28 मार्च, 2017

कुंवारों-कुंवारियों की धमाचौकड़ी

मारे देश में रोजगारों की कमी नहीं है। अगर हम अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाएं, तो एक नहीं बीस तरह के काम हैं, जिनको रोजगार के रूप में अपनाया जा सकता है। मैं आपको बीस के बीस तरह के रोजगार नहीं बता सकता, पर एक के बारे में कुछ खुलासा करता हूं। समझदार को तो इशारा ही काफी होता है। पिछले दिनों एक वैवाहिक साइट ने सर्वेक्षण करवाया कि कुंवारों-कुंवारियों की पहली पसंद में कौन-कौन शमिल है। पसंद की बात पर ऐसे-ऐसे नजारे सामने आए कि मत पूछिए बात। बॉलीवुड-हॉलीवुड और क्रिकेट-राजनीति के युवा चेहरों की तो जैसी लॉटरी निकल आई। दीवानों-दीवानियों के हाल-बेहाल, पसंद करना था एक को, और नाम बताए दस के। पूरी वेटिंग लिस्ट ही बना दी। ये नहीं तो ये, और ये नहीं तो ये चलेगा। ही और शी इस ये-यू के चक्कर में रहते हैं। अंततः गले और वरमाला पर किसी एक्स-वाई का नाम लिखा होता है। पसंद करने-कराने की छूट हो तो फिर पूरी छूट होनी चाहिए। पसंद तो पसंद होती है। कोई शादीशुदा है या नहीं, इससे कोई सरोकार नहीं। यह अंदर की बात होती है। दिल का मामला है साहेव। फिर जब सपनों में किसी के आने-जाने की कोई रोक-टोक नहीं है, तो यहां पसंद में रोक-टोक क्यों? देश में बड़े नाम ऐसे भी मिल जाएंगे जो शादीशुदा होते हुए भी कुंवारों और कुवारियों जैसे हैं। कोई अपने जीवन-साथी को वर्षों तक छोड़ दे, तो कोई समयावधि होनी चाहिए कि इतने वर्षों पूरे कर, आप कुंवरा-कुंवारी कहे जाने का प्रमाण-पत्र पा सकेंगे। झूठ बोलना किसे पसंद नहीं है। खुद को बरसों कुंवरा-कुंवारी कहलाने में गर्वानुभूति है। तो बात सर्वेक्षण की थी और उस में अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर, रितिक रोशन, विराट कोहली, राहुल गांधी से लेकर माननीय प्रधानमंत्री जी तक का नाम कुंवारियों की पसंद में सरपट आया। रूपसियों को तो छोड़िए कुंवारों का हाल तो इससे भी बुरा है। वे तो पासवाली आंटी तक का नाम लेने में नहीं शर्माते हैं। आप कुछ भी समझे, पर ये अंदर की बात है। दिल का मामला है। बहुत सी पुरानी बातें ऐसी हैं जो पुरानी होती ही नहीं। सदा प्रासंगिक रहती है। जैसे- भैया! शादी ऐसा लड्डू है, खाए सो पछताए और ना खाए पछताए। जब पछताना ही है तो खा लेना ही ठीक है। कुछ का मानना है कि पछताना ही है, तो अकेले ही ठीक है। मिलकर पछ्ताना ठीक है या अकेले, इसका कोई ढंग से खुलासा नहीं हुआ है। कुछ ट्रेलर देख कर पछताते हैं। किसी को आदर्श मानकर प्रेरणा ग्रहण करना गलत नहीं। राजनीति और समाज में कुछ प्रसिद्ध कंवारों और कंवारियों के नाम कुख्यात हैं। अपने जीवन को फकीरी जीवन कहने वाले और वालियों का कुछ तो जादू है। आह ! स्वतंत्रता से भरा जीवन कितना सुखद है। किसी का ना कहना, ना सुनना। जो जी में आए, सो करो। परिवार और शादी में कितने बंधन हो जाते हैं। इन दिनों यह एक बड़ा रोजगार बन गया है। बिन किसी इन्वेस्टमेंट के आमदनी होने लगती है।
          पंच काका रोमाटिंग मूड में आ कर कहने लगे हैं- जब दो दिल टकराते हैं तो बिजलियां कड़कती है, घर में बारिश और तूफान आता है। धीरे-धीरे दो पहियों पर दौड़ने वाली गाड़ी, सवारियों के बढ़ने पर बैलगाड़ी बन जाती है। बीस बातें सोचते हुए जीवन जीना पड़ता है। ऐसे में कुंवारों और कुंवारियों की धमाचौकड़ी देख कर जलन होती है। यह खेल निराला है- जो बंधन में हैं, आजादी चाहते हैं और जो आजाद है, वे बंधन के लिए बेताब है।
० नीरज दइया 

24 मार्च, 2017

मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने

पंच काका का मानना है कि हमारे देश में जिन राज्यों की चर्चा मुख्य धारा में रहती है, उनमें यूपी-बिहार प्रमुख हैं। वे कहते हैं कि लूटा उसे जाता है जिसके पास कुछ होता है। यूपी-बिहार में ही सब कुछ है। बिहार में लालूजी तो यूपी में मुलायमजी प्रसिद्ध है। ये तो बस दो ठो नाम लिए हूं। पर इतना जान लो के जिनके पास लुटाने के लिए बहुत कुछ होत रहा, वही लूट और लूटा सकत है। फिल्मी दुनिया में गाना ऐसे ही नहीं बन जात- ‘मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने’। इस गाने में ही लाइन थी- ‘दिल वालों का करार लूटने’। अब अगर गौर किया जाए तो गीतकार ने सबसे पहले ‘दिल वालों’ की जगह ‘दिल्ली वालों’ का करार लिखने की सोची थी। पंच काका ने ही कहा कि इसे इतना ओपनली नहीं लिखना है। माना कि दिल्ली का करार यूपी-बिहार से जुड़ा हुआ है। आपको याद हो तो एक समय भोजपुरी गाना हिट हुआ था- ‘कमर लचके तो यूपी-बिहार झुमेला।’ यह प्रमाण है कि यूपी-बिहार की लोकप्रियता अन्य राज्यों से अधिक है। वैसे यूपी, बिहार के लोगों की भावनाओं को ठेस भी बहुत जल्दी पहुंचती है। पूरे देश में यूपी-बिहार के लोग फैले हुए हैं। काफी जगह तो ऐसी है कि वहां सभी हिंदी-भाषी लोगों को ‘बिहारी’ कहा जाता है। हमारे एक मित्र यूपी वालों को नाराजगी में ‘यूप्ले’ कहा करते हैं। ऐसे ही एक परेशानी के दिन उन्होंने अपनी भाषा में यूपी वालों के लिए एक नया शब्द इजाद कर दिया- ‘यूप्ले’ यानी ‘तुम खेलो’, वे शब्द के प्रयोग को कोड-वर्ड की तरह काम लिया करते थे। कोड वर्ड का मतलब भय-खतरा है। क्या यूपी-बिहार में देश के लोगों को डाराने वाले लोग रहते हैं? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो यूपी-बिहार को किसी के ले लेने और किसी को दे देने से भला आपत्ति क्यों होती। एक किस्सा यूं हुआ कि फिल्म ‘छोटे सरकार’ के एक गाने को लेकर शिल्पा शेट्टी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो गई। कारण था उनकी फिल्म का  गाना- 'एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे और बदले में यूपी-बिहार ले ले...।’
         यूपी-बिहार को लूटने-लूटाने और झूमने-झुमाने तक तो बात ठीक थी, कि चलो भैया! लूट और झूम लो। यूपी हो या बिहार यहां के शीर्ष नेताओं का परिवार बड़े कुनबें के रूप में विख्यात है। यहां बस गिने-चुनों की चलती है। कुछ परिवारों का दबदबा है। जब-जब से वे सत्ता में आएं हैं, अपने भाई-बंधुओं का जमावड़ा किया है। मान कि यह अपने अपने घर का मसला है, और कोई ऐसे ही लुटता-लूटता नहीं। कैसे लुटता-लूटता है इसकी सब खबर रहती है। पर यह क्या है कि सब जब अपने ही आदमी है, तो किससे क्या कहा जाए? है तो यह सरासर गलत ही। यह क्या बात हुई कि एक ‘चुम्मा’, और वह भी उधार का। यानी उधार के चुम्मे के बदले में ‘यूपी-बिहार ले ले...’। कोई ऐसे क्यों ले लेगा। हम नहीं हैं क्या? एकदम पोल थोड़ी है। कोई ऐसे कैसे ले सकता है? इसी बात पर कोर्ट में मुकदमा दर्ज हो गया। सबको लाइन में लगा दिया। यह बात अलग है कि हमारे यहां नियम में भी नियम और उपनियमों के अनेक दाव हैं। कानून का खेल बड़ा है। यहां देर जरूर हो जाती है, पर अंधेर नहीं। अगर अंधेर होती तो कोई देने-लेने की बात करता ही क्यों? ऐसे ही लेन-देन नहीं हो जाता क्या? बिना बात के...। पंच काका करते हैं कि संयुक्त परिवार अच्छी बात है। इससे कभी मैं और कभी तुम का खेल चलता रहता है। ना इसकी बारी और ना उसकी बारी। हम ही हम है बारीबारी। आपस में मिल बांट कर खा लेते हैं। आप भले इसे बदलती राजनीति का खेल कहें। पर जनता टेस्ट बदलना चाहती है। हर रोज दाल खाने वालों को अब कुछ दूसरा टेस्ट मिलना चाहिए।

० नीरज दइया

22 मार्च, 2017

जाकेट की सर्दी और गर्मी

काफी दिनों से सोच रहा था कि मैं भी माननीय प्रधानमंत्री जैसी जाकेट खरीद लूं। जब अधिक इच्छा हो गई तो कीमत जान कर ही होश उड़ गए। उड़े हुए होश को जल्दी से संभाला और दुकानदार से बोला- प्रधानमंत्री जी को छोड़ो, किसी दूसरे किस्म की दिखाओ भैया। वह बोला- साहित्यकारों वाली दिखानी है या बाबाओं वाली। मैंने जिज्ञासावश कह दिया- दोनों ही दिखा दो। पास खड़ी श्रीमती जी कान के पास आ कर फुसफुसाई- बाबाओं वाली नहीं लेनी। आप लिखते हो इसलिए साहित्यकारों वाली जचेगी। मैंने मुस्कुरा कर हां की निगाहों से उसे देखा। उसके अधरों पर मुस्कान खिल उठी। मेरा मानना है कि कपड़े अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए ही हम पहनते हैं। दूसरों को अच्छे दिखने के लिए पहनने वाली साहित्यकारों वाली जाकेट की कीमत बजट में थी, सो खरीद कर हंसी-खुशी घर आए।
            अगले दिन जाकेट पहन कर आइने के सामने खड़ा हुआ तो लगा जाकेट में मैं नहीं कोई दूसरा दिखाई दे रहा है। सुंदर चीजें सभी को आकर्षित करती हैं। बहुत से मित्रों से मेरे जाकेट में जचने को स्वीकारा और मुझे बधाइयां मिली। न्यू पिंच का सुखद अहसास तब सौ गुना बढ़ गया जब हैडमास्टर ने पहले ही कालांश में आकर कहा- कैसे कहूं, क्या कहूं, कहूं या नहीं कहूं। बहुत सोच में पड़ गया हूं। मैं खुशी खुशी बोला- कहिए जो भी कहना है, आपको सब कुछ कहने का हक है। तब वे बड़े संकोच से बोले- आज क्या है कि फोटोग्राफर को बुलवाया है। हमारी प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के साथ फोटो खींची जानी है। अगर आपको बुरा नहीं लगे तो एक घंटे के लिए अपनी जाकेट दीजिए, फोटोग्राफर का फोन आ गया है कि वह आने वाला है। जीवन में अनेक मांगने वालों से वास्ता पड़ा था पर यह अनुभव पहला-पहला था। मैंने जाकेट उतारते हुए सोचा कि मैं कर्ण हूं और यह भगवान हैडमास्टर बन कर आया है। मैं संकोच में तो था कि जाकेट के चक्कर में शर्ट को ढंग से प्रेस नहीं किया था और जाकेट उतारते ही यह रहस्य भी खुलना था।
            एक घंटे का कह कर ले गए थे फिर दो घंटे में हो गए और वे लौटाने नहीं आए तो मैं खुद लेने पहुंचा गया। वे बोले- मैं तो भूल ही गया था। जाकेट आपसे अधिक मुझ पर फबती है। लिजिए आपकी जाकेट। और हां थेंक्यू। मैंने मुस्कुराते हुए अपनी जाकेट लेकर पहन ली। गनीमत रही कि शर्ट के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा। बुरा तो उसके अगले दिन हुआ जब मैं जाकेट पहन कर प्राथमिक विभाग से गुजर रहा था कि कुछ छोटे बालकों ने आ कर मुझे घेर लिया। पहले तो मैं समझ नहीं पाया कि माजरा क्या है। बच्चे मन के सच्चे होते हैं और उन्होंने सच्चाई जाहिर कर दी कि मैंने उनके हैडमास्टर जी का जाकेट क्यों पहन रखा है? बड़े बच्चे ऐसे सवाल करने वाले भोले नहीं होते, मैं भी कहां भोला था। मैंने बच्चों को यह कह कर टरकाया कि यह जाकेट मैंने हैडमास्टर जी की खरीद ली है। वे अब अपने लिए नई लाएंगे।
            पंच काका कहते हैं कि साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है। ये सर्दी-गर्मी को रोकने के लिए नहीं, बस ऐसी ही त्रासदियां भोगने और दिखाने के लिए होती हैं। समझ में नहीं आता कि लोग साहित्यकारों वाली जाकेट पहनते क्यों है? क्या बस दिखाने के लिए कि हमारे पास भी है या यह कोई ड्रेस-कोड है?

० नीरज दइया
 

18 मार्च, 2017

कविता का पंजाबी अनुवाद / अमरजीत कौंके

कैनेडा से निकलने वाली पत्रिका ‘‘पंजाब टुडे” के नए अंक में `भाषांतर’ में श्री अमरजीत कौंके द्वारा किए कविताओं के अनुवाद मेरी कविता भी शामिल हुई है। साथ अन्य कवि हैं- श्री मंगलेश डबराल, डा.अनीता सिंह, अन्नू प्रिया, डा. ऋतू भनोट, डा. संतोष अलेक्स, आशा पांडेय ओझा और ज्योति आर्य।
शुक्रिया पंजाब टुडे टीम और कवि मित्र कौंके जी
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ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ / ਨੀਰਜ  ਦਈਆ

ਮੈਂ
ਸੰਭਾਲ ਕੇ
ਰੱਖਿਆ ਹੈ
ਤੇਰਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ
ਗੁਲਾਬ

ਜਦੋਂ
ਤੂੰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ
ਉਦੋਂ ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਾਣਦਾ
ਉਸਨੂੰ ਲੈਣ ਦਾ
ਮਤਲਬ

ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਸੀ
ਮੈਂ
ਕਿ ਕਿਸੇ ਨੂੰ
ਵੀ ਮਿਲ ਸਕਦਾ ਹੈ
ਚਾਹੇ ਅਣਚਾਹੇ
ਕੋਈ ਵੀ ਗੁਲਾਬ

ਹੁਣ ਤੂੰ
ਮੇਰੀ ਆਤਮਾ ਦੇ
ਵਿਹੜੇ ਵਿਚ
ਗੁਲਾਬ ਦੇ
ਫੁੱਲ ਦੇ ਨਾਲ
ਜਿਉਂਦੀ ਹੈਂ

ਤੇ ਮੇਰੇ
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ
ਉਡੀਕ ਦੇ ਨਾਲ
ਵਗਦੀ ਹੈਂ......

हिंदी कविता 
शब्दों की नदी में

मैंने संभाल रखा है
तुम्हारा दिया हुआ-
गुलाब ।

जब तुमने दिया था
तब मैं नहीं जानता था
उसे लेने का अर्थ।

नहीं जानता था मैं
कि किसी को भी मिल सकता है
चाहे-अनचाहे अचानक
कोई भी गुलाब ।

अब तुम
मेरे अंतस के आंगन में
गुलाब के फूल के साथ जीती हो
और मेरे शब्दों की नदी में
इंतजार के साथ बहती हो ।
००००

17 मार्च, 2017

विकास का गणित

ह निर्विवादित सत्य कि है कि हर भी काम की तीन प्रतिक्रिया होती है। सिक्का उछालेंगे तो कभी अनिर्णय की स्थिति भी आ सकती है। सरल शब्दों में उदाहरण से बात करें तो जैसे मैं लिखता हूं, तो एक वर्ग कहेगा- क्या खूब लिखता है, दूसरा वर्ग कहेगा- बकवास लिखता है और तीसरा वर्ग ऐसा होगा जो कुछ नहीं कहेगा। जैसे उन्हें मेरे लिखने ना लिखने से कोई सरोकार नहीं हो। सकारात्मक और नकारात्मक के साथ यह जो मौन और निर्लिप्तता का भाव है, इसका हर जगह बड़े महत्त्व का है। राजनीति में तो कहना ही क्या! सत्ता सदैव वोटिंग पर चलती है। यहां एक पक्ष में बैठता है तो और दूसरा विपक्ष में। पक्ष किसी बात पर कहेगा- हां तो विपक्ष की मजबूरी है कि उसे कहना होगा- ना। और किसी काम के संदर्भ में विपक्ष कहेगा- हां तो पक्ष कहेगा- ना। दोनों एक साथ एक जैसा कुछ कह नहीं सकते हैं।
          सत्ता पक्ष कहेगा- देश विकास कर रहा है, तो विपक्ष का बयान आएगा- गर्त में जा रहा है। विकास और गर्त की अपनी-अपनी दिशाएं है। पर यह खेल जैसा है। क्यों कि कभी ऐसा नहीं हुआ है कि एक ने कुछ कहा और दूसरे ने सहमति में सिर हिलाया हो। लगता है कि हां और ना का कोई गणित है। जो सत्ता में होगा वह जो कुछ कहेगा, उसके विपरीत विपक्ष कहेगा। दोनों की यह त्रासदी है। जब से मैंने होश संभाला, देखा भारत प्रायः त्रासदी को झेलता रहा है। देश के विकास की गति कौन कैसे आंकता है? सबके अपने-अपने तर्क है। मैं भ्रम में हूं- कभी लगने लगता है कि सच में विकास हो रहा है। इसके साथ ही जब मैं दूसरे पक्ष की बात सुनता हूं तो मुझे वे भी ठीक लगते है कि देश गर्त में जा रहा है। मेरे अपने तर्क और पैमाने नहीं है। कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि देश दो दिशाओं में गति कर रहा है। विकास की दिशा में गति पक्ष को दिखाई देती है, और गर्त की दिशा वाली गति दिखने के लिए विपक्ष है। इसका अभिप्राय यह अवश्य है कि देश गतिशील है। देश की गति पर तो संदेह दोनों को नहीं है।
          इनके बीच एक तीसरा पक्ष मौन है। यह पक्ष जानबूझ कर मौन धारण किए है। हिरणां मून साध वन चरणा को निमंत्रण का इंतजार है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही निर्दलयी को कहते हैं- आ जाओ, आ जाओ। हमारे साथ आ जाओ। हमारी पार्टी में आ जाओ। किसी चुप्पी के बाद की ‘हां’-‘ना’ महत्त्वपूर्ण होती है। हमारे पक्ष का क्या होगा जिसे जनता-जनार्दन कहा है। हमें निमंत्रण बस चुनाव के समय मिलता है। वोट नहीं देना लोकतंत्र का अपमान है, अपमान पढ़े-लिखे लोग करते नहीं। हमारी कामना है देश विकास करे, आगे बढ़े। विकास की दिशा में सभी जुट जाएं। पर वोट जिन्हें नहीं मिलता, वे नाराज हो जाते हैं। वे सदा गर्त की दिशा का आकलन करते हैं। सत्ता में तीसरा मौनी-पक्ष कभी पटला खा सकता है। आफत मेरी है कि मुझे सभी का सुनना पड़ता है। पंच काका कहते हैं- सबकी सुनो। सबकी देखो और करो अपने मन की। किसी का मन भला बुरा कैसे हो सकता है, वह तो विकास की दिशा देखता है। देखना चाहता है। देश के कर्णधार भारतीय मन को समझ कर विकास की राह चलते चलेंगे तो बात बनेगी।
० नीरज दइया