31 दिसंबर, 2017

पुस्तक समीक्षा- डॉ. नीरज दइया

नम्बर वन आऊंला (राजस्थानी बाल कविताएं)
कवि : पवन पहाड़िया, प्रकाशक- नेम प्रकासण ग्रा.पो. डेह (नागौर) राज. 341022, पृष्ठ : 52 मूल्य : 100/- संस्करण : 2014   
   
    राजस्थानी भाषा और साहित्य के लिए विगत तीन दशकों से सक्रिय पवन पहाड़िया की पहचान एक कवि और राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु संघर्षशील रचनाकार के रूप में है। अपनी मातृभाषा के लिए ऐसे अनेक रचनाकारों की अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं हैं, जिनके रहते वे अनेक मोर्चों पर स्वयं खड़े होने के लिए विवश हैं। पवन पहाड़िया भी एक कवि-लेखक के साथ-साथ जनचेतना और साहित्य के प्रचार-प्रसार-प्रकाशन हेतु सक्रिय है। इसके अतिरिक्त वे राजस्थानी भाषा के नए रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने अनेक भामाशाहों को प्रेरित कर साहित्य पुरस्कार आरंभ किए हैं।
     ‘नम्बर वन आऊंला’ संग्रह पर पवन पहाड़िया को साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पुरस्कार (राजस्थानी) वर्ष 2017 का अर्पित किया गया है। यह बाल कविताओं का संग्रह उन्होंने प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार बी.एल. माली की प्रेरणा से लिखा है और यह संग्रह उन्हें ही समर्पित किया गया है। इस संग्रह की भूमिका में कविताओं में वर्णित विषयों और भावबोध का खुलासा करते हुए आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित लिखते हैं- ‘‘एक अबोध बाल का मन सदैव आगै बढ़ने की चाहत रखता है। यही चाहत उसे सदैव सफलता के शिखर तक ले जाती है। उसी चाहत को कवि अपनी रचनाओ- नम्बर वन आऊंला के मार्फत बालकों में जाग्रत करता है। चेतना को ललकारता है कि वह किसी से कम नहीं है, वह सदा सत्य के मार्ग चलते हुए एक नया इतिहास रचेगा। यही चाहना ही उसे सफलता दिलाती है, सर्वश्रेष्ठ बनाती है।’’   
आरंभ में अपनी बात ‘मेरा दर्द’ शीर्षक से व्यक्त करते हुए कवि पवन पहाड़िया लिखते हैं- “नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे चाहे अंग्रेजी में पढ़े-लिखें या हिंदी में पर घर में अपनी मातृभाषा को काम में लेंवे।” घर-परिवार और समाज में भाषा को संस्कार बनाएं रखने और जाग्रत करने के प्रमुख धेय से ही कवि ने इस संग्रह की 41 कविताएं लिखी है। पुस्तक की पहली कविता वंदना के रूप में करतार से अरदास है तो दूसरी बाल कविता ‘तिंरंगो’ में देश-भक्ति की भावना उजागर होती है। संग्रह में बालकों के आत्मीय और निजी संबंधों यथा मां, बहन आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया है। कवि कविताओं में श्रम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संदेश भी देता है कि पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलना-कूदना भी जीवन में उतना ही आवश्यक और अनिवार्य है। शिक्षा और चरित्र निर्माण की भावना इन कविताओं में प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं।
    संग्रह की अनेक कविताएं प्रेरणादायी है जिनमें बालकों से पानी के महत्त्व और वृक्षारोपण जैसे अनेक मुद्दों पर सीधा संवाद है। कवि मौसम की बात करते हुए गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमों के विविध रंगों को कविताओं में शब्दबद्ध कर अनेक बिंब रखते हुए सुंदर चित्रों को जैसे चित्रित करते हुए बालकों को समोहित करता है। कविताओं में बालकों को प्रिय लागने वाली तितलियों और बिल्लियों की दुनिया के साथ अन्य पशुओं-पक्षियों को भी वर्णित विषय बनाया गया है। इन कविताओं से बालकों में भारतीय त्यौहारों का हर्ष-उल्लास एक झलक के रूप में प्रस्तुत होता है। होली, दीपावली, अक्षय तृतीया और मकर सक्रांति जैसे पर्वों के माध्यम से बालकों को संस्कारित करने का प्रयास भी हुआ है।
    संग्रह की शीर्षक कविता में राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिभावान विद्यार्थियों को ‘लेपटोप’ दिए जाने को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्रेरित करने हेतु एक बाल मन के उद्गार कवि ने लयबद्ध अभिव्यक्त किए हैं। मूल कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘लेपटोप घर में ल्याऊंला / मां म्हैं नंबर वन आऊंला / बैगो दिनगै म्हनै उठाज्यै,/ दांतण करियां पाठ पढ़ाज्यै।’ बच्चों के द्वारा बच्चों को संदेश देना अधिक प्रेरक और प्रभावशाली है।
    बाल साहित्य के लिए कवि पवन पहाड़िया का सक्रिय होना सुखद है पर भाषिक संरचनागत कुछ बातों का भी यहां विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है। बालक जो भाषा सीख रहा है उसके समक्ष भाषा की अनेक चुनौतियां भी होती है। उदाहरण के लिए पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ‘नम्बर’ लिखा गया है जबकि संग्रह में कविता के शीर्षक में ‘नंबर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। पंचमाक्षर का यह रूपभेद समरूपता की मांग यहां रखता है। कविताओं के साथ प्रयुक्त चित्रों को केवल कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ते हुए किसी कलाकार के माध्यम से अधिक मेहनत के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभवाना बनी हुई है। ऐसी कुछ बातों के बावजूद यह संग्रह अपनी सरलता, सहजता, गेयता के कारण मनोहक और प्रभावशाली है। कवि को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और भाषा की गहरी सूझ-बूझ है। उनके छंद-ज्ञान से संग्रह की इन बाल कविताओं को बल मिला है। 
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27 दिसंबर, 2017

मूल : बुलाकी शर्मा / अनुवाद : नीरज दइया

राजस्थानी कहानी- हिलोर

    हमीद ने झोंपड़ी के पास मोटरसाइकिल रोकी और क्वाटरों के काम का जायजा लेने के लिए आगे रवाना हुआ।
    लाइन से क्वाटर बन रहे थे। पंद्रह-बीस आदमी-औरतें काम में लगे थे।
    “बालनजोगी, टांगों में सत नहीं है क्या? ऐसे कैसे बेसके पड़ रही है? फुर्ती से हाथ-पैर नहीं चलाए जाते?... अरे रामले, तुझे क्या हुआ? टी.बी. के मरीज जैसे क्या मरा मरा सा फावड़ा चलता है? गारा बनाने में इस साहब को क्या जोर आता है भाई..... ?”
    सोहन चलवे की बातें सुन कर हमीद मुस्कुराया। एक तरफ रखी खाट पर बैठते हुए कुछ जोर से बोला, “कैसे चलवोजी, काम ठीक-ठाक चल रहा है ना?”
    बीड़ी का कश खींचते हुए सोहनजी ने पीछे मुड़ क्र देखा, “ओह... ठेकेदारजी आप।”
    “जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलावो देखें।” सोहनजी मजदूरों को हिदायत देते हुए हमीद के पास पहुंचे और खाट के पैताने बैठ गए।
    कमीज के जेब से हमीद ने सिगरेट का पाकेट निकाला। उस में से एक सिगरेट निकाल कर पाकेट सोहनजी के आगे कर दिया। फिर पेंट की जेब से लाइटर निकाल कर सिगरेट जलाई और एक जोरदार कश खींचा। सोहनजी ने भी सिगरेट जलाई।
    “बहुत कामचोर है ये लड़के-लड़कियां। इन से तो बूढ़े भले जो बेचारे अपने वश से भी अधिक काम करते हैं। इन नलायकों को कितना ही डांटो, किंतु चलेंगे तो अपनी ही चाल से।” काम करते मजदूर की तरफ देखते हुए सोहनजी ने कहा।
    भोमा पानी के दो मग ले कर आया।
    हमीद ने मग मुंह से थोड़ा ऊंचा कर एकधार गटागट पानी पीया। पी कर एक कुरला किया और मग को खाट के नीचे रख दिया।
    “आपकी गालियों का भी असर नहीं होता?” हमीद ने मुस्कुराते हुए पूछा।
    “नहीं जी।” एक हाथ से पगड़ी ऊंची करते हुए दूसरे से सिर खुजाते वह बोला, “मेरा ही गला खराब होता है, इन नालायकों को क्या फर्क पड़ता है।”
    इतने में वे गरजे- “तुझे बहुत हंसी आ रही है चिड़कली। कामचोर से काम तो होता नहीं, खड़े-खड़े दांत निकालती है। जल्दी से तगारी भर कर पहुंचाया नहीं जाता क्या?”
    पगड़ी उन्होंने वापस सिर पर रखली।
    चिड़कली की हंसी थम गई पर आंखें अब भी हंस रही थी। होले से बोली- “मैं क्या करूं, संतिया ई तगारी नहीं भरता।”
    “किस बात की मजाक करता है रे संतिया।” अब वे संतिये पर गुस्सा हुए- “यह क्या तेरे, मैं कह दूंगा अभी लगती है। तगारी भरी नहीं जाती क्या? कहां से आ कर जम गए ऐसे ढीठ?”
    संतिये ने गारे से तगारी भरी। चिड़कली उठा कर कारीगर की तरफ रवाना हो गई।
    हमीद उसे ही देखता रहा। उसे यह नई लगी। करीब अठारह साल की होगी। मंझला कद। सुंदर नैन-नक्स, उन में किनारे तक लगाया कजल। गहरी मांग भरे थी। पीली ओढ़नी और हरी छींट का लंहगा पहने हुए। ओढ़नी का एक सिरा कांचली में दबाए हुए।
    सोहनजी ने उसकी नजरों का कहा जैसे सुन लिया- “कल ही आई है यह। बहुत हाथ-पैर जोड़ने लगी तब रख ली।”
    “अच्छा किया।” हमीद ने कहा।
    संतिया गारे से तगारी भरता है, चिड़कली झुक कर उठाती है और इंटे लगाते कारीगर तक गारा पहुंचाती है। फिर से आती है, गारे से तगारी भरावती है और वही क्रम।
    हमीद की नजरें लगातार उस के पीछे।
    सोहनजी उसे देख कर मुस्कुराए। आवाज दी- “अरे चिड़कली, जा लिच्छू की होटल से ठेकेदारजी के लिए चाय ले कर आ।”
    उस ने गारे की तगारी भरवाई, उठाई और रवाना हो गई। जैसे सुना ही नहीं।
    वे गुस्सा होते खाट से खड़े हुए। जोर से कहा- “बहरी है क्या? सुना नहीं मैं क्या कह रहा हूं?”
    “मैं अपना काम कर रही हूं ना, किसी दूसरे से कह दें।” कारीगर के पास तगारी खाली करती हुई वह वापस आ कर भोमले से तगारी भरवाने लगी। तगारी भर गई, उस ने उठाई और फिर रवाना हो गई।
    अब सोहनजी से कहां सब्र होता। वे उसी के पास पहुंच गए और तगारी छीन कर दूर फेंकते तीखे स्वर में बोले- “बहुत काम कर के निहाल कर दिया। जा केतली ले कर चाय ला। आई है बहुत काम करने वाली।”
    चिड़कली के सिर पर तीन सलवटें घिर आई। कुछ समय वह चलवोजी की तरफ देखती रही। चलवोजी गुस्से में थे। केतली ले कर वह चुपचाप रवाना हो गई।
    सोहनजी ने चलवे हमीद के सामने देखा और दोनों एक ही भाव से होले-से मुस्कुराए।
    हमीद ने नई सिगरेट जलाई। एक शानदार कश लिया और खाट से खड़ा हो लिया।
    काम करने वालों की तरफ आया। बनते क्वाटरों का चक्कर लिया। कुछ समय कारीगरों को ईंटें लगाते देखता रहा। फिर होले-होले उस के कदम झोंपड़ी की तरफ बढ़ने लगे।

  
    चिड़कली चाय ले कर आई। केतली और कप खाट के करीब रखे और कुछ गर्म हो कर बोली- “यह लो चाय, चलवोजी।”
    सोहनजी मजदूरों की तरफ खड़े थे। वहीं से नाराज होते कहा- “तुम तो एकदम पागल हो। अरे कपों में डाल। एक कप ठेकेदारजी को दे कर आ। वे झोंपड़ी में बैठे हैं।”
    बेमन उस ने कपों में चाय डाली। एक कप ले कर झोंपड़ी के सामने पहुंची और वहीं खड़ी होकर बोली- “लिजिए चाय।”
    हमीद भीतर खाट पर बैठा था। नजरे मिलाती बोली- “लेना।”
    चिड़कली के पैर वहीं चिपक गए।
    “अरे भाई, चाय ठंडी हो रही है ना।” हमीद कोमलता से बोला।
    वह भीतर गई। एक कदम दूर से ही कहा- ‘लिजिए” आउर कप जमीन पर रखने के लिए नीचे झुकी।
    “नहीं-नहीं, नीचे नहीं रखना।” हमीद तपाक से खड़ा हो गया- “धूल गिर जाएगी।... लाओ मुझे दो।”
    हमीद ने हाथ लंबा किया। कप लिए उसा ने हाथ आगे कर दिया।
    “आ बैठ... ” वह चिड़कली को कहने वाला ही था पर उस से निजरे मिलते ही उस की आंखों से गुस्सा बरस रहा था। आंखों में भड़का हुआ गुस्सा जोर पर था। गुलाबी पंखुड़ियों सरीखे होंठ फड़फड़ाने लगे। सांसें तेज चलने लगी।
    हमीद यह तेज लावा सहन नहीं कर सका और उसका हाथ सुस्त हो गया।
    चिड़कली ने कप नीचे रखा। लाल आंखों से उस को देखा और झोंपड़ी से बहार निकल गई। हमीद को जैसे पसने छूट गए। सुन्न-सा निढाल खाट पर गिर गया।
    उस में डर समा गया। चिड़कली ने शोर-शराबा कर दिया तो? इस प्रकार की लपटों से पहली बार सामना हुआ था। खूब औरतों को देखा था लेकिन चिड़कली जैसी एक भी नहीं। वह मजाक करता तब मजदूरनियां खुश होती, आंखें मटकारती हंसती और उसे आगे का रास्ता मिल जाता।
    पर यह चिड़कली? जरूर उस ने गुस्से में उस के बारे में उलट-पुलट कर दिया होगा। मजदूर कुछ नहीं कहेंगे, पर उन की आंखों में घिरते सवालों के उत्तर उस के पास कहां होंगे? उस की बरसों की साख आज मिट्टी में मिलेगी। झोंपड़ी से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई उस की।
    चिड़कली झोंपड़ी से बाहर आ कर काम करने लगी। किसी से कुछ नहीं कहा। पर चेहरे पर गुस्से की टेढी-मेढ़ी रेखाएं साफ नजर आ रही थी।
    दोपहर का समय हुआ तब उस की सहेली झमकू ने पास आ कर कहा- “आ, नाश्ता कर लें।”
    “मुझे भूख नहीं।” उस ने सामने ही नहीं देखा।
    “क्या हुआ री भूख के?” झमकू ने उसे शक की निगाहों से देखते कहा।
    “कह दिया ना, इच्छा नहीं है।”
    झमकू आगे कुछ पूछे उस से पहले वह अलग दिशा में चली गई।
    पानी के कुंड के पास पहुंच कर चिड़कली ने दोनों हाथों से पानी ले कर मुंह को छींटे दिए। सिर को भी गिला किया। फिर कांचली में ठूंसी हुई ओढ़नी का सिर निकाल कर उस से सिर-मुंह पोंछा।
    फिर वह बजरी पर पलाथी लगा कर बैठ गई। कोहनियां पलाथी से सटा कर हथेलियों में अपना चेहरा लिए सोचती रही।
    मजदूरी पर आते आज उस का दूसरा ही दिन था। काम करने आना जरूरी था। घर के हालात किसे से छुपे नहीं। शादी की मेंहदी अभी हाथों से गई नहीं। छह महीने ही नहीं हुए शादी को। घर में बड़ा परिवार। बस एक कमाऊ उस का पति। उस ने तो मनाही दी, बोला रहने दे ऐसे ही गुजार-बसर हो जाएगी। जैसे-तैसे कर लेंगे। पर उस से अपने मरद की दौड़-भाग नहीं देखी गई। कितना काम करता है। सुबह हाथ गाड़ा ले कर निकलता है। दिन में ऊन के बोरे एक कोटड़ी से दूसरी कोटड़ी में पहुंचाता है। रात गए आता है तब बैठने की भी हिम्मत नहीं रहती।
    पर ठेकेदारजी ऐसे करेंगे तब कैसे बसर होगा। अपने आदमी को बताए तो और भी बुरा। वह मरने-मारने पर उतर आएगा। उसे काम छोड़ना होगा और एकेला घाणी के बैल जैसा वह शरीर तोड़ता रहेगा।
    चिड़कली की आंखें गिली हो आईं।


    उस दिन के बाद चिड़कली की हंसी-मजाक सब बंद हो गई। चुपचाप काम करना, किसी के बिना मतलब के बोलना नहीं। सहेलियां कभी मजाक करती- “घरवाले की याद सताती रहती है, ऐसे क्या गुमसुम बनी रहती हो?”
    वह कुछ जबाब नहीं देती।
    चलवोजी भी उस से अधिक गुस्से से नहीं बतियाते। क्या कहे, वह बिना आराम किए काम करती रहती, काम में ढीठाई करे तब अवसर मिले उन्हें कुछ कहने का।
    हमीद दस बजते ही खाट पर आकर बैठ जाता। बैठा-बैठा सिगरेटे फूंकता। दो-चार बार घूम कर काम का जायजा लेता, कभी झोंपड़ी में आ कर आराम करता। उस ने यह सोच कर धैर्य धारण किया कि चिड़कली ने किसी से कुछ नहीं कहा। काम पर भी लगातार आ रही है, समय के साथ खुद ही मजदूरी के नियम-कायदे सीख जाएगी। उस की निगाहें चिड़कली पर ही रहती।
    नीचे झुक कर ईंटें उठाती, गारे की तगारी उठाती, ओढ़नी के छोर से पसीना पोंछती, प्याज-रोटी खाते, सहेलियों को आंखें निकालती, हथनी जैसी मंथर चाल से घूमती-फिरती चिड़कली- यकायक हमीद की निगाहों में स्थिर हो जाती है।
    हंस कर उस की बात मानने वाली लड़कियों को वह दूसरे ही दिन भूल जाता पर चिड़कली की रक्तिम आंखें वह नहीं भूला सका। गुस्से से तमतमाये चेहरे की जगह वह मुस्कुराता चेहरा देखना चाहता है और चाहता है कि चिड़कली अपने आप मान जाए।
    दोपहर के समय एक बार चिड़कली कीकर के नीचे बैठी सुस्ता रही थी। होले-होले पैर रखते हुए हमीद उस कीकर के पास पहुंचा। चिड़कली खुद में खोई थी। उसे के आने की उसे खबर ही नहीं लगी।
    कुछ दूरी पर खड़ा वह चिड़कली को निहारता रहा। चेहरे पर चिंता और मजबूरी की रेखाएं। बाएं हाथ में एक तिनका लिए, वह उस से दांत कुचर रही थी।
    सिर पर होले-से थपकी दे कर हमीद ने उसे सचेत करने की सोची पर हिम्मत का हाथ बढ़ ना सका।
    “सुस्त कैसे है, चिड़कली?” मधुर स्वर में हमीद बोला।
    वह चौंकी जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। फुर्ती से खड़ी होने लगी।
    “बैठी रहो, बैठी रहो” हमीद ने हाथ से टोक दिया- “मैं कुछ नहीं करूंगा।"
    वह सचेत हो कर बैठ गई। अब वह तिनके से जैसे मिट्टी पर मांडने बनाने लगी।
    “क्या हुआ तुम्हारे? ऐसे कैसे सुस्त और उदास रहती है?”
    उस ने जबाब नहीं दिया।
    कीकर की फली तोड़ कर हमीद ने उसे होले-होले मसला और दूर गिराते कहा- “मेरी नियत खराब नहीं पर तुम मुझे अच्छी लगती हो। जिस समय देखा, उसी समय से मेरे मन में तेरी ठौर बन गई।”
    “इस में मैं क्या करूं ठेकेदारजी”, चिड़कली शांत नहीं थी, यह बात उसकी ऊपर-नीचे होती कांचली कह रही थी।
    “अच्छा लगता है उसे हर कोई पाना चाहता है।” हमीद का स्वर बहुत धीमा था।
    “आप को तो मेरा काम अच्छा लगना चाहिए, तभी मुझे रोजगार मिलेगा।”
    “तुम तो निरी भोली हो, चिड़कली”, वह उसे समझाने लगा- “तू ने मेरे मन को गिरफ्त में ले लिया। एक बार मन की बात रख दे। रोजगार की चिंता फिर रहेगी ही नहीं।”
    गर्दन उठा कर उस ने उस के सामने देखा। कुछ समय एकटक देखती रही, फिर पूछा- “मन रखने के बाद आप अपने घर ले कर चलेंगे क्या? पत्नी बना क्र रखेंगे मुझे?”
    उस से जल्दी से उत्तर नहीं बना। कीकर की डाले पकड़ता छोड़ता रहा। कांट गड गया और अंगुली से खून गिरने लगा। अंगुली चूस कर खून बंद किया। फिर दीनता से हंसने की चेष्टा करते हुए बोला- “मजाक कर रही है क्या? तुम दूसरे की ब्याहता घर में कैसे रख सकता हूं।"
    “मैं मेरे मरद को छोड़ कर आ जाऊंगी। बोलिए है मंजूर? फेर जैसा आप चाहे होगा।” चिड़कली की नजरें उस पर टिक हुई थी।
    हमीद का गला सूखने लगा। माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी। उसे समझ नहीं आया कि आज इतना बेवश कैसे हो गया। दूसरी मजदूरनियां उस के सामने होंठ तक नहीं हिला सकती पर यह तो सवालों के और वे भी इतने ऊंचे टीलों जैसे खड़े कर दिए कि वह उन टीलों में धंसता ई जा रहा है।
        कुछ समय चिड़कली उस को देखती रही, फिर नम्रता से बोली- “आप मेरे माई-बाप हो ठेकेदारजी। मजबूरी की मारी मैं आती हूं। आप को पैसों के बल पर मुझ से भी रूपवती मिल जाएगी। आप के किस बात की कमी। आप मुझे माफ कर दें ठेकेदारजी।”
    चिड़कली ने हमीद के पैर पकड़ लिए।
    “आपकी चाहत मैं पूरी नहीं कर सकती। अप को मेरी चाम प्यारी है पर यह मेरे मरद की है। उस पर मैं आंच नहीं आने दूंगी।” चिड़कली खड़ी हो गई- “अब यहां नहीं तो किसी दूसरी जगह काम करूंगी। मुझे माफ करना ठेकेदारजी।”
    उस ने एक बार हमीद की तरफ देखा, फिर गर्दन नीची किए रवाना हो गई।
    हमीद संज्ञाविहीन हो गया। जाते उसे देखता रहा। फिर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता उस के करीब पहुंचा और दीनता से बोला- “नहीं-नहीं यहीं काम कर। तुझे मेरी सौगंध। तुझे यहीं काम करना है। ... तुझे कोई कुछ नहीं कहेगा। किसी चीज वस्तु की जरूरत हो तो चेलवोजी से कह देना।”
    वह चिड़कली के सामने भी नहीं देख सका।
    तेज-तेज कदमों को उठाता मोटरसाइकिल के करीब पहुंचा, किक लगा कर स्टार्ट की और धुंआ छोड़ता निकल गया।
  
    ढाई-तीन महीनों क्वाटरों का काम चला पर हमीद एक बार भी नहीं आया। चलवोजी ही काम देखते रहे।
    काम करते हुए चिड़कली ने एक दिन अचानक सोचा- “ठेकेदारजी इन दिनों एक बार भी नहीं आए, क्या हुआ होगा उन के.... एक बार आए तो कितना अच्छा रहे....।”
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अनुवाद : नीरज दइया


अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति,अमेरिका की प्रमुख त्रैमासिक पत्रिका “विश्वा” (प्रधान संपादक श्री रमेश जोशी, ओहायो) के अक्टूबर, 2017 अंक में प्रख्यात कहानीकार श्री बुलाकी शर्मा की प्रसिद्ध राजस्थानी कहानी का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। 




खतरनाक खिचड़ी / डॉ. नीरज दइया

आपको मैं एक जादू दिखाना चाहता हूं। कोई मदारी तो मैं हूं नहीं और अगर होता तो भी बंदर या भालू को यहां कागज पर कैसे दिखा सकता हूं। उन्हें देखने के लिए तो आपको मेरे मजमे में कहीं उपस्थित होना होता। खैर मैं एक जादू लाया हूं। जादू यानी मैजिक। मैजिक कहते ही आपके दिमाग से ‘बंदर-भालू’ सब गायब हो गए हैं। क्यों कि फिलहाल मीडिया का मैजिक चल रहा है कि उसने इस शब्द के साथ माननीय प्रधानमंत्री का नाम जोड़कर ‘मोदी-मैजिक’ के अनुप्रास को चर्चित कर दिया है। सोचने की बात यह है कि भला जादू में जादू कहां और कैसे काम करता है या कर सकता है। क्या कोई जादू किसी को वोट दिला सकता है? मतदान में तो आप और हमने यानी देश की जनता ने भाग लिया है। मेरा मनना है कि कोई जादू तो हुआ है। जैसे फिल्म में ‘तेरा जादू चल गया’ और ‘सीने से दिल गया’ जैसी बातें जादू जैसी दिखाई देती हैं वैसे ही रोजमर्रा के जीवन में अनेक जादू होते रहते हैं।
आप यकीन कीजिएगा कि जादू होता है और कहीं भी हो सकता है। किसी के भी साथ हो सकता है। मैं तो यहां तक मानता हूं कि कोई भी जादू कर सकता है। मैं यहां एक शब्द लिखता हूं- ‘खिचड़ी’। देखिए यह इस शब्द का यह जादू है कि खिचड़ी शब्द पढ़ते ही आप के दिमाग में राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ की तश्वीर उभरने लगी है। मशहूर शेफ संजीव कपूर ब्रांड एम्बेसडर बन कर इंडिया गेट पर हजार किलोग्राम खिचड़ी बनाने की तश्वीर या ऐसा विचार जेहन में आना क्या किसी जादू से कम है। खिचड़ी वे अनाथ बच्चों को खिलाएं या स्कूलों में मिड डे मील में, हमें क्या? मैं आपको इस कहानी से बहुत पहले ले चलता हूं जहां वर्षों पुरानी खिचड़ी अभी भी अधपकी आपका इंतजार कर रही है। लिजिए आपके दिमाग में बीरबल की खिचड़ी का दृश्य उभर कर आ गया है। अकबर और बीरबल को ना आपने देखा और ना मैंने। उनकी अधपकी खिचड़ी के चर्चे क्या हजार किलोग्राम की खिचड़ी पकाते ही भूल गए हैं?
एक समय था जब खिचड़ी गरीबों और बीमार लोगों का भोजन हुआ करती थी, अब जमाना बदल गया है और खिचड़ी को बहुत सम्मान मिल चुका है। यानी खिचड़ी भी वीआईपी हो गई है। खिचड़ी खाने वाली से भी अधिक वीआईपी दिमाग में पकने वाली होती है। मेरे दिमाग में तो हर दिन खिचड़ी पकती रहती है। अगर आपके पास भी दिमाग है तो आप अपना हाल सुनाएं। खास बात दिमाग में खिचड़ी पकाने के लिए बुद्धि की जरा भी जरूरत नहीं है। मेरे जैसे और मूर्ख दिमाग खिचड़ी पकाने के बेहतरीन स्थल कहे जा सकते हैं।
पंच काका कहते हैं कि यह स्कूली लड़के के दिमाग में पकने वाली खिचड़ी का ही कमाल था कि उसने ग्रेटर नोएडा में अपनी मां और बहन की जघन्य तरीके से हत्या कर दी। बिना खिचड़ी पके भला कोई बेटा अपनी प्यारी मां और बहन पर क्रिकेट बैट और कैंची से ताबड़तोड़ वार कर हत्या कर सकता है? भैया ये बड़ों और बच्चों के दिमाग में पकने वाली खिचड़ी बड़ी खतरनाक होती है।
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19 दिसंबर, 2017

उत्तर आधुनिक सच / डॉ. नीरज दइया

हमारा विकास इतना हुआ है कि अब छुपाए नहीं छुप सकता। सुनो, सब लोग कह रहे हैं कि हां विकास हो गया है, हां विकास हो गया। किसी कोने से अगर कोई आवाज आएगी- विकास नहीं हुआ है तो हम उसे हमारे इस विकास होने के शोर में दबा देंगे। वैसे हमारे पास सब कुछ है मसलन आधुनिक तकनीक है। हम ऐसी बेसुरी आवाजों को तकनीक से कुचल सकते हैं। विकास के होने अथवा नहीं होने के मुद्दे पर मतदान करा सकते हैं। लोकतंत्र में मतदान का प्रवल महत्त्व है। अगर दस आदमी कहे- विकास नहीं हुआ है और नब्बे कहें कि हुआ है तो सच क्या है? सीधी बात है- दस की बात को सच नहीं मान जा सकता।
आदमी का विकास देखिए- वह क्या से क्या हो गया। पहले सच बोलता था, फिर जमाना बदला और वह आधुनिक सच बोलने लगा। आजकल वह लोकतंत्र में ऐसे उत्तर आधुनिक सच सुनना और बोलता है। उसके संस्कारों में प्रगति करना है और वह प्रगति करता जा रहा है। बहुमत का जमाना है। और बहुमत कहता है कि विकास हुआ है। आप धारा के विरूद्ध नहीं जा सकते हैं। अरे आप देशद्रोही थोड़ी बनाना चाहेंगे। जो विकास को विकास नहीं मानते और हमारे जयधोष में काले झंडे दिखाते हैं या कुछ काली पट्टियां लगाते हैं वे मूर्ख है। समझते नहीं कि काले झंडे लहराने से भला क्या होगा। दो मिनट को बस आप ध्यान भंग करा देंगे। यह उत्तर आधुनिक सच है कि दो मिनिट का क्या महत्त्व है? बस दो मिनट में आप वो कर सकते हैं। वो नहीं समझे, अरे वो... वो जो आजकल हर घर में बनाने की बात सरकार कर रही है। आपके घर में शौचालय है ना? अब दूसरों के घरों में बन जाएंगे तो इसे विकास नहीं कहेंगे क्या? स्वच्छता अभियान है और खुले में शौच मना है। अगर आप खुले में जाएंगे तो आप विकास के विरूद्ध हैं।
आम आदमी की जरूरत है- रोटी, कपड़ा और मकान। इन तीनों चीजों का अंतर्संबंध शौचालय से भी है। हमारी विकास-यात्रा में यह बहुत युगों पुरानी बात है कि हम भले कितनी ही प्रगति कर लें, विकास कर लें किंतु हमें बार बार शौचालय तो जाना ही पड़ेगा। इससे पीछा नहीं छूट सकता। उत्तर आधुनिक सच है कि आप कलेक्टर भी बन जाएंगे तो आपको दैनिक दिनचर्या में यह तो करना ही होगा। देखिए जितने भी अफसर है उनके लिए यह विशेष व्यवस्था उनके कमरे में अलग से होती है। पता नहीं अफसर को हाजत हो जाए और वह निवृत होना चाहे। लघु शंकाओं और दीर्घ शंकाओं से अफसर का बहुत वास्ता पड़ता है। वैसे अफसर ऐसी व्यवस्था अपने लिए रखते हैं तो वे पहले ऐसी ही एक सामूहिक व्यवस्था दूसरों के लिए भी करते हैं। घर और दफ्तर में ऐसी व्यवस्थाएं हैं तो भला अगर आप कहीं जा रहे हो या कहीं से आ रहे हो तब इस व्यवस्था का क्या होगा? यह व्यवस्था तो हमारे आस-पास रहनी चाहिए। भीड़ में यह कर नहीं सकते और खुले में करने की सरकारी मनाही है इसलिए भावनाओं को समझते हुए विकास में एक विकास फिर जुड़ रहा है कि अव आप गूगल मैप द्वारा शहर के शौचालय देख सकेंगे।
पंच काका कहते हैं कि जीपीएस की मदद से शहर में किसी भी स्थान के नजदीकी यूरिनल तक पहुंचना अब संभव हो जाएगा। अरे भाई हम कुत्ते नहीं हैं कि कहीं भी टांग उठा लेंगे। आप समझ गए ना इस विकास को।
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16 दिसंबर, 2017

सभ्य भाषा में झगड़े का नाम चुनाव

    झगड़ा करना अच्छे लोगों का काम नहीं होता। मैं खुद को अच्छे लोगों में शुमार करता हूं और भविष्य में भी इसी पोजिशन में बने रहना चाहता हूं। वैसे पोजिशन चीज ही ऐसी है कि जिस पर सबसे ज्यादा खतरा मंडराता रहता है। खैर सारी बातें अपनी जगह है और समय ही फैलता करता रहा है। अब समय है फैसले का और मैं किसी भी प्रकार का झगड़ा करने के पक्ष में तो बिल्कुल नहीं हूं। और साथ में तुर्रा यह भी है कि किसी से भी झगड़ा क्यों किया जाए। ना जाने किस की कब जरूरत आन पड़े। आज झगड़ा और कल सुलह करनी पड़े तो भाई पहले से ही पुखता इंतजाम होना चाहिए।
    हमारे बड़े कवि कबीर जी कह गए- ‘कबिरा खड़ा बजार में मांगे सब की खैर। ना काहू से दोस्ती न काहू से वैर।’ छोटे कवि और मुझ जैसे आपके मित्र ऐसे संकटों में भी पड़ने से जरा गुरेज करते हैं। भाई बजार में खड़े होने की फुर्सत अपने पास नहीं है और इतने भी ठाले नहीं बैठे कि सब की खैर मांगे। यहां अपनी खैर के लिए दिन रात रोते रहते हैं और अपनी खैर की चिंता की ही तो बात कर रहे हैं कि झगड़ा करने का अर्थ अपनी खैर को खोना है। हां अगर बजार में कहीं खैर मिलती हो पैसे देकर, या फ्री में बांटी जा रही हो तो भैया हमें बजार में खड़ा होना भी मंजूर है। बिना खैर के बजार में खड़े हो कर खैर मांगने के पक्ष में हम नहीं हैं। दोस्ती और बैर की भी बात अगर कबीर स्टाइल में रखी जाएगी तो अपना काम कौन करेगा। जिनसे जान-पहचान है उनके लिए तो बस दो ही श्रेणियां है- दोस्ती या दुश्मनी।
    झगड़ा करना यानी दुश्मनी मोल लेना। वही तो नहीं चाहते सो पूछ रहे हैं कि झगड़ा करने का सही समय क्या है। झगड़ा कुर्सी का है और साहब को फरियाद करने जाना है। साहब हमको बड़े वाले और अच्छे वाली कुर्सी चाहिए। आपकी किरपा हो जाए तो सुसरे रामलाल और श्यामलाल को छोड़ कर मुंगेरीलाल को धकेल कर हमें कुर्सी दे दी जाए। ये चुनाव-वुनाव तो सब चोंचले हैं। होगा तो वही जो श्रीमान चाहेंगे। आप अफसर है और आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं उसके लिए किसी तीसरे की पंचायत तो हो नहीं सकती है। अगर चुनाव से पहले झगड़ा करेंगे तो हम आंखों में आ जाएंगे और हम वैसे तो आपकी आंखों में ही रहना चाहते हैं पर ऐसे नहीं... आंख रहने और आंख में रखने में बहुत फर्क है। सरा खेल ही आंख का है। वर्षों से हम अर्जुन वाली आंख कुर्सी पर गड़ाएं बैठे हैं। इसी चक्कर में तो सब से दोस्ती रखी और बैर मोल नहीं लिया। कवीर जी के मंतर को जरा मरोड लिया साहब- अपनी सबसे दोस्ती ना काहू से बैर। किसी को हंस कर पटाए रखा, किसी को मुस्कुरा कर फसाए रखा। जरूर हुई तो चाय-पानी से मामला बैठाया। उससे भी नहीं बनी बात तो पार्टी देकर खुश किया। खुश क्या धोखा दिया। हमारा असली मकसद ऐन-केन-प्रकरेण इस बड़े वाली कुर्सी तक पहुंचने का है।
    पंच काका कहते हैं कि सभ्य भाषा में झगड़े का नाम चुनाव है। सो अरज हमारी यह है कि हम को तो सर्वसम्मति से आप जोड़-तोड़ कर कुर्सी पर एक बार बिठला दो, बाकी सब हम संभाल लेंगे। एक बार बैठ गए तो ऐसे चिपक कर बैठेंगे कि हम हमार बिटवा के बड़े होने तक यहीं बैठे रहेंगे। 
डॉ. नीरज दइया

14 दिसंबर, 2017

जीवनानुभवों को व्यंजित करती कहानियां

पुस्तक समीक्षा- डॉ. नीरज दइया
हिंदी जगत के लिए गौरव का विषय है कि वरिष्ठ कहानीकार हरदर्शन सहगल अब भी सक्रिय हैं। आपका जन्म 26 फरवरी, 1935 को कुंदियाँ, जिला मियाँवाली (अब पाकिस्तान) में हुआ, यानी उम्र के 82 वसंत देख चुके सहगल की एक लंबी कहानी और अपनी जीवन-यात्रा है। उन्होंने अपनी दिनचार्या में अब भी लिखने-पढ़ने को अबाध गति से जारी रखा है। निसंदेह वे आज कथा-साहित्य के प्रतिमान हैं किंतु फिर भी वे अपनी रचनाओं के बारे में छोटी से छोटी राय-टिप्पणी पर भी ध्यान देते हैं साथ ही निरंतर परिष्कार और परिवर्धन की बातें सोचते रहते हैं।
    हरदर्शन सहगल अपनी अपनी जीवन-कथा आत्मकथा के रूप में ‘डगर डगर पर मगर’ में लिख चुके हैं, फिर भी उनकी झोली में अनेक अपनी और आस-पास की कहानियां शेष हैं। गुलाम और आजाद भारत के साथ बदलते शहरों और लोगों के मंजर उनके जेहन में नित्य कथाओं के उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। आपके कृतित्व की बात करें तो अब तक दस कहानी-संग्रह, एक व्यंग्य कथा-संग्रह, तीन उपन्यास, दो बाल उपन्यास, एक नाटक, एक हास्य संस्मरण, दस बाल कथा-नाटक संग्रह, कई संपादित पुस्तकें के अतिरिक्त बाल साहित्य की अनेक पुस्तकें तथा लगभग दो हजार से अधिक स्फुट रचनाएं प्रकाशित व प्रसारित हो चुकी है। उनका विभाजन की त्रासदी पर लिखा उपन्यास ‘टूटी हुई जमीन’ अनेक भाषाओं में अनूदित और चर्चित हुआ है। वहीं ‘वर्जनाओं को लाँघते हुए’, ‘कई मोड़ों के बाद’ संग्रह विशेष रूप से चर्चित रहे हैं। इसी शृंख्ला में उनका कहानी संग्रह ‘मुहब्बते’ आज के बदलते समय और संदर्भों में विशेष रूप से उल्लेखनीय इसलिए भी है कि इसमें उनकी प्रेम कहानियों को संकलित किया गया है। ‘मुहब्बतें’ में संकलित कहानियां केवल नायक-नायिका के देहिक प्रेम की कहानिया नहीं है, वरन यहां प्रेम के विशद और व्यापक बहुआयामी रूप को देखा-समझा जा सकता है।
    संग्रह के आवरण पर कहानीकार हरदर्शन सहगल और श्रीमती कमला सहगल का एक पुराना चित्र और किताबों के बीच उनकी उपस्थिति अपने आप में एक कहानी है। यहां यह बताना भी आबश्यक है कि कृति के समर्पण पृष्ठ पर अंकित है- ‘‘जिसका होना ही मेरा अस्तित्व है : कमला”
    संग्रह के आरंभ में ‘गल्प का यथार्थ’ शीर्षक से एक भूमिका है जिसमें कहानी के बदलते रंग-रूप पर व्यापक चर्चा करते हुए अनेक स्थापनाएं-आग्रह प्रस्तुत हुए हैं। मनुष्य के विचार-बोध और व्यवहार के अंतर के रेखांकित करते हुए हरदर्शन सहगल साहित्य के समाजवादी उद्देश्य के पक्ष में अपना मत रखते हुए अंत में दो छोटी मगर जरूरी बातें कहानी के संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं, जो इस प्रकार है-“एक छात्र को मैडम सजा देती है। आगे जाकर वह डॉक्टर बन जाता है। सेवानिवृति पश्चात मैडम अस्पताल पहुंचती है डॉक्टर झट से आगे बढ़ कर मैडम के पांव छूता है- मैडम आपने मेरा जीवन संवार दिया।/ एक दूसरा छात्र है। उसे भी मैडम सजा देती है। आगे चलकर वह भी डॉक्टर बन जाता है। मैडम को देखते ही उपेक्षा से मुह फेर लेता है।/ दोनों ही यथार्थवादी कहानियां है। कौन सी अच्छी लगी?”
    कहानी अच्छी या बुरी से अधिक जीवनानुभवों को व्यंजित करती है। दोनों ही स्थितियों पर यदि उस छात्र के मनोविज्ञान का अध्ययन किया जाए तो गलत दोनों नहीं हैं किंतु हर चरित्र से एक पाठक और कहानीकार की अपेक्षा होती है। कहानी में कुछ रूढ़ चरित्र और आदर्शों के रहते बदलता यथार्थ पूर्ण रूपेण चित्रित होने के रह भी जाता है। इस भूमिका और हरदर्शन सहगल की कथा-यात्रा के विविध पड़ावों को देखते हुए निसंदेह कहा जा सकता है कि वे बहुधा चरित्रों को आदर्श स्थितियों में देखने के पक्ष में दिखाई देते हैं। उनका कहानीकार सदा संबंधों को बनाने और बनने पर बने रहने, बने रखने के पक्ष में सक्रिय रहा है। बिना जीवन मूल्यों के पोषण के कहानी या साहित्य का भला क्या उद्देश्य हो सकता है।
    ‘देश हुआ बेगाना’ में दो दोस्तों की मुहब्बत की अविस्मरणीय कहानी है जो विभाजन की त्रासदी और संत्रास को ब्यंजित करती है। इसी पृष्ठभूमि पर कहानी ‘आज़ादी के वे दिन उर्फ वह्शियाना तूफान’ है जिसमें भी 1947 के वे दिन आंखों के सामने साकार होते हैं। ‘टूटते हुए पंख’ को एक प्रयोग और प्रतीकात्मक कहानी कहना अधिक उपयुक्त होगा इसमें राजतंत्र की अनेक परतों को खोलते हुए एक मासूम पक्षी की कथा है। ‘हारमोनियम और ग्रामोफोन’ कहानी में भी संदर्भ देश के बंटवारे का है किंतु यह अपनी सांकेतिकता में एक मार्मिम संकेत भी छोड़ती है। हारमोनियम और ग्रामोफोन दोनों ही जीवन और संगीत के साथ हमारी कलात्मक रुचियों को प्रकट करने के उपकरण के रूप में कहानी में आएं हैं। कहानी के अंत में सरदार सिंह का हारमोनियम पहुंचाने का उपक्रम और यह संवाद- ‘संभालो अपनी दूसरी अमानत को! बड़ी मुश्किल से सब कुछ छोड़कर, इसे बचा लाया था।’ एक विशद संकेत है। यहां मानवीय मूल्य-बोध के साथ जीवन के संगीत की पुनर्रचना का स्वर भी कहानी से उभरता है। 
    ‘पहलू’ अपेक्षाकृत लंबी कहानी है जिसमें दशहत के सामने सिर उठाने के प्रसंग को बड़े कलात्मक ढंग से संजोते हुए प्रताप नारायण भार्गव के माध्यम से बदलते समय के साथ बदलती स्थितियों का चित्रण किया गया है। दादाजी के प्रति पौत्रों की मुहब्बत की इस कहानी के अंत में कहानीकार का कहना- ”अब यह कथा किसी को अयथार्थवादी लगे तो बेशक लगे लकिन हकीकत यही है कि अग्ले सप्ताह से बच्चों ने प्रताप बाबू के नेतृत्व में बाजार में पिकटिंग (धरना) शुरू कर दी। संवाददाता आये। प्रेस फोटोग्राफर आये। संसद का अगला सत्र शुरू होने वाला था। सो नेता भी आये। नहीं आये तो वो हफ़्ताबारी उगाहने वाले। पुलिसवाले, अपने ट्रासंफर के लिए नये-नये स्टेशनों की तलाश में मशगूल हो गये।” कहानी ‘इंतजार’ में मदमाती का प्रतिशोध जिस प्रविधि से आहिस्ता-आहिस्ता कहानी में फलित हुआ है वह प्रभावित करता है। 
    शब्दों के आवरण में कहानी में कल्पना भी यर्थाथ सदृश्य प्रस्तुत होती है। कहानी का द्वंद्व यह भी है कि कहानीकार के सामने जो यथार्थ है उसे वह उसी रूप में अथवा उसके परिमार्जित रूप में प्रस्तुत करता है। यथार्थ से अंश दर अंश चयनित कर उसे कहानी में घटित और फलित होने की प्रविधि हरदर्शन सहगल के यहां यहां तक पहुंचते पहुंचते जिस मानक तक आ गई है वह रेखांकित किया जाना चाहिए। कहानी में भाषिक प्रवाह के साथ अंत तक उत्सुकता को बनाए रखना भी एक कला है जिसे अथक साधना से सहगल जैसे कहानीकारों ने साध कर इस विधा को लोकप्रिय बनाए रखा है।
    संग्रह की दो कहानियों- ‘कुछ बंगले और मकान’ और ‘अंतर्जगत’ को कहानीकार ने ‘परा मनोवैज्ञानिक कहानी’ के रूप में रेखांकित किया है। शीर्षक कहानी ‘मुहब्बतें’ में नम्रता और वैभव के बदलते-बिगड़ते-संवरते संबंधों को परिवार और बच्चों के साथ प्रस्तुत करते हुए संबंधों के बने और बनाए रखने का स्वर भी है। संग्रह की शेष कहानियां भी अपने-अपने स्तर हमारे संबंधों के रहस्यों पर प्रकाश डालती हुई मन की अनेक परतों को खोलती और प्रभावित करती हैं।      
डॉ. नीरज दइया

मुहब्बतें (कथा संग्रह) कहानीकार : हरदर्शन सहगल, प्रकाशक- कलासन प्रकाशन, मॉर्डन मार्केट, बीकानेर (राज.), पृष्ठ : 150, मूल्य : 250/-, संस्करण : 2017   

10 दिसंबर, 2017

राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता

डॉ. नीरज दइया
    साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में राजस्थान का महत्त्वपूर्ण योगदान इस रूप में रहा है कि यहां न केवल हिंदी, वरन राजस्थानी, उर्दू, सिंधी व अन्य भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हुई है। वर्तमान में भी अनेक पत्र-पत्रिकाएं राजस्थान के साहित्यिक वातावरण को गतिशील किए हुए है। कहा जा सकता है कि राजस्थान के संपादकों-पत्रकारों ने इस तथ्य को समझा है कि साहित्य की समाज में अहम भूमिका होती है। भारतीय साहित्य में अगर हम विविध विधाओं के विकास और संवर्द्धन की बात करें तो यहां के साहित्य का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो सका है। यहां के रचनाकारों की दोहरी भूमिका उल्लेखनीय है कि उन्होंने साहित्य लेखन के साथ साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया है। वैसे साहित्यिक पत्रकारिता के मूल में मुख्य आधार वही सफल हुए हैं जहां संगठित होकर प्रयास किए गए हैं। फिर भी सरकारी और गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के अतिरिक्त अनेक व्यक्तिगत प्रयासों की भी सराहना करनी होगी कि जिनके अथक प्रयासों से यह परंपरा पोषित होती रही है। अधिकांश पत्रिकाओं का संपादन अवैतनिक और अव्यवसायिक रहा है।
    साहित्यिक पत्रकारिता में स्थितियां भले कभी कुछ लाभ की नहीं रही हो किंतु यह घर फूंक कर तमाशा देखना एक मिशन की बात है। आज तकनीकी विकास और आधुनिकता के दौर में साहित्यिक पत्रकारिका के संबंध में रहीम जी की पंक्तियां स्मरणीय हैं- रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि। राजस्थान की पत्रकारिता के संदर्भ में यह बात कुछ अधिक प्रासंगिक हो जाती है। राजस्थान के इतिहास में जाएं तो कहना होगा कि शौय-वीरता की इस धरती पर राजपूताना रियासतों के समय पत्रकारिता का आगाज हुआ। तत्कालीन समाज में राजनैतिक और समाजिक चेतना की जागृति हेतु समाचार पत्रों की महती भूमिका रही है। यहां की जनता पर राष्ट्रीय समाचार पत्रों का विशेष योगदान रहा, वहीं अजमेर, ब्यावर और जयपुर से अनेक समाचार पत्र प्रकाशित हुए। विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों जिनमें विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास, सेठ जमनालाल बजाज आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है जिनका योगदान राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, प्रजा सेवक, अखंड भारत व आगीवाण जैसे पत्रों को प्रकाशित करने में रहा। साथ ही उन्होंने अनेक ने कविताओं और आलेखों के माध्यम से जनचेतना का संचार कर आजादी की अलख जगाने का प्रसार किया।
    पुस्तक ‘राजस्थान में जन-जागरण एवं पत्रकारिता’ के लेखक डॉ. रामचन्द्र रूण्डला अपनी शोध-खोज के आधार इस पर इस बात पर सहमत होते हैं कि राजस्थान में पत्रकारिका का आरंभिक दौर मनोरंजन और सुधारवादी दृष्टिकोण पर आधारित रहा। भारत में जहां पहला समाचार पत्र 1780 में प्रारंभ हुआ तो राजस्थान में 1949 में भरतपुर के शासक द्वारा हिंदी-उर्दू द्विभाषी पत्र ‘मजहरूल सरूर’ आरंभ हुआ। इस मासिक पत्र को राजपूताना का प्रथम पत्र माना जाता है। डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र अपनी कृति ‘हिंदी पत्रकारिता’ में जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य के निर्माण की भूमि तलाश करते हुए विभिन्न तथ्यों को उजागर करते हैं। किंतु राजस्थान की पहली साहित्यिक पत्रिका के विषय में अब भी शोध शेष है। इस दिशा में स्वतंत्र कार्य किए जाने की आवश्यकता है।
    आजादी के बाद प्रांतीय सरकारों ने साहित्य के विकास और उत्थान को ध्यान में रखते हुए अकादमियों की स्थापना की। इसी क्रम में राजस्थान में भी अकादमियां स्थापित हुई। आरंभ में राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम) के नाम से वह हिंदी के साथ राजस्थानी भाषा के लिए कार्य करती रही थी प्रकारांतर में राजस्थानी के लिए पृथक से राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की स्थापना हुई। वर्तमान में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की मासिक पत्रिका मधुमति की सक्रियता इस रूप में है कि यह पत्रिका नियमित प्रकाशित हो रही है। सरकारी पत्रिकाओं का स्वरूप और रूपरेखा उसके संपादक और यहां कहा जाना चाहिए कि अध्यक्ष के बदल जाने से परिवर्तित होती है। देश में प्रकाशित होने वाली इस प्रकार की पत्रिकाओं में प्रायः जो सरकारी ढंग की एकरूपता-एकरसता को देखा जा सकता है उससे यह अकादमी भी अछूती नहीं है। नए अध्यक्ष और संपादक जो कुछ करना चाहते हैं अथवा करते हैं वह कुछ गतिशील होता है कि उनका समय समाप्त हो जाता है। नए चेहरे बाजय काम को देखने के पुराने चेहरों के काम को नकारते हुए अपने ढंग से कोइ नया काम करने की चेष्टा में फिर से नई पारी का आरंभ करते हैं।
    इस विषय का एक पक्ष यह भी है कि साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पत्रकारिता से जुड़ कर भी पत्रकार कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। समाचार पत्रों के पत्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को पत्रकार की श्रेणी में नहीं मानते हैं। ऐसे संपादक-पत्रकार सदैव प्रकाशन संकट से जूझते, सीमित संसाधनों में पत्रिका निकालते हैं। वे रचनाकारों को मानदेय नहीं दे पाते हैं, रचनाकार भी अपनी वरियताओं के रहते इन्हें रचनाएं देने का अपना क्रम रखते हैं।
    कहने को तो अन्य प्रांतों की भांति राजस्थान से बहुत अधिक साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई अथवा हो रही हैं किंतु ये अपने जिले-प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर कुछ रचनात्मक पहचान बनाए तभी इनकी सार्थकता है। साहित्यिक पत्रिका के संपादक जो लेखक-कवि हैं ने पत्रकारिता को एक जरिया बनाने का प्रयास किया है जिससे कि वे स्वयं और अपने मित्रों को महान सिद्ध करने का उपक्रम सिद्ध कर सकें। साहित्य में कुछ लाभ लेने-देने के दृष्टिकोण से आरंभ की गई ऐसी पत्रिकाओं का प्रकाशन ऐसी सिद्धियों के बाद रोक दिया जाता है। कहना होगा कि खरी और सच्ची पत्रिकाएं बहुत कम है, जिनसे राजस्थान का नाम वर्तमान परिदृश्य में गर्व से लिया जा सके। खैर जैसे भी स्थितियां और हालात रहे हों किंतु इन साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का वातावरण निर्माण और नए लेखकों को मंच देने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भाषा, साहित्य तथा संस्कृति के क्षेत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं का अतुलनीय योगदान स्वीकारा गया है।
    राजस्थान के अनेक दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्र साहित्य को प्रमुखता देते हुए अपने परिशिष्ट प्रकाशित करते हैं। साहित्यिक लघु पत्र-पत्रिकाओं के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि ’लहर‘, ’बिन्दु‘, ’वातायन‘ ‘कृति ओर’ और ’पुरोवाक‘ आदि अनेक पत्रिकाओं ने हिन्दी जगत में अपनी पहचान बनाई। लघु संसाधनों के बावजूद भी इन पत्रिकाओं ने बड़े पाठक वर्ग तक अपनी पहुंच का दायरा बनाया।
    वैसे तो राजस्थान से अनेक लघु पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित हुई और हो रही है किंतु यहां कुछ प्रमुख पत्रिकाओं की चर्चा इस आश्य से कर रहा हूं कि इस दिशा में व्यापक शोध-खोज से नए तथ्य प्रकाश में आएंगे। यहां किसी पत्रिका अथवा संपादक के कार्य का मूल्यांकन कम या अधिक के आधार पर नहीं किया जा रहा है, यह तो बस एक विहंगम परिदृश्य को देखने देखाने का प्रयास भर है।
अक्सर : त्रैमासिक रूप में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका के संपादक प्रख्यात कवि हेतु भारद्वाज है। जयपुर राजस्थान से प्रकाशित इस पत्रिका के अपने खास तेवर हैं। इस पत्रिका में जहां हिंदी साहित्य की विविध गतिविधियों और घटनाक्रम को समाहित किया जाता है वहीं परंपरा बोध के परिपेक्ष्य में साहित्यिक आलेख और अन्य सामग्री दी जाती है। गहरी सूझ-बूझ और विचारोत्तेजकता देख सकते हैं।
अनुकृति : यह त्रैमासिक पत्रिका जयश्री शर्मा के संपादन में जयपुर से प्रकाशित होती है।
अनुक्षण- प्रयास संस्थान चूरू की त्रैमासिक पत्रिका अनुक्षण के संपादक उम्मेद सिंह गोठवाल हैं। वर्ष 2015 में आरंभ हुई इस पत्रिका में कविता, कहानी, साक्षात्कार, संस्मरण आदि विधाओं को शामिल कर इसे भरा पूरा बनाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
अभिनव संबोधन- इसका प्रवेशांक हाल ही में आया है। इसमें दो अनुभवी रचनाकार जुड़े हुए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इनके द्वारा बेहतर काम होगा। प्रसिद्ध संपादक कमर मेवाड़ी पत्रिका के सलाहकार संपादक हैं तथा कहानीकार-कवि माधव नागदा संयुक्त संपादक है।
अरावली उद्घोष : इसका मासिक प्रकाशन उदयपुर से होता है। इसके संपादक बी पी वर्मा पथिक हैं। आदिवासी मीडिया व साहित्य के लिए समर्पित यह पत्रिका उल्लेखनीय है।
इतवारी पत्रिका : यह राजस्थान पत्रिका का प्रकाशन था, जिसमें प्रति रविवार साहित्य के अतिरिक्त समाज,देश और राजनीति पर साहित्यिक दृष्टिकोण से सजग साहित्यकारों के वैचारिक आलेख प्रकाशित होते थे। बड़े प्रकाशन समूह से जुड़े होने के बाद भी इतवारी पत्रिका ने व्यवसायिकता के साथ साहित्यिक दृष्टिकोण से लंबा सफर तय किया।
उत्पल : बोधि प्रकाशन द्वारा साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन के क्रम में ‘उत्पल’ पत्रिका आरंभ की गई। कवि-संपादक और प्रकाशक मायामृग ने पत्रिका बड़े साज-सज्जा के साथ निकाली किंतु इसे नियमित नहीं रखा जा सका। इसके अंक संग्रहणीय कहे जा सकते हैं।
एक और अंतरीप : जयपुर से अजय अनुरागी इस पत्रिका को पिछले 23 वर्षों से प्रकाशित कर रहे हैं। इसका ताजा अंक अप्रैल-जून, 2017 को वरिष्ठ लेखक हेतु भारद्वाज पर केन्द्रित किया गया है।
कथारंग- युवा नाटककार-कवि हरीश बी. शर्मा ने बीकानेर शहर और संभाग में कथा साहित्य की परंपरा में तेजी से आए बदलावों को केंद्रित करते हुए अनेक कहानीकारों को कथारंग पत्रिका के माध्यम से मंच दिया है। यह एक अनुपम उदाहरण है कि किसी क्षेत्र विशेष में इतनी संख्या में कथाकार हो सकते हैं। इसका नया और तीसरा अंक लघुकथा पर केंद्रित आया है।
कथाराज- श्रीडूंगरगढ़ जब चूरू जिले में था तब यह कहानी केंद्रित पत्रिका चेतन स्वामी के संपादन में प्रकाशित होती थी। राजस्थान में नई कहानी के दौर में इस पत्रिका की अहम भूमिका रही है। 
कालबोध : प्रख्यात लेखक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ ने बीकानेर से कालबोध पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। विशेष रूप से यह गद्य साहित्य और कथा केंद्रित पत्रिका कही जाती थी। बाद में 1957-58 के आस पास ‘नई चेतना’ नाम से पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
किरसा : सूरतगढ़ से युवा साहित्यकार सतीश छिम्पा ने इस अनियतकालीन पत्रिका के तीन चार अंक प्रकाशित हुए। इसमें युवा रचनाशीलता के साथ संपादक की गहरी सूझ-बूझ देखी जा सकती है।
कुरजा संदेश : पत्रकर लेखक ईश मधु तलवार के संपादन में इस पत्रिका के अनेक विशेषांकों से कीर्तिमान स्थापित किया है। इसके सभी विशेषांक बेहद चर्चित रहे हैं। फिलहाल राजस्थानी कहानी पर केंद्रित भव्य और विशाल विशेषांक चर्चा के केंद्र में है।
कृति ओर- वरिष्ठ कवि विजेंद्र और डॉ. रमाकांत शर्मा के संयुक्त प्रयासों से इस पत्रिका ने कविता और आलोचना के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। अपनी सुदीर्घ यात्रा में यह पत्रिका रुकी पर कभी झुकी नहीं। लंबे अंतराल पर भी अपने पाठकों-लेखकों का विश्वास बनाए रखा। इस पत्रिका का “लोकधर्मी कविता विशेषांक” अंक 60-61 विशेष चर्चा में रहा। इसका नया अंक 83-84 जनवरी-जून, 2017 विजेंद्र के निर्देशन में संपादक अमीरचंद वैश्य द्वारा प्रकाशित किया गया है।
खोजो और जाने : यह पत्रिका विद्या भवन उदयपुर की है जो शिक्षा जगत और समाजिक वैचारिकता पर केंद्रित है।
चर्चा : जोधपुर के कवि योगेन्द्र दवे ने लंबे समय तक कविता के विविध रूपों पर केंद्रित इस पत्रिका को चलाया। चर्चा के कवि और कविता पर केंद्रित अनेक अंक चर्चा में रहे।
तटस्थ : सीकर के शोध विद्वान डॉ. कृष्णबिहारी सहल ने इस त्रैमासिक पत्रिका को लघुपत्रिकाओं के निराशाजनक दौर में चालीस से अधिक वर्ष सतत सक्रिय बनाए रखा। यह बहुत पुरानी पत्रिका है जिसमें रचनात्मकता व विविधता किसी व्यवसायिक पत्रिका से कमतर नहीं है।
दृष्टिकोण : यह पत्रिका नरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती कोटा से प्रकाशित कर रहे हैं।
नई गुदगुदी- जयपुर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का आकार भले छोटा हो किंतु हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में इसका बहुत नाम है। वर्षों से सक्रिय इस पत्रिका ने अनेक लेखकों और व्यंग्यकारों को जहां मंच दिया, वहीं सही और सच्ची बात करने से भी कभी गुरेज नहीं किया।
नजरिया : युवा कवि दिनेश चारण ने 2013 में इस पत्रिका को आरंभ किया और अब तक के प्रकाशित अंकों के आधार पर वे संभावनाओं से भरे संपादक के रूप में छवि बना चुके हैं। नजरिया में भाषा, साहित्य और संस्कृति के साथ समग्र कला माध्यमों को एक नजरिये से देखने-परखने और प्रस्तुत करने का साहस देखा जा सकता है। एक पुस्तक पर अनेक समीक्षकों से मूल्यांकन और भारतीय भाषाओं की रचनाओं को हिंदी में प्रस्तुत करना इसकी अन्य विशेषता कही जा सकती है। 
नया शिक्षक : शिक्षा विभाग राजस्थान की इस द्विभाषी पत्रिका का प्रकाशन त्रैमासिक होता था। इसका शिक्षा जगत में बड़ा नाम रहा है। इसमें साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा का अपना स्तर था। 
परंपरा- राजस्थानी शोध संस्थान जोधपुर की इस शोध पत्रिका ने अपनी सुदीर्घ यात्रा में राजस्थान और राजस्थानी को केन्द्र में रखा। इसके अनेक अंक आज भी स्मरणीय और धरोहर के रूप में याद किए जाते हैं। प्राचीन, मध्यकालीन साहित्य और अप्रकाशित साहित्य भंडार पर उल्लेखनीय कार्य हुआ।
पुरोवाक- पीयूष दईया के संपादन का यह उनकी पत्रकारिता का पहला आस्वाद था। इसमें निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव बैद सरीखे लेखकों के साथ राजस्थान के कला जगत को और आधुनिक दृष्टिकोण को केंद्र में रखा गया था। एक दो अंकों के बाद इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।
प्रतिलिपि : कवि गिरिराज किराडू ने इसे आरंभ में इंटरनेट पर और बाद में प्रिंट रूप में प्रकाशित किया। विशेष चयन दृष्टि और कुछ प्रिय लेखकों-कवियों के रचना-संसार में एक नए लेखक की उत्सुकता और सम्मान की दृष्टि यहां देखी जा सकती है। वर्तमान में भी अपनी वेव साइट और प्रिंट अंकों से कुछ खास रुचि के रचनाकारों पर इनका कार्य मंथर गति से चल रहा है।
प्रतिश्रुति : इसे जोधपुर से साहित्यकार रामप्रसाद दाधीच ने त्रैमासिक प्रकाशित किया। मरुधर मृदुल द्वारा संपादित यह पत्रिका लगभग दस वर्षों तक राजस्थान की रचनाशीलता को व्यापक परिदृश्य में स्थापित करती रही।
बनास : संपादक पल्लव ने उदयपुर से ’बनास‘ का प्रकाशन आरंभ में अनियतकालीन रखा। अब यह दिल्ली से प्रकाशित हो रही है। यह साहित्य में व्यक्ति और साहित्य केंद्रित उपक्रम से अपने हर अंक में एक नयी और जीवंत बहस को स्थापित करने वाली पत्रिका है। ‘काशी का अस्सी‘ के बहाने इस पत्रिका ने हिन्दी उपन्यास के स्वरूप पर गंभीर बहस कर साहित्यकारों एवं पाठकों का ध्यान खींचा। समकालीन रचनाशीलता पर किसी कृति अथवा कृतिकार पर अंक प्रकाशित करना संपादक की जिद और जनून है, जिसके रहते वे हर बार असंभव दिखने वाला कार्य संभव कर दिखाते हैं।
बाल वाटिका- प्रख्यात बाल साहित्यकार भैरूंलाल गर्ग ने बाल साहित्य के क्षेत्र में अनुपम काम कर दिखया है। अब तक दो सौ पचास से अधिक अंकों में बाल वाटिका राजस्थान ही नहीं वरन देश की ऐसी पत्रिका है जिसे बाल साहित्य के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की चर्चा से पृथक नहीं किया जा सकता है। बाल साहित्य की विविध विधाओं और आलोचना के साथ विचार-विमर्श में संपादक भैरूंलाल गर्ग की गहरी सूझ-बूझ और प्रखर दृष्टि देखी जा सकती है।
बालहंस (पाक्षिक) राजस्थान पत्रिका के इस प्रकाशन ने बाल पाठकों में अपना गहरा स्थान बनाया है। यह पत्रिका राष्ट्रीय स्तर भी चर्चित और लोकप्रिय पत्रिका रही है।
मधुमति- राजस्थान सहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका मधुमति की सुदीर्घ यात्रा रही है। यह उदयपुर से नियमित प्रकाशित हो रही है। वर्तमान में डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ अपनी साहित्यिक दृष्टि से इस पत्रिका को एक नया स्वरूप देने में संलग्न हैं।
मरूदीप - बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में मक्खन जोशी का योगदान रहा। चौथा सप्तक के कवि आलोचक डॉ. नंदकिशोर आचार्य की ख्याति संपादक-पत्रकार के रूप हुई जिसमें इस पत्रिका का स्मरण किया जाता हैं। अपने वैचारिक आलेखों और रचनात्मकता से मरूदीप ने अपने समय में पूरे देश का ध्यान आकृषित किया।
मरूभारती- बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी की यह पत्रिका लंबे समय तक प्रकाशित होती रही। इसने शोध-खोज की दिशा में सराहनीय कार्य किया।
मारवाड़ी डाइजेस्‍ट : इसके संपादक रतन जैन, पडि़हारा (चूरू) हैं। यह नियमित प्रकाशन है।
लहर- प्रकाश जैन के संपादन में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ा नाम रहा है।
वरदा- राजस्थान साहित्य समिति बिसाऊ की यह शोध पत्रिका डॉ. मनोहर शर्मा के संपादन में देश-दुनिया में चर्चित रही है। प्रचानी और मध्यकालीन साहित्य पर इस पत्रिका ने विशद कार्य किया है।
वातायन- बीकानेर के कवि हरीश भादाणी ने अपने संघर्ष के दिनों में अपने मित्रों के साथ तत्कालीन हिंदी साहित्य में इसे वरेण्य पत्रिका बना दिया था। वातायन चर्चा और विचार विमर्श के साथ समकालीन रचनाशीलता की प्रमुख पत्रिका रही। लंबे अर्से बाद इसका पुनर्प्रकाशन भी हुआ किंतु फिर से इसे बंद करना पड़ा। सूर्यप्रकाशन मंदिर के सूर्यप्रकाश बिस्सा ने भी वातयन के पुनर्प्रकाशन का दायित्व संभाला किंतु यह नियमित नहीं हो सकी।
विकल्प- बीकानेर के अजीत फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका में वैचारिक आलेख, शोध और समीक्षा आदि प्रकाशित होती है।
शबनम ज्योति : इस अनियतकालीन पत्रिका का संपादन अब्दुल समद राही सोजत सिटी से करते हैं। वे पिछले तीस वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस पत्रिका में राजस्थान के लेखकों की विविध विधाओं की रचनाओं को महत्त्व दिया जा रहा है। प्रतिष्ठ रचनाकारों के साथ नए और उदयीमान रचनाकारों के उत्थान में इस पत्रिका का सराहनीय योगदान रहा है।
शिविरा- शिक्षा विभाग राजस्थान की बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस शैक्षिक पत्रिका के प्रत्येक अंक में पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित होती है। इसका प्रचार-प्रसार पूरे राजस्थान के गांव गांव ढाणी ढाणी में है क्यों कि इसमें शिक्षा विभाग के आदेश प्रकाशित होते हैं। विगत वर्षों से सितम्बर महिने का अंक साहित्य की विविध विधाओं पर केंद्रित किया जा रहा है जिसमें राजस्थान के सृजनशील कर्मचारियों की रचनाशीलता को देखा जा सकता है।
शेष : त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हसन जमाल ने इसे राजस्थान की सीमाओं से बाहर पाकिस्तान तक में लोकप्रिय बनाया है। वे इसे जोधपुर से विगत 16 वर्षों से प्रकाशित करा रहे हैं। इस पत्रिका में शोध-खोज के साथ विषय केंद्रित विशेषांक अपनी पूरी गरिमा और गंभीरता के साथ प्रकाशित किए गए हैं।
संबोधन- यह त्रैमासिक पत्रिका कमर मेवाड़ी के संपादन में कांकरोली (राजसमंद) से प्रकाशित हो रही है। पिछले 44 वर्षों से नियमित प्रकाशित हो रही इस लघु पत्रिका ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसके अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषांकों को राजस्थान की हिंदी पत्रिकारित के क्षेत्र में उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। इसमें विविधतापूर्ण रचनाओं का प्रकाशन होता है। विविध विधाओं और स्थापित रचनाकारों के साथ नए लेखकों को स्थान मिलता रहा है। कुछ ऐसे भी विशेषांक आए है जिनका संपादन संपादन ने राजस्थान के बाहर के रचनाकारों को सौंप कर इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया है।
संस्कृति-मीमांसा : इसमें चिंतनपरक सांस्कृतिक लेखों और टिप्पणियों के साथ ही सृजनात्मक पक्षों को भी यथोचित स्थान दिया जाता है। समान्तर संस्थान जयपुर से आलोचक राजाराम भादू ने इसे विचारोत्तेजक आलेख और संवाद की पत्रिका के रूप में लोकप्रिय बनाया है।
समय माजरा : यह मासिक प्रकाशन है जिसका प्रकाशान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन, जयपुर से होता है। यह विगत 17 वर्षों से प्रकाशित हो रही है। विचार, सृजन और जनसरोकारों की इस पत्रिका के संपादक ओम सैनी हैं। 
साहित्य समर्था- नीलिमा टिक्कू इस पत्रिका की संस्थापक और संपादिका हैं। वे एक रचनाकार के साथ-साथ स्पंदन महिला साहित्यिक संस्थान जयपुर की अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय हैं। विगत 6 वर्षों से प्रकाशित होने वाली इस त्रैमासिक पत्रिका के वरिष्ठ महिला रचनाकारों पर केंद्रित अंक चर्चा में रहे हैं। पद्मश्री सम्मान से सम्मानित लेखिका डॉ. सुनीता जैन के रचनाकर्म पर केंदित अंक अप्रैल-जून 2016 आदि साहित्य समाज में व्यापक चर्चा का विषय रहे हैं। इसके प्रत्येक अंक को विख्यात साहित्यकारों पर केंद्रित कर उनके अवदान पर चर्चा की जाती है।
सिम्पली जयपुर : इस पत्रिका में पुस्तक समीक्षा और साहित्यिक विषय पर आलेख के अतिरिक्त वर्तमान सरोकारों के साथ समय, समाज और राजनीति की चर्चा विशेष रहती है।
सुजस- सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय, राजस्थान जयपुर की इस पत्रिका को साहित्यिक नहीं कहा जा सकता किंतु जिस लकदक साज-सज्जा और रंग-रूप में यह प्रकाशित होती है वह उल्लेखनीय है। इसमें साहित्य, कला व संस्कृति के विविध घटकों को समाहित किया जाता है।
सृजन कुंज : विगत चार वर्षों से श्रीगंगानगर से पत्रकार और व्यंग्यकार कृष्णकुमार आशु इस पत्रिका का त्रैमासिक प्रकाशन कर रहे हैं। सृजन कुंज सीमित संसाधनों के उपरांत भी महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है। इन दिनों इस पत्रिका का ‘महिला लेखन अंक’ चर्चा में है।
    कहना होगा कि हिन्दी भाषी व्यापक समाज में इन और ऐसी लघुपत्रिकाओं की आवश्यकता सदा बनी हुई है और आलोच्य पत्रिकाओं के साथ सैकडों छोटी-बडी पत्रिकाएँ यह दायित्व पूरा भी कर रही है। राजस्थान में अनेक पत्रिका प्रकाशित हुई, बंद हुई। कुछ का स्मरण यहां अपनी सीमाओं के कारण नहीं हो सका है उसके लिए लेखक खेद व्यक्त करता है। ऐसे छूटे हुए संपादक इसे अन्यथा नहीं लेंगे। जो पत्रिकाएं अपने संसाधनों से प्रकाशित हो रही हैं, वे निसंदेह सम्मान की अधिकारी हैं।
    वर्तमान में प्रतिलिपि, अपनी माटी, हस्ताक्षर आदि अनेक ई-पत्रिकाएं नई तकनीक से जुड़ते हुए इस कार्य में नई संभावनाओं के साथ सामने आ रही है। अनेक दैनिक समाचार पत्र नियमित रूप से अथवा साप्ताहिक रूप से साहित्य पर केंद्रित अपने परिशिष्टों से अनेक रचनाकारों को सक्रिय बनाए हुए हैं, वहीं साहित्यिक परिदृश्य को विकासित करने में दूरदर्शन और आकाशवाणी का भी सराहनीय योगदान है। यह आलेख राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता का एक आइना भर है, इस विषय में अनेक तथ्यों और संभावनाओं को जोड़ा जाना शेष है। यह तो बस एक आगाज है, इसका अंजाम आपके सहयोग से ही होगा।
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लालित्य ललित की व्यंग्य-यात्रा - डॉ. नीरज दइया

     “किसी पर ऐसे मजाक कर जाना, जो किसी को चुभे भी नहीं और अपना काम भी कर जाए।” यह आत्मकथन हमें लालित्य ललित के पहले व्यंग्य संग्रह के लिए लिखे उनके आरंभिक बयान ‘मेरी व्यंग्य-यात्रा’ में मिलता है। उनके दोनों व्यंग्य संग्रह ‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’ (2015) और ‘विलायतीराम पांडेय’ (2017) इस आत्मकथन पर एकदम खरे उतरते हैं। यह कथन उनकी इस यात्रा की संभवानाओं और सीमाओं का भी निर्धारण करने वाला है। यहां यह भी उल्लेख आवश्यक है कि दोनों व्यंग्य संग्रह की भूमिका प्रख्यात व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने लिखी है। जनमेजय ने प्रशंसात्मक लिखते हुए अंत में रहस्य उजागर कर दिया कि वे नए व्यंग्यकार लालित्य ललित के प्रथम व्यंग्य संग्रह का नई दुल्हन जैसा स्वागत कर रहे हैं। ‘उसकी मुंह-दिखाई की, चाहे कितनी भी काली हो, प्रशंसा के रूप में शगुन दिया और मुठभेड़ भविष्य के लिए छोड़ दी। ललित यदि इस प्रशंसा से कुछ अधिक फूल गए तो यह उनके साहित्यिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होगा।’ जाहिर है कि अब मुठभेड़ होनी है और यह भी देखा जाना है कि उनका साहित्यिक स्वास्थ्य फिलहाल कैसा है क्यों कि उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह भी आ चुका। दूसरे संग्रह ‘विलायतीराम पांडेय’ में भूमिका लिखते हुए प्रेम जनमेजय ने ‘दिवाली का सन्नाटा’ व्यंग्य रचना को लालित्य ललित की अब तक की रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ कहा है। पहले व्यंग्य संग्रह को अनेक आरक्षण दिए जाने के उपरांत दूसरा संकलन जिस कठोरता और किंतु-परंतु के साथ परखे जाने की कसौटी के साथ ही आलोचना के विषय में भी अनेक संभावनाएं और सीमाओं का उल्लेख करते हुए मेरा काम आसान कर दिया है। साथ ही व्यंग्यकार लालित्य ललित ने अपने बयान में अपने व्यंग्यकार के विकसित होने में अनेक व्यंग्य लेखकों का स्मरण और आभार ज्ञाप्ति करते हुए पूरी प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वहीं पहले संग्रज के फ्लैप पर ज्ञान चतुर्वेदी, यज्ञ शर्मा, डॉ. गिरिजाशरण अग्रवाल, सुभाष चंदर, हरीश नवल और गौतम सान्याल की टिप्पणियों को देख कर बिना व्यंग्य रचनाएं पढ़े ही लालित्य ललित को महान व्यंग्यकार कहने का मन करता है।
    मन को नियंत्रण में लेते हुए दोनों पुस्तकों में संग्रहित 66 व्यंग्य रचनाओं का गंभीरता से पाठ आवश्यक लगता है। यह गणित का आंकड़ा इसलिए भी जरूरी है कि दोनों व्यंग्य संग्रह में रचनाएं का जोड़ 67 हैं पर एक व्यंग्य ‘पांडेजी की जलेबियां’ दोनों व्यंग्य संग्रहों में शामिल है। यहां यह कहना भी उचित होगा कि इन दोनों व्यंग्य संग्रह में लालित्य ललित ने व्यंग्य के नाम पर कुछ जलेबियां पेश की है। वैसे भी व्यक्तिगत जीवन में आप स्वाद के दीवाने हैं और संग्रह के अनेक व्यंग्य आपके इसी स्वाद के रहते जरा स्वादिष्ठ हो गए हैं। जाहिर है कि आपकी इन जलेबियों में आपके अपने निजी स्वाद की रंगत और कलाकारी है जो आपको अन्य व्यंग्यकारों से अलग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। कलाकारी इस अर्थ में कि लालित्य ललित कवि के रूप में जाने जाते हैं और संख्यात्मक रूप से भी आपकी कविताओं की किताबों का कुल जमा आंकड़ा डराने वाला है। अपनी धुन के धनी ललित का 32 वां कविता संग्रह "कभी सोचता हूं कि" आ रहा है। ऐसे में बिना पढ़े-सुने उन्हें कवि-व्यंग्यकार मानने वाले बहुत है तो जाहिर है उनके व्यंग्यकार की पड़ताल होनी चाहिए जिससे वास्तविक सत्य उजागर हो सके। उनके कवि की बात फिर कभी फिलहाल व्यंग्यकार की बात करे तो गद्य को कवियों का निकष कह गया है। निबंध गद्य का निकष कहा जाता है, इसमें व्यंग्य को भी समाहित ही नहीं विशेष माना जाना चाहिए। अस्तु कवि-कर्म को कसौटी व्यंग्य भी है।
    लालित्य ललित के व्यंग्य की तुलना किसी अन्य व्यंग्यकार ने इसलिए नहीं की जा सकती कि उन्होंने स्वयं की एक शैली विकसित करने का प्रयास किया है। उनके व्यंग्य किसी अन्य व्यंग्यकार या हिंदी व्यंग्य की मुख्य धारा से अलग अपने ही तरह के व्यंग्य लेखन का परिणाम है। उनकी यह मौलिकता उनकी निजता भी है जो उन्हीं के आत्मकथन मजाक करने में उनकी अपनी सावधानी कि किसी को चुभे नहीं और अपना काम कर जाए की कसौटी के परिवृत में समाहित है। उनकी रचनाओं का औसत आकार लघु है और कहना चाहिए कि आम तौर पर दैनिक समाचार पत्रों को संतुष्ट करने वाला है। जहां उन्होंने इस लघुता का परित्याग किया है वे अपने पूरे सामर्थ्य के साथ उजागर हुए हैं। साथ ही यह भी कि वे व्यंग्यकार के रूप में भी अनेक स्थलों पर अपने कवि रूप को त्याग नहीं पाए हैं। सौंदर्य पर मुग्ध होने के भाव में उनकी चुटकी या पंच जिसे उन्होंने मजाक संज्ञा के रूप चिह्नित किया है चुभे नहीं की अभिलाषा पूरित करता है।
    व्यंग्य का मूल भाव ‘दिवाली का सन्नाटा’ में इसलिए प्रखरता पर है कि उन्होंने करुणा और त्रासदी को वहां चिह्नित किया है। इस व्यंग्य के आरंभ में पैर और चादर का खेल भाषा में खेलते हुए वे चुभते भी है और अपना काम भी करते हैं। मूल बात यह है कि उनका यह चुभना अखरने वाला नहीं है। उनकी व्यंग्य-यात्रा में कुछ ऐसे भी व्यंग्य हैं जहां उनका नहीं चुभना ध्यनाकर्षक का विषय नहीं बनता है। यहां यह भी कहना आवश्यक है कि इसी व्यंग्य का बहुत मिलता जुलता प्रारूप इसी संग्रह में संकलित अन्य व्यंग्य ‘महंगाई की दौड़ में पांडेयजी’ में देखा जा सकता है। जाहिर है मेरी यह बात चुभने वाली हो सकती है पर अगर इसने अपना काम किया तो आगामी संग्रहों में ऐसा कहने का अवसर किसी को नहीं मिलेगा। सवाल यहां यह भी उभरता है कि विलायतीराम पांडेय ने क्या सच में अपने परिवार की खुशी के लिए किडनी का सौदा कर लिया है। यह हो सकता है कहीं हुआ भी हो किंतु यहां मूल भाव ऐसा किया जाने में जो करुणा है वह रेखांकित किए जाने योग्य है। आधुनिक जीवन में घर-परिवार और बच्चों की फरमाइशों के बीच पति और पिता का किरदार निभाने वाला जीव किस कदर उलझा हुआ है। लालित्य ललित की विशेषता यह है कि वे इस पिता और खासकर पति नामक जीव की पूरी ज्यामिति वर्तमान संदर्भों-स्थितियों में उकेरने की कोशिश करते हैं।
    उनका मुख्य पात्र विलायतीराम पांडेय दोनों संग्रहों में सक्रिय है और दूसरे में तो वह पूरी तरह छाया हुआ है। धीरे धीरे उसकी पूरी जन्म कुंडली हमारे सामने आ जाती है। नाम- विलायतीराम पांडेय, पिता का नाम- बटेशरनाथ पांडेय, माता का नाम- चमेली देवी, पत्नी- राम प्यारी यानी दुलारी और दोस्त- अशर्फीलाल जैसे कुछ स्थाई संदर्भ व्यंग्यकार ने अपने नाम करते हुए विगत चार-पांच वर्षों का देश और दुनिया का एक इतिहास इनके द्वारा हमारे समाने रखने का प्रयास किया है। यहां दिल्ली और महानगरों में परिवर्तित जीवन की रंग-बिरंगी अनेक झांकियां है तो उनके सुख-दुख के साथ त्रासदियों का वर्णन भी है। पति-पत्नी की नोक-झोंक और प्रेम के किस्सों के साथ एक संदेश और शिक्षा का अनकहा भाव भी समाहित है। कहना होगा कि लालित्य ललित मजाक मजाक में अपना काम भी कर जाते हैं। यहां व्यंग्य का मूल केवल कुछ पंक्तियों में निहित नहीं है, वरन व्यंग्य का वितान जीवन के इर्द-गिर्द दिखाई देता है। स्वार्थी और मोल-भाव करने वाले प्राणियों के बीच इन रचनाओं का नायक विलायतीराम पांडेय कहीं-कहीं खुद व्यंग्यकार लालित्य ललित नजर आता है तो कहीं-कहीं उनके रंग रूप में पाठक भी स्वयं को अपने चेहरों को समाहित देख सकते हैं। आज का युवा वर्ग इन रचनाओं में विद्यमान है। उसके सोच और समझ को व्याख्यायित करते हुए एक बेहतर देश और समाज का सपना इनमें निहित है।
    यहां लालित्य ललित की अब तक की व्यंग्य-यात्रा के सभी व्यंग्यों की चर्चा संभव नहीं है फिर भी उनके दोनों संग्रहों से कुछ पंक्तियां इस आश्य के साथ प्रस्तुत होनी चाहिए कि जिनसे उनके व्यंग्यकार का मूल भाव प्रगट हो सके। पहले व्यंग्य संग्रह से कुछ उदाहरण देखें- ‘आप भारतीय हैं यदि सही मायनों में, तो पड़ोसी से जलन करना, खुन्नस निकालना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।’ (पृष्ठ-15); ‘जमाना चतुर सुजानों का है। मक्खन-मलाई का है, हां-जी, हां-जी का है, अगर आप यह टेक्नीक नहीं सीखोगे तो मात खा जाओगे, दुनियादारी से पिछड़ जाओगे।’ (पृष्ठ-20); ‘मगर यह बॉस किसिम के जीव जरा घाघ प्रजाति के होते हैं, जो न आपके सगे होते हैं और संबंधी तो बिल्कुल नहीं।’ (पृष्ठ-29); ‘सांसारिक लोगों का हाजमा होता ही कमजोर है।’ (पृष्ठ-37); ‘इन दिनों बड़ा लेखक छोटे को कुछ नहीं समझता तो छोटा लेखक बड़े को बड़ा नहीं समझता, हिसाब-किताब बराबर।’ (पृष्ठ-52); ‘जो लेते हैं मौका, वही माते हैं चौका।’ (पृष्ठ-58); ‘यह हिंदुस्तान है, यहां कुछ भी हो सकता है। अंधे का ड्राइविंग लाइसेंस बन सकता है। मृत को जीवित बनाया जा सकता है।’ (पृष्ठ-65);  ‘यही तो भारतीय परंपरा है- हम एक बार किसी से कुछ उधार लेते हैं तो देते नहीं।’ (पृष्ठ-92) आदि
    कुछ उदाहरण दूसरे व्यंग्य संग्रह से- ‘विलायतीराम पांडेय ने सोचा पल्ले पैसा हो तो साहित्यकार क्या, मंच क्या, अखबार क्या कुछ भी मैनेज किया जा सकता है।’ (पृष्ठ-21); ‘घूस देना आज राष्ट्रीय पर्व बन चुका है। अपने दी, आपकी फाइल चल पड़ी और नहीं दी तो आपका काम अटक गया, भले ही आप कितने बड़े तोपची हों।’ (पृष्ठ-24); ‘एक वो जमान था, एक अब जमाना है। बच्चे पहले तो सुन लेते थे, पर अब लगता है जैसे हम भैंक रहे हैं और वह अनसुना करने में यकीन करते हैं।’ (पृष्ठ-28); ‘कामवाली बाई भी वाट्सअप पर बता देती है, आज माथा गर्म है, मेमसाब, नहीं आ पाऊंगी, वेशक पगार काट लेना। (पृष्ठ-30); ‘बाजार में नोटबंदी के चलते कर्फ्यू-सा माहौल था।’ (पृष्ठ-38); ‘अब देश के नेता बाढ़ में जाने के बजाय अपना दुःख ट्विटर पर व्यक्त कर देते हैं।  (पृष्ठ-66); ‘मंदी ने बजाया आज सभी का बाजा, लेकिन राजनेताओं का कभी नहीं बजता बाजा, पता नहीं वो दिन कब आएगा।’ (पृष्ठ-80); ‘नंगापन क्या समाज के लिए अनिवार्य योग्यताओं में शामिल एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। कितने पोर्न पसंदीदा हो गए हम।’ (पृष्ठ-92); आदि उदाहरणो से जाहिर है कि उनके यहां विषय की विविधा के साथ समसामयिक स्थितियों से गहरी मुठभेड भी है। वे साहित्य और समाज के पतन पर चिंतित दिखाई देते हैं और साथ ही जनमानस की बदलती प्रवृतियों और लोक व्यवहार को रेखांकित करते हुए कुछ ऐसे संकेत छोड़ते हैं जिन्हें पाठकों को पकड़ना है। वे अपनी बात पर कायम है कि उनका कोई भी मजाक हिंसक नहीं है वरन वे अहिंसा के साथ उस रोग और प्रवृत्ति को स्वचिंतन से बदलने का मार्ग दिखलाते हैं।
    लालित्य ललित के पास गद्य का एक कौशल है जिसके रहते वे किसी उद्घोषक की भांति अपनी बात कहते हुए आधुनिक शव्दावली में अपने आस-पास के बिम्ब-विधान के साथ नए रूपकों को निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। काफी जगहों पर हम व्यंग्य में कवि के रूप में ‘यमक’ और ‘श्लेष’ अलंकारों पर उनका मोह भी देख सकते हैं। एक उदाहरण देखें- ‘बॉस यदि शक्की है तो आपको ‘ऐश’ हो सकती है, बच्चन वाली ‘ऐश’ नहीं। नहीं तो अभिषेक की ठुकाई के पात्र बन सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-35) वे व्यक्तिगत जीवन में खाने और जायकों के शौकीन हैं तो उनके व्यंग्य में ऐसे अनेक स्थल हैं जहां उनकी इस रुचि के रहते हमें मजेदार परांठों और पकौड़ों के बहुत स्वादिष्ट अनुभव ज्ञात होते हैं। नमकीन और मिठाई पर उनकी मेहरबानी कुछ अधिक मात्रा में है कि वे अपनी पूरी बिरादरी का आकलन भी प्रस्तुत करते हैं- ‘शुगर के मरीज लेखक लगभग अस्सी पर्सेंट हैं पर मुफ्त की मिठाई खाने में परहेज कैसा!’ (‘विलायतीराम पांडेय’, पृष्ठ-16)
    विलायतीराम पांडेय उनके लिए सम्मानित पार है और वे उसे यत्र-तत्र ‘नत्थू’ बनने की प्रविधियों में बचाते भी हैं। भारतीय पतियों और पत्नियों के संबंधों में मधुता होनी चाहिए इस तथ्य की पूर्ण पैरवी करते हुए भी पतियों और पत्नियों की कुछ कमजोरियों को भी वे बेबाकी के साथ उजागर भी करते हैं। जैसे संग्रह ‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’ के दो उदाहरण देखिए- ‘अधिकतर मर्द जिनकी प्रायः बोलती घरों में बंद रहती है, यहां नाई की दुकान पर उनकी जबान कैंची की तरह चलती है।’ (पृष्ठ-78); ‘शादी-शुदा है यानी तमान बोझों से लदा-फदा एक ऐसा आदमी, जिसकी न घर में जरूरत है और न समाज में।’ (पृष्ठ-24) दूसरे संग्रह ‘विलायतीराम पांडेय’ से- ‘जिंदगी में क्या और किस तरह एक पति को पापड़ बेलने पड़ते हैं यह पति ही जानता है, जो दिन रात खटता है।’ (पृष्ठ-59); ‘हे भारतीय पुरुष ! तू केवल खर्चा करने को पैदा हुआ है। खूब कमा, पत्नियों पर खर्चा कर। बच्चों के लिए ए.टी.एम. बन।’ (पृष्ठ-74); ‘हद है यार, महिला दिखी नहीं कि छिपी हुई सेवा-भावना हर पुरुष की उजागर हो जाती है।’ (पृष्ठ-101)
    लालित्य ललित के व्यंग्यों में प्रतुक्त अनेक उपमाएं रेखांकित किए जाने योग्य है। वे परंपरागत उपमानों के स्थान पर नए और ताजे उपमान प्रयुक्त करते देखे जा सकते हैं। यह नवीनता बाजार की बदलती भाषा और रुचियों से पोषित है। वे एक ऐसे युवा चितेरे हैं जिन्हें अपनी परंपरा से गुरेज नहीं है तो साथ ही अतिआधुनिक समाज की बदलती रुचियों और लोक व्यवहार से अरुचि भी नहीं है। हलांकी वे कुछ ऐसे शब्दों को भी व्यंग्य में ले आते हैं जिनसे आमतौर पर अन्य व्यंग्यकार परहेज किया करते हैं अथवा कहें बचा करते हैं। ‘मेरा भारत महान, जहां मन हो थकने का और जहां मन हो मूतने का,कही कोई रूकावट नहीं है।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-55) ये अति आवश्यक और सहज मानवीय क्रियाएं हैं। सभी का सरोकार भी रहता है फिर भी उनके यहां शब्दों की मर्यादा है और वे संकेतों में बात कहने में भी सक्षम है- ‘हम भारतीय इतने प्यारे हैं कि अपने शाब्दिक उच्चारण से किसी का भी बी.पी. यानी रक्तचाप तीव्र कर सकते हैं या आपकी चीनी घटा सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-17);
    अंत में यह उल्लेखनीय है कि लालित्य ललित के व्यंग्य अपनी समग्रता और एकाग्रता में जो प्रभाव रचते हैं, वह प्रभावशाली है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे संभवतः पृथक-पृथक अपनी व्यंजनाओं से हमें बेशक उतना प्रभावित नहीं करते भी हो किंतु धैर्यपूर्वक पाठ और उनकी सामूहिक उपस्थिति निसंदेह एक यादगार बनकर दूर तक हमारे साथ चलने वाली है। विविध जीवन स्थितियों से हसंते-हसंते मुठभेड करने वाला उन्होंने अपना एक स्थाई और यादगार पात्र रचा है। अब आप ही बताएं कि हिंदी व्यंग्य साहित्य की बात हो तो कोई भला विलायतीराम पांडेय को कैसे भूल सकता है।
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 लालित्य ललित के पास गद्य का एक कौशल है जिसके रहते वे किसी उद्घोषक की भांति अपनी बात कहते हुए आधुनिक शव्दावली में अपने आस-पास के बिम्ब-विधान के साथ नए रूपकों को निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। काफी जगहों पर हम व्यंग्य में कवि के रूप में ‘यमक’ और ‘श्लेष’ अलंकारों पर उनका मोह भी देख सकते हैं। एक उदाहरण देखें- ‘बॉस यदि शक्की है तो आपको ‘ऐश’ हो सकती है, बच्चन वाली ‘ऐश’ नहीं। नहीं तो अभिषेक की ठुकाई के पात्र बन सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-35)
वे व्यक्तिगत जीवन में खाने और जायकों के शौकीन हैं तो उनके व्यंग्य में ऐसे अनेक स्थल हैं जहां उनकी इस रुचि के रहते हमें मजेदार परांठों और पकौड़ों के बहुत स्वादिष्ट अनुभव ज्ञात होते हैं। नमकीन और मिठाई पर उनकी मेहरबानी कुछ अधिक मात्रा में है कि वे अपनी पूरी बिरादरी का आकलन भी प्रस्तुत करते हैं- ‘शुगर के मरीज लेखक लगभग अस्सी पर्सेंट हैं पर मुफ्त की मिठाई खाने में परहेज कैसा!’ (‘विलायतीराम पांडेय’, पृष्ठ-16)
लालित्य ललित के व्यंग्यों में प्रतुक्त अनेक उपमाएं रेखांकित किए जाने योग्य है। वे परंपरागत उपमानों के स्थान पर नए और ताजे उपमान प्रयुक्त करते देखे जा सकते हैं। यह नवीनता बाजार की बदलती भाषा और रुचियों से पोषित है। वे एक ऐसे युवा चितेरे हैं जिन्हें अपनी परंपरा से गुरेज नहीं है तो साथ ही अति आधुनिक समाज की बदलती रुचियों और लोक व्यवहार से अरुचि भी नहीं है।
लालित्य ललित के व्यंग्य अपनी समग्रता और एकाग्रता में जो प्रभाव रचते हैं, वह प्रभावशाली है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे संभवतः पृथक-पृथक अपनी व्यंजनाओं से हमें बेशक उतना प्रभावित नहीं करते भी हो किंतु धैर्यपूर्वक पाठ और उनकी सामूहिक उपस्थिति निसंदेह एक यादगार बनकर दूर तक हमारे साथ चलने वाली है।
- नीरज दइया
(“लालित्य ललित 51 व्यंग्य रचनाएं” पुस्तक के दूसरे फ्लैप पर प्रकाशित टिप्पणी)

असंवेदनशील बयानों के बीच उलझती फिल्म / डॉ. नीरज दइया


कला के भीतर सतत साधना की मांग अंतर्निहित है। अन्य कला माध्यमों में अपेक्षाकृत सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय होने का श्रेय अथवा आधार सामूहिक रचनात्मक कहा जा सकता है। प्रत्येक कला माध्यम की अपने समाज के प्रति जबाबदेही होती है और होनी भी चाहिए। ऐसे में सिनेमा जैसे माध्यम में यह जिम्मेदारी और जबाबदेही सामूहिक है। संभवतः फिल्म ‘पद्मावती’ के निर्माण से जुड़े कलाकार दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, रणवीर सिंह और निर्माता-निर्देशक इसलिए सामूहिक रूप से विवादों के घेरे में हैं। दोष किसी एक का नहीं फिर भी इसके सूत्रधार निर्देशन संजय लीला भंसाली हैं जिन्होंने फिल्म की पटकथा लिखी और साथ ही प्रकाश कपाड़िया जिनका नाम भी लेखक के रूप में दिया गया है। इस पूरे विवाद के बाद ताजा स्थिति में संजय लीला भंसाली का जबाब चर्चा में है- “फिल्म को लेकर सारा विवाद अफवाहों पर आधारित है। मैंने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं किया है। फिल्म मलिक मुहम्मद जायसी के काव्य पर आधारित है।” यह उनका खुद को और फिल्म को बचने का एक संकट-द्वार है जिससे उम्मीद है कि वे इस प्रयास में बच सकते हैं। यदि मान भी लिया जाए कि इस फिल्म का आधार यह कृति है तो अब यह देखना होगा कि इनमें कितना साम्य है और कितने कहां बदलाव किए गए हैं। यह शोध-खोज का विषय है पर इतना जरूर है कि लोक विश्वास और ऐतिहासिक सत्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना जनभावनाओं को आहत कर सकता है। बिना पर्याप्त तथ्यों के काल्पनिक अथवा सपने में ऐसा कुछ दिखाया जाना मनोवैज्ञानिक आधार एवं गहरी सूझ-बूझ की अपेक्षा तो रखता ही है।
    वैसे सत्य यह भी है कि आज स्त्री-पुरुष समानता की बातें करने वाले हमारे भारतीय समाज में राजस्थान का भी अपना एक अध्यय रहा है जिसमें स्त्री को पर्दों में रखा जाता था। यहां तक कि उसे पैर की जूती के बाराबर दर्जा दिया हुआ था। स्त्री-चेतना और अस्मिता की बात करें तो हमारे समक्ष प्राचीनतम उदाहरण कन्नड़ कवयित्री अक्क महादेवी और उसके बाद मध्यकालीन समय में मीरा है। इन संदर्भों और यात्रा के बीच एक अध्याय और सुनहरा पन्ना अपनी अस्मिता के लिए रानी पद्मिनी ने जौहर की आग में कूद कर रचा। अपनी आन-बान और शान पर आंच नहीं आने देना का यह अनुपम उदाहरण है। कहना होगा कि यह स्त्री जाति का प्रवल प्रतिरोध है कि उनका प्राणोत्सर्ग गरिमामय है। नारी जाति और रानी पद्मिनी के प्रति जनता में यह सम्मान है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म-प्रोमो देखकर वे उसके तामझाम और चकाचौंध में नहीं उलझे। रानी पद्मावती के प्रति इसे उनकी श्रद्धा और सम्मान माना जाना चाहिए कि वे न्याय के लिए वगावत पर आमादा हुए।
    एक दूसरा पक्ष यह भी ध्यान दिए जाने योग्य है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड से पास होने पहले चयनित दर्शकों को दिखाना अनुचित है। माना कि फिल्म के विरोधियों को फिल्म के बारे में पर्याप्त और पूरी जानकारी नहीं है। उन्हें नहीं पता कि ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ हुई है या यह उनका भ्रम है। भीड़ और विरोधी शोर में शामिल जनता की अपेक्षाएं भी अनुचित हो सकती है। कहा जा रहा है कि इतिहासकारों और प्रचलित कहानियों के अनुसार पद्मिनी की कहानी में गोरा-बादल प्रमुख चरित्र है, जिन्होंने राणा रतन सिंह की मदद की थी। इस विषय पर प्रसिद्ध कथाकार यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ की ‘गौरा-बादल’ पुस्तिका और पं. नरेन्द्र मिश्र की कविता बेहद लोकप्रिय है। वहीं पद्मावती की कहानी और संदर्भ ‘भारत एक खोज’ (जवाहर लाल नेहरू) में भी आता है। जिसे पर्दे पर दिखाया भी जा चुका है। उनमें कहीं विवाद नहीं हुआ तो फिर ऐसा इस फिल्म में क्या है जिस पर इतना विवाद हो रहा है। रानी पद्मिनी (पद्मावती) विषय लोक आस्था यह है कि चित्तौड़ की औरतों से दो विकल्पं से जौहर को चुना। उन्हें विजयी सेना के समक्ष अपमानित होने को अस्वीकार किया। सभी महिलाओं की एक राय पर विशाल चिता सजाई गई और रानी पद्मिनी के बाद सारी औरतें धधकती अग्नि में स्वाभिमान के लिए कूद गईं और दुश्मन बाहर खड़े देखते रह गए। इस अविस्मरणीय जौहर का गौरव लोकगीतों और कथाओं में आज भी जीवित है।   
    अगर फिल्म कवि जायसी के प्रेमकाव्य पर आधारित है तो यह जानकारी अनिवार्य है कि यह एक लोकप्रिय कृति है जो अनेक विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों में वर्षों से पढ़ाई जा रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, विजयदेव नारायण साही सहित अनेक आलोचकों-रचनाकारों ने इस के संबंध में बहुत कुछ लिखा और कहा है। रानी पद्मिनी के जौहर की अमरगाथा से संबंधित अनेक तथ्य और प्रमाण राजस्थान के इतिहास में विभिन्न इतिहासकारों ने अभिव्यक्त किए हैं। ‘त्रिवेणी’ की भूमिका में आचार्य शुक्ल ने लिखा हैं- “जायसी का क्षेत्र तुलसी की अपेक्षा परिमित है, पर प्रेमवेदना अत्यंत गूढ़ है।” तो साही ने तो जायसी को हिंदी का पहला विधिवत कवि कह कर अपनी पुस्तक ‘जायसी’ में सम्मानित-चर्चित किया है। इस कृति में इतिहास और कल्पना का मणिकंचन योग स्वीकारा गया है। मूल कृति ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा है, जो सूफी मसनवी शैली में 57 खंडों में अभिव्यक्त हुई है। इसके पूर्वाद्ध को कल्पना और उत्तरार्द्ध को ऐतिहासिक आधार से युक्त स्वीकारा गया है। ‘पद्मावत’ महाकाव्य में रहस्यवाद और आध्यात्मिक रंग और संदर्भों की अपनी कहानियां हैं जिनको जाने-समझे बिना संजय लीला भंसली द्वारा दिया गया बयान संभवतः बहुत दूर तक नहीं चलेगा।
    गौर किए जाने वाली बात यह है कि किसी भी श्रव्य-माध्यम की रचना को जब दृश्य-श्रव्य-माध्यम में रूपांतरित करते हैं तो अनेक समस्याएं आती है। यदि मलिक मुहम्मद जायसी के इस काव्य पर आधारित यह फिल्म बनानी होती तो इसमें अनेक घटनाओं, तथ्यों और विवरणों के साथ देश-काल की सम्यक जानकारी आवश्यक थी। यह विवाद थमने वाला नहीं है क्यों कि श्री राजपूत करणी सेना के संरक्षक और संस्थापक लोकेंद्र सिंह काल्वी ने कहा था- “हम किसी भी कीमत पर फिल्म में विकृत तथ्यों को दिखाए जाने की अनुमति नहीं देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि फिल्म भारत के आधे हिस्से में प्रदर्शित ना हो सके।” अब इस मुद्दे पर राज्य सरकार कानून और व्यवस्था की दुहाई पर सक्रिय हुई है। कोर्ट ने किसी भी प्रकार के फैसले को पहले देने से इंकार कर दिया है। ऐसी स्थिति में अभिनेत्री रवीना टंडन का अपना मत है कि ‘पद्मावती’ विवाद केवल राजनीतिक ड्रामा है और इलेक्शन खत्म होते ही सब ठीक हो जाएगा। वहीं इस फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जो रानी पद्मिनी या चित्तौड़ की पद्मावती का किरदार निभा रही हैं का कहना ठीक लगता है कि बिना फिल्म देखे ही विरोध अनुचित है। कलाकारों से विरोध की प्रराकाष्ठा यह है कि उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही है और करणी सेना ने तो पादुकोण को यह धमकी दी है कि रामायण में जिस तरह शूर्पणखा की नाक काट दी गई थी, करणी सैनिक उसी तरह उनकी भी नाक काट सकते हैं। लोकतांत्रिक देश में ऐसा गर्व प्रदर्शन भी बेहद चिंताजनक और असंवेदनशील है। यहां संजय लीला भंसाली से यह भी कहना है कि अगर फिल्म जायसी के काव्य पर आधारित है तो इसका श्रेय और नाम क्यों नहीं दिया गया। ऐसी स्थिति में यह एक पटकथा लेखक और निर्देशक की असंवेदनशीलता कही जाएगी।
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नम्बर वन आऊंला (राजस्थानी बाल कविताएं)

 कवि : पवन पहाड़िया, प्रकाशक- नेम प्रकासण ग्रा.पो. डेह (नागौर) राज. 341022, पृष्ठ : 52 मूल्य : 100/- संस्करण : 2014   
   
    राजस्थानी भाषा और साहित्य के लिए विगत तीन दशकों से सक्रिय पवन पहाड़िया की पहचान एक कवि और राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु संघर्षशील रचनाकार के रूप में है। अपनी मातृभाषा के लिए ऐसे अनेक रचनाकारों की अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं हैं, जिनके रहते वे अनेक मोर्चों पर स्वयं खड़े होने के लिए विवश हैं। पवन पहाड़िया भी एक कवि-लेखक के साथ-साथ जनचेतना और साहित्य के प्रचार-प्रसार-प्रकाशन हेतु सक्रिय है। इसके अतिरिक्त वे राजस्थानी भाषा के नए रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने अनेक भामाशाहों को प्रेरित कर साहित्य पुरस्कार आरंभ किए हैं।
     ‘नम्बर वन आऊंला’ संग्रह पर पवन पहाड़िया को साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पुरस्कार (राजस्थानी) वर्ष 2017 का अर्पित किया गया है। यह बाल कविताओं का संग्रह उन्होंने प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार बी.एल. माली की प्रेरणा से लिखा है और यह संग्रह उन्हें ही समर्पित किया गया है। इस संग्रह की भूमिका में कविताओं में वर्णित विषयों और भावबोध का खुलासा करते हुए आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित लिखते हैं- ‘‘एक अबोध बाल का मन सदैव आगै बढ़ने की चाहत रखता है। यही चाहत उसे सदैव सफलता के शिखर तक ले जाती है। उसी चाहत को कवि अपनी रचनाओ- नम्बर वन आऊंला के मार्फत बालकों में जाग्रत करता है। चेतना को ललकारता है कि वह किसी से कम नहीं है, वह सदा सत्य के मार्ग चलते हुए एक नया इतिहास रचेगा। यही चाहना ही उसे सफलता दिलाती है, सर्वश्रेष्ठ बनाती है।’’
    आरंभ में अपनी बात ‘मेरा दर्द’ शीर्षक से व्यक्त करते हुए कवि पवन पहाड़िया लिखते हैं- “नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे चाहे अंग्रेजी में पढ़े-लिखें या हिंदी में पर घर में अपनी मातृभाषा को काम में लेंवे।” घर-परिवार और समाज में भाषा को संस्कार बनाएं रखने और जाग्रत करने के प्रमुख धेय से ही कवि ने इस संग्रह की 41 कविताएं लिखी है। पुस्तक की पहली कविता वंदना के रूप में करतार से अरदास है तो दूसरी बाल कविता ‘तिंरंगो’ में देश-भक्ति की भावना उजागर होती है। संग्रह में बालकों के आत्मीय और निजी संबंधों यथा मां, बहन आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया है। कवि कविताओं में श्रम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संदेश भी देता है कि पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलना-कूदना भी जीवन में उतना ही आवश्यक और अनिवार्य है। शिक्षा और चरित्र निर्माण की भावना इन कविताओं में प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं।
    संग्रह की अनेक कविताएं प्रेरणादायी है जिनमें बालकों से पानी के महत्त्व और वृक्षारोपण जैसे अनेक मुद्दों पर सीधा संवाद है। कवि मौसम की बात करते हुए गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमों के विविध रंगों को कविताओं में शब्दबद्ध कर अनेक बिंब रखते हुए सुंदर चित्रों को जैसे चित्रित करते हुए बालकों को समोहित करता है। कविताओं में बालकों को प्रिय लागने वाली तितलियों और बिल्लियों की दुनिया के साथ अन्य पशुओं-पक्षियों को भी वर्णित विषय बनाया गया है। इन कविताओं से बालकों में भारतीय त्यौहारों का हर्ष-उल्लास एक झलक के रूप में प्रस्तुत होता है। होली, दीपावली, अक्षय तृतीया और मकर सक्रांति जैसे पर्वों के माध्यम से बालकों को संस्कारित करने का प्रयास भी हुआ है।
    संग्रह की शीर्षक कविता में राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिभावान विद्यार्थियों को ‘लेपटोप’ दिए जाने को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्रेरित करने हेतु एक बाल मन के उद्गार कवि ने लयबद्ध अभिव्यक्त किए हैं। मूल कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘लेपटोप घर में ल्याऊंला / मां म्हैं नंबर वन आऊंला / बैगो दिनगै म्हनै उठाज्यै,/ दांतण करियां पाठ पढ़ाज्यै।’ बच्चों के द्वारा बच्चों को संदेश देना अधिक प्रेरक और प्रभावशाली है।
    बाल साहित्य के लिए कवि पवन पहाड़िया का सक्रिय होना सुखद है पर भाषिक संरचनागत कुछ बातों का भी यहां विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है। बालक जो भाषा सीख रहा है उसके समक्ष भाषा की अनेक चुनौतियां भी होती है। उदाहरण के लिए पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ‘नम्बर’ लिखा गया है जबकि संग्रह में कविता के शीर्षक में ‘नंबर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। पंचमाक्षर का यह रूपभेद समरूपता की मांग यहां रखता है। कविताओं के साथ प्रयुक्त चित्रों को केवल कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ते हुए किसी कलाकार के माध्यम से अधिक मेहनत के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभवाना बनी हुई है। ऐसी कुछ बातों के बावजूद यह संग्रह अपनी सरलता, सहजता, गेयता के कारण मनोहक और प्रभावशाली है। कवि को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और भाषा की गहरी सूझ-बूझ है। उनके छंद-ज्ञान से संग्रह की इन बाल कविताओं को बल मिला है। 

     डॉ. नीरज दइया

08 दिसंबर, 2017

खर, दूषण का भाई प्रदूषण

सच में मैं ड्रामा नहीं कर रहा। मेरी आंखें जल रही है। देखिए जलते जलते लाल हो गई है। मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं पॉल्यूशन मास्क पहन लिया है फिर भी मुझे तकलीफ हो रही है। पूरा शरीर ढक कर रखता हूं सन स्ट्रोक से मुझे खतरा है। सन रेज आजकल कितनी खतरनाक है कि स्किन का सत्यानाश हो जाता है। कुछ लोग समझते हैं यह फैशन है। कुछ भी समझे मेरी बला से, मुझे क्या फर्क पड़ता है। पानी भी साथ लेकर चलता हूं। बाहर का पानी नहीं पी सकते। मिनरल वाटर की कंपनियां भी ऐसी है कि हम कोई भरोसा नहीं कर सकते हैं। सुबह सुबह ही उबाल कर दो-तीन बोलत भर लेता हूं। मजबूरी है कि बाहर निकलना पड़ता है। नहीं तो घर से सेफ जगह भला कौनसी है। बाहर निकलते ही पहला डर तो यही कि कोई किडनेप ना कर ले। गली गली में चोर उच्चके घूमते हैं। किसी का क्या भरोसा कि क्या कुछ कर जाए। बड़ा संभल कर रहना पड़ता है। जनाब यह जिंदगी की खर खर है। जीवन की गाड़ी कभी भी जबाब दे सकती है। इसका कोई भरोसा नहीं। ऐसी जिंदगी से मौत भली यह जिंदगी नहीं है। छोड़ो यह सब, इतनी सावधानियों की जरूरत ही नहीं है। अरे भैया, जिंदगी हंसने-गाने का नाम है।
इन सब स्थितियों को देखते हुए हंसते-गाते हुए हमने भारत को स्वच्छ करने का प्रयास जोर-शोर से आरंभ कर दिया हैं। भगवान श्री राम ने खर और दूषण का वध किया था और हम सब को मिलकर उनके बड़े भाई प्रदूषण का वध जरूर करेंगे। पर हमारे समाने समस्या यह है कि वध कैसे करेंगे? रामजी के पास तो तीर-कमान था, अब आप और हम मिलकर कौनसा तीर चलाएंगे? भला हो सरकार का कि सरकार ने इवन-ओड का चक्कर चलाने का प्रयास किया पर उसमें भी घोचेवाजी और मीन-मेख बहुत हुई हैं। समझते नहीं कि हमारे पूरे देश ही नहीं दुनिया भर में रावण के भैया पधार चुके हैं और स्थिति यह है कि अभी रामजी का अता-पता नहीं है। यह पक्का है कि वे भी जरूर आएंगे। पर फिलहाल उनका इंतजार कर रहे हम क्या करें। हमें भी तो कुछ करना चाहिए कि खाली इंतजार ही करते रहें। दिल्ली में प्रदूषण है इसका सब को पता है और पहले से ही पता था कि हां भाई दिल्ली में प्रदूषण है। पर यह फिरोज़ शाह कोटला स्टेडियम में टेस्ट मैच में श्रीलंकाई खिलाड़ी पॉल्यूशन मास्क पहन अपना मुंह छिपा रहे हैं कि प्रदूषण भैया कहीं हमें देख ना ले। अरे देख भी लेगा तो क्या कर लेगा प्रदूषण। हम सब खड़े हैं ना सीना ताने। यह बेवजह मुद्दे को भड़का रहे हो भैया। लंकाधिपति के देश से पधारे खिलाड़ियों तुम्हें सलाम! जीत-हार तो खेल में होती ही रहती है, पर इतना ड्रामा।
पंच काका कहते हैं कि दिल्ली में रविवार का एयर क्वालिटी इंडेक्स चारों ओर से समंदर के घिरे श्रीलंका में प्रदूषण के स्तर से काफी कम था। पूछना यह है कि भैया यह ड्रामा हार के डर का नतीजा है या फिर सच में खर-दूषण के बड़े भैया प्रदूषण से आपने सांकेतिक घूंघट रखने का नया रिवाज निकाला है।
 नीरज दइया
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06 दिसंबर, 2017

टांय टांय फिस्स / नीरज दइया

   बड़े-बूढ़ों के साथ रहना सच में बहुत बड़ी मुसिबत का काम है। वे बात बात पर हमारी कमियां निकालते रहते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे भगवान ने उनके हाथ में परमानेंट कोई आइना दे दिया हो और वे बात-बात पर हमें आइना दिखाते रहते हैं। हम अपनी असलियत को स्वीकारते हुए सकुचाते हैं। अब देखिए मैं जो कुछ भी जैसा भी लिखता हूं, वह एकदम नया और मौलिक होता है। पंच काका को क्या पड़ी है कि वे कमियां निकालते रहते हैं। हर बार हर रचना पर वे मुझे टोकते हैं! कहते हैं- बात बनी नहीं।
    हमारी किसी बात पर हमें कोई पराया ऐसा-वैसा कहे तो उतना बुरा नहीं लगता, जितना अपना कोई सागा कहे तो लगता है। आप समझ रहे हैं ना, मैं क्या कहना चाहता हूं। पूरा उल्टा हिसाब है, पूरी दुनिया जिसे वाह-वाह करती है वह घर के जोगी जोगना हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि काका की नजर ही कमजोर नहीं हुई साहित्य को समझने की समझ ही कमजोर हो गई है। ऐसा कहने में यदि आपत्ति है तो इसको घुमाकर कहा जा सकता है- काका की साहित्यिक समझ इतनी विकसित हो गई है कि उन्हें अच्छी से अच्छी रचना जमती नहीं।
    अगर मेरी हर रचना का विषय पुराना यानी बासी है तो ताजा कहां से लाना है। माना कि आप बड़े हैं, अनुभवी है और आपको कहने का हक है। जब ऐसा कुछ कहते हो तो इसका इलाज भी तो बताओ। आप जिसे नया और उम्दा मानते हैं उसके बारे में कोई संकेत तो कीजिए। यह क्या हुआ कि मैं हिम्मत रखते हुए फिर-फिर प्रयास करता हूं। यकीन कीजिए मैं दुगने जोश-होश से प्रयास करता हूं। मैं हर बार सोचता हूं अबकी विषय नया और निर्वाहन नया है, काका दाद देंगे पर उनके आगे हमेशा मेरी टांय टांय फिस्स। इस टांय टांय फिस्स से टकरा-टकरा कर मेरे लेखन की गति सुस्ता गई है।
    पंच काका कहते हैं- जीवन की गाड़ी जब तक चल रही है चल रही है, ना जाने किस दिन टांय टांय फिस्स हो जाए। इस जीवन का परम सत्य टांय टांय फिस्स है।
    कोई बात जब नई नई होती है तो अच्छी लगती है। एक ही बात बीस बार सुनते हैं तो बोरियत होने लगती है। काका ने जैसे टांय टांय फिस्स को तकिया कलाम बना लिया है। कोई बात कहो-करो वे कहीं न कहीं से जैसे तैसे इस फिस्स तक पहुंच ही जाते हैं। कबीर दासजी ने कहा था- ‘चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।’ मेरे लिए पहला पाट पंच काका है अर दूसरा टांय टांय फिस्स। लगता है काका और उस तकिया कलाम से जल्दी ही मेरी टांय टांय फिस्स होने वाली है।
    मैंने एक प्रयोग किया। जब काका को मेरे लिखे में खोट ही खोट दिखाई देता है तो उनकी पारखी नजर की परख भी हो जाएगी और हो सकता है कि कोई रास्ता ही मिल जाए। मैं काका के सामने प्रेमचंदजी की कहानी कफन मेरी बना कर ले गया।
    बोला- काका कहानी लिखी है। नाम रखा है- ‘कफन’।
    काका बोले रख दे मैं पढ़ कर बात करूंगा। मैं कहानी छोड़ कर आ गया। काका ने जैसे ही कहानी को पूरा किया तो मुझे आवाज लगाई। मैं गया और मन ही मन डर रहा था कि कहीं यह ना कह दे कि कहानी चुरा कर लाया है। पूरी की पूरी चोरी हुई कहानी देकर मुझे मूर्ख बनाता है। पर नहीं, काका शायद पकड़ नहीं पाए थे। पकड़ने वाले होते तो कहानी का नाम ‘कफन’ सुनते ही उनके दिमाग की बत्ती जलती और प्रेमचंद का नाम क्लिक होता। नए कहानीकारों की बात तो अलग यहां तो बड़े बड़े कहानीकारों को अभी तक लोगों ने पढ़ा नहीं। काकाजी के पढ़ने में जब प्रेमचंद सरीखे रचनाकार का यह हाल है, तो दूसरे रचनाकार की तो बात ही क्या करें!
    काका कहने लगे कि तेरी यह कहानी ठीक से जमी नहीं। मैं मन ही मन बोला- जमी नहीं, अरे इस कहानी से प्रेमचंदजी की दुकान अब तक जमी हुई है और आप कहते हैं कि जमी नहीं। काका ने उलटे सवाल किया- तूने कफन के चंदे से बाप-बेटे को शराब पीते दिखाया सो तो ठीक है पर वे क्या जंगल में रहते थे। यदि नहीं तो गांव में आस-पास या दूर दराज कोई औरतें नहीं थी क्या? एक स्त्री को ऐसे तड़फता दिखाय है। जापे में तो स्त्रियां एक दूसरे का सहयोग करने दूर दूर से चली आती हैं। यह कोई त्वरित घटना तो होती नहीं फिर और ऐसे काम में तो अनजान भी मदद करते हैं। किसी भी घर का दरवाजा बजाने की देर थी उन्हें मदद मिल जाती।
    काका के श्रीमुख से इतनी बातें सुनकर मेरे पैर कच्चे पड़ गए और मेरा खेल टांय टांय फिस्स। मैंने कह दिया- यह कहानी तो प्रेमचंदजी ने लिखी थी। आपको भूलवश मेरी कहानी की जगह उनकी दे दी थी।
    काका ने हंसते हुए कहा- मुझे क्या मूर्ख समझ रखा है। मैं जानता था कि तुम ऐसा करोगे । तुम इतनी महान और बारीक कहानी जिंदगी भर लिखोगे तब भी नहीं लिख सकोगे। लेखकों में फर्क बस इतना ही है कि प्रेमचंद कम गलती करते थे और तुम हो जो गलतियों की खान हो। कहानी या कोई भी रचना हो मुंह बोलनी चाहिए। तुम्हारे यहां तो दो लाइन पढ़ो और जांच करो तो टांय टांय फिस्स। रचना का उठाव अच्छा होना चाहिए। अब देखो यह कहानी प्रेमचंदजी की। इसमें माना कि कुछ छोटी मोटी कमियां है पर उठाव जबरदस्त है। एकदम पठनीय और सधी हुई भाषा। मैं समझता हूं कि इस कहानी में जो कमजोरियां मैंने बताई है वे ही इस कहानी का नयापन है। नया यानी जो जैसा हम नहीं जानते वही तो मौलिक हुआ। कफन से स्त्रियों को प्रेरणा मिलेगी कि ऐसी विकट स्थितियों में वे उनके पास रहे। अरे माना कि धीसू और माधव ने नहीं बुलाया तो क्या यह उनका धर्म नहीं था।
    बे बोल रहे थे और मैं सुन रहा था। ऐसी टांय टांय सुनना सच, बड़ी मुसिबत है! फिस्स....। और कमरा दुर्गंधमय हो गया।
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