20 अप्रैल, 2018

नाक का बांका बाल / डॉ. नीरज दइया

    साहब के आगे बाबू ने एक पत्र किया और बोला- इसका क्या करना है.... साहब ने इस आग्रह पर गौर फरमाते हुए पत्र पर एक सरसरी दृष्टि डाली और बोले- अरे ! मैंने तो इसे पढ़ा नहीं, तुम्हीं बताओ क्या है? बाबू ने साहब को बताया- हेड ऑफिस में इसी महीने आठ तारीख को अधिकारियों की एक कार्यशाला होनी है। जिस में आपको ‘नाक का बांका बाल’ विषय पर व्याख्यान देना है। साहब सोच में पड़ गए। यह भी क्या अजीब सा विषय दिया। प्रत्यक्ष में बोले- हां तो तुम डीएफए तैयार करो। बाबू ने अपनी सीमाओं को उल्लेखित किया तो साहब ने तत्काल अर्जेट मिटिंग रख दी और बाहर चपरासी को बता दिया किसी को अंदर नहीं आने दिया जाए।
    ऑफिस के खास खास कर्मचारी मंत्रणा के लिए साहब के कमरे में पहुंच गए और बाहर पहरेदार चपरासी ने रटा-रटाया हुआ जुमला- ‘साहब बीजी है, अर्जेंट मिटिंग ले रहे हैं।’ मुंह में दबा लिया, जिससे कोई भी आए या पूछे तो तुरंत जबाब दिया जा सके। साहब बड़े नेकदिल और नियम पसंद आदमी है इसलिए ऑफिस बड़े ढंग से चलता है। ऐसे साहब अगर हरेक ऑफिस में हो जाए तो देश ढंग से चलने लग जाए। मिटिंग में देश के ढंग से नहीं चलने के सबूत पर चर्चा हो रही थी। बड़े बाबू कह रहे थे कि देश अगर ढंग से चलता तो यह गलत विषय साहब तक नहीं आता। विषय में बदलाव बिना हेड ऑफिस की मंजूरी के हो नहीं सकता और अगर विषय केवल ‘नाक का बाल’ होता तो सरलता रहती। अब समस्या यह है कि नाक का बाल बांका है, जिसके बांकपन से छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। हिंदी अधिकारी अपना ज्ञान दे रहा था कि सर, जरूर कुछ मिस्टेक हुआ है। यह कोई दूसरा विषय होगा- ‘बाल तक बांका न होना’ उसमें से यह बांका सब इधर सिफ्ट हो गया है। जैसे हम समस्या से परेशान हो रहे हैं वैसे ही कोई दूसरा ऑफिस भी समस्या में होगा। जाहिर है उन्हें विषय मिला होगा- ‘बाल तक न होना’। सर आप अपने जानकारों को फोन पर बात कर पूछिए कि उन्हें क्या क्या विषय मिला है।
    साहब जरा बिदक गए- इसमें दूसरों को फोन करने वाली कौनसी बात है। जिसे जो मिला है उसे उसी पर काम करना होता है। आप लोग यहां मेरे सामने इतना बोल लेते हैं, आपको खबर होनी चाहिए कि हम हमारे उच्चाधिकारियों से ऐसे चपर-चपर थोड़ी कर सकते हैं। ‘बाल तक न होना’ की तुलना में ‘नाक का बांक बाल’ विषय जरा टेढ़ा है। बाल तक न होना तो सीधा-साधा है कि गंजेपन के बारे में बात करनी है। साहब में डबल एओ साहब की तरफ देखा जो नाक में अंगुली डाले ना जाने किस कार्य में व्यस्त थे।
    वे स्थिति को भांपते हुए जरा चौंक कर बोले- यह सब आपके बस का रोग नहीं है छोटे बाबू। अगर होता तो खुद ही कुछ ना कर लिए होते। साहब ने हाथ के संकेत से उन्हें रोका तो वे कहने लगे- साहब आप पहले चाय-नाश्ते का बोलो, तभी कुछ दिमाग चलेगा। भूखे भजन ना होत गोपाला। साहब कैसे भी हो एकाउंट वाले उन्हें अज्ञाकारी बना ही लेते हैं। डबल एओ साहब का मान रखते हुए साहब ने झटपट व्यवस्था के लिए आदेश जारी किए। फिर मिटिंग में जोश आना ही था। डबल एओ साहब बोले- सर इसके लिए एक पैनल बना देते हैं जो कुछ खोज खबर करेगा फिर जो रिपोर्ट आएगी उसको नोटसीट पर ले लेंगे और हमारा काम बन जाएगा। कोई भी काम हो उसे विधिसम्मत करने से बाद में परेशानी नहीं आती। नहीं तो बाद में यह मुद्दा बनेगा कि हमने तो नाक के दाहिने भाग बाले बांके बाल का लिखा था और अपने बाएं भाग वाले बाल की चर्चा कर दी है। ऐसे ओब्जेक्शन में यह भी ध्यान रखें कि बाल कितना बांका है यह इस पत्र में स्पष्ट नहीं लिखा है। सर, एक बात गौर की आपने.... देखिए इस लेटर में बाल की लेंथ के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया है।  
    साहब चहकते हुए बोले- यही तो मैं कहता हूं कि हेड ऑफिस में सारे मूर्ख भरे पड़े हैं। क्या करते हैं और क्या नहीं करते हैं कुछ मालूम नहीं चलता। देश में वैसे ही इतनी अफरा-तफरी है ऐसे में नाक जैसे संवेदनशील मुद्दे को टच ही क्यों किया जाए। देखना ये नाक बड़ा इश्यू बन जाएगा। स्टेनो जो अब तक चुप चाप बैठी थी ने हस्तक्षेप किया और बोली- सर, मेरे ध्यान में हमारे शहर में एक लेखक है जो लिखता-पढ़ता है। आप कहें तो उन से बात करें। अच्छा रहेगा कि उनसे ही लिखवा लें।
    ‘गुड, वेरी गुड।’ और साहब ने कहा- ‘ओके, काम बन गया। ऐसा करो पैनल में ये जो है लेखक उसका नाम डाल कर फाइल पुट अप कीजिए। साथ ही एक मिटिंग भी प्रपोज कर देना।’ सब कुछ साहब के आदेशानुसार हुआ। लेखक महाश्य पधारे और अपने विशद ज्ञानी होने का प्रमाण भी उन्होंने प्रस्तुत कर दिया। अफिस के सभी कर्मचारी तो कर्मचारी साहब भी उनके ज्ञान का लोहा मान गए। लेखक महाश्य ने बताया कि नाक के बाल अगर बांके नहीं हो तो नाक के रास्‍ते से धूल और दूसरी गंदगी सीधे फेंफड़ों तक पहुंच जाती है। ऐसे में सीधी बालों की तुलना में बालों को बांका रखा जाना चाहिए। यह विषय बड़ा सोच-समझ कर दिया गया है। कोई रचनात्मक रुचि सम्पन्न अधिकारी रहा होगा जिसने यह विषय रखा है। बांका बाल सौंदर्य-शास्त्र का विषय है। वैसे दूसरा पक्ष भी देखिए अगर बाल बांके होंगे तो वे नाक में एडजेस्ट हो जाएंगे और बढ़ने पर भी आपको या फिर हमको शर्मिंदा नहीं करेंगे। 
    लेखक महाश्य ने नाक के बालों की ट्रिमिंग के अनेक तरीकों को आजमाने की सलाह भी नोट करवा दी। हैरत तो साहब को तब हुई जब लेखक महाश्य ने बताया कि 'हेयरी नोज़' नामक एक फिल्म चीन में  बनी है जो वायु प्रदूषण के मुद्दे को उठाती हुई शहरी चीनियों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर रही है। साहब ने माना कि सरकारी लोग बस सरकारी होते हैं। ये लेखक किस्म के गैर सरकारी लोग ही सही सूचनाएं रखते हैं। अब देखिए ना इतनी बड़ी सूचना हमें नहीं थी। लेखक महाश्य अगर नहीं बताते तो हमें मालूम ही नहीं चलता कि पिछले साल 'नेचर' पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें चीन में प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या 13 लाख बताई गई थी।
    फिर क्या था साहब के लिए ‘नाक का बांका बाल’ एक नियत मानदेय पर तैयार हो गया। साहब ने अपने बड़े साहब को यह ब्रीफ बताने का विचार किया। उन्होंने सोचा कि मैं बताता हूं कि ‘हेयरी नोज’ फिल्म में बहुत सारे स्टाइलिश चीनी लोगों और एक कुत्ते को दिखाया गया है। जिन्होंने 'बदबूदार, दमघोंटू हवा और कभी ख़त्म न होने वाली धुंध' के बीच जीने का तरीका नाक के लंबे बालों के जरिए ढूंढ़ निकाला है। तो बड़े साहब को झटका लगेगा। साहब मन ही मन में मुदित होते सोचने लगे इस बार तो उन्हें बोलना ही पड़ेगा- कमाल कर दिया है तुमने। रियली यू आर ग्रेट। ये ‘नाक का बांका बाल’ बस तुम्हीं सीधा कर पाए हो। दूसरों को देखो, नोनसेंस। इतनें में बाबू आया और उत्साह के साथ बोला- सर, आठ तारीख वाली कार्यशाला केंसिल हो गई है।... साहब ने उसके हाथ से कागज लिया और यह देखा तो उनका उत्साह ठंडा हो गया।
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15 अप्रैल, 2018

हर समस्या का समाधान है नई समस्या

नीरज दइया
    मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सभी जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बात बिल्कुल छोटी सी है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह एक बेहतर स्थिति है। इससे आप भी मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र रहा है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं।
    हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि जो हम नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो हमने दिया और हम पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। हमें प्रर्दशन बिल्कुल पसंद नहीं है और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
    अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में जरा कंजूस-सा हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ स्थानांतरित हो जाएगी। अस्तु आप थोड़े में संतोष करें। संतोषी सदा सुखी होते हैं। मैं मेरी समझ का शेष पूरा भाग मेरे पास रखना अपना अधिकार मानता हूं। देखिए ना बाज वक्त मेरी यह समझ मेरे और आपके काम आनी है। हां, तो जैसा कि मैंने कहा लोहा लोहे को काटता है, यह हमारा आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में बहुत से लोग हरदम रोते ही रहते हैं।
    अब बेरोजगारी की समस्या की ही बात करते हैं। असल में हमें हमारी मूल समस्या का पता नहीं है और हमारे नेता यह अच्छे से जानते हैं कि जैसे लोहा लोहे को काटता है ठीक वैसे ही समस्या समस्या को काटती है। बस हमने हमारी एक समस्या को काटने के लिए दूसरी और दूसरी को काटने के लिए तीसरी समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है। अब हमारे यहां समस्याओं का एक अम्बार बन गया है। समस्या समस्या को काटती है की तर्ज पर बहुत से प्रयोग किए गए हैं। अब चुनाव की बात करें तो पार्टी पार्टी को काटती है।
    वैसे हमारी हर समस्या से भी देश में खुशहाली बढ़ी है। सुनने में तो बेरोजगारी की समस्या बड़ी लगती है पर इसी की बदौलत कितने ही लोग रोजगार पा रहे हैं। इसी बेरोजगारी से तो हमारी सरकार भी माला माल हो रही है। चार पोस्ट निकालती है और उसके लिए फार्म और फीस के नाम पर वारे न्यारे हैं। अब फार्मों के अंबार की समस्या जब आई तो सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जिनके लिए यह ऑन लाइन समस्या है उनके लिए भी हम किसी दूसरी समस्या का इजाद करेंगे। अब सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। इससे पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी अंत हुआ कि नहीं हुआ? बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल गर्दन नहीं हिलानी है। झूठ और सच में अंतर करना सीखो भाई। अब समय आ गया है कि सच को सच कहें और झूठ को झूठ।
    चलिए जो मन में है उसे कहना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं। जब वे कुछ छुपा कर नहीं रखते तो हम और तुम यानी आम आदमियों की औकात ही क्या है। सच में अब सभी को अपने अपने मन की बात कहनी चाहिए। समस्या यह है कि मन की बात कहना कठिन है।
    पंच काका का तो मानना है कि गोपियों की भांति हमारे मन को कोई कृष्ण ले गया है। हम बिना मन वाले भला मन की कोई बात कह ही कैसे सकते हैं। याद रखना किसी झूठ पर गर्दन हिलाने से पहले नेक-प्रोब्लम और बाद में नोज-प्रोब्लम हो सकती है।
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