24 मई, 2017

“पंच काका के जेबी बच्चे” व्यंग्य संग्रह की भूमिका

वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार
सामान्य कथन में व्यंग्य को लोग ताना या चुटकी की संज्ञा देते हैं। व्यंग्य, कथन की एक ऐसी शैली है जहां बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्कु रा रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठे। यानी व्यंग्य तीखा और तेज तर्रार कथन होता है जो हमेशा सोद्देश्य होता है। इसका प्रभाव तिलमिला देने वाला होता है।
पारिभाषिक रूप से व्यंग्य साहित्य की एक विधा है जिसमें उपहास, मजाक और इसी क्रम में आलोचना का प्रभाव रहता है। शब्द की अभिव्यंजना शक्ति द्वारा निकलने वाला अर्थ ही व्यंग्य कहलाता है। यदि इन पारिभाषिक मापदंडों की कसौटी पर नीरज दइया की पुस्तक- ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ में संकलित व्यंग्य रचनाओं को कसा जाए तो वह खरी उतरती है। भाषा विषयानुरुप और कथन में निर्बाध प्रवाह। शैली की विशिष्टता भी अनूठी।
एक लंबे अर्से से दैनिक नवज्योति के संपादकीय पृष्ठ के लोकप्रिय स्तंभ ‘जल-तरंग’ में उनकी रचनाएं नियमित रूप से प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं की लोकप्रियता का अंदाजा पाठकों से मिल रहे प्रशंसात्मक पत्रों से लगाया जा सकता है। व्यंग्य की पारिभाषिक व्याख्या के अलावा जिस सहज अंदाज से उन्होंने अपनी रचना- ‘व्यंग्य की ए बी सी डी’ में चुटकियां ली हैं- ‘वाह ! बेटा उस्ताद से उस्तादी’। वे खुद लिखते हैं कि ‘व्यंग्य की ए बी सी डी आसान नहीं है बल्कि कठिन है। कठिन इसलिए है कि यह शरारतियों का काम है। यह सीडी ऐसी है जो बिना कम्प्यूटर के चलती है। ऐसी सीढ़ी जो दूर तक पहुंचती है’। इससे सरल व्याख्या व्यंग्य की और क्या हो सकती है? बात जब ‘एक नम्बर बनाम दो नम्बर’ की हो तो यह करारा प्रहार उन व्यक्तियों के दो नंबर के क्रिया-कलापों को लेकर किया गया है, जो एक जेब में औरों को दिखाने के लिए अखरोट और बादाम रखते हैं और पीछे छिपकर भुने हुए चने खाते हैं। आज समाज की सार्वजनिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार है। व्यंग्यकार दइया लक्ष्मी की खासियत बताने में नहीं चूकते कि ‘वह ऐसी शक्ति है जो खुद तो पूजनीय है, साथ ही वह जहां रहती है, उसे भी पूजनीय बना देती है’।
लेखक ‘जुल्म-ए-जलसा’ की अपनी तरह से शब्दों में जो व्याख्या दी है वह भी अद्भुत अंदाज से। जल्सा या जल सा यानी पानी सा। फिर इसकी आड़ में कहर किस तरह बरपाया है और पेटपूजा की जाती है, यह अपने आप में एक अच्छी खासी रचना है। इसी तरह ‘मास्टरजी का चोला’ व्यंग्य आजकल जिस तरह विश्वविद्यालयों और हमारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों और शिक्षिकाओं के पहनावे और व्यवहार है, उस पर भी अच्छा-खसा तंज कसा गया है। पहनावे और व्यवहार से कभी शिक्षक छात्रों में स्पष्ट भेद किया जा सकता था, लेकिन आज इस दृष्टि से कोई भेद ही नहीं रहा। कभी शिक्षक से छात्र भय खाते थे, आजकल फ्रें डली नजर आते हैं। शिक्षक ही नहीं वर्तमान पिताओं के व्यवहार पर भी कटाक्ष किया गया है। जिसकी वजह से नई पीढ़ी जिस तरह अनियंत्रित होकर अपने अभिभावकों के बताए मार्ग का अनुसरण ना कर दूसरे मार्ग पर चलने को ही मॉर्डन होने की दंभ भरती है। इसे चरितार्थ करने की कोशिश लेखक ने अपनी रचना- ‘पिताजी के जूते’ की आड़ में अभिव्यक्त की है।
हमारे समय में होली और शीतलाष्टमी, शादी या अन्य पारिवारिक उत्सवों में हास-परिहास की परंपराएं थीं, उन्हें हम भुलाते जा रहे हैं, लेकिन पश्चिमी सभ्यता से आए अप्रैल फूल बनाने की प्रवृति को ‘फलके सा चेहरा’ के माध्यम से चित्रण किया है। वर्तमान में किसी भी विभाग में आप जाइए-साल भर कोई काम नहीं होता। लेकिन नया बजट आने से पहले वित्तीय वर्ष के आखिरी माह मार्च के लक्ष्य पाने के लिए जिस तरह की प्रवृत्ति आज आम हो गई है, उस पर करारा व्यंग्य है- ‘टारगेटमयी मार्च’। ‘हेलमेट’ के जरिए सड़क सुरक्षा, यातायात नियमों की आड़ में जिस तरह परिवहन विभाग और यातायात पुलिस द्वारा उलटे-सीधे ऊपरी कमाई के उद्यम को ‘हेलमेट पर निबंध’ के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।
आजकल समाज में सोशल मीडिया काफी सक्रिय है। लोग सुबह ईश्वर का स्मरण करना भूल जाएं और रात को सोते समय स्वाध्याय ना करें लेकिन फेसबुक, ट्वीटर के जरिए मोबाइल, कम्प्यूटर, टेब, लेपटॉप में डूबे रहते हैं। फेसबुक पर अपनी सेल्फी लेकर अपलोड करने फिर उसकी लाइक्स और कमेंट लिखने और देखने में अपने जीवन का कीमती समय व्यर्थ कर रहे हैं, इस पर ‘दाढ़ी रखूं या नहीं’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी रचनाओं के जरिए कटाक्ष किया गया है।
जब डिजिटल इंडिया की चर्चा हो तो स्वत: ‘विकास’ की बात करना तो बनता ही बनता है। विकास पर सत्तारूढ़ हर दल दावे करता है, भले ही हो या ना हो, लेकिन नगाड़ा तो बजाते रहना ही पड़ता है। तो इसके ठीक विपरीत विपक्ष विकास में भी विनाश के हर पहलू को ढूंढ़कर आलोचना करने से बाज नहीं आता। आजकल राजनीति में विकास की यही गणित पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। तीसरा पक्ष की पलटी राजनीति चाल भी चर्चा का विषय बन जाती है।
कुल मिलाकर नीरज दइया की इस कृ ति ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ में संकलित व्यंग्य रचनाएं वर्तमान युग की विसंगतियों पर अपनी तेज धार से प्रहार करती है। ईश्वर से कामना है कि वे आधुनिक व्यंग्य विधा के प्रमुख प्रकाश-स्तंभ हरिशंकर परसाई और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होंगे। इन मंगलकामनाओं के साथ मैं उनके सुनहरे भविष्य की कामना करता हूं।
महेश चंद्र शर्मा
स्थानीय संपादक, दैनिक नवज्योति, जयपुर
-----------------------------
पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
------------------------------
पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) प्रख्यात साहित्यकार-पत्रकार देवकिशन राजपुरोहित को सादर समर्पित

20 मई, 2017

श्री कुंवर रवीन्द्र द्वारा निर्मित कविता-पोस्टर


साख भरै सबद / नीरज दइया
-------------
दरद रै सागर मांय
म्हैं डूबूं-तिरूं
कोई नीं झालै-
महारो हाथ ।

म्हैं नीं चावूं
म्हारी पीड़ रा
बखाण
पूगै थां तांई
कै उण तांई ।

पण नीं है कारी
म्हारै दरद री
साख भरै-
म्हारो सबद-सबद ।
००००

दर्द / नीरज दइया

--------
दर्द के सागर में
मैं डूबता तिरता हूं
कोई नहीं थामता
मेरा हाथ ।

मैं नहीं चाहता
मेरी पीड़ा का
बखान
पहुंचे आप तक
या उन तक ।

लेकिन कोई चारा भी नहीं है
मेरे दर्द का
साक्षी है
मेरा शब्द-शब्द ।

अनुवाद : मदन गोपाल लढ़ा

अन्य कविताएं देखें

19 मई, 2017

जीवन को पहचानते हैं नीरज दइया


नीरज दइया समकालीन व्यंग्यकारों में एक महत्वपूर्ण नाम हैं। उनका महत्व इस लिए भी बढ़ जाता है क्योंकि व्यंग्य में यह संक्रांति काल है। क्रांति का फल क्या निकलेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है। संक्रांति यह है कि सोशलमीडिया के सुविधाजनक आगमन व हस्तक्षेप से अभिव्यक्ति आसान, निष्कंटक और अपार हो गई है। व्यंग्य केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है। जब वह साहित्य बनता है तब बहुत सारे अनुशासन ज़रूरी होते हैं। ...ऐसे दिलचस्प और दिलनवाज़ माहौल में नीरज दइया जैसे सुलझे व्यंग्यकार अलग से दिखाई देते हैं।
नीरज जी को पढ़ते हुए पाठक को एहसास होता है कि उनका परिवेश के साथ गहरा रिश्ता है। क्योंकि वे बहुत सामान्य सी बातों को परख कर उनके तल से मतलब की बात निकालने का हुनर जानते हैं। जैसे 'नियम वहां, जहां कोई पूछे' में भारतीय समाज की सामान्य मानसिकता पर वे चुटकी लेते हैं,'...नियमों के जाल से जिसे बचना आता है वह बच जाता है। ...नियम तो बेचारे उस जाल की तरह है जिसे एक बहेलिए ने बिछाया तो पक्षियों को पकड़ने के लिए था,पर वे होशियार निकले। पूरे जाल को ही लेकर उड़ गए।' कितनी सरलता से नीरज जी शासन प्रशासन न्यायपद्धति नागरिक बोध आदि बातों को आईना दिखा देते हैं।
नीरज जी कुछेक व्यंग्यकारों की तरह दूर की कौड़ी नहीं लाते। वे कथात्मक शैली में संवाद करते हुए लिखते हैं। भाषा को उन्होंने साध लिया है। छोटी वाक्यसंरचना उनको भाती है। प्रत्यक्ष कथन और अप्रत्यक्ष संकेत में उनको कुशलता प्राप्त है। 'टारगेटमयी मार्च' में नीरज जी लिखते हैं,'बिना खर्च के आया हुआ बजट लौट जाएगा तो यह सरासर हरामखोरी है। लापरवाही है।कार्य के प्रति उदासीनता है। अनुशासनहीनता है।'
अब सोचिए जिस समाज में ऐसे 'परिश्रमी,सतर्क, सचेत,अनुशासित' कर्मचारी होंगे वह समाज प्रगति क्यों न करेगा!!!
नीरज जी ने साहित्य के बाहरी भीतरी स्वांगों पर अनेक बार लिखा है। प्रायः हर ज़रूरी व्यंग्यकार ने लिखा है। यह अनुभव का मसला तो है ही,बौद्धिक ज़िम्मेदारी का सवाल भी है। इस बहाने सब पर कोड़े बरसाने वाला व्यंग्यकार ख़ुद पर भी बरसता है। कहना ही चाहिए कि नीरज जी बहुत वक्रता के साथ बरसे हैं।
नीरज दइया में एक और हुनर भरपूर है। व्यंग्य मूलतः किस्सागोई, लंतरानी और ललित निबंध आदि के सहभाव से विकसित गद्य रूप है (इसको विधा मानने या न मानने वालों को मेरा सलाम,ताकि मैं सलामत रहूं) इसलिए इसमें बात से बात निकालने और बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी का कौशल आवश्यक है। नीरज जी यह काम करते हैं।'पिताजी के जूते' में वे बात निकालते हैं,'देश से असली जूते गायब हो चुके हैं।किसी के पैरों में कोई जूता नहीं,बस भ्रम है कि जूते हैं। अगर गलती से कोई जूता है तो वह बेकार है।' यहां यह कहना है कि बात निकली है,दूर तलक गई है।ऐसा नहीं हुआ कि बात कहीं और चली गई, मूल मंतव्य कहीं और चला गया। यह नीरज जी का अनुशासन है।
मैं नीरज जी को पढ़ता रहा हूं। एक व्यक्ति और लेखक के रूप में उनकी आत्मीयता प्रभावित करती है। बेहद जटिल समय और रचना परिवेश में उनकी उपस्थिति आश्वस्त करती है। उनकी उर्वर रचनाशीलता का अभिवादन। अनेक शुभकामनाएं।

सुशील सिद्धार्थ
किताबघर प्रकाशन,24 अंसारी रोड,दरियागंज, नयी दिल्ली 2
08588015394

समाज एवं रचनाकार के लिए एक आइना


किसी भी रचनाकार का अपने परिवेश के साथ, अपने समाज के साथ, अपने समय के साथ क्या रिश्ता है यह जानने का अच्छा एवं सही तरीका है उसकी रचना के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी ‘रचनात्मक दृष्टि’। मनुष्य जीवन में भी मनुष्य के हर कार्य के पीछे उसकी ‘दृष्टि’ छुपी होती है और उसी ‘दृष्टि’ के आलोक में हम उस कार्य का और उस कार्य के कारण उस मनुष्य का आकलन करते हैं। इसीलिए जब हम किसी रचनाकार के अब तक प्रकाशित रचनाकर्म का आकलन करने बैठते हैं हमें सबसे पहले यह जानना पड़ता है कि उस रचनाकार की ‘दृष्टि’ क्या है, जो उसकी रचनाओं के माध्यम से हम तक सम्प्रेषित होती है। वह रचनाकार अपने समय के सवालों से कैसे जूझता है, अपने समय को एक शाश्वत समय में कैसे प्रतिष्ठित करता है। हम इससे भी एक कदम पहले लेकर यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि वह अपने समय के सवालों को कैसे उठाता है। अपने समय को प्रश्नांकित करना, अपने समय से मुठभेड़ करना एवं उस मुठभेड़ को एक शाश्वत समय में प्रतिष्ठित करना किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ी चुनौति होती है। जो रचना इस कार्य को ठीक तरह से पूरा कर पाती है वह अपने पाठकों का विश्वास अर्जित कर लेती है।
श्री मधु आचार्य के सर्जनात्मक सरोकारों पर केन्द्रित यह पुस्तक तत्कालीन समाज के लिए एवं स्वयं रचनाकार के लिए एक आइने का काम करेगी क्योंकि इस पुस्तक के लेखक डॉ. नीरज दइया  अपनी इस पुस्तक में श्री मधु आचार्य की रचनाओं में छुपी ‘रचनात्मक दृष्टि’ को समाज के सामने लाने का प्रयास करते हैं जिसके कारण वे रचनाएं एवं उन रचनाओं के माध्यम से स्वयं रचनाकार महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
श्री मधु आचार्य के रचनाकर्म का आकलन इसलिए भी जरूरी लगता है कि वे एक ही समय में दो भिन्न भाषाओं में साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, व्यंग्य एवं बाल साहित्य के क्षेत्र में निरंतर लिखना एवं स्तरीय लिखना दो अलग अलग बातें हैं। श्री मधु आचार्य के लेखन की विशेषता यही है कि वे दो भिन्न भाषाओं में इतनी साहित्यिक विधाओं में एक साथ सक्रिय रहते हुए भी अपने रचनाकर्म के साथ समझौता नहीं करते। इसलिए भी उनका पाठक वर्ग उन पर उनके रचनाकर्म के कारण विश्वास करता है, उन्हें प्यार करता है। किसी भी रचनाकार के लिए उसके पाठक वर्ग का विश्वास ही सबसे बड़ी पूजी होती है और श्री मधु आचार्य पाठकों के इस विश्वास पर खरे उतरते हैं।
कविता और कहानी या उपन्यास और नाटक या कि बड़ों के लिए लेखन एवं बच्चों के लिए लेखन दो भिन्न मानसिकता, दो भिन्न धरातल, भिन्न भाषागत व्यवहार भिन्न शिल्पगत वैशिष्ट्य को साधना है। एक रचनाकार के लिए भाषा को ‘सिरजना’ एवं भाषा को ‘बरतना’ का सांमजस्य बनाये रखना बहुत जटिल कार्य होता है। खास तौर से जब साहित्यिक विधा की अपनी अन्दरूनी मांग ही उससे भाषा के भिन्न ‘वैशिष्ट्य’ को अपने पाठक तक पहुंचाने की चुनौति देती है। इस पुस्तक में लेखक डॉ. नीरज दइया विवेचित रचनाकार के रचनाकर्म के उस वैशिष्ट्य को उसके पाठक तक पहुंचाने के लिए एक ‘सेतु’ बनाने का श्रमसाध्य कार्य करते हुए सामने आते हैं। यही इस पुस्तक की विशेषता है और इस कार्य के लिए डॉ. नीरज दइया को बहुत बहुत बधाई।
श्री मधु आचार्य का रचनाकर्म अभी चुका नहीं हैं। उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में वे राजस्थानी एवं हिंदी में और रचनाएं अपने पाठक समुदाय को सौंपेंगे। रंगकर्म के क्षेत्र में उनके लम्बे अनुभव को देखते हुए राजस्थान के रंग सामाजिक को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। वे अपने जीवन में एवं अपने सर्जनात्मक क्षेत्र उत्तरोत्तर उन्नति की ओर बढ़ेंगे यही कामना है।
- डॉ. अर्जुनदेव चारण
वरिष्ठ कवि-नाटककार-आलोचक

मधु आचार्य `आशावादी' के सृजन-सरोकार (2017) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : दिनेश कुमार ओझा ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ISBN : 978-93-82307-70-9 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003

16 मई, 2017

साहब की साहबी

मारे बोलन-सुनने और देखने के विषय में सरकारी कानून बने हुए हैं। सभी के पास आंखें तो होती हैं, पर उसमें जो नजर होती है, उससे कुछ का कुछ हो जाता है। उसका ख्याल रखना होता है। जब देने वाले ने ही अच्छी और बुरी दो नजर दी, फिर बुरी नजर पर कानूनी दांव-पेंच क्यों?
जरा सी ऊक-चूक आपकी नजर हुई और आप आए कानून के शिकंजे में। देखने और देखने में फर्क है, तभी तो कानून के हवाले दंडित करने के नियम बनाएं गए हैं। केवल देखने में ही नहीं बोलने में अच्छा और बुरा दो प्रविधियां सामन्यत बोलने की हैं। कहीं जरा सी अभ्रदता, खतरे का आगाज है। संभल कर देखना-बोलना और चलना है। क्योंकि शरीफ आदमी के बीस दुशमन है, जो बदमाश है उसे कोई कुछ नहीं कहता!
घर से दफ्तर को मैं निकलते हुए बीस बार रामजी-रामजी का नाम जाप करके निकलता हूं। सोचता हूं कहीं कुछ उलटा-पुलटा नहीं हो जाए। मैं शरीफ आदमी किसी से माथा लगाना नहीं चाहता। मैं तो इतना शरीफ हूं कि अगर गली का कुत्ता भी रास्ता रोकता है, तब भी उसे अच्छी नजर से देखते हुए मुस्कुराते हुए अच्छा-अच्छा बोलता हूं- कुत्ता भाई साहबजी हटिए, रास्ता छोडि़ए ना। प्लीज, दफ्तर को देर हो रही है।
मुझे याद आता है कि बालपन कितना सहज और आनंदमयी था। कोई कुत्ता रास्ते में दिखई देता तो पहले पत्थर उठाते थे, फिर दे मारा। कहीं कभी कोई सोया हुआ कुत्ता मिल जाता तो उसे लात मारने का सुख, अब कहां! सोचता हूं- तब हम गाय-बैल को तंग क्यों नहीं करते थे? शायद इसलिए कि सीख लिया था- गाय हमारी माता है, बैल हमारा बाप है। अब जाना कि पहले ऐसा क्यों रटाया! गाय-बैल से ऐसा करते तो खेती और किसान जीवन गड़बड़ा जाता।
अब ना खेत रहे और ना खेती। ना वे किसान रहे और ना किसानी जीवन। है तो भी हमारे जीवन में कहां कितना महत्त्व है इन सब का। हम दौड़ते जीवन में फुर्सत कहां से निकाले कि इनको देखें-जाने। बदली दिनचर्या में कुत्तों-बिल्लियों से लेकर घोड़ों-गधों-ऊंटों के लिए प्यार-नफरत की छोडि़ए, ये देखने को बस किताबों और स्क्रीन पर नसीब होते हैं।
पहले प्रकृ ति और पर्यावरण का जीवन और विकास में महत्त्व हुआ करता था। अब तो किसी का कोई महत्त्व नहीं है। जरूरत पडऩे पर ही हम किसी को महत्त्व दे देते हैं। बचपन कितना सहज-सरल था। कोई मिला और मुस्कुरा दिए, अब हम मसीन है। सब कुछ मसीन की भांति करते हैं। हमारी बहुत मजबूरियां हैं। देखिए अगर साहब के सामने जाएंगे तो मुस्कु राना लाजमी है, और अगर रास्ते में साहब का कोई चम्मचा-चम्मची या कुत्ता दिख जाए तो सोचना पड़ता है कि क्या किया जाए, किस बात से बचा जाए! साहब और उनके प्रभामंडल के सदस्यों के अनुसार ही हमें हमारी आचार-संहिता का निर्माण करना होता है। ख्याल रखना पड़ता है कि साहब हमारी किसी बात से नाराज नहीं हो जाए। उनकी नाराजगी का नतीजा हमारी ए.पी.आर. तक पहुंच जाता है।
पंच काका कहते हैं कि तालाब में रहकर मरगमच्छ से बैर नहीं करना चाहिए। यह भी दस्तूर है कि इंसान जैसे ही साहब की पदवी पाता है, वह दूसरी भांति का प्राणी बन जाता है। उसे ऊपर से लेकर नीचे तक सिस्टम में सब एडजेस्टमेंट करना होता है। साहब है तो क्या हुआ, साहब के भी तो साहब होते हैं। इसलिए कभी मूंछें नीची, तो कभी मूंछें ऊंची। उन्हें कभी भौंकना पड़ता, अवसर विशेष पर कभी किसी को दांत दिखाने पड़ते हैं। किसी को कभी काटना पड़ता है। हमें साहब को समझने के लिए जानवरों से कुछ सीखना चाहिए। 
० नीरज दइया