16 अगस्त, 2017

111 कविताएँ कवि : सुधीर सक्सेना

पुस्तक समीक्षा /  डॉ. नीरज दइया
    हिंदी कविता में विगत चार दशकों से सक्रिय कवि सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘111 कविताएं’ उनके सात पूर्व प्रकाशित कविता-संग्रहों- ‘कुछ भी नहीं अंतिम’, ‘समरकन्द में बाबर’, ‘रात जब चन्द्रमा बजाता है बाँसुरी’, ‘किताबें दीवार नहीं होती’, ‘किरच किरच यकीन’, ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ एवं ‘धूसर में बिलासपुर’ से चयनित कविताएं है। संग्रह में इन सात कविता-संकलनओं से चयनित कविताएं कवि के इंद्रधनुषी सफर को प्रस्तुत करती हैं, वहीं इन सात रंगों में अनेक रंगों और वर्णों की आभा भी सुसज्जित नजर आती है। कहना होगा कि एक लेखक-कवि और संपादक के रूप में सुधीर सक्सेना की रचनाशीलता के अनेक आयाम हैं। वे किसी एक शहर अथवा आजीविका से बंधकर नहीं रहे, साथ ही वे विविध विधाओं में सामान्य और औसत लेखन से अलग सदैव कुछ अलग और विशिष्ट करने के प्रयास में आरंभ से ही कुछ ऐसा करते रहे हैं कि उनकी सक्रिय उपस्थिति को रेखांकित किया गया है। उनका कविता-संसार एक रेखीय अथवा सरल रेखीय संसार नहीं है कि जिसमें बंधी-बंधाई और किसी एक लीक पर चलने वाली कविताएं हो। जाहिर है यह चयन और संकलन उनकी इसी विविधता और बहुवर्णी काव्य-सरोकारों को जानने-समझने का मजीद अहमद द्वारा किया गया एक उपक्रम है। सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा के विषय में संपादक के कथन- ‘उनकी कविओं की शक्ति, सुन्दरता के आयामों की विविधता ही कवि को समकालीन हिंदी कविता की अग्रिम पंक्त में ला खड़ा करती है।’ से निसंदेह पाठकों और आलोचकों की सहमति पुस्तक के माध्यम से भी होती है।
    पुस्तक के आरंभ में कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालती सुधी आलोचक ओम भारती की विस्तृत एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है। साथ ही वरिष्ट कवि-आलोचक नरेन्द्र मोहन का कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-साधना पर एक पत्र पुस्तक में ‘मंतव्य’ के अंतर्गत दिया गया है। इससे यह पुस्तक शोधार्थियों और सुधी पाठकों के लिए विशेष महत्त्व की हो गई है। कविता-यात्रा के विविध पड़ावों पर यह गंभीर अध्ययन-मनन कविताओं के विविध उद्धरणों के माध्यम से नवीन दृष्टि और दिशा देने वाले हैं। इन आलेखों में जहां कवि के साथ अंतरंग-प्रसंगों को साझा किया गया है वहीं समकालीन कविता और सुधीर सक्सेना की कविता को लेकर विमर्श में हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना का योगदान भी रेखांकित हुआ है। संग्रह में संकलित कविताओं में जहां कवि के काव्य-विकास और संभावनाओं की बानगी है, वहीं उनके सधे-तीखे तेवर और निजता में अद्वितीय अभिव्यंजना का लोक भी उद्घाटित हुआ हैं। इसी को संकेत करते ओम भारती लिखते हैं- ‘सुधीर की कविता बरसों का रियाज, सधे-सुरों और सहज आलाप समेटती पुरयकीन कविता है। इसमें व्यंजना का रचाव है,तो लक्ष्णा का ठाठ भी है।’
    संकलित कविताएं वर्तमान जीवन के यथार्थ-बोध के साथ कुछ ऐसे अनुभवों और अनुभूतियों का उपवन है जिसमें हम उनकी विविध पक्षों के प्रति सकारात्मकता, सार्थकता और आगे बढ़ने-बढ़ाने की अनेक संभवनाएं देख सकते हैं। कविताओं में कवि की निजता और अंतरंगता में प्रवाह है तो साथ ही पाठक को उसके स्तर तक पहुंच कर संवेदित करने का कौशल भी है। वे कविताओं के माध्यम से जैसे एक संवाद साधते हैं। कविताओं में कवि की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति से अधिक उल्लेखनीय उनकी सहजता, सरलता और सादगी में अभिव्यंजित होती विचारधारा है। जिसके रहते वे विषय और उसके प्रस्तुतीकरण के प्रति सजग-सचेत और हर बार नई भंगिमाओं की तलाश में उत्सुकता जगाते हुए अपने पाठकों को हर बार आकर्पित करते हैं। ‘कुछ भी नहीं अंतिम’ संग्रह के नाम को सार्थक करता यह संकलन अपनी यात्रा में बहुत बार हमें अहसास करता है कि सच में कवि के लिए कविता का कोई प्रारूप अंतिम और रूढ़ नहीं है। ‘समरकंद में बाबर’ के प्रकाशन के साथ ही हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना को बहुत गंभीरता से लिया जाने लगा। वे जब ईश्वर के विषय में फैले अथवा बने हुए संशयों को कविता में वाणी देते हैं तो अपने अंतःकरण के निर्माण में अपने इष्ट मित्रों और साथियों की स्मृतियों-अनुभूतियों को भी खोल कर रखते हैं। ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ और ‘किताबें दीवार नहीं होती’ जैसे संग्रहों की कविताएं सुधीर सक्सेना को हिंदी समकालीन कविता के दूसरे हस्ताक्षरों से न केवल पृथ्क करती है वरन यह उनके अद्वितीय होने का प्रमाण भी है। प्रेम कविताएं हो अथवा निजता के प्रसंगों की कविताएं सभी में उनकी अपनी दृष्टि की अद्वितीयता प्रभावशाली कही जा सकती है। ये कविताएं कवि के विशद अध्ययन-मनन और चिंतन की कविताएं हैं जिन में विषयों की विविधता के साथ ऐसे विषयों को छूने का प्रयास भी है जिन पर बहुत कम लिखा गया है। कवि को विश्वास है- ‘वह सुख/ हम नहीं तो हमारी सततियां/ तलाश ही लेंगी एक न एक दिन/ इसी दुनिया में।’ वे अपनी दुनिया में इस संभावना के साथ आगे बढ़ते हैं।
    ‘धूसर में बिलासपुर’ लंबी कविता इसका प्रमाण है कि किसी शहर को उसके ऐतिहासिक सत्यों और अपनी अनुभूतियों के द्वारा सजीव करना सुधीर सक्सेना के कवि का अतिरिक्त काव्य-कौशल है। कविता की अंतिम पंक्तियां है- ‘किसे पता था/ कि ऐसा भी वक्त आयेगा/ बिलासपुर के भाग्य में/ कि सब कुछ धूसर हो जायेगा/ और इसी में तलाशेगा/ श्वेत-श्याम गोलार्द्धों से गुजरता बिलासपुर/ अपनी नयी पहचान।’ अस्तु कहा जा सकता है कि जिस नई पहचान को संकेतित यह कविता है वैसी ही हिंदी कविता यात्रा की नई पहचान के एक मुकम्मल कवि के रूप में सुधीर सक्सेना को पहचाना जा सकता है।
    अच्छा होता कि इस संकलन में संग्रहों और कविताओं के साथ उनका रचनाकाल भी उल्लेखित कर दिया जाता जिससे हिंदी कविता के समानांतर सज्जित इन कविता यात्रा को काल सापेक्ष भी देखने-परखने का मार्ग सुलभ हो सकता था। साथ ही यहां यह भी अपेक्षा संपादक से की जा सकती है कि वे अपना और कवि का एक संवाद इस पुस्तक में देते अथवा कवि सुधीर सक्सेना से उनका आत्मकथ्य इस पुस्तक में शामिल करते। इन सब के बाद भी यह एक महत्त्वपूर्ण और उपयोग कविता संचयन कहा जाएगा। सुंदर सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति से कविताओं का प्रभाव द्विगुणित हुआ है।
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111 कविताएँ / कवि : सुधीर सक्सेना चयन एवं संपादन : मजीद अहमद प्रकाशक- लोकमित्र, 1/6588, पूर्व रोहतास नगर, शाहदरा, दिल्ली पृष्ठ : 224 मूल्य : 395/- संस्करण : 2016  
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11 अगस्त, 2017

असत्य के प्रयोग

    बापू की आत्मकथा का नाम है। सत्य के प्रयोग। उन्होंने बताया जो मैं पहले से जानता था, पर नई बात यह थी कि वे किताब लिख रहे हैं- असत्य के प्रयोग। केवल किताब ही नहीं लिख रहे, उन्होंने कहा कि वे प्रयोग भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि सत्य से भला क्या प्रयोग करना? जो सत्य है, वह तो सत्य है। प्रयोग का विषय तो असत्य है। अब जमाना सत्य का नहीं, केवल और केवल असत्य का ही जमाना है। अब तो झूठों का बोलबाला और सच्चे का मुंह काला वाली अनेक बातें और स्थितियां हमारे समाने हैं। वे महाश्य मुंह खोल कर खड़े थे और बीच-बीच में बोल रहे थे- मुझसे मुंह मत खुलवाओ, आपको सबको पता है कि कहां क्या-क्या हो रहा है। मैंने उन्हें टोका- मुझे कुछ भी नहीं पता कि कहां क्या-क्या हो रहा है?
    उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा- अखबार नहीं पढ़ते हो या समाचार नहीं सुनते हो। छोड़िए इन दोनों को, क्या चौक में नहीं बैठते हो। आस-पास की गप्प-गोष्ठी का आनंद तो लेते ही हो। फिर भी भोले बनते हो। क्या आप भी मेरी तरह असत्य का कोई प्रयोग मुझ पर करने लग गए हो? देखिए, यह आपका विषय नहीं है। मैंने इसे खोजा है और इस पर मुझे काम करने दो। मेरी किताब छप जाए फिर देखना सबकी आंखें खुल जाएगी। मुझे फिर उनको टोकना पड़ा- जनाब आंखें तो सभी की खुली हुई है।
    वे तनिक गुस्से से बोले- आप सब कुछ समझकर भी नादान बनते हैं, उसका कोई क्या कर सकता है! आंखें तो खुली हुई है, पर फिर भी खुली हुई नहीं है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमारा आदर्श वाक्य है- सत्यमेव जयते। जानते हैं ना? मैंने गर्दन स्वीकृति में हिलाई तो वे बोले- मेरी किताब पढ़ने के बाद वही वाक्य नए रूप में दिखाई देने लग जाएगा। आज सत्य की जीत कहां हो रही है। झूठ बेचा जा रहा है, खरीदा जा रहा है। चारों तरफ झूठे लोग भरे पड़े हैं। जिसे देखो- झूठ बोलते हैं और सरासर झूठ बोलते हैं। सफेद झूठ को रंग-बिरंगे लुभावने रंगों में सजा कर पेश किया जा रहा है। नहीं समझें? मैं विज्ञापनों की बात कर रहा हूं। वस्तुओं की कीमत की बात कर रहा हूं। दो रुपये के माल को बीस रुपये में बेचने वाले एम.आर.पी. के नाम पर भोली भाली जनता को ठग रहे हैं।
    मैंने बीच में पूछना मुनासिब समझा कि असत्य के प्रयोग किताब में क्या इन्हीं सब बातों पर प्रवचन मिलेंगे? वे हंसने लगे और बोले- आप भी ना कितने भोले हैं। देखिए मैं प्रयोग कर रहा हूं। किताब लिखने की बात कर रहा हूं और अगर किताब लिख दी तो फिर यह असत्य, कैसे असत्य रहेगा? बात को समझा करो, मैं सच में असत्य के प्रयोग कर रहा हूं। मैंने उन्हें प्रणाम कर बस इतना ही कहा- धन्य हैं आप। धन्य है आपकी धरा और धन्य जननी। जैसे उन्हें मेरे इसी धन्य का इंतजार था। वे मुडे और चल दिए।
    मैं उन्हें मंथर गति से जाते हुए देख रहा था कि पंच काका आ पहुंचे, बोले- ये पागल क्यों आया था। इसकी ज्यादा मत सुना करो। सबके पास ऊल-जलूल बातें करता फिरता है। यह अच्छा किया इसे घर में नहीं बैठाया। इसके घरवाले भी इससे परेशान है। इस से होता कुछ नहीं, इसे करना कुछ नहीं। बस फालतू बातें करता रहता हैं। इसका काम लोगों के दिमाग खराब करना है।
० नीरज दइया 
 

31 जुलाई, 2017

एक तीर : कई निशानें

मारे आदि-आयुध तीर-कमान रहें हैं। समय ने प्रगति की और अनेकानेक आयुधों के इस दौर में हम उन्हें भूल गए हैं। तीखे तीर से राम ने रावण को मारा। वैसे तीर की क्षमता उसकी तीक्ष्णता पर निर्भर नहीं करती है, यह कमाल तो हाथ और अंगूठा दिखाता है। हमारे सामने कोई तीर ताने यह सहनीय है, पर हमें कोई अंगूठा दिखाए.... यह असहनीय है! गुरु द्रोण के समय से ही अगूंठा देखने की हमारी आदत बिगड़ी हुई है। अब तो शिष्यों ने बिना मांगे ही गुरुओं को अगूंठें देने आरंभ कर दिए हैं। अगूंठा देना और दिखाना भी एक कला है, ठीक वैसे ही जैसे कि तीर चलाना और तीर झेलना कला है।
गुरुजी भी कम नहीं, वे भी अब अगूंठा मांगते नहीं, बहुत हो चुका वे अब सरेआम अगूंठा-छाप घोषित करते हैं। कल की ही बात लो, भरी सभा में गुरुजी ने बोलते हुए सवाल दागा- ‘लिंचिंग’ का मतलब किसी को पता है? सारे चुप! यह लिंचिंग बीच में कहां से आ गया। वे बोल तो ब्लीचिंग पाउडर पर थे और बीच में उनका अहम जाग गया। अपनी कुटिल मुस्कान के साथ वे बोले- मुझे पता है, आपको नहीं पता होगा। आप जब इस देस में रहते हुए भी अगला-पिछला कुछ जानते नहीं, फिर अगूंठा-छापों की श्रेणी में आ जाओ। सुनिए हाल ही के दिनों में भीड़ के हाथों बढ़ रहे क़त्ल के लिए लिंचिंग शब्द प्रचलन में आया है। हाय जुनैद, इतनी बड़ी बात और ये सब नहीं जानते!
वर्षों पहले गीतकार मजरुह सुलतानपुरी ने गुरुजी की किसी बात पर लिखा था- ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’। नाजुक दिलों को ऐसे और वैसे तीर कुछ ज्यादा ही घायल करते हैं। इस तश्वीर का दूसरा पहलु यह भी है कि रोजाना ऐसे अगूंठे देखने वालों का दिल मजबूत हो जाता है। वे कठोर, निष्ठुर ऐसे घायल नहीं होते। कोई घायल बाद में गुरुजी के बारे में कह रहा था कि उनका मन था, मंच पर जाकर कुछ ऐसा पूछे जिसका जबाब गुरुजी के गुरुजी को भी नहीं आता हो। माना यह उनकी भ्रांति थी पर वे मन मार कर रह गए। ऐसा अगर तीर चल भी जाता तो क्या होता? गुरुजी का स्वभाव रहा है कि ऐसे पथभ्रष्ट चेलों को सार्वजनिक रूप से बदनाम कर दो। ऐसे नालायक चेलों की भ्रूण-हत्याएं गुरुजी बखूबी कर डालते हैं। ऐसे बांसों को वे जड़-मूल से नष्ट करने की कला में पारंगत हैं, इसलिए बांसुरी वही बजती है जिसके सुर सात होते हैं। कोर्स में आठवां सुर नहीं फिर कैसे कोई नया आलाप ले सकता है। यह निषेध है। विधि सम्मत नहीं।
पक्ष हो या विपक्ष, गुरु हो या शिष्य सभी की यही कामना होती है कि कोई ऐसा तीर मिल जाए जिससे कई निशाने एक साध सध जाएं। इश्यू बनाने पड़ते हैं, ढूंढ़ने पड़ते हैं। अब तो ‘एक साधै : सब सधे’ की तर्ज पर बस एक तीर को साधना चाहते हैं कि अगला-पिछला सब सध जाए। ऐसे साधक अपनी लाठियों को सलामत रखते हुए सांपों को मारने निरंतर अभ्यास करते हैं, पर इसका क्या किया जाए जब उनकी आस्तीनों में सांप पल रहे हो। ऐसे में सलामत लाठियों को खुद पर ही बरसाना होता है।
पंच काका कहते हैं- चोर-चोर मैसेरे भाई, कोई कुछ कहता-करता नहीं। आग लगानी तो सरल है पर बुझानी जरा कठिन। आंदोलन करना तो सरल है पर हिंसा रोकनी जरा कठिन। तीर चलाया तो जा सकता है पर उनके घाव मिटाना जरा कठिन है।
० नीरज दइया 
 

15 जुलाई, 2017

स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता

    फेसबुक से जुड़ी अनेक कहानियां है। मैं एक छोटी-सी कहानी साझा करता हूं। जिन्हें कभी मैंने पढ़ाया था, वर्षों बाद फेसबुक की दुनिया में वे अनेक छात्र-छात्राएं मुझे मिले। यह जया की कहानी है। उसने अपने स्कूल-टाइम के टीचर यानी मुझ से एक सवाल किया- “सर, ये जो आपने हमें पढ़ाया था... साइन-कोस-टेन... वगैराह-वगैराह... वो हमें यूज कब करना है?” प्रश्न बड़ा गंभीर है कि गणित या फिर अन्य विषयों का स्कूली पाठ्यक्रम हमारे भविष्य के जीवन में कितनी उपादेयता रखता है। अगर कोई पाठ्यक्रम आगे के जीवन में उपादेयता नहीं रखता है तो उसके पीछे हम सुनहरा बचपन और युवावस्था को कोई बोझिल बनाते हैं?
    सभी शिक्षकों की मजबूरी होती है कि उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करना होता है। जो पाठ्यक्रम में है, जैसा पाठ्यक्रम में है उन्हें उसे पढ़ाना होता है। नौकरी का असूल है कि दिया हुआ काम करो। कोई ऐसा-वैसा सवाल मत करो। पाठ्यक्रम निर्माण और ऐसी अनेक गंभीर बातें बड़े-बड़े नेताओं और शिक्षाविदों के बस की बातें हैं। उसे कोई गांव का या शहर का सामान्य शिक्षक नहीं समझ सकता। मैं भी जब विज्ञान-विद्यार्थी के रूप में स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहा था, तब मेरे लिए भी यह रहस्य था- ‘हम क्यों पढ़ रहे हैं? यह हमारे आगे के जीवन में कब काम आएगा।’ मैं शिक्षक बनने का प्रशिक्षण ले रहा था, तब भी मन में ऐसे अनेक सवाल आते थे। सवालों का होना एक अच्छे अध्येता की निशानी है। ऐसे मेरे सवालों का जवाब मैंने खोजने और पूछने का प्रयास किया। कुछ विषयों और पाठ्यक्रम के कुछ हिस्से के बारे में तो कुछ बातें ठीक लगी पर इस सवाल का पूरा जबाब किसी ने नहीं दिया, कहीं नहीं मिला। बहुधा तो मेरे शिक्षक मेरे सवाल का जवाब ही अपने कुछ सवालों में देते थे। और उन दिनों कभी ऐसे जबाब मिलते थे कि मेरी समझ में नहीं आया था। अब भी मैं यदि अपने अनुभव से जवाब देने का प्रयास करूंगा तो वह अंतिम जबाब होगा ऐसा नहीं कह सकता। कुछ आंशिक जबाब ही सही इस बात पर जया के बहाने चर्चा की जानी चाहिए।
    शिक्षक के रूप में शिक्षा-नीतियों और पाठ्यक्रम आदि के बारे में आलोचना नहीं की जा सकती। किसी भी शिक्षक का ऐसा करना गलत है। दूसरे को इस बात से उनका सरोकार है नहीं, फिर इस पर चर्चा कौन करेगा। यह आलोचना नहीं वरन हमारे देश के भविष्य का प्रश्न है जिससे लाखों-करोड़ों की अभिलाषाएं और जीवन जुड़ा है। मुझे लगता है कि स्कूली पाठ्यक्रम के दौरान बच्चे जिस अवस्था में होते हैं वहां उनके माता-पिता, अभिभावकों अथवा शिक्षकों को यह जानकारी होना संभव नहीं कि बच्चा आगे चलकर क्या बनेगा। जब हमें मालूम नहीं विद्यार्थी आगे चलकर क्या करेगा, पाठ्यक्रम में समाहित सारी बातें जीवनोपयोगी हैं। स्कूली पाठ्यक्रम ऐसे विविध वितानों का समुच्चय है जिनके लिए बच्चे से हम उम्मीद करते हैं। यह ठीक किसी बीज में पेड़ होने का सपना देखने जैसा है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि उन्हें वह सब कुछ पढ़ाया और सीखाया जाए जिसकी आगे चल कर किसी मार्ग पर उन्हें आवश्यकता पड़ सकती है। यह पहले जैसा सामज नहीं कि लड़की को चिट्ठी लिखनी-पढ़नी आ जाए तो बस हो गई पढ़ाई। आगे जाकर रोटियां बनाने वाली महिलाएं अब केवल रोटियां बनाने वाली नहीं रही हैं। उनकी उम्मीदे, सपने और सरोकार इस देस समाज को प्रभावित करते हैं।
    श्रेष्ठ शिक्षक जीवन पर्यंत शिक्षार्थी बना रहता है। मुझे मेरे शिक्षार्थी होने में गर्व और आनंद है। किसी भी सफल शिक्षार्थी की निशानी है कि उसके पास कुछ सवाल है। जया, त्रिकोणमिति में साइन-कोस-थीटा को बहुत अच्छे से समझ कर, मैंने इतने विद्यार्थियों को पढ़ाया कि वह पूरा अध्याय रट-सा गया है। दैनिक जीवन में त्रिभुज और पूरी त्रिकोणमिति का गहरा अभिप्राय संभव है। केवल तीन भुजाओं और तीन कोण के माध्यम से अनेक गूढ़ अर्थों को समझ सकते हैं। किसी भी विद्यार्थी की असली पढाई अपने पाठ्यक्रम को याद रखना और स्कूली जीबन के संस्कारों का पोषण करना है। किसी का गुण मानना है, किसी को याद रखना और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपना ही संसार का नियम है। किसी गृहणी के जीवन में रोटी और सब्जी बनाते समय बेशक गणितीय शिक्षा के आधार-लंब और कर्ण आदि का कोई विशेष अर्थ नहीं होता। घर के बच्चों को पालते समय भी नहीं होता शायद, पर जब वे बच्चे स्कूल जाएंगे तब अर्थ होने लगेगा। अगर माता-पिता ‘साइन-कोस-टेनथीटा’ से परिचित हैं, तो वे बच्चों को संभाल सकते हैं। उनकी मदद कर सकते हैं, कुछ बता सकते हैं। जया तुम्हारे बच्चे इंजिनियन बनेंगे अथवा गणित-विज्ञान पढेंगे, तब थीटा तुम्हारे लिए कुछ काम का होगा। कोई एक आदमी केवल एक काम करता है पर देश में एक नहीं अनेक काम है और उन अनेक कामों की संभावनों से जुड़ी हमारी शिक्षा पद्धति है। स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता इसी बात पर निर्भर करती है कि यह हमारी सामूहिकता और एकता का प्रतीक है। पूरे देश में समान पाठ्यक्रम इसी बात पर आधारित है।
नीरज दइया


13 जुलाई, 2017

निरे बुद्धू और गूगल बाबा

प्रतियोगिता परीक्षा के बाद बच्चे सवालों पर चर्चा करते हैं- कौनसा सही हुआ, कौनसा गलत। जो हुआ सा हो गया। पर नहीं, इनकों तो मेरे जैसे बुद्धिजीवियों की हालत दयनीय करनी होती है। पेशे से अध्यापक हूं और लेखक-कवि होने का वहम से खुद को बुद्धिजीवी मानने लगा हूं। यह कहने-सुनाने की बात नहीं है फिर भी यहां लिखना पड़ता है कि हम निरे बुद्धू हैं। हम से बड़ी-बड़ी उम्मीदें हैं। यह तो अच्छा हो गूगल बाबा का जो कुछ भी पूछो, जल्दी से बता देते हैं। यह एक गुप्त ज्ञान है। गूगल बाबा ने आधुनिक समाज में गुप्त-ज्ञान को सार्वजनिक ज्ञान की श्रेणी में कर दिया है। बच्चे ने पूछा- ‘तावान’ कहानी के लेखक कौन है? इसके साथ ही उसने चार कहानीकरों के नाम बता कर मेरा मुंह ताका। मुस्कुराता हुआ वह बोला- मुझे नहीं आता था इसलिए मैं प्रेमचंद का नाम देखकर, यही तुक्का चला आया हूं।
गूगल बाबा की जय हो कि तवान कहानी के कहानीकार प्रेमचंद ही हैं। काश! बात यहीं थम जाती तो ठीक थी। पर अगले सवाल से बुद्धिजीवी होने के वहम पर फिर गाज गिरी- ‘तावान’ का मतलब क्या होता है? एक बार फिर गूगल बाबा की जय बोलनी पड़ेगी। लाज रह गई, पर यह पक्का हो गया कि अब बिन गूगल के सब सून है। प्रेमचंदजी सरीखे लेखक भी क्या खूब थे! इतनी कहानियां लिखी कि नाम भी भला अटपटे और कठिन रख छोड़े हैं। बड़ी गलती पेपर-सेटर की है। भला यह भी क्या सवाल हुआ कि फलां कहानी किसकी है, और फलां कहानीकार की कहानी निम्न में से कौनसी? अब ये खामियाजा तो आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ हमको भुगतना होगा।
तावान यानी हर्जना, मुआवज़ा, क्षतिपूर्ति, अर्थदंड आदि शब्द अभी विस्मृति में पहुंचे ही नहीं थे कि हमारे शहर में एक हादसा हो गया। फटाखा गोदाम में हुई दुर्घटना ने इस बुद्धिजीवी के सामने फिर से बड़ी समस्या खड़ी कर दी। जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ, इसका गम होने से अधिक दिखाने की कला हमें आनी चाहिए। ऐसी किसी भी घटना से अगर हमारी संवेदनशीलता आहत नहीं हो, तो हम काहे के बुद्धिजीवी? माना कि ऐसी घटना में कोई भरपाई यानी तावान संभव नहीं है। असली दर्द तो उसका है, जिसका घर-संसार उजड़ गया। गलती किसकी थी, कौन जिम्मेदार है, किसको सजा होगी? किसने अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं की? यह सब फैसला तो होता रहेगा पर जिसकी जान गई उसका क्या होगा? ऐसी लाशों पर राजनीति और पार्टी की रोटियां सेकने वाले हमारे कितने हमदर्द है? बच्चे बड़े हो गए फिर भी सवाल करते हैं। ऐसे सवाल जिनका जबाब ना तो गूगल बाबा के पास है और ना निरे बुद्धू जी के पास। बच्चा जानना चाहता है कि एक मौत के पच्चीस लाख मुवावजा मांगने वाले ढाई लाख से राजी क्यों गए? यह भी जानना चाहता है कि ढाई लाख या पच्चीस लाख किसी मृतक के परिवार वाला सरकार को दे दे तो क्या उनका घर फिर आबाद हो जाएगा?
पंच काका कहते हैं कि ऐसी मौत की क्षतिपूर्ति संभव नहीं। कोई अर्थदंड ऐसे घावों को भर नहीं सकता। मौत के सामने हम सब लाचार होते हैं। वह किसके हिस्से कब-कहां-कैसे आएगी, इसकी खबर किसी खबरनवीश को भी नहीं होती। वैसे यह खबर है भी नहीं, यह तो परमात्मा का बड़ा व्यंग्य है। हम सब इस व्यंग्य के निशाने पर हैं। किसी का नंबर कभी भी लग सकता है।

* नीरज दइया