18 फ़रवरी, 2018

रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी / नीरज दइया

मायड़ भाषा से अनजान रहकर अंग्रेजी में गिटपिट करके खुद को बड़ा आदमी होने का दिखावा करने वाले चाहे कितनी भी उन्नति कर लें, वे सदैव हीन ही रहते हैं। भाषायी ज्ञान अच्छी बात है, लेकिन मातृभाषा की कीमत पर कतई नहीं।
भारत की संस्कृति में राजस्थानी का अपना अनूठा रंग है और इसके बिना सभी रंग फीके हैं। राजस्थानी भाषा का सांस्कृतिक रंग इतना अनूठा है कि किसी के आने और जाने दोनों क्रियाओं के लिए एक ही शब्द 'पधारो सा' को बोलने का अंदाज निराला है। 
दीया बुझता नहीं ‘बड़ा’ होता है
हमारे यहाँ दूकान को बंद नहीं मंगळ किया जाता है और दीपक को बुझाने के स्थान पर 'बड़ा करना' शब्द इसकी विशिष्टता दर्शाता  है। यहाँ मरण को भी मंगल माना गया है। किसी के निधन के लिए "सौ बरस" कहना अपने आप में हमारे यहां निराला है। लोक की यह धरोहर बची और बनी रहे। बिना राजस्थानी की आत्मा को समझे अनजाने में कुछ लोग भूल करते हैं। जैसे बढ़ना और बढ़ाना क्रिया-पद यहां हिंदी-अर्थ से इतर अर्थ के हैं। राजस्थानी में ये काटना क्रिया से संबधित है, जबकी इनके हिंदी-भाव को 'बधावां' शब्द प्रयुक्त होता है।
इसी भांति राजस्थानी भाषा की सामासिकता भी बेजोड़ है। उदाहरण के लिए 'बासी मूंढै' में जो अर्थ बिना कुछ खाए सुबह सुबह उठने के बाद की स्थति और मनोभावों की व्यंजना है वह हिंदी अथवा अन्य भाषा सहज सुलभ नहीं है। एक एक शब्द के अनेक पर्यायवाची और विभिन्न भावों   अर्थों के लिए विशाल शब्द भंडार भी राजस्थानी भाषा की एक अद्वितीय विशेषता है। 
कोस-कोस पर बदले वाणी
राजस्थानी भाषा की आंचलिकता उसकी बोलियों में समाहित है। 
कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी बदलने की बात राजस्थान के लिए हमेशा से कही जाती है, किंतु किंतु संप्रेषण की कहीं कोई समस्या यहाँ नहीं है। कुछ शब्दों और वर्तनी को लेकर जो भिन्नताएं हैं वे मान्यता मिलने और स्कूली शिक्षा में पूर्ण राजस्थानी के लागू होने पर स्वतः हल हो जाएंगी। 
युवा वर्ग का राजस्थानी से कटाव
राजस्थानी को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं प्रदान किए जाने की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि युवा पीढ़ी की भाषाई जड़े ही कटती जा रही है। बढ़ती शिक्षा और बदलती संस्कृति से हमारी नई पीढ़ी एक ऐसे दौर में पहुंचा दी गई है जहां अब उनकी स्मृति में तो मातृभाषा है किंतु  वे लोक-व्यवहार में अंग्रेजी और हिंदी के अभ्यस्त होने लगे हैं। किसी भी भाषा में कोई खराबी या कमजोरी नहीं है किंतु बात हमारी मातृभाषा राजस्थानी की विशाल धरोहर को बचाने की है।
यूनेस्को द्वारा इसी उद्देश्य से  21 फरवरी को ‘अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाना आरंभ किया गया, जो विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण करना प्राथमिकता मानता है। आवश्यकता बहुभाषिता को बढ़ावा देने की है। एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया में लगभग 2500 भाषाएं ऐसी हैं, जो खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि लगभग 25% भाषाएं तो विश्व में ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक हजार से भी कम है। 
संपूर्ण और समृद्ध भाषा
सवाल यह है कि क्या राजस्थानी भाषा को लुप्त होने दिया जाए या इसे बचाया जाना जरूरी है। भाषा विज्ञान में बोलियों और भाषाओं के क्रमिक विकास पर व्यापक विवेचन मिलता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि कोई बोली भाषा कब, कैसे और क्यों बनती है। इसके साथ ही वैज्ञानिक और तार्किक आधार भी विद्वानों ने नियत किए हैं। उन सभी आधारों पर खरी उतरने वाली राजस्थानी भाषा के विषय में अब भी भाषा-बोली को लेकर भ्रामक स्थिति फैलाई जा रही है। 
रिमिक्स के दौर में गुम होते शब्द
प्रत्येक भाषा में व्याकरण और भाषिक संदर्भ होते हैं जिनके अभाव में अनेक दोष लोक में धीरे धीरे व्याप्त होने लगते हैं। बदलते समय और समाज में राजस्थानी लोक-साहित्य और भाषा की समझ नहीं होने के अनेक प्रमाण हम देखते हैं। 
उदाहरण के लिए राजस्थानी में ‘ळ’ एक विशिष्ट ध्वनि है किंतु प्रत्येक ‘ल’ के लिए ‘ळ’ प्रयुक्त नहीं होता है। बल (ताकत) और बळ (जलना) इसके सहज उदाहरण हैं। अनेक लोकगीत ऐसे हैं जिनका स्वरूप बदलता जा रहा है। रिमिक्स और फ्यूजन के दौर में लोकधुनों की मीठास और परंपरागत कौशल धीरे-धीरे बिसरता जा रहा है। क्या अब भी हम ‘कान्या मान्या कुर्र, चलां जोधपुर...’ अथवा ‘आओ नीं पधारो म्हारे देस... ’ जैसे कर्णप्रिय गीत सुनकर भीतर तक रसविभोर नहीं होते हैं? 
जीवन से मरण तक के लोकगीत वाले हमारे समाज में अनेकानेक भावों से हम मुदित और हर्षित होते हुए हमारी इस थाती पर इतराते हैं किंतु संकट मंडराता साफ देखा जा सकता है। असंख्य पांडुलिपियां और ग्रंथ संग्रहालयों की विरासत क्या भविष्य में नष्ट हो जाएगी? ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिनके लिए राजस्थानी भाषा से युवा पीढ़ी और घर-परिवार से जोड़े रखना जरूरी है।  
मातृभाषा का ऋण उतारना होगा
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में मातृभाषा के पक्ष में स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी राजस्थान के विद्यार्थियों को उनके मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना सर्वथा अनुचित और अनैतिक है। भाषा ही ऐसी जड़ें हैं जिससे हमारे भीतर संस्कार पोषित होते हैं और बालक-बालिकाओं को ऐसी त्रासद स्थिति में देखते हुए भी पूरा राजस्थानी समाज कब तक चुप्पी साधे रखेगा। हमारी भाषा को हमारे घर, परिवार और समाज ने हमें सौंपा है तो इस अपेक्षा के साथ कि इसे हम बचाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को सौंप कर मातृभाषा के ऋण से मुक्त होंगे। यह संयोग है कि मेरे रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी है, जो मुझे मेरी मां ने अपने स्तनपान के दिनों मुझे विरासत के रूप में दी थी। राजस्थानी मेरी आत्मा की भाषा है और हिंदी मेरे पेट का पोषण करती है। 

हिंदी को ॠणमुक्त करना है
अगर राजस्थान से एक आवाज राजस्थानी के लिए उठती है तो दुगने जोश और उत्साह के साथ राजस्थानी समाज हिंदी का भी समर्थन करता रहा है। क्या मेरा मकान यदि पक्का बनता है तो किसी पड़ौसी अथवा मकान जहां स्थित है वह मकान अथवा स्थान कमजोर होने का कोई अंदेशा है? यदि नहीं तो फिर राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता से हिंदी भला कमजोर कैसे होगी? अगर इतिहास के पन्नों में जाएंगे तो मिलेगा कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देकर हिंदी को ऋण-मुक्त करना है।
म्हारी जबान रो ताळो खोलो 
राजस्थानी मान्यता के इस संघर्ष में अनेक पीढ़ियों के अपना अपना योगदान दिया है। अब भी संघर्ष जारी है किंतु इसका रूप परिवर्तित होते नजर आने लगा है। युवा पीढ़ी के क्षोभ में यदि समय रहते यह मांग अब भी पूरित नहीं होती तो गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाले राजस्थान की हवाओं में आंधी आने की संभवाना बनने लगी है। आज राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए घर-गली-कस्बों और गांव-गांव से एक ही आवाज आने लगी है- ‘म्हारी जबान रो ताळो खोलो। राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी भासा है।’ पर जब अपने ही लोग इसे बिसरा रहे हो तो मान्यता मिलने के बाद भी क्या राजस्थानी खुश हो पाएगी?
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मायड़ भाषा को युवा पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता
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प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी नहीं होने से प्रदेश के बच्चों की जड़े काटती जा रही हैं, इसके अभाव में विकास की सारी संभवानाएं कुंठित होती जाती है। उन पर बहुत छोटी उम्र में ही हिंदी और अंग्रेजी का बोझ डाल कर उनके भाषाई संस्कार छिने जा रहे हैं। 
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देश और प्रांत के गठन के समय भाषा का संदर्भ महत्त्वपूर्ण माना गया है। पंजाब के लिए पंजाबी, गुजरात के लिए गुजराती और महाराष्ट्र के लिए मराठी फिर राजस्थान के लिए राजस्थानी क्यों नहीं?
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मातृभाषा से हर आदमी की एक खास पहचान बनती है, हमारी खास पहचान खान-पान से लेकर पहनावे तक में धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है।
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आज अंग्रेजी की पौ बारह पच्चीस है। लगने लगा है कि अंग्रेजी से जुड़ कर हम उच्च वर्ग में शामिल हो जाएंगे। हिंदी समेत सभी भारतीय मातृभाषाओं की स्थिति कमजोर होती जा रही है ऐसे में राजस्थानी दोहरी मार झेलने को विवश है।
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11 फ़रवरी, 2018

लड्डू / डॉ. नीरज दइया

खिर इंतजार करते-करते वह बस आ गई जिससे मुझे यात्रा करनी थी। इसे संयोग कहेंगे कि बस भरी हुई थी। बस में चढते ही मैं सीट का जुगाड़ करने की फिराक में था, पर हर सीट पर किसी न किसी का कब्जा था। काफी सवारियां बस में खड़ी थी। मैंने विचार किया पीछे कोई एक-आध सीट खाली मिल सकती है। रास्ते में खड़ी सवारियों में आगे-पीछे धक्कम-पेल करते बड़ी मुश्किल से पीछे तक पहुंचा। मेरा अंदाजा ठीक था, एक सीट खाली दिखाई दी। मैंने पहले आओ, पहले पाओ के हिसाब से सीट पर कब्जा करने का जरा सा प्रयास किया ही था कि पास की सीट पर काबिज नवयुवक ने सीट पर रखे रुमाल की तरफ संकेत करते हुए कहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” 
            मैंने झेंपते हुए कहा- “अच्छा जी” और पास खड़ा रह गया। सोचा- नाहक हैरान हुआ। आगे भी खड़े होने के लिए पर्याप्त जगह थी। मैंने देखा- उस सीट के लिए एक-दो अन्य यात्री भी आए, किंतु पास बैठा आदमी पक्का पहरेदार था किसी को पल भर भी बैठने नहीं दिया। वह कहता रहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” इसी बीच एक सुंदर नैन-नक्स वाली लड़की को देखा जो मुस्कान बिखेरते हुए उसी आदमी से पूछ रही थी- “यह सीट खाली है क्या?” लड़की की मुस्कान से वह आदमी जैसे खिल उठा, उसकी आंखों में चमक आ गई थी। मुस्कुराते हुए वह कह रहा था- “हां-हां, आइए....। खाली है।” यह सुनते ही वह लड़की पीछे पलट कर ऊंचे स्वर में बोली- “ताऊजी! यहां आ जाएं। सीट मिल गई है।” वह आदमी मुंह बाए आगे खड़ी सवारियों में उसके ताऊजी को पहचानने की कोशिश करने लगा।  
            मुझे लगा उस आदमी के सपने बिखर कर चकना चूर हो गए हैं और वह मुंह बाए ऐसे दिखाई दे रहा था जैसे उसके मुंह में कोई लड्डू आते-आते रह गया हो। उस लड़की के ताऊजी को देखते हुए उस आदमी का मुंह ना जाने क्यों खुला रह गया था और मुझ से निगाहें मिलते ही उसने सकपकाकर मुंह बंद कर लिया। मैं अब कहां चूकने वाल था, मैंने मन ही मन कहा- “ क्यों, मिल गया लड्डू?”
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03 फ़रवरी, 2018

डॉ. नीरज दइया की आलोचना-दृष्टि और सृष्टि

पुस्तक पर आलेख
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राजस्थानी और हिन्दी साहित्य में डॉ. नीरज दइया एक जाना-पहचाना नाम है। राजस्थानी कविता और आलोचना के क्षेत्र में तो उन्होंने विशेष कार्य किया ही है, अनुवाद, संपादन और व्यंग्य साहित्य में भी इनका योगदान उल्लेखनीय है। डॉ. दइया की अब तक दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले दिनों उनकी आलोचनात्मक कृति ‘बिना हासलपाई’ को साहित्य अकादेमी मुख्य पुरस्कार (राजस्थानी) 2017 दिये जाने की घोषणा हुई है। यहां हम उक्त पुरस्कृत पुस्तक पर आलेख प्रकाशित कर रहे हैं।
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भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
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आलोचना बौद्धिक प्रकृति का साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म है अतः आलोचक का नैतिक दायित्व बनता है कि वह किसी कृति की विषद व्याख्या और तात्विक मूल्यांकन करते हुए उसमें व्याप्त बोध की अभिव्यक्ति और उसके निहितार्थ को समाने लाए। उसका यह भी दायित्व है कि वह आज के जटिल समय में किसी कृति की समग्रता को इस प्रकार प्रस्तुत करे कि पाठक की समझ का विकास हो और वह बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिक बोझ के रचना का आस्वाद ले सके। काल के अनंत प्रवाह में कृति की अवस्थिति की पहचान ही आलोचना है।
सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है।
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पुस्तक का नाम- बिना हासलपाई (2014)
लेखक- डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक - सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर- 334003
पृष्ठ- 160
कीमत - रुपये 240/-
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 आभार : ‘दुनिया इन दिनों’ प्रधान संपादक- श्री सुधीर सक्सेना

बुलाकी शर्मा के सृजन सरोकार

इस पुस्तक में राजस्थान के परिचित कथाकार व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को केंद्र में रखकर नीरज दइया ने अपना समीक्षात्मक आकलन प्रस्तुत किया है। इस आकलन में उनके परस्पर संबंधों तथा निजी जीवन के अनुभवों के साथ ही संस्मरणपरक छवियां भी अंकित की गई है। व्यक्ति के समाज, समय, संस्कृति तथा परिवेश से जुड़ाव की बदौलत ही उसके सर्जनात्मक व्यक्तित्त्व तथा कृतित्त्व की भूमिका निश्चित होती है। इससे यह भी पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति बतौर एक रचनाकार हमेशा अपने भीतर सतत आत्म-संघर्ष तथा आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरता रहता है। रचनाकार के तौर पर बुलाकी शर्मा को समझने की दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व स्पष्ट है। व्यंग्यकार तथा कथाकार के रूप में बुलाकी अपने विचार खुलकर प्रकट करते हैं और उनके रचनाकार का यह अकुंठित रूप से उन्हें सार्थक रचनाकार के तौर पर स्थापित करता है।
- मधुमती टीम ( राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)

29 जनवरी, 2018

आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं : डॉ. दइया

साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत राजस्थानी कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया से संवाद ० नवनीत पाण्डे
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• आपको साहित्य अकादेमी के सर्वोच्च सम्मान के साथ-साथ पिछले साल मिले दर्जन भर पुरस्कारों, वे भी इतनी कम उम्र में, आपको बहुत- बहुत बधाई! इतने पुरस्कार-सम्मान कैसे मिल गए?
• पता नहीं। प्रत्येक पुरस्कार की अपनी एक प्रक्रिया होती है। साहित्य अकादेमी में तो पुरस्कारों के लिए आवेदन भी मांगे नहीं जाते हैं। उनकी एक गोपनीय प्रक्रिया है। कभी-कभार प्रकाशक सूचना दे देते हैं कि किस किस किताब को साहित्य अकादेमी ने खरीदा है। इससे एक संभावना बनती है कि पुरस्कार के अंतिम दौर में कौन-सी किताबें पहुंची है। अनेक किताबों के बीच से किसी एक किताब को चयनित करना सरल काम नहीं है। यह निर्णायकों का सामूहिक निर्णय होता है। ऐसे में जिसका चयन होता है उसे लगता है कि निर्णय ठीक हुआ है, और जो वंचित रह जाते हैं उनको लगता है यह गलत हो गया। मेरा मानना है कि अगर कोई ढंग का लिखता है तो उसे पुरस्कार मिलेगा, हां कभी देर हो सकती है पर यहां अंधेर नहीं है। उम्र के आधे मुकाम पर मैं पहुंच चुका हूं और आपको 50 की उम्र कम लगती है... खैर आपकी बधाई के लिए आभारी हूं।
• आप के लेखन को देख कर आप ही की तरह बहुमुखी विलक्षण प्रतिभा असमय हमें छोड़ गए आपके पिता कवि-कथाकार सांवर दइया याद आते हैं, उन्हें 35 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, उनके बाद आपको अब 50 की उम्र में... कैसा लग रहा है?
• कोई भी बेटा कभी अपने बाप की बराबरी नहीं कर सकता है। कम से कम किसी एक जीवन में तो हर्गिज नहीं। अपने पिता सांवर दइया जितना बड़ा लेखक मैं नहीं हूं। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे और यह उनका आशीर्वाद है कि मैं लेखन के क्षेत्र में कुछ करने का प्रयास करता हूं। वे 44 वर्ष ही लेकर आए पर वह उनके जाने की उम्र नहीं थी। वे होते तो आज तुम से सवाल करते कि नवनीत तुम्हें भी तो पुरस्कार मिले हैं फिर तुम पुरस्कारों के खिलाफ क्यों हो?
• मैं पुरस्कारों के खिलाफ नहीं हूँ, अगर कोई लेखक ईमानदारी से काम करता है, उसे स्वीकृति-सराहना, सम्मान मिलना चाहिए लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि आज पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचायी जा रही है।
• हम जिस दौर में पहुंच चुके हैं उसमें शब्द अपने अर्थ खोते चले जा रहे हैं या कहें कि शब्द खोखले, बेजान और अर्थहीन हो चुके हैं। ऐसे में हमें उनकी गरिमा के कार्य करना है। मैं मानता हूं कि साहित्य और समाज का दायित्व आज पहले से अधिक हो गया है। पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कुछ स्वार्थी किस्म के लोग हमारे बीच हैं, जो अपने लाभ के लिए ऐसा कुछ करते हैं कि पूरे साहित्य-समाज की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। किंतु पुरस्कार और सम्मान की गरिमा बनी रहनी चाहिए।
• पुरस्कारों के लिए मारामारी, लॉबिंग करना हद दर्जे तक घटियापन पर उतर आना भी तो होता है?
• आज हमारे चारों तरफ बाजार का बोलबाला है। हम सब नए बाजारीकरण के दौर में हैं। ऐसे में सभी तरह के रंग रूप यहां देखने को मिलते हैं तो हमें इसे सहजता से स्वीकारना चाहिए। पुरस्कार किसी की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। यह महज एक बार समाज का ध्यान खींचता है। इसे सामाजिक स्वीकृति कह सकते हैं। साहित्य का इतिहास गवाह है कि वह पुरस्कार को एक ब्यौरे की भांति दर्ज करता है जब कि रचनाओं का उसमें विधिवत उल्लेख होता है। चर्चा किसी पुरस्कार की बजाय रचना पर होनी चाहिए।
• साहित्य अकादेमी राजस्थानी पुरस्कारों के इतिहास में राजस्थानी की बात करें तो डॉ कुंदन माली के बाद केवल आपने आलोचना में यह पुरस्कार पाया है। डॉ. माली पुरस्कार मिलने के बाद से लेखन से नदारद हैं, तो क्या अब आप भी...?
• ऐसा नहीं है। डॉ. कुंदन माली लिखते रहे हैं और मैं भी इस पुरस्कार के बाद लिखता रहूंगा। कोई पुरस्कार किसी लेखक की मंजिल नहीं होता है। हम जो कुछ कहते हैं हमारी जानकारी के आधार पर कहते हैं और उसमें सदैव संभवानाओं को बनाए रखना चाहिए।
• पुरस्कारों के सिलसिले में यह देखा गया है कि पुरस्कार का अभिप्राय लेखक की संभावनाओं का अंत। ऐसा क्यों हो रहा है?
• पुरस्कार तो संभावनाओं का सम्मान है उसे अंत नहीं मानना चाहिए। आपके संकेत कुछ मामलों में सही भी हैं किंतु कुछ अपवाद रूप छोड़ दें तो पाएंगे कि सम्मान और पुरस्कार ने नई ऊर्जा का संचार किया है। वैसे संभावनाओं के अंत पर भी अनेक संभावनाएं शेष होती है। साहित्य में अंत जैसा कुछ नहीं होता, वह तो स्वयं अनंत है।
• राजस्थानी में आपने पुरस्कारों और लेखक का एक रिकार्ड बनाया है। पुरस्कारों के बारे में अक्सर आरोप लगते हैं कि इनके देने-लेने के पीछे साहित्येत्तर कारण होते हैं। वास्तव में ऐसा होता है?
• आपके सवाल में ही जबाब छिपा है। पुरस्कारों के देने लेने में यदि साहित्येत्तर कारण होते भी होंगे तो क्या हर बार यह संभव होता होगा। अगर हर बार यह संभव नहीं होता तो फिर पुरस्कारों और लेखन का रिकार्ड कैसे बन सकता है? आरोप हमेशा लगने के होते हैं और सच्चाई किसी आरोप की परवाह नहीं करती। अगर कोई किसी पर आरोप लगता है और आरोप सच्चा है तो उसे साबित किया जाना चाहिए। लेखक का काम ही सच्चाई को सामने लाने का होता है।
• क्या आपको इस बार साहित्य अकादेमी से इस निर्णय की उम्मीद थी?
• एकदम नहीं थी। इस वर्ष के लिए तो बिल्कुल नहीं थी। मैंने इस विषय में सोचा भी नहीं था। जब यह सूचना मिली तो मुझे आश्चर्य हुआ और खुशी भी हुई।
• अकादेमी इतिहास में क्षेत्रीय भाषा में शायद यह पहला ही उदाहरण है कि एक शहर में लगातार तीन वर्षों से पुरस्कार आ रहे हैं, सवाल उठने, उठाने स्वाभाविक हैं, आप क्या कहते हैं?
• लगातार चार वर्ष और पांच वर्ष भी हो सकते हैं। क्यों कि साहित्य अकादेमी यह पुरस्कार किसी शहर को नहीं देती है। मैं नहीं जानता कि आपको पता है या नहीं, पर साहित्य अकादेमी केवल किताब और लेखक के नाम के साथ अपना सर्वेक्षण करती है। एक शहर का यह संयोग बना है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’, बुलाकी शर्मा और नीरज दइया बीकानेर में रहते हैं।
• राजस्थानी में बीकानेर और जोधपुर संभाग में अधिक लेखन हो रहा है, प्रांत के बाकी हिस्सों में बहुत कम... ऐसा क्यों है?
• राजस्थानी में अधिक से अधिक लेखन की आवश्यकता है और राजस्थान के प्रत्येक शहर में लेखन हो रहा है। आज सूचना तंत्र और मीडिया के विकास के कारण छोटे छोटे गांवों-कस्बों से लेखक आ रहे हैं। तुलनात्मक रूप से बीकानेर-जोधपुर संभाग आगे हो सकते हैं किंतु वह दिन दूर नहीं जब अन्य संभागों के लेखक भी अधिक सक्रिय होंगे।
• आलोचना की अक्सर निंदा होती है, आलोचकों को प्रतिष्ठा और पुरस्कार कम मिलते हैं। ऐसा क्यों?
• आलोचना सहन करने की क्षमता लेखकों में नहीं है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि आलोचकों में भी भय रहता है कि संबंध खराब हो जाएंगे। आलोचक और लेखक सभी सामाजिक प्राणी ही तो है। समाज में अपना-पराया सब होता है। द्वंद्व यह है कि आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं। ऐसे में आलोचना की निंदा होना स्वभाविक है।
• आपकी आलोचना में आलोच्य लेखकों और कृतियों के चयन को लेकर कुछ लेखकों की असहमति रही है और सवाल उठाए गए हैं, इसका क्या कारण है?
• सहमति और असहमति एक ही सिक्के के दो पक्ष है। आलोचना में ऐसा होना भी चाहिए अन्यथा सब ठीक है तो फिर आलोचना होगी किस की। साहित्य में प्रत्येक आलोचक अपने दृष्टिकोण से सही कार्य करने का प्रयास करता है। हरेक का अपना नजरिया होता है। कोई भी चयन कभी भी निरपेक्ष हो नहीं सकता है। मैं आप से ही कहता हूं कि अगर आप मुझे कोई चयन देंगे तो क्या उस पर सभी की सहमति संभव है क्या? आरोप लगाने से पहले हमें यह सब सोचना-विचारना चाहिए। हवा में बातें कहने वाले बहुत मिलते हैं पर आलोचना में जमीन पर खड़े होकर यर्थाथ को देखना होता है।
• आलोचना के लिए आप किस आधार पर लेखक अथवा कृति का चयन करते हैं?
• आरंभ में तो मैंने संपादकों और मित्रों के आग्रह पर आलोचनात्मक आलेख लिखे जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। एक लंबी यात्रा से कुछ आलेखों का चयन मेरी किताब ‘आलोचना रै आंगणै’ में आप देख सकते हैं। ‘बिना हासलपाई’ के लिए कार्य करते हुए आदरणीय नंद भारद्वाज से लंबा संवाद रहा और इस किताब की रूपरेखा पहली से भिन्न बनी। राजस्थानी में आधुनिक कहानी को लेकर अनेक अंतर्विरोध और द्वंद्व की स्थितियां रही है। इस यात्रा में अनेक कहानीकारों का समायानुकूल सम्यक मूल्यांकन भी नहीं हुआ। ऐसे में यह प्रयास किया गया कि कहानी विधा पर एक विविध आयामों को लेकर बात हो, जिसका परिणाम आप देख रहे हैं। मैं किसी लेखक अथवा कृति के प्रति कोई पूर्वाग्रह लेकर नहीं चलता हूं, ‘आंगळी-सीध’ कृति में आप पाएंगे कि राजस्थानी उपन्यास की समग्र यात्रा को देखने-दिखाने और समझने का मेरा प्रयास है। इस से आप या अन्य कोई कितना सहमत अथवा असहमत होता है यह उसकी अपनी स्वतंत्रता है।
• आपने ‘नेगचार’ पत्रिका निकाली और वह खूब चर्चित हुई, फिर अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का भी संपादन किया। राजस्थानी में अब भी पत्रिकाएं कम है ऐसे में ‘नेगचार’ को फिर से आरंभ क्यों नहीं करते?
• पत्रिका निकालना अथवा संपादन का कार्य करना बहुत कठिन है। ‘नेगचार’ के संपादन की अपनी परिस्थितियां थीं। संपादन और सक्रिय लेखन दो भिन्न-भिन्न कार्य-क्षेत्र है। जो दोनों को साधते हैं वे निसंदेह महान हैं। क्योंकि इन दोनों में बहुत समय की आवश्यकता होती है। दिन-रात एक करना पड़ता है। किसी भी संपादक का महत्त्व किसी लेखक से कम नहीं आंका जाना चाहिए। संपादक यदि संपादन के नाम पर केवल प्राप्त रचनाओं को एकत्रित कर पत्रिका प्रकाशित कराएं तो मैं इसे अनुचित मानता हूं। संपादक में एक दृष्टि की अनिवार्यता होती है। उसे अनेक बार बहुत चयन और आग्रह करने होते हैं। संपादक ही दूरदर्शी होता है जो भविष्य के साहित्य का निर्माण को दिशा देता है। उदाहरण के लिए संपादक तय करता है कि किस कृति की समीक्षा होनी है और किस से होनी है। राजस्थानी की बात करें तो भाषागत अनेक समस्याओं और समरूपता के लिए विवेकवान संपादकों से उम्मीद है।
• आपने अनुवाद के क्षेत्र में भी बहुत काम किया है। किसी कृति अथवा रचना को अनुवाद के लिए चयन करने का क्या आधार रहता है?
• चयन का आधार मेरी आलोचनात्मक दृष्टि ही कही जा सकती है। हमारी यह अभिलाषा है कि अनुवाद के क्षेत्र में सभी भारतीय भाषाओं का आस्वाद राजस्थानी में आए। समकालीन भारतीय साहित्य की चर्चा हम ऐसे अनेक कार्यों को देखते हुए ही कर सकते हैं। अनुवाद से ही राजस्थानी की साहित्यिक महानता को हम भारतीय साहित्य में सिद्ध कर सकेंगे। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, मोहन आलोक, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना आदि अनेक ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किया है। मैंने साहित्य अकादेमी के लिए भी अनुवाद किए हैं किंतु मैं किसी रचना का अनुवाद के लिए अनुवाद करने की तुलना में अपने तर्कों और इच्छा के आधार पर रचना लेता हूं। तकनीकी अनुवाद के पक्ष में मैं अनुवाद की मशीन नहीं बनता हूं।
• मैं तुम्हारी रचना का अनुवाद करता हूं तुम मेरी करो, क्या अनुवाद में यह टेक एंड गिव का सिद्धांत काम करता है?
• आप खुद अनुवाद करते हैं और सब स्थितियों से परिचित हैं। इसमें कितना सच है और कितना झूठ यह किसी से छिपा नहीं है। मैं इसे भाषा के लिए हितकर भी मानता हूं कि ऐसे में कुछ आदान-प्रदान ही होता है। अगर दो लेखकों में ऐसा अनुवंध होता है तो यकीन कीजिए कि कुछ काम ही सामने आता है। आपके इस टेक एंड गिव को एक साहित्यिक अनुष्ठान समझा जाना चाहिए जहां दो रचनाकार अपनी अपनी भाषा के लिए कुछ रचनात्मक काम ही करते हैं। परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से ऐसे सभी कार्य भाषा की क्षमता को और लेखकों की सक्रियता को बढ़ाते हैं।
• पढ़ने-लिखने की बजाय लेखक पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करते दिखायी देते हैं, वे भाषा की मान्यता के लिए भी खुल कर आगे क्यों नहीं आते हैं?
• बहुत से लेखकों का मत है कि सभी पुरस्कार बंद हो जाने चाहिए। पुरस्कार विजेता ही ऐसी घोषणाएं करते हैं। जिन्हें पुरस्कार कभी नहीं मिला उन से पूछेंगे तो पुरस्कार का महत्त्व समझ में आएगा। पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करने वाले किसी एक पुरस्कार के लिए अपना जुगाड़ कितनी बार करेंगे, बाद में वह बिना जुगाड़ वालों को मिलने हैं। साहित्य के क्षेत्र में और खासकर राजस्थानी अथवा हिंदी के क्षेत्र में लेखन से किसी लेखक ने आज तक अपने लिए महल नहीं बनाएं है। साहित्य थेंकलेस जोब है। बहुत बार मैं खुद से सवला करता हूं कि मैं क्यों लिखता हूं, मैं लिखता हूं कि बिना लिखे रह नहीं सकता हूं। अनेक लेखक भाषा के लिए खुल कर आगे आएं हैं, आप क्या चाहते हैं? भाषा मान्यता के लिए शर्म बेचकर नंगे हो जाएं! भाषा मान्यता का मुद्दा केवल हम लेखकों का नहीं राजस्थान के आम नागरिक का भी है।
• हमारे प्रदेश के आम नागरिकों में भी राजस्थानी भाषा-साहित्य और संस्कृति के प्रति क्या अनुराग दिखाई देता है?
• अनुराग है और उसी अनुराग को बनाए रखने लिए हम सभी सक्रिय हैं। आप गांव-गांव ढाणी-ढाणी जा कर देख सकते हैं कि लोगों को अपनी भाषा से अथाह प्यार है। राजस्थानी उनके लिए जीवन का सवाल है। बहुत से लोगों को तो हिंदी-अंग्रेजी आती ही नहीं। ऐसे में राजस्थान के जन जन से यह हनुमान जी की भांति अपेक्षा करना कि अपना हृदय चीर कर दिखाए कि भाषाई अनुराग है मेरी दृष्टि में बेमानी है। राजस्थान सरकार ने केंद्र को व्यापक समर्थक से प्रस्ताव भेज रखा है और आशा है केंद्र सरकार द्वारा जल्दी ही स्वीकृति मिल जाएगी।
• राजस्थान में रोजगार की भाषा हिंदी है फिर राजस्थानी में लिखना-पढ़ना जरूरी क्यों मानते हैं?
• आप और हम आने मां-बाप और पूर्वजों को क्यों याद करते हैं? मेरी कविता में मैंने लिखा है- राजस्थानी म्हारी रगत रळियोड़ी भाषा है। जो भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। जिस भाषा को मैं अपने भीतर दौड़ता हूं पाता हूं और जिससे होने से ही मुझे लगता है मेरा होना है। उसके लिए आप ऐसा सवाल करते हैं तो मुझे यह ठीक नहीं लगता है। हिंदी से मेरा शरीर बेशक पोषित होता है किंतु मेरी आत्मा का पोषण करने वाली मेरी मातृभाषा मेरा स्वाभिमान है। राजस्थानी को हम सभी ने आत्मिक रूप से स्वीकार किया है और हिंदी में जो भी काम-काज करते हैं अथवा किया है उसमें घुलने में हमें बहुत समय लगा है। बहुत बार अनेक राजस्थानी शब्दों के हिंदी पर्याय ही नहीं मिलते थे। आप राजस्थान के आम आदमी की हिंदी देखेंगे तो उसमें राजस्थानी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देगा। प्राथमिक स्तर के स्कूल में जा कर देखें कि भाषा की समस्या से हमारे शिक्षक कैसे जूझ रहे हैं। आप या कोई भी सत्ता सरकर बालकों के मन की भाषा को मसोस नहीं सकते हैं।
• कुछ का कहना है कि राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा ही नहीं है, यह तो बस कुछ बोलियां है?
• जो ऐसा कहते हैं उनकी अज्ञानता है। किसी भी मूर्ख को कभी लगता ही नहीं कि वह मूर्खता कर रहा है। भाषा विज्ञान का पूरा अपना आधार राजस्थानी के पक्ष में है। सदियों पुरानी बात है कि राजस्थानी की बोलियों को हिंदी की बोलियों के रूप में वर्णित किया गया। इक्कीसवीं शताब्दी में आप अगर अठारहवीं शताब्दी की जानकारी रखेंगे तो यह मूर्खता नहीं तो भला क्या है? और अगर राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है तो साहित्य अकादेमी और अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे मान्यता क्यों दी है। राजस्थान सरकार ने भी राजस्थानी की मान्यता के लिए जो प्रस्ताव एक मत से भेजा है क्या वह भी गलत है? राजस्थानी ने सदा हिंदी को बल दिया है और राजस्थानी की मान्यता से हिंदी अधिक बलशाली होगी। हम राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते हैं इसके बाद भी हम हिंदी के विरोधी कैसे हो गए...!
• अब तक राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलने का प्रमुख कारण क्या है?
• राजस्थानी भाषा मान्यता के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जा चुका है। राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का निर्णय जल्द ही माननीय प्रधानमंत्री जी करेंगे। प्रदेश में राजस्थानी को अब तक लागू नहीं करने का सबसे बड़ा कारण राजनीति में हमारे नेताओं की इच्छा-शक्ति की कमी माना जा सकता है। राज्य सरकार चाहे तो राजस्थानी को दूसरी राजभाषा घोषित कर काम काज के लिए अनुमति दे सकती है।
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 आभार : भाई राजेश चड्ढ़ा जी & डॉ.हरिमोहन सारस्वत 'रूंख' जी