10 मार्च, 2017

कविताओं के बारे में कविताएं : पाछो कुण आसी

    ‘पाछो कुण आसी’ डा. नीरज दइया का तीसरा राजस्थानी कविता संग्रह है। इससे पूर्व उनके ‘साख’, ‘देसूंटो’ राजस्थानी में और ‘ऊचटी हुई नींद’ हिंदी में कविता संग्रह प्रकाशित हैं। वे अनुवाद से भी जुड़े हैं, और उन्हें हिंदी के साथ अनेक भारतीय कवियों की कविताओं के अनुवाद का लंबा अनुभव भी है। यह यहां रेखांकित करने का अभिप्राय कि नीरज दइया समकालीन भारतीय कविता के वर्तमान स्वर से पूर्ण परिचित है। संभवतः यही कारण है कि इस संग्रह में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो उनके कवि रूप को पहले की तुलना में अधिक गंभीर और प्रमुखता से अवस्थित करता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वे जहां आरंभ में युवा मन की अनुभूतियां रचते थे, यहां तक पहुंचते हुए वे उम्र और अनुभव की आंच से कविता लोक का एक परिपक्व वितान रचते हैं। कहना होगा कि कवि नीरज दइया राजस्थानी के एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर के रूप में पहचाने जाने लगे हैं।
    संग्रह की कविताओं का पाठ बाहर से जितना सरल-सहज प्रस्तुत होता दिखता है, वह भीतर से उतना ही जटिल व गुंफित है। ‘पाछो कुछ आसी’ संग्रह की कविताएं अपने पाठ के पीछे जैसे कोई आक्रोश या कहें घनीभूत पीड़ा से प्रेरित है। यहां काव्यानुभूतिया का विस्तार भीतर से बाहर, व्यष्टि से समष्टि में होता हुआ चहुंदिश से हाहाकार करता उद्वेलित करता है। कुछ संकेतों को स्थूल अर्थों में लिया जाए तो यहां एक ओर निकटतम पारिवारिक रिश्तों की असल हकीकत, उनसे मिले नैराश्य-प्रताड़ना पर आत्ममंथन है तो दूसरी ओर सम्बन्धियों, मित्रो और व्यवस्था के दोगले चरित्र, व्यवहार का जीता-जागता लेखाजोखा भी है।
    “म्हारी वा मुळ्क/ मा री मुळ्क/ जिकी बिसरगी/ मुळकती- मुळकती/ म्हनै” एक अन्य कविता में- ”ठीक कोनी/ घणो सीधो सादो होवणो/ लोग मोको तकै” आज की कुछ ऐसी ही जीवंत स्थितियों की व्यंजनाएं हैं। ऐसी घनीभूत पीड़ादायी अनुभूतियों को कवि ने बहुत ही सहजता से अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है। ‘दोस म्हारो नीं/ थारै स्वाद रो है’ के माध्यम से वह साफ कहता है कि अगर उसका कहा, लिखा अगर आपको नहीं रुचता तो यह उसका नहीं वरन आपके स्वाद का दोष है। ‘समझो नै/ सीखो, कठै कांई सबद बोलणा चाइजै/ कद किसो सबद बरतणो चाइजै...” जैसी उक्तियां इस बात का संकेत है कि हम शब्दों के प्रयोग के प्रति कितने लापरवाह हैं। पीड़ा और चेतावनी के ये वेदना युक्त स्वर ‘पाछो कुण आसी’ कविता-संग्रह का केंदीय भाव है।
    कवि स्पष्ट शब्दों में लिखता है- ‘आवणियै काल खातर ओ सवाल जरूरी है- काल अर आज में कांई फरक है।’ मुझे लगता है ‘पाछो कुछ आसी’ की कविताएं इन्हीं सवालों से जूझती है। सम्बन्धों के स्खलन को किस खूबसूरती से नीरज ने अभिव्यक्त किया है- ‘जिको कीं दियो जा सकतो हो/ सो कीं देय दियो/ संपत खातर/ बगतसर पल्लै राखी/ थोड़ी सी’क सरम/ थोड़ो क नेठाव..” यह जो थोड़ी-सी शर्म और धैर्य रखने की बात कवि अपनी इस कविता में कर रहा है, वह केवल ‘पाछो कुण आसी’ के कवि की ही नहीं, वरन सभी कला रूपों और कला माध्यमों से जुड़े समज की सामूहिक अभिलाषा है।
    कविताएं ऐसे ही नहीं लिखी जाती। कविता लिखने और रचने का अपना सुख, अनुभव और शिल्प है। कविता को हम किसी यांत्रिक तकनीक के तहत सांचे में नहीं ढाळ सकते हैं। इस संग्रह में कवि ने कुछ कविताएं कविता की रचना प्रक्रिया को लेकर भी लिखी हैं। उदाहरण के लिए इन पंक्तियों को देखा जा सकता है- “आंगणै आवै कविता बादळां दांई/ बरसै तो बरसै नीं बरसै तो करता रैवै टाळ बादळ/ बरसां बरस कोनी बरसै बरसणिया बादळ/ किण री मजाल/ कै एक छांट ई बरसा लेवै/ बिना मरजी” कविता सर्जन के बारे में यह सोच ही किसी कवि को एक अच्छा कवि बनाता है। यह प्रविधि और स्पष्टता ही कविता से अच्छी कविता उम्मीदें बधांता है। निसंदेह नीरज दइया इस कसौटी पर प्रमाणित और खरे उतरने वाले कवि हैं। उनकी कविता और राजस्थानी भाषा को लेकर संग्रह में कुछ उल्लेखनीय कविताओं को देखते हुए इस तथ्य दोहराया जा सकता है कि इन कविताओं में समकालीन कविता के बदलते रंग और रंगत की अनुगूंज साफ सुनाई देती है। इतना होने के उपरांत भी इस संग्रह में अंत में शामिल की गई गद्य कविताओं से मैं इत्तेफाक नहीं रखता। मुझे गद्य कविताओं में कविताएं कम और लघुकथाएं अधिक अनुभूत होती हैं।
    अच्छी छपाई के लिए सर्जना और सुंदर आवरण के लिए भाई रामकिशन अडिग को बधाई! और आखिर में डा. नीरज की कविताओं के बारे में डा. आईदान सिंह भाटी से सहमत होते हुए उन्हीं के शब्दों को दोहराना चाहता हूं- “नीरज दइया री ऐ कवितावां आज अर बीत्योड़ै काल री तो कवितावां है ईज, आवणाआळै काल रा पळका ई आं कवितावां में पड़ै।”
० नवनीत पाण्डे
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पुस्तक : पाछो कुण आसी 
विधा : काविता 
भाषा : राजस्थानी
कवि  : नीरज दइया 
प्रकाशक : सर्जना, बीकानेर
संस्करण : 2015 प्रथम 

पृष्ठ : 96 
मूल्य : 140/-

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