06 जुलाई, 2018

शब्द संस्थान सूरतगढ़ द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘कागद की कविताई'

साहित्यकार बोले- राजस्थानी भाषा के लिए कवि कागद के प्रयासों से युवा वर्ग ले प्रेरणा

सूरतगढ़| ओमपुरोहित कागद राजस्थानी व हिंदी जगत के लोकप्रिय रचनाकार थे। उन्होंने नवोदित रचनाकारों के प्रोत्साहन...

सूरतगढ़| ओमपुरोहित कागद राजस्थानी व हिंदी जगत के लोकप्रिय रचनाकार थे। उन्होंने नवोदित रचनाकारों के प्रोत्साहन के लिए किया गया ‘थार सप्तक’ का संपादन राजस्थानी साहित्य के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने योग्य है। यह बात वरिष्ठ समालोचक डॉ. नीरज दैया ने गुरुवार को ग्रामोत्थान स्कूल प्रांगण में कागद जयंती समारोह में बोलते हुए कही। उन्होंने कहा कागद की कविताएं शीर्षक से पांडुलिपि तैयार की है, जो जल्द ही पाठकों तक पहुंचेगी। समारोह में संभाग के वरिष्ठ रचनाकार शामिल हुए। साहित्यकार मोहन आलोक की अध्यक्षता में हुए समारोह में कागद की धर्मप|ी भगवती पुरोहित अतिथि के रूप में मौजूद थीं। डॉ. हरिमोहन सारस्वत ने कागद की राजस्थानी व हिंदी रचनाओं का वाचन किया। महेंद्रसिंह शेखावत ने स्मृति में रचित कविता पढ़ी। वक्ताओं ने कागद के रचनाकर्म के साथ उनके व्यक्तित्व पर संस्मरण सांझा किए। पत्रकार करणीदानसिंह राजपूत, संदेश त्यागी, डॉ. मदनगोपाल लड्ढा, राजूराम बिजारणियां, नवनीत पांडे, हरीश हैरी, सतीश छींपा, नरेश मेहन ने कागद के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू संस्मरण के माध्यम से बताए। साहित्यकार मोहन आलोक ने कहा कि राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए कागद ने अनूठे प्रयास किए थे, जिनसे प्ररेणा लें। भगवती पुरोहित ने आयोजन के लिए आभार जताते हुए कागद की स्मृति में रचित कविताएं प्रस्तुत की। कागद पुत्री भारती व अंकिता पुरोहित भी समारोह में मौजूद थीं। समारोह में डॉ. अरूण सहरिया, सुरेंद्र सुंदरम, विनोद वर्मा, प्रहलादराय पारीक, आशा शर्मा, सुमन शेखावत, जयश्री सारस्वत, दिनेश चंद्र शर्मा, लाजपतराय भाटिया, नरेश रिणवा, नरेश वर्मा, अनिल धानुका, रमेश माथुर शामिल हुए। संचालन आकाशवाणी के वरिष्ठ उदघोषक राजेश चड्ढा ने किया। गोपीराम गोदारा ने आभार जताया।

05 जुलाई, 2018

कागद हो तो हर कोई बांचे / डॉ. नीरज दइया

    कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ (05 जुलाई, 1957 - 12 अगस्त, 2016) के ब्लॉग का नाम है- ‘कागद हो तो हर कोई बांचे’। यह आज से करीब दस वर्ष पहले 2009 में जब बनाया था, तब उनके साथ मैं था। चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचे की तर्ज पर रखे इस शीर्षक में ‘भाग ना बांच्या जाय’ की व्यंजना आज अधिक व्यापक रूप में समझ आती है। कागदजी भाग्य बांचना भी जानते थे, लेकिन उन्होंने सदा कर्म पर ही विश्वास किया। वे एक आदर्श शिक्षक के रूप में अपना सामाजिक दायित्व निभाते हुए समाज में रचनाकार के रूप में भाषा, साहित्य और संस्कृति की अलख जगाते रहे। वे गीता के ज्ञान को आत्मसात किए निरंतर कर्मशील रहते हुए साहित्य-समाज में खोए रहे। राजस्थान शिक्षा विभाग में उन्होंने एक चित्रकला-शिक्षक के रूप में सेवाएं देते हुए, शैक्षिक प्रकोष्ठ अधिकारी पद तक का सफर किया।
    दो अवधारणाएं परस्पर विरोधी हैं। एक कहती है कि इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति कवि होता है। हरेक के पास कवि-मन है। ऐसा मन जिसका परिष्कार संभव है। दूसरी अवधारणा के अनुसार कवि जन्मजात होते हैं। वे बनाएं नहीं जाते। कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा को साहित्य-शास्त्र में अपने ढंग से समझाया गया है। कागद हो तो हर कोई बांचे में जो पठनीयता का भाव है वह सपाट बयानी किंतु संवेदनशीलता से पोषित है। बहुधा ऐसा भी होता है कि किसी एक कवि का चेहरा दूसरा कवि धारण कर लेता है। कहीं अंशिक साम्य और विरोधाभाव के साथ कविता-यात्रा के आरंभ में प्रत्येक कवि का संघर्ष खुद का व्यक्तिगत चेहरा निर्मित करता रहता है।
    कविता के क्षेत्र में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ एक ऐसा चेहरा है, जिन्होंने तीस  वर्षों की सतत साधाना से अपना व्यक्तिगत चेहरा निर्मित किया है। यह ऐसी निर्मिति है जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता। चार हिंदी और आठ राजस्थानी कविता-संग्रह ओम पुरोहित ‘कागज’ के प्रकाशित हुए हैं। अनेक कविताएं अब भी अप्रकाशित हैं। सही अर्थों में बड़ा कवि वही होता है जो अपनी विशिष्टताओं का दंभ नहीं पालता। ऐसे अनेक कवियों के बीच कागद जी हमें बराबर अहसास कराते रहे हैं कि वे कवि तो हैं पर किसी दूसरे लोक के प्राणी नहीं हैं। उनका जीवन इतना सहज और सरल रहा कि उनकी सहजता-सरलता के रहते बहुत बार वे कवि-रूप में अस्वीकार किए गए थे। किंतु कवि कागद को भी जैसे कवि होने से जरूरी नेक आदमी होना ही सदा मंजूर रहा।
    हम सब के बीच कागद जी एक सामान्य इंसान की भांति सखा भाव में रहते रहे। कभी उन्हें उग्र या प्रतिरोध की मुद्रा में आक्रोशित होते हुए नहीं देखा गया। उनके भीतर स्वाभाविक रूप से एक कवि  था, जो बेहद विनम्र, सौम्य, शांत, सरल था। ये वे गुण थे जिनसे वे हर किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। वे सदा संयमित होकर जीवन-राग की बातें किया करते थे। बहुत बार मैंने पाया कि वे बहुत कुछ भीतर छिपा कर भी बाहर सर्वानुकूल और सहजता धारण किए रहते थे।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ के समग्र साहित्य का अवलोकन करें तो वे भाषाओं के बंधनों से परे ऐसे भारतीय कवि के रूप में लगते हैें। हिंदी और राजस्थानी भाषा महज एक माध्यम है। वे हमारे मनोभावों और अनुभूतियों को वाणी देने वाले प्रमुख कवि हैं। अकाल और कालीबंगा पर आधारित कविताओं को क्या किसी भाषा के बंधनों में बांधा जा सकता है! यह शब्दों के माध्यम से रंगों और रेखाओं की ऐसी धरोहर है जिसे किसी सीमा में बांधना उचित नहीं है।
    हिंदी और राजस्थानी के साथ साथ आपको पंजाबी भाषा में भी समान गति प्राप्त थी। आपने कुछ काविताएं पंजाबी में भी लिखी हैं। भाषाओं का क्षेत्र इतना व्यापक और विशाल है कि भारत की किस भाषा में कहां क्या हो रहा है, यह सहजता से जानना कठिन है। अपने राजकोट प्रवास के दौरान कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ की अकाल से संबंधित कुछ कविताओं का गुजराती अनुवाद मैंने प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘कविता’ में देखे। मैं बहुत खुश हुआ और कवि को बधाई का फोन लगाया। जब बात हुई तो पता चला कि उन्हें इसकी खबर तक नहीं है! यह अनुवादक और संपादक की गलत परंपरा है। ऐसा भी संभव है कि उन्हें सूचना दी गई हो और मिली नहीं हो। किंतु अनुवाद बिना कवि की अनुमति के प्रकाशित नहीं होना चाहिए।
    यहां एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि समय, समाज, संस्कृति और देश-काल से जुड़ी रचनात्मकता किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। उसकी महक दूर-दूर तक किसी न किसी रूप में किसी माध्यम से पहुंच ही जाती है। प्रत्येक क्षेत्र और आंख की अपनी-अपनी सीमाएं हैं, इन सीमाओं का अतिक्रमण करने वाली रचनात्मकता को मैं प्रणाम करता हूं। निसंदेह कागदजी व्यापक जन-सरोकारों के कवि हैं। ‘कागद की कविताई’ उनकी कविता के साथ उनके कवि-मन और अंतर्संबंधों को देखने-दिखाने का एक छोटा सा प्रयास है। 
    बचपन से ही ओम पुरोहित को कागज इकट्ठा कर उसे जेब में रखने का शौक था। यही कारण था कि उन्हें उनके नाना श्री तेजमाल बोहरा ‘कागदिया’ कह कर बुलाया करते थे। ‘कागज’ को राजस्थानी में ‘कागद’ कहते हैं। लोक में प्रसिद्ध है- ‘हीमत कीमत होय, विन हिमत कीमत नही। / करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया॥’ नाना जी का स्नेहिल ‘कागदिया’ जैसे इसी सोरठे से प्रेरणा ग्रहण कर हमारी पूरी पीढ़ी के आदरणीय बन गए। उनको दिशा देने वाला घर-परिवार और विद्यालय मिला।
    जन्म जिस घर परिवार में हुआ वहां घर-आंगन में कविता खेला करती थी। पिता श्री रिद्धकरण पुरोहित साहित्यिक रुचि से सुसम्पन्न लोक साहित्य के मर्मज्ञ थे। पिताजी कविता के इस कदर रसिक थे कि कविता सुनना-सुनाना और पढऩा-पढ़ाना उनकी दैनिक दिनचर्या में था। अनेक लोककथाएं, लोकगीत और लोक कहावतों के मर्म पर गंभीरता से चर्चा करते थे। उन्होंने न केवल राजस्थानी वरन हिंदी साहित्य की अनेक कृतियों को घर में सहेज रखा था। वे मीरा, कबीर, बिहारी, तुलसी से अमीर खुसरो की बातों में खो जाते थे। ढोला मारू रा दूहा, वीर सतसई उनकी प्रिय पुस्तकें थी। अनेक चारण कवि मित्रों की रचनाएं उन्हें कंठस्थ थी। इस साहित्यिक विरासरत में बालक ओम पुरोहित को कविताई सिखाई जाने लगी।
    वर्ष 1970 में ज्ञान ज्योति उच्च माध्यमिक विद्यालय, श्रीकरनपुर (श्रीगंगानगर) ने प्रवेश लिया और वहां प्रिंसिपल प्रख्यात कवि जनकराज पारीक का मिलना संयोग बना। आखिर एक दिन वह आया जब स्कूल में पारीकजी को लगा बालक ओम में काव्य-प्रतिभा है। वैसे ओम पुरोहित ने 9 वर्ष की आयु में कविता लिखना आरंभ कर दिया था। मराठी के प्रख्यात लेखक आनंद यादव के आत्मकथात्मक उपनयास ‘जूझ’ में जिस भांति बालक आनंद का कविता प्रेम स्कूल में जाग्रत होता है, कुछ वैसे ही भविष्य के एक कवि ओम पुरोहित ने भी अपने गुरु की भांति कविताएं गाने का प्रयास किया। उसे बहुत जल्द ही पता चल गया कि गुरुजी की भांति कविताएं, गीत-गायन उसके बस की बात नहीं है।
    ओम पुरोहित बताते थे कि उन पर सुरीले कंठ के धनी उनके गुरु जनकराज जी पारीक का कवि-रूप छाया रहता था। उनकी आरंभिक रचनाओं में कोरा आदर्शवाद था। वर्ष भर के अंतराल के बाद उनकी रुचि व्यंग्य-कविता की दिशा में बढ़ी। उनकी हास्य-व्यंग्य की कविताएं 1975-76 में लोकप्रिय होने लगी। इन्हीं दिनों श्रीगंगानगर के कवि और डांखला विधा के प्रेरक कवि मोहन आलोक से उनकी मुलाकात हुई। मोहन आलोक के सान्निध्य ने ओम पुरोहित के कवि को दिशा दी। कागद जी का जीवन पर्यंत मानना रहा कि इस आपाधापी और अपसंस्कृति के दौर में मनुष्य का कोई साथी नहीं है, केवल कविता ही एक हथियार है जो हमें संवेदनशील बनाती है।
    विचित्र संयोग यह है कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के कवि को पहले पहल पहचानने वाले उनके गुरुजी जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की कोई किताब वर्षों तक नहीं आई और अपने गुरुजी की अप्रकाशित कविताओं को उनके शिष्य ‘कागद’ ने ‘थार सप्तक-5’ में प्रकाशित किया। बाद में जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की स्वतंत्रत पुस्तक प्रकाशित हुई।
    मान-सम्मान और पुरस्कारों की बात करें तो ओम पुरोहित ‘कागद’ को कविता संग्रह ‘आदमी नहीं है’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’, राजस्थानी कविता संग्रह ‘बात तो ही’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से काव्य विधा का गणेशी लाल व्यास ‘उस्ताद’ पुरस्कार अर्पित किया गया। उन्हें भारतीय कला साहित्य परिषद, भादरा का कवि गोपी कृष्ण ‘दादा’ राजस्थानी पुरस्कार मिला, सरस्वती साहित्यिक संस्था (परलीका) और जिला प्रशासन, हनुमानगढ़, कन्हैयाला सेठिया सम्मान, छोटीखाटू आदि द्वारा सम्मानित किया गया।  सन् 1989 में राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित ‘राजस्थान के कवि’ शृंखला के तीसरे भाग ‘रेत पर नंगे पाँव’ (संपादक-नंद भारद्वाज) में उनकी कविताएं संकलित की गई हैं।
    कागदजी का मानना था कि हमारे यहां राजस्थानी आलोचना विधा में पर्याप्त कार्य होना शेष है। संभवत: यही कारण था कि जब मेरी पहली आलोचनात्मक कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ प्रकाशित हुई तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि मेरे ऐसे कार्यों से आलोचना का सूनापन दूर होगा। वे कहते थे कि कवि कुं.चंद्रसिंह बिरकाळी से लेकर पारस अरोड़ा तक और कहानीकार नृसिंह राजपुरोहित से लेकर सांवर दइया तक की यात्रा में आधुनिक राजस्थानी गद्य-पद्य साहित्य का पर्याप्त विकास हुआ है किंतु राजस्थानी आलोचना ठहरी हुई है। उनका मानना था कि डा.किरण नाहटा के शोधग्रंथ से वह आगे नहीं बढ़ी और यदि बी.एल. माळी के हाथों विकसित हुई तो नंद भारद्वाज के हाथों उसे सजने-संवरने का उसे किंचित अवसर मिला। अनेक कार्यों को लेकर कुछ सहमतियों-असहमतियों के विषय में भी हमारी चर्चा खुल कर होती थी। उनका मत था कि कुंदन माळी, डा. अर्जुनदेव चारण, डा.रमेश मयंक, श्यामसुन्दर भारती ने भी आलोचना की दिशा में कार्य किया है, किंतु केवल आलोचक के रूप में किसी की ख्याति नहीं बनी है। मुझे इसके लिए प्रयास करना चाहिए। मैं कहता- ऐसा सोच कर कुछ करने के पक्ष में मैं नहीं हूं। किंतु यह सच है कि आधुनिक साहित्य और खासकर आजादी के बाद के साहित्य का विकास और समृद्धि का परचम आलोचना के अभाव में पूरा लहराने से वंचित है।
    राजस्थानी के आधुनिक साहित्य की भारतीय भाषाओं तक पहुंच जरूरी है और इसके लिए हमें आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में बहुत कार्य करना होगा। फु टकर आलोचनाओं से ना वे संतुष्ट थे और ना मैं। पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न आलेखों और साहित्यिक कार्यक्रमों में पढ़े जाने वाले पत्रवाचनों में एक बंधे बंधाए प्रारूप और कुछ विशेष रचनाकारों को ही केंद्र में रखे जाने पर वे असहमत थे। धड़ैबंध आलोचना उनको रास नहीं आती थी। वे कहते थे कि यदि कोई आलोचक आलोचना के नाम पर केवल वाह-वाह बटोरने के लिए तारीफ ही तारीफ लिखे और सबको संतुष्ट रखने का प्रयास करे तो उसे सात सलाम। यह आलोचक और आलोचना का धर्म नहीं है। आलोचना में तो रचना के पाठ से मुठभेड़ होनी चाहिए। हमारे साहित्यकार भी कितने भोले और मासूम हैं कि वे ऐसे आलेखों में अपने नाम जुड़े होने से मुंह के ताले रखते हैं। कागदजी राजस्थानी साहित्य के वैज्ञानिक काल विभाजन, विधागत बदलाव-विकास-दशा-दिशा, प्रवृत्तियां, सरोकारों और बदलते प्रतिमानों की स्थापनाओं पर गंभीरता से कार्य किए जाने की सलाह देते थे।
    उन्हें स्मरण कराया कि ‘सबद गळगळा’ पर युगपक्ष में 1995 में और ‘बात तो ही’ पर जागती जोत में 2003 में मैंने उनकी समीक्षाएं लिखी। ‘बात तो ही पण बैठी कोनी’ समीक्षा से वे कुछ असहमत भी हुए, किंतु उन्होंने स्वीकार किया कि वे कविता में सजग हुए हैं। आलोचना की सजगता ही रचनाकार को सजगता की दिशा देती है। आलोचना का अभिप्राय केवल कमियां निकालना नहीं वरन प्रेरणा और प्रोत्साहन भी होता है। कुछ संभावनाओं को देखकर ही आलोचना में कुछ निर्णय अग्रिम रूप से भी प्रस्तावित करने होते हैं। मुझे हर्ष है कि मैंने ‘राजस्थली’ त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका के 100वें अंक के लिए जो आलेख ‘राजस्थानी कविता रा साठ बरस’ लिखा, उसमें उन्हें मैंने दस महत्त्वपूर्ण कवियों में शामिल किया था। ओम पुरोहित ‘कागद’ के साहित्यिक अवदान पर बहुत कम लिखा गया है किंतु कागदजी पर विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने लघु-शोध लिखें हैं- ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संचेतना (2008), ओम पुरोहित ‘कागद’ द्वारा रचित ‘थिरकती है तृष्णा’ में अकाल की विभीषिका (2008-09), कवि ओम पुरोहित का हिंदी-काव्य : एक मूल्यांकन (2008-09), ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संवेदना और शिल्प (2011-12) आदि।
ओम पुरोहित ‘कागद’ ने अनुवाद के रूप में अनेक रचनाओं का राजस्थानी, पंजाबी और हिंदी में परस्पर अनुवाद किए। अनूदित पुस्तक अभी कोई प्रकाशित नहीं हुई है किंतु कवि मायामृग के हिंदी कविता-संग्रह का उन्होंने राजस्थानी अनुवाद ‘कै जीवण कठैई ठैर नीं जावै’ नाम से किया है। उनकी अनेक रचनाओं का इतर भारतीय भाषाओं में अनुवाद होने के अनेक उदाहरण है, किंतु किसी संपूर्ण कृति के अनुवाद का प्रकाशन नहीं हुआ है। कुछ राजस्थानी कविता-संग्रह अंकिता पुरोहित ‘कागदांश’ द्वारा अनुवाद किए गए हैं जो ‘कविता कोश’ अंतरजाल पृष्ठों पर देखे जा सकते हैं।  
    ओम पुरोहित ‘कागद’ राजस्थानी-हिंदी कविता में एक मुकाम पर पहुंचने के बाद भी अंत तक कविता और रचना-प्रक्रिया को लेकर बहुत विनीत रहे। छोटा होते हुए भी मुझे बहुत स्नेह और मान देते थे। इतना मान दिया कि मुझे लगता है कि उनकी मुझे लेकर जो आशाएं-संभावनाएं थीं उन्हें जिम्मेदारी से पूरित करना है। उनका कहना था कि मेरी आलोचना पुस्तक ‘आलोचना रै आंगणै’ को यश मिलेगा क्यों कि इस कृति के माध्यम से मैंने साहित्य आलोचना के पर्याप्त दरवाजों को खोलने का प्रयास किया है। यह सच भी हुआ कि मुझे आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का सर्वोच्च पुरस्कार अर्पित किया गया। उनके नहीं रहने पर ‘कागद सम्मान’ का मिलना भी मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है। वैसे उन्होंने अपने जीवन काल में ही मुझे और मेरी कृति को बहुत बड़ा सम्मान दे दिया था। उन्होंने राजस्थानी साहित्य को एक अलग दिशा देने वाली कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ के पक्ष में अपनी सार्वजिक टिप्पणी में लिखा था- ‘आ पोथी आगै री आलोचना सारू च्यानणो करसी, जकै री खासा दरकार ही। नीरज री इण पोथी में कमियां हो सकै पण नीत में खोट नीं। कोई सडयंतर नीं! आज तक घणकरी राजस्थानी आलोचना में नीत रै खोट री बात होंवती ही, अब ईमानदारी री बात चालसी! आज ताईं थरपीज्यैड़ै कूड़ रै टूटण रा चरड़का भी सुणीजसी!’
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29 जून, 2018

पैसे का चक्कर / नीरज दइया

पैसा एक वचन है और इसका बहुवचन जब भी होता है वह बहुत भारी होता है। अब इसके एक वचन से किसी को कोई मतलब नहीं रह गया है। जहां कहीं भी मुद्रा में पोइंट के बाद कुछ लिखा होता है उसे हमारे सिस्टम अपने आप अपग्रेड कर देते हैं। इस राउंट-अप करने की प्रक्रिया में अब वे दिन लद गए जब इसके एक वचन अथवा बहुवचन होने के भी कोई अर्थ होते थे। मुझे अपने बचपन के दिन याद आते हैं, जब हाथ में पैसे होते थे तब एक अजीव सी खुशी होती थी। अब यह हाल है कि जब कोई हाथ में पैसों की शक्ल वाले सिक्के खुल्ले के चक्कर में पकड़ा देता है तो लगता है कि कह दें कि भैया इन्हें तुम ही रख लो। नोट है तो दे दो पर ऐसे चिल्लर से जेब फटने और खन-खन होने का डर है। हाय रे हमारा वह जमाना जब हम पैसों की इसी खन-खन से हर्षित होते थे और अब यहीं खनखनाहट कानों को खटकने लगी है। अतः यह निर्विवादित सत्य के रूप में कहा जा सकता है कि पैसे का सिम्पल बहुवचन हमारे भीतर नफरत भरने वाला है। पैसे का सुपर डिग्री बड़े वाला बहुवचन जिसमें बहुत सारे बहुवचन मिले हो और वह भी पैसे की शक्ल में हर्गिज नहीं हो तब हमारे काम का है।
एक रुपया यानी सौ पैसे और सौ पैसे में अब कुछ नहीं आता है। बच्चों को मनी जिसे हम पुराने जमाने में बहुत बाद में हाथ खर्च के नाम से जानने लगे थे आजकल वह सब डिजिटल हो गया है। बच्चों को कार्ड चाहिए और उससे कुछ भी करने की छूट। अब पैसों की तो बात ही मत करो, कम से कम सौ रुपये को शून्य मानते हुए जो भी करना है स्टार्ड करो। आप को बच्चों की जरा-भी खुशी का ख्याल है या फिर उसकी एक झलक देखने की इच्छा है तो बात पांच सौ देने लेने से कम मत करना। यदि आपका पहला फिगर दो हजार हो तो कुछ बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। अब ऐसी जनरेशन है कि बिना संकोच के सीधे कहती है- ‘पैसा पैसा क्या होता है पैसे की लगा दूँ ढेरी...’ भारतीय मुद्रा के विषय में यदि इस गीत के जैसे कि कहा ‘मैं बारिश कर दूँ पैसे की जो तू हो जाये मेरी’। किसी दिन यह तेरी मेरी वाला खेल सच में हो गया और किसी ने पैसों की बारिश करा दी शायद हमारे अच्छे दिन आ जाएंगे। पर इसमें अच्छे दिनों की तुलना में मुझे खतरा अधिक लगता है कि जिस किसी क्षेत्र में पैसों की बारिश होगी वह दिवानों और दिवानियों की संख्या के बल को देखते हुए होगी। खुदा ना करे कि हम सब उन्हीं पैसों के ढेर के नीच दब जाएं।
वैसे भी अभी हमारी हालत कुछ अच्छी नहीं है। सुनते हैं कि पूरा देश कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। देश के दबे होने में आप अपने पर कितना दबाब महसूस करते हैं आप की आप जाने पर मैं तो मेरी ही कह सकता हूं। मेरे गणित के अध्यापक ने ढंग से गिनती में निपुण नहीं किया या कहें कि मेरी ही नालायकी थी कि बड़ी गणित देखकर जी धबराने लगता है। बात लाखों से पार होते ही केस किसी दूसरे को रेफर करना पड़ता है। रोज दाल-रोटी मिल जाए इसी में भारतीय जनता की भांति मेरी भी खुशी है। अपनी अक्षमता को मैं स्वाभिमानी हूं इसलिए ‘सादा जीवन उच्च विचार’ कह कर गौरव की अनुभूति करता हूं। हमारे बुजुर्गों ने पैसों को हाथ का मैल कहा था सो मैं तो इस मैले से हाथ की अधिक निकटता का पक्षधर नहीं हूं। पंच काका की बात भी ठीक है कि जिनको पैसों का असली सूत्र मालूम है वे चुप रहते हैं। नासमझ लोग ही ‘पैसे पैसे क्या करती है’ ऐसा शोर-शराबा करते हैं। ए मुनिया! इस पैसों की ढेरी के चक्कर में नहीं आना है।
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अट्टहास, जुलाई, 2018 में प्रकाशित



25 जून, 2018

जय प्रकाश मानस : गूगल से भी आगे / नीरज दइया

जयप्रकाश मानस से मेरा परिचय बहुत पुराना है। कोई जान-पहचान दो दशक को छूने लगे तो उसे पुराना कहा जा सकता है। समय परिचय को प्रगाढ़ करे अथवा नहीं करें किंतु किसी व्यक्ति आकलन में मदद जरूर करता है। इस दौरान हम अपने संबंधों को ठीक-ठीक समझ और परिभाषित कर सकते हैं। मैं मेरे और मानस जी के विषय में कुछ लिखने से पहले उस दिन का स्मरण करना चाहता हूं जब जयप्रकास जी ने मेरे मानस में एक दस्तक दी। बात उन दिनों की है जब मैंने राजस्थान सरकार की अपनी मास्टरी छोड़कर केंद्रीय विद्यालय, राजकोट में पी.जी.टी. हिंदी के रूप में वर्ष 2003 में कार्यग्रहण किया था। वहां मुझे उच्च माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में हिंदी अध्यापन के साथ राजभाषा हिंदी और अन्य कार्य भी मिले थे।
किसी तारीख, दिन और महीने के चक्कर में पड़े बिना सीधे-सीधे कहना यह है कि जयप्रकाश मानस मेरे मानस गुरु उन्हीं दिनों बने थे। ऐसे गुरु जिन्हें वर्षों तक खबर नहीं हुई कि उनका कोई शिष्य नीरज दइया राजकोट गुजरात में बैठा है। भले उस समय मैं अपने इस संबंध को परिभाषित नहीं कर सका पर अब यह पक्का है कि वे मेरे गुरुजनों की श्रेणी में हैं। मेरे कुछ मित्रों को मुझ से शिकायत है कि मेरे गुरुजनों की संख्या अधिक है। मैं मानता रहा हूं जिससे हम कुछ सीखते हैं, जो हमें कुछ सीखाता है वह आदरणीय गुरु ही होता है। उन्होंने मुझे कंप्यूटर के भीतर छुपी हुई राजभाषा हिंदी लेखन से परिचित होने की प्रेरणा दी। उन दिनों मैं कंप्यूटर द्वारा देवनागरी हिंदी में लिखने का प्रयास बेबदुनिया के की-बोर्ड से किसी प्राथमिक स्तर के विद्यार्थी जैसे कर रहा था। मेरे पास एक ई-मेल आया। ऐसा मेल जिसे मैं अपने याहू आई-डी पर पढ़ नहीं पा रहा था। जानकार मित्र ने बताया कि यह फोंट की समस्या हो सकती है, यहां खुल नहीं रहे हैं। मित्र के सुझाव दिया और वह मेल जीमेल एकाउंट मैं पढा गया। सृजनगाथा संपादक के रूप में जयप्रकाश मानस के मेल से पता चला कि उन्होंने मेरे दो अनुवाद प्रकाशित किए हैं।
यह किसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा की बात है। कुछ बातें हम कह देते हैं और कुछ मनों में रह जाती है। मैं शब्दों के माध्यम से जयप्रकास मानस जी मिलता रहा हूं। उनसे संवाद का भी लंबा सिलसिला रहा हैं। बीकानेर में हमारी पहली रू-ब-रू मुलाकात वर्ष 2017 में हुई। जब वे अपने दल-बल के साथ ‘द्वितीय अंतराष्ट्रीय लघुकथा हिन्दी सम्मेलन’ के दौरान मेरे शहर में आए थे। मैंने उन्हें अपनी इन भावनों से अवगत कराया तो वे हंसने लगे और ‘अरे नहीं’ शब्द उनके मुख से निकले। उनके ‘अरे नहीं’ कहने और हंसने से मैं अपना शिष्य पद छोड़ने वाला नहीं था और नहीं छोड़ा है। वे भले मुझे मित्र, छोटा भाई या एक लेखक जैसा जो कुछ समझे उनका अपना दृष्टिकोण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिस श्रद्धा-भक्ति का पाठ पढ़ाया है उससे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैं तो जय, प्रकाश और मानस तीनों से शब्दों के गहरे अर्थों से प्रभावित होता रहा हूं, फिर ऐसे दुर्लभ संयोग को कैसे छोड़ सकता हूं।
मेरा उनसे संबंध कवि-अनुवादक के रूप में भी रहा है। मैंने उनकी कुछ कविताओं के राजस्थानी अनुवाद किए थे। जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं। आप और हम उन्हें फेसबुक पर लंबे समय से सक्रिय देख रहे हैं। वे किसी एनसाइक्लोपीडिया की भांति इतनी जानकारिया और स्रोत का भंडार है कि उन्हें प्रणाम करने का मन करता है। खैर मैं तो उन्हें अपना गुरु मान चुका हूं और उनकी इन सभी सेवाओं के लिए उन्हें हार्दिक वंदन करता ही हूं। अंत मैं मेरा बस इतना सा आग्रह है कि जो तटस्थ रहेगा, समय लिखेगा उसका भी इतिहास, फैसला आपका है कि आप अपना इतिहास कैसा चाहते हैं। मुझे तटस्थ की भूमिका से बेहतर स्नेह और आशीष का आकांक्षी होना बेहतर लगता है। मैं अपने गुरु जयप्रकाश रथ के रथ के साथ हूं और रहूंगा।
व्यक्ति का स्वभाव है कि वह थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है। मैं कुछ अधिक हूं और जयप्रकास रथ यानी मानस जी के संदर्भ में इतने लंबे समय में मुझे उनके कार्य, व्यवहार और अदम्य उत्साह में अनेकानेक स्वार्थ नजर आते हैं। वे एक सक्रिय रचनाकार के साथ गहरे अध्येता हैं। अपने समय और परिवेश से जुड़ कर वे जैसा जो कुछ कर चुके हैं अथवा अब भी कर रहे हैं बहुत उल्लेखनीय है। किसी एक व्यक्ति में इतनी क्षमताएं और योग्यताएं होना अद्वितीय है। उन्होंने साहित्य लेखन के साथ संपादक और हिंदी के प्रचार-प्रसार-विकास के लिए अतुलनीय कार्य किए हैं। यह सब उनके परिचय में विस्तार से देखा जा सकता है। अगर आपको यह सब पता नहीं तो गूगल जिंदाबाद तो आप जानते ही हैं। गूगल के साथ मेरे गुरुजी मानस जी को भी जिंदाबाद इसलिए कहना है कि वे बहुत सी बातों में गूगल से भी आगे हैं।
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24 जून, 2018

आज तुम याद बेहिसाब आए / डॉ. नीरज दइया

25 जून स्मृति दिवस पर विशेष-
स्मृति-शेष साहित्यकार श्री महेशचन्द्र जोशी


    मैं अपने ही काम-काज में खोया था कि बहुत दिनों बाद मन्दा (मन्दाकिनी जोशी) का फोन आया। एक छोटे से संवाद ने मुझे समय के उस बिंदु तक पहुंचा दिया जहां से हमारे परिचय का स्मरण मैं करने लगा। मेरे बचपन के दिनों में कहानीकार महेशचन्द्र जोशी (1935-2012) को मैंने सबसे पहले बाल साहित्य के लेखकों के रूप में पहचाना था। वे मेरे पिता को गहरे दोस्त रहे और मेरे लिए ऐसे लेखक हैं जिन्होंने मुझे अपना बाल उपन्यास भेंट कर शब्दों की इस दुनिया के लिए प्रेरित किया था। जोशी की पुत्री मन्दा से मेरा परिचय कब हुआ यह अब ठीक-ठीक स्मरण नहीं आता। उसे मेरे पिता सांवर दइया ने उसे बेटी की तरह प्यार दिया और वह मेरे लिए सदा बड़ी बहन की भांति आदरणीय रही हैं। उसकी सादगी, सहजता और सरलता प्रभावित करती है।  
    मन्दा बचपन से ही नाटकों में काम करती थी, उसे मेकअप और बिना मेकअप दोनों रूपों में देखा है। उसे और उसकी छोटी बहन अनु (अनुपमा) में मैंने पाया कि एक छिपी हुई रहती थी और दूसरी मुझसे मेरे हाल चाल पूछा करती थी। आज सोचता हूं तो लगता है कि मैंने उसे कभी सीधी-सरल लड़की के रूप में तो देखा ही नहीं, वह तो सदा से मुझे एक परी जैसी लगती रही है। मेरे बाल मन में पंखों वाली परियों की जो कहानियां रहीं उसमें मन्दा बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान को पर्याप्त मान-सम्मान मिला है। परियों तो हमेशा हंसती रहती है पर वह ऐसी परी है जो 25 जून, 2012 को बहुत रोई थी। उसने अपने पापा और हम सब के आदरणीय कहानीकार महेशचन्द्र जोशी को इसी दिन मुखाग्नि दी थी। उसने यह साबित कर दिया कि वह अपने पापा की बहादुर बेटी नहीं बेटा है। उसके संघर्ष और कार्यों को देखते हुए अगर मैं उसे परी कहता हूं तो गलत नहीं है। यह बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान की कहानियां बरसों हम में प्रेरण और हिम्मत भरती रहेगी। वह नारी शक्ति और अदम्य जीजीविषा का एक उदाहरण है। पिछले दिनों बीमारी से लंबा संघर्ष कर फिर से अपनी अदम्य मुस्कान से साबित किया है कि वह सचमुच परी ही हैं जो कभी हारती नहीं है।   
    मन्दाकिनी जोशी इसका पूरा श्रेय अपने पापा को देती हैं। वह उन्हें याद करते हुए कहतीं हैं- ‘मेरे प्रेरक मेरे पापा रहे हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। एक संपन्न परिवार में जन्म लेने के बाद भी पापा आर्थिक संकटों से जूझते रहे, पर हमें कभी आर्थिक अभाव महसूस नहीं होने दिए। जब तक माँ रहीं, दु:ख क्या होता है, शायद हमने दोनों बहनों ने जाना ही नहीं। जब 31 मार्च, 1993 को मेरी माँ (हेमप्रभा) का असामयिक निधन हुआ पापा ने हमें हिम्मत बंधाई। उन्होंने हमें भरपूर प्यार दिया। हम दोनों बहनों को बेटों की तरह पाला। हमें जीने की, कुछ करने की पूरी आजादी दी। इसी आजादी की वजह से मैंने रंगमंच पर लगभग 15 वर्ष की लंबी पारी पूरी की। पापा अस्वस्थ होने के बाद भी मुझे कभी रंगकर्म के लिए नहीं रोकते थे, वरन् मेरी कला को सराहते हुए सदा प्रेरित-प्रोत्साहित करते रहे।’
    मन्दा की इस यात्रा में मैंने उसके कुछ नाटक देखे हैं। महेशचन्द्र जोशी को अपने पुराने अजीज दोस्त सांवर दइया को याद करते हुए देखा है। वे बहुत भावुक इंसान थे और उनका गला भर आता था। वे बीमारी में भी जीवन से भरपूर उत्साहित रहते थे। उनकी बातों में पुराने किस्से और साहित्य की दुनिया के अलावा कुछ नहीं होता था। वे भी मन्दा को मन्दा कहते थे, मेरे पिता भी मन्दा कहा करते थे। शायद यही कारण रहा होगा कि हम घर में उसे मन्दा कहा करते थे। वह कविताएं लिखती है पर उसकी कोई किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है।
    किसी रचनाकार के जीवन में उसके माता-पिता का स्थान बहुत बड़ा होता है। वह बड़ा स्थान कुछ अधिक बड़ा हो जाता है जब पिता महेशचन्द्र जोशी जैसे हो। वरिष्ठ साहित्यकार महेशचन्द्र जोशी सन 1965 से अनवरत् लिखते रहे और वे राजस्थान ही नहीं राष्टीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहे । उनका जन्म 30  अगस्त, 1935 जसपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे मूलतः कुमाऊँनी थे। उनके जीवन काल में सात किताबें- मोम का घोड़ा (बाल उपन्यास), नशा (उपन्यास 1985), अधूरी तस्वीर(1972), मुझे भूल जाओ (1996), तलाश जारी है (1998), आठवाँ फेरा (2001), मेरा घर कहाँ है (2004) प्रकाशित हुई और आठवी किताब ओल्ड डोक्यूमेंट (2013) उनके निधनोपरांत प्रकाशित हुई। इसमें बड़ी भूमिका मन्दा यानी परी दीदी की रही है।
    आज महेशचन्द्र जोशी को इस संसार से विदा हुए 6 साल हो चुके हैं। वे अपने शब्दों के द्वारा अब भी हमारे बीच बने हुए हैं। उनकी ढेर सारी यादें और बातें अब भी हमें प्रेरित करती हैं। दुनिया की नजरों में वे चले गए हैं पर बहुत बार उनके जाने के बाद मुझे ऐसा लगता रहा है कि वे बीच-बीच में कभी कभार मुझे देखने आते हैं। मैं उन्हें मन्दा की आंखों से झांकता हुआ पाता हूं कि वे मुझे देख रहे हैं। उनका स्नेह और आशीर्वाद हमेशा हमेशा से बना हुआ है और इस बार जब वे झांक रहे थे तब कुछ कह भी रहे थे। उनका कहा मैंने मन्दा से कह दिया है कि वे चाहते हैं अभिनेत्री और रंगमंच की कलाकार अब कवयित्री के रूप में आए। शब्दों की दुनिया बहुत बड़ी है और इस बड़ी दुनिया में एक छोटी सी दुनिया मेरी है। मैं अपनी दुनिया में फैज अहमद फैज की पंक्तियां याद करता हुआ कहना चाहता हूं- कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब, आज तुम याद बेहिसाब आए।
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