17 जून, 2018

डॉ. नीरज दइया की तीन कविताएं-

घर वह घर नहीं है

पता तो वही है
घर वह घर नहीं है
जो था आपका
पिताजी !

नाम तो वही है
भाई पर भाई नहीं है
जो था आपके रहते
पिताजी !

घर जिस में आप रहते थे पिताजी।
भाई जिस में मैं था पिताजी।
पता ही नहीं चला
कव कैसे क्या हो गया...।

पुराने घर को गिरा कर
खड़ा किया नया घर।
पिताजी ! आपने बनवाया
वह घर अब नहीं है।
भाई कहता है- पुश्तैनी घर है।
इस घर के बारे में
अब मैं क्या कहूं पिताजी ?
००

कोई बात नहीं !

बहुत पुरानी हो गई
फिर भी अपनी मुस्कान लिए
दीवार पर सजी है-
तश्वीर पिताजी की।

सुबह-सवेरे वे रोज
भरते हैं मुझ में नया जीवन
घर से निकते समय देखता हूं उन्हें
जीवन की भागा-दौड़ में
सोचता हूं- इस रविवार को
तश्वीर साफ करूंगा।

काफी महीने हो गए
वह रविवार नहीं आया,
मैं ग्लानि से भरता हूं
फिर भी दीवार पर-
तश्वीर में पिताजी
मुस्कान लिए कहते हैं-
कोई बात नहीं !
००

अधूरी कविताओं के बारे में

मुझे कविताओं को सौंपा पिताजी ने
पर नहीं सौंपी मुझे
आपनी कविताएं।

कई कविताएं
जो सहेजती है मुझे
और जिन्हें सहेजता हूं मैं
नहीं लगी अच्छी
क्यों कि वे नहीं हो सकी
पूरी!

उन कविताओं के लिए
मेरा बड़ा दुख है
कि वे रह गईं हैं अधूरी।

जब-जब मैं बतियाता हूं उनसे
वे रोती हैं, साथ मेरे
उनकी पीड़ा परखने वाला
मेरे अतिरिक्त
कोई नहीं है।
कोई नहीं है अन्य !
००

05 जून, 2018

दो व्यंग्य संग्रह- डॉ. नीरज दइया / समीक्षा- रजनी मोरवाल

रजनी मोरवाल
पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
पंच काका के जेबी बच्चे
    व्यंग्य का अभिप्राय अमूमन हास्य, ताना, उपहास, मजाक, तंज़, त्वरित टिप्पणी या प्रतिक्रिया से लगाया जाता है, जिसके प्रभाव स्वरूप तिलमिला देने वाली प्रतिक्रिया उत्पन्न की जा सके। जबकि पारिभाषिक अर्थों में देखें तो अभिव्यंजना शक्ति द्वारा निकलने वाला अर्थ ही व्यंग्य होता है। डॉ. नीरज दइया की व्यंग्य कृति “पंच काका के जेबी बच्चे” इन तमाम पारिभाषिक अर्थों पर पूर्णतया खरी उतरती है। संग्रह में कुल 39 व्यंग्य हैं जिनमें पंच काका के माध्यम से वर्तमान युग की सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया गया है।
    संग्रह के पहले व्यंग्य में पंच काका का सवला हैं- “व्यंग्य क्या होता है?” और अंत में वे स्वयं ही कहते है- “ये शरारतियों का काम है।” पंच काका एक पात्र इजाद किया गया है जो लगभग सभी व्यंग्य में अपनी उपस्थित दर्ज कराते हुए जैसे अंतिम स्टोक लगा कर किसी बात को पूरा करते हैं। पंच काका नामक यह अनूठा पात्र कभी-कभी अपने मन की बात तो अधिकतर व्यंगकार के मन की बात करता है, किंतु इतनी मार्मिकता और कलाकारी के साथ कि स्वयं को उसमें गौण रखते हुए भी सतत विद्यमान है। पंच काका के माध्यम से इस व्यंग्य-संग्रह में गज़ब की किस्सागोई उत्पन्न हुई है।
    ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ संग्रह का शीर्षक प्रारम्भ से अंत तक उत्सुकता बनाए रखता है, मसलन प्राकृतिक बच्चे, परखनली बच्चे, सेरोगेट बच्चे तो सभी सुनते आ रहें हैं, किन्तु ‘जेबी बच्चे’ एक ऐसा अनूठा प्रयोग है जो संग्रह के अंत में जाकर अपना भेद खोलता है। दरअसल लेखक ने अपनी विचारशक्ति से इस अद्भुत शब्द का आविष्कार किया जो एक उपलब्धि के रूप में उनके नाम दर्ज किया जाना चाहिए। इस शब्द के साथ वे चुटकी लेते हैं कि जेब से उत्पन्न होने वाले बच्चे ‘जेबी बच्चे’ कहलाते हैं जो कि इस अवसरवादी, महत्वकांक्षी और पैसों की दुनिया में जेब से पैदा होते हैं।
    व्यंग्य ‘गुट, गुटका और गुटकी’ में नीरज दइया साहित्य की उठा-पटक पर तंज़ कसते हुए कहते हैं कि “गैर गुट वाले गुटका-गुटकी के नशे में लडखडाते हैं, साहित्य के ऐसे सूरमाओं के मुख पर ऐसे-ऐसे विशेषण और आप्त कथन आते हैं कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं, दो-चार गुटकी भरते ही वे पीढ़ियों तक को सुशोभित करते हुए ज्ञान के घोड़े पर सवार हो जाते हैं।” विषयानुरूप सहज-सरल भाषा में डॉ. दइया पाठकों से सीधा संवाद करते हैं और यही उनका वैशिष्टय है जो पाठकों को जोड़ता है।
    व्यंग्यों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि दइया किसी बात में से बात निकालने की खूबी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि हर बात से व्यंग्य नहीं निकालता और यदि व्यंग्य के लक्षण मिल भी जाएं तो उसे साहित्य के रूप में ढालने से पूर्व कठिन तपस्या करनी पड़ती हैं। वे तमाम बातों के सागर से उस सीप को खोज लाते हैं जिस में मोती होता है, फिर उसी मोती पर व्यंग्य केन्द्रित करते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। वे निरंतर इस विधा के अनुशासन में रहते हुए अपने मंतव्य पर दृष्टि गढ़ाए रहते हैं।
    ‘सर्वश्रेष्ठ वाद-अवसरवाद’ व्यंग्य के बहाने समाज में बढ़ती अवसरवादी प्रवृति पर डॉ. दइया लिखते हैं- “अवसरवाद सिद्धांत के अनुसार दिल खोलकर दिखावा करो, दिखावा करने से ही अवसर मिलते हैं। किस अवसर के लिए तेल कौनसे ब्रांड का खरीदना है यह महत्त्वपूर्ण है। तेल, साबुन क्रीम से आपकी हैसियत का पता चलता है और गेंहू, दाल, चावल तो आपके पेट में चले जाते हैं।” बेहद सधा हुआ व्यंग्य और यथार्थवादी भी।
    ‘डिज़िटल इंडिया’ और ‘दाढ़ी रखूं या नहीं’ के माध्यम से उन्होंने सोशल मीडिया पर समय के दुरुपयोग पर कटाक्ष किया है तो वहीं देश में बिजली की समस्या को आधार बनाकर ‘डिजिटल इंडिया’ और विकास के नारे पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाया है। सरकारी नीतियों के कारण स्कूलों में हर क्रियाविधि की सूचना कार्यालय को सबूतमय भेजनी पड़ती है, शिक्षक पढ़ाने से अधिक बच्चों के संग सेल्फी लेते नज़र आते हैं ‘बच्चे के संग सेल्फी’ व्यंग्य के द्वारा उन्होंने नई शिक्षा नीति पर बड़ी गंभीरता से करारा व्यंग्य ढूंढा है। ‘टारगेटमयी मार्च’ के द्वारा वे काम के बढ़ते बोझ से उत्पन्न तनाव पर निशाना साधते हैं कि कैसे एक निश्चित समयावधि में टारगेट और आंकड़ों की जद्दोजहद में फंसे कर्मचारी मानसिक व शारीरिक रूप से बढ़ते तनाव की वजह से जूझते हैं।
    ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो संग्रह से दिए जा सकते हैं, हर रचना में पंच काका के पंच हैं, व्यंग्य के ये तीर दरअसल नीरज दइया द्वारा ही छोड़े गए हैं जो अपने गंतव्य पर पहुंचकर लोगों को गुदगुदाते तो हैं साथ ही बढ़ी गंभीरता से अपनी बात का असर भी छोड़ जाते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि व्यंग्य महज़ हास्य बनकर न रह जाए इसीलिए वे अपने व्यंग्यों में बिम्ब, प्रतीक, वक्रता के साथ-साथ भाषा की सहजता व सरलता पर भी ध्यान देते हैं और यही विशेषताएं उनके लेखन को समृद्ध बनाती हैं।
००००
टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
टांय टांय फिस्स
    व्यंग्य संग्रह “टांय टांय फिस्स” अपने अनूठे शीर्षक से प्रभावित करता है। यूँ तो आम मायनों में इसका अर्थ होता है- जिसका परिणाम कुछ न निकले, किंतु व्यंग्य संग्रह की 40 रचनाओं को पढ़कर लगता है कि जैसे किसी खजाने की कूंची हाथ लग गई हो। लेखक नीरज दइया ने ऐसे-ऐसे वाक्यों का प्रयोग करते हुए कुछ नए मुहावरे भी गढ़े हैं कि व्यंग्यकार के रूप में उनकी छवि यादगार कही जा सकती है।
    व्यंग्य में अपनी उत्कृष्ट भाषा शैली से नीरज दइया छोटी से छोटी बात को भी वे इस ढंग से चुटीला बना देते हैं कि बात के नए अर्थ उभरकर पाठकों के सामने आते हैं। यह इसलिए भी है कि वे राजस्थानी भाषा और जिस लोक से जुड़े हैं उनका व्यंग्य में एक नया ‘फ्लेवर’ उन्हें अन्य व्यंग्यकारों से भिन्न और कुछ खास भी बनाता है। उनका विशद अध्ययन है जिससे समसामयिका के साथ अनेक प्रसंग और ब्यौरे उनकी रचनाओं को तो समृद्ध बनाते हैं। व्यंग्यों में जिस ‘पंच काका’ नामक अनोखे किरदार को गढ़ा है वे काका यहां भी अपने पंच छोड़ते हुए सतत विद्यमान हैं । इस संग्रह में कुछ नए पात्र- फन्ने खां, स्वामी चेतानानंद, आदि आचार्य श्री बैगनाचार्य आदि हैं जो व्यंग्य को आगे बढाने में सहायक प्रतीत होते हैं। 
    इन रचनाओं से गुजरते हुए लगता है कि नीरज दइया जानते हैं कि देश के माहौल, परिवार, साहित्यिक गतिविधियों, लेखकों, स्कूल, समसामयिक घटनाओं, चर्चाओं, बातों, कार्यस्थल व भिन्न-भिन्न स्थानों पर किस तरह अपनी सहमति-अहसमति के द्वंद्व में व्यंग्य का मौका मिल सकता है। उनकी अनेक रचनाओं में व्यंग्य के साथ कोई न कोई गंभीर संदेश होता है जिसे वे शब्दों की आड़ लेकर बेहद करीने से पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य हास्य तो उत्पन्न करते ही है, साथ ही नैतिक मूल्यों की पैरवी भी करते हैं।
    नीरज दइया विभिन्न विषयों से पाठकों को हतप्रभ करते चलते हैं। कागज के दुश्मन, कुंवारे-कुंवारियों की धमाचौकड़ी, हम सबकी गति एक, वी.आई.पी. कल्चर, बाबाजी के चेलों खूब खाओ बैंगन, खुल्ले मिलेंगे क्या, काला धन देश में पकड़ा, ई-होली हुडदंग आदि अनेक ऐसे व्यंग्य हैं जहाँ वे समसामयिक समस्याओं पर करारा प्रहार करते हैं। पूरा संग्रह ही व्यंग्य से सराबोर है किन्तु कुछ उदहारण जो मुझे निजी रूप से सुंदर पंच लगे उनमें से चयनित पांच पंच प्रस्तुत है-
कागज के दुश्मन- ई-युग ने डाक-डाकिया को परमानेंटली फ्री कर दिया।
हम सबकी गति एक- जहाँ बूढे दादाजी के मरने पर परिवार वाले फूट-फूटकर रोते हैं, वहीँ घर में कन्या के जन्म पर रोनी सूरत बनाए रखते हैं, बेटा हो या बेटी सबकी गति और दिशा एक ही होनी चाहिए।
जाकेट की सर्दी-गर्मी- साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है, ये त्रासदियाँ भोगने के लिए नहीं दिखाने के लिए भी होती है , क्या जाकेट साहित्यकारों का कोई ड्रेस कोड बन गई है ?
होमवर्क, स्कूल और पेरेंट का त्रिभुज– यह एक गणित है और इस त्रिभुज में टोटल तनाव वही का वही रहता है अब यह आपकी मर्ज़ी है कि इसे कब, कहाँ व कैसे भोगना है ?
वी आई की खान भारत- ये सब नाटक है ढकोसला है, दुनिया एक रंगमंच है और हम इसकी कठपुतलियाँ, कब-कौन-कैसे उठेगा ये कोई नहीं जानता...बाबु मोशाए ...वी आई पी की खान भारत तो गया...अब मुठ्ठी भर पूर्व वी आई पी सारे नवजात वी आईपियों को मारेंगे।
    डॉ. नीरज दइया की भाषा की कलात्मकता और कसावट के साथ वैविद्ध्यपूर्ण विषयों पर लिखते हुए गुणवत्ता से व्यंग्य का मंतव्य साधते हैं। अपने गंभीर-चिंतन सूक्ष्म सर्वेक्षण, व्यंजनामूलक विशिष्ट जीवन दृष्टि द्वारा समाज में फैली विद्रूपताओं पर चोट करने के निर्भीक प्रयास में वे शत-प्रतिशत खरे उतरते हैं। पंच काका का आशीर्वाद तो उनके साथ है ही। कृति “टांय टांय फिस्स” में उनकी पहचान को और अधिक पुख्ता धरातल मिलता है। आशा है वे एक प्रखर व्यंग्यकार के रूप में नए-नए आयाम गढ़ते रहेंगे।
०००००
रजनी मोरवाल, 
23/97 “आर्ष”, स्वर्ण पथ, मानसरोवर, जयपुर 302020
मोबाइल-09824160612

नहाना-धोना / डॉ. नीरज दइया

पको जानकर बिल्कुल हैरानी नहीं होगी कि हमारे जीवन का सार बस ‘नहाना-धोना’ ही है। आप तो मुझे ऐसे देखने लगे हैं, जैसे आपको हैरानी हो रही है। चलिए मुझे अपनी बात को बदल कर कहना चाहिए- आपको जानकर बहुत हैरानी होगी कि हमारे जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ है। कमाल हो गया साहब, जब मैं कहता हूं कि हैरानी नहीं होगी तब हैरान होते हैं और जब हैरानी होगी कहता हूं तो हैरान होना छोड़ देते हैं! आप तो यह भी नहीं जानते कि कब हैरान होना है और कब नहीं होना है। बेशक आप जानते होंगे पर मैं तो यही कहूंगा कि नहीं जानते हैं। किसी के जानने या नहीं जानने या फिर होने या ना होने से भी ज्यादा जरूरी मेरा कहना है। जब मैं खुद ही मेरे कुछ कहने को जरूरी नहीं मानूंगा तो दूसरे भला क्यों मानेंगे? क्यों मैं ठीक कर रहा हूं ना?
    पहले आप मन में अच्छे से यह फैसला करें कि आपको हैरानी है अथवा नहीं है। अरे यह बात भी भूल गए, मैं पूछ रहा हूं कि नहाने-धोने की बात पर आपको हैरानी है अथवा नहीं है? वैसे आपके हैरान होने अथवा नहीं होने के अतिरिक्त भी एक तीसरी स्थिति है आपकी संवेदनहीनता। यानी आपको कुछ पता चल रहा है अथवा नहीं चल रहा इसका कोई फर्क नहीं पड़ता। आप ही से मैं पूछ रहा हूं- क्या आप अब भी जिंदा है? यह कोई बेहूदा सवाल नहीं है। जीवन और मृत्यु के विषय में अब भी बहुत सारी भ्रांतियां हैं। इसका कारण हमारा होना और नहीं होना दोनों का बहुत पास-पास होना है। इतना पास-पास कि क्षण भर में और कहें उससे भी कम समय में हम कभी भी इधर से उधर जा सकते हैं। ‘गीता’ कहती है कि जीवन बार-बार वस्त्र बदलता है। अभिप्राय यही है कि जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ ही है। कुछ को नहाने-धोने की जल्दी लगी रहती है। जब फिर फिर नहाना-धोना है तो डरना कैसा!
    कुछ लोग चिंतन करते हैं कि जीवन इतने वर्षों से चल आ रहा है और चलता जा रहा है। यहां इतने लोग जन्में और मरे, पर नतीजा क्या निकला? सभी इधर से उधर और उधर से इधर चले आ रहे हैं। यह कोई निरा उपदेश नहीं है भैया। मैं आपसे बतियाने के चक्कर में पंच काका के बारे में बताना ही भूल गया। अगला-पिछला जीवन तो याद नहीं पर इस जीवन को तो याद रखना है। मैं घर में हूं और मेरे काका-काकी मुझे बहुत प्यार करते हैं। काका आज सवेरे से ही गार्डन में खोए हैं। मैंने सोचा लौट आएंगे पर बहुत देर लगा दी तो मुझे चिंता होनी चाहिए कि नहीं। मैं उन्हें देखने पहुंचा तो वे घास-फूस में कुछ ढूंढ रहे थे।
    मैंने पूछा- काका, यहां क्या खोजने लगे हो? उन्होंने गर्दन उठाई और बोले- कोई जड़ी-बूंटी खोज रहा हूं। तुझे बताया था ना कि तेरी काकी को जवान करूंगा और फिर हनीमून। इतने में भीतर से काकी चिल्लाई- अरे इतनी देर कर दी, आज नहाना-धोना नहीं है क्या?
    देखिए आप को फिर से थोड़ी हैरानी हुई है। नहीं हुई तो आप ठीक से खुद को समझ नहीं पा रहे हैं। आप को पता ही नहीं चलता कि आपके भीतर-बाहर क्या हो रहा है। आप वही है जो मैंने कहा- संवेदनहीन। आपको संवेदनहीन कहने से आपकी संवेदनाएं जाग गई है और मुझ पर गुस्सा होने लगे हैं। अपना गुस्सा कंट्रोल कीजिए। सेहत के लिए गुस्सा अच्छा नहीं होता है। पता नहीं कितनी-कितनी बीमारियों ने आपको घेर रखा है। ऐसे गर्दन हिलाने से कुछ नहीं होगा। आप बीमार हैं या नहीं, आपको कहां पता है। आपके कहने से कुछ नहीं होता। पांच सौ रुपये देकर चैक-अप कराओ। देखिए कितनी कितनी बीमारियां हैं आपको। पांच हजार के कुछ टेस्ट कराने की फीस बड़ी है या आपका जीवन? पैसा तो क्या है, आपके हाथ का मैल ही है। आप तो जानते हैं- मैल बीमारी की जड़ है। इसी जड़ को हम खत्म करना चाहते हैं। नहाना-धोना भी असल में मैल-मुक्ति है और हमारी काकी जी इसके लिए चिल्ला रही हैं। अब आप मुस्कुराने लगे...... तो क्या आप सही में संवेदनहीन नहीं है? आपमें संवेदनाएं बची हुई है। अरे वाह, आप अब भी जिंदा है!
    अब तो मेरा आपको बस यह बताना शेष है कि पंच काका पागल है। उनसे यह कहना नहीं कि मैंने उन्हें पागल कहा है। लोग क्या बस इधर-उधर ही करते रहते हैं। वे सोचते हैं जीवन का असली आनंद इधर-उधर करने में है। यहां सब कुछ देखा-भाला है और पुरानी चीजों को नए-नए ब्रांड के रूप में बेचते हैं। नया कुछ भी नहीं है। आप और हम सभी, नहा-धो कर फिर से फिर फिर कर आएं हैं। यह जो गार्डन में जड़ी-बूटी ढूंढ़ने का नाटक कर रहे हैं, बहुत पहुंचे हुए आदमी है। कहते हैं कि जवान करने का नुस्का ढूंढ़ रहा हूं, तेरी काकी को जवान करूंगा... ठीक कहा था ना इन्हें मैंने पागल, अरे अगर काकी जवान हो गई तो लोग कहेंगे- बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम। नहीं कहेंगे क्या? और हां, मैं यह कहना तो भूल ही गया कि आप संवेदनशील हैं।
००००


20 अप्रैल, 2018

नाक का बांका बाल / डॉ. नीरज दइया

    साहब के आगे बाबू ने एक पत्र किया और बोला- इसका क्या करना है.... साहब ने इस आग्रह पर गौर फरमाते हुए पत्र पर एक सरसरी दृष्टि डाली और बोले- अरे ! मैंने तो इसे पढ़ा नहीं, तुम्हीं बताओ क्या है? बाबू ने साहब को बताया- हेड ऑफिस में इसी महीने आठ तारीख को अधिकारियों की एक कार्यशाला होनी है। जिस में आपको ‘नाक का बांका बाल’ विषय पर व्याख्यान देना है। साहब सोच में पड़ गए। यह भी क्या अजीब सा विषय दिया। प्रत्यक्ष में बोले- हां तो तुम डीएफए तैयार करो। बाबू ने अपनी सीमाओं को उल्लेखित किया तो साहब ने तत्काल अर्जेट मिटिंग रख दी और बाहर चपरासी को बता दिया किसी को अंदर नहीं आने दिया जाए।
    ऑफिस के खास खास कर्मचारी मंत्रणा के लिए साहब के कमरे में पहुंच गए और बाहर पहरेदार चपरासी ने रटा-रटाया हुआ जुमला- ‘साहब बीजी है, अर्जेंट मिटिंग ले रहे हैं।’ मुंह में दबा लिया, जिससे कोई भी आए या पूछे तो तुरंत जबाब दिया जा सके। साहब बड़े नेकदिल और नियम पसंद आदमी है इसलिए ऑफिस बड़े ढंग से चलता है। ऐसे साहब अगर हरेक ऑफिस में हो जाए तो देश ढंग से चलने लग जाए। मिटिंग में देश के ढंग से नहीं चलने के सबूत पर चर्चा हो रही थी। बड़े बाबू कह रहे थे कि देश अगर ढंग से चलता तो यह गलत विषय साहब तक नहीं आता। विषय में बदलाव बिना हेड ऑफिस की मंजूरी के हो नहीं सकता और अगर विषय केवल ‘नाक का बाल’ होता तो सरलता रहती। अब समस्या यह है कि नाक का बाल बांका है, जिसके बांकपन से छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। हिंदी अधिकारी अपना ज्ञान दे रहा था कि सर, जरूर कुछ मिस्टेक हुआ है। यह कोई दूसरा विषय होगा- ‘बाल तक बांका न होना’ उसमें से यह बांका सब इधर सिफ्ट हो गया है। जैसे हम समस्या से परेशान हो रहे हैं वैसे ही कोई दूसरा ऑफिस भी समस्या में होगा। जाहिर है उन्हें विषय मिला होगा- ‘बाल तक न होना’। सर आप अपने जानकारों को फोन पर बात कर पूछिए कि उन्हें क्या क्या विषय मिला है।
    साहब जरा बिदक गए- इसमें दूसरों को फोन करने वाली कौनसी बात है। जिसे जो मिला है उसे उसी पर काम करना होता है। आप लोग यहां मेरे सामने इतना बोल लेते हैं, आपको खबर होनी चाहिए कि हम हमारे उच्चाधिकारियों से ऐसे चपर-चपर थोड़ी कर सकते हैं। ‘बाल तक न होना’ की तुलना में ‘नाक का बांक बाल’ विषय जरा टेढ़ा है। बाल तक न होना तो सीधा-साधा है कि गंजेपन के बारे में बात करनी है। साहब में डबल एओ साहब की तरफ देखा जो नाक में अंगुली डाले ना जाने किस कार्य में व्यस्त थे।
    वे स्थिति को भांपते हुए जरा चौंक कर बोले- यह सब आपके बस का रोग नहीं है छोटे बाबू। अगर होता तो खुद ही कुछ ना कर लिए होते। साहब ने हाथ के संकेत से उन्हें रोका तो वे कहने लगे- साहब आप पहले चाय-नाश्ते का बोलो, तभी कुछ दिमाग चलेगा। भूखे भजन ना होत गोपाला। साहब कैसे भी हो एकाउंट वाले उन्हें अज्ञाकारी बना ही लेते हैं। डबल एओ साहब का मान रखते हुए साहब ने झटपट व्यवस्था के लिए आदेश जारी किए। फिर मिटिंग में जोश आना ही था। डबल एओ साहब बोले- सर इसके लिए एक पैनल बना देते हैं जो कुछ खोज खबर करेगा फिर जो रिपोर्ट आएगी उसको नोटसीट पर ले लेंगे और हमारा काम बन जाएगा। कोई भी काम हो उसे विधिसम्मत करने से बाद में परेशानी नहीं आती। नहीं तो बाद में यह मुद्दा बनेगा कि हमने तो नाक के दाहिने भाग बाले बांके बाल का लिखा था और अपने बाएं भाग वाले बाल की चर्चा कर दी है। ऐसे ओब्जेक्शन में यह भी ध्यान रखें कि बाल कितना बांका है यह इस पत्र में स्पष्ट नहीं लिखा है। सर, एक बात गौर की आपने.... देखिए इस लेटर में बाल की लेंथ के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया है।  
    साहब चहकते हुए बोले- यही तो मैं कहता हूं कि हेड ऑफिस में सारे मूर्ख भरे पड़े हैं। क्या करते हैं और क्या नहीं करते हैं कुछ मालूम नहीं चलता। देश में वैसे ही इतनी अफरा-तफरी है ऐसे में नाक जैसे संवेदनशील मुद्दे को टच ही क्यों किया जाए। देखना ये नाक बड़ा इश्यू बन जाएगा। स्टेनो जो अब तक चुप चाप बैठी थी ने हस्तक्षेप किया और बोली- सर, मेरे ध्यान में हमारे शहर में एक लेखक है जो लिखता-पढ़ता है। आप कहें तो उन से बात करें। अच्छा रहेगा कि उनसे ही लिखवा लें।
    ‘गुड, वेरी गुड।’ और साहब ने कहा- ‘ओके, काम बन गया। ऐसा करो पैनल में ये जो है लेखक उसका नाम डाल कर फाइल पुट अप कीजिए। साथ ही एक मिटिंग भी प्रपोज कर देना।’ सब कुछ साहब के आदेशानुसार हुआ। लेखक महाश्य पधारे और अपने विशद ज्ञानी होने का प्रमाण भी उन्होंने प्रस्तुत कर दिया। अफिस के सभी कर्मचारी तो कर्मचारी साहब भी उनके ज्ञान का लोहा मान गए। लेखक महाश्य ने बताया कि नाक के बाल अगर बांके नहीं हो तो नाक के रास्‍ते से धूल और दूसरी गंदगी सीधे फेंफड़ों तक पहुंच जाती है। ऐसे में सीधी बालों की तुलना में बालों को बांका रखा जाना चाहिए। यह विषय बड़ा सोच-समझ कर दिया गया है। कोई रचनात्मक रुचि सम्पन्न अधिकारी रहा होगा जिसने यह विषय रखा है। बांका बाल सौंदर्य-शास्त्र का विषय है। वैसे दूसरा पक्ष भी देखिए अगर बाल बांके होंगे तो वे नाक में एडजेस्ट हो जाएंगे और बढ़ने पर भी आपको या फिर हमको शर्मिंदा नहीं करेंगे। 
    लेखक महाश्य ने नाक के बालों की ट्रिमिंग के अनेक तरीकों को आजमाने की सलाह भी नोट करवा दी। हैरत तो साहब को तब हुई जब लेखक महाश्य ने बताया कि 'हेयरी नोज़' नामक एक फिल्म चीन में  बनी है जो वायु प्रदूषण के मुद्दे को उठाती हुई शहरी चीनियों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर रही है। साहब ने माना कि सरकारी लोग बस सरकारी होते हैं। ये लेखक किस्म के गैर सरकारी लोग ही सही सूचनाएं रखते हैं। अब देखिए ना इतनी बड़ी सूचना हमें नहीं थी। लेखक महाश्य अगर नहीं बताते तो हमें मालूम ही नहीं चलता कि पिछले साल 'नेचर' पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें चीन में प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या 13 लाख बताई गई थी।
    फिर क्या था साहब के लिए ‘नाक का बांका बाल’ एक नियत मानदेय पर तैयार हो गया। साहब ने अपने बड़े साहब को यह ब्रीफ बताने का विचार किया। उन्होंने सोचा कि मैं बताता हूं कि ‘हेयरी नोज’ फिल्म में बहुत सारे स्टाइलिश चीनी लोगों और एक कुत्ते को दिखाया गया है। जिन्होंने 'बदबूदार, दमघोंटू हवा और कभी ख़त्म न होने वाली धुंध' के बीच जीने का तरीका नाक के लंबे बालों के जरिए ढूंढ़ निकाला है। तो बड़े साहब को झटका लगेगा। साहब मन ही मन में मुदित होते सोचने लगे इस बार तो उन्हें बोलना ही पड़ेगा- कमाल कर दिया है तुमने। रियली यू आर ग्रेट। ये ‘नाक का बांका बाल’ बस तुम्हीं सीधा कर पाए हो। दूसरों को देखो, नोनसेंस। इतनें में बाबू आया और उत्साह के साथ बोला- सर, आठ तारीख वाली कार्यशाला केंसिल हो गई है।... साहब ने उसके हाथ से कागज लिया और यह देखा तो उनका उत्साह ठंडा हो गया।
००००

15 अप्रैल, 2018

हर समस्या का समाधान है नई समस्या

नीरज दइया
    मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सभी जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बात बिल्कुल छोटी सी है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह एक बेहतर स्थिति है। इससे आप भी मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र रहा है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं।
    हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि जो हम नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो हमने दिया और हम पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। हमें प्रर्दशन बिल्कुल पसंद नहीं है और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
    अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में जरा कंजूस-सा हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ स्थानांतरित हो जाएगी। अस्तु आप थोड़े में संतोष करें। संतोषी सदा सुखी होते हैं। मैं मेरी समझ का शेष पूरा भाग मेरे पास रखना अपना अधिकार मानता हूं। देखिए ना बाज वक्त मेरी यह समझ मेरे और आपके काम आनी है। हां, तो जैसा कि मैंने कहा लोहा लोहे को काटता है, यह हमारा आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में बहुत से लोग हरदम रोते ही रहते हैं।
    अब बेरोजगारी की समस्या की ही बात करते हैं। असल में हमें हमारी मूल समस्या का पता नहीं है और हमारे नेता यह अच्छे से जानते हैं कि जैसे लोहा लोहे को काटता है ठीक वैसे ही समस्या समस्या को काटती है। बस हमने हमारी एक समस्या को काटने के लिए दूसरी और दूसरी को काटने के लिए तीसरी समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है। अब हमारे यहां समस्याओं का एक अम्बार बन गया है। समस्या समस्या को काटती है की तर्ज पर बहुत से प्रयोग किए गए हैं। अब चुनाव की बात करें तो पार्टी पार्टी को काटती है।
    वैसे हमारी हर समस्या से भी देश में खुशहाली बढ़ी है। सुनने में तो बेरोजगारी की समस्या बड़ी लगती है पर इसी की बदौलत कितने ही लोग रोजगार पा रहे हैं। इसी बेरोजगारी से तो हमारी सरकार भी माला माल हो रही है। चार पोस्ट निकालती है और उसके लिए फार्म और फीस के नाम पर वारे न्यारे हैं। अब फार्मों के अंबार की समस्या जब आई तो सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जिनके लिए यह ऑन लाइन समस्या है उनके लिए भी हम किसी दूसरी समस्या का इजाद करेंगे। अब सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। इससे पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी अंत हुआ कि नहीं हुआ? बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल गर्दन नहीं हिलानी है। झूठ और सच में अंतर करना सीखो भाई। अब समय आ गया है कि सच को सच कहें और झूठ को झूठ।
    चलिए जो मन में है उसे कहना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं। जब वे कुछ छुपा कर नहीं रखते तो हम और तुम यानी आम आदमियों की औकात ही क्या है। सच में अब सभी को अपने अपने मन की बात कहनी चाहिए। समस्या यह है कि मन की बात कहना कठिन है।
    पंच काका का तो मानना है कि गोपियों की भांति हमारे मन को कोई कृष्ण ले गया है। हम बिना मन वाले भला मन की कोई बात कह ही कैसे सकते हैं। याद रखना किसी झूठ पर गर्दन हिलाने से पहले नेक-प्रोब्लम और बाद में नोज-प्रोब्लम हो सकती है।
===