06 मार्च, 2017

फन्नेखां पर क्यों लिखूं?

लेखक का किसी पर लिखना अथवा नहीं लिखना किसके हाथ में है? क्या खुद लेखक के हाथ में है, या कई दूसरे घटक काम करते हैं। लेखक लिखता अथवा टाइप अपने हाथों से जरूर करता है, पर यह सब उसके वश में नहीं होता। भीतर-बाहर की प्रेरणा और परिस्थितियों से लिखा जाता है। कोई रोजाना लिखता है। सुबह-दोपहर और शाम लिखता है। रात को सोता नहीं और लिखता है। पर कुछ ऐसे भी है जो सालों-साल नहीं लिखते हैं। लिखना तो सभी चाहते हैं, पर लिखा नहीं जाता। अधिक ज्ञानी लेखक लिख नहीं सकते। वे जब कुछ भी लिखते अथवा लिखने की सोचते हैं तो उसका ज्ञान हावी हो जाता है। उन्हें लगता है- यह श्रेष्ठ नहीं है। ज्ञानी लेखक केवल श्रेष्ठ लिखने की सोचता है, और लिख नहीं पाता। ज्ञानी जिसे अज्ञानी और सामान्य समझता है वह अपने लेखन में लिखते-लिखते अनेक श्रेष्ठ रचनाएं लिख लेता है। यह ज्ञान कुछ तो वास्तविक होता है, और कुछ को भ्रम हो जाता है कि इतने साल हो गए सो अब तो हम ज्ञानी हो ही चुके हैं। कुछ अपनी उम्र से और कुछ अनुभव से परमज्ञानी होने का भ्रम पाल लेते हैं। वे फिर परामर्शक बन जाते हैं। ऐसा ही भ्रम एक लेखक को हो गया कि मैं लिखता हूं। मैं लिखता जरूर हूं पर ज्ञानी अथवा परमज्ञानी होने का भ्रम दूर रखता हूं। मैं लिखता जरूर हूं पर किसी के कहने पर लिखता नहीं हूं और किसी के कहने पर रुकता भी नहीं हूं। तो हुआ यूं कि एक लेखन महोदय ने अपनी किताब भेजी और लिखने का अनुरोध किया। उन्हें मैं किसी योग्य लगा तभी उन्होंने अनुरोध किया होगा। मैंने सहृदयतावश कह दिया- जी, मैं प्रयास करूंगा। यह कहना मेरा अपराध था। उनके साप्ताहिक फोन आने आरंभ हो गए। हर बार पूछते हैं- लिखा क्या? मेरी किताब पर लिखा क्या? कब तक लिख देंगे? किसी किताब पर लिखना कोई कठिन काम नहीं है। कोई भी लिख सकता है। किसी भी किताब पर लिख सकता है। कोई चाहे तो अपनी खुद की किताब पर खुद भी लिख सकता है। ऐसा हो सकता है कि खुद लिख कर अपने किसी मित्र का नाम अटका दिया जाए। कुछ लिखने वाले ऐसे भी हैं कि खुद आगे बढ़ कर अनुरोध करते हैं कि हम से लिखवा लो। हम लिख देते हैं। ऐसे बहुत से विकल्प हैं। फिर भी मैं उन मित्र पर नहीं लिख सका। मुझे किताब जमी नहीं कि उस पर कुछ लिखने का मन बना सकूं। किसी को सीधे-सीधे यह कहना भी अभद्रता है कि मुझे आपकी किताब ठीक नहीं लगी। माफ कीजिए, मैं नहीं लिख सकता। ऐसी अभ्रदता को बचाने के चक्कर में वे मेरा साप्ताहिक खून पीते रहे हैं और मैं अब तक पिलाता रहा हूं।
            एक दिन पंच काका मुझ से बोले- तुम, फन्नेखां पर क्यों नहीं लिखते? मैंने कहा- क्यों क्या हुआ? क्या बात है? क्या उन्होंने अपको भी फोन किया है? काका बोले- नहीं उसे छोड़, यह बता लिखने में तुझे समस्या क्या है? मैं क्या कहता, बस इतना ही कि आप कहेंगे तो लिख दूंगा। बहुत बार अनेक काम हम मन मार कर भी करते हैं। पर दूसरे ही पल सोचा- मैं फन्नेखां पर क्यों लिखूं? मेरा लिखना इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है, जिस के लिए फन्नेखां मरा जा रहा है। फोन पर फोन कर रहा था और अब काका तक पहुंच गया। आपने किताब लिखी, छपा ली और मुझे भेज कर प्रेम, मूर्खता अथवा आदर जो भी प्रगट करना था कर दिया। अब उन्हें भूल जाना चाहिए। मुझे अगर किताब अच्छी लगेगी अथवा मेरा मन करेगा तो उस पर लिखूंगा। यह कोई जवरदस्ती हुई कि लिखने के लिए मजबूर किया जाए। भाई फन्नेखां! बस करो यार। आगे से अब मुझे फोन मत करना। मेरे भीतर का भद्र इंसान अब अभद्र होने वाला है। वह अभ्रद कह देगा- दो कौड़ी का लेखन है तुम्हारा। जाओ मैं नहीं लिखता।
० नीरज दइया

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