था जब उनको कहानी संग्रह ‘धरती कद तांई धूमैली’ पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का पुरस्कार घोषित हुआ था। मैं उनको वर्षों पढ़ते-लिखते देखते रहा था, ऐसे में पता ही नहीं चला कि कब मैंने कलम थाम ली और पहली कविता लिखी। बाद में मुझे उनका मार्गदर्शन मिला और मैं लघुकथाकार के रूप में पहचाना जाने लगा। तब कुछ लोगों का यह भी कहना था कि मेरे पिता लघुकथाएं मेरे नाम से लिख रहे हैं, यह मेरे लिए बहुत बड़ा पुरस्कार था। मैं नया लेखक होकर भी इतना सधा हुआ समझा जाने लगा था।   
स्मृतिशेष दइया साहब के अतिरिक्त उनके समकालीन साहित्यकारों का कितना प्रभाव रहा है?
उनके मित्रों से भी मैं प्रभावित रहा। बचपन में हरदर्शन सहगल, महेशचंद्र जोशी, बुलाकीदास ‘बाबरा’ और कन्हैयालाल भाटी जैसे वरिष्ठ लेखकों का स्नेह मिला तो बाद में भंवरलाल ‘भ्रमर’, माणक तिवाड़ी ‘बंधु’ और बुलाकी शर्मा आदि अनेक रचनाकारों से मेरा विमर्श होने लगा था। अकादमी द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘उकरास’ के संपादन के दौरान मुझे उनके साथ काम करने और खास कर समग्र राजस्थानी कहानी का काम देखने का सुअवसर मिला। संभवतः वर्ष 1985 में उनको और हिंदी कहानीकार निर्मल वर्मा को एक साथ साहित्य अकादेमी पुरस्कार ने मुझे प्रेरणा दी होगी कि मैंने निर्मल वर्मा के कथा साहित्य को शोध के लिए चुना। शिक्षा ग्रहण करते समय मेरे अनेक गुरुजन कवि थे। मोहम्मद सद्दीक, अजीज आजाद, जगदीश प्रसाद ‘उज्जवल’, भवनीशंकर व्यास ‘विनोद’, पृथ्वीराज रतनू, सरल विशारद और प्रो. अजय जोशी आदि अनेक नाम है। डॉ, उमाकांत जी के मर्गदर्शन में शोध करते हुए मैं आलोचना के पथ पर व्यवस्थित रूप से बढ़ा। मेरा मानना है कि हमें हमारे वरिष्ठ लेखकों से बहुत कुछ सीखना चाहिए।
मूलतः आप राजस्थानी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठित आलोचक हैं, वर्तमान में समग्रतः राजस्थानी साहित्य के बारे में आप क्या कहना चाहते हैं?
मैं आलोचक हूं यह आपका मानना है। कुछ ऐसा भी कहते हैं कि मैं आलोचक ही नहीं हूं। कुछ मुझे कवि, अनुवादक, बाल साहित्यकार और संपादक के रूप में श्रेष्ठ मानते हैं। सबकी अलग अलग धारणा है। मैं जो भी हूं किंतु मैं वर्तमान राजस्थानी साहित्य को लेकर बहुत आशावादी हूं। एक समय था जब राजस्थानी में लोककथाओं का जमाबड़ा था, किंतु अब कहानी और आधुनिक कहानी के बाद उत्तर आधुनिक कहानियां हम देख सकते हैं। पहले अनेक विधाओं में बहुत कम सृजन होता था किंतु विगत वर्षों में देखें तो पता चलेगा कि विपुल सृजन हुआ है। राजस्थानी में नए रचनाकारों का पूरे विश्वास के साथ लिखना उत्साहजनक है। अनेक पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगी है। अब राजस्थानी साहित्य के विकास के प्रति समाज भी जागरूक हो रहा है।
समूचे प्रदेश में राजस्थानी की मान्यता का प्रश्न युगीन संदर्भ में नितांत आवश्यक अनुभूत किया जा रहा है, आपकी दृष्टि में कौन-कौन सी बाधाएं इस मध्य उत्पन्न हो रही है।
राजस्थानी की मान्यता एक ऐसा प्रश्न है जिसका जबाब पूरे प्रांत द्वारा दिया जा चुका है। राज्य सरकार के प्रस्ताव पर केवल केंद्र सरकार की मंजूरी लंबित है। आशा की जाती है कि हमारी जनभावनाओं को देखते हुए माननीय प्रधानमंत्री जी शीतकालीन सत्र में राजस्थानी मान्यता की घोषणा करेंगे। भाषा वैज्ञानिक आधारों पर राजस्थानी एक स्वतंत्र भाषा सिद्ध हो चुकी है। हमारी सारी बाधाएं दूर हो चुकी है अब हमें केवल सरकारी घोषणा का इंतजार है। यह मानता हूं कि सरकारी उदासीनता के चलते राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्य लंबे समय से बंद पड़े हैं। ऐसे में हमें एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। राजस्थान की जनता को अपनी भाषा के लिए मरणा मांडना होगा।    
छतीसगढ़ राज्य की विधान सभा मे छतीसगढ़ी भाषा को प्रस्ताव द्वारा मान्यता प्रदत्त कर दी, आज संपूर्ण राज्य में कामकाज की भाषा के रूप में प्रयुक्त हो रही है। राजस्थानी के लिए ऐसा क्यों नहीं हुआ है?
राजस्थानी के प्रति नेताओं में इच्छा शक्ति का अभाव है। वे जिस भाषा में वोट मांगते हैं जीतने के बाद उसे भूल जाते हैं। भाषा और साहित्य की तुलना में उन्हें अपनी सीट अधिक प्यारी है। भाषा का संबंध आत्मा से है और अगर हमें हमारी संस्कृति को बचाना है तो हमें छत्तीसगढ़ से प्रेरणा लेनी चाहिए। पूरा राजस्थानी समाज इन दिनों सोया हुआ है और ऐसे में मुझे मनुज देपावत का स्मरण होता है। जिन्होंने वर्षों पहले लिखा था- धोरावाळा देस जाग रे, ऊंठावाळा देस जाग, छाती पर पैणां पड्या नाग  रे..। जिस दिन सभी राजस्थानी जाग जाएंगे, उसी दिन हमें हक मिल जाएगा।
कहते हैं कि सफल व्यक्ति के पीछे पत्नी का सहयोग होता है आप क्या मानते हैं?
घर ही वह स्थल है जहां मैं शांतिपूर्वक लेखन कर सकता हूं। जाहिर है ऐसे में पत्नी और बच्चों का बड़ा त्याग रहा है कि वे लेखन के लिए अवकाश उपलब्ध कराते हैं। 
युवा रचनाकारों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
फिलहाल तो मैं खुद ही पचास की उम्र का युवा रचनाकार हूं। पुरानी पीढ़ी के रचनाकार जो मेरे पिता के समकालीन रहे हैं उनके सामने मुझे युवा बने रहने में ही गर्व महसूस होता है। मैं दावा तो नहीं करता किंतु प्रयास करता हूं कि अधिक से अधिक नए और पुराने साहित्य के बारे में जानकारी कर सकूं। लिखने के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है और आलोचना विधा में पढ़ना पहली शर्त है। हम युवाओं को भाषा और साहित्य के प्रति गंभीरतापूर्वक ठोस कार्य करने हैं। युवाओं को भाषा और साहित्य के प्रति जिम्मेदारी और जबाबदेही समझनी चाहिए।

डॉ. नीरज दइया का परिचय

प्रकाशन सूची
मौलिक पुस्तकें-
• भोर सूं आथण तांई (लघुकथा संग्रह) 1989 मुन्ना प्रकाशन, बीकानेर
• साख (कविता संग्रह) 1997 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• देसूंटो (लांबी कविता) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• आलोचना रै आंगणै (आलोचनात्मक निबंध) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• जादू रो पेन (बाल साहित्य) 2012 शशि प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
• उचटी हुई नींद (हिंदी कविता संग्रह) 2013 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• बिना हासलपाई (आधुनिक कहाणी आलोचना) 2014 सर्जना, बीकानेर
• पाछो कुण आसी (कविता संग्रह) 2015 सर्जना, बीकानेर
• मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• पंच काका के जेबी-बच्चे (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
अनूदित पुस्तकें-
• कागद अर कैनवास (अमृता प्रीतम की पंजाबी काव्य-कृति का अनुवाद) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• कागला अर काळो पाणी (निर्मल वर्मा के हिंदी कहाणी संग्रह का अनुवाद) 2002 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• ग-गीत (मोहन आलोक के कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद) 2004 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।
• सबद नाद (भारतीय भाषाओं की कविताएं) 2012 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवां री घाटी (भोलाभाई पटेल के गुजराती यात्रा-वृत) 2013 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।
• ऊंडै अंधारै कठैई (डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की चयनित कविताएं) 2016 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• अजेस ई रातो है अगूण (सुधीर सक्सेना री की चयनित कविताओं का राजस्थानी अनुवाद) 2016 लोकमित्र, दिल्ली
संपादित पुस्तकें-
• मंडाण (युवा कविता) संपादक : नीरज दइया 2012 राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
• मोहन आलोक री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2010 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2017 राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर
• आधुनिक लघुकथाएं (संपादन) प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग, बीकानेर- 334003
• नेशनल बिब्लियोग्राफी ऑफ इंडियन लिटरेचर (राजस्थानी : 1981-2000) साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली

प्राप्त पुरस्कार एवं सम्मान   
• साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार 2014
• राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर से “बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार”
• नगर विकास निगम से “पीथळ पुरस्कार” ।
• नगर निगम बीकानेर से वर्ष 2014 में सम्मान
• अखिल भारतीय पीपा क्षत्रिय महासभा युवा प्रकोष्ठ बीकानेर द्वारा सम्मान- 2014
• सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से तैस्सितोरी अवार्ड- 2015
• रोटरी क्लब, बीकानेर द्वारा “खींव राज मुन्नीलाल सोनी” पुरस्कार-2016
• कालू बीकानेर द्वारा नानूराम संस्कर्ता राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• कांकरोली उदयपुर द्वारा मनोहर मेवाड़ राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• फ्रेंड्स एकता संस्थान बीकानेर द्वारा साहित्य सम्मान-2016
• दैनिक भास्कर बीकानेर द्वारा शिक्षक सम्मान- 2016
• सृजन साहित्य संस्थान, श्रीगंगानगर द्वारा सुरजाराम जालीवाला सृजन पुरस्कार-2017
• राजस्थानी रत्नाकर, दिल्ली द्वारा श्री दीपचंद जैन साहित्य पुरस्कार’- 2017
• ओम पुरोहित ‘कागद’ फाउण्डेशन हनुमानगढ़ द्वारा कागद सम्मान- 2017
• साहित्य कला एवं संस्कृति संस्थान नाथद्वारा द्वारा हल्दीघाटी में साहित्य रत्न सम्मान- 2017
• जिला लोक शिक्षा समिति, बीकानेर द्वारा साक्षरता दिवस पर सम्मान- 2017
• मावली प्रसाद श्रीवास्तव सम्मान 2017 अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन द्वारा
• अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा सीताराम रूंगटा सीताराम रूंगटा राजस्थानी साहित्य पुरस्कार- 2017
• केंद्रीय विद्यालय संगठन, जयपुर संभाग द्वारा क्षेत्रीय प्रोत्साहन पुरस्कार, 2017
• गौरीशंकर कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा पुरस्कार- 2017
•  कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा डॉ. नारायणसिंह भाटी अनुवाद सम्मान

अन्य   
राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का संपादन। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की उच्च माध्यमिक कक्षा की पाठ्यपुस्तक का संपादन।
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर की राजस्थानी पाठ्यक्रम विषय-समिति के पूर्व-संयोजक।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर की कार्यकारणी और सामान्य सभा के सदस्य।
“कविता कोश” राजस्थानी विभाग सहायक-संपादक।
समन्वयक : राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति विभाग, हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए अंतरजाल पर सक्रिय रचनाकार, अनेक ब्लॉगों के लेखक।
राजस्थान भाषा मान्यता के प्रवल समर्थक।

01 जनवरी, 2018

डॉ. नीरज दइया से डॉ. लालित्य ललित की बातचीत

1
पहले तो आप बधाई स्वीकारें कि यह जाता हुआ वर्ष और आता हुआ वर्ष यानि 2017 और 2018 आपके लिए सृजनात्मक रहा और पुरस्कारों के लिए भी, आप राजस्थान के साथ कोलकाता और देश की राजधानी में भी सम्मानित होंगे यह समाचार सभी को खुशियां दे रहा है। कैसा लग रहा है?
अच्छा लग रहा है। मेरी लेखक के रूप में जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ी है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जिसमें समाज और साहित्य में अंतराल बढ़ रहा है, इन पुरस्कारों और साहित्यिक आयोजनों का बड़ा महत्त्व है। इनसे समाज का साहित्य के प्रति ध्यानाकर्षक होता है। मैं पुरस्कारों को एक समाजिक स्वीकृति के रूप में देखता हूं। कोलकता के अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन अथवा दिल्ली के साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कारों की चर्चा से मेरे आसपास के सामाजिक जीवन में हलचल है। उन्हें लगता है कि लेखन के क्षेत्र में मैंने कोई बड़ा काम किया है जिसके रहते अनेक पुरस्कारों के लिए चयनित हो रहा हूं। यह अच्छा होगा कि नए पाठक मेरी रचनाओं तक पहुंचेंगे। 
2
कभी सोचा था कि आप आलोचना से सृजनात्मक लेखन में आएंगे?
आलोचना अपने आप में सृजनात्मक होती है, और होनी चाहिए। किसी सृजन के बाद आलोचना का जन्म होता है और सृजन ही वह प्रेरणा है जिससे आलोचना का उद्भव संभव है। जैसे अनुवाद में अनुवाद का मौलिक हो जाना उसका परम लक्ष्य है, वैसे ही आलोचना में आलोचना का रचना हो जाना एक उपलब्धि है। मैं रचना को किसी बंधी-बंधाई शास्त्रीय आलोचना के पक्ष में नहीं हूं। प्रत्येक रचना अपने आप में सृजन के क्षेत्र में अभिनव प्रयास है और उसका मूल्यांकन करते समय आलोचना को हर बार अभिनव होना होता है। परंपरा और आधुनिकता की विकास-यात्रा में किसी रचना का निर्धारण अथवा स्थापना बिना सृजनात्मकता के संभव ही नहीं है। आलोचना में काम करते हुए भी मैं सृजनात्मक लेखक में ही हूं। मेरी सृजनात्मकता ही मुझे बेहतर आलोचनात्मक दृष्टिकोण देती है।
3
क्या कारण है कि राजस्थानी लेखन और बीकानेर अब पर्याय होने लगा है?
राजस्थान के अन्य जिलों की तुलना में बीकानेर जिले और बीकानेर संभाग में लेखन प्रचुर मात्रा में हुआ है और हो रहा है। यहां राजस्थानी भाषा की मान्यता की मांग लंबे समय से प्रमुखता से उठाई जाती रही है। बीकानेर में राजस्थानी, हिंदी, उर्दू और सिंधी के साथ अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने-लिखने वाले तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या में हैं। यहां साहित्यिक आयोजनों की बाहर रहती है। साहित्य के प्रति लोगों का रुझान इन वर्षों में बढ़ा है। ऐसे में बीकानेर राजस्थानी लेखक का पर्याय है तो अन्य जिलों को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। 
4.
राजस्थानी के साहित्य अकादेमी पुरस्कार में पहले मधु आचार्य, बुलाकी शर्मा और अब आप? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि बीकानेर को लगातार पुरस्कार मिले हैं। यह सोची-समझी रणनीति तो नहीं, या इसे करनी माता का आशीर्वाद समझ लिया जाएं ?
राजस्थानी संस्कृति में आस्था और आशीर्वाद का बड़ा तो महत्त्व है। आप इसे मेरे माता-पिता और परमपिता का आशीर्वाद कह सकते हैं। वर्ष 1985 में यह पुरस्कार मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह ‘एक दुनिया म्हारी’ के लिए मिला और 32 वर्षों के बाद मुझे कहानी-आलोचना पर मिल रहा है। लगातार तीन वर्षों की बात भी सही है। पर इसमें कोई रणनीति नहीं, यह महज एक संयोग है। यदि रणनीति से पुरस्कार मिलते हों तो हमें मिलकर नोबल पुरस्कार के लिए रणनीति बनानी चाहिए। वैसे आप जानते ही है कि साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के पुरस्कारों की अपनी लंबी और गोपनीय प्रक्रिया है। वह लेखकों से पुस्तकें आमंत्रित नहीं करती। अकादेमी अपने स्तर पर ग्राउंड लिस्ट बनवा कर अपने पैनलों से उसे रिफाइंड करवाती है। साहित्य अकादेमी के भाषा सलाहकारों अथवा संयोजक को भी पता नहीं रहता कि निर्णायक कौन है। संयोजक के सामने अंतिम बैठक के दिन ही यह भेद खुलता है। इस प्रक्रिया में कोई रणनिति काम कर सकती। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे हमेशा के लिए इस प्रक्रिया से बाहर करने का नियम है। हां इस बार यह आश्चर्य का विषय है कि लगातार तीसरी बार मुख्य पुरस्कार बीकानेर के रचनाकार को मिल रहा है। राजस्थानी कहानी आलोचना की पुस्तक “बिना हासलपाई” (2014) को साहित्य अकादेमी पुरस्कार का अभिप्राय बस इतना है कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच प्रकाशित पुस्तकों में यह पुस्तक निर्णायकों की नजर में बेहतर सिद्ध हुई है।   
5.
आप व्यंग में भी उतने सहज है जितने आलोचना में ऐसे कैसे हुआ?
व्यंग्य और आलोचना मैं स्वयं को समान भावभूमि पर खड़ा पाता हूं। दोनों के उद्देश्यों में भी कुछ मायनों में समानता है। बिना सहजता के व्यंग्य और आलोचना विधा में काम नहीं किया जा सकता। पाठकों और संबंधितों को भी इन्हें सहजता से लेना चाहिए क्यों कि इन दोनों के पीछे सुंदर और आदर्श समाज का भाव निहित होता है।     
6.
आप लगातार लिख रहे हैं, घर की सभी जिम्मेवारियों को भी निभा रहे हैं, फिर भी कहीं लगता है कि कहीं कुछ छूट रहा हैं?
असल में हमारा जीवन ही ऐसा है कि जिसमें निरंतर बहुत कुछ पीछे छूटता चला जाता है। इस पीछे छूटते जीवन को कुछ अंश तक साहित्य द्वारा बचाने का प्रयास रचनाकार करते हैं। वर्तमान दौर में हिंदी अथवा राजस्थानी लेखन से कोई अपना घर-परिवार नहीं चला सकता। ऐसे में आपको नौकरी भी करनी होती है। मैं नौकरी करते समय एक राजकीय कर्मचारी और घर में अपने संबंधों के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने के बाद ही अपने भीतर के लेखक को जगाता हूं कि आ जा भैया अब तेरा समय है। हां इतना जरूर है कि घर में पत्नी और बेटे-बेटियां इस बात कि चिंता रखते हैं कि जब मैं लिखता हूं अथवा पढ़ता हूं तब वे मुझे बहुत अवकाश देते हैं। उनके और मित्रों के इसी सहयोग के चलते मैं अपना काम ठीक से करने का प्रयास करता हूं।    
7.
आप एक शिक्षक है और केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ा रहे है और अपने विद्यार्थियों में खासे लोकप्रिय भी, जब उनको पता लगा कि आप को साहित्य अकादेमी के सम्मान से सम्मानित किया जाएगा तो पहली प्रतिक्रिया कैसी थीं, उनकी?
बच्चों को बड़ी खुशी होती है और जाहिर हैं वे पहली प्रतिक्रिया के रूप में पार्टी मांगते हैं। एक बार की बात है मैं किसी प्रशिक्षण में था और वहां भोजनावकाश के बाद एक सवाल किया गया कि आपके बच्चे कितने हैं। बहुत से संभागी अपने अपने विषय में बता रहे थे और जब मेरी बारी आई तो मैंने जबाब दिया दो हजार। सारे चौंके और सवाल करने वाले ने ताली बजाकर सही उत्तर की घोषणा की। मैं मनाता हूं कि एक शिक्षक के रूप में विद्यालय में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी मेरे अपने बच्चे हैं। इस भावना के बिना हम बच्चों के साथ न्याय नहीं कर सकते। इसलिए उनका हक है कि वे पार्टी मांगे, उन्हें पार्टी मिलेगी। हमारे प्राचार्य सरजीत जी ने भी पुरस्कार के बाद बच्चों की पार्टी को पुरस्कार का टीडीएस की संज्ञा दी है। बच्चों को यह टेक्स देते हुए खुशी होती है।
8.
कितना समय लेखन को, कितना पर्यटन को और कितना घर को देते हैं ?
मेरी एक राजस्थानी कविता है। जिसकी कुछ पंक्तियां हिंदी अनुवाद में यहां साझा करना चाहता हूं। कविता का शीर्षक है- ‘रक्त में मिली हुई भाषा’ आरंभिक पंक्तियां कुछ इस तरह है- “राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है / यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे / तो कोई बात नहीं है... / कविता से ज्यादा अधिक जरूरी है भाषा को संभालना / भाषा की हेमाणी लिए खड़ा हूं मैं...” मैंने लेखन के संस्कार अपने लेखक पिता से पाए हैं और मैं अपने भीतर के लेखक को मेरे आस-पास की परिस्थियों के अनुरूप कभी भी सक्रिय कर सकता हूं। मैं जितना भी समय संभव होता है लेखक को देता हूं और देना चाहता हूं, पर्यटन कम संभव होता है पर मैं घर में ही रहना अधिक पसंद करता हूं। किसी आयोजन के लिए बाहर निकलना भी मुझे जरा मुश्किल लगता है। ऐसे में आयोजक मित्रों की यह शिकायत भी रहती है। 
9.
दिनचर्या क्या रहती हैं, मसलन लेखन की और घर के संदर्भ में ?
सुबद जल्दी उठकर कंप्यूटर पर लिखने-पढ़ने की आदत है। विद्यालय जाने से पहले कुछ जरूरी काम करने के बाद अपने लेखक को भूल जाता हूं। मैं हिंदी पीजीटी के रूप में विद्यालय के कार्यों में व्यस्त रहता हूं। पुस्तकालय में जब कभी लेखक जागता है तो उसे मना लेता हूं कि भैया घर पर लौटकर बात करेंगे। घर लौटकर मैं घर-परिवार के छोटे-मोटे काम के बाद मेरी प्राथमिकता लिखना-पढ़ना है। मैंने छोटा-मोटा एक पुस्तकालय घर में ही बना रखा है। किताबों में खो जाने बाद मैं बाहर भी दुनिया को भूल जाता हूं। हां कोई पारिवारिक काम हो तो उसे मैं मेरी प्राथमिकता उसे मानता हूं।  
10.
पहली रचना कौन सी थीं, व्यंग को अपने दिल के करीब मानते हैं या आलोचना से उतना ही सरोकार हैं ?
आज ठीक से पहले रचना की जानकारी नहीं है पर मैंने संभवतः उच्च प्राथमिक स्तर पर लिखना आरंभ किया था। मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह पर राज्य की साहित्य अकादमी के पुरस्कार की घोषणा मैंने दसवीं कक्षा में मंच से होती सुनी तो मुझे गर्वानुभूति हुई और किताब के रूप में मेरा पहला लघुकथा संग्रह 1989 में अकादमी अनुदान से प्रकाशित हुआ था। मेरी साहित्यिक यात्रा में मेरे पिता का योगदान इसलिए भी है कि जब 1992 में उनका असामयिक निधन हो गया तब पहले मैंने उनके साहित्यिक कार्यों को प्रकाश में लाने को प्राथमिकता पर रखा और लगभग पांच वर्षों में उनका अप्रकाशित साहित्य पारिवारिक संसाधनों से प्रकाशित करवाया। उसके बाद मैंने अपना पहला कविता संग्रह ‘साख’ 1997 में प्रकाशित किया। व्यंग्य की तुलना में मैं खुद को आलोचना के करीब मानता हूं। मैंने आलोचना के क्षेत्र में कुछ नवीन प्रयोग करने का प्रयास किया और मुझे खुशी है कि मेरे प्रयास को ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन’ के अवसर पर बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव साहित्य पीठ, रायपुर द्वारा प्रदत्त पुरस्कार ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ पर अर्पित किया गया। चयन समिति ने संस्तुति में कहा- श्री दइया की इस कृति में संग्रहित निबंध किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने और परखने की कथित रूप से जरूरी अकादमिक और क्लासिक परंपरावाली क्लिष्टता और संशलिष्टता के बरक्स आत्मीय और सहज रागात्मक भाषा में मूल्यांकन के नये और कारगर टूल्स को चिह्नांकित करते हैं ।
11.
जिंदगी का लक्ष्य क्या है?
मातृभाषा राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में देखना मेरा एक सपना है, यह पूरा हो जाए। मैं लेखन में अपनी सक्रियाता बनाए रख सकूं और मेरे विद्यार्थी देश के सुयोग्य नागरिक बने। 
12.
पुरस्कारों की राजनीति भी होती हैं, क्या ? इस पर कुछ कहेंगे ?
हां, कुछ पुरस्कारों में राजनीति हुई है। राजनीति की बात करें तो इसमें जनमत बदलता है, वैसे ही ऐसे पुरस्कारों और लेखकों की साख भी बदलती रहती है। महानता से पुरस्कार मिल सकते हैं, पर पुरस्कारों से महानता हासिल नहीं की जा सकती है। इस दौर में मूल्यों और आदर्शों का पतन हुआ है किंतु यह लंबे समय तक यह चलने वाला नहीं है। मेरा अपने कार्य के प्रति विश्वास बना रहता है, अगर असहमतियों के बीच भी मुझे लगता है कि मैं सही हूं तो मुझे रुकना नहीं है, निरंतर आगे बढ़ना है। 
13.
साहित्य अकादेमी का वाल साहित्य पुरस्कार आपको 1994 में मिला और मुख्य पुरस्कार 2017 मिल रहा है, अनुवाद पुरस्कार कब मिलेगा?
पुरस्कार मिलना या नहीं मिलना किसी लेखन के हाथ में नहीं है। पुरस्कारों की अपनी अपनी प्रक्रिया होती है। मैंने राजस्थानी बाल साहित्य, कविता, आलोचना आदि विधाओं के साथ अनुवाद के क्षेत्र में भी काफी कार्य किया है। मैं अनुवाद के क्षेत्र में राजस्थानी और हिंदी के लिए कार्य कर सका यह बात किसी भी पुरस्कार से बड़ी है। मैंने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, मोहन आलोक, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्दकिशोर आचार्य और सुधीर सक्सेना जैसे रचनाकारों की पुस्तकों का अनुवाद किया है। ‘सबद-नाद’ पुस्तक में मैंने भारतीय भाषाओं की कविता को आधुनिक राजस्थानी कविता के संदर्भ में समझने-समझाने का एक प्रयास किया है। अनेक रचनाओं का हिंदी अनुवाद और पाठकों की सराहना ही मेरा पुरस्कार है। रही बात साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार की तो वह प्रक्रिया है कि मिलने पर ही पता चलेगा कि मिल गया है। 
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