20 सितंबर, 2017

घूमाते रहें दिमाग

जार्ज बर्नार्ड शा ने कहा था कि जो अपना दिमाग नहीं बदल सकत वे कुछ भी नहीं बदल सकते। वे बड़े लेखक जरूर थे पर यह नहीं जानते थे कि इस पृथ्वी पर ऐसा समय आएगा जब दिमाग बदलना बाएं हाथ का खेल होगा। वे यह जानते भी होंगे तो उन्होंने निश्चित तौर पर यह तो सोचा नहीं होगा कि इक्कीसवी सदी में दिमाग बदल कर भी कुछ नहीं बदल सकेंगे। चुनाव में हम बहुत बार दिमाग बदलते हैं। फिर पता चलता है कि हम कुछ भी बदल नहीं पाए। अब देखिए ना हमारे कुछ मित्र कहते हैं- अच्छे दिन दिन आ गए। कुछ कहते हैं- नहीं आए। मित्रों के इस मतभेद को हल कौन करेगा?
सरकारी दावा है कि सब कुछ बदल गया है। देश तेजी से विकास कर रहा है। जब सब कुछ बदल गया है तो हमें दिखाई क्यों नहीं देता। क्या बदलाव से हमारे आंखें चुंधिया गई है कि हम कुछ देख नहीं पा रहे। जब हम रेलगाड़ी में बैठते हैं तो खिड़की से बाहर स्थिर पेड़ और जमीन भागती हुई दिखाई देती है। आंखें जो देखती है, मन जिसे महसूस करता है वह गलत कैसे हो सकता है। मरा यह दिमाग इस सत्य को स्वीकार क्यों नहीं करता। आंखों देखे सत्य को जो नकार रहे हैं वे विपक्ष के आदमी हैं। हमने देश को विकास की गाड़ी में रवाना कर दिया है और आप अपना पुराना-बासी दिमाग लिए चल रहे हैं। विकास की गाड़ी द्रुत गति से चला रही है। आप कहते हैं कि नहीं-नहीं कुछ नहीं बदला। आपको बस अपने वाला बदलाव और विकास दिखाई देता है। यह सारासर गलत है कि आप अपने विकास को विकास मानें और हमारे विकास को पप्पू। पप्पू तो अपा है कि सब कुछ आपको स्थिर और गर्त में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।
हमारे माननीय और माननीय इतनी दौड़-भाग कर रहे हैं। उनकी गतिशीलता आपको निर्थक लगती है! अब समझ आ गया है कि आप राष्ट्रविरोधी हैं। सांप्रदायिक हैं। आतंकवादी है। राष्ट्रद्रोही है। ऐसे जितने भी जो कुछ हो सकते हैं, वे सब आप हैं। हम आप के कार्य-व्यवहार और हर बात-बात पर टांग खींचने की आदद से परेशान हो गए हैं। अब एक प्रस्ताव पारित होगा। देश में जिन जिन नागरिकों को बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है उन्हें अनिवार्य रूप से अपने दिमाग के बारे में घोषणा-पत्र देना होगा। आप लिखकर देंगे कि आपने अपने दिमाग को बदला है अथवा अभी बदलना शेष है। यदि बदलना शेष है तो आप कब तक दिमाग बदल लेंगे। आपका खुद का दिमाग देश की प्रगति में बाधा है। आपको इक्कतीस दिसम्बर तक एक अंतिम अवसर दिया जाता है।
पंच काका कहते हैं कि हम सभी के पास दो दिमाग होते हैं। एक लेफ्ट और दूसरा राइट। यह सारा झगड़ा लेफ्ट-साइट का है। लेफ्ट वाला कहता है कि मैं सही हूं और राइट वाला कहता है मैं। दोनों मत एक नहीं है। जरूरत इस बात कि है अब हम सकारात्मक सोचें। स्थिर दिमाग अपनी स्थिरता के कारण अवरूद्ध हो जाता है। दिमाग को स्थिर रखना गलत है। दिमाग को स्थिर अथवा खाली नहीं रखें, उसे घुमाते रहें। आप खुद घूमते रहें और दिमाग भी घूमाते रहें। यही एक कारगर तरीका है जिससे कुछ बदल सकते हैं और कुछ बदला हुआ देख सकते हैं। यह भूल जाएं कि कोई आएगा और आपका दिमाग बदलेगा, यदि बदलाव चाहते हैं तो आपको अपना दिमाग बदलना होगा।
डॉ. नीरज दइया 

18 सितंबर, 2017

सदा असत्य बोलो अधिनियम

डॉ. नीरज दइया
कोई माने ना माने पर देश में असत्य के प्रयोग हो रहे हैं। कहा जाता था- सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला। अब इतने काले मुंह देख लिए कि सभी के चेहरे सफेद हो चुके हैं। काले मुंह वाले भी खुद से अधिक काले मुंह वालों की तरफ अंगुली कर दिखाने लगे हैं। कहते हैं कि हम उनसे तो ठीक है। समझ ने काम करना बंद कर दिया। अब ठीक-गलत सब गड़मड़ है। दाढ़ी-मूछों में बाबा लोग काला मुंह छिपा कर रखते रहे। अब उनकी काली करतूतें कोर्ट से प्रमाणित हो रही है। संदेह है कि इतनी कालिख क्या स्वच्छता अभियान साफ कर पाएगा।
हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं। जो दिलवाले हैं वे ही काले-काले नजर आते हैं। हे ढोंगी बाबाजी! अब सब साफ हो गया है कि आपकी पूरी दाल काली थी। काली दाल खाकर सब कुछ काला हो गया। यहां तक कि गांठ का धन भी काला हो गया। नोटबंदी के बाद काले और सफेद धन में ऐसी कुश्ती हुई कि देश की जनता मूर्ख बनी। अगली-पिछले सारी बातें भूल गए। किसने क्या कहा और कब कहा? हमने जान लिया कि हिसाब रख कर परेशान होने में लाभ नहीं है। आज लाठी आपके पास है तो भैंस आपकी है, कल को अगर यही लाठी हमारे हाथ आ जाएगी तो फिर भैंस भी हमारी ही होगी। दुनिया इसी का नाम है, यहां तो चला चली का खेला है। कभी धूप तो कभी छांव। कहते हैं काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती पर जानता का मन भी अजीब है। वह खुद की तुलना में देश का लाभ अधिक देखती है।
देश को लाभ हो तो जनता को लाभ हो। कहते हैं कि देश में नोटबंदी के बाद करदाताओं की संख्या में विरोधाभास है। जो ऐसा कहते हैं वे देश के विकास को रोकना चाहते हैं। माना यह सच्चाई है- आंकड़ों को अलग-अलग श्रोत, एक जैसा नहीं दे पा रहे हैं। हमें इन चक्करों में उलझना नहीं चाहिए। हमारे लिए बस इतना जानना काफी है कि नए व्यक्तिगत करदाताओं की संख्या में अधिक इज़ाफा हुआ है। अब प्रधानमंत्रीजी ने कितना बताया और वित्तमंत्रीजी ने क्या कहा को छोड़ देना चाहिए। हमें इस बात में सुख की अनुभूति करनी चाहिए कि देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या भारी मात्रा में बढ़ गई है। देखिए अधिक कर आएगा तो विकास भी अधिक होगा। इसमें हमारा लाभ ही लाभ होगा।
पंच काका का सुझाव है- देश को सदा-सदा के लिए आंकड़ों के जाल से मुक्त करने के लिए ‘सदा असत्य बोलो अधिनियम’ बनाया जाना चाहिए। जिसके अंतर्गत सब को यह छूट दी जानी चाहिए कि आगे कहीं किसी प्रसंग में आंकड़ों की बात होगी तो आंकड़ा लिखा ही नहीं जाए। बस उस आंकड़े की जगह डेस-डेस-डेस लिख दिए जाएगा। ये तीन डेस देकर देश की जनता को छूट होगी कि वे अपनी मर्जी से आंकड़ा भरे। यह देश हम सब का है। इसके विकास को हम सब बताएंगे। लोकतंत्र सबका है इसलिए विकास को सभी देखें। यह ठीक रहेगा कि सब अपने-अपने हिसाब से आंकड़े भरें। सारी जिम्मेदारी और जबाबदेही मंत्रियों पर क्यों हो? ऐसा करने से फायदा ही फायदा होगा और कोई किसी को यह नहीं सकेगा कि सर आंकड़ों में फर्क है। अगर इसके बाद भी कोई कहता है तो कह सकते हैं कि भैया तेरे डेस-डेस-डेस में तू अपने हिसाब से सही आंकड़ा भर कर चुप बैठ।
००००

हॉट सीट की हॉट कथा

नुमति है और अनुमति नहीं है के बीच बस एक ओब्लिक रहता है। अधिकारी की मर्जी है कि वह इन दोनों में से किसे चुने। कभी वह खुश कर देता है तो कभी दुखी कर देता है। हरे पेन की इंक बर्बाद करते हुए कुछ अधिकारी एक तरफ टिक लगाते हैं तो दूसरे विकल्प को पूरा काटना नहीं भूलते। माना छुट्टी किसी कर्मचारी का अधिकार नहीं है, फिर इसे आप अधिकार में लेते हुए आपनी इच्छा हो दिया करें। आपका मूड हुआ कि आज फलां कर्मचारी को छुट्टी देनी है, तो उसे पहले ही सूचित कर दिया जाना चाहिए कि आज तुम आराम करो। हो तो यह भी सकता है कि कर्मचारी दफ्तर आए और जैसे ही वह हाजरी रजिस्टर के हाथ लगाने के हो आप उसे कह दें- आज आपको छुट्टी दी जाती है।
हे अफसर देवता! छुट्टी देने अथवा नहीं देने का आपका फैसला सदा सुरक्षित है तो इसमें कर्मचारियों को भी हो-हल्ला नहीं करना चाहिए। यह कैसी लीला है कि अफसर देवता के ऊपर भी कोई दूसरा देवता या सरकार विरजमान है। यह तो जैसे को तैसा वाली बात हो गई। बिदाई संभाषण वाली तीसरी शक्ति अब भी सक्रिय है। सभी छोटे-बड़े सभी कर्मचारियों को अपने से ऊपर के अधिकारियों की अनुमति लेनी होती है। मैं तो अनुमति लेने का इतना आदि और अभ्यस्त हो गया हूं कि लघुशंका भी साहब को पूछ कर करता हूं। वे मना कर देते हैं तो इंतजार करता हूं, थोड़ी देर बाद फिर निवेदन करता हूं- साहब जोर की लगी है, आप का हुकम हो तो फारिग हो आऊं? ऐसे निवेदन पर साहब पसीजते हैं। वे मुस्कान के साथ पूरे दांत दिखाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि सब से बड़ा साहब मैं ही हूं। मेरी भी इच्छा हुई कि कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में हिस्सा लूं, पर साहब ने रोक दिया और मैं रुक गया।
छत्तीसगढ़ का समाचार पढ़ कर मुझे बड़ा सुख मिला कि वहां की एक ट्रेनी डिप्टी कलक्टर अनुराधा अग्रवाल को 'कौन बनेगा करोड़पति' में भाग लेना की अनुमति नहीं है का पत्र देरी से मिला। यह तो अच्छा हुआ वे कार्यक्रम कर चुकी थी। कानून और अफसर दोनों को अंधा रहना चाहिए। संवेदनशीलता जाग्रत होने की जरा भी संभवना नहीं रखनी चाहिए। भले ही अनुराधा जी विकलांग हो और वॉकर के सहारे चलती हो। भले ही वे कार्यक्रम से जीती हुई रक़म से अपने भाई की किडनी का इलाज़ करना चाहती हो। वैसे यह उनके घर का निजी मामला है। और देखिए कार्यक्रम की शूटिंग के एक दिन पहले उनकी मां का निधन हो गया तो यह भी ईश्वर की मर्जी है, इसमें सरकार का कहां कोई दोष है। यह ईश्वर का संकेत था कि तुमको कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं मिलने वाली। पंगा होगा, रुक जाओ पर अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बैठना किसे अच्छा नहीं लगता। आप गई तो देखिए कितनी बातें हो गई ऊपर से लेकर नीचे तक।
पंच काका कहते हैं कि अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बड़े अफसर नहीं बैठ सके तो वे अपने से छोटे अधिकारियों को बैठने का भला अवसर क्यों देने लगे। नेताओं को मुद्दा मिलना चाहिए कि वे किस तरह किस को घेर सकते हैं। वैसे यह भी ठीक है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल होने की अनुमति प्रशासनिक अधिकारियों को बाकायदा अधिसूचना जारी कर दी जाती है और हॉट सीट को इतना हॉट कर दिया जाता है।
० डॉ. नीरज दइया
 

12 सितंबर, 2017

टॉलस्टॉय की टोपी

मैं लेखक हूं पर दिखता नहीं हूं। मुझे देखकर कोई भी लेखक नहीं कहता। देखने में मैं बिल्कुल आम आदमी जैसा हूं। जो भी मुझे से मिलता है यही कहता है कि मैं लेखक जैसा दिखता नहीं हूं। अपनी ऐसी तारीफ सुन-सुन कर कोई कब तक धीरज रखेगा। आखिरकार धीरज को जबाब देना था दे दिया। मुझे महसूस होने लगा कि जब मैं लेखक हूं तो लेखक जैसा दिखाई क्यों नहीं देता हूं। अगर लेखक जैसा दिखाई दूं तो हर्ज ही क्या है? सभी समकालीन लेखक तो लेखक जैसे दिखते हैं फिर मैं आम आदमी जैसा क्यों बना रहूं। वैसे यह गलत भी तो है कि कोई लेखक हो और वह देखने में लेखक जैसा दिखाई ही नहीं दे। इस गलती को मेरे अलावा कौन सुधार सकता है। अब मैं लेखक की तरह दिखना चाहता हूं।
    मुझे खुद के लिए कुछ भी करूंगा। मैं जो हूं वही तो दिखाई देना चाहिए। समस्या यह भी है कि इधर के आलोचक भी मुझे लेखक कम और आम आदमी अधिक मानते हैं। अब आप ही बताएं कि कोई इतने वर्षों से कोई लिख रहा हो और उसे लेखक नहीं माना जाए तो वह क्या करे! यह तो सरासर नाइंसाफी हुई ना। आपको और मुझे ही नहीं वैसे सबको पता है कि सबके अपने-अपने ग्रुप हैं। मैं उनके ग्रुप में नहीं हूं तो मेरा यह हाल है। वैसे मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और अगर पड़ता भी है तो मैं प्रत्यक्ष में यही कहूंगा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं लेखक हूं और किसी आलोचक के कुछ कहने-सुनने से आम आदमी नहीं हो जाऊंगा। ऐसी साहित्य विरोधी घटनाओं और गतिविधियों से आहत होकर मैं लिखना-पढ़ना बंद नहीं कर सकता। मैं तो यहां तक छाती ठोक कर कहता हूं कि कोई पाठक भी अगर मुझे रिजेक्ट करता है तो कर दे मेरी बला से। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे किसी पाठक ने लेखक नहीं बनाया है। फिर यहां यह भी बता दूं जो पाठक मुझे लेखक नहीं मानते हैं, मैं उन्हें पाठक भी नहीं मानता हूं।
    भारतीय लेखकों को देखता हूं तो सब अलग-अलग मिजाज के दिखाई देते हैं। उनमें ऐसी कोई उभयनिष्ठ चीज है ही नहीं कि मैं अपना लूं। अब मेरी दूरदृष्टि का कमाल देखिए। लगभग सारे विदेशी लेखक हेट लगया करते थे और लगते हैं। मैंने भी हेट लगाने की सोच ली। तीन-चार नेहरू टोपी ले तो आया पर बात जमी नहीं। देशी टोपी की यही औकात है कि उन्हें लगाते ही लोग मुझसे पूछने लगे कि क्या अबकी चुनाव में खड़े होने का इरादा है? कहलाना चाहता था लेखक और लोग कहने लगे नेताजी। लेखक को नेताजी कहें तो गाली जैसा लगता है।
    पंच काका की शरण में गया। उनसे सारी कथा कही। उन्होंने संदूक से एक टोपी निकाल कर मुझे देते हुए कहा- इसे पहन कर अब ठाठ से घूम। यह टॉलस्टॉय की टोपी है। कोई पूछे तो नाम बता देना। सबकी बोलती बंद हो जाएगी। फिर उन्होंने काम की बात बताई कि लेखक होने या दिखने से जरूरी है हमारा चिंतन-मनन। ईश्वर ने हम सब को पांच तत्त्वों से बनाया है पर कोई किसी के जैसा नहीं। ऐसी होती है रचना की मौलिकता। शब्द सभी के पास समान हैं पर उनको रचना में अपनी मौलिकता के साथ प्रयुक्त करना आना चाहिए। एक लेखक को अपनी भाषा गढ़नी और कमानी होती है, तभी वह लेखक कहलाता है।

नीरज दइया

10 सितंबर, 2017

बड़े लोगों की बड़ी बातें

   जो आसानी से समझ आ जाए, वह छोटी बात होती है। जो आसानी से समझ नहीं आए, वह बड़ी बात होती है। छोटी बात छोटे लोग करते हैं। बड़ी बात बड़े लोग। छोटे लोगों की छोटी-छोटी बातें करने वाले लेखक छोटे होते हैं और बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लेखक बड़े। बड़ा लेखक और बड़े लोग कभी नहीं चाहते कि वे छोटे लोगों के समझ में आने लायक कोई छोटी बात करें, किंतु छोटे लेखक और छोटे लोग हमेशा इसी अभिलाषा में मरते हैं। वे चाहते हैं कि कुछ बड़ी बात हो जाए, वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में पहुंच जाएं। उनका जीवन भी धन्य हो जाए। पर नहीं होता।
    मैं बहुत चाहता हूं कि कुछ ऐसी बात करूं जो आपके बिल्कुल समझ में नहीं आए। सिर के ऊपर से निकल जाए। आप उसे लेकर पहले तो खूब माथा-पच्ची करें कि कहीं कोई पेंच मिल जाए और बाद में उसे साझा करते हुए अपने दोस्तों को भी परेशान करें कि समझाओ इसका अर्थ। मैं छोटा वाक्य लिखता हूं और आप तक बात पहुंच जाती है। मैं बड़ा वाक्य लिखता हूं तब भी आप अर्थ समझ जाते हैं। मैं करूं क्या? ऐसा कैसे क्या लिखूं कि आप अटक जाएं, भटक जाएं। 
    वैसे गुणी जनों का मानना है कि कोई बड़ी और ना समझ में आने वाली बात हमें छोड़ देनी चाहिए। उसे समझने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। जो बड़े हैं और जो बड़ी बातें है, उन्हें बिना समझे ही बड़ी बात मान कर उन्हें बड़ी बात बने रहने देना चाहिए। ऐसी बड़ी बातें लिखने वाले बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी किताबें बड़े-बड़े प्रकाशक प्रकाशित करते है। वे बिकते हैं। उनका नाम बिकता है। उन्होंने क्या और कैसा लिखा है? इसकी चिंता वे नहीं करते। जो बिकता है उसे समझने-समझाने की जरूरत ही क्या है? वे बाजार की नब्ज पहचानते हैं। उनके जुमले चलते हैं। उन्हें बाजार की गति और लय का पुराना अनुभव होता है। वे अपनी बड़ी बातों के लिए बाजार बनाना जानते हैं। उनके संस्थान और उनसे उपकृत संस्थानों में खेल चलता है। पैसों का खेल है और खेल सारा पैसों के लिए है। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपया।
    बड़े लोग कभी नाक को सीधी पकड़ते हैं और कभी घुमा कर पकड़ते हैं। जब जरूरत होती है अपने नाक-कान सब पकड़ लेते हैं। इनके नाक का कमाल है कि उन्हें पहले से खुशबू आ जाती है कि नाक कटने वाली है। परिस्थियों को देखते हुए वे अपनी नाक लंबी कर लेते हैं और नाक कटा भी लेते हैं। नाक कट चुकने के बाद भी देखने में नाक की लंबाई पहले जितनी ही नजर आती है। वे कहते हैं कि देखो नाक तो सही सलामत है। उनके नाक लंबी करने और कट जाने पर भी सामान्य आकार के रहस्य को हर कोई जान नहीं सकता। यह रहस्य भी उनके अर्थ से परे होता है। अर्थ होता है तो भी दिखाई नहीं देता। उनकी ऐसी महिमा अपरमपार है।
    पंच काका कहते हैं कि बड़े लोग अर्थ लेना जानते हैं, देना जानते ही नहीं! बड़े लोग बड़े पदों पर रहे होते हैं। सबके लिए तीन शब्द शक्तिया होती हैं पर उनके लिए ऐसी चार। यह चौथी शब्द-शक्ति ही है जिसमें वे अर्थ को गायब कर चुके होते हैं। वे जीवन पर्यंत अनेक शक्तियों से तीन-पांच करते इतना निचोड़-निचोड़ कर अर्थ प्राप्त कर चुके होते हैं कि आम भी गायब और गुठलियां भी गायब। यानी अर्थ और रस सफाचट्ट !
० डॉ. नीरज दइया

09 सितंबर, 2017

हम सब बैलों की कथा

हले गायें और भैंसे बोलती नहीं थी। ऐसा नहीं कि पहले उनके मुंह में जुबान नहीं थी। जुबान तो थी पर कोई कानून ऐसा नहीं था कि वे बोलें। सामाजिक चेतना आने से धीरे-धीरे गायें-भैंसें मुख्य धारा में आने लगी। आजकल गायों-भैंसों का जमाना है। ऐसा कोई क्षेत्र बचा ही नहीं है जहां गायों-भैंसों ने एंट्री ना ले ली हो। जहां देखो वहां कोई न कोई गाय-भैंस नजर आ ही जाएगी। अब कहने वाले भले कहते रहें कि कुछ सिरफिरे गधों का ये सब किया धरा है। हो गया सो हो गया, अब क्या किया जाए?
घर के नमक-मिर्च और खाने के चक्कर बेचारा बंधा बैल में रहता है। कोल्हू के बैलों को समय ही नहीं कि वे इस बारे में सोचे। आजाद धूमते सांड भला इस विषय पर ध्यान क्यों देंगे? खुला सांड मंडी में आजादी से घूमता है, कहीं भी कुछ भी खाता है। वह जम कर पीता भी है। जो बहुत तगड़ा है वह दिनोंदिन तगड़ा होता जा रहा है। जो इस रेखा के नीचे हैं उसको तो रोने की आदत है। वह बस रोता रहेगा। वैसे रोने-धोने वाले बैलों के लिए आज खुशी का दिन है। वे बड़े खुश हो रहे है कि केंद्र सरकार ने अदालत में चल रहे 'मैरिटल रेप' के मामले में कह दिया है कि इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। भला हो केंद्र सरकार कि उसने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी- मैरिटल रेप को अपराध मानने से विवाह संस्था अस्थिर हो जाएगी और पतियों को परेशान करने का ये एक नया हथियार मिल जाएगा।
हथियार किसी के पास हो वह काम के समय काम आए, तभी उसकी सार्थकता है। बैलों के पास सींग होते हैं पर वे भला खुले सांड जैसे उनका प्रयोग कहां कर सकते हैं। बैल जब कोल्हू में जोता जाता है तो उसके गले में घंटी बांध दी जाती है। आंखों के आगे गांधारी स्टाइल में पट्टी बांध दी जाती है। बेचारा खोल भी नहीं सकता। कहते हैं कि चूहे बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकते। यहां तो दर्द ही दूसरा कि ऐसे-ऐसे कानून बना दिए गए हैं कि अब बैल चूं भी नहीं कर सकते। गनीमत केंद्र सरकार ने इस बार तो बचा लिया। कितने भले दिन थे जब मनोज कुमार ने अपनी फिल्म में सुनहरे दिन दिखाए थे। बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं, गम कोसों दूर हो जाता है, खुशियों के कमल मुस्काते हैं। हाय री किस्मत, आज खुशियों के कमल ने बचा लिया। पर कहां गई खुशियां!
गायों और भैंसों से पीड़ित-प्रताड़ित बैलों ने अनेक संघ हैं। एक स्वर में वे गाते हैं- जाने कहाँ गये वे दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछाएंगे। कुछ मजाक-मस्ती करते हैं। दुखी आत्माओं का यही तो सुख है कि थोड़ी मजाक-मस्ती से जी बहला लेते हैं। चूहा ने सारी विस्की पी कर एक बार बोला- कहाँ है बिल्ली। और फिर क्या था दुम दबा के बिल्ली भागी। उस दिन भले बिल्ली भागी हो पर आज तक किसी चूहे की फूटी किस्मत नहीं जागी। कोल्हू में बंधना एक रिस्की खेल होता है। इस बार बेड़ा पार हो गया, पर हलाल करने वाली तलवार अब भी लटक रही है।
पंच काका का कहना है कि इस युग का एक ही यथार्थ है- हैंडल विथ केयर। जिसकी लाठी उसकी भैंस भूल जाओ, अब तो जिसकी भैंस उसी की लाठी। जरा संभल कर काम लो इनसे। काका ने मुझे कहा कि मैं अपना उपनाम ‘चंडीदास’ रख लूं! 


डॉ. नीरज दइया

01 सितंबर, 2017

भोग और उपभोग में दर्शन

 डॉ. नीरज दइया
    जीवन बड़ा अनमोल है। बार बार नहीं मिलता। ना जाने कितने-कितने जन्म लगते हैं। कितने-कितने पुण्य करने पड़ते हैं। फिर कहीं जाकर यह जीवन मिलता है। मनुष्य जीवन पूरी पुण्य-प्रक्रिया का प्रसाद है। योगी और भोगी दोनों मानते हैं- मनुष्य योनी बार बार नहीं मिलनी। मिली है तो भोग लो भैया! नहीं तो मन की मन में रह जानी है। मनुष्य की यही अवस्था श्रेष्ठ है।     इससे भी जरूरी और असली बात- कल किसने देखा? जो भी है बस यही इक पल है। किसी पल में जैसा-कैसा प्यार मिले, ग्रहण कर लेना चाहिए। पल चला जाता है फिर गाना गाते रहो- पल भल के लिए कोई हमें प्यार करले, झूठा ही सही। गाने-बजाने से कुछ नहीं होता।
    जीवन में सब कुछ करना पड़ता है। आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। भारतीय के पास तो जहां देखो दार्शनिकता भरी पड़ी है। वस उसे सच्चाई के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए अपाने सुना होगा- कल हो ना हो। यह कोई नई और ताजा बात नहीं। इस नाम से फिल्म भी बनी पर कबीर ने तो वर्षों पहले लिखा छोड़ा था- काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। यह गूढ़ रहस्य जान लेना चाहिए कि कवि सदा सच लिखते हैं और सच के सिवाय कुछ नहीं लिखते हैं। या फिर ऐसे समझ लें कि वे जो भी लिखते हैं, सच हो जाता है। जैसे कवि प्रदीप ने लिखा था- राम के भक्त रहीम के बंदे, रचते आज फ़रेब के फंदे। कितने ये मक्कर ये अंधे, देख लिये इनके भी धंधे। इन्हीं की काली करतूतों से बना ये मुल्क मशान। देखिए मिल गया ना सूत्र।
    सूत्र यह है कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें भोग को सीधे-सीधे ग्रहण करना खतरनाक है। भोग तो राम और रहीम सभी करते हैं। जो भोग बचा रहता है उसे उपभोग उनके चेले-चेलियां करते हैं। सच्चाई तो यह भी है कि भोग पर पुण्य का आवरण अनिवार्य है। ऐसा कौन मूर्ख है जो यह नहीं मानता कि मनुष्य योनी भोग और उपभोग का समुच्चय है। यह बात अलग है कि बहुत बार भोग और उपभोग की श्रेणियां इतनी घुल-मिल जाती है कि उन्हें पृथक-पृथक नहीं कर सकते हैं। नेमी-धर्मी और ज्ञानी आदमी इन चक्करों में नहीं उलझता। वह तो वह ग्रहण करता है। कभी भोग को उपभोग बनाकर और कभी उपभोग को भोग बनाकर।
    पंच काका कहते हैं- जिंदगी चार दिन की है। रोज-रोज की किच-किच किस काम की। जीवन ठाठ भोग और उपभोग में है। बिना ठाठ-बाट के लोग आदमी को आदमी समझते नहीं। अनुभव की बात बता रहा हूं- कभी कभी तो आदमी भी खुद को आदमी नहीं समझता। यह कोई दर्शन नहीं हकीकत है- कभी कभी तो घर में घरवाली तक अपने आदमी को भेड़िया की संज्ञा दे डालती है। अगर घरवाली ऐसा कहेगी तो आदमी अपनी औकात पर आ जाता है। वह उसे कुतिया जैसे घटिया शब्द से विभूषित करता है, बदले में आदमी भेडिये से कुत्ते की श्रेणी में आ जाता है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि उन दोनों की यह दर्शनिकता है कि वे अलगा-पिछला सब कुछ देख लेते हैं। इतनी योनियां पार करते हुए अब मनुष्य जीवन मिला है तो क्या हुआ, कभी कुत्ते-कुतिया और भेडियों के संग रहे हैं। ऐसे में इस जीवन में उनके कुछ लक्षण तो अटके-भटके आ ही गए होंगे। तभी तो ऐसा है।

30 अगस्त, 2017

शाश्वत जीवन और छलांग

    कुछ चीजें जो हम पाना चाहते हैं, वे  कैसे मिल सकती है? कहते हैं कुछ चीजें सोचने से मिलती हैं। जो पाना है उसके बारे में सोचते रहो और वे एक दिन मिल जाएंगी। सोचने की अवधि के बारे में कुछ विवरण नहीं है। यह उस चीज और आपके सोचने की क्षमता पर निर्भर है। यह बड़ी गहरी बात है। एक दूसरी बात कि कुछ चीजों को पाने के लिए बिना सोचे-समझे छलांग लगानी पड़ती है। अगर आप कुछ चीज को पाने के लिए छलांग लगाते हैं और आपके हाथ-पैर या कुछ भी टूट-फूट होती है तो जिम्मेदार मैं नहीं हूं। यह ज्ञान मेरा नहीं है। यह गहन चिंतन-मनन भगवान ओशो का है। वे तो यहां तक कह गए हैं कि जिस किसी ने कहा होगा कि कोई भी छलांग लगाने के पहले हजार बार सोचना चाहिए, कहने वाला कोई कायर या कमजोर रहा होगा। बकौल ओशो- छलांग पहले लगा लो, सोचना कभी भी। शाश्वत जीवन पड़ा है, जब दिल आए सोच लेना, मगर छलांग तो लगा लो। ठीक बात है बाद में अस्पताल या घर में पड़े-पड़े आराम से सोचा जा सकता है। वैसे जेल सोचने के लिए बेहद उपयुक्त जगह है। जेल में सोचने और सोचने के अनेक प्रमाण हम अनेक कृतियों के रूप में गिना सकते हैं, जो जेल में लिखी गई हैं। 
    बिना सोचे और कम सोचे छलांग लगाने वालों में युवा पीढ़ी बड़ों को भी पीछे छोड़ चुकी है। खेल खेल में वे छलांग लगा कर मौत को गले लगा लेते हैं। कभी प्रेमी छलांग लगाता है कभी प्रेमिका। कभी खुशी में छलांग लगाई जाती है तो कभी गम में। कभी मिलन में छलांग का दृश्य आता है और कभी विरह में। छलांग के बारे में इसलिए ओशो ने कहा कि सोचना नहीं है। पीछे घरवालों के बारे में अपने परिवार और मित्रों के बारे में बिल्कुल सोचने नहीं है। क्यों कि सोचने वाला छलांग लगा ही नहीं सकता। कहते हैं कि जितनी चादर है उतने पैर फैलाओ की बातें ऐसे लोगों पर लागू नहीं होती है। उनका मानना है कि पैर लंबे हैं तो क्या काट लें? हम तो खुल कर और जी भर के पैर फैलाएंगे। कर्ज लेकर चादर को लंबा-चौड़ा करेंगे, और बाद में छलांग लगाएंगे। ऐसी छलांग में देश से भाग जाने वालों के अनुपम उदाहरण हम जानते हैं। नीति और धर्म की बातें बताने वाले ही जब अलमस्त हो कर छलांगें लागने में व्यक्त है तो फिर रोकने वाला है कौन? समझाने वाला ही मूर्खताएं करें तो फिर किसे दोष ? 
    देश में ओशो को मानने वाले बहुत है। धर्मगुरु और बाबाओं ने भी ओशो के इस चिंतन पर ममन किया और कई छलांग लगा चुके हैं, कुछ तैयारी में है। बिना सोचे-समझे छलांग लगा कर सफलता हासिल करने का सुख तो उन्हें मिला ही किंतु बाद में जो कुछ हुआ और जो कुछ हो रहा है वह बस नसीब की बातें है। पहुंचे हुए धर्मगुरु, साधु, संन्यासी जो कहते हैं करते हैं उनमें इतनी गूढ़ता होती है कि सामान्य व्यक्ति के समझने की बात होती ही नहीं। वे ईश्वर की भांति इस संसार में लीला करने आते हैं और कुछ की लीला गुप्त रहती है कुछ की जगजाहिर हो जाती है। बापू आशाराम से राम-रहीम की यात्रा में यही हुआ कि आम आदमी हैरान हो गया। सामान्य आदमी की तो औकात ही क्या, इस खेल को तो विशिष्ट आदमी भी देखते रह गए।
    पंच काका कहते हैं कि यह होना स्वभाविक था, क्योंकि छलांग शब्द को गंभीरता से देखें। इसमें अनेक ध्वनियां और अर्थ छुपे हैं। छलांग में जो ‘लांग’ है वह धोती की लांग का संकेत हैं। छ वर्ण असल में छह की ध्बनि देता है। वे तो यहां तक मानते हैं कि छलांग में मूल शब्द ‘छल’ है और उसमें ‘अंग’ जोड़ कर छलांग बना है। छल और अंग की व्याख्या ऐसे संतों ने अपने अपने ढंग से की है। 
     ० नीरज दइया

25 अगस्त, 2017

मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना

डॉ. नीरज दइया
यह संयोग है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ का जन्म 27 मार्च, 1960 को विश्व रंगमंच दिवस के दिन हुआ। यह भी संयोग है कि विद्यासागर आचार्य के आंगन में हुआ जिन्होंने नाटक के लिए अपने दोनों बेटों को समर्पित कर दिया। संभवत: इसी कारण और अपनी लगन के बल पर मधु आचार्य ने नाटक, रंगमंच, पत्रकारिता और साहित्य में ऐसा मुकाम हासिल किया, जिस पर देश और दुनिया की नजर है। कवि-कथाकार मित्र राजेन्द्र जोशी के शब्दों में कहें तो मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना और बीकानेर जैसे शहर में होना, अपने आप में बहुत मायने रखता है। बीकानेर एक ऐसा शहर है जिसमें रचनात्मकता के ऐसे बीज हैं जो अपना पर्यावरण खुद निर्मित कर लेते हैं। यहां कला, साहित्य और संस्कृ ति की एक अखूट परंपरा रही है जो निरंतर प्रवाहशील होते हुए मधु आचार्य तक पहुंचती है। नाटक और साहिय के संस्कार अगर घर में मिल जाए तो किसी के कला माध्यम में कुछ खास करने की संभावनाएं बढ़ जाती है। आनंद वी. आचार्य और मधु आचार्य ‘आशावादी’ इसके प्रमाण हैं कि जिन्होंने अपने पिता की थाती को धरोहर की तरह न केवल संभाला, बल्कि उसे विकसित भी किया। मधु आचार्य के साथ एक संयोग चेतना आचार्य से विवाह के साथ जुड़ा। इसे संयोग इसलिए कह जाएगा कि पिता के साथ ससुर भी साहित्यिक परंपरा से जुड़े होने से पूरी पारिवारिक पृष्ठभूमि मधु आचार्य के साथ जुड़ती है और दूर तक चलती है। बीकानेर के जनकवि बुलाकी दास ‘बावरा’ ने अपने समय में मंचीय कवि के रूप में धूम मचा रखी थी। उनका आशीर्वाद आचार्य के साहित्यिक-संस्कारों को द्विगुणित करने वाला कहा जा सकता है।
बाल्यकाल से ही मधु आचार्य का अनेक विख्यात नामों के साथ पारिवारिक जुड़ाव रहा। शिक्षा और साहित्य के वातावरण में पले-बढ़े छात्र मधु ने जीवन में अनेक मुकाम पार करते हुए, राजनीति विज्ञान से एम. ए. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा ग्रहण की। अध्ययन के दौरान गुरु-मार्गदर्शक के रूप में भवानी शंकर शर्मा का सान्निध्य मिला। विभिन्न मंचों पर अनेक नाटकों में कलाकार और निर्देशक की भूमिकाओं का सफल निर्वाह करने वाले मधु आचार्य ने कभी किसी काम से गुरेज नहीं किया। उनके संस्कार ही ऐसे थे कि स्टेज पर और जीवन में भी किसी भी काम को कभी छोटा-बड़ा नहीं समझा। वर्षों तक नाटक के लिए कुछ भी करने और करवाने का जुनून-जिद पालते रहे। इसी यात्रा में आपने 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। साहित्य सृजक के रूप में वर्ष 1990 से जुड़ाव हुआ। तब से अब तक विविध विधाओं मंन निरंतर लिख-पढ़ रहे हैं। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध-कार्य भी किया है।
साहित्य-लेखन की यात्रा का आगाज राजस्थानी नाटक ‘अंतस उजास’ (1995) से हुआ। यह एक प्रयोग था कि किसी जन कवि की कविताओं को नाटक में प्रयुक्त किया जाए। मंच पर लोक-रंग को बिखेरने वाला यह नाटक जितनी बार मंचित हुआ सफल रहा। बाद में यह नाटक राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी, बीकानेर की पांडुलिपि प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित हुआ। पत्रकारिता से जुड़े मधु आचार्य ‘आशावादी’ के दैनिक राष्ट्रदूत से दैनिक भास्कर तक की यात्रा के अनेक मुकाम और पड़ाव हैं। रंगकर्मी-नाटककार और पत्रकार के रूप में अपना लौहा मनवा चुके आशावादी ने साहित्य में ‘गवाड़’ के माध्यम से जैसे दूसरी पारी का श्रीगणेश किया। इस बार साहित्य-प्रांगण में एक के बाद एक और कभी एकसाथ अनेक पुस्तकें और विधाओं में अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत करते गए, जो अब भी जारी है। विशाल अनुभव लिए मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने साहित्यिक दुनिया को नवीन आभा देने का प्रेरणास्पद आगाज बीकानेर में किया है। प्रकाशन के बाद भव्य लोकार्पण अपनी पूरी टीम के साथ मिलकर करने में वर्तमान समय और समाज में साहित्य की गरिमामय पुनस्र्थापना का लक्ष्य अंतर्निहित है।
अब तक राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें हैं- ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’, ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (उपन्यास); ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’, ‘हेत रो हेलो’ (कहानी-संग्रह); ‘अमर उडीक’, ‘अेक पग आभै मांय’ (कविता-संग्रह)। आपने शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए ‘सबद साख’ (विविधा) पुस्तक का संपादन भी किया है। हिन्दी में भी विविध विधाओं में 26 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं। यथा- ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’, ‘दलाल’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’, ‘चिड़िया मुंडेर पर’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’, ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’, ‘गुमान में खड़ा आकाश’, मौन में उसे देखना' (कविता-संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह) ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’, ‘खुद लिखें अपनी कहानी’, ‘सुनना, गुनना और चुनना’ (बाल साहित्य)।
बीकानेर में मधु आचार्य का होना एक संयोग है और मेरा उनकी इस साहित्यिक यात्रा को करीब से देखना भी संयोग है। साहित्य में पुरस्कारों के विषय में मानते हैं कि पुरस्कार संयोग होते हैं। मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने लेखन में पुरस्कारों के स्थान पर सतत लेखन को महत्त्व दिया है। संयोग है राजस्थानी उपन्यास ‘गवाड़’ पर उन्हें जहां राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’ अर्पित किया गया और इसी कृ ति पर वर्ष 2015 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी अर्पित किया गया है।
अन्य पुरस्कार और सम्मान है- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर से ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्रकारिता पुरस्कार’, सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से ‘तैस्सितोरी अवार्ड’ एवं नगर विकास न्यास द्वारा भी पुरस्कृ त-सम्मानित। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के आप उपाध्यक्ष रहे तथा साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय सहभागिता है। आपकी अनेक रचनाओं के विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं और विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य भी हुआ है। प्रतिदिन लिखना-पढऩा केवल अनिवार्य मानते ही नहीं वरन मधु आचार्य ‘आशावादी’ प्रतिदिन करणीनगर स्थिति अपने निजी आवास में इतना पढ़ते-लिखते हैं कि लोगों को आश्चर्य होता है। इतना ही नहीं इस लिखने-पढऩे के बीच अपने मित्रों और परिजनों से मिलने जुलने के साथ ही जन-जन के चहेते मधु आचार्य अपनी व्यस्तताओं के बीच नित्य समय-प्रबंधन ऐसा करते हैं कि वे सभी जगह मौजूद मिलते हैं। आचार्यों के चौक स्थित अपने पैतृक आवास कलकत्तिया भवन में रहते हैं। नित्य बेहद सरल, सीधे मिलनसार आत्मीय मधु आचार्य अपने पत्रकारिता, साहित्यिक व्यक्तित्व के बिना किसी आवरण पाटों पर बैठे हथाई करते मिलते हैं। अपने सभी रूपों को विस्मृत कर वे संजीदा इंसान के रूप में मिलते हैं। कला माध्यम से जुड़े अथवा शीर्ष पर पहुंचे व्यक्ति का जीवन में एक योग्य इंसान होना ही उसका असल है। अपनी रचनाओं के माध्यम से निर्माण के नवीन विचार एक अच्छा इंसान ही बेहतर दे सकता है।
======
मधु आचार्य का प्रकाशित साहित्य
• 1995 अतंस उजास (नाटक)
• 2012 ‘गवाड़’ (राजस्थानी उपन्यास)
• 2013 ‘हे मनु!’ (उपन्यास), ‘चेहरे से परे’ (कविता संग्रह) ‘सबद साख’ (संपादन)
• 2014 ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इंसानों की मंडी’ (उपन्यास), ‘अवधूत’, (राजस्थानी उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’(कहानी संग्रह), ‘उग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’ (कविता संग्रह), ‘रास्ते हैं, चले तो सही’ (प्रेरक निबंध)
• 2015 ‘@24 घंटे’ (उपन्यास), ‘आडा-तिरछा लोग’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘सुन पगली’, (कहानी संग्रह), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं है जिंदगी’ (कविता संग्रह) ‘अमर उडीक’ (राजस्थानी कविता संग्रह)
• 2016 ‘अपने हिस्से का रिश्ता’(उपन्यास), ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’ (कहानी संग्रह), ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’ (कविता संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’ (बाल उपन्यास) ‘खुद लिखें अपनी कहानी’(बाल कथाएं) ‘सुनना, गुनना और चुनना’(बाल कविताएं)
• 2017 ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘हेत रो हेलो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘एक पग आभै मांय’ (राजस्थानी कविता संग्रह) दलाल (उपन्यास) मुंडेर पर चिड़िया (कहानी संग्रह) गुमान में खड़ा आकाश, मौन में उसे देखना (कविता संग्रह)
======================




बुलाकी शर्मा की सृजन में आलोचना-दृष्टि से प्रवेश

हिन्दी साहित्य का यह सबसे बड़ा और कटु सत्य है कि यहां विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों द्वारा शोध, आलोचकों द्वारा की रचना की बजाय नाम को महत्त्व अधिक दिया जाता है, कमोबेश यह भेड़चाल है जिसका खामियाज़ा हर अच्छे लिखनेवाले को भुगतना पड़ता है और अच्छा-सराहनीय लिखने के बावज़ूद वह हाशिए पर, अचर्चित और गुमनाम-सा ही रह जाता है। राजस्थान के लेखकों के साथ ये दुर्घटनाएं सबसे अधिक हुयीं हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह कि खुद यहां के बड़े- बड़े तथाकथित नामधारी, आलोचना में चर्चित आलोचको ने यहां के शब्दकारों की बजाए उन दिल्ली, भोपाली लेखकों के लेखन पर ज्यादा काम किया जो उन्हें अधिक से अधिक प्रोजेक्ट लाभ, नाम- इकराम, किसी न किसी अकादमी, संस्था, फाउंडेशन में फिट करा सकते थे। इस दिशा में यह सुखद लगता है कि बीकानेर के राजस्थानी-हिन्दी में समान अधिकार से लिखनेवाले युवा कवि, आलोचक डा. नीरज दइया ने इस ओर ध्यान दिया और उनकी दो किताबें बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार व मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर से आयी हैं। अभी मैं “बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार” से गुजर रहा हूं चूंकि मैं बुलाकी शर्मा, उनके लेखन से व्यक्तिश: जुड़ा हूं, उनकी सृजन-यात्रा के के हर पड़ाव का न केवल साक्षी रहा हूं अपितु उन्हें निकटता से जानने का दावा तो नहीं करता लेकिन अवसर जरूर मिलता रहा है और मुझे इस बात का संतोष और खुशी है कि डा. नीरज दइया मुझ से भी कहीं गहरे बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व को जानने में सफल हुए हैं।
बुलाकी शर्मा शब्द-जगत में बीकानेर की ऐसी शख्सियत है जिस पर हर शहर ऐसी शख्सियत के अपने शहर में होने का गर्व कर सकता है एक ऐसा समन्वयवादी दोस्त- दुश्मन सभी से मधुरभाषी, व्यवहार-कुशल व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में एक शब्द ’अजात शत्रु’ बिज्जी ने सही ही कहा था। चालीस बरसों से राजस्थानी- हिन्दी में व्यंग्य- कथा साहित्य में निर्बाध रूप से निरंतर उनकी कलम चल रही है। राजस्थानी- हिन्दी दोनों ही भाषाओं में अकादमी सम्मान के अलावा उन्हें कई सम्मान से भी अधिक लेखकों-पाठकों के बीच गहरी पहचान उनकी कलम की बदौलत हासिल है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व देखते हुए सहज ऐसी अपेक्षा और आवश्यकता बेमानी नहीं है कि उनके रचनाकर्म पर विस्तार से आलोचनात्मक आलेख, बातचीत, बहस और मूल्यांकन आदि हो।
एक ऐसा समय जब जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति आत्ममुग्धता में जी रहा है, कला- साहित्य में तो यह चरम पर है। सब एक-दूसरे की टांग खींचने में जुटे हैं, कौन मित्र-शत्रु है, कौन शत्रु-मित्र, पहचान मुश्किल है, हर कार्य-करम किसी न किसी स्वार्थ, हित में निहित हो चुका हो, ऐसे में किसी के व्यक्तित्व, सृजन का सम्यक मूल्यांकन का विचार ही आश्चर्यजनक लगता है, पर जैसा कि नीरज दइया को जाननेवाले जानते हैं, वे ऐसे आश्चर्यजनक शुभ करते रहते हैं, उन्हंत ऐसे सभी शुभ के लिए साधुवाद।
बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार कृति में डा. नीरज दइया ने अथ श्रीबजरंग बली की डायरी, धूमिल होते समय के एलबम के पन्ने, अफलातून की धूम, अजात शत्रु की काया- माया, लिखा तो ठीक ही है, बात एक कालजयी कहानी की, नवीन कथा शैली में सम्बन्धों के ग्राफ, सुनने- सुनाने और पढ़ने- पढ़ाने की कहानियां, राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई, खुद घायल होने का हौंसला और हुनर, चेखव की बन्दूक यानी बीएस फिफ्टी वन, वरिष्ठ व्यंग्यकार की श्रेणी में, सदा स्मरणीय बाल साहित्यकार, नाटककार, अनुवादक और सम्पादक के रूप में, बुलाकी शर्मा से सृजन-संवाद और अंत में बुलाकी शर्मा की सृजन- यात्रा जैसे आकर्षक शीर्षकों से बुलाकी शर्मा के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को एक मंच पर सामने लाने का जो सद्प्रयास किया है, उस में वे सफल रहे हैं। पुस्तक के अंत में बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व की परतें खोलनेवाला साक्षात्कार दिया गया है जो महत्त्वपूर्ण हैं, जिस में इस किताब को तैयार करते समय उनके लेखन और व्यक्तित्व के बारे में उपजी हमारी कुछ शंकाओं से सम्बन्धित सवालों के लेखक द्वारा दिए गए माकूल जबाब, कुछ और प्रश्नो की राह खोलते हैं, हो सकता है उन प्रश्नों के उत्तर लेखक आगे कभी दें। एक प्रश्न बहुभाषाओं में लिखनेवाले लेखक अपनी रचनाओं को दोनों भाषाओं की किताबों में रखते हैं , उन रचनाओं की मौलिकता के बारे में हैं, वह किस भाषा में मौलिक है, का उत्तर जो उन्होंने दिया है, से तो मैं भी सहमत नहीं। मेरा मानना है यह रचना के प्रति अतिरिक्त मोह के अलावा कुछ नहीं हैं जो वह उसी एक रचना को लेखक अपने लेखन की हर भाषा में देखना-दिखाना चाहता है।
सुन्दर आवरण के लिए प्रख्यात चित्रकार-कवि कुंवर रवीन्द्र एवं सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर के डॉ. प्रशांत बिस्सा बधाई के पात्र हैं।
- नवनीत पाण्डे
(लेखक वरिष्ठ कवि-कथाकार है)
==============================
पुस्तक : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) / लेखक : डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन, मंदिर, बीकानेर ; पृष्ठ-88 ; संस्करण 2017 ; मूल्य-200/-
==============================




24 अगस्त, 2017

आकंठ आत्मीयता में डूबे कवि सुधीर सक्सेना

डॉ. नीरज दइया
       असल में बड़ा आदमी वह होता है जिसके साथ हमें या किसी को भी आपनी लघुता का अहसास नहीं होता। इस विचार के आलोक में सुधीर सक्सेना बड़े आदमी हैं। मेरे शब्दों पर उनके परिचित और मित्र मोहर लगाएंगे कि उनके साथ जब कभी साथ होने का अवसर आता है, हमें हमेशा यही अहसास रहता है कि जैसे कोई अपना सगा-संबंधी आत्मीय जन हमारे साथ है। इस आत्मीयता के आस्वाद में वे भूले से भी कभी कहीं किसी भी क्षण ऐसा कुछ नहीं छोड़ते कि जिस पर कोई संदेह या शक किया जा सके। चंद मुलाकातों और थोड़े से संवाद में वे धीरे-धीरे हर दूरी को पाटने की क्षमता रखते हैं।
    मैंने सुधीर सक्सेना को बड़ा आदमी इसलिए कहा है कि वे संबंधों में ऐसे समानता और समव्यस्कता के घरातल पर पहुंच जाते हैं, जहां छोटे-बड़े का अहसास लुप्त हो जाता है। जाहिर है कि यह अनायास यूं ही नहीं होता, ऐसा अहसास बहुत कम बड़े रचनाकारों के साथ हम पाते हैं। उनकी सहजता हमारी धरोहर है। यह मेरा अनुभव है कि वे नए और युवा रचनाकारों से बतियाते हुए अक्सर उम्र के ढलान से जैसे लुढ़ते हुए समानता के धरातल पर बिना कोई अहसास कराए खुद को उतार लेते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे हमसे बतियाते हुए हमारे पंख लगा देते हैं और हमें उड़ते हुए अपने तक पहुंचने में सक्षम बना देते हैं। उनका यह ऐसा हुनर है कि हर किसी की पकड़ में नहीं आता। वे कहीं ऐसा कोई संदेह या शक होने से पहले ही उसे पाट देते हैं। कोई स्थान रिक्त नहीं छोड़ते कि जहां कोई सूराख हो सके, और हम ऐसे किसी रहस्य तक पहुंच सकें।
    यह अंधेरे में तीर छोड़ा ऐसा एक तीर है जो सीधा निशाने पर जा कर लगा है। इसके प्रमाण एक-एक कर मैं जाहिर करता हूं। पहले-पहल तो सुधीर सक्सेना अपनी किताबों में उम्र का हवाला दिया करते थे, लेकिन काफी समय से यह सिलसिला बंद है। शायद उन्हें लगने लगा होगा कि उम्र का हवाला नहीं देने से ‘काल को भी नहीं पता’ चलेगा कि वे समय के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं। हां, यह भी हो सकता है कि वे वर्तमान से भविष्य की तरफ दौड़ते समय में कुछ रफ़तार का अहसास कम करने की फिराक़ में हैं। वे स्मृतियों और अतीत में अधिक से अधिक बने रहने की संभावनाएं तलाशते हैं। साफ शब्दों में कहा जाए तो उन्हें रचनात्मकता के तौर पर अतीत, संभावना और बदलते समय के रंग अधिक पसंद हैं।  
आकंठ आत्मीयता में डूबे कवि सुधीर सक्सेना न केवल आत्मीयता से लबरेज गहरे इंसान है, वरन उन्हें एक दिव्यात्मा कहना अधिक उपर्युक्त होगा। दिव्यात्मा इसलिए कि उनकी आत्मीयता हर छोटे-बड़े के साथ समानता का एक आदर्श भाव लिए हुए है। इंसान जब मसीनों में तब्दील हो गए हैं, तब ऐसे समय में ऐसा क्यों हैं? यह बदला हुआ समय और सब कुछ बदलते जाने का अहसास कराने वाला समय है। ऐसे कुहासे के समय में सुधीर सक्सेना अक्सर हमें लडाते हुए, किसी स्मृति में सहलाते हुए, चुपचाप अपनी कविताओं में सतत रूप से ऐसा मर्म अपने विविध पाठों में उद्घाटित करते हैं कि हमसे मिलने वाले हर इंसान हमारी आत्मीयता का ऐसा ही अहसास कर सके। क्या इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि सुधीर सक्सेना ऐसा क्या करते हैं कि वे हम सब को अपने घनिष्ट, निजी, अंतरंग और आत्मीय लगते हैं।
    मैं सुधीर जी से न केवल उम्र के लिहाज से वरन रचनात्मकता के हिसाब से मैं खुद को उनके पीछे-पीछे दौड़ते हुए पाता हूं। यह दौड़ना इसलिए भी जरूरी है कि वे आचार-विचार और व्यवहार से इतना उत्साह, आत्मीयता और जोश से भर देते हैं कि मुझे लगने लगने लगता है मुझे भी सुधीर सक्सेना जैसे आकंठ आत्मीयता में डूब जाना चाहिए। वे अपने समय से इतना समय निकाल लेते हैं कि नए रचनाकारों से सम्मान और स्नेह से भरपूर उनका संवाद होता है।
    यह सम्मान और स्नेह ही है कि मैं अतीत में उस जगह पहुंच गया हूं, जहां सुधीर सक्सेना से मेरी पहली मुलाकात सूरतगढ़ में हुई थी। यह संयोग बना कि वे हमारे मित्र रविदत्त मोहता के यहां मेहमान बन कर आए थे। आकाशवाणी सूरतगढ़ में मोहता के सहकर्मी उद्घोषक एवं कवि-गीतकार राजेश चढ्ढा व अन्य स्थानीय रचनाकारों के आग्रह से एक संवाद-कार्यक्रम रखा गया, असल में यह हमारी पहली मुलाकात का एक बहाना बना। मिलकर लगा जैसे कोई पहचान थी, बस हमारा मिलना ही बाकी था।
    सूरतगढ़ जैसे छोटे कस्बे में भले सुधीर सक्सेना के पाठक अधिक नहीं हो, किंतु कविता कोश पर चस्पा उनकी कविताएं हम सब मित्रों के लिए उनके कवि को पहचानने-परखने की पहली सीढ़ी कही जाएगी। जिस दिन राजेश चढ्ढा ने मुझे फोन पर इस कार्यक्रम का आमंत्रण दिया, संयोग से मेरे मित्र नंदकिशोर सोमानी साथ थे। मुझे याद आता है कि उनके पूछने पर मैंने उन्हें कहा था कि कुछ कविताएं और आलेख सुधीर सक्सेना के पढ़े हुए हैं, पर सुधीर सक्सेना तो दो हैं। पता नहीं ये कौनसे वाले आएं है।
    सुधीर सक्सेना ‘सुधि’ और सुधीर सक्सेना के बारे में उसी दिन एक बार नए सिरे से अंतरजाल पर गूगल से खोज-खबर ली। राजेश चढ्ढ़ा से बात कर यह भी पक्का कर लिया कि आने वाले ‘सुधि’ नहीं हैं, पर मित्र ऐसे हैं कि हम सभी की ‘सुधी’ बराबर लेते-देते रहेंगे। और यही हुआ, पहली ही मुलाकात में हम मित्रों ने जान लिया कि साहित्यकार सुधीर सक्सेना का व्यक्तित्व चुम्बकीय है। उन्होंने मेरे साथ वहां के सभी साथी रचनाकारों और सुधि पाठकों को पहली नजर में आकर्षित किया। फेंचकट दाड़ी और चश्मा पहने जो कवि मेरे सामने आया, वह किसी कहानी के नायक से कम नहीं था। जब बतियाना आरंभ किया तो जैसे उनका जादू पूरे सभागार में बढ़-चढ़ कर बोलने लगा। लंबे अंतराल के बाद सूरतगढ़ में किसी को सुनना और मिलना हमें महत्त्वपूर्ण लगा था।
    ये लगभग पांच वर्षों से अधिक पुरानी बातें हैं। उन्होंने उस दिन कुछ कविताएं और अपनी यात्राओं की स्मृतियां साझा करते हुए व्याख्यान दिया था। कविता में स्मृतियों और ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़े कुछ अहसास और शब्दों की अनुगूंज अब भी किसी संगीत की भांति भीतर कहीं दफन है, किंतु वे शब्द अब पकड़ में नहीं आते। जैसे स्मरण में उस दिन के संवाद का पूरा ब्यौरा कहीं खो गया। किंतु उनके संवाद में स्थानीयता और राजस्थान के विषय में जानने की उत्कंठा और अद्भुद लालसा का स्मरण मैं भूला नहीं हूं। वे जिस तन्मयता के साथ कुरेद-कुरेद कर सवाल-दर-सवाल करते हुए हमारी बातों को ध्यान-मगन हो कर सुन रहे थे, और उसी समय स्मृति में किसी फिल्म की भांति कैद भी होते जा रहे थे। वह स्मृति अब वैसी नहीं है, इन विगत कुछ दृश्यों में आवाजें नहीं रहीं। रील चल भी नहीं रही, बस एक चित्र पर अटकी हुई है। सुधीर सक्सेना का उस समय में होना और हम सब से मिलना। तब से अब तक सुधीन सक्सेना स्नेहिल बने रहे हैं, इसे ऐसे भी कहा जाना चाहिए कि मेरे प्रति उनके स्नेह में निरंतर इजाफा हो रहा है।
    जिक्र ‘दुनिया इन दिनों’ पत्रिका का भी आया था। साथ ही यह भी कि दिल्ली-भोपाल के विषय में सुना कि सरकारी विज्ञापनों के बल पर बहुत पत्रिकाएं निकल रही हैं। सुधीर जी ने हम मित्रों के आग्रह का मान रखते हुए एक बंडल बना कर पत्रिका के कुछ अंक भिजवाए। ‘दुनिया इन दिनों’ के वे विशेषांक फिल्म जगत के कलाकारों पर बेहद मेहनत से तैयार किए गए थे। वे अंक बेहद आकर्षक और प्रभावशाली लगे। मेरी राय आज भी यही है कि प्रधान संपादक सुधीर सक्सेना की मेहनत के बल पर ‘दुनिया इन दिनों’ पाक्षिक पत्रिका सदा मित्रों को सम्मोहित करने वाली बनी रहेगी।
    इस बीच एक लंबा अंतराल गुजर गया। कभी-कभार दुआ सलाम हो जाती। मैं बिना काम हाय-हेलो करने वाला नहीं हूं किंतु दोस्तों-दुश्मनों की याद बराबर बनी रहती है। बहुत अच्छा हुआ कि फेसबुक पर एक बार फिर सुधीर सक्सेना से मित्रता और संवाद का सिलसिला बना। मेरे हिंदी कविता-संग्रह ‘उचटी हुई नींद’ की समीक्षा ‘दुनिया इन दिनों’ में प्रकाशित कर उन्होंने मुझे उपकृत किया। ऐसा इसलिए कि राजस्थानी भाषा में तो पत्र-पत्रिकाएं बेहद कम है और जब हिंदी कविता-संग्रह आया तो जिन बहुत-सी पत्र-पत्रिकाओं का दंभ हिंदी ओढ़े है, उन में से काफी को समीक्षार्थ पुस्तकें भिजवाने पर भी निराशा हाथ लगी।
    सुधीर सक्सेना का आभार इसलिए भी कि ‘दुनिया इन दिनों’ के आगे के अंकों में उन्होंने मुझे सक्रियता से जोड़े रखा। जब मैंने चयनित राजस्थानी कवियों की कविताओं के प्रकाशन का सुझाव दिया तो उसे न केवल सहर्ष स्वीकार किया वरन मेरी मातृभाषा के कई कवियों को किसी स्तंभ की भांति पत्रिका में लगातार सुंदर साज-सज्जा के साथ स्थान दिया। 
    फोन और इंटरनेट संवाद के लंबे सिलसिले के बाद एक बार फिर उन से रू-ब-रू होने का संयोग बना। दैनिक भास्कर बीकानेर संस्करण के मुख्य-संपादक मधु आचार्य ‘आशावादी’ और उनके बड़े भाई आनंद वि. आचार्य की पुस्तकों के लोकार्पण के कार्यक्रम की रूपरेखा जब मित्र बना रहे थे, तब बहार से बुलाए जाने वाले मुख्य अतिथियों के प्रस्तावित नामों में एक नाम सुधीर सक्सेना का भी था। जिसे आयोजन से जुड़ी मित्र मंडली द्वारा सर्वसहमति से स्वीकार किया। बीकानेर के लेखकों में मधु आचार्य ‘आशावादी’ की सक्रियता जान कर सुधीर सक्सेना बहुत प्रसन्न हुए।
    लोकार्पित होने वाली पुस्तकें उनको ई-मेल पर उपलब्ध करवाने के बाद हमारी चर्चा का लंबा सिलसिला चला। राजस्थानी और बीकानेर सुधीर सक्सेना के लिए आकर्षकण का केंद्र इसलिए भी रहा है कि उनके पूर्वज यहीं के थे, और अब भी उनके अनेक सगे-संबंधियों के निवास राजस्थान में हैं। जिन दिन सुधीर जी को दिल्ली से बीकानेर आना था उसी दिन भास्कर के धीरेंद्र आचार्य ने दूरभाष पर उनसे लंबी चर्चा कर एक शानदार साक्षत्कार तैयार किया जो आगले दिन भास्कर में प्रकाशित हुआ। मेरे आग्रह पर सुधीर जी ने अपनी तीन-चार कविताओं को राजस्थानी में अनूदित करने की अनुमति दी। यह संयोग बनाया गया कि जिस दिन वे बीकानेर में रहें, उसी दिन ‘दैनिक युगपक्ष’ में उनकी हिंदी कविताओं के राजस्थानी अनुवाद उनके सम्मान में प्रकाशित हो सकें।
    रेल्वे स्टेशन पर बहुत आत्मीयता से सुधीर जी का मिलना और वहां से होटल तक के छोटे से सफर में बेहद आत्मीयता भरी बातें, मेरी निजी धरोहर है। मधु आचार्य ‘आशावादी’ के हर लोकार्पण-कार्यक्रम की भांति यह कार्यक्रम भी टाउन हॉल में भव्यता के साथ हुआ। खूब साहित्य-प्रेमी जुटे। बहुत कम समय में सुधीर सक्सेना ने अपनी लिखित टिप्पणी तैयार कर की थी। उस दिन साहित्य, समाज और कविताओं पर उनकी सारगर्भित टिप्पणी सभी को प्रभावित करने वाली लगी। मैं नहीं भूला हूं कि टाउन हॉल में कार्यक्रम के बाद वे भोज का जितना रस ले रहे थे, उससे कहीं अधिक उनकों रस मित्रों से बातों करने में आ रहा था। वे इतनी आत्मीयता के साथ मधुर संवाद में खोए रहे कि किसी को यह अहसास नहीं होने दिया कि वे दिल्ली से आएं हैं और सफर के साथ दिन भर की थकवट हमारे इस मेहमान ने पूरे दिन भूलाए रखी। ऐसा लगा कि यह मेहमान मेजबान जैसा है।
    मैं जितना सुधीर सक्सेना को याद करता हूं उतना भीतर डूबता जाता हूं। असंख्य यादों में सुधीर जी के साथ मेरी और मित्र हरीश बी. शर्मा की देशनोक-यात्रा भी शामिल है, तो उनका बीकानेर की हवेलियों को देखने का चाव भी अविस्मरणीय है। इसी प्रसंग में उनका एकांत क्षणों में साथ बैठने का आग्रह और मुझे ‘सूफी संत’ की उपमा से विभूषित करना। ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो मेरे भीतर रोमांच भर देते हैं।
    ‘दुनिया इन दिनों’ में प्रकाशन का क्रम और हमारी चर्चाएं निर्बाध गति से चलती रही। इसी बीच इस बार उनकी तरफ से सूचना मिली कि वे जल्द ही बीकानेर आ रहे हैं। पता चला एक लोकार्पण-कार्यक्रम में वे और ज्योतिष जोशी आने वाले हैं। सुधीर जी अक्सर चर्चा में पूछते रहते हैं- और इन दिनों क्या चल रहा है? मैं इस सवाल को लेखन से जोड़ते हुए अपनी गतिविधियों के बारे में बताता हूं और वे अपने बारे में।
    एक दिन जब मैंने उन्हें बताया कि मैं नंदकिशोर आचार्य की चयनित कविताओं की एक कविता पूरी कर चुका हूं, तब उन्होंने कहा कि वे बीकानेर आएंगे तब उस किताब को देखना चाहेंगे। उनकी इस चाहना में एक दूसरी किताब का हमारा स्वपन छिपा था। योजना बनी कि सुधीर सक्सेना की चयनित कविताओं की एक किताब राजस्थानी में आए। उनका सुझाव था कि अनुवाद के साथ मूल कविताओं का पाठ भी साथ में प्रकाशित होना चाहिए। 
    उनके उपलब्ध संग्रह में पढ़ता रहा और बिना कवि-आग्रह के मैं कविताएं चयनित करने लगा। मैं चाहता था कि उनकी सभी कविताएं और सारे संग्रह पढ़ सकूं। जो उपलब्ध नहीं थे, वे उन्होंने मेरे लगातार आग्रह पर पीडीएफ फाइल के रूप में उपलब्ध करवाए। अच्छा तो यह रहता कि वे खुद अपनी प्रतिनिधि कविताएं अनुवाद के लिए चयनित कर देते, पर उन्होंने ऐसा नहीं करते हुए मुझ पर विश्वास बनाए रखा और मुझे निरंतर प्रोत्साहित करते रहे। उनकी कविताओं का मैं ऐसा भिखारी बन गया कि जहां कहीं कोई सुराग मिलता, मैं पीछा करने लगता। कहीं ऐसा नहीं हो कि उनकी कोई कविता मेरी आंखों के आगे आने से रह जाए। कुछ भी छोड़ना मुझे गवारा नहीं था।
    कविता-पाठ करते उनका एक चित्र इसी खोज-खबर के बीच हाथ लगा और मैंने पाया कि उनके हाथ के नीचे डायरी और किताब जैसा कुछ है। मैंने फोटो डाउनलोड कर उसे एनलार्ज कर उत्सुकतावश देखा तो समझ में आया कि संभवतः एक किताब अब भी मुझे दूर है। मैंने उसी दिन आग्रह किया और अपने पिछले आग्रहों के इतिहास को याद करते हुए नए संग्रह की सोफ्ट कॉपी भेजने का अनुनय किया। बाद में सुधीर जी ने इसे मेरी ‘बनिक-वृति’ की संज्ञा देते हुए, मुझे अपने उस उपहार से विभूषित किया था।      
    इस बीच साहित्य अकादेमी का राजस्थानी भाषा के लिए पुरस्कार मधु आचार्य ‘आशावादी’ के उपन्यास ‘गवाड़’ को मिलना और ‘दुनिया इन दिनों’ के लिए बेहद उत्साह और आत्मीयता से उपन्यास-अंश के अनुवाद का आग्रह मिलना, जैसी अनेक बातें हैं लिखने को। अंत में मैं अपनी डायरी-अंश अथवा कहूं कुछ पंक्तियां सुधीर सक्सेना के काव्य-संग्रहों पर नोट्स के रूप में प्रस्तुत करते हुए ‘जय हिंद’ कहना चाहता हूं। 

कविता संग्रहों पर कुछ तरतीब और बेतरतीब बातें

कविता संग्रह ‘ईश्वर हां, नहीं.... तो’ का नाम ही बेजोड़-अद्वितीय है। मुझे ज्ञात नहीं कि हिंदी कविता के इतिहास में ऐसा नामकरण विन्यास किसी कवि ने अपने कविता संग्रह के में किया होगा। उस परमपिता और शक्ति को लेकर इन कविताओं में किसी संत कवि-सी दार्शनिकता है, तो साथ ही इतिहास के विराट रूप को दृष्टि में रखते हुए असमंजस, संशय, द्वंद्व और विरोधाभास जैसे अनेक घटक हमें अद्वितीय अनुभव और विस्तार देते हैं। इस संग्रह की लगभग सभी कविताएं कवि के दो तरफा आत्म-संवाद से जुड़ी हैं। यहां विशेष उल्लेखनीय यह है कि जो ईश्वर से अपरिमित दूरी है अथवा होना न होना जिस संशय-द्वंद्व में है, उसके अस्थित्व को कवि ने आशा और विश्वास से भाषा में अभिव्यंजित किया है।
००००
‘किरच-किरच यकीन’ सुधीर सक्सेना का नई कविता को समृद्ध करने वाला कविता-संकलन है। छोटी और मध्यम आकार की इन कविताओं में कम शब्दों में कवि ने अपने काव्य-कौशल एवं शिल्प के बल पर जैसे प्रभावशाली कविताओं को सहजता से रचने का हुनर पा लिया है। 
००००
‘काल को भी नहीं पता’ संग्रह सुधीर सक्सेना के कवि की कीर्ति को अभिवृद्धि करते हुए अलगा पड़ाव है। यहां कवि की चिर परिचित भाषा और कहन को हम पहचान सकते हैं। इस संग्रह से हमें पुखता अहसास होता है कि यह कवि सामान्य नहीं वरन विशेष है, जो हिंदी कविता में प्रयोग और अपने अद्वितीय विचार-बल पर कविता की ऊंचाई पर ले जाने वाला कहा जाएगा। तूतनखामेन के लिए तीस कविताओं की रचना करना यानी खुद को एक समय से दूसरे समय में ले जाकर, वहीं लंबे समय तक ठहर जाना है। बिना ठहराव के यहां जो अनुभूतियां शब्दों के रूपांतरित होकर हमारे सामने है, वे कदापि संभव नहीं थी। ये कविता कोरा ऐतिहासिक ज्ञान अथवा विमर्श नहीं, वरन कवि के वर्तमान से अतीत को छूने की चाह में उस बिंदु तक पहुंच जाना है जहां कोई कवि काल को विजित करता है।  
००००
संग्रह ‘रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी’ में प्रेम में पगी मोहक कविताएं हैं। यहां कवि का सांसारिक और प्रकृतिक-प्रेम एक ऐसे विन्यास में समायोजित है कि कविताएं विराट को व्यंजित करती हुई, बेहद निजता को भी अनेकार्थों में जुड़ती हुई भीतर समाहित करती है। 
००००
लंबी कविता ‘धूसर में बिलासपुर’ संभवतः किसी शहर पर अपने ढंग की अद्भुद विराट कविता है। यहां एक ऐसा बिलासपुर है जिस की छाया में हमें अपना अपना बिलासपुर दिखता है। बदलाव की आंधी में आधुनिक समय के साथ बदलते इतिहास और एक शहर का यह दस्तावेज एक आईना है।
००००
मेरे विचार से समग्र आधुनिक भारतीय कविता में कविता संग्रह ‘किताबें दीवार नहीं होतीं’ रेखांकित किए जाने योग्य है। इस संग्रह में कवि सुधीर सक्सेना ने अपने आत्मीय मित्रों और परिवारिक जनों पर जो कविताएं लिखी हैं, वे असल में अनकी आत्मानुभूतियां और हमारा जीवन हैं। इस कविता संग्रह को हिंदी कविता में कवि के व्यक्तिगत जीवन के विशेष काल-खंडों और आत्मीय क्षणों का काव्यात्मक-रूपांतरण कर सहेजने-संवारने का अनुपन उदाहण कहा जाएगा।
००००
लंबी कविता ‘बीसवीं सदी इक्कीसवीं सदी’ बेहद उत्सुकता के साथ समय में झांकने का रचनात्मक प्रयास है। यहां समय के बदलाव को देखने-समझने का विन्रम प्रयास निसंदेह रेखांकित किए जाने योग्य है। कवि का मानना है कि समय तो एक समय के बाद अपनी सीमा-रेखा को लांध कर, अंकों के बदलाव के साथ दूसरे में रूपांतरित हो जाता है। किंतु उस बदलाव के साथ बदलने वाले सभी घटकों का बदलाब क्या सच में होता है? या यह एक कृतिम और आभाषित स्थित है? इस भ्रम में खोये हम हैं। और कविता के अंत तक पहुंचते पहुंचते स्वयं प्रश्न-मुद्रा में समय के बदलाव को नियति की विडंबना मान कर चुप रहने की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं। 
००००
‘समरकंद में बाबर’ अपनी सहजता, संप्रेषणीयता, सृजनात्मकता और विषयगत विविधता के कारण एक संग्रहणीय कविता-संग्रह है। इस संग्रह में उनकी लंबी कविता ‘बीसवीं सदी इक्कीसवीं सदी’ भी संकलित है। सुधीर सक्सेना की सभी कविता-संग्रह एक साथ देखते हैं तो कुछ कविताएं अभनिष्ठ है। संभवतः ये ऐसी कुछ कविताएं है जो उन्हें प्रिय रही हैं, अथवा उन्हें लगता है कि इनका पूरा मूल्यांकन नहीं हुआ है।
००००
‘कुछ भी नहीं अंतिम’ की विविध कविताओं और इससे पहले के संग्रहों में संकलित कविताओं में कुछ शब्दों के प्रयोग को लेकर मुझे लगता है कि सुधीर सक्सेना जैसे कवि हमारे भाषा-ज्ञान का विस्तार करते हैं। कुछ ऐसे शब्द हैं जो एक पाठक और रचनाकार के रूप में सुधीर सक्सेना को पढ़ते हुए मैंने सीखें हैं। कविता के प्रवाह और आवेग में कहीं कोई ऐसा शब्द अटक जाता है कि हम उस शब्द का पीछा करते हैं। हम शब्दकोश तक पहुंचते हैं और लोक में उसे तलाशते हैं। संग्रह की कविताओं के पाठ को फिर-फिर पढ़ने का उपक्रम असल में हमारा कविता में डूबना है। बहुत गहरे उतरना है। जहां हम पाते हैं कि एक ऐसा दृश्य है जो हमारी आंखों के सामने होते हुए भी अब तक हमसे अदृश्य रहा है। सुधीर सक्सेना की कविताएं हमें हमारे चिरपरिचित संसार में बहुत कम परिचित अथवा कहें समाहित अदृश्य संसार को दृश्य की सीमा में प्रस्तुत करती है। सच तो यह है कि ‘कुछ भी नहीं अंतिम’ संग्रह में गहन संभवनाएं हैं। यहां उनकी काव्य-यात्रा के परिभाषित-अपरिभाषित अनेक संकेत देखे जाने शेष हैं।
००००
    सुधीर सक्सेना के मोह और प्रेम में मैं डूबा हुआ हूं, भविष्य में उनकी कविता-यात्रा पर विस्तार से लिखने की अभिलाषा है।
डॉ. नीरज दइया
----------------------------
युग सहचर - सुधीर सक्सेना / संपादक : प्रद्युमन कुमार सिंह / लोकोदय प्रकाशन, 65/44, शंकरपुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ- 226001 दूरभाष : 7897201523 / संस्करण : 2017 / मूल्य : 160/- /पृष्ठ : 160
----------------------------

21 अगस्त, 2017

दो बाल-कविताएं ० नीरज दइया

खाऊंगा

आलू नहीं खाऊंगा
मटर नहीं खाऊंगा
खाना ही है मुझको
तो रसगुल्ला खाऊंगा।

मिर्ची नहीं खाऊंगा
बेंगन नहीं खाऊंगा
खाना ही है मुझको
तो मालपुआ खाऊंगा।

केला नहीं खाऊंगा
आम नहीं खाऊंगा
खाना ही है मुझको
तो ब्रेड-फकोड़ा खाऊंगा।
००

भुजिया का स्कूल
बीकानेरी भुजिया
कैसे नबंर वन आता
कोई जरा समझा दो...

दादाजी लाते-
दो नबंर भुजिया

दादीजी मंगवती-
तीन नंबर भुजिया

ऐसे कितने-कितने
होते भुजिया के नंबर

ठीक पढ़ते नहीं भुजिया
अपने स्कूल में
तभी तो पाते है-
इतने कम नंबर।
००

16 अगस्त, 2017

111 कविताएँ कवि : सुधीर सक्सेना

पुस्तक समीक्षा /  डॉ. नीरज दइया
    हिंदी कविता में विगत चार दशकों से सक्रिय कवि सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘111 कविताएं’ उनके सात पूर्व प्रकाशित कविता-संग्रहों- ‘कुछ भी नहीं अंतिम’, ‘समरकन्द में बाबर’, ‘रात जब चन्द्रमा बजाता है बाँसुरी’, ‘किताबें दीवार नहीं होती’, ‘किरच किरच यकीन’, ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ एवं ‘धूसर में बिलासपुर’ से चयनित कविताएं है। संग्रह में इन सात कविता-संकलनओं से चयनित कविताएं कवि के इंद्रधनुषी सफर को प्रस्तुत करती हैं, वहीं इन सात रंगों में अनेक रंगों और वर्णों की आभा भी सुसज्जित नजर आती है। कहना होगा कि एक लेखक-कवि और संपादक के रूप में सुधीर सक्सेना की रचनाशीलता के अनेक आयाम हैं। वे किसी एक शहर अथवा आजीविका से बंधकर नहीं रहे, साथ ही वे विविध विधाओं में सामान्य और औसत लेखन से अलग सदैव कुछ अलग और विशिष्ट करने के प्रयास में आरंभ से ही कुछ ऐसा करते रहे हैं कि उनकी सक्रिय उपस्थिति को रेखांकित किया गया है। उनका कविता-संसार एक रेखीय अथवा सरल रेखीय संसार नहीं है कि जिसमें बंधी-बंधाई और किसी एक लीक पर चलने वाली कविताएं हो। जाहिर है यह चयन और संकलन उनकी इसी विविधता और बहुवर्णी काव्य-सरोकारों को जानने-समझने का मजीद अहमद द्वारा किया गया एक उपक्रम है। सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा के विषय में संपादक के कथन- ‘उनकी कविओं की शक्ति, सुन्दरता के आयामों की विविधता ही कवि को समकालीन हिंदी कविता की अग्रिम पंक्त में ला खड़ा करती है।’ से निसंदेह पाठकों और आलोचकों की सहमति पुस्तक के माध्यम से भी होती है।
    पुस्तक के आरंभ में कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालती सुधी आलोचक ओम भारती की विस्तृत एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है। साथ ही वरिष्ट कवि-आलोचक नरेन्द्र मोहन का कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-साधना पर एक पत्र पुस्तक में ‘मंतव्य’ के अंतर्गत दिया गया है। इससे यह पुस्तक शोधार्थियों और सुधी पाठकों के लिए विशेष महत्त्व की हो गई है। कविता-यात्रा के विविध पड़ावों पर यह गंभीर अध्ययन-मनन कविताओं के विविध उद्धरणों के माध्यम से नवीन दृष्टि और दिशा देने वाले हैं। इन आलेखों में जहां कवि के साथ अंतरंग-प्रसंगों को साझा किया गया है वहीं समकालीन कविता और सुधीर सक्सेना की कविता को लेकर विमर्श में हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना का योगदान भी रेखांकित हुआ है। संग्रह में संकलित कविताओं में जहां कवि के काव्य-विकास और संभावनाओं की बानगी है, वहीं उनके सधे-तीखे तेवर और निजता में अद्वितीय अभिव्यंजना का लोक भी उद्घाटित हुआ हैं। इसी को संकेत करते ओम भारती लिखते हैं- ‘सुधीर की कविता बरसों का रियाज, सधे-सुरों और सहज आलाप समेटती पुरयकीन कविता है। इसमें व्यंजना का रचाव है,तो लक्ष्णा का ठाठ भी है।’
    संकलित कविताएं वर्तमान जीवन के यथार्थ-बोध के साथ कुछ ऐसे अनुभवों और अनुभूतियों का उपवन है जिसमें हम उनकी विविध पक्षों के प्रति सकारात्मकता, सार्थकता और आगे बढ़ने-बढ़ाने की अनेक संभवनाएं देख सकते हैं। कविताओं में कवि की निजता और अंतरंगता में प्रवाह है तो साथ ही पाठक को उसके स्तर तक पहुंच कर संवेदित करने का कौशल भी है। वे कविताओं के माध्यम से जैसे एक संवाद साधते हैं। कविताओं में कवि की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति से अधिक उल्लेखनीय उनकी सहजता, सरलता और सादगी में अभिव्यंजित होती विचारधारा है। जिसके रहते वे विषय और उसके प्रस्तुतीकरण के प्रति सजग-सचेत और हर बार नई भंगिमाओं की तलाश में उत्सुकता जगाते हुए अपने पाठकों को हर बार आकर्पित करते हैं। ‘कुछ भी नहीं अंतिम’ संग्रह के नाम को सार्थक करता यह संकलन अपनी यात्रा में बहुत बार हमें अहसास करता है कि सच में कवि के लिए कविता का कोई प्रारूप अंतिम और रूढ़ नहीं है। ‘समरकंद में बाबर’ के प्रकाशन के साथ ही हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना को बहुत गंभीरता से लिया जाने लगा। वे जब ईश्वर के विषय में फैले अथवा बने हुए संशयों को कविता में वाणी देते हैं तो अपने अंतःकरण के निर्माण में अपने इष्ट मित्रों और साथियों की स्मृतियों-अनुभूतियों को भी खोल कर रखते हैं। ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ और ‘किताबें दीवार नहीं होती’ जैसे संग्रहों की कविताएं सुधीर सक्सेना को हिंदी समकालीन कविता के दूसरे हस्ताक्षरों से न केवल पृथ्क करती है वरन यह उनके अद्वितीय होने का प्रमाण भी है। प्रेम कविताएं हो अथवा निजता के प्रसंगों की कविताएं सभी में उनकी अपनी दृष्टि की अद्वितीयता प्रभावशाली कही जा सकती है। ये कविताएं कवि के विशद अध्ययन-मनन और चिंतन की कविताएं हैं जिन में विषयों की विविधता के साथ ऐसे विषयों को छूने का प्रयास भी है जिन पर बहुत कम लिखा गया है। कवि को विश्वास है- ‘वह सुख/ हम नहीं तो हमारी सततियां/ तलाश ही लेंगी एक न एक दिन/ इसी दुनिया में।’ वे अपनी दुनिया में इस संभावना के साथ आगे बढ़ते हैं।
    ‘धूसर में बिलासपुर’ लंबी कविता इसका प्रमाण है कि किसी शहर को उसके ऐतिहासिक सत्यों और अपनी अनुभूतियों के द्वारा सजीव करना सुधीर सक्सेना के कवि का अतिरिक्त काव्य-कौशल है। कविता की अंतिम पंक्तियां है- ‘किसे पता था/ कि ऐसा भी वक्त आयेगा/ बिलासपुर के भाग्य में/ कि सब कुछ धूसर हो जायेगा/ और इसी में तलाशेगा/ श्वेत-श्याम गोलार्द्धों से गुजरता बिलासपुर/ अपनी नयी पहचान।’ अस्तु कहा जा सकता है कि जिस नई पहचान को संकेतित यह कविता है वैसी ही हिंदी कविता यात्रा की नई पहचान के एक मुकम्मल कवि के रूप में सुधीर सक्सेना को पहचाना जा सकता है।
    अच्छा होता कि इस संकलन में संग्रहों और कविताओं के साथ उनका रचनाकाल भी उल्लेखित कर दिया जाता जिससे हिंदी कविता के समानांतर सज्जित इन कविता यात्रा को काल सापेक्ष भी देखने-परखने का मार्ग सुलभ हो सकता था। साथ ही यहां यह भी अपेक्षा संपादक से की जा सकती है कि वे अपना और कवि का एक संवाद इस पुस्तक में देते अथवा कवि सुधीर सक्सेना से उनका आत्मकथ्य इस पुस्तक में शामिल करते। इन सब के बाद भी यह एक महत्त्वपूर्ण और उपयोग कविता संचयन कहा जाएगा। सुंदर सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति से कविताओं का प्रभाव द्विगुणित हुआ है।
------------------------------------
111 कविताएँ / कवि : सुधीर सक्सेना चयन एवं संपादन : मजीद अहमद प्रकाशक- लोकमित्र, 1/6588, पूर्व रोहतास नगर, शाहदरा, दिल्ली पृष्ठ : 224 मूल्य : 395/- संस्करण : 2016  
------------------------------------

11 अगस्त, 2017

असत्य के प्रयोग

    बापू की आत्मकथा का नाम है। सत्य के प्रयोग। उन्होंने बताया जो मैं पहले से जानता था, पर नई बात यह थी कि वे किताब लिख रहे हैं- असत्य के प्रयोग। केवल किताब ही नहीं लिख रहे, उन्होंने कहा कि वे प्रयोग भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि सत्य से भला क्या प्रयोग करना? जो सत्य है, वह तो सत्य है। प्रयोग का विषय तो असत्य है। अब जमाना सत्य का नहीं, केवल और केवल असत्य का ही जमाना है। अब तो झूठों का बोलबाला और सच्चे का मुंह काला वाली अनेक बातें और स्थितियां हमारे समाने हैं। वे महाश्य मुंह खोल कर खड़े थे और बीच-बीच में बोल रहे थे- मुझसे मुंह मत खुलवाओ, आपको सबको पता है कि कहां क्या-क्या हो रहा है। मैंने उन्हें टोका- मुझे कुछ भी नहीं पता कि कहां क्या-क्या हो रहा है?
    उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा- अखबार नहीं पढ़ते हो या समाचार नहीं सुनते हो। छोड़िए इन दोनों को, क्या चौक में नहीं बैठते हो। आस-पास की गप्प-गोष्ठी का आनंद तो लेते ही हो। फिर भी भोले बनते हो। क्या आप भी मेरी तरह असत्य का कोई प्रयोग मुझ पर करने लग गए हो? देखिए, यह आपका विषय नहीं है। मैंने इसे खोजा है और इस पर मुझे काम करने दो। मेरी किताब छप जाए फिर देखना सबकी आंखें खुल जाएगी। मुझे फिर उनको टोकना पड़ा- जनाब आंखें तो सभी की खुली हुई है।
    वे तनिक गुस्से से बोले- आप सब कुछ समझकर भी नादान बनते हैं, उसका कोई क्या कर सकता है! आंखें तो खुली हुई है, पर फिर भी खुली हुई नहीं है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमारा आदर्श वाक्य है- सत्यमेव जयते। जानते हैं ना? मैंने गर्दन स्वीकृति में हिलाई तो वे बोले- मेरी किताब पढ़ने के बाद वही वाक्य नए रूप में दिखाई देने लग जाएगा। आज सत्य की जीत कहां हो रही है। झूठ बेचा जा रहा है, खरीदा जा रहा है। चारों तरफ झूठे लोग भरे पड़े हैं। जिसे देखो- झूठ बोलते हैं और सरासर झूठ बोलते हैं। सफेद झूठ को रंग-बिरंगे लुभावने रंगों में सजा कर पेश किया जा रहा है। नहीं समझें? मैं विज्ञापनों की बात कर रहा हूं। वस्तुओं की कीमत की बात कर रहा हूं। दो रुपये के माल को बीस रुपये में बेचने वाले एम.आर.पी. के नाम पर भोली भाली जनता को ठग रहे हैं।
    मैंने बीच में पूछना मुनासिब समझा कि असत्य के प्रयोग किताब में क्या इन्हीं सब बातों पर प्रवचन मिलेंगे? वे हंसने लगे और बोले- आप भी ना कितने भोले हैं। देखिए मैं प्रयोग कर रहा हूं। किताब लिखने की बात कर रहा हूं और अगर किताब लिख दी तो फिर यह असत्य, कैसे असत्य रहेगा? बात को समझा करो, मैं सच में असत्य के प्रयोग कर रहा हूं। मैंने उन्हें प्रणाम कर बस इतना ही कहा- धन्य हैं आप। धन्य है आपकी धरा और धन्य जननी। जैसे उन्हें मेरे इसी धन्य का इंतजार था। वे मुडे और चल दिए।
    मैं उन्हें मंथर गति से जाते हुए देख रहा था कि पंच काका आ पहुंचे, बोले- ये पागल क्यों आया था। इसकी ज्यादा मत सुना करो। सबके पास ऊल-जलूल बातें करता फिरता है। यह अच्छा किया इसे घर में नहीं बैठाया। इसके घरवाले भी इससे परेशान है। इस से होता कुछ नहीं, इसे करना कुछ नहीं। बस फालतू बातें करता रहता हैं। इसका काम लोगों के दिमाग खराब करना है।
० नीरज दइया 
 

31 जुलाई, 2017

एक तीर : कई निशानें

मारे आदि-आयुध तीर-कमान रहें हैं। समय ने प्रगति की और अनेकानेक आयुधों के इस दौर में हम उन्हें भूल गए हैं। तीखे तीर से राम ने रावण को मारा। वैसे तीर की क्षमता उसकी तीक्ष्णता पर निर्भर नहीं करती है, यह कमाल तो हाथ और अंगूठा दिखाता है। हमारे सामने कोई तीर ताने यह सहनीय है, पर हमें कोई अंगूठा दिखाए.... यह असहनीय है! गुरु द्रोण के समय से ही अगूंठा देखने की हमारी आदत बिगड़ी हुई है। अब तो शिष्यों ने बिना मांगे ही गुरुओं को अगूंठें देने आरंभ कर दिए हैं। अगूंठा देना और दिखाना भी एक कला है, ठीक वैसे ही जैसे कि तीर चलाना और तीर झेलना कला है।
गुरुजी भी कम नहीं, वे भी अब अगूंठा मांगते नहीं, बहुत हो चुका वे अब सरेआम अगूंठा-छाप घोषित करते हैं। कल की ही बात लो, भरी सभा में गुरुजी ने बोलते हुए सवाल दागा- ‘लिंचिंग’ का मतलब किसी को पता है? सारे चुप! यह लिंचिंग बीच में कहां से आ गया। वे बोल तो ब्लीचिंग पाउडर पर थे और बीच में उनका अहम जाग गया। अपनी कुटिल मुस्कान के साथ वे बोले- मुझे पता है, आपको नहीं पता होगा। आप जब इस देस में रहते हुए भी अगला-पिछला कुछ जानते नहीं, फिर अगूंठा-छापों की श्रेणी में आ जाओ। सुनिए हाल ही के दिनों में भीड़ के हाथों बढ़ रहे क़त्ल के लिए लिंचिंग शब्द प्रचलन में आया है। हाय जुनैद, इतनी बड़ी बात और ये सब नहीं जानते!
वर्षों पहले गीतकार मजरुह सुलतानपुरी ने गुरुजी की किसी बात पर लिखा था- ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’। नाजुक दिलों को ऐसे और वैसे तीर कुछ ज्यादा ही घायल करते हैं। इस तश्वीर का दूसरा पहलु यह भी है कि रोजाना ऐसे अगूंठे देखने वालों का दिल मजबूत हो जाता है। वे कठोर, निष्ठुर ऐसे घायल नहीं होते। कोई घायल बाद में गुरुजी के बारे में कह रहा था कि उनका मन था, मंच पर जाकर कुछ ऐसा पूछे जिसका जबाब गुरुजी के गुरुजी को भी नहीं आता हो। माना यह उनकी भ्रांति थी पर वे मन मार कर रह गए। ऐसा अगर तीर चल भी जाता तो क्या होता? गुरुजी का स्वभाव रहा है कि ऐसे पथभ्रष्ट चेलों को सार्वजनिक रूप से बदनाम कर दो। ऐसे नालायक चेलों की भ्रूण-हत्याएं गुरुजी बखूबी कर डालते हैं। ऐसे बांसों को वे जड़-मूल से नष्ट करने की कला में पारंगत हैं, इसलिए बांसुरी वही बजती है जिसके सुर सात होते हैं। कोर्स में आठवां सुर नहीं फिर कैसे कोई नया आलाप ले सकता है। यह निषेध है। विधि सम्मत नहीं।
पक्ष हो या विपक्ष, गुरु हो या शिष्य सभी की यही कामना होती है कि कोई ऐसा तीर मिल जाए जिससे कई निशाने एक साध सध जाएं। इश्यू बनाने पड़ते हैं, ढूंढ़ने पड़ते हैं। अब तो ‘एक साधै : सब सधे’ की तर्ज पर बस एक तीर को साधना चाहते हैं कि अगला-पिछला सब सध जाए। ऐसे साधक अपनी लाठियों को सलामत रखते हुए सांपों को मारने निरंतर अभ्यास करते हैं, पर इसका क्या किया जाए जब उनकी आस्तीनों में सांप पल रहे हो। ऐसे में सलामत लाठियों को खुद पर ही बरसाना होता है।
पंच काका कहते हैं- चोर-चोर मैसेरे भाई, कोई कुछ कहता-करता नहीं। आग लगानी तो सरल है पर बुझानी जरा कठिन। आंदोलन करना तो सरल है पर हिंसा रोकनी जरा कठिन। तीर चलाया तो जा सकता है पर उनके घाव मिटाना जरा कठिन है।
० नीरज दइया 
 

15 जुलाई, 2017

स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता

    फेसबुक से जुड़ी अनेक कहानियां है। मैं एक छोटी-सी कहानी साझा करता हूं। जिन्हें कभी मैंने पढ़ाया था, वर्षों बाद फेसबुक की दुनिया में वे अनेक छात्र-छात्राएं मुझे मिले। यह जया की कहानी है। उसने अपने स्कूल-टाइम के टीचर यानी मुझ से एक सवाल किया- “सर, ये जो आपने हमें पढ़ाया था... साइन-कोस-टेन... वगैराह-वगैराह... वो हमें यूज कब करना है?” प्रश्न बड़ा गंभीर है कि गणित या फिर अन्य विषयों का स्कूली पाठ्यक्रम हमारे भविष्य के जीवन में कितनी उपादेयता रखता है। अगर कोई पाठ्यक्रम आगे के जीवन में उपादेयता नहीं रखता है तो उसके पीछे हम सुनहरा बचपन और युवावस्था को कोई बोझिल बनाते हैं?
    सभी शिक्षकों की मजबूरी होती है कि उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करना होता है। जो पाठ्यक्रम में है, जैसा पाठ्यक्रम में है उन्हें उसे पढ़ाना होता है। नौकरी का असूल है कि दिया हुआ काम करो। कोई ऐसा-वैसा सवाल मत करो। पाठ्यक्रम निर्माण और ऐसी अनेक गंभीर बातें बड़े-बड़े नेताओं और शिक्षाविदों के बस की बातें हैं। उसे कोई गांव का या शहर का सामान्य शिक्षक नहीं समझ सकता। मैं भी जब विज्ञान-विद्यार्थी के रूप में स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहा था, तब मेरे लिए भी यह रहस्य था- ‘हम क्यों पढ़ रहे हैं? यह हमारे आगे के जीवन में कब काम आएगा।’ मैं शिक्षक बनने का प्रशिक्षण ले रहा था, तब भी मन में ऐसे अनेक सवाल आते थे। सवालों का होना एक अच्छे अध्येता की निशानी है। ऐसे मेरे सवालों का जवाब मैंने खोजने और पूछने का प्रयास किया। कुछ विषयों और पाठ्यक्रम के कुछ हिस्से के बारे में तो कुछ बातें ठीक लगी पर इस सवाल का पूरा जबाब किसी ने नहीं दिया, कहीं नहीं मिला। बहुधा तो मेरे शिक्षक मेरे सवाल का जवाब ही अपने कुछ सवालों में देते थे। और उन दिनों कभी ऐसे जबाब मिलते थे कि मेरी समझ में नहीं आया था। अब भी मैं यदि अपने अनुभव से जवाब देने का प्रयास करूंगा तो वह अंतिम जबाब होगा ऐसा नहीं कह सकता। कुछ आंशिक जबाब ही सही इस बात पर जया के बहाने चर्चा की जानी चाहिए।
    शिक्षक के रूप में शिक्षा-नीतियों और पाठ्यक्रम आदि के बारे में आलोचना नहीं की जा सकती। किसी भी शिक्षक का ऐसा करना गलत है। दूसरे को इस बात से उनका सरोकार है नहीं, फिर इस पर चर्चा कौन करेगा। यह आलोचना नहीं वरन हमारे देश के भविष्य का प्रश्न है जिससे लाखों-करोड़ों की अभिलाषाएं और जीवन जुड़ा है। मुझे लगता है कि स्कूली पाठ्यक्रम के दौरान बच्चे जिस अवस्था में होते हैं वहां उनके माता-पिता, अभिभावकों अथवा शिक्षकों को यह जानकारी होना संभव नहीं कि बच्चा आगे चलकर क्या बनेगा। जब हमें मालूम नहीं विद्यार्थी आगे चलकर क्या करेगा, पाठ्यक्रम में समाहित सारी बातें जीवनोपयोगी हैं। स्कूली पाठ्यक्रम ऐसे विविध वितानों का समुच्चय है जिनके लिए बच्चे से हम उम्मीद करते हैं। यह ठीक किसी बीज में पेड़ होने का सपना देखने जैसा है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि उन्हें वह सब कुछ पढ़ाया और सीखाया जाए जिसकी आगे चल कर किसी मार्ग पर उन्हें आवश्यकता पड़ सकती है। यह पहले जैसा सामज नहीं कि लड़की को चिट्ठी लिखनी-पढ़नी आ जाए तो बस हो गई पढ़ाई। आगे जाकर रोटियां बनाने वाली महिलाएं अब केवल रोटियां बनाने वाली नहीं रही हैं। उनकी उम्मीदे, सपने और सरोकार इस देस समाज को प्रभावित करते हैं।
    श्रेष्ठ शिक्षक जीवन पर्यंत शिक्षार्थी बना रहता है। मुझे मेरे शिक्षार्थी होने में गर्व और आनंद है। किसी भी सफल शिक्षार्थी की निशानी है कि उसके पास कुछ सवाल है। जया, त्रिकोणमिति में साइन-कोस-थीटा को बहुत अच्छे से समझ कर, मैंने इतने विद्यार्थियों को पढ़ाया कि वह पूरा अध्याय रट-सा गया है। दैनिक जीवन में त्रिभुज और पूरी त्रिकोणमिति का गहरा अभिप्राय संभव है। केवल तीन भुजाओं और तीन कोण के माध्यम से अनेक गूढ़ अर्थों को समझ सकते हैं। किसी भी विद्यार्थी की असली पढाई अपने पाठ्यक्रम को याद रखना और स्कूली जीबन के संस्कारों का पोषण करना है। किसी का गुण मानना है, किसी को याद रखना और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपना ही संसार का नियम है। किसी गृहणी के जीवन में रोटी और सब्जी बनाते समय बेशक गणितीय शिक्षा के आधार-लंब और कर्ण आदि का कोई विशेष अर्थ नहीं होता। घर के बच्चों को पालते समय भी नहीं होता शायद, पर जब वे बच्चे स्कूल जाएंगे तब अर्थ होने लगेगा। अगर माता-पिता ‘साइन-कोस-टेनथीटा’ से परिचित हैं, तो वे बच्चों को संभाल सकते हैं। उनकी मदद कर सकते हैं, कुछ बता सकते हैं। जया तुम्हारे बच्चे इंजिनियन बनेंगे अथवा गणित-विज्ञान पढेंगे, तब थीटा तुम्हारे लिए कुछ काम का होगा। कोई एक आदमी केवल एक काम करता है पर देश में एक नहीं अनेक काम है और उन अनेक कामों की संभावनों से जुड़ी हमारी शिक्षा पद्धति है। स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता इसी बात पर निर्भर करती है कि यह हमारी सामूहिकता और एकता का प्रतीक है। पूरे देश में समान पाठ्यक्रम इसी बात पर आधारित है।
नीरज दइया


13 जुलाई, 2017

निरे बुद्धू और गूगल बाबा

प्रतियोगिता परीक्षा के बाद बच्चे सवालों पर चर्चा करते हैं- कौनसा सही हुआ, कौनसा गलत। जो हुआ सा हो गया। पर नहीं, इनकों तो मेरे जैसे बुद्धिजीवियों की हालत दयनीय करनी होती है। पेशे से अध्यापक हूं और लेखक-कवि होने का वहम से खुद को बुद्धिजीवी मानने लगा हूं। यह कहने-सुनाने की बात नहीं है फिर भी यहां लिखना पड़ता है कि हम निरे बुद्धू हैं। हम से बड़ी-बड़ी उम्मीदें हैं। यह तो अच्छा हो गूगल बाबा का जो कुछ भी पूछो, जल्दी से बता देते हैं। यह एक गुप्त ज्ञान है। गूगल बाबा ने आधुनिक समाज में गुप्त-ज्ञान को सार्वजनिक ज्ञान की श्रेणी में कर दिया है। बच्चे ने पूछा- ‘तावान’ कहानी के लेखक कौन है? इसके साथ ही उसने चार कहानीकरों के नाम बता कर मेरा मुंह ताका। मुस्कुराता हुआ वह बोला- मुझे नहीं आता था इसलिए मैं प्रेमचंद का नाम देखकर, यही तुक्का चला आया हूं।
गूगल बाबा की जय हो कि तवान कहानी के कहानीकार प्रेमचंद ही हैं। काश! बात यहीं थम जाती तो ठीक थी। पर अगले सवाल से बुद्धिजीवी होने के वहम पर फिर गाज गिरी- ‘तावान’ का मतलब क्या होता है? एक बार फिर गूगल बाबा की जय बोलनी पड़ेगी। लाज रह गई, पर यह पक्का हो गया कि अब बिन गूगल के सब सून है। प्रेमचंदजी सरीखे लेखक भी क्या खूब थे! इतनी कहानियां लिखी कि नाम भी भला अटपटे और कठिन रख छोड़े हैं। बड़ी गलती पेपर-सेटर की है। भला यह भी क्या सवाल हुआ कि फलां कहानी किसकी है, और फलां कहानीकार की कहानी निम्न में से कौनसी? अब ये खामियाजा तो आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ हमको भुगतना होगा।
तावान यानी हर्जना, मुआवज़ा, क्षतिपूर्ति, अर्थदंड आदि शब्द अभी विस्मृति में पहुंचे ही नहीं थे कि हमारे शहर में एक हादसा हो गया। फटाखा गोदाम में हुई दुर्घटना ने इस बुद्धिजीवी के सामने फिर से बड़ी समस्या खड़ी कर दी। जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ, इसका गम होने से अधिक दिखाने की कला हमें आनी चाहिए। ऐसी किसी भी घटना से अगर हमारी संवेदनशीलता आहत नहीं हो, तो हम काहे के बुद्धिजीवी? माना कि ऐसी घटना में कोई भरपाई यानी तावान संभव नहीं है। असली दर्द तो उसका है, जिसका घर-संसार उजड़ गया। गलती किसकी थी, कौन जिम्मेदार है, किसको सजा होगी? किसने अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं की? यह सब फैसला तो होता रहेगा पर जिसकी जान गई उसका क्या होगा? ऐसी लाशों पर राजनीति और पार्टी की रोटियां सेकने वाले हमारे कितने हमदर्द है? बच्चे बड़े हो गए फिर भी सवाल करते हैं। ऐसे सवाल जिनका जबाब ना तो गूगल बाबा के पास है और ना निरे बुद्धू जी के पास। बच्चा जानना चाहता है कि एक मौत के पच्चीस लाख मुवावजा मांगने वाले ढाई लाख से राजी क्यों गए? यह भी जानना चाहता है कि ढाई लाख या पच्चीस लाख किसी मृतक के परिवार वाला सरकार को दे दे तो क्या उनका घर फिर आबाद हो जाएगा?
पंच काका कहते हैं कि ऐसी मौत की क्षतिपूर्ति संभव नहीं। कोई अर्थदंड ऐसे घावों को भर नहीं सकता। मौत के सामने हम सब लाचार होते हैं। वह किसके हिस्से कब-कहां-कैसे आएगी, इसकी खबर किसी खबरनवीश को भी नहीं होती। वैसे यह खबर है भी नहीं, यह तो परमात्मा का बड़ा व्यंग्य है। हम सब इस व्यंग्य के निशाने पर हैं। किसी का नंबर कभी भी लग सकता है।

* नीरज दइया 
 

10 जुलाई, 2017

कच्चे कान : पक्के कान

ठीक-ठीक इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता कि कान पकड़ने की परंपरा का आरंभ कब हुआ और किसने किया। आदिकाल से कान दो प्रकार के पाए जाते रहे है। सजीव कान और निर्जीव कान। सभी सजीवों के कान सजीव कहलाते हैं, किंतु निर्जीव कान प्रायः दीवारों के होने के समाचार है। दीवारों के कान होते होंगे, पर आज तक किसी ने देखे नहीं। अनेक प्रमाणों के आधार पर पुष्ट होता है कि दीवारों के कान होते हैं।
    आधुनिक काल में कान को ठोक-बजाकर देखें तो कान की दो किस्में हैं- कच्चे कान और पक्के कान। कहते हैं कि अफसर के कान कच्चे होते हैं। वे किसी भी बात पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं। खासकर अपने मेल स्पूनों और फीमेल स्पूनों द्वारा दूसरों के बारे में कही गई बातों को वे आंखें मूंद कर भरोसा कर लेते हैं। कर्मचारी के विषय में शोध के परिणाम आए हैं कि उनके कान पक्के होते हैं अथवा पक्के हो जाते हैं। कर्मचारी जब कर्मचारी के रूप में सेवा आरंभ करते हैं तब उनके कान अधपक्के होते हैं। जैसे ही प्रोबेशन पूरा होता है वे पक्के हो जाते हैं। अफसर के श्रीमुख से आरंभ में कर्मचारी इतना कुछ सुन चुका होता है कि उसके कान पकने लाजमी है। अफसर का काम होता है- कहना और कर्मचारी का बंधा-बंधाया काम है- सुनना। जब अफसर जब बार-बार कहता है तो समझ लिजिए कि साहब के कान कुछ ज्यादा ही कच्चे हो गए हैं।
    अफसर चाहता है कि वह कर्मचारियों के कानों को पकड़ कर रखे। अफिस के कर्मचारी भी भला कहां कम होते हैं, वे भी अफसर से भिन्न विचार नहीं रखते हैं। जब सभी के विचार अफसरी-विचार हो जाते हैं तो कान पकड़म-पकडाई का खेल आरंभ होता है। कौन मूर्ख सीधा सीधा कान पकड़ता है। इस खेल का असूल है कि कान पकड़ा तो जाए पर उसे जरा घुमाकर पकड़ा जाए। प्रत्यक्ष में सीधा-सीधा यह नहीं लगना चाहिए कि कान पकड़ा गया है।
    सीधा कान पकड़ना निगाहों में आ जाता है, घूमाकर पकड़ा हुआ कान निगाहों में नहीं आता। सुनते हैं कि सरकार सभी नौकरीपेशा कर्मचारियों को खूब पगार देती थी और तिस पर सातवां वेतन आयोग भी दे दिया गया है। जनता का मानना है कि सरकारी दामादों के तो व्यारे-न्यारे हो गए। पर कर्मचारियों के श्रीमुख से सुना जा रहा है कि क्या दिया, कुछ नहीं! इधर दिया, उधर ले लिया। वृद्धि के नाम पर बढ़ी हुई पगार देने के साथ ही भरपाई के लिए कर यानी टेक्स से सरकार ने सभी के कान पकड़ लिए हैं। 
    पंच काका कहते हैं कि जब किसी का कान सीधा-सीधा पकड़ना संभव नहीं हो तो दूसरे-तीसरे अथवा चौथे विकल्प पर विचार ही नहीं करना चाहिए। देखिए ना पहले हमारे जमाने में गुरुजी का साप्ताहिक कार्यक्रम होता था- बच्चों के दो-च्यार बार कान पकड़ना और कान के नीचे हाथ जमाना। कभी कभी उनकी मरजी होती तो वे कान घुमाने का प्रयास भी किया करते थे। कान घूमने में सीमा यह थी कि शिष्य की आंखें छल-छला आए और गुरुजी की मुस्कान- जा बैठ बेटा! अब गुरुजी कान पकड़ने और कान के नीचे दो च्यार हाथ जमाने के सपने भी नहीं देख सकते। ऐसे में अफसरों और कर्मचारियों को आचार-संहिता का पालन करना चाहिए। यह जान लें कि भलाई इसी में है कि ये कान-कान खेल बंद ही कर दिया जाए।     
० नीरज दइया