26 मई, 2017

वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री बुलाकी शर्मा की टिप्पणी

दूसरे व्यंग्य संग्रह- “टांय टांय फिस्स” पर
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लक झपकते ही समाज अपना रंग-रूप बदल लेता है। किसी रूप-रंग के बारे में कोई व्यंग्यकार लिखने की सोचता है कि उसे पता चलता है कि वह जो सोच रहा था वह तो बदल गया।
व्यंग्यकार डॉ. नीरज दइया के व्यंग्य ‘रचना की तमीज’ की उक्त पंक्तियां जहां पल-प्रतिपल रंग बदलते समाज की ओर संकेत करती है, वहीं मौजूदा समय में व्यंग्यकारों के सम्मुख उपस्थित चैलेंज की ओर भी ध्यानाकर्षित करती है। व्यंग्यकारों की पैनी नजर से तात्कालिक घटनाओं को ही नहीं, वरन उनके कारणों की जांच-परख करते हुए वास्तविक वजह तक पहुंचते हुए समाज को सजग और सचेत करने का जोखिम उठाना होगा। क्योंकि मौजूदा समय में ‘हम समूह राग तो गा लेते हैं पर एकल-गान हमारे बस की बात नहीं।’ ऐसे समय में डॉ. नीरज दइया ने ‘टांय टांय फिस्स’ व्यंग्य संग्रह में ‘एकल-गान’ गाने का जोखिम उठाने का दुस्साहस किया है। वे मौजूदा समय और समाज की विसंगतियों-विद्रूपताओं-विषमताओं को तल्खी से उद्घाटित ही नहीं करते, वरन उनकी तह में जाकर उनके कारणों को खोजने की ईमानदार कोशिश करते हैं। देश-दुनिया में ‘पलक झपकते’ होते परिवर्तिनों पर डॉ. दइया की नजर है और वे उसे अपने अलहदा अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. नीरज दइया की नजर से न नोटबंदी बची है, न स्कूली शिक्षा, न लेखक संघ बचे हैं, न वीआईपी, न भष्ट्राचारी बचे हैं, न समाजद्रोही। उन्होंने हर क्षेत्र की विसंगतियों पर करारी चोट की है।
कवि-आलोचक-अनुवादक के रूप में विशेष पहचान रखने वाले डॉ. नीरज दइया हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में सृजनरत हैं। उनका व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ व्यंग्य विधा को समृद्ध-समुन्नत करनेवाला है। हम सब इसका शानदार स्वागत करते हैं।

-बुलाकी शर्मा 
टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003 ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र
निबन्ध शैली में लिखे गए नीरज दइया के व्यंग्य हमारे परिवेश से जुडी समस्याओं से जूझते हैं। उनके लेखन में व्यवस्थागत विसंगतियां प्रचुर रूप से उजागर होतीं हैं, साथ ही सामाजिक बुराइयों पर उनके तंज उल्लेखनीय हैं। बिना हो-हल्ला किये नीरजजी का व्यंग्य विद्रूपताओं से मुठभेड़ करता है। आशा है इनकी ऊर्जा से व्यंग्य-साहित्य सुदृढ़ होगा।
- अरविन्द तिवारी
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नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाये हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती हैं, अपितु उनकी सक्रियता को भी दर्शाती हैं कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्यम से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
-लालित्य ललित 
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आलोचन और कविता में बेहतरीन काम के बाद डा. नीरज दइया हिंदी व्यंग्य के मैदान में भी पूरी तैयारी के साथ उतरे प्रतीत होते हैं। सामाजिक विद्रूपताओं पर उनके व्यंग्य प्रहार गहरी चोट करते हैं। पंच काका के माध्यम से डा. दइया ने समाज के उन चेहरों से नकाब उतारने का प्रयास किया है जो राजनीति, धर्म, व्यापार, साहित्य और पत्रकारिता के साथ अन्य क्षेत्रों में घुसपैठ करके अपनी ‘कलाबाजियां’ दिखा रहे हैं। दरअसल यही बहुरूपिये हमारी सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने में जुटे हैं। इनकी खबर लेना ही आज व्यंग्यकार का दायित्व है और डा. दइया ने इस दायित्व को कुशलता से निभाया है।
-कृष्णकुमार आशु 
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24 मई, 2017

“पंच काका के जेबी बच्चे” व्यंग्य संग्रह की भूमिका

वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार
सामान्य कथन में व्यंग्य को लोग ताना या चुटकी की संज्ञा देते हैं। व्यंग्य, कथन की एक ऐसी शैली है जहां बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्कु रा रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठे। यानी व्यंग्य तीखा और तेज तर्रार कथन होता है जो हमेशा सोद्देश्य होता है। इसका प्रभाव तिलमिला देने वाला होता है।
पारिभाषिक रूप से व्यंग्य साहित्य की एक विधा है जिसमें उपहास, मजाक और इसी क्रम में आलोचना का प्रभाव रहता है। शब्द की अभिव्यंजना शक्ति द्वारा निकलने वाला अर्थ ही व्यंग्य कहलाता है। यदि इन पारिभाषिक मापदंडों की कसौटी पर नीरज दइया की पुस्तक- ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ में संकलित व्यंग्य रचनाओं को कसा जाए तो वह खरी उतरती है। भाषा विषयानुरुप और कथन में निर्बाध प्रवाह। शैली की विशिष्टता भी अनूठी।
एक लंबे अर्से से दैनिक नवज्योति के संपादकीय पृष्ठ के लोकप्रिय स्तंभ ‘जल-तरंग’ में उनकी रचनाएं नियमित रूप से प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं की लोकप्रियता का अंदाजा पाठकों से मिल रहे प्रशंसात्मक पत्रों से लगाया जा सकता है। व्यंग्य की पारिभाषिक व्याख्या के अलावा जिस सहज अंदाज से उन्होंने अपनी रचना- ‘व्यंग्य की ए बी सी डी’ में चुटकियां ली हैं- ‘वाह ! बेटा उस्ताद से उस्तादी’। वे खुद लिखते हैं कि ‘व्यंग्य की ए बी सी डी आसान नहीं है बल्कि कठिन है। कठिन इसलिए है कि यह शरारतियों का काम है। यह सीडी ऐसी है जो बिना कम्प्यूटर के चलती है। ऐसी सीढ़ी जो दूर तक पहुंचती है’। इससे सरल व्याख्या व्यंग्य की और क्या हो सकती है? बात जब ‘एक नम्बर बनाम दो नम्बर’ की हो तो यह करारा प्रहार उन व्यक्तियों के दो नंबर के क्रिया-कलापों को लेकर किया गया है, जो एक जेब में औरों को दिखाने के लिए अखरोट और बादाम रखते हैं और पीछे छिपकर भुने हुए चने खाते हैं। आज समाज की सार्वजनिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार है। व्यंग्यकार दइया लक्ष्मी की खासियत बताने में नहीं चूकते कि ‘वह ऐसी शक्ति है जो खुद तो पूजनीय है, साथ ही वह जहां रहती है, उसे भी पूजनीय बना देती है’।
लेखक ‘जुल्म-ए-जलसा’ की अपनी तरह से शब्दों में जो व्याख्या दी है वह भी अद्भुत अंदाज से। जल्सा या जल सा यानी पानी सा। फिर इसकी आड़ में कहर किस तरह बरपाया है और पेटपूजा की जाती है, यह अपने आप में एक अच्छी खासी रचना है। इसी तरह ‘मास्टरजी का चोला’ व्यंग्य आजकल जिस तरह विश्वविद्यालयों और हमारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों और शिक्षिकाओं के पहनावे और व्यवहार है, उस पर भी अच्छा-खसा तंज कसा गया है। पहनावे और व्यवहार से कभी शिक्षक छात्रों में स्पष्ट भेद किया जा सकता था, लेकिन आज इस दृष्टि से कोई भेद ही नहीं रहा। कभी शिक्षक से छात्र भय खाते थे, आजकल फ्रें डली नजर आते हैं। शिक्षक ही नहीं वर्तमान पिताओं के व्यवहार पर भी कटाक्ष किया गया है। जिसकी वजह से नई पीढ़ी जिस तरह अनियंत्रित होकर अपने अभिभावकों के बताए मार्ग का अनुसरण ना कर दूसरे मार्ग पर चलने को ही मॉर्डन होने की दंभ भरती है। इसे चरितार्थ करने की कोशिश लेखक ने अपनी रचना- ‘पिताजी के जूते’ की आड़ में अभिव्यक्त की है।
हमारे समय में होली और शीतलाष्टमी, शादी या अन्य पारिवारिक उत्सवों में हास-परिहास की परंपराएं थीं, उन्हें हम भुलाते जा रहे हैं, लेकिन पश्चिमी सभ्यता से आए अप्रैल फूल बनाने की प्रवृति को ‘फलके सा चेहरा’ के माध्यम से चित्रण किया है। वर्तमान में किसी भी विभाग में आप जाइए-साल भर कोई काम नहीं होता। लेकिन नया बजट आने से पहले वित्तीय वर्ष के आखिरी माह मार्च के लक्ष्य पाने के लिए जिस तरह की प्रवृत्ति आज आम हो गई है, उस पर करारा व्यंग्य है- ‘टारगेटमयी मार्च’। ‘हेलमेट’ के जरिए सड़क सुरक्षा, यातायात नियमों की आड़ में जिस तरह परिवहन विभाग और यातायात पुलिस द्वारा उलटे-सीधे ऊपरी कमाई के उद्यम को ‘हेलमेट पर निबंध’ के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।
आजकल समाज में सोशल मीडिया काफी सक्रिय है। लोग सुबह ईश्वर का स्मरण करना भूल जाएं और रात को सोते समय स्वाध्याय ना करें लेकिन फेसबुक, ट्वीटर के जरिए मोबाइल, कम्प्यूटर, टेब, लेपटॉप में डूबे रहते हैं। फेसबुक पर अपनी सेल्फी लेकर अपलोड करने फिर उसकी लाइक्स और कमेंट लिखने और देखने में अपने जीवन का कीमती समय व्यर्थ कर रहे हैं, इस पर ‘दाढ़ी रखूं या नहीं’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी रचनाओं के जरिए कटाक्ष किया गया है।
जब डिजिटल इंडिया की चर्चा हो तो स्वत: ‘विकास’ की बात करना तो बनता ही बनता है। विकास पर सत्तारूढ़ हर दल दावे करता है, भले ही हो या ना हो, लेकिन नगाड़ा तो बजाते रहना ही पड़ता है। तो इसके ठीक विपरीत विपक्ष विकास में भी विनाश के हर पहलू को ढूंढ़कर आलोचना करने से बाज नहीं आता। आजकल राजनीति में विकास की यही गणित पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। तीसरा पक्ष की पलटी राजनीति चाल भी चर्चा का विषय बन जाती है।
कुल मिलाकर नीरज दइया की इस कृ ति ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ में संकलित व्यंग्य रचनाएं वर्तमान युग की विसंगतियों पर अपनी तेज धार से प्रहार करती है। ईश्वर से कामना है कि वे आधुनिक व्यंग्य विधा के प्रमुख प्रकाश-स्तंभ हरिशंकर परसाई और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होंगे। इन मंगलकामनाओं के साथ मैं उनके सुनहरे भविष्य की कामना करता हूं।
महेश चंद्र शर्मा
स्थानीय संपादक, दैनिक नवज्योति, जयपुर
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पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
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पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) प्रख्यात साहित्यकार-पत्रकार देवकिशन राजपुरोहित को सादर समर्पित

20 मई, 2017

श्री कुंवर रवीन्द्र द्वारा निर्मित कविता-पोस्टर


साख भरै सबद / नीरज दइया
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दरद रै सागर मांय
म्हैं डूबूं-तिरूं
कोई नीं झालै-
महारो हाथ ।

म्हैं नीं चावूं
म्हारी पीड़ रा
बखाण
पूगै थां तांई
कै उण तांई ।

पण नीं है कारी
म्हारै दरद री
साख भरै-
म्हारो सबद-सबद ।
००००

दर्द / नीरज दइया

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दर्द के सागर में
मैं डूबता तिरता हूं
कोई नहीं थामता
मेरा हाथ ।

मैं नहीं चाहता
मेरी पीड़ा का
बखान
पहुंचे आप तक
या उन तक ।

लेकिन कोई चारा भी नहीं है
मेरे दर्द का
साक्षी है
मेरा शब्द-शब्द ।

अनुवाद : मदन गोपाल लढ़ा

अन्य कविताएं देखें

19 मई, 2017

जीवन को पहचानते हैं नीरज दइया


नीरज दइया समकालीन व्यंग्यकारों में एक महत्वपूर्ण नाम हैं। उनका महत्व इस लिए भी बढ़ जाता है क्योंकि व्यंग्य में यह संक्रांति काल है। क्रांति का फल क्या निकलेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है। संक्रांति यह है कि सोशलमीडिया के सुविधाजनक आगमन व हस्तक्षेप से अभिव्यक्ति आसान, निष्कंटक और अपार हो गई है। व्यंग्य केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है। जब वह साहित्य बनता है तब बहुत सारे अनुशासन ज़रूरी होते हैं। ...ऐसे दिलचस्प और दिलनवाज़ माहौल में नीरज दइया जैसे सुलझे व्यंग्यकार अलग से दिखाई देते हैं।
नीरज जी को पढ़ते हुए पाठक को एहसास होता है कि उनका परिवेश के साथ गहरा रिश्ता है। क्योंकि वे बहुत सामान्य सी बातों को परख कर उनके तल से मतलब की बात निकालने का हुनर जानते हैं। जैसे 'नियम वहां, जहां कोई पूछे' में भारतीय समाज की सामान्य मानसिकता पर वे चुटकी लेते हैं,'...नियमों के जाल से जिसे बचना आता है वह बच जाता है। ...नियम तो बेचारे उस जाल की तरह है जिसे एक बहेलिए ने बिछाया तो पक्षियों को पकड़ने के लिए था,पर वे होशियार निकले। पूरे जाल को ही लेकर उड़ गए।' कितनी सरलता से नीरज जी शासन प्रशासन न्यायपद्धति नागरिक बोध आदि बातों को आईना दिखा देते हैं।
नीरज जी कुछेक व्यंग्यकारों की तरह दूर की कौड़ी नहीं लाते। वे कथात्मक शैली में संवाद करते हुए लिखते हैं। भाषा को उन्होंने साध लिया है। छोटी वाक्यसंरचना उनको भाती है। प्रत्यक्ष कथन और अप्रत्यक्ष संकेत में उनको कुशलता प्राप्त है। 'टारगेटमयी मार्च' में नीरज जी लिखते हैं,'बिना खर्च के आया हुआ बजट लौट जाएगा तो यह सरासर हरामखोरी है। लापरवाही है।कार्य के प्रति उदासीनता है। अनुशासनहीनता है।'
अब सोचिए जिस समाज में ऐसे 'परिश्रमी,सतर्क, सचेत,अनुशासित' कर्मचारी होंगे वह समाज प्रगति क्यों न करेगा!!!
नीरज जी ने साहित्य के बाहरी भीतरी स्वांगों पर अनेक बार लिखा है। प्रायः हर ज़रूरी व्यंग्यकार ने लिखा है। यह अनुभव का मसला तो है ही,बौद्धिक ज़िम्मेदारी का सवाल भी है। इस बहाने सब पर कोड़े बरसाने वाला व्यंग्यकार ख़ुद पर भी बरसता है। कहना ही चाहिए कि नीरज जी बहुत वक्रता के साथ बरसे हैं।
नीरज दइया में एक और हुनर भरपूर है। व्यंग्य मूलतः किस्सागोई, लंतरानी और ललित निबंध आदि के सहभाव से विकसित गद्य रूप है (इसको विधा मानने या न मानने वालों को मेरा सलाम,ताकि मैं सलामत रहूं) इसलिए इसमें बात से बात निकालने और बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी का कौशल आवश्यक है। नीरज जी यह काम करते हैं।'पिताजी के जूते' में वे बात निकालते हैं,'देश से असली जूते गायब हो चुके हैं।किसी के पैरों में कोई जूता नहीं,बस भ्रम है कि जूते हैं। अगर गलती से कोई जूता है तो वह बेकार है।' यहां यह कहना है कि बात निकली है,दूर तलक गई है।ऐसा नहीं हुआ कि बात कहीं और चली गई, मूल मंतव्य कहीं और चला गया। यह नीरज जी का अनुशासन है।
मैं नीरज जी को पढ़ता रहा हूं। एक व्यक्ति और लेखक के रूप में उनकी आत्मीयता प्रभावित करती है। बेहद जटिल समय और रचना परिवेश में उनकी उपस्थिति आश्वस्त करती है। उनकी उर्वर रचनाशीलता का अभिवादन। अनेक शुभकामनाएं।

सुशील सिद्धार्थ
किताबघर प्रकाशन,24 अंसारी रोड,दरियागंज, नयी दिल्ली 2
08588015394
पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
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प्रख्यात साहित्यकार-पत्रकार देवकिशन राजपुरोहित को सादर समर्पित

समाज एवं रचनाकार के लिए एक आइना


किसी भी रचनाकार का अपने परिवेश के साथ, अपने समाज के साथ, अपने समय के साथ क्या रिश्ता है यह जानने का अच्छा एवं सही तरीका है उसकी रचना के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी ‘रचनात्मक दृष्टि’। मनुष्य जीवन में भी मनुष्य के हर कार्य के पीछे उसकी ‘दृष्टि’ छुपी होती है और उसी ‘दृष्टि’ के आलोक में हम उस कार्य का और उस कार्य के कारण उस मनुष्य का आकलन करते हैं। इसीलिए जब हम किसी रचनाकार के अब तक प्रकाशित रचनाकर्म का आकलन करने बैठते हैं हमें सबसे पहले यह जानना पड़ता है कि उस रचनाकार की ‘दृष्टि’ क्या है, जो उसकी रचनाओं के माध्यम से हम तक सम्प्रेषित होती है। वह रचनाकार अपने समय के सवालों से कैसे जूझता है, अपने समय को एक शाश्वत समय में कैसे प्रतिष्ठित करता है। हम इससे भी एक कदम पहले लेकर यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि वह अपने समय के सवालों को कैसे उठाता है। अपने समय को प्रश्नांकित करना, अपने समय से मुठभेड़ करना एवं उस मुठभेड़ को एक शाश्वत समय में प्रतिष्ठित करना किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ी चुनौति होती है। जो रचना इस कार्य को ठीक तरह से पूरा कर पाती है वह अपने पाठकों का विश्वास अर्जित कर लेती है।
श्री मधु आचार्य के सर्जनात्मक सरोकारों पर केन्द्रित यह पुस्तक तत्कालीन समाज के लिए एवं स्वयं रचनाकार के लिए एक आइने का काम करेगी क्योंकि इस पुस्तक के लेखक डॉ. नीरज दइया  अपनी इस पुस्तक में श्री मधु आचार्य की रचनाओं में छुपी ‘रचनात्मक दृष्टि’ को समाज के सामने लाने का प्रयास करते हैं जिसके कारण वे रचनाएं एवं उन रचनाओं के माध्यम से स्वयं रचनाकार महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
श्री मधु आचार्य के रचनाकर्म का आकलन इसलिए भी जरूरी लगता है कि वे एक ही समय में दो भिन्न भाषाओं में साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, व्यंग्य एवं बाल साहित्य के क्षेत्र में निरंतर लिखना एवं स्तरीय लिखना दो अलग अलग बातें हैं। श्री मधु आचार्य के लेखन की विशेषता यही है कि वे दो भिन्न भाषाओं में इतनी साहित्यिक विधाओं में एक साथ सक्रिय रहते हुए भी अपने रचनाकर्म के साथ समझौता नहीं करते। इसलिए भी उनका पाठक वर्ग उन पर उनके रचनाकर्म के कारण विश्वास करता है, उन्हें प्यार करता है। किसी भी रचनाकार के लिए उसके पाठक वर्ग का विश्वास ही सबसे बड़ी पूजी होती है और श्री मधु आचार्य पाठकों के इस विश्वास पर खरे उतरते हैं।
कविता और कहानी या उपन्यास और नाटक या कि बड़ों के लिए लेखन एवं बच्चों के लिए लेखन दो भिन्न मानसिकता, दो भिन्न धरातल, भिन्न भाषागत व्यवहार भिन्न शिल्पगत वैशिष्ट्य को साधना है। एक रचनाकार के लिए भाषा को ‘सिरजना’ एवं भाषा को ‘बरतना’ का सांमजस्य बनाये रखना बहुत जटिल कार्य होता है। खास तौर से जब साहित्यिक विधा की अपनी अन्दरूनी मांग ही उससे भाषा के भिन्न ‘वैशिष्ट्य’ को अपने पाठक तक पहुंचाने की चुनौति देती है। इस पुस्तक में लेखक डॉ. नीरज दइया विवेचित रचनाकार के रचनाकर्म के उस वैशिष्ट्य को उसके पाठक तक पहुंचाने के लिए एक ‘सेतु’ बनाने का श्रमसाध्य कार्य करते हुए सामने आते हैं। यही इस पुस्तक की विशेषता है और इस कार्य के लिए डॉ. नीरज दइया को बहुत बहुत बधाई।
श्री मधु आचार्य का रचनाकर्म अभी चुका नहीं हैं। उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में वे राजस्थानी एवं हिंदी में और रचनाएं अपने पाठक समुदाय को सौंपेंगे। रंगकर्म के क्षेत्र में उनके लम्बे अनुभव को देखते हुए राजस्थान के रंग सामाजिक को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। वे अपने जीवन में एवं अपने सर्जनात्मक क्षेत्र उत्तरोत्तर उन्नति की ओर बढ़ेंगे यही कामना है।
- डॉ. अर्जुनदेव चारण
वरिष्ठ कवि-नाटककार-आलोचक

मधु आचार्य `आशावादी' के सृजन-सरोकार (2017) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : दिनेश कुमार ओझा ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ISBN : 978-93-82307-70-9 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003

16 मई, 2017

साहब की साहबी

मारे बोलन-सुनने और देखने के विषय में सरकारी कानून बने हुए हैं। सभी के पास आंखें तो होती हैं, पर उसमें जो नजर होती है, उससे कुछ का कुछ हो जाता है। उसका ख्याल रखना होता है। जब देने वाले ने ही अच्छी और बुरी दो नजर दी, फिर बुरी नजर पर कानूनी दांव-पेंच क्यों?
जरा सी ऊक-चूक आपकी नजर हुई और आप आए कानून के शिकंजे में। देखने और देखने में फर्क है, तभी तो कानून के हवाले दंडित करने के नियम बनाएं गए हैं। केवल देखने में ही नहीं बोलने में अच्छा और बुरा दो प्रविधियां सामन्यत बोलने की हैं। कहीं जरा सी अभ्रदता, खतरे का आगाज है। संभल कर देखना-बोलना और चलना है। क्योंकि शरीफ आदमी के बीस दुशमन है, जो बदमाश है उसे कोई कुछ नहीं कहता!
घर से दफ्तर को मैं निकलते हुए बीस बार रामजी-रामजी का नाम जाप करके निकलता हूं। सोचता हूं कहीं कुछ उलटा-पुलटा नहीं हो जाए। मैं शरीफ आदमी किसी से माथा लगाना नहीं चाहता। मैं तो इतना शरीफ हूं कि अगर गली का कुत्ता भी रास्ता रोकता है, तब भी उसे अच्छी नजर से देखते हुए मुस्कुराते हुए अच्छा-अच्छा बोलता हूं- कुत्ता भाई साहबजी हटिए, रास्ता छोडि़ए ना। प्लीज, दफ्तर को देर हो रही है।
मुझे याद आता है कि बालपन कितना सहज और आनंदमयी था। कोई कुत्ता रास्ते में दिखई देता तो पहले पत्थर उठाते थे, फिर दे मारा। कहीं कभी कोई सोया हुआ कुत्ता मिल जाता तो उसे लात मारने का सुख, अब कहां! सोचता हूं- तब हम गाय-बैल को तंग क्यों नहीं करते थे? शायद इसलिए कि सीख लिया था- गाय हमारी माता है, बैल हमारा बाप है। अब जाना कि पहले ऐसा क्यों रटाया! गाय-बैल से ऐसा करते तो खेती और किसान जीवन गड़बड़ा जाता।
अब ना खेत रहे और ना खेती। ना वे किसान रहे और ना किसानी जीवन। है तो भी हमारे जीवन में कहां कितना महत्त्व है इन सब का। हम दौड़ते जीवन में फुर्सत कहां से निकाले कि इनको देखें-जाने। बदली दिनचर्या में कुत्तों-बिल्लियों से लेकर घोड़ों-गधों-ऊंटों के लिए प्यार-नफरत की छोडि़ए, ये देखने को बस किताबों और स्क्रीन पर नसीब होते हैं।
पहले प्रकृ ति और पर्यावरण का जीवन और विकास में महत्त्व हुआ करता था। अब तो किसी का कोई महत्त्व नहीं है। जरूरत पडऩे पर ही हम किसी को महत्त्व दे देते हैं। बचपन कितना सहज-सरल था। कोई मिला और मुस्कुरा दिए, अब हम मसीन है। सब कुछ मसीन की भांति करते हैं। हमारी बहुत मजबूरियां हैं। देखिए अगर साहब के सामने जाएंगे तो मुस्कु राना लाजमी है, और अगर रास्ते में साहब का कोई चम्मचा-चम्मची या कुत्ता दिख जाए तो सोचना पड़ता है कि क्या किया जाए, किस बात से बचा जाए! साहब और उनके प्रभामंडल के सदस्यों के अनुसार ही हमें हमारी आचार-संहिता का निर्माण करना होता है। ख्याल रखना पड़ता है कि साहब हमारी किसी बात से नाराज नहीं हो जाए। उनकी नाराजगी का नतीजा हमारी ए.पी.आर. तक पहुंच जाता है।
पंच काका कहते हैं कि तालाब में रहकर मरगमच्छ से बैर नहीं करना चाहिए। यह भी दस्तूर है कि इंसान जैसे ही साहब की पदवी पाता है, वह दूसरी भांति का प्राणी बन जाता है। उसे ऊपर से लेकर नीचे तक सिस्टम में सब एडजेस्टमेंट करना होता है। साहब है तो क्या हुआ, साहब के भी तो साहब होते हैं। इसलिए कभी मूंछें नीची, तो कभी मूंछें ऊंची। उन्हें कभी भौंकना पड़ता, अवसर विशेष पर कभी किसी को दांत दिखाने पड़ते हैं। किसी को कभी काटना पड़ता है। हमें साहब को समझने के लिए जानवरों से कुछ सीखना चाहिए। 
० नीरज दइया 

15 मई, 2017

दो भाषाओं से हमें पढ़ती-पढ़ाती हुई एक किताब

पुस्तक समीक्षा/  अजेस ई रातो है अगूण – सुधीर सक्सेना
० नवनीत पाण्डे

“कविता एक मुसलसल प्रक्रिया है, जो शब्दों में उभरती और व्यक्त होती है। कविता की यह प्रक्रिया अलबत्ता लिखे जाने के पहले भी और बाद भी जारी रहती है।” लगभग आधी सदी से कविता-कर्म में लगे वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना के अब तक प्रकाशित दस से अधिक कविता-संग्रहों यथा - बहुत दिनों के बाद, इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी, समरकंद में बाबर, काल को भी नहीं पता, रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी, किरच-किरच यकीन, ईश्वर हां, नहीं तो..!, किताबें दीवार नहीं होतीं, धूसर में बिलासपुर और कुछ भी नहीं अंतिम से कवि अनुवाद नीरज दइया द्वारा चयनित कविताओं का प्रकाशन ‘अजेस ई रातो है अगूण’ शीर्षक से प्रकाशित है, जिसमें से उक्त पंक्तियां कवि और उनकी कविताओं के स्वर का सहज ही अंदाज़ा देती हैं। ‘अजेस ई रातो है अगूण’ में नीरज दइया ने राजस्थानी में सुधीर सक्सेना की हिंदी काव्य-यात्रा को समेटने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
इस चयन से गुजरते हुए महसूस किया जा सकता है कि कवि सुधीर सक्सेना बहुत बड़े कैनवस के कवि हैं। वे बड़े घोषित घरानों और स्थापित नामों की चर्चाओं-स्थापनाओं के खेल से दूर हिन्दी समकालीन काव्य-यात्रा के सजग साधक हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए अहसास होता है कि सक्सेना की कविताओं पर आलोचकों को ध्यान देना चाहिए था। वे हिंदी के ऐसे प्रयोगशील और अभिनव कवि हैं जो राजस्थानी भाषा में जैसे एक पूरा परिदृश्य प्रस्तुत करते हुए अपने पाठ से अविस्मरणीय बन जाने की क्षमता रखते हैं। कविताएं अपने पाठ में बहुत ही सरल-सहज शब्दावली में बिना किसी अतिरेक या आवेश के मध्यम स्वर को साधे आगे बढ़ती है। उदाहरण के लिए शीर्षक कविता का एक अंश देखें- ‘कै अजेस ई रातो है अगूण/ अजेस ई रातो है सूरज रो उणियारो/ अजेस ई रातो है मिनख रै डील मांय बैंवतो रगत.. (कि अभी भी लाल है पूरब/ अभी भी लाल है सूरज का मुखड़ा/ अभी भी लाल है मनुष्य की देह में बहता रक्त..) यह महज एक बानगी भर है। यहां उम्मीद का एक रंग तो है, सूरज के संग बने रहने का विश्वास भी है। स्वयं पर और अपने समय के साथ भविष्य पर यकीन ही कविता में सबसे बड़ी पूंजी है, जिसे कवि पोषित करता है।
कहना होगा कि यह एक ऐसे कवि की कविताओं का संग्रह अपनी मूल भाषा हिंदी और राजस्थानी में है जो कविता में आईनों के चौखटों में सिर्फ सूखे हाड़ चमचमाने, एक तिनके की तलाश में लगातार पचासी करोड़ लोगों के हिचकोले खाने, धरती को हरियाली से, बच्चों की जेबें कंचों से और समुद्र को मछलियों से भरने की बात करते-करते कह सकता है - ‘जद अळघै तांई, अळघै तांई, अळघै तांई, कोई नीं हुवै आपां रै आखती- पाखती, बस, बठै सूं ई सरु हुवै नरक, बठै सूं ई सरु हुवै नरक जातरा। (जब दूर तलक, दूर तलक, दूर तलक कोई नहीं होता हमारे आसपास, बस वहीं से शुरू होता है नरक, वहीं से शुरू होती है नरक यात्रा)। कविता की पुरानी लीक तोड़ने वाले आदमी के लिए कपाल मे थोड़ा-सा क्रोध, दिल में थोड़ा-सा प्यार, थोड़ी नफरत दिमाग में और आँखों में थोड़ी-सी शर्म की अपेक्षा रखने वाले कवि सुधीर सक्सेना की सीधे-सीधे व्यवस्था और आदमी के चरित्र पर चोट करने वाली मारक कविताओं का इस कठिन समय में राजस्थानी में आना मानीखेज़ है।
‘अजेस ई रातो है अगूण’ में संकलित कविताओं में कविता का हर रस-रंग मौजूद है। यही इस चयन की सबसे बड़ी खासियत है। अनुवादक स्वयं कवि हैं, अस्तु कविता की गहरी समझ ने चयन और अनुवाद करते समय कवि को हर ओर से टटोला है। यह संचयन कविता के अनेक पक्षों और भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के अतिरिक्त कवि की सोच, मन:स्थिति, कवि-दृष्टि को जैसे खोल कर रख देता है। ईश्वर, मनुष्य, प्रकृति, इतिहास, ऐतिहासिक चरित्र (बाबर, तूतनखामेन), प्रेम, समाज, राजनीति, व्यवस्था और जीवन के हर पहलू को समेटे यह कृति काव्य का ऐसा इंद्रधनुष है जो निश्चय ही राजस्थानी अनुवाद-जगत में महत्त्वूपर्ण व मील का पत्थर माना जाएगा। सुधीर सक्सेना की एक कविता की पंक्ति से हम इसे आसानी से समझ और महसूस कर सकते हैं - ‘हम किताब बाद में पढ़ते हैं, उससे पहले हमें पढ़ती है किताब।’
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* अजेस ई रातो है अगूण (कविता-संचयन) मूल - सुधीर सक्सेना, अनुवाद - नीरज दइया प्रकाशक : लोकमित्र, 1/6588, रोहतास नगर (पूर्व), शाहदरा, दिल्ली-110032 संस्करण : 2016, पृष्ठ : 144, मूल्य : 295/

डिजिटल इंडिया जिंदाबाद

ह जान लिजिए कि दुनिया में बस दो ही डिजिट ‘शून्य’ और ‘एक’ है। बाकी सब बेकार है। एक को हीरो कहा जाता है, तो दूसरे को हम जीरो कह लेते हैं। नंबर वन को हीरो नहीं कहेंगे तो किसे कहेंगे। दुनिया भर का ज्ञान-विज्ञान, धन-दौलत, शब्द और मौन सब कुछ को, कंप्यूटर जीरो और हीरो यानी शून्य और एक के गणित में बदल कर सहज लेता है। यह सब बायनरी यानी दो नंबर के सिस्टम पर आधारित है। यही सिस्टम डिजिटल इंडिया जिंदाबाद सफल बनाने जा रहा है। ‘दो नंबर’ कहते ही आपका दिमाग उलटा-पुलटा चलने लगता है। ऐसा लगता है आप विपक्ष में बैठ गए हैं। भैया यह हमारे पक्ष की बात है और हिंदी में समझा रहे हैं। वरना इसे यदि ‘बाइनरी सिस्टम’ कहते तो आप ऐसा-वैसा सोचते नहीं। यह कोई ऐसा-वैसा नहीं पूरा का पूरा अमजाया हुआ और जांचा-परखा सिस्टम है।
भारत के गांव-गांव में बिजली भले पहुंची ना पहुंची हो पर मोबाइल पहुंच ही गया। जहां बिजली है वहां इंटरनेट है। इंटरनेट और बिजली असल में ‘डिजिटल इंडिया’ के चोली-दामन हैं। याद होगा साक्षरता अभियान जिसमें निरक्षरों को अज्ञानी नहीं कहा जाता था। अब तक जो साक्षर नहीं हो सकें है, उन्हें भी ‘डिजिटल इंडिया’ के लिए जैसे-तैसे तैयार किया जाएगा। कुछ साक्षर और बहुत पढ़े-लिखें यानी एम.ए.-बी.ए. पास देशवासी ऐसे है जो कहते हैं- मोबाइल पूरा चलना आता नहीं। बस फोन कर लेते हैं और उठा लेते हैं। एक लेखक ने लिखा कि उसे इंटरनेट पूरा चलना आता नहीं। बस महीने में एक-दो बार थोड़ा-बहुत देख लेता हूं। खैर जो भी जैसे भी स्थितियां हैं उन्हें नजर अंदाज करके जब भी कहीं डिजिटल इंडिया नाम आए तो हमें हमेशा ‘जिंदाबाद’ बोलना है। सिस्टम को सिस्टम में लाने और यह सिस्टम बनाने कंप्यूटर सिस्टम लगाना जरूरी है। गांब-गांव और गली-मौहल्ले में ऐसा सिस्टम इजाद कर दिया है कि अब कोई डिजिटल इंडिया को रोक नहीं सकता। कहने वाले कहते हैं कि भगवान साहूकार को बाद में पैदा करता है पहले चोर को दुनिया में भेजता है। डिजिटल इंडिया के चोरों को ‘हैकर’ नाम से भेजा गया है। जैसे भारत में साक्षरता अभियान अथवा सतत साक्षरता अभियान चला वैसे ही चोरी-छुप्पे ‘हैकिंग सीखो अभियान’ चल रहा है। नकली नोट छापने वाले और टैक्स चुराने वाले या फिर सीधा-सीधा कहें तो डिजिटल इंडिया को मुर्दाबाद करने वाले सक्रिय है।
मैं और मेरी पूरी मंडली ‘डिजिटल इंडिया जिंदाबाद’ के नारे लगाते-लगाते अपनी कुछ मांगे भी प्रस्तुत करना चाहते हैं। हमारी पहली मांग है- कैसे भी करो, कुछ भी करो पर हमें बिजली चौबीसों घंटे चाहिए। दूसरी मांग है- इंटरनेट की स्पीड को फुल्म-फार किया जाना चाहिए। गति में बिल्कुल समझौता नहीं होना चाहिए। हम हैं तो इक्कीसवीं सदी में और इंटरनेट की स्पीड़ अब भी सोलवीं सदी जैसी है। आती-जाती रहती है, कभी बीच में रुक-रुक कर आती है। तीसरी मांग है- जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से हम वंचित हैं। रोटी-कपड़ा और मकान की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। सो इन चिंताओं के बीच बिजली और इंटरनेट के बिल के बजट में कुछ जादू होना चाहिए। जैसे कि जीओ ने डाटा फ्री कर नया सिद्धांत लागू कर दिया है। वैसे ही बिजली चोरी करने को मूलभूत अधिकारों में शामिल कर दिया जाना चाहिए। चौथी और अंतिम मांग जरा मंहगी है- हमें दो जोड़ी आंखें और हाथ सरकार द्वारा उपलब्ध कराएं जाएं। ताकि दिन रात डिजिटल में खोए रहे तो बाद में नई जोड़ी की जरूरत पड़ेगी ही।
० नीरज दइया

14 मई, 2017

साहित्याकाश में दमकता दूज का चांद

समीक्षा : मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन सरोकार/डॉ.नीरज दइया 
हरीश बी.शर्मा


ह 2012 का जाता हुआ दिसंबर था, ‘गवाड़’ फाइनल हो चुकी थी और लोकार्पण के लिए तैयार थी। हमें याद है यह एक अभूतपूर्व लोकार्पण समारोह था जिसमें चार बाई दो की एक बड़ी किताब का लोकार्पण हुआ, यह किताब खुली तो उसमें से कुछ किताबें निकली। अतिथियों ने कृति ‘गवाड़’ का लोकार्पण किया। अपने समय का यह एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था और लोगों ने सोचा कि 1995 के बाद 17 साल हुए हैं, पहली बार मधुजी ने किताब लिखी है, अब  अगली कृति के लिए कम से कम 2017 तक का तो इंतजार करना ही पड़ेगा। लेकिन 2017 तक आते-आते उनकी कृतियों की संख्या चालीस हो चुकी है और हालात यह है कि 17 में 17 कृतियां आएंगी,ऐसे कयास लगाए जाने लगे हैं। और मैं नहीं भी कहूं, इस कार्यक्रम का संदर्भ भी नहीं हो तो क्या देश में जहां कहीं भी साहित्य या साहित्यिक गतिविधियों की थोड़ी-बहुत भी चर्चा होती है, उन्हें क्या यह बताना जरूरी है कि हम मधु आचार्य ‘आशावादी’ की बात कर रहे हैं?
यह सच है कि देश के साहित्यिक ठीयों पर बीकानेर का इन दिनों अगर कोई जिंदा रखे हुए है तो वह एक ही नाम है, मधु आचार्य ‘आशावादी’। पाटे, गलियों, दफ्तरों और अकादमियों के बाद कॉफी हाउस तक यह चर्चा है कि बीकानेर में एक व्यक्ति है, जो निरंतर लिख रहा है, छप रहा है और पाठकों का चहेता है। चर्चा यह भी है कि एक रामकिसन आचार्य नाम के पूर्व सरपंच ने तो इनके लिखने के जुनून को देखकर लोकार्पण समारोह के लिए एक रंगमंच बनाकर दे दिया है, जहां आयोजकों को सिर्फ फ्लैक्स और लोकार्पित होने वाली कृति लाने की दरकार है। जब ऐसी चर्चा देश-प्रदेश की राजधानी में होती है तो कौतुहल जागता है, कौन है वह, का सवाल उठना लाजिमी है तो कोई पुराना रंगकर्मी कहता है, ‘अरे अपना मधु...’, सारी बातों को सुन रहा कोई पत्रकार कहता है, ‘पत्रकार मधु आचार्य को नहीं जानते आप?, वही हैं।’
मधु आचार्य आशावादी का नाम आते हुए है बहु आयामी व्यक्तित्व हमारे सामने उभरता है। अपने ठेठ अंदाज, जिसे आप बीकानेर की मौलिक जीवन शैली जैसे शब्द से समझ सकते हैं, में मस्त रहने वाली एक शख्सियत। न ज्यादा गंभीर और न बड़बोलापन।
एक रंगकर्मी, एक पत्रकार, एक रचनाकार और एक ऐसा इंसान जो जरूरत पड़े तो ‘आउट ऑफ वे’ जाकर भी मदद करने से नहीं चूकता। लोग उन्हें मधु आचार्य ‘आशावादी’ के नाम से पहचानते हैं।
दुनिया में अपनी तरह के पहले पिता होंगे विद्यासागर आचार्य जिन्होंने अपने दोनों बेटों को कला-संस्कृति के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया और न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि सारी जिम्मेदारियों से मुक्त भी कर दिया। आनंदजी और मधुजी इन अपेक्षाओं पर खरे उतरे और इसके लिए किसी भी तरह के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
पूर्व महापौर भवानीशंकर शर्मा को गुरु मानने वाले और आलोचक-कवि डॉ.नंदकिशोर आचार्य से सदैव प्रेरित रहे मधु आचार्य के संबंध में एक ही बात उनके समूचे व्यक्तित्व को परिभाषित करती है और वह उनका धुन का पक्का होना है। रंगकर्म किया तो इतनी शिद्दत के साथ कि रंगजगत में बीकानेर का बोलबाला हो गया। बीकानेर को उत्तर भारत की नाट्य राजधानी कहा जाने लगा। पत्रकारिता में आए तो एक सामान्य सांस्कृतिक संवाददाता के रूप में और आज दैनिक भास्कर जैसे हिंदी के बड़े समाचार पत्र के कार्यकारी संपादक हैं और वह भी एक ही संस्करण में, लगातार 16 साल से। यह किसी भी अजूबे से कम नहीं है। साहित्य सृजन की बात आई तो लिखना शुरू किया और इतना लिखा कि पहले से लिख रहे लोगों को तो हैरत में डाला ही, नए लोगों को भय-मुक्त करने का कोम भी किया। उस धारणा को मिथ्या साबित किया कि अभिव्यक्ति कुछ लोगों का ही अधिकार है। साहित्य की हर विधा में कलम चलाने वाले मधु आचार्य की प्रतिबद्धता वरेण्य है। इसका एक उदाहरण देखिए कि एक दिन नाटककार-आलोचक डॉ.अर्जुनदेव चारण ने इतना ही कहा, ‘राजस्थानी में भी लगोलग लिखिया कर...’ और फिर राजस्थानी में भी लिखना शुरू कर दिया।
साहित्य अकादेमी का प्रतिष्ठित सर्वोच्च राजस्थानी पुरस्कार, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का मुरलीधर व्यास राजस्थानी पुरस्कार, टैस्सीटोरी पुरस्कार, पत्रकारिता का शंभूशेखर सक्सैना पुरस्कार, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का निर्देशन पुरस्कार और फिर बहुत सारे पुरस्कारों की फेहरिस्त में तीन नागरिक अभिनंदन भी अकेले मधुजी के नाम हैं,
लोगों का जीवन खप जाता है, एक नागरिक अभिनंदन भी नहीं होता, यह शहर मधु जी के तीन-तीन नागरिक अभिनंदन का साक्षी बना। 27 मार्च, 1960 को जन्मे मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने एमए के अलावा एलएलबी भी की लेकिन सक्रिय कला-संस्कृति के क्षेत्र में ही रहे। इस बीच भीष्म सहानी, अफसर हुसैन, त्रिपुरारी शर्मा, रेणुका इसरानी, मंगल सक्सैना और ऐसे ही बहुत सारे लोगों को काम करते हुए देखते रहे, सीखते रहे।
पत्रकारिता में आए तो दिग्गज राजनेताओं के साथ उनके संपर्क स्थानीय राजनेताओं के लिए परेशानियों का कारण बने। बीते तीन दशक में ऐसा कोई भी राजनेता नहीं होगा जिसके साथ मधु जी के संबंधों की मधुरता ने इस कयास को बल दिया कि मधुजी अगला चुनाव लडऩे वाले हैं।    
ऐसे व्यक्ति के सृजन-सरोकार क्या हैं, क्यों लिखता है यह आदमी? बल्कि क्यों इतना लिखता है यह आदमी? यह सवाल यक्ष-प्रश्न सा उभर रहा है। क्योंकि जैसा कि साहित्य की राजनीति के जानकार करते हैं, एक साल में एक ही किताब निकालते हैं या कसमसाहट बढ़ जाती है तो दो। दूसरी भी इस तरह कि पुरस्कारों की पंगत से किसी एक को नहीं निकाला जा सके। ज्यादा समझदार लोग तो यह भी जानते हैं कि पुस्तकों की सरकारी खरीद की प्रक्रिया की मियाद भी प्रकाशन-वर्ष से तीन साल की रहती है, काहे को ज्यादा लिखना? बेवजह बेदखल होने का कोई तुक भी तो नहीं है।
और इस तुकबंदी से दूर, अपनी मस्ती में सराबोर। अगर कोई लिख रहा है तो कुमार विश्वास के शब्द उधार लेते हुए कहूं तो कहूंगा कि ‘कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है, मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है...’
और इस धरती रूपी बेचैनी को समझने के लिए बादल का एक टुकड़ा डॉ.नीरज दइया के रूप में है। डॉ.नीरज दइया उस 2012 के दिसंबर से इस 2017 की मई तक लगातार यह समझने की कोशिश में है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ क्या लिख रहे हैं? सभी जानते हैं कि आलोचना विधा में डॉ.नीरज दइया किसी भी तरह के परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी आलोचना किसी का फॉलोअप नहीं होती, बंधे-बंधाए, कहें कि बने हुए फ्रेम में सैट नहीं होती, वे अपनी बात कहने के लिए किसी की दृष्टि को खुद पर हावी नहीं होने देते और अगर कोई यह कहता है कि आपने अपनी बात कहते हुए जब दस संदर्भ या व्यक्ति गिनाए तो दो गलत थे और तीन का उल्लेख आपने नहीं किया। तो वे मुस्कुरा कर कहते हैं मैंने जितना काम कर दिया, उसे अगर आप 60-70 प्रतिशत मानते हैं तो यह अच्छी बात है, बचा हुआ काम आप कर दीजिए, इस बहाने ही सही साहित्य का भला तो होगा। कहने का मतलब, अपनी दृष्टि को लेकर सदैव सजग और जिम्मेदार रहने वाले डॉ.नीरज दइया जब मधु आचार्य के सृजन सरोकारों पर चर्चा करते हैं तो एक लेखक को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है। यह अवसर आज जन-सामान्य को उपलब्ध हो गया है और स्थूल रूप में इस कृति के माध्यम से दिक-दिगंत तक रहेगा।
सामान्यतया इस तरह की किताबों की उपयोगिता एकेडमिक ज्यादा होती है, आम-पाठकों में इस तरह की किताबों का अधिक प्रचलन नहीं होता। लेकिन एक ऐसा लेखक जिसकी फैन-फॉलोइंग जबर्दस्त है और उनके लिए यह तय करना मुश्किल कि कौनसी किताब पढ़ी जाए, यह किताब उनके लिए सबसे अधिक कारगर सिद्ध होगी। इस किताब को पढऩे के बाद वे यह आकलन कर सकेंगे कि उन्हें पहले ‘गवाड़’ पढऩी है या ‘खारा पानी’। ‘सवालों में जिंदगी’ जैसे कहानी संग्रह से निकलना है या उपन्यास ‘हे मनु’ से आज के समय को समझना है।
यह किताब सिलसिलेवार मधुजी की किताबों के कंटेंट और कैरेक्टर पर चर्चा करते हुए पाठकों को अपनी प्रायोरिटी तय करने का अवसर प्रदान करती है। ‘मेरा शहर’, ‘अघोरी’, ‘अवधूत’, ‘उग्यौ चांद ढळयौ जद सूरज’, ‘इंसानों की मंडी’, ‘आकाश के पार’, ‘एट 24 घंटे’, ‘सुन पगली’, ‘आडा तिरछा लोग’, ‘आंख्या मांय सुपनौ’, ‘अमर उडीक’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’, ‘जीवन एक सारंगी’, ‘श से शायद शब्द’, ‘गई बुलट प्रूफ में’, ‘भूत भूत रौ गळौ मोसे’, ‘हेत रौ हेलो’, ‘एक पग आभै मांय’ में से कौनसी किताब उसकी पसंद की है, यह समझने का मौका देती है।
यह सच भी है कि आज जब एक महीने में एक किताब खरीदकर पढऩे की भी रवायत नहीं है, और फिर खरीद ली जाए तो पढऩे की फुरसत नहीं है, ऐसे दौर में चालीस किताबों को पढऩे के लिए समय निकालना हंसी-खेल नहीं है, ऐसे दौर में यह किताब मधुजी के उन प्रशंसक-पाठकों को,  जो कि पाठक बने ही सिर्फ मधु जी को पढऩे के लिए हैं, उन्हें एक अवसर देती है अपनी पसंद की किताबों का चयन कर लें और उस आधार पर पढऩा शुरू करें।
इसलिए मैं नीरज दइया जी की इस पहल का स्वागत करता हूं। पहले बुलाकी शर्माजी और फिर मधुजी के सृजन सरोकार पर आपने अपनी दृष्टि डाली है तो यह अपेक्षा भी है कि आप इस तरह दूसरे-दूसरे साहित्यकारों के सृजन-सरोकारों पर भी काम जारी रखेंगे, तब तक मधुजी शतक लगा चुके होंगे, काम इस तरह भी जारी रहेगा। 
इस किताब में आई नीरज जी की जिन चार-पांच बातों से मैं सहमत हूं, उनमें से एक, मधुजी का साहित्य नए पाठकों को जोडऩे का काम कर रहा है। दूसरा, उन्हें गद्य में अधिक लिखना चाहिए। तीसरा, लेखक का धर्म पाठकों के लिए लिखना है। चौथा, मधुजी के हिंदी और राजस्थानी लेखन में किसी तरह का घालमेल नहीं है। पांचवी बात, मधुजी के साहित्य में नाटकीय संवादों का बोलबाला रहता है और यही बात उन्हें सीधे पाठकों से जोड़ती है। हालांकि इसके साथ ही मधुजी नाटक कब लिखेंगे? आलोचना में काम क्यों नहीं कर रहे हैं? जैसे सवाल भी उठाए जाते हैं, यह लाजिमी भी है। जो काम करते हुए नजर आएगा, उसी से अपेक्षाएं होंगी लेकिन क्या यह कम नहीं है कि अभी तक मधु जी मन का लिख रहे हैं और जब तक मन का लिख रहे हैं, उन पर अपेक्षाओं का लदान नहीं करना ही ठीक है। फिलहाल तो इतना ही ठीक है कि उनके लिखने से नए लोगों को प्रेरणा मिल रही है, लोगों में लिखने की हूक जागने लगी है।
संभव है कि उन्हें यह लग रहा हो कि बहुत नाटक किए, लेखन की शुरुआत ही समीक्षा से की थी तो नाट्य लेखन या आलोचना के क्षेत्र में बाद में काम करेंगे। साहित्य की इतर विधाओं में खुद को परखा जाए। और इस रूप में वे यहां प्रयोग भी तो कर रहे हैं।
एक जगह स्वयं डॉ.दइया उनके उपन्यास ‘हे मनु!’ पर चर्चा करते हुए यह कहते हैं कि उपन्यास के अनेक घटक यहां अनुपस्थित हैं। इस अनुपस्थित के विस्थापन हेतु नवीन घटक एवं संस्थापनाएं यहां उपस्थित हैं। इस तरह मधु जी ने उपन्यास के जड़ होते जा रहे फार्म में नई संभावनाओं को देखा है।
इस रूप में कहा जा सकता है कि बीकानेर के साहित्यकाश में चंद्रजी के जाने के बाद जो एक वैक्यूम नजर आने लगा था, उसे भरने की दिशा में मधुजी का सृजन संभावनाओं से सराबोर है। हालांकि मधुजी अपने सृजन को अखबार या मैगजीन में फैलाने के पक्ष में कभी नहीं रहे हैंं लेकिन बीकानेर के साहित्याकाश में दमकता यह दूज का चांद दुनिया की नजर में है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
नीरज जी ने मधु जी के बहाने बीकानेर ही नहीं बल्कि देश-दुनिया के साहित्य सृजन की पंरपरा पर जो बात की है, वह पाठकों की समझ को विकसित करने के लिए एक समयोचित प्रयोग है। बहुत ही सहजता से डॉ.दइया मधुजी की बात करते हुए जब प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणू, गुलशेर शानी, निर्मल वर्मा आदि से होते हुए राजस्थान और राजस्थानी के साहित्यकारों के सृजन और दृष्टि की बात करते हैं तो न सिर्फ डॉ.दइया के अध्ययन पर गर्व होता है बल्कि मधुजी की सृजन-दृष्टि के विस्तार का भी पता चलता है।
‘घर रा जोगी जोगिया...’ कहावत हम सभी की त्रासदी है। हम व्यक्ति का आकलन उसके व्यवहार से करते हैं और इस रूप में मधु जी इतनी सहजता से लोगों से बात करते हैं कि यह अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि इस व्यक्ति के अंदर संवेदनाओं का इतना गहरा सागर हिलोरे मार रहा है। इस सागर की गहराई को मापने का यह प्रयास स्तुत्य है। इस किताब से मधुजी की गहराई को समझने का जो अवसर नीरज दइया ने उपलब्ध करवाया है, हम बीकानेर के नागरिक उनका नागरिक अभिनंदन करते हैं। वस्तुत: यह एक शोध दृष्टि है और उस शोधार्थी के लिए चुनौती, जो कालांतर में मधु आचार्य पर शोध करने का बीड़ा उठाएगा।
और सबसे अंत में एक बार फिर से आभार नीरज दइया जी का कि इस किताब को समर्पण करने के लिए उन्होंने सबसे सही नाम चुना। यह कृति वत्सलमयी मातृस्वरूपा चेतना भाभीजी और प्रिय युग को समर्पित है।
आदरणीया चेतना भाभीजी वास्तव में मधुजी की चैतन्य ऊर्जा है। नीरजजी, आप बड़े आलोचक माने जाते हैं लेकिन अगर आपको मधुजी के सृजन संसार का अवलोकन करते हुए आलोचना के लिए ज्यादा नहीं मिला है तो इसका कारण चेतना भाभीजी ही हैं, जिनकी पारखी नजर से निकलकर ही यह मधु-कर्म जन तक पहुंचता है।
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मधु आचार्य `आशावादी' के सृजन-सरोकार (2017) डॉ. नीरज दइया ; अवरण : कुंवर रवीन्द्र ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ISBN : 978-93-82307-70-9 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर (राजस्थान) 334001

10 मई, 2017

जुल्म-ए-जलसा

ब्द और साहित्य की दुनिया मुझे सदा ही भ्रमित करने वाली लगती है। वैसे कहने वाले कहते हैं कि शब्द और साहित्य हमारे भ्रम को दूर करने वाली दुनिया है। मैं जान नहीं पा रहा हूं कि फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? अब ‘जलसा’ शब्द को ही लिजिए। मुझे लगता है कि जलसा यानी जो जल सा है। पानी जैसा जो हो उसको जलसा कहना चाहिए, पर इसका अर्थ कुछ दूसरा ही है। जलसा अथवा कोई भी शब्द कहां से आया है यह भी हैरान करने वाली बात है। कहते हैं हिंदी में खुद के शब्द तो बहुत कम है। अन्य भाषाओं से बहुत से शब्द हिंदी ने ग्रहण कर लिए हैं। उर्दू, फारसी, अरबी और यहां तक चीनी जैसी विदेशी भाषाओं को भी नहीं छोड़ा। हिंदी अगर भारतीय भाषाओं से शब्द लेती है तो यह उसका निजी मामला है। ‘जलसा’ शब्द जो मुझ पर जुल्म ढाने वाला बना है, उसका यहां असली अर्थ साहित्य की दुकान है। हर जगह साहित्य की अपनी-अपनी दुकाने हैं। जो संस्थाजीवी लोग हैं वे कार्यक्रम करवाते हैं और हमारा भाग्योदय होता है। इन कार्यक्रमों में हम आमंत्रित होते हैं। ऐसे कार्यक्रम में भोजन अथवा अच्छा नाश्ता हो तो ‘जलसा’ शब्द काम में लेना सार्थक होता है। जलसा यानी ऐसा आनंद जिसमें पेट का फायदा हो। कहना-सुनना तो होता ही रहता है। असली आनंद तो आस्वाद का है। साहित्यिक रस का असली आस्वाद यहीं से आरंभ होता है। आरंभ में मैंने जिस ढंग से शब्द और साहित्य के भ्रम का जिक्र किया, उसका एक उदाहरण तो यही है कि आपको इस पंक्ति तक ले आया हूं और आप जुल्म को खोज रहे हैं।
    जुल्म यह है कि आप को किसी जलसे का बुलावा हो और आप सब बातों-चर्चाओं से दूर सीधे भोजन अथवा नाश्ते से ठीक पहले उपस्थित होकर जलसे का मान रखें। जुल्म यह है कि कार्यक्रम को नियत समय पर आरंभ नहीं कर के श्रोताओं और मंच के अतिथियों के इंतजार में जो पहुंच गए उनका धैर्य-परीक्षण करते रहें। जुल्म यह है कि कार्यक्रम में विषय पर बोलने के स्थान पर ज्ञान की उल्टियों से इतनी बदबू फैला दें कि श्रोता बिना नश्ता-भोजन किए ही घर जाने का निर्णय करने पर विवश हो जाएं। जुल्म यह है कि आपको जिसने मंच दिया है, उसी की बखिया उधेड़ने का सिलसिला आरंभ किया जाए। कहां तक बताएं भैया, जल्मों की लंबी और अलग-अलग दास्तानें हैं। जुल्म यह है कि दो-तीन घंटे कार्यक्रम को ऐसा घसीटा जाए और बाद में रहस्य खुले कि केवल चाय बिस्किट है। जुल्म यह है कि एक जलसे को कराने का इतना खर्चा होता है और अखबार वाले चार लाइनों की खबर छापते हैं। बड़े बड़े जलसों में वक्ताओं द्वारा कहा कुछ जाता है और अखबारों में लिखा कुछ जाता है। साहनुभूति से सोचिए कि आयोजक को कोई जलसा करना होता है तो कितनी तैयारियां करनी होती है। निमंत्रण पत्र लिखो, छपवाओ। बैनर बनावाओ, हॉल बुक करो। खान-पान विभाग के साथ मंच के अतिथियों के आने-जाने और ठहरने आदि की अनेक व्यवस्थाओं में धन के साथ मानव श्रम का हिसाब-किताब जलसा पूरा होते-होते जल्मों की पूरी गाथा बन जाता है।
    पंच काका कहते हैं कि जलसा होना चाहिए पर बेहद सादगी के साथ। आज तक हुए अनगिनत जलसों ने इतना जुल्म ढाया है अब तो जलसों पर ही जुल्म करने का जमाना आ गया है। कोई जलसा करना हो तो उसे गुपचुप तरीके से किया करो। कहने वाले कहेंगे कि गोथली में गुड़ फोड़ लिया। कहने-सुनने वालों की परबाह नहीं। आप तो बस मंच पर जितने जो चाहिए उनको खबर करो। गिने-चुने अपने आत्मीयों को बुलाओ और बंद कमरों में जलसा करो। इस नाटकीय जलसों के फोटो और घड़िये जारी कर दो। घड़िये यानी झूठे समाचार। इसी को तो कहते हैं कि हिंग लागे ना फिटकरी, रंग आवे चोखा।
० नीरज दइया
 

05 मई, 2017

आत्मीय और सारगर्भित गंभीर टिप्पणी

बुलाकी शर्मा हिंदी और राजस्थानी के सिद्धहस्त लेखक हैं; कृतित्व में अनेक आयामों को समेटे हुए, जागरूक और निर्भीक लेखक। शब्द उनके साथी हैं और आयुध भी। उनके सरोकारों का दायरा व्यापक है। उनकी जीवन-यात्रा ऋजुरेखीय नहीं रही है। वे घुमावदार पेचीदा मोड़ों से गुजरे, जद्दोजहद की और गर्दिश व अच्छे दिनों में रचनाकर्म में यकसां शरीक रहे। नौकरियां छूटी, मगर शब्दों से उनका संग-साथ कभी न छूटा। उन्होंने बाबूगीरी की, अध्यापन किया, लघुकथा तथा कहानियां लिखीं, व्यंग्य-लेखन किया, स्तम्भ-लेखन किया और संपादन किया और आज वे राजस्थानी के लेखन के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। सच तो यह है कि यह प्रतिष्ठा अब वे ‘साठा-पाठा’ होने के वर्षों पूर्व अर्जित कर चुके हैं। समकालीन राजस्थानी व्यंग्य और कहानी की गाथा भाई बुलाकी शर्मा की चर्चा के बिना अधूरी रहेगी।
डॉ. नीरज दइया ने ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ लिख कर एक सामयिक, जरूरी और बड़ा काम किया है। नीरज का बुलाकी भाई से परिचय अपने पिता और राजस्थानी व्यंग्य के पितामह सांवर दइया के समय यानी बालपने से है। वे अपने अग्रज लेखक के जीवन-संघर्ष, स्वभाव, लेखन-कौशल, आचार-विचार, अंतर्दृष्टि, वरीयताओं और उपलब्धियों से गहरे परिचित हैं। बुलाकी और नीरज में बड़ा साम्य यह है कि एक तो दोनों ही बहुआयामी शब्द-शिल्पी हैं, दूसरे लहरों को ऊपर ही ऊपर छूने के बजाए दोनों ही लहरों में गहरे धंस कर अतल गहराइयों से मूल्यवान शंख, सीपियां, मुक्ता और प्रवाल बटोर कर लाते हैं। अपनी इस कृति में नीरज ने अत्यंत आत्मीयता, धैर्य और गंभीरता से बुलाकी भाई के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊतकों (तंतुओं) को इस तरह उद्घाटित और चित्रित किया है कि बुलाकी शर्मा को न जानने वाले बुलाकी शर्मा को जान सकें और उन्हें जानने वाले और ज्यादा और और गहरा जान सकें। बुलाकी के अंतरंग को बूझने में नीरज सफल रहे हैं। अपने समकालीन और मित्र लेखक के बारे में लिखना नितांत जोखिम का पर्याय है, किंतु नीरज बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने कृति को प्रशस्ति या ‘चालीसा’ नहीं होने दिया है। मुमकिन है कि कतिपय जन उनसे अहसमति व्यक्त करें, जब वे बुलाकी शर्मा को प्रथमतः कहानीकार करार देते हैं। बरहाल नीरज ने बुलाकी भाई के बहाने अंशतः आधुनिक राजस्थानी कहानी और व्यंग्य का इतिहास लिख ड़ाल है।
इन पंक्तियों को लिखते हुए कृति के नायक और कृतिकार दोनों के अक्स मेरे जेहन में बराबर और बरबस उभर रहे हैं। गौर और श्याम वर्ण इस युग्ल के चेहरों की मैं बिना मुस्कान के कल्पना भी नहीं कर सकता। दोनों जब भी दिखें- सस्मित दिखें, दोनों का यह बांकपन इस कृति में भी है। रुसी में कहूं तो बुलाकी ऊ नास अद्ना.... बुलाकी तो बस एक ही हैं अनूठे और अद्वितीय। बुलाकी भाई के सरोकार और विकसे, कलम और निखरे और भाई नीरज दइया हमारे समय के रचनाकारों को इसी तरह साहसपूर्वक शब्द चित्रित करते रहें, यही शुभेच्छा और हार्दिक बधाई।
 - डॉ. सुधीर सक्सेना
प्रख्यात कवि-संपादक
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बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (2017) डॉ. नीरज दइया ; अवरण : कुंवर रवीन्द्र ISBN : 978-93-82307-69-3 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003 ; पृष्ठ : 88 ; मूल्य : 200/-
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04 मई, 2017

वीआईपी की खान भारत

ब भारत में ‘आम आदमी’ नामक प्रजाति दुर्लभ और लुप्तप्राय हो गई है। पहले ही आम आदमी को लेकर बहुत समस्या थी। अब तो इस समस्या पर सोचना ही बेमानी हो चला है। हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी ने कह दिया है कि अब हर भारतीय खास और वीआईपी है। मैं किसी दूसरे की बात क्यों करूं, कोई भी काम खुद से ही आरंभ करना चाहिए। चलिए दूर हटिए अब मैं खुद जो कुछ कुछ आम आदमी था अब आज और अभी से खास हो गया हूं। आम आदमी की तरह साधारण जीवन जीते हुए जो सादा जीवन उच्च विचार में यकीन किया करता था आज से बंद। जब प्रत्येक भारतीय खास और वीआईपी घोषित हो चुका है, तब मैं भला पीछे क्यों अटका रहूं। यह मैंने जब सुना, तभी से मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। खुद को खास और वीआईपी मानते ही नजारे ही बदल गए। सोचा जब खुद को वीआईपी माना जाए तो लोगों को दिखाने के लिए कुछ खास करना जरूरी है। भारत में लाल बत्ती वीआईपी कल्चर की निशानी मानी जाती थी, लेकिन उसे तो बंद कर दिया गया है। अब जब भारत का प्रत्येक लाल ही वीआईपी है तब लाल बत्ती किस काम की। इतिहास गवाह कि लाल बत्ती के नजरे को सर्वप्रथम कबीर ने पहचाना और लिखा- लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल/ लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल। कवीर का यह रहस्य इस रूप में उद्घाटित हुआ कि सभी भारतीय लाल हैं और खास-वीआईपी लाल-लाली देखते रहो।
    कोई कार्यक्रम करते थे तब पहले वीआईपी की बहुत समस्या होती थी। उनके पास समय होता नहीं था और वे यह समझ लेते थे कि हमारे पास खूब समय है। हमें खूब चक्कर काटने पड़ते थे। अब जब सभी वीआईपी हो चुके हैं तब भी कार्यक्रम में समस्या आ रही है कि किस-किस वीआईपी को मंचस्थ किया जाए। फिलहाल तो सभी मंच गायब करके बस एक ही वीआईपी मुझे ठीक जच रहा है और वह हूं मैं खुद। किसी भी कार्यक्रम में मैं यानी हम मंचस्थ हो जाते हैं, कोई आता है तो उसे भी मंचस्थ कर लेते हैं। आवश्यकतानुसार मंच का आकार-प्रकार बढ़ा लिया जाता है। कुतर्क करने वाले पहले भी थे और अब भी हैं। वे कम नहीं है, पूछते हैं कि श्रोता और दर्शक कहां है। उन्हें अव कौन समझाएं कि खास और वीआईपी भला क्या कभी श्रोता और दर्शक बनते हैं? यह राज की बात है कि अब किसी को श्रोता अथवा दर्शक समझने की भूल कर लेते हैं तो वह भाई-बहन अपनी कथा और साथ मधुर संबंध इति कर लेता है। अब जब हाईकमान ने प्रत्येक को खास और वीआईपी बना दिया, तो क्या यह नियम का उल्लंधन नहीं होगा कि हम किसी को आम आदमी समझें? हमें इतने बड़े और महान नियम को भंग नहीं करना चाहिए।
    दूसरे देशों में अब तो हम भारत से वीआईपी निर्यात कर सकते हैं। कितना अच्छा होगा कि हमारे देश के वीआईपी विश्व के कौने-कौने में पहुंच कर बिगुल बजाएंगे। हमारा अखिल विश्व पर राज्य हो जाएगा। जहां भी जिस किसी दिशा अथवा एंगल से विश्व पटल पर नजर दौड़ाएंगे तो बस हर तरफ भारतीय ही भारतीय नजर आएंगे। हमारे देश के वीआईपी दूसरों की तुलना में अधिक समन्वयवादी रहेंगे इसलिए वे अधिक लोकप्रिय रहेंगे। जाहिर है कि अब हमारी पांचों अंगुलियां घी में है जनाब। मगर पंच काका है जो  कहते हैं कि ये सब नाटक और ढकोसला है। भैया दुनिया एक रंगमंच है..... और हम सब इसकी कठपुतलियां... जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है...कब-कौन-कैसे उठेगा... कोई नहीं जानता.... हा हा हा.. बाबु मोशाए... वीआईपी की खान भारत तो तो गया पर अब मुठ्ठी भर पूर्व वीआईपी सारे नवजात वीआईपियों को मारेंगे।
० नीरज दइया
 

27 अप्रैल, 2017

राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी : देवकिशन राजपुरोहित

बातचीत / डॉ. नीरज दइया

     श्री देवकिशन राजपुरोहित एक ऐसा नाम है जिनके परिचय में कुछ कहा जाना इसलिए जरूरी नहीं है कि उनके बारे में हम सब बहुत कुछ जानते हैं। बहुत कुछ जानते हुए भी उनके अनेक पहलुओं से हम अब भी अनजान हैं। आपकी लंबी साधाना के अनेक मुकाम है। शिक्षा विभाग में शिक्षक, बाद में पत्रकार और संपादक के साथ यायावरी का आपको लंबा अनुभव है। राजस्थानी और हिंदी की विविध विधाओं में विपुल साहित्य सृजन करते हुए अनेक दौर आपने ना केवल देखे-सुने वरन अनुभूत किए हैं। कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, संस्मरण आदि में सृजनरत रहते हुए वे देश-प्रदेश की राजनीति, समाज और साहित्य के अनेक पक्षों के गंभीर जानकार के रूप में पहचाने गए हैं। आपने लोक साहित्य और संस्कृति का विशद अध्ययन, मनन और चिंतन किया है। देश-विदेश की अनेक यात्राएं की हैं तो आप राजस्थानी भाषा के प्रवल पैरोकार और प्रखर वक्ता हैं। छद्म और आड़म्बर से परे सदा खरी-खरी बात कहने वाले आप समालोचक हैं। मीरा के जीवन और साहित्य पर काम करने वाले विशेष विद्वानों की श्रेणी में आपकी गणना देश में कोटी के शोधकर्ता के रूप में की जाती हैं, इन सब से परे आप हमारे ऐसे आत्मीय पुरखे है जो सभी छोटे, बड़े और अपने समव्यस्कों पर समान रूप से स्नेह और आत्मीयता की वर्षा करते हुए अविस्मरणीय-अद्वितीय इंसान है। हमारे आग्रह पर ‘मरु नवकिरण’ के लिए खास तौर से एक संवाद कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने राजपुरोहित जी से किया है। यहां प्रस्तुत है चयनित अंश। -संपादक

० इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?
- लिखे बिना किसी भी लेखक का जीना संभव नहीं। वह अगर लेखक है तो उसे अपना लेखन जीवित रखना चाहिए। इन दिनों में व्यंग्य लिख रहा हूं, कुछ विषयों पर स्वतंत्र निबंध लिखें हैं तो इन दिनों कुछ समसामयिक निबंध भी मैंने लिखे हैं। कुछ छपे हैं पत्र-पत्रिकाओं में और कुछ छपने वाले हैं।
० आप अनेक विधाओं में सृजनरत रहे हैं तो जाहिर है कि एक जिज्ञासा है कि आपकी प्रिय विधा कौनसी है?
- लेखक की प्रिय विधा जैसा कोई विचार मैंने नहीं किया। मैं या कोई भी लेखक जिस समय जिस विधा में काम करता है वह उसकी प्रिय विधा ही होती है। लगभग सभी विधाओं में काम करते हुए मैंने अपने लेखन से प्रेम किया है। विधाएं मेरी प्रिय रही हैं फिर भी अगर इसका जबाब ही देना हो तो मैं अपनी प्रिय विधा के रूप में उपन्यास, संस्मरण और व्यंग्य का नाम लेना चाहूंगा।
० आप को क्या कहलाना पसन्द है- आपके अनेक रूप हैं- पत्रकार, संपादक, साहित्यकार, व्यंग्यकार, हिंदी लेखक, राजस्थानी रचनाकार, गुरूजी, फिल्मी कलाकार, दाता अनेक नाम हैं। आप बहुत से क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं।
- इन सब रूपों में तो मैं हूं ही लेखन इन सब से पहले मैं एक संवेदनशील इंसान के रूप में खुद को पाता हूं। मुझे घर-परिवार और देश-दुनिया की बहुत सी बातें प्रभावित करती है। मैं अपसंस्कृति और विकृत होती मानसिकता से बहुत आहत होता हूं। मैं कोई योद्धा या नेता तो हूं नहीं। अब राजा-महाराजा का युग भी चला गया। ऐसे में किसी परिवर्तन के लिए कोई एक आदेश कहीं से जारी नहीं हो सकता। मेरे पास मेरे शब्द हैं जो मैं एक साहित्यकर और पत्रकार के रूप में काम में लेता रहा हूं। मैं असल में अनेक रूपों में खुद के भीतर एक साहित्यकार और पत्रकार को सदा महसूस करता हूं। मेरा संपादक होना भी इसमें सामिल है। वैसे फिल्मी कलाकार आदि के रूप में कभी कार्य कर लेना तो केबल रूचि है।
० भाषाओं की बात करें तो आप खुद को हिंदी साहित्यकार कहेंगे या राजस्थानी साहित्यकार?
- पहले राजस्थानी और बाद में कोई दूसरा। राजस्थानी हमारी मातृभाषा है। मां का दर्जा कोई नहीं ले सकता। मां आखिर मां होती है और हरेक की होती है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। मां भाषा राजस्थानी से रक्त का संबंध है तो हिंदी ने हमें संस्कार और रोजी-रोटी दी। दोनों का ही ऋण है। राजस्थान तो नमक के लिए विख्यात है कि हम राजस्थानी हिंदी की अवमाना कर ही नहीं सकते हैं। देशभक्ति और स्वाभिमान हमारे रक्त में है।
० आपने पहले राजस्थानी में लिखा या हिंदी में?
- जिसे लिखना जैसा कुछ कहा जा सकता है तो वह राजस्थानी में ही लिखा। राजस्थानी से ही मैंने हिंदी को सीखा। आगे चल कर राजस्थानी से ही बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान कराया। राजस्थानी में पत्रकारिता का सपना देखा। काम भी किया। किसी काम की सफलता और असफलता से बड़ी बात मैं किसी काम को अंजाम देने को मानता हूं। पत्रिकारिता के इतिहास जब कभी लिखा जाएगा उसमें ‘मरुधर ज्योति’ पत्रिका की चर्चा जरूर होगी। राजस्थानी के लिए दिन-रात एक किया है। भाषा, साहित्य के काम के लिए ना दिन देखा ना रात। पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूं इसलिए कह सकता हूं कि दिन-रात कुछ नहीं होता बस काम ही काम होता है। दुनिया जब सोती हैं तब पत्रकार और लेखक जागते हैं।   
० आप एक पत्रकार और साहित्यकार के लेखन में क्या कोई अंतर पाते हैं?
- अंतर इन दोनों के लेखन के जीवन को लेकर है। पत्रकारिता में लिखा हुआ शब्द समय विशेष तक जिंदा रहता है। आज का अखबार कल बासी हो जाता है। पत्रिकाएं जब नई पत्रिका आ जाती है तो पुरानी हो जाती है। साहित्य में कालजयी साहित्य टिका रहता है। किताब कभी पुरानी नहीं होती। आज का अखबार पांच-दस वर्ष बाद फिर से नहीं प्रकाशित होता जब कि किताबों के नए संस्करण प्रकाशित होते हैं। लोकप्रियता लेखन की लंबे समय तक रहती है। मेरा मानना है कि जो सामयिक और अच्छा लिख पाते है वे पत्रकार ही साहित्य-लेखन में सफल होते हैं। जो खुद को केवल खबरों तक सीमित रहते हैं, वे केवल पत्रकार ही रहते हैं।
० अपने लेखन के विषय में क्या कहना चाहते हैं?
- मैं वर्ष 1967 से निरन्तर लिख रहा हूं। नवरात्रि 2017 में मेरे लेखन के 50 वर्ष पूरे होंगे। मैं सबसे पहले नवज्योति में 1967 में छपा था। मुझे याद है तब भी नवरात्रि ही चल रही थी। अब तक मेरी 65 पुस्तकें आ चुकी है। आगमी दिनों में एक बड़ा अभिनंदन कार्यक्रम और ग्रंथ मित्रों द्वारा प्रस्तावित है।
० राजस्थानी की मान्यता के विषय में आपका क्या मानना है?
- मैं तो राजस्थानी के सुनहरे भविष्य को देखता हूं। पूरे दावे के साथ कह रहा हूं कि राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी। आज नहीं तो कल इस भाषा को मान्यता देनी ही पड़ेगी। मान्यता देने में देरी कर सकते हैं पर इसे मान्यता मिलना अटल है।
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दो नंबर की बही

खुद को सभी नंबर वन मानते हैं और चाहते है कि सदा-सदा के लिए वे नंबर वन पर ही बने रहें। जिंदगी के खेल में पास-फेल का सिलसिला चलता है। जैसे धूप-छांव वैसे ही नंबर वन-टू। अंधेरे के साथ उजाला जरूरी है और काले के साथ सफेद। जीवन में इसी विरोधाभास के कारण गति है। वन-टू का फोर करने वाले गति को पसंद करते हैं। गति कैसी भी हो, संतुलन की मांग करती है। हमारा सार्वजनिक जीवन वन है तो निजी जीवन टू है, इन दोनों के बीच संतुलन होना फोर है। सेठ हीरालाल जी सर्दियों के मौसम में अपने कोट की एक जेब में चना-चबेना, मूफली और दूसरी जेव में काजू-बिदाम, किसमिस रखा करते थे। उसका संतुलन यह था कि कोई उन्हें देखता अथवा मिल जाता तो वे सेठजी बन कर काजू-बिदाम की जेब से अपना सार्वजनिक जीवन उजागर करते, और निजी जीवन में वह चने-चबेने, मूफली से काम चलते। मूल बात यह है कि हम जो असल में होते हैं, वह असल में दिखना पसंद नहीं करते हैं। असल में हैं चोर, और बन कर घूमते हैं साहूकार। झूठे-मक्कार लोग सदा हरीशचंद्र का मुखौटा लगाए घूमना चाहते हैं। दागी बेदाग दिखाना चाहते हैं। कुछ मुखौटे इतने पुराने हो चले हैं कि अब उनके असली चेहरा खुद-ब-खुद झांकने लगे हैं।
जीवन के हिसाब-किताब की दो बहियां होती है। एक असली, दूसरी नकली। एक में काला धन और दूसरी में सफेद धन। हमारे निजी जीवन में वैसे ही बहुत कुछ काला होता है, जिसे हम सफेद करते हैं। करना चाहते हैं। कला छिपाना कला है। ठीक वैसे ही जैसे दो नंबर को एक नंबर करना। लेखक ईनामदार होते हैं, उनके काले-सफेद और सफेद-काले के चक्कर होते हैं पर ऐसा करने में उनकी आत्मा लहूलुहान हो जाती है। लेखक होना यानी एकदम सच्चा और ईमानदार होना है। लेखक से बेईमानी की उम्मीद किसी को नहीं होती। ना पक्ष और ना विपक्ष को। अगर लेखक ही बईमानी करने लगा, तो समाज का क्या होगा? नैतिक शिक्षा कौन देगा? लेखक का भ्रष्ट होना पूरे समाज और तंत्र का भ्रष्ट होना है। इसलिए लेखक का सदा स्वच्छ रहना और बेदाग होना जरूरी होता है। लेखक स्वच्छ हो, या नहीं हो, वह स्वच्छ दिखना चाहिए। धुला-धुला, निरखा-निखरा। उसका काम समाज की गंदगी और बुराइयों को दूर करना है। वह खुद मैला-कुचैला या ऐसा-वैसा कैसे हो सकता है? अगर वह गंदा और बुरा हो जाएगा तो उसे लेखक कौन कहेगा! प्रेमचंदजी ने लेखकों को बहुत पहले ऐसी मशालें हाथों में थमा दी कि उन्हें तब से अब तक सदा आगे चलने वाला ही माना जा रहा है। वे समाज को रोशनी दिखाने वाले हैं। महानता का लबादा पहने हुए हमारे लेखक भले थक जाए पर उन्हें आगे ही चलना है। लेखकों का यह फर्ज है कि वह बुरे को अच्छा देखे और उसे अच्छा बनाकर प्रस्तुत करे। बुरे को बुरा कहने की सामाजिक मानसिकता बदल चुकी। क्यों कि जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये। इसलिए बुरा कहीं है ही नहीं। यह भी कितना नेक और पवित्र विचार है कि यदि करनी है तो बुराई से नफरत करो, बुरे से नहीं। अस्तु बुरा यानी नंबर टू तो सदा प्यार के काबिल है। फिर दो नंबर बही को एक नंबर की बना देना ही कला है। हमें दो नंबर को असली कहना है। लोगों का क्या है, लोग तो वही मानेंगे, जो हम कहेंगे।
पंच काका कहते हैं कि नकली को असली जैसा प्रस्तुत करना ही वर्तमान समय की कला है। बही कैसी भी हो वह सदा नंबर वन ही होती है। नंबर टू तो दिखाई नहीं जाती। धन काला हो या सफेद, उस पर उसका नाम काला या सफेद नहीं लिखा होता। नोटों की माया इतनी मोहक होती है कि उसकी बढ़त में बुरे से बुरा अच्छा हो जाता है। लक्ष्मी में इतनी शक्ति है कि वह स्वयं तो पूजनीय है ही, साथ ही वह जहां और जिसके पास रहती है उसे भी पूजनीय बना देती है।

 ० नीरज दइया


 

19 अप्रैल, 2017

सबकी अपनी-अपनी दुकानदारी

ह नाहक दुख की चर्चा क्यों है? अभी तो हमारे अच्छे दिन है। यह संसार सुखी लोगों से भरा पड़ा है। सुखी लोग यानी- खाने और रोने वाले लोग। जागने वाले और रोने वाले लोग सुखी नहीं होते। जिनके भाग्य में जागना और रोना लिखा है ऐसे दुखी लोग गिनती के होते हैं। यह उनके भाग्य की बात है। कर्मों का लेखा है। इस रहस्य को वर्षों पहले कबीरदास ने उद्घाटित किया- ‘सुखिया सब संसार है, खावे और सोए। दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए।’ जागने वाला और रोने वाला कोई कबीर सरीखा बिरला व्यक्ति होता है। आज सब की अपनी-अपनी दुकानदारी है, कोई कबीर जैसा कहां है। दुकानदारी के चलते सभी खाते हैं और सो जाते हैं। कौन भूखा है, यह सोचने-जानने की जरूरत किसे है? हमने जब खा लिया और चैन से सो लिए, तो हिसाब यही कहता है कि अपनी दुकानदारी में लगे रहें। अपने खाने और सोने की चिंता करना ही अच्छे दिन होते हैं। दुखिया दास कबीर पहले एक थे। अब बढ़ कर कितने हो गए होंगे। ऐसे दासों की परवाह सुखिया संसार के प्राणियों को बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। बात जब खाने की चली है तो जैसे किसी ने दुखती रग पर हाथ रख दिया है। क्या बताएं भैया, बुरा हाल है। खाना सबका अपना-अपना निजी होता है। किस घर की देगची में क्या पक रहा है, इसकी चर्चा बाजार तक जा पहुंची है। यह हमारी निजता पर हमला है। व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है। कबीर कभी मारे नहीं जा सकते हैं। वे मर भी जाते हैं तो उनका रोना जारी रहता है। उस आसन को कोई दूसरा संभाल लेता है। हमें क्या खाना है और क्या नहीं खाना, इस पर गहन चिंतन-मनन किया जा रहा है। क्या हम नहीं जानते कि शाकाहार स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। वनस्पति और जीव-जंतु दोनों की जान में अंतर होता है। देश की एकता और अखंडता विषय पर महाकवि दिनकर ने चिंतन करते हुए लिखा कि शाकाहार को राष्ट्रीय आहार के रूप में पूरे देश में अपनाया नहीं जा सकता है। कवयित्री मीरा कहती हैं- ‘भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई!’ जगत को देख कर मीरा को रोना पड़ा पर कबीर तो रोते हुए जागते रहे। उन्हें नींद नहीं आई। उनका रोना किसी ने नहीं देखा। इसलिए उन्होंने इस सच्चाई को लिख दिया। एक युग मीरा का था तब सभी लोग भगत नहीं थे। एक युग आज का है तब भी सभी लोग भगत नहीं हैं। इस जगत में भगवा धारण किए हुए कुछ भगत हैं, तो कुछ बिना भगवा के भी भगवा के भगत हैं। बाकी बचे हुए रंग-बिरंगे जगत के लिए भी अपनी दुकानदारी है। यहां दो पाट दो दुकानदारियों के हैं। लगता है कि अब साबुत नहीं बचेंगे। दुकानदारी का यह चक्कर है कि एक चालू और चलती दुकान में जो सामान है, नियम बना दो कि वही बेचा जाएगा। बाकी सभी दुकानदारियां फेल हैं, सारी बेकार है। आप सुखी संसार में खाना और सोना चाहते हैं तो कबीर की बात मान लो। किसी बिल में एक बिल पास हुआ मान लिया जाए कि जगत की सारी दुकानें आज से घास बेचा करेंगी, जिसको खाना हो खाओ। अच्छे दिन हैं कि सभी घास खाएं और रोएं। माना कि आपने आज तक घास नहीं खाया तो क्या आगे भी नहीं खाएंगे। हम घास खिला के रहेंगे। पंच काका कहते हैं कि प्रजातंत्र में कानून सर्वोपरि होता है। शाकाहारी कानून बना दिया है तो परेशानी किस को है। अब शेर राजा भी घास खाएगा, और कभी मांस खाने की इच्छा होगी तो छिप कर कहीं गुप-चुप खा लेगा। फिर स्टेज पर आकर घास के पास मुंह किए खड़ा होकर शाकाहार का विज्ञापन करेगा। शेर-चूहे सब की अपनी दुकानदारी है। जब बात देखने-दिखाने की हो तो सब कुछ सही और सलीके से होना चाहिए। अच्छे दिन यही है कि चूहे-शेर मिलकर करे कुछ भी, पर यह नाहक दुख की चर्चा क्यों है? 
- नीरज दइया 

13 अप्रैल, 2017

व्यंग्य की ए बी सी डी

पंच काका ने पूछा- व्यंग्य क्या होता है? यह सवाल सीधा है पर मुझे इसका कोई सीधा जबाब नहीं सूझ रहा था, इसलिए कहा- व्यंग्य व्यंग्य होता है। यही सवाल अगर बादशाह अकबर बीरबल से पूछते तो जाहिर है बीरबल कहते- जहांपना मैं कल जबाब दूंगा। बीरबल के जितने भी जबाब है वे तुरंत नहीं दिए हुए है। बीरबल से हमें सीखना चाहिए कि तुरंत जबाब देने में खतरा है। किसी भी सवाल को कल पर टालना ही समझदारी है। सोचने के लिए समय मिल जाता है। पंच काका मेरा समय लेने के मूड में थे, इसलिए उन्होंने फिर कहा- ये भी भला क्या जबाब हुआ कि व्यंग्य व्यंग्य होता है। यह तो वही बात हुई कि दो दोस्तों को उनके घरों के बारे में पूछा गया तो पहले ने जबाब दिया- मेरा घर इसके घर के सामने है, और दूसरे ने भी कहां कि मेरा घर इसके सामने है। जब पूछा गया कि दोनों के घर कहां हैं तो जबाब आया- आमने-सामने। अब जो आमने-सामने घर हैं उन्हें कैसे ढूंढ़ा जाए? मेरा बात को घूमाना लाजमी था, मैंने कहा- काका, आप बड़े विद्वान है और व्यंग्य क्या होता है यह बखूबी जानते हैं। इस जबाब पर काका मुस्कुराए और बोले- वाह ! बेटा, उस्ताद से उस्तादी। चलो मान लिया कि मुझे पता है और यह भी मानता हूं कि तुम्हें भी पता है, फिर भी अगर कोई यह सवाल पूछे तो उसे कहा क्या जाए? मेरी मुसिबत यह थी कि काका को यह भी नहीं कह सकता कि व्यंग्य की ए बी सी डी इतनी सरल नहीं है कि हर कोई समझ सके। बहुत बार चीजें बहुत सरल लगती हैं, पर वास्तव में वे कठिन होती है। जैसे- व्यंग्य असल में ऐबी यानी शरारती लोगों का काम है। यह सीडी ऐसी है जो बिना कंप्यूटर के भी चलती है। इससे भी आगे कहा जाए तो ऐसी सीढ़ी है जो बहुत दूर तक हमें पहुंचाती है। ऐसे-ऐसे नजारे दिखाते हैं कि चक्कर आने लगते हैं। हमारा मन धरातल पर आने को मचलता है। बहुत पहले जसपाल भट्टी ने जो उलटा-पुलटा दिखाया था, वह व्यंग्य था। मान लिजिए कि हम घर देरी से पहुंचते हैं और देरी से पहुंचने पर भी सुनने को मिले- बहुत जल्दी आ गए। यह व्यंग्य है। टेढ़ा मसला है कि जो बात सीधे-सीधे कहनी चाहिए उसे व्यंग्य के जरिये तोड़ते-मरोड़ते और रस पैदा करते हैं। कहते कि इससे जायका आता है। जायका यहां यह है कि काका ने मेरी फीत उतार ली। कोई भी फीत चलते-चलते उतार सकती है। सीधा एकदम सरल सवाल करो। गीतकार शैलेंद्र ने लिखा था- हर सवाल का सवाल ही जवाब हो। जैसे- हम जिंदा क्यों है? जीवन-मृत्यु क्या है? मैं क्या हूं? ऐसे में पता चलेगा कि रहस्यों से भरा संसार है। हर आदमी के पास अपने-अपने सवाल है। सवाल यदि एक है तो जबाब भी एक होना चाहिए। यहां सवाल यह था कि व्यंग्य क्या है? तो जबाब है कि व्यंग्य यही है। यहीं है। जो मैं लिखता हूं और जो आप पढ़ते हैं, वही व्यंग्य है। बाकी सब क्या है यह कहना मेरा काम नहीं है। पंच काका मेरी हालत ताड़ गए और कहने लगे- किसी भी चीज के लिए ये ‘क्या’ बड़ा सवाल होता है। मैं क्या हूं और तुम क्या हो, इससे बड़ी बात यह है कि हम क्या हैं? हम बुद्धिजीवी हैं और बुद्धिजीवियों का काम है कि दुनिया के हर सवाल पर चिंतन-मनन करें। इस संसार में हम सभी भटक रहे हैं। सब को इतना भ्रमित कर देना चाहिए कि सामने सवाल पूछने की कोई हिम्मत करे तो दस बार सोचे। सच्चाई यह है कि सही मार्ग कोई नहीं जानता। अलग-अलग विद्वान हर बात पर मतांतर रखते हैं। यह जरूरी है कि अगर हम विद्वान हैं और बने रहना चाहते हैं तो अपना अलग मत रखें। सब को भटकाने वाल मत। मत यह है कि भटकना-भटकाना ही व्यंग्य है।  
- नीरज दइया

10 अप्रैल, 2017

मास्टरजी का चोला

    किसी के कुछ होने या नहीं होने से जरूरी होता है दिखना और लगना। बिना दिखे और लगे, कुछ होना या नहीं होना किसी काम का नहीं है। अब मास्टरजी को ही लो, मास्टरजी इन दिनों जिंस-टी-शर्ट और न जाने क्या क्या वस्त्र धारण कर के आते हैं कि वे मास्टरजी जैसे लगते ही नहीं। मास्टरनियां भी कहां कम है, वे भी अपने निराले अंदाज में अदाएं बिखेरती स्कूल पहुंचती हैं। जवान तो जवानी के जोश में होती है पर यहां तो बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम तक के उदाहरण देखने को मिलते हैं। उम्र का अपना हिसाब और सलीका होता है। विद्या के मंदिर में भड़कीले रंगों और चमक-दमक का भला क्या काम। जब आप ऐसे आएंगे तो आदर्श और संस्कारों का क्या होगा। बच्चों को कैसे समझाएंगे। जब खुद ही ऐसे निराले अंदाज में हीरो-हिरोइन बन कर विद्यालय पधारेंगे तो संस्कृति गर्त में चली जाएगी। कभी फेंच कट दाढ़ी तो कभी ऐसे-ऐसे कट में कि उनका नाम भी आप ही बता कर विज्ञापन करते हैं। जैसे स्कूल स्कूल न होकर कोई फैशन-ग्राउंड हो गया हो। कार्यालय के कर्मचारी बाबू अपने रंग-ढंग में मस्त है। उन्हें कहने-सुनने की हिम्मत किसी में नहीं है। वे स्कूल के सभी कर्मचारियों की पगार बनाते हैं, फीस का हिसाब रखते हैं। वे बजट को हिसाब से बरतते हैं। वे साहब को नियम और पेच बताते हैं। वे तो जो कुछ जानते हैं, कोई दूसरा कहां जानता है। इसलिए उनके अंदाज भी निराले होने ही चाहिए। वे साहब से भी बढ़-चढ़ कर सज-धज कर अपनी मर्जी से आते हैं और जाते भी अपनी मर्जी से हैं। जब सारा हिसाब-किताब उनके हाथ में है, तो फिर डर किस का। पहले वाले स्कूलों में मास्टरजी टाइप जो लुक दिखता था, अब वह नहीं दिखता है। कुछ मास्टर तो छोरे-छपारे जैसे लगते हैं, और नहीं लगते तो वे वैसे ही बन-ठन कर आते हैं। नई मास्टरनियां और छोरियां दोनों एक जैसी लगती है। किसी मास्टरनी को बड़ी कक्षा में बैठा दिया जाए तो अंतर मामूल नहीं चलेगा। पहले का जमाना दूसरा था, जब मास्टरनीजी को ‘बहनजी’ कहा करते थे। उस जमाने में वे कितनी शांत-शालीन थी। वे जब से मैड़म बनी है तब से मत पूछिए बात। अंग्रेजी रंग-ढंग और नाज़-नखरे पूरे होने चाहिए। वे ऐसे क्रीम-पॉउडर मल-मल के आती हैं कि कोस्मेटिक की दुकानें उन्हीं से चलने लगी हैं। कहीं गुलाब महकता है तो कहीं चंदन। कहीं केवड़ा तो कहीं चमेली। स्टाफ रूप में तीन-चार मेडम हो तो लगता है कहीं पास में फुलवाड़ियां महक रही हैं। रंग-रूप और साज-सज्जा अथवा सुगंध के मामले में मास्टरजी भला कब पीछे रहने वाले हैं। वे भी कम नहीं, डियो और इत्र लगाकर आते हैं, या डियो-इत्र से स्नान कर के आते हैं कहना मुश्किल है। डियो अथवा इत्र की तीखी महक जब नाक में तीर जैसे घुसती है तो विचार आता है कि ये भाई-बंधु नहा-धो कर कभी आते भी हैं या यूं ही छू-छा, फुस-फुस किए और निकल आते हैं। नकली और असली में यही फर्क है कि पुराने वाले दिनों वाले मास्टरजी का रौब होता था, गरिमा होती थी। अब इन पर इनके चेले-चपाटों का रौब और आतंक है। कहते हैं कि ट्रेंड बदल गया है। अब सब फ्रेंडली है। गुरु-शिष्य परंपरा को नए चेले और चेलियों ने तहस-नहस कर फ्रेंडली दुनिया में सब कुछ फ्रेंडली बना दिया है। ऐसे माहौल में यदि कोई योगी-महात्मा का तेज जाग जाए तो अतिश्योक्ति नहीं है। पंच काका कहते हैं कि जब विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए ड्रेस कोड है तो फिर वहां काम करने वाले सभी कर्मचारियों और शिक्षकों को भी इस परिधि में लेना चाहिए। माना कि मास्टरजी को अब पुराने वाला वह धोती-चोला पसंद नहीं है, पर जब आपने मास्टरजी का चोला धारण किया है तो कुछ तो परंपरा-संस्कृति और संस्कार का लिहाज होना चाहिए। खैर छोड़िए मास्टरजी आपको बस इतना ध्यान रखाना है कि विद्यालय में रोमियो बन कर नहीं आना है।   
- नीरज दइया

06 अप्रैल, 2017

पिताजी के जूते

पको खबर है या नहीं- समय बदल गया है। बदलते समय के साथ बहुत सारी चीजें बदल गई हैं। बहुत सारे रिश्ते और टेस्ट बदल गए हैं। जो नहीं बदलने थे, वे भी बदल गए हैं। मसलन पहले हमारे घरों में जो पिताजी हुआ करते थे, उन्हें भी बदल दिया गया है। आजकल वे अपने बदले-बदले रूप में पाए जाते हैं। पिताजी कितना ओल्ड नेम है। अब नए दौर में सब कुछ नया-नया होना चाहिए। पिताजी तो बदले नहीं जा सकते, पर उनका नाम बदल कर कुछ नए का असहास तो ला साकते हैं। बेशक, पापा या डेड जैसे किसी संबोधन में पिताजी वाली गरिमा नहीं है। ना हो गरिमा, करना क्या है गरिमा का। नए जमाने में जब सब कुछ बदल रहा है, तो यह बदलाव भी जरूरी है। नाम बदलने से बहुत फर्क पड़ता है। कुत्ते को कुत्ता कहो तो लगता है किसी गली के आवारा कुत्ते की बात हो रही है। यही अगर कुत्ते को बस ‘टोमी’ कह कर चर्चा कीजिए, तुरंत बात कहने-सुनने वालों का स्तर उच्च हो जाता हैं। पीढ़ियों की मानसिकता में यही तो अंतर है कि वे बात को दिल पर ले लेते हैं। पिताजी की बात में कुत्ता आने से प्रसंग में कोई हल्कापन आने की बात सोचे, तो समझ लिजिए पुराने खयालों का दिमाग है। नए ख्यालों में इन छोटी-बड़ी बातों को इगनोर करना पड़ता है। पिताजी में से जब से ‘जी’ निकला है तो पिता के पर्यायवाची- डेड, पापा जैसे शब्द हो गए। कुछ अब भी ‘जी’ को घसीटते हुए इस युग तक ले आए हैं। वे पापाजी और डेडीजी कहते हैं। उनका यह ‘जी’ को बचाए रखने का प्रयास है। पहले वाले पिताजी का रुतबा हुआ करता था, लेकिन अब पिताजी ने डेडीजी का चोगा पहना है वे बहुत फ्रेंडली हो गए हैं। वे जमाने के साथ बदल रहे हैं। पहले वाले रौब को छोड़, वे थके-मांदे एडजेस्टिव नेचर के होते जा रहे हैं। इस शताब्दी में सरवाइव करना है तो एडजेस्टिव होना पड़ेगा। लोक की मान्यता है कि अगर बेटे के पैर में बाप का जूता आने लगे तो समझो वह बड़ा हो गया है। अब फ्रेंडली जनरेशन में तो बेटों के पैर जन्म से ही बड़े-बड़े होने लगे हैं। ‘तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राज दुलारा...’ पिताजी का गाना था और अब बेटाजी का गाना है- ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा, मगर ये तो, कोई ना जाने... के मेरी मंज़िल, है कहाँ।’ बेटे की मंजिल पापा नहीं जानते हैं, क्यों कि बेटों की मंजिल बदल गई है। पिताजी का बड़ा नाम रौशन करने में उनकी कोई रुचि नहीं है। इसका एक बड़ा कारण ‘जूते’ हैं। अब कहने को बस जूते शब्द रह गया है। देश से असली जूते गायब हो चुके हैं। किसी के पैरों में कोई जूता नहीं, बस भ्रम है कि जूते हैं। अगर गलती से कोई जूता है, तो वह बेकार है। उसे पैरों में पहनने पर ना बचाव करता है ना उसे खोल कर उठाया जा सकता है। पहले पिताजी पैर में जूता रखते थे, स्कूल में मास्टरजी जूता रखते थे, गली-समाज में कुछ बड़े-बूढ़े लोग जूता रखते थे, पंच-सरपंच के भी जूते हुआ करते थे।
          पंच काका कहते हैं कि अब जूतों की प्रजाति लुप्त हो गई है। सबसे पहले घरों से पिताजी के जूते गायब हुए। स्कूल के सारे जूते चुरा लिए गए। बंटाधार हो गया। बच्चों के हित में बड़े-बड़े कानून है। थाने-कोर्ट-कचेड़ी आदि सब के जूते शोफानी हो गए। हाथ के दात जैसे सिर्फ दिखाने के जूते। अब तो हुआ यह है कि कभी बच्चे ना जाने कहां से जूते ले आते हैं, और अपने अभिभावकों, शिक्षकों तक को नहीं छोड़ते। कहां गए हमारे संस्कार? कहां गए हमारे जीवन-मूल्य? हाय पहले वाली शिक्षा कहां गई?
० नीरज दइया   

03 अप्रैल, 2017

फलके सा चेहरा और अप्रैल-फूल

मैं सुबह-सुबह जब दफ्तर के लिए निकलने लगा तो पंच काका ने कहा- ये फलके सा चेहरा लिए कहां जा रहा है? मुझे यह उम्मीद तो नहीं थी कि काका मुझे मूर्ख बनाएंगे और मैं बन जाऊंगा। मैं जानता हूं कि ज्ञानियों के मजाक भी उच्च स्तरीय होते हैं, हर कोई समझ नहीं सकते हैं। मैं फलके सा चेहरा लिए कहां जा रहा हूं इस बात पर मौन रहा तो काका ने पूछा- अरे बोलता क्यों नहीं, फलके सा मुंह लिए कहा जा रहा है। मैं अटकता अटकता बोला- द... फ्त.. र। और घर से निकल तो गया पर यह क्या दफ्तर पहुंचा तो गेट पर खड़ा कर्मचारी भी हंसते हुए बोला- साहब आज तो फलके सा चेहरा लेकर आए हो। मेरी हैरानी का पार नहीं, ये क्या माजरा है कि सब फलके सा चेहरा कह रहे हैं। सीट पर बैठा तो पास वाली सीट पर बैठा मेरा सहकर्मी भी यही बात बोल कर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम करने के लिए काफी था। मैं चिंता में पड़ गया कि ये सब आज फलके सा चेहरा क्यों कह रहे हैं। यह तो अच्छा हुआ कि मैं बेहोश नहीं हुआ साहब ने बुलाया और उन्होंने भी मुझे पंच काका वाली बात कही- आज फलके सा चेहरा लिए कैसे हो? मैं भीतर ही भीतर शर्माता और बाहर मुस्कुराता बोला- सर ये फलके सा चेहरा क्या होता है। जबाब हथोड़े जैसा था- आइना देखो, तुम्हारा चेहरा आज फलके सा है। साहब की गंभीरता अब भी कायम थी और फाइल हस्ताक्षर करा के मैं लौट आया। फाइल रख कर वॉश रूम में गया तो वहां मेरा मित्र वर्मा पहले से ही अपना मुंह आइने में देख रहा था। मैं भी परेशान सा पास खड़ा होकर आइना देखने लगा कि ये फलके सा चेहरा क्या माजरा है। वर्मा से हंसी रुकी नहीं और उसने भेद खोल दिया- अप्रैल फूल बना रहे हैं। मेरी हालत रोने जैसी थी, मैं चीखा- ये क्या मजाक हुआ? वर्मा बोला- मजाक ही तो है। फलका यानी रोटी, तेरा मुंह गोल रोटी जैसा है। इसमें क्या गलत है। मजाक को समझा करो यार।
      मैं मजाक को समझा कि नहीं इससे जरूरी है कि मैं एक अप्रैल को समझ लेता हूं। एक अप्रैल का किसी भी प्रकार के फूल से कोई संबंध नहीं है, फिर भी वर्षों से अप्रैल-फूल का ऐसा राग क्यों गाया जाता है? प्रतिवर्ष इस राग को सुन-सुन कर यकीन करने को जी करता है कि इस प्रकार का कोई दुर्भल जाति का फूल भी होता है। यह भेड़ चाल है, कोई किसी से सवाल नहीं करता, बस नाचते-गाते हैं- अप्रैल-फूल आ गया, आ गया। अरे क्या आ गया, जीवन में इतने अप्रैल आए और गए... पर अप्रैल फूल इस बार जैसा कभी नहीं आया। माना यह एक-दूसरे को मूर्ख बनाने-बनने का दिवस है। देश की प्रगति में अब अप्रैल फूल केवल एक अप्रैल को ही नहीं, तीन सौ पेंसठ दिन मनाया जाता है। हमको खबर भी नहीं होती है और हम हर दिन अलग अलग जगह मूर्ख बनते हैं, बनाए जाते हैं। अप्रैल फूल का लोकप्रिय संस्करण ‘उल्लू के पठ्ठे’ के रूप में विख्यात है। जब पंच काका को पूछा तो उन्होंने बताया- बाबा आदम को सर्प ने मूर्ख बनाकर पहली अप्रैल को सेव खिलाया था। जिससे उन्हें ज्ञान हुआ, और आगे क्या हुआ हम सब जानते हैं। आदम और हव्वा ने एक-दूसरे को मूर्ख बनाया। यह चक्कर आगे चलता रहा। उल्लू के पठ्ठों का विकास हुआ। उन्हें यह ज्ञान हुआ कि बिना ज्ञान के कोई किसी को मूर्ख नहीं बना सकता। अज्ञान तो खुद मूर्खता का पर्याय है। मूर्ख को मूर्ख नहीं बनाया जाता- उसे महामूर्ख बनाना पड़ता है। अब तो महामूर्खों की भी कई श्रेणियां हैं। हम ऐसे लोक में पहुंच चुके हैं जहां हमारी मूर्खताओं की पावर इतनी बढ़ गई है कि हमें हर कोई आसानी से मूर्ख बना सकता है। जैसे मैंने तुझे ‘फलके सा चेहरा’ कह कर मूर्ख बनाया।
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02 अप्रैल, 2017

राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद भाषा भारती में प्रकाशित


मैं कविता की प्रतीक्षा में हूं 
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डा. नीरज दइया
अनुवाद : नवनीत पाण्डे 
 
ढूंढ़ने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
जब भी करना चाहता हूं संवाद
तो नहीं मिलता कोई ठीक-ठाक प्रश्न
प्रश्न यह है कि कोई कवि क्या पूछे कविता से
क्या किसी कविता से पहचान के बाद भी जरूरी होता है प्रश्न
प्रश्न कि समय क्या हुआ है?
प्रश्न कि बाहर जा रहे हो कब लौटोगे?
प्रश्न कि खाना अभी खाएंगे कि ठहर कर?
प्रश्न कि चाय बना देती हूं पिएंगे क्या?
प्रश्न कि नींद आ रही है लाइट कब ऑफ करोगे?
प्रश्न कि इन किताबों में सारे दिन क्या ढूंढते रहते हो?
प्रश्न कि कोई पैसे-टके का काम क्यूं नहीं करते?
प्रश्न.. प्रश्न... प्रश्न ? शेष है प्रश्न-प्रतिप्रश्न?
किंतु सिर्फ प्रश्नों से क्या बन सकता है?
क्या सभी प्रश्नों को इकठ्ठा कर रच दूं कोई कविता?
पर क्या करुं-
अभी-अभी आया है जो प्रश्न आपके संज्ञान में
इसीलिए तो मैंने सर्वप्रथम लिखा था-
ढूंढने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
कविता यह है कि मैं कविता की प्रतीक्षा कर रहा हूं
अगर आपकी भेंट हो
तो कहना उसे कि मैं प्रतीक्षारत हूं।

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मूल कविता-
म्हैं उडीकूं कविता
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डा. नीरज दइया
 
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
जद करणी चावूं बतळावण
तो कोनी सूझै
कोई सावळ सवाल
सवाल ओ पण है-
कोई कवि कविता सूं
कांई करै सवाल?
कांई कविता सूं ओळख पछै ई
जरूरी होवै कोई सवाल?
सवाल है कै कित्ती बजी है?
सवाल है कै बारै जावो पाछा कणा आसो?
सवाल है कै अबार जीमसो का पछै?
सवाल है कै चाय बणा दूं पीसो कांई?
सवाल है कै नींद आवै बत्ती कद बंद करसो?
सवाल है कै आं पोथ्यां में सारो दिन कांई सोधो?
सवाल है कै कोई पइसा-टक्कां रो काम क्यूं नीं करो...?
सवाल... सवाल... सवाल।
सवाल भळै है केई सवाल
पण कोरा सवालां सूं कांई संधै!
कांई सगळा सवाल रळा’र
सांध देवूं कोई कविता
पण कांई करूं
अबार-अबार ई जलम्यो है जिको सवाल
आप रै मगज मांय
इणी खातर तो सगळा सूं पैली कैयो—
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
कविता आ है
कै म्हैं उडीकूं कविता
जे थानै सूझै कविता
तो उण नै खबर जरूर करजो
-कै म्हैं उडीकूं।
००००
(भाषा भारती में प्रकाशित)

31 मार्च, 2017

कागज के दुश्मन

कागज का आविष्कार चीन में हुआ। पंच काका का स्थाई आदेश है कि जब भी किसी का नाम लेने की बात हो, तो सावधानी रखो। मैं सोच रहा हूं कि चीन का नाम लिया जाए, या कह दिया जाए कि कागज का आविष्कार भारत में हुआ। कोई वास्तव में पक्का यह नहीं जानता कि कागज का आविष्कार कहां हुआ। कहते हैं कि ऐसा लिखा हुआ मिलता है। लिखने से मानते हो तो मैंने लिख दिया- ‘कागज का आविष्कार भारत में हुआ।’ मैंने लिखा तो आप संदेह कर रहे हैं। इसलिए बेहतर पंच काका की बात है कि कागज की बात करते हुए मैं इसके आविष्कारक की बात गोल कर जाऊं। किसी ने कब कहा है कि नाम लो। मोर नाचा जंगल में किसने देखा, आपकी बात सही है। पर मैं तो पंच काका के स्थाई आदेश की पालना में बात का आरंभ ही बदल देता हूं। हमारे कविराज कह गए- ‘हीमत कीमत होय, बिन हिमत कीमत नही। करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया॥’ वैसे यह केवल राजिया के ही समझने की बात नहीं है। यह मेरी हिम्मत है कि कवि का नाम नहीं लिया, और उनकी पंक्तियों का उल्लेख कर दिया। लिखते समय पूरा मार्जिन हाथ में रखता हूं। कागज और कलम हमारी है, तो फिर कंजूसी कैसी? वैसे कागद को चिट्ठी भी कहते हैं। और आजकल चिट्ठी आनी-जानी बंद-सी हो गई है। वह भी क्या दौर था- जब डाकिया डाक लाता था और हिंदी फिल्मों में ‘डाकिया डाक लाया...’ जैसे गाने लिखे गए थे। खुशी की बात यह है कि अब डाक और डाकिया दोनों ही कंपलीटली फ्री हो गए हैं। लेटर-बॉक्स देखे तो बरसों-बरस हो गए हैं। जैसे वे हमारी दुनिया से गायब हो गए हो। अब यह शिकायत भी दूर हो गई- “चिठिया हो तो हर कोई बांचे, भाग ना बांचे कोए....।” भाग्य का भाग्योदय हो गया है। ई-मेल और संदेश भेजने के नए-नए तरीके इजाद हो गए हैं। अब कागज के दुशमन तो गिने-चुने ही रहे हैं। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं ने भी ई-संस्करण सुलभ करा दिए हैं। अब कौन कचरा इक्कठा करे। यह ‘ई-युग’ है बाबा। देखिए ए-बी-सी-डी चार युगों के बाद ये ई-युग आया है। इसमें समझदारी नहीं कि अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के लिए इंतजार करो। सब कुछ नेट के ई में है भैया।
    पंच काका कागज की दूसरी ही बात बता रहे हैं। गली में लड़ाई हो गई। बात बस इतनी थी कि दो हजार के नए नोट पर कोई नया फोटो क्यों नहीं छापा? भगतसिंह का छप जाता, नहीं तो बाबा साहेब का छाप देते। देखिए ना फिर से छाप दिया- गांधी बाबा का। वे इतने छप चुके हैं, तो अब किसी नए का नंबर आना चाहिए था। इसी बात पर बहस हुई। किसी ने सुझाव दिया कि जब इतने नोट हैं, तो फिर अलग-अलग नोटों पर अलग-अलग फोटो छाप कर सब की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। वैसे यह बहस और लड़ाई की बात नहीं थी। पर क्या करें हो गई कि गांधी बाबा को करवट बदलवाने के चक्कर में क्यों सबको लाइन में खड़ा करा दिया। नोट पर गांधी लेफ्ट से राइट हुए कि राइट से लेफ्ट, पर पूरे देशवासियों ने बैंकों की लेफ्ट-राइट जरूरी की। आजादी इसी का नाम है कि सब के अपने-अपने सुझाव और विचार हैं।
    पंच काका ने उन्हें समझाया- ओछी राजनीति के चक्कर में आपने संबंध बर्बाद मत करो। सब के सब कागज और कलम ले आए और लिखने लगे। सबका कहना था कि हम प्रधानमंत्री जी कागद लिख सकते हैं। उन्होंने खुद कहा है- मुझे लिखो। गली के लोगों की कागज से दुश्मनी निकली। एक कागज लिखकर फाड़ते कि ठीक से लिखा नहीं गया। फिर दूसरा-तीसरा-चौथा। यह क्रम किसी नए कवि जैसे चलता रहा कि कविता लिखने के नाम पर बीसियों कागज बर्बाद करते हैं। अब इन्हें कौन समझाएं कि इस ‘ई-युग’ में कागज के दुश्मनों के लिए कोई जगह नहीं है। अब सब कुछ कागज-लेस हो रहा है।
नीरज दइया

टारगेटमयी मार्च

ब से मार्च का महीना आया है तब से हर सरकारी कार्यालय के गेट को देखता हूं तो पाता हूं कि वे इन दिनों जल्दी खुल जाते हैं और देरी से बंद होने लगे हैं। जिस कार्यलय में कर्मचारी सूरज के सिर पर आने के बाद भी दौड़ते-भगते पहुंचते थे, उन्हीं कार्यालयों में अब सूरज के आते हैं थोड़ी देर में एक-एक कर सभी कर्मचारी और अफसर आने लगे हैं। न केवल आने लगे हैं वरन अपने स्थान पर विजारित होकर फाइलों और बिलों में ऐसे खो जाते हैं कि दिन भर लगे रहने पर भी उनका सिर ऊंचा नहीं होता। यह सब देख कर लगता है कि देश बदल रहा है। ऐसे तो हमारी तरक्की को कोई रोक नहीं सकता। सबके अपने-अपने टारगेट हैं। टारगेट को प्राप्त करना बहुत जरूरी है। बाबू का टारगेट है और अफसर का अपना टारगेट। सब के अपने अपने टारगेट और खाते हैं। आदमी की हिम्मत और पद के हिसाब से सब का अपना अपना मुंह है। किसी का मुंह छोटा है वह कम खाता-पीता है, और जिसका मुंह बड़ा है वह ज्यादा खाता-पीता है। यह झूठ है कि हमारे देश में कोई भूखा सोता है। यहां भले कितनी ही गरीबी हो और भले गरीबी की किसी भी रेखा की बात हो, यहां कोई भूखा नहीं सोता है। सबके अपने अपने खाने-पीने के रास्ते बने हुए हैं। भिखारी से लेकर सेठ साहूकार तक के अपने अपने रास्ते हैं। कोई भगवान के नाम पर कुछ ले रहा है तो कोई दे रहा है। हरेक का अपना खाता है। जिसमें पाप-पुण्य है। आदमी एक जैसे ही हैं, पर कभी कोई भगवान के नाम पर तो कभी कोई वाहे गुरु और अल्लाह के नाम पर खाता-पीता अथवा खिलाता-पिलाता है। कार्यालय में साहब के कमरे के बाहर बैठने वाला अंतिम अधिकारी भी दफ्तर के हिसाब से खाता-पीता है। सबका नसीब है और यह नसीब मार्च के महीने में जोर शोर से चमक उठता है। मार्च का महीना यानी खाने-खिलाने का महीना। इस महीने में टारगेट पूरे करते-करते कई टारगेट पूरे हो जाते हैं। बकाया बिल और बकाया बजट को यूज करना मार्च में जरूरी होता है। सब चाहते हैं कि आया हुआ बजट जाना नहीं चाहिए। बिना खर्च के आया हुआ बजट वापस चला जाएगा तो यह सरासर हरामखोरी है। लापरवाही है। कार्य के प्रति उदासीनता है। अनुशासनहीनता है। सरकारी बजट का पूरा पूरा उपयोग होना ही चाहिए। यदि किसी करण से बजट मार्च में नहीं खत्म हो सकता है तो उसके लिए मार्च के महीने को खुला रखा जाता है। अप्रैल की दस-बीस तारीख तक मार्च महीने को चलाया जाता है। पिछली तारीखों में बिलों का लेन-देन और सब व्यवस्थित किया जाता है। बिना तारीख के बिल कबाड़े जाते हैं। साहब के खास आदमी दफ्तर में अपने हिसाब से बिलों पर तारीख लिखते और प्रमाणित करते हैं। ऐसा भी होता है कि बिल का सामान और काम-काज अपनी जगह छोड़ दिया जाता है। आज नहीं तो कल-परसों या फिर कभी सामान एडजेस्ट हो जाएगा, काम करा लिया जाएगा। परंतु अगर मार्च का महीना निकल गया और उसको अप्रैल में भी नहीं पकड़ पाए तो बजट लेफ्स हो जाएगा। सामान और काम की बजाय ध्यान बिल और कमीशन पर दिया जाना चाहिए। वांछित बिल समय पर आ जाए, पास हो जाए और सबका खाना-पीना बराबर हो जाए तो कोई समस्या नहीं है। बस एक बार दौड़ते-भागते टारगेटमयी मार्च को पकड़ लिया तो समझो पूरे साल भार का आराम हो गया। पंच काका कहते हैं कि मार्च की दौड़-भाग में कुछ कर्मचारी और अफसर ऐसे भी हैं, जिनको टारगेटमयी मार्च के पीछे दौड़ना-भागना नहीं आता। राम जाने वे किस मिट्टी से बने हैं। उनको ढंग से खाना-पीना नहीं आता। ऐसे में बेचारे सहायकों को चाय-पानी के लिए तरसना पड़ता है। बिना चाय-पानी के नौकरी किस काम की, इससे तो बेहतर है कहीं ढंग की जगह तबादला हो जाए।
नीरज दइया

28 मार्च, 2017

कुंवारों-कुंवारियों की धमाचौकड़ी

मारे देश में रोजगारों की कमी नहीं है। अगर हम अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाएं, तो एक नहीं बीस तरह के काम हैं, जिनको रोजगार के रूप में अपनाया जा सकता है। मैं आपको बीस के बीस तरह के रोजगार नहीं बता सकता, पर एक के बारे में कुछ खुलासा करता हूं। समझदार को तो इशारा ही काफी होता है। पिछले दिनों एक वैवाहिक साइट ने सर्वेक्षण करवाया कि कुंवारों-कुंवारियों की पहली पसंद में कौन-कौन शमिल है। पसंद की बात पर ऐसे-ऐसे नजारे सामने आए कि मत पूछिए बात। बॉलीवुड-हॉलीवुड और क्रिकेट-राजनीति के युवा चेहरों की तो जैसी लॉटरी निकल आई। दीवानों-दीवानियों के हाल-बेहाल, पसंद करना था एक को, और नाम बताए दस के। पूरी वेटिंग लिस्ट ही बना दी। ये नहीं तो ये, और ये नहीं तो ये चलेगा। ही और शी इस ये-यू के चक्कर में रहते हैं। अंततः गले और वरमाला पर किसी एक्स-वाई का नाम लिखा होता है। पसंद करने-कराने की छूट हो तो फिर पूरी छूट होनी चाहिए। पसंद तो पसंद होती है। कोई शादीशुदा है या नहीं, इससे कोई सरोकार नहीं। यह अंदर की बात होती है। दिल का मामला है साहेव। फिर जब सपनों में किसी के आने-जाने की कोई रोक-टोक नहीं है, तो यहां पसंद में रोक-टोक क्यों? देश में बड़े नाम ऐसे भी मिल जाएंगे जो शादीशुदा होते हुए भी कुंवारों और कुवारियों जैसे हैं। कोई अपने जीवन-साथी को वर्षों तक छोड़ दे, तो कोई समयावधि होनी चाहिए कि इतने वर्षों पूरे कर, आप कुंवरा-कुंवारी कहे जाने का प्रमाण-पत्र पा सकेंगे। झूठ बोलना किसे पसंद नहीं है। खुद को बरसों कुंवरा-कुंवारी कहलाने में गर्वानुभूति है। तो बात सर्वेक्षण की थी और उस में अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर, रितिक रोशन, विराट कोहली, राहुल गांधी से लेकर माननीय प्रधानमंत्री जी तक का नाम कुंवारियों की पसंद में सरपट आया। रूपसियों को तो छोड़िए कुंवारों का हाल तो इससे भी बुरा है। वे तो पासवाली आंटी तक का नाम लेने में नहीं शर्माते हैं। आप कुछ भी समझे, पर ये अंदर की बात है। दिल का मामला है। बहुत सी पुरानी बातें ऐसी हैं जो पुरानी होती ही नहीं। सदा प्रासंगिक रहती है। जैसे- भैया! शादी ऐसा लड्डू है, खाए सो पछताए और ना खाए पछताए। जब पछताना ही है तो खा लेना ही ठीक है। कुछ का मानना है कि पछताना ही है, तो अकेले ही ठीक है। मिलकर पछ्ताना ठीक है या अकेले, इसका कोई ढंग से खुलासा नहीं हुआ है। कुछ ट्रेलर देख कर पछताते हैं। किसी को आदर्श मानकर प्रेरणा ग्रहण करना गलत नहीं। राजनीति और समाज में कुछ प्रसिद्ध कंवारों और कंवारियों के नाम कुख्यात हैं। अपने जीवन को फकीरी जीवन कहने वाले और वालियों का कुछ तो जादू है। आह ! स्वतंत्रता से भरा जीवन कितना सुखद है। किसी का ना कहना, ना सुनना। जो जी में आए, सो करो। परिवार और शादी में कितने बंधन हो जाते हैं। इन दिनों यह एक बड़ा रोजगार बन गया है। बिन किसी इन्वेस्टमेंट के आमदनी होने लगती है।
          पंच काका रोमाटिंग मूड में आ कर कहने लगे हैं- जब दो दिल टकराते हैं तो बिजलियां कड़कती है, घर में बारिश और तूफान आता है। धीरे-धीरे दो पहियों पर दौड़ने वाली गाड़ी, सवारियों के बढ़ने पर बैलगाड़ी बन जाती है। बीस बातें सोचते हुए जीवन जीना पड़ता है। ऐसे में कुंवारों और कुंवारियों की धमाचौकड़ी देख कर जलन होती है। यह खेल निराला है- जो बंधन में हैं, आजादी चाहते हैं और जो आजाद है, वे बंधन के लिए बेताब है।
० नीरज दइया