28 सितंबर, 2016

सेल्फी लेने के नए आइडिया

लॉस एंजिलिस भाषा द्वारा तो बहुत बाद में शोध-खोज कर कहा गया है कि स्मार्ट फोन से सेल्फी लेना और इन तस्वीरों को साझा करना हमें खुशमिजाज व्यक्ति बना सकता है, हम तो बहुत पहले से ही सेल्फी लेने वाले हैं और हमारे यहां के गीतकार ने तो गाने में भी कह दिया कि चल बेटा सेल्फी ले ले। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्त्ताओं के अध्ययन का यही सार अब आया है तो सकारात्मक प्रभाव की बात आपको भी माननी पड़ेगी।
जब मैं और मेरे जैसे अनेक भाई-बंधु अपनी सेल्फी और सेल्फी क्यों बहुत सारी या कहें ढेरों सेल्फियों को आपके सामने परोसते थे तो आपका उन्हें लाइक करना तो दूर नकात्मक बातें करते थे। आपने लाख बार कहा होगा कि देखो अपना फोटो कितनी बार बदलते हैं। ऐसे नए नए फोटो लगाने से चेहरा कोई बदलने वाला नहीं है। जो चेहरा पहले में था वही दूसरे और तीसरे में ही नहीं दस हजारवें में भी वही होगा। बदलाव तो होगा पर आपको नजर नहीं आएगा। यह बदलाव धीरे-धीरे होता है।
हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवियों की खाशियत यह कि उनको मैं कहूं या पंच काका कहें उनकी बातों पर संदेह करते हैं। अब जब यूनिवर्सिटी के पोस्टडॉक्टरेट और लेखक यू चेन ने कह दिया तो सकारात्मक विचारों की वृद्धि के लिए स्मार्टफोन से सेल्फी लेकर साझा करने को उपलब्धि मानने लगे हैं। क्या यह कमाल की बात नहीं कि कोई शोध होता तो विदेश में है और उसके परिणामों को देखते हुए लागू उसे प्रभावशाली मान कर दूसरे देश भी उसे ही परमसत्य मान लेते हैं। अब इस सेल्फी को ही लिजिए कि सेल्फी का प्रभाव जानने के लिए 41 कॉलेज छात्रों को शामिल कर चार सप्ताह तक अध्ययन किया गया और अध्ययन में हिस्सा लेने वाली 28 लड़कियां और 13 लड़कों को शामिल किया गया। अब जब इसे हमारे भारत के संदर्भ में देखें तो गौर करने वाली बात है कि हमारे यहां तो लड़कियां कम है और इस अध्ययन में लड़कियों की संख्या अधिक रखी गई है। दूसरी बात यह अध्ययन कॉलेज के विद्यार्थियों पर किया गया है जब कि हमारे देश में तो अब छोटे छोटे बच्चे स्कूल में जाने वाले भी सेल्फी के दीवाने हैं।
जब मैंने इस सेल्फी के बारे में लिखने का मूड बनाया तो पंच चाचा ने कहा यह विषय बहुत अच्छा है और लिखना है तो सेल्फी के नए आइडियों के बारे में लिखना। मैं पंच चाचा की बात मानता रहूं और आगे भी मानता रहूंगा। आपकी अपनी मर्जी है आप माने या नहीं माने। भले लोग तो यह भी कहते हैं कि कोई अच्छी बात अगर कोई किसी को कहे और हमें ठीक लगे तो हमें बिना कहे ही माननी चाहिए। आप भी अगर सेल्फी लेने के नए आइडिया के बारे में लिखना चाहते हैं तो आपका भी स्वागत है।
मेरा मानना है कि ‘सेल्फी लेने के नए आइडिया’ विषय इतना रोचक है कि इसकी रोचकता बस एक आलेख में पूरी समा ही नहीं सकती और दूसरा यह भी कि यह विषय तो हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहत सुनत बहु बिधि सब संता की भांति है।
हे सज्जनों ! यदि आप लिखते हैं हरि कथा की भांति इस विषय पर लिखिएगा तो पाएंगे कि आपके पौ-बारह पच्चीस हो रहे हैं। मैंने तो तय कर लिया है कि इस विषय पर एक बड़ी किताब लिखूंगा और उसकी कीमत भी अच्छी खासी रखनी होगी, क्यों कि अब तो सेल्फी का राज यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्त्ताओं ने जग जाहिर कर दिया है। सब से बड़ी बात यह है कि हर तरफ नकारात्मकता के रहते हुए भी हम आज भी सकारात्मता की बात कर रहे हैं, तो हो जाए इस बात पर एक सेल्फी। सामने देखिए।

21 सितंबर, 2016

ठग जाने ठग की भाषा

         म जिस महान भारत देश में रह रहें हैं, वहां हर कोई हमें कुछ न कुछ सुनाने को आमदा है। और हमारा हाल यह है कि हम इतना कुछ सुन चुके हैं कि कहीं कुछ बाकी नहीं लगता। देश से बाहर जो हमारा काला धन है, देश में आएगा। यह हमने इतना सुन लिया कि अगर काला-सफेद धन आता है और हम सब में बांटा भी जाता है तो वह रकम हमारे इस सुनने-सुनाने का हर्जना भर होगी। पूरी दुनिया में मुफ्त में सब कुछ सुनने वाले अगर कहीं किसी को मिल सकते हैं तो भारत में मिलेंगे।
         सीधे-सीधे तो किसी से यह सवाल पूछा नहीं जा सकता- ‘आप ‘खग’ का अर्थ जानते हैं या नहीं?’ तो उल्टे-पुलटे ढंग से प्रयास करते हैं। आप चाहे यकीन करें या न करें पर यह ऐसा समय है कि देश का बच्चा-बच्चा कुछ जाने न जाने पर ‘ठग’ और ‘ठगना’ तो जान ही गया है। डार्विन के वर्षों पुराने सिद्धांत का नया पाठ हमारे पंच काका ने तैयार किया है- ‘ठगना और ठगे जाना’ जो इन दिनों बेहद लोकप्रिय हो रहा है। पंच चाचा कहते हैं कि हमारे पास कुछ ऐसे सवाल और मुद्दे होने चाहिए कि जिससे सामने वाला हमें सुने और सुनता रहे। इस सुनाने और सुनाने के क्रम में वे बातें भी हम बीच-बीच में सुना सकते हैं, जिन्हें सुनने वाले बखूबी जानते हैं। और जानते भी इस हद तक है कि उन्हें सुन-सुन कर बोर ही नहीं अब तक तो पूरे पक चुके हैं।
         भारत की जनता ने वर्षों इतना कुछ सुना और सदियों से सुनती चली आ रही है कि सुनना सभी के जीन्स में शामिल है। हरदम कुछ न कुछ सुनना-सुनाना हमारा वंशानुक्रमित लक्ष्ण है। अब तो हाल यह है कि जिसे देखो सुनाने को आमदा है। सुनने वाल कौन बचा है? घर में पिता की न बेटा सुनता हैं न बेटियां और ऐसा ऐसा घर तो शायद ही भारत भूमि पर पाया जाएगा जहां पति सुनाएं और पत्नी सुने। देश, समाज और राजनीति में भी जो कुछ सुनाने में सक्षम हैं, वही राज करते हैं। सत्तारूढ़ इतना कुछ सुनाते हैं कि हमें वोट देते समय सोचना पड़ता है कि शायद दूसरा अथवा तीसरा विकल्प कुछ कम सुनाने वाला होगा।
         हमारी विवशता है कि हम ऐसे समय में हैं जहां अब हमें किसी को कुछ सुनाने के नए-नए तरीके इजाद करने होगे। ऐसे में बहुत जरूरी हो गया कि आप कुछ ऐसी घटनाओं, ब्यौरों और शब्दों को याद कर लें, जो दूसरे नहीं जानते हैं। ध्यानाकर्षण के लिए यह बहुत जरूरी है। खैर बात ‘खग’ की करते हुए, मैं भी इतनी चतुराई से आपको कहां ले आया हूं। आपको अब तो लगने लगा होगा कि अरे यह ‘खग’ तो बहुत उड़ लिया। ‘खग’ के बहाने मैं ऐसे ठगों की कह रहा हूं जिनसे हम ठगे जाने की त्रासदी झेल रहे हैं।
         क्या आप जानते हैं रबीन्द्रनाथ टैगोर की ख्याति के कारणों में एक कारण उनका एक खग की कहानी लिखना भी माना जाता है। वर्षों से यह पंडितों का काम है कि वे खगों को भी पढ़ा सकते हैं। पर पंडित तो खग की भाषा नहीं जानते, और गनीमत यह कि सारे खग पंडितों की भाषा बखूबी समझते है। लोकतंत्र में राजा का नाम भले बदल गया हो, पर राजा अब भी तोते को चुटकी से दबाते हैं। पढ़े-लिखे तोते हैं जो ना हां करते हैं, ना हूं करते हैं। हां, उसके पेट में पोथियों के सूखे पत्ते अब भी खड़खड़ाने लगते है। मेरा तो यहां तक मानना है कि अब जो हम सुन रहे हैं, वह क्या सूखे पत्तों की खड़खड़ाट तो नहीं है?
         पंच चाचा कहते हैं- खग जाने खग की भाषा और ठग जाने ठग की भाषा। जीवन इस कदर रीतता जा रहा है कि कहीं कोई प्रतिरोध नहीं है। चंद सिक्कों की खनखनाहट और कुछ मरे हुए या जीवन से शून्यता की तरफ गति करते शब्दों की खड़खड़ाट सुनना ही भारतीय जीवन का शेष रह गया है।

17 सितंबर, 2016

कहां है उल्लू

पंच काका कह रहे हैं कि सच को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को टैक्स में अतिरिक्त राहत देनी चाहिए और झूठ पर टैक्स लगाना चाहिए। जिससे लोग मन की बात कह सकें। सुना है कि भारत देश में वर्षों से बिना मन की बातें ही होती थी, और अब मन की बातें होने लगी है।
भारतीय जन-मानस के सामने गोपियां का उदाहरण था। गोपियों ने उधो जी को कह दिया था- उधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस। पर हमारी त्रासदी की मन की यह बात आज तक हमने मन में ही रखी और अब वह समय आ गया है जब मन की बात कहें। एक कारण मन की बात मन में ही रखने का यह भी माना जा रहा है कि हमारे देश के किसी प्रधानमंत्री ने पहले कभी मन की बात की ही नहीं। यह देश में पहला अवसर है कि मन की बात प्रधानमंत्री जी करने लगे हैं।
यह मैं नहीं कहता हूं पर पंच चाचा कुछ बोलने में मुंहफट है। वे कहते हैं और यह उनका ही यहां तक मत है कि भारत देश इतनी समस्याओं से घिरा है कि भारतीय राजनीति में जो आता है वह अपना मन मगरमच्छ और बंदर की कहानी जैसे किसी पेड़ पर नहीं वरन तहखानों के सात तालों में बंद कर के ही आता है। भैया बच के रहना, ऐसे ही करना पड़ता है। जनता के दुख-दर्द का यह आलम है कि उससे कोई मन कितना ही चंगा-भला हो पागल हो जाएगा। कोई एक-दो या दस-बीस समस्याएं हों तो कोई सुने और गुने भी। यहां तो जनता-जनार्दन के पास थोक में समस्याओं का अंबार है, उसे बस हां-हूं कर सुनो और चलता करो। किसी को बस जनता को उल्लू बनाना आना चाहिए। उल्लू बनाना सीख लेने में ही फायदा है।
यहां समस्या कोई एक हो तो देखें भी कि क्या सच है और क्या झूठ है। यहां तो सच-झूठ इतना गड़मड़ है कि कुछ मालूम ही नहीं चलता है। यह तो सुनने-सुनाने और समझने-समझाने की कला है कि कोई सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर देता है। अब टैक्स की ही बात करें तो आयकर बचाने के लिए कितना सच-झूठ और क्या-क्या होता है। बाकायदा आयकर बचाने और आयकर की चपत लगाने वाले अपनी अपनी दुकानें खोलें बैठै हैं। यह पंगा सब छोटी-मोटी नौकरी करने वालों के लिए है। असली आयकर दाताओं को तो मालूम है कि लक्ष्मी जी की सवारी उल्लू है, और वे किसी को भी लक्ष्मी के बल पर उल्लू बना कर अपनी लक्ष्मी का वाहन बनाने से नहीं चूकते। ऐसे ही ज्ञानी तय करते-कराते हैं कि सरकार को किसे टैक्स में अतिरिक्त राहत देनी चाहिए और किस पर टैक्स अधिक लगाना चाहिए।
आज के युग में ऐसा कौन उल्लू होगा जिसे लक्ष्मी से प्यार नहीं हो। पर लक्ष्मी भी बेचारी क्या करे? इतनी जनता से तो एक साथ तो प्यार कर नहीं सकती, इसलिए वह छांट लेती है कि कौन उल्लू है और कौन उसकी सवारी को यहां से वहां पहुंचाने में काम आएगा। वह मन की बात हर किसी से नहीं करती। हमारे प्रधानमंत्री जी ने चुनाव जीतने के लिए मन की बात कही कि सभी भारतीयों के खातों में काल धन का एक हिस्सा आएगा। पर हाय रे हमारी किस्मत। इतनी अच्छी क्यों है? हमारी लक्ष्मी जानती है कि हमने वर्षों से उसकी पूजा की है। इसलिए काली लक्ष्मी को बैंक खातों में आने ही नहीं दिया। जिस किसी ने ऐसी उम्मीद की उल्लू बना दिया। यही कारण है कि सभी उल्लू लक्ष्मी का इंतजार करते हैं।
मुझे लगता है हमारे चारों तरफ उल्लू ही उल्लू है। जो धन के लिए आंखें फाड़ते हैं। ये पागल होकर घूमने वाले हर दूसरे को उल्लू समझते हैं। चाहते हैं हर कोई इनके लिए लक्ष्मी जी का वाहन बने, और उनको ले आए। आश्चर्य तो इस बात का है कि ये मन की बात तो करते हैं, पर पूछते हैं- ‘कहां है उल्लू?’
- नीरज दइया  
 

09 सितंबर, 2016

मायड़ भाषा का अविस्मरणीय सपूत : ओम पुरोहित ‘कागद’

हिंदी और राजस्थानी भाषा के प्रख्यात कवि-लेखक ओम पुरोहित ‘कागद’ के असमायिक निधन से भाषा-आंदोलन को गहरा आधात लगा है। उनका सड़क दुर्घटना में 12 अगस्त, 2016 को निधन होना साहित्य के इतिहास में अपूर्णीय क्षति के रूप में दर्ज होगा।
    राजस्थानी भाषा की मान्यता का सुनहरा सपना देखने वाले कागद जीवन पर्यंत एक योद्धा की भांति विविध क्षेत्रों में जी-जान से जुटे थे। उन्हें आधुनिक युग का कबीर कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। वे आजीवन कबीर की भांति लोकजीवन और संस्कृति में उन्नयन के लिए खोए रहे। साहित्यकार कागद एक ऐसे विरल रचनाकार थे जिन्होंने जीवन के कठोर सत्यों को अत्यंत निकटता से देखा-परखा था। युवा पुत्र को सड़क दुर्घटना में खो देने के बाद जैसे वे भाषा, साहित्य, संस्कृति तीनों मोर्चों को एक साथ संभाला कर खुद को खुदी से भूला देना चाहते थे। अपने दुख-दर्द को भूलाकर जैसे वे इस लोक में खो गए थे। उनकी इसी भावना और कार्यों के कारण वे न केवल अपनी रचनाओं से वरन पूरे साहित्य जगत से जुड़े अद्वितीय सभी के लिए आत्मीय रचनाकार बने हुए थे।
    कबीर के शब्दों में- ‘मैं कहता हूँ आखिन देखी, / तू कहता कागद की लेखी।’ की परंपरा में वे आंखों की देखी को कागद पर लिखते हुए जैसे अपना ‘कागद’ उपनाम सार्थक कर रहे थे। कागद की लेखी में अनुभव की गहराई, शिल्प का बांकपन और जीवन के जटिलताओं में बहुआयामी यथार्थ देख सकते हैं। ओम पुरोहित ‘कागद’  का जन्म 5 जुलाई 1957 को श्रीगंगानगर के केसरीसिंहपुर में हुआ था। राजस्थान शिक्षा विभाग में उन्होंने एक चित्रकला-शिक्षक के रूप में सेवाएं करते हुए, शैक्षिक प्रकोष्ठ अधिकारी पद तक का सफर किया। वे जीवन के अंतिम वर्षों में हनुमानगढ़ जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक शिक्षा कार्यालय में सेवारत थे।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ को राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर के अलवा अनेक मान-सम्मान और पुरस्कार मिले। वे पुरस्कारों से बड़े रचनाकार थे। यह उनकी रचनात्मकता का सम्मान था कि वे उदयपुर और बीकानेर अकादमी में लंबे समय तक सदस्य के रूप में जुड़े रहे। उन्होंने लगभग दो वर्ष तक राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की मुख्य मासिक पत्रिका “जागती जोत” का संपादन किया था। कागद ऐसे लेखक थे जिन्हें केवल लिखने और छपने तक में विश्वास नहीं था। उनका मानना था कि साहित्य का पढ़ा जाना और युवाओं को साहित्य से जोड़ा जाना बेहद जरूरी है। मुझे याद आता है कि उन्होंने ‘जागती जोत’ के संपादक पद पर रहते हुए, अपने अथक प्रयासों से पत्रिका की ग्राहक संख्या को चरम तक पहुंचा दिया। वे एक आदमी के रूप में बेहतर इंसान और उच्च कोटि के रचनाकार थे। वे जहां जिस क्षेत्र में रहें उन्होंने अपनी कार्य-क्षमता और दक्षता से अपना स्थान अग्रिम पंक्ति में स्वयं प्रमाणित किया।
    कागद राजस्थानी भाषा मान्यता अनंदोलन के हरावल हस्ताक्षर के साथ भाषा, साहित्य, संस्कृति से ही नहीं जन आंदोलनों में शिक्षा-साक्षरता या किसी दूसरे कार्य में भी कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर के साथ ही संपूर्ण राजस्थान के लिए साक्षरता एवं सतत शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रवेशिका लेखन हो या नवसाक्षरों के लिए साहित्य लेखन उनका नाम अकसर चर्चा में रहता था। अनेक बार राज्य संदर्भ केंद्र में उनसे मिलने का मुझे सौभाग्य मिला। वे संदर्भ व्यक्ति के रूप में जिस जिस के साथ रहे, उसे उन्होंने अपना बना लिया। उनके हृदय में आत्मीयता और प्रेम की अविरल धारा थी। वे सहकर्मियों और पूरे समाज के लिए स्नेह और भाईचारा के अज्रस स्रोत वरदान के रूप में लाए थे। वे जन चेतना और आखर की अलख जगाने वाले सिपाही थे।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ के प्रकाशित कविता संग्रहों में प्रमुख है- बात तो ही, आंख भर चितराम, थिरकती है तृष्णा, आदमी नहीं आदि। इन के अतिरिक्त राजस्थानी में भाषा-विमर्श पर उनकी पुस्तक ‘मायड़ भाषा’ बेहद चर्चित रही। बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘सुरंगी संस्कृति’ हाल ही में प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक से जान सकते हैं कि वे किस कदर भाषा और संस्कृति के गहन अध्येता थे। इस पुस्तक में उनके विविध विषयों पर छोटे-मध्यम आकार के सारगर्भित पठनीय 34 मौलिक आलेख संकलित हैं।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ ने राजस्थानी के अप्रकाशित कवियों की संभावना को देखते हुए अज्ञेय की भांति राजस्थानी भाषा में सप्तक परंपरा का आगाज किया। उनके महत्त्वपूर्ण कार्यों में “थार सप्तक” के सात खंड़ याद किए जाएंगे। इन में उन्होंने राजस्थानी के 49 कवियों की कविताओं का संपादन-प्रकाशन कर एक ऐतिहासिक उदाहारण प्रस्तुत किया है। उनका यह कार्य कविता के इतिहास में याद किया जाता रहेगा। वे कवि-लेखक के साथ रंग और रेखाओं के भी गहरे जानकार थे। उन्होंने अनेक स्कैच और पेंटिंग से अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। एक संपूर्ण कलाकार की आत्मा उन में बसती थी। स्वयं दुख और कष्ट सहकर भी दूसरों की मदद करते रहना उनकी इंसानित थी। वे अच्छे गद्यकार भी थे। उन्होंने अनेक पुस्तकों की समीक्षाएं लिखी तथा शिक्षा विभाग के पांच सितम्बर को प्रतिवर्ष प्रकाशित विविध विभागीय प्रकाशनों में अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाएं दी। उनकी काफी कहानियां भी प्रकाशित हुई थी। मुझे लग रहा था कि साहित्यकार के रूप में उनके कहानीकार रूप को जांचा-परखा जाना शेष है। किंतु यह काम होता उससे पहले समय ने जल्दबाजी में एक बड़ी गलती कर दी। असमय हम सबके प्रिय और आदरणीय कागद जी चले गए। समय की इस गलती की अब कोई भरपाई नहीं है। यह मेरी निजी क्षति भी है। वे सदा प्रेरक थे और प्रेरक रहेंगे। ‘मायड़ भाषा’ के ऐसे अविस्मरणीय सपूत को शत-शत नमन।
("शिविरा" के "शिक्षक दिवस विशेषांक" में सितम्बर, 2016 में प्रकाशित)

02 सितंबर, 2016

पांच लेखकों के नाम

र्षों पहले किसी लेखक से पंच चाचा ने सवाल किया था- पांच लेखकों के नाम बताओ?’ तब वह बेचारा लेखक नाम नहीं गिना पाया या इस संकोच में रहा होगा कि किसका नाम लूं और किसका छोड़ूं। ऐसा भी हो सकता है कि उसे उस समय पांच लेखकों के नाम मालूम ही नहीं हो, और होने को तो यह भी हो सकता है कि वह लेखक पूरे साहित्य-संसार में सिर्फ स्वयं को ही लेखक मानता हो सो चार नाम कौनसे लिए जाए। खैर हुआ यह कि वर्षों बाद वही लेखक पंच चाचा को देख उनके पीछे पीछे दौड़ता आया और हांफते-हांफते बोला- ‘मैं पांच लेखकों के नाम बताना चाहता हूं।”
       ऐसे कोई आपके पीछे दौड़ लगाकर आए और कहे मैं पांच लेखकों के नाम बताना चाहता हूं तो आप क्या कहेंगे। वह लेखक तो वर्षों तक पांच लेखकों के नाम की तलाश में भटकता रहा था और दौड़ते-दौड़ते इस दिन तक पहुंचा कि वह खुद को पांच लेखकों के नाम बताने लायक समझ रहा था। पंच चाचा मुस्कुराए और बोला- “क्यों?”
       उस लेखक ने अगला-पिछला सारा विवरण दिया और बोला- ‘आपने तब पूछा था और मैं अब बता रहा हूं तो कोई परेशानी है क्या?’ पंच चाचा ने इसे सहृदयता से लिया और बोले- ‘तुम इतने वर्षों पांच लेखकों के नाम नहीं बता पाए तो अब क्या खाक बताओगे! चलो चाय की दुकान पर चाय पीते हैं और मैं तुम को वहीं पूरी बात समझा सकूंगा।’
       वह पंच चाचा के पीछे-पीछे चाय की दुकान पहुंचा और दो चाय का बोलकर सामने बैठ गया। पंच चाचा फिर शुरु हो गए- ‘पर तुम पांच लेखकों के नाम जो बताने वाले हो वे कहां के हैं? तुम्हारे अपने ही घर-परिवार के हैं या गली-मौहल्ले के हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि पांच के पांच नाम हमारे ही शहर के तुम बताने लगो। और अगर ऐसा है भी तो देखना होगा कि पांच लेखकों की विधाएं क्या-क्या है? उन में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। उन की कितनी-कितनी किताबें प्रकाशित हुई है और कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं। साथ में यह भी देखना होगा कि समकालीन आलोचना ने उनका मूल्यांकन किस श्रेंणी का मानकर किया है। भैया मैंने तुम से जोड़-तोड़ कर लेखक बनने वाले लेखकों के नाम नहीं पूछे थे। मुझे यह भी देखना होगा कि तुम कितने संकीर्ण हो, प्रांत और देश की सीमा से भी ऊपर उठकर बात करनी होती है। कहा जाता है कि जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। समझ रहे हो ना तुम, यह मामला ऐसा है कि तुम को कवियों के जब गूढ़ स्थानों की जानकारी हो ही नहीं सकती तो नाम क्या जान सकोगे। कोई कहीं पहुंच गया होगा और कोई कहीं।’
       इतने में चाय आ गई। पंच चाचा के सामने उसकी तो जैसा बोलती बंद हो गई। वह सिर झुकाए मनन करता रहा तो पंच चाचा ने फिर बोलना चालू किया- ‘सुन भैया, तुम क्या बड़े-बड़े लेखक पांच लेखकों के नाम नहीं बता पाते, जहां उन को नाम बताने होते हैं वहां कन्नी काटते हैं या फिर एक-दो रटे-रटाये नाम लेकर आदि-आदि से काम चलाते हैं। साहित्य पढ़ने-पढ़ाने वाले भी बस कोर्स की किताबों तक वर्षों घसीटते रहते हैं। किसी से पूछो कहानीकार का नाम तो प्रेमचंद और कवि का नाम पूछो तो तुलसीदास से आरंभ करेंगे और दो-च्यार नाम के बाद गाड़ी रुक जाती है।’       वह लेखक उठ खड़ा हुआ और बोला- ‘मुझे माफ कर दीजिए, मैं पांच लेखकों के नाम नहीं जानता। बस एक ही नाम जानता हूं, वो है आपका।’
- नीरज दइया