14 नवंबर, 2017

गिनीज़ विश्व कीर्तिमान की कढ़ी

अरे जनाब, जब पूरा देश दौड़ में शामिल है फिर आप पीछे कैसे रह सकते हैं। आपको भी दौड़ना होगा। हम आपका भ्रम तोड़ देंगे। फिर यह नाम दर्ज करवाने की दौड़ है। गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। आपको भी लालायित होना चाहिए। वैसे मेरा मानना है- यह हो नहीं सकता। आप जरूर भीतर ही भीतर लालायित हैं, पर अपनी लालायित-लालिमा को प्रगट नहीं कर रहे। चलिए देश में खिचड़ी बनी और एक कीर्तिमान अर्जित हो गया। वैसे हमारे यहां खिचड़ी पहली बार नहीं पकी, रिकार्ड के लिए तो लोग वर्षों से खिचड़ी पकाते रहे हैं। यह अब सार्वजिक हो गया कि हम खिचड़ी बड़े स्तर पर पका सकते हैं। ऐसी अनेक सफलताएं हम अर्जित करेंगे और पूरे गिनीज विश्व कीर्तिमान की कढ़ी कर देंगे। कढ़ी से याद आया हम खिचड़ी की तुलना में कढ़ी बनाने में ज्यादा उस्ताद हैं।
कुछ लोग वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने में जी-जान लगा देते हैं और हमें तो जी-जान लगाने की जरूरत नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि हमारा ‘जी’ तो टीवी और न्यूज वालों ने ले चुरा लिया है। अब हमारी ‘जान’ बिना ‘जी’ के है। हमारी किसी को परवाह नहीं है। यह पूरा सत्य नहीं है। क्यों कि जान है तो जहान है। फिर जान-जहान में हम योग गुरु जो ठहरे। हमने माननीय प्रधानमंत्री जी को आगे किया और राजपथ पर योग कर डबल गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। पहला तो 35 हज़ार से ज़्यादा लोगों के एक साथ योग करवाने का और दूसरा 84 देशों के नागरिकों के एक साथ एक जगह योग करवाने का। काश! हम खिचड़ी खाने के लिए भी 84 देशों के नागरिकों को आमंत्रित कर लेते तो यह भी डबल हो जाता। हम यह कसर कढ़ी बनाते वक्त पूरी करेंगे।
हमारे कढ़ी प्रोग्राम में जिनको नहीं आना उनके लिए बता दें कि हमने जब दुनिया में सबसे बड़ी जलेबी और इमरती बनाकर रिकॉर्ड बनाया था तब भी आपको बुलाना भूल गए थे। इसलिए कढ़ी के कार्यक्रम में आप जरूर पधारें। वैसे नहीं आ सकें तो चिंता भी नहीं करें। हम रुकने वाले नहीं। फिर मौका देंगे। हमारे पास खूब विचार है। हम विचारों की खान हैं। हम आपको टांग खींचने का रिकॉर्ड बनाते वक्त याद करेंगे। वैसे तो हम यहां दूर बैठे हुए भी आपकी टांग खींच सकते हैं। आपकी इज्जत उतार सकते हैं। इज्जत की बात पर याद आया कि इटली के सिल्वियो साबा ने महज 30 सेकेंड में 13 अंडरवियर पहनकर अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करा लिया। हमें इतनी उछल कूद की जरूरत नहीं। भारत का वर्ल्ड रिकॉर्ड यह भी है कि पढ़ने वाले और देखने-सुनने वालों में अंडरवियर जैसे विषयों में अपरोक्ष रुचि बड़े शर्म के साथ हम दर्शाते हैं। पहले हमारे यहां ऐसे विषयों पर प्रतिबंध था, अब हमने भी सारे पर्दे हटा दिए हैं।
० डॉ. नीरज दइया

12 नवंबर, 2017

पांच कविताएं ० नीरज दइया


अंजाम

सत्य वचन है श्रीमान
यूज एंड थ्रो आइटम हूं मैं
यह बाजार है श्रीमान
मुझे यूज करें....

जानता हूं मैं
मेरा अंजाम
फिर भी कहता हूं-
श्रीमान! यूज करें मुझे..

‘थ्रो’ से पहले
क्या यह स्मृति काफी नहीं
‘यूज’ किया गया मैं
श्रीमान के द्वारा!
००००

अधूरी कहानी

चलता जा रहा हूं मैं
जैसे चलती है पेन की रिफिल
लिखता जा रहा हूं मैं
जैसे कोई कहानी....

और एक दिन
यानी किसी आखिरी दिन
पेन से नहीं लिख सकूंगा मैं
कैसे करूंगा पूरी कहानी...
००००

निवेदन

जीवन के दो छोर हैं-
‘यूज’ और ‘थ्रो’।

मेरे ‘यूज’ में तुम साथ रहे,
‘थ्रो’ से ठीक पहले
नजर बचा के निकल जाना
थोड़ी देर के लिए ही सही
मैं तुम्हें दुखी नहीं देख सकूंगा।
००००

एक जैसी बातें नहीं

‘यूज’ किया तुमने मुझे
‘यूज’ हुआ मैं तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुमने मुझे ‘थ्रो’ किया
मैं ‘थ्रो’ हुआ तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुम्हें भ्रम है
मुझे भी भ्रम है
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुमने मुझे प्रेरणा दी
मैंने तुमसे प्रेरणा ली
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
००००

तिल भर जगह
 
किसे बचा कर रखूं
क्या बचा कर रखूं
रखने को कोई कोना नहीं मेरा
यहां तिल भर जगह भी नहीं है मेरी
सब कुछ है तुम्हारा....
००००
राजस्थान पत्रिका समूह के प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ‘डेली न्यूज़’, जयपुर के 12-11-17 रविवारीय साहित्य पृष्ठ 'हमलोग' में
 

11 नवंबर, 2017

भटकती आत्माएं

प आत्मा में विश्वास करें या ना करें। मुझे तो पूरा विश्वास है कि आत्मा होती है। मेरी आत्मा है और मुझ को मेरी आत्मा में आस्था है। आप क्या कहते हैं, क्या मानते हैं या मानते भी है कि नहीं मानते, इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी आस्था पर अडिग हूं। अडिग होना बड़ा कठिन काम है। पूरा पार्टी इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कोई किसी पार्टी में अडिग नहीं रहा है। वे अस्थिर होते हैं, कहते हैं- बदलाव प्रकृति का नियम है। अडिग रह कर क्या झंडे गाड़ने हैं। अडिग तो यह जीवन भी नहीं। सब चला चली का दो दिन का खेला है। इस खेले में जितन हंस खेल लें, खा-पी लें वही बस अपना है। बंद मुठ्ठी आए थे और खाली हाथ जाना है। ये इतनी ज्ञान की बातें करने वाले बड़े स्याणे होते हैं। बाते बड़ी बड़ी करते हैं और हरकतें छोटी-छोटी। मुंह में राम और बगल में छुरी की बातें ऐसे महानुभाव ही पुष्ट करते हैं। इन के लिए कुछ कहना खतरा मोल लेना है। इसलिए अपनी तो चुप है जी।
    हां तो मैं बता रहा था कि मेरा मानना है- आत्माएं होती हैं और वे भटकती रहती हैं। आपको सच कह रहा हूं कि भटकती आत्माएं बेचैन होती है। भटकन और बेचैनी परस्पर एक दूसरे को हस्ट-पुष्ठ करती है। अगर इस बीमारी को चैन मिल जाए तो वे सुखी हो जाए। सुख में भला कौन भटकता है। दुनिया में सारा खेल बस सुख-चैन का है। जिसको सुख-चैन मिला की ठहर कर बैठ जाते हैं। सुख में सुमरिन भी कहां होता है। दुखी और बेचैन भटकता भटकता भी सुमरिन करता है। उसे जिस जिस की याद आती है वह उस उस के पास भटकता भटकता पहुंच जाता है इसलिए उसे भटकती आत्मा कहा जाता है। जगत में रावण की आत्मा भटकने में विख्यात है। एक रावण दस सिर और उसकी आत्माएं कितनी थी यह पता नहीं। फिर उसके भाई-बंधु और वंशज भी तो उसी नस्ल की आत्मा को लिए हुए थे।
    रावणी आत्माओं का आजादी के इतने वर्षों बाद भी इलाज नहीं हुआ तो अब क्या होगा! रामजी भी रुष्ठ हो गए हैं कि अबकी बार जब माननीय प्रधानमंत्री जी ने रावण के सामने धनुष की प्रत्यंचा से निशाना साधाने का प्रयास किया तो बिना आवाज के वह टूट गया। विपक्ष की आत्माओं अट्टहास हुआ। अदृश्य आत्माएं और मौन अट्टहास। प्रत्यक्ष में तो इस टूटने पर पास खड़े पूरे व्यवस्था-विभाग को सांप सूंध गया। निकट खड़े पूर्व प्रधानमंत्री जी को वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने देख हल्की सी स्मित विखेरी और कहा- रावण को नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने तीर को भाले की तरह रावण की दिशा में फेंका। बात बस इतनी थी। रावणी आत्माओं को मौका मिल गया। बात का बतंगड़ बना। जाने खबरों और अपवाहों का जाल कैसे रचा, किसने रचा। पर आजाद देशवासियों ने इस घटना को तूल दिया। इसे सफेद बालों वाले 56 इंची छाती से संपन्न युवा नरेंद्र के हाथों रावण का मरने से इनकार बताते हुए, अनिष्ट और अपशकुन का प्रमाण बताया गया। पंच काका कहते हैं- राजस्थानी में एक कहावत है- रांडे रोती रहेंगी और जवांई जीमते रहेंगे। भटकती आत्माएं रांडे हैं जिनको रोना है और जवांई कौन है यह कहने की जरूरत नहीं है। थोड़ी बहुत समझ तो रखते हैं आप। अब सब कुछ काका के मुंह से ही सुनोगे कि अपना मुंह भी कुछ खोलोगे...। 
००००

08 नवंबर, 2017

परख / पंच काका के जेबी बच्चे

यशवंत कोठारी
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कवि-आलोचक नीरज दइया इन दिनों व्यंग्य में सक्रिय है। इस पोथी में उनके ताजा व्यंग्य संकलित है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं हेतु लिखे हैं। इन व्यंग्य रचनाओं के बारे में सुपरिचित व्यंग्यकार-संपादक सुशील सिद्धार्थ ने एक लंबा, सचित्र ब्लर्ब लिखा है जो उनके फोटो के साथ अवतरित हुआ है। संकलन में नीरज के चालीस व्यंग्य हैं, भूमिका महेश चंद्र शर्मा ने लिखी है जो स्वयं एक बड़े संपादक हैं। वर्तमान की विसंगतियों पर नीरज की पैनी नजर है, वे चीजों को बहुत ध्यान से देखते हैं फिर पूरी शालीनता के साथ व्यंग्य के रूप में रियेक्ट करते हैं, यहीं आज के व्यंग्य की मूलभत आवश्यकता है, जिसे लेख लिखने वाले भूल जाते हैं, मगर कविमना नीरज सब कुछ संजो कर पाठकों के साथ ताल मेल बिठा कर अपनी बात कहते हैं। व्यंग्य की यही विशेषता होती है। पाठक आपको मिल जाए।
अधिकांश रचनाएं कलेवर में छोटी है, काश नीरज पूरी लंबाई की रचना लिखते फिर संपादित कर अखबारों को देते , क्योंकि अखबारों में आजकल जगह खत्म, लेख खत्म, प्रभारी ज्यादा मेहनत नहीं करते। नीरज पाठकों को गुमराह नहीं करते, वे सीधा संवाद करते हैं। वे लंबी-चौड़ी नहीं हांकते, बस काम की बात करते हैं। लगभग सभी रचनाओं में पंच काका उपस्थित है, यह पंच हिंदी का तो है ही अंग्रेजी का भी पंच है। हर रचना में पंच है जो पाठक को झकझोर देता है। मास्टरजी का चोला इस संकलन का सबसे अच्छा व्यंग्य है। सेल्फी पर भी लेखन ने अच्छा लिखा है। लेखक का वर्तमान परिवेश से अच्छा नाता है, वे बार-बार समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।
दाढ़ी पर भी उन्होंने खूबसूरत व्यंग्य लिखा है। नीरज का कवि रूप भी इन रचनाओं में विचरता रहता है। साहित्य संबंधी व्यंग्यों में कटु यथार्थ के दर्शन होते हैं। नीरज के इन व्यंग्यों में बिम्ब है, प्रतीत है, वक्रता है, वे इन औजारों का जम कर इतेमाल करते हैं। ‘अपने अपने भूत’ ऐसा ही व्यंग्य है। काश वे कुछ और रचनाओं को शामिल करते, पुस्तक का कलेवर छोट है, मूल्य अधिक।
पुस्तक का शीर्षक व्यंग्य- पंच काका के जेबी बच्चे कुछ आत्म व्यंग्य की तरह शुरू होता है फिर जाकर सार्वजनिक हो जाता है। यह कला कम ही लेखक साध पाते हैं। नीरज ने यह कर दिखाया है। कई जगहों पर राजस्थानी मुहावरे हैं, जो मन को खुश कर देते हैं पिताजी के जूते ऐसा ही व्यंग्य है।
अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक एक साहित्यिक व्यंग्य है जिसे लगभग हर लेखक ने जिया है। मानदेय हर सच्चे लेखक की दुखती रग है। साहित्यिक मेलों प्र भी लेखक ने कलम तोड़ कर रख दी है। कुल मिलाकर सुधि पाठक इस संकलन का स्वागत करेंगे। अब कुछ बात कालम लेखक की। नीरज के ये व्यंग्य किसी कॉलम की मर्यादा के साथ चलते हैं, कॉलम का अनुशासन या संपादक का अनुशासन मानना ही पड़ता है लेखक को अपनी मजबूरियों को नजर अंदाज कर कॉलम की मजबूरियों के साथ जीना पड़ता है या जीना सिखना पड़ता है। यही है वो कारण जो एक क्लासिक रचना को रोक देता है।
मैं इस रचना का स्वागत करता हूं। वे खूब लिखें। पुस्तक का कवर प्रतीकात्मक है मगर सुंदर है। इस संकलन को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि राजस्थान का हिंदी व्यंग्य लेखन का भविष्य उज्ज्वल है। वे रांगेय राघव, अशोक शुक्ल, भगवती लाल व्यास की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। आमीन।
००००
पंच काका के जेबी बच्चे / डॉ. नीरज दइया / व्यंग्य संग्रह / वर्ष 2017 / मूल्य 200/- / पृष्ठ 96 / सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर-334001
(मधुमती : अक्टूबर, 2017)

06 नवंबर, 2017

सच और झूठ की लड़ाई

डॉ. नीरज दइया
राम और रावण की लड़ाई सच और झूठ की लड़ाई थी। कौरवों और पांडवों की लड़ाई भी सच और झूठ की लड़ाई थी। किंतु ये बहुत पुरानी कहानियां है। सच और झूठ की ऐसी अनेक कहानियां है। कहानियां अब भी चल रही है, पर समस्या यह है कि सच और झूठ की जो लड़ाई की ये कहानियां नई-नई है। कहानियां अभी चल रही है इसलिए कोई फैसला देना जल्दबाजी होगा। सच और झूठ की ये कहानियां अब चुनाव चिह्नों के साथ जुड़ गई है। अपने पायदे के लिए कोई सच-झूठ भी पार्टी बदल सकता है। बदल रहे हैं। भीड़ का क्या है, आज सच के साथ है सच को जिंदाबाद कहती है, कल सच को झूठ से टिगट मिल गया तो उसके अनुगामी झूठ के साथ हो जाएंगे और दम लगाकर कहेंगे- झूठ जिंदाबाद।
असल में यह छद्म युद्ध है। यहां नाम-काम सब दाम के सहारे अदल-बदल होते हैं। ऐसी चालें और घातें पहले नहीं थी। जिसे देखो सच का झूठ और झूठ का सच करने में लगा है। दोनों का चेहरा इतना बदल गया है कि इन्हें आम आदमी अब पहचाना ही नहीं सकता। वह अपनी धुन में रहता है। सच आम आदमी के पास गया और बोला- मैं सच हूं। आम आदमी ने कहा- मैं क्या करूं? वह बोला- बस यूं ही बता रहा हूं। आप को ध्यान होना चाहिए कि मैं सच हूं। मुझे वोट देना। आम आदमी ने रूखाई से कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। मैं आम आदमी हूं और मेरा वोट गोपनीय है। मैं अपना काम करूंगा, तुम अपना करो। फिर झूठ भी आम आदमी के पास पहुंचा और बोला- मैं झूठ हूं। वोट मुझे देना। आम आदमी ने रटा-रटाया जबाब दिया- मैं क्या करूं? मेरा वोट गोपनीय है। झूठ ने प्रतिवाद किया- अभी तुम्हारे पास जो आया था, वह क्या कह रहा था? आम आदमी ने सिर नीचे किए रखा, उसे सिर उठाने की फुर्सत नहीं थी। उसने उसकी तरफ देखे बिना ही कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। तुम जब मतलब होता है तभी आते हो। तुम जा सकते हो।
आम आदमी की त्रासदी है कि उसने सच और झूठ दोनों को नहीं देखा। वे भेस बदल बदल कर उसे प्रभावित करते रहे हैं। उसे अब अरुचि हो गई है। वह बस चाहता है कि उसे दाल-रोटी मिल जाए। उसे इन पड़पंचों में नहीं उलझना। उसे ना इस से सरोकार है ना उस से तकरार है। वह हर बार सुनता है कि जबरदस्त मुकाबला चल रहा है। कोई उससे कहता है कि यह लड़ाई आम आदमी के लिए है, कोई उसे कहता है देखना अब हालात बदल जाएंगे। वह सुनता है कि वह यानी आम आदमी जिसे चाहेगा वह जीतेगा। आम आदमी एक फीकी मुस्कान के साथ इस पंचवर्षीय योजना में मूक बना हुआ है।
पंच काका कहते हैं- यह तो अच्छा है कि आम आदमी अपने कामों में खोया है। उसे फुर्सत नहीं है कि वह पार्टियों के सच-झूठ को देखे-सुने और फैसला करे। अगर देख भी लेगा तो वह क्या कर सकता है? उसके पास कुछ नहीं है बस केवल एक वोट है। सच और झूठ की लोकतांत्रिक लड़ाई में खेल-भावना का बड़ा महत्त्व है। अंत में सब गले मिलते हैं और फिर शीत-समाधि के बाद समय आने पर ही मोर्चा संभालते हैं। आम आदमी की जान इस मुखौटा-युग में सही सलामत रह जाए यही बहुत है।
००००

30 अक्तूबर, 2017

इज्जत की लेनदारी और देनदारी

नीरज दइया
इज्जत के ठेकेदारों का कहना है कि इज्जत देकर ही ली जा सकती है। गुंडाराज के हिमायतियों का भी मानना है- इज्जत देने-लेने की वस्तु है ही नहीं, उसे तो बस लूटा जा सकता है। ऐसे लोगों को इज्जत देने में ही भलाई है क्यों कि वे इज्जत का फलूदा अपने बाएं हाथ से करते हैं। शरीफ आदमी को बस अपनी इज्जत बचानी आती है, उसे इज्जत लूटनी नहीं आता। शरीफ आदमी अपनी इज्जत लुटकर भी मौन रहता है। इज्जत और मुंह का चोली-दामन का साथ है। इसमें जीभ का कमाल कौन नहीं जानता! जीभ के कारनामों से भी इज्जत का ग्राफ बदलता है।
मैं इज्जतदार आदमी हूं। आपको बस इज्जत बचाने के कुछ तरीकों साझा करता हूं। पहला तरीका तो यह है कि किसी को पुकारना हो तो सदा अदब से पुकारें। जैसे फन्ने खां को आप पुकारना चाहते हैं तो केवल फन्ने खां नाम लेखर पुकारना सरासर गलत है। शरीफ आदमी को चाहिए कि वह कहे- श्रीमान फन्ने खां जी साहब जी हजूर को तहे दिल की गहराइयों से प्रणाम। बंदगी करते हैं कि जनाव हमारा सलाम कवूल करें।
पढ़े-लिखें और भाषा के जानकारों के साथ बड़ी समस्या यह है कि वे इज्जत देना जानते ही नहीं। कहेंगे कि इतने विशेषणों की अबश्यकता नहीं। यह अनर्गल भाषा है। व्याकरण सम्मत नहीं। मैं पूछता हूं- विशेषणों की जरूरत क्यों नहीं है, इन विशेषणों से ही तो इज्जत की देनदारी और लेनदारी का संबंध है। आपको जानना चाहिए कि इससे सामने वाले को कितनी खुशी मिलती है। अगर हम इज्जत दे रहे हैं यह अहसास भी तो होना चाहिए। दुनिया में विशेषण और उपमाएं बने किस लिए हैं? श्री के साथ श्री श्री एक सौ आठ या हजारों लाखों में श्री का संख्यात्मक रूप इज्जत देना है। नाम का महत्त्व नहीं है जितना उसके आगे-पीछे के लगे श्री और जी का है। इसी से तो दिनग्रह बदलते हैं।
वैसे कुछ अफसर और साहब लोगों को सूखी इज्जत फसंद नहीं होती है। वे चाहते हैं कि बहुत इज्जत देनी ही है तो साथ में कुछ ऐसा दो जो काम आए। ऐसे इज्जतदार लोग अपनी इज्जत नगदी के लेन-देन में अधिक खुश होते हैं। वैसे इज्जतदार आदमी तो कुछ लेते-देते डरते हैं पर सीधे-सीधे कैसे पता चले कि कौन इज्जतदार है और कौन सूखी इज्जत नहीं वरना चुपड़ी-चुपड़ी और दो-दो इज्जत चाहता है। ऐसे चाहने वालों के लिए आपको धी पास रखना चाहिए कि पांचों अंगुलियां धी में डूबो देने में सफल हो जाएं।
पंच काका कहते हैं कि आज के दौर में इज्जत दो कौड़ी की रह गई है। सच्चाई यह है कि खुद भीतर झांक कर देखेंगे तो पता चलेगा कि फूटी कौड़ी की इज्जत भी किसी के पास नहीं बची है। अब यूज एंड थ्रो के इस जमाने में इज्जत देने-लेने के चक्कर में कोई किसी का इंतजार नहीं करता। एडवांस तकनीक के साथ बाजार का कमाल है कि इज्जत देने-लेने के साथ ही लूटने-लुटाने की अनेक दुकानें खुल गई हैं। पहले आप जिस इज्जत को इज्जत समझते थे, वह बीते जमाने की बात हो गई है। नए वक्त के साथ जीना सीखो। यह दौड़ती-भागती शताब्दी है, यहां इज्जत को खूंटी टांग कर घर से बाहर निकलो इसी में भलाई है। क्या समझें? नहीं समझे क्या? समझ जाओगे।
००००

18 अक्तूबर, 2017

‘पाछो कुण आसी’ - मानवीय संवेदनाओं व हेत-प्रेम के जीवंत चित्र

० सी.एल. सांखला, कोटा
    मनुष्य होने की पहचान उसके अंतस में हेत-प्रेम व मानवीय संवेदनाओं का संचरण ही है। संवेदनाओं की सघनता मनुष्यता को सही मायने में प्रामाणिक बनाती है। अमूर्त भावनाओं का जितना अधिक जुड़ाव जीवन से होता है, वे उतनी ही तीव्रता से कविता में ढलकर समूर्त होने लगती है।
    राजस्थानी कविता और गद्य में अपनी गहरी पकड़ व पैठ रखने वाले नीरज दइया तीन चार दसकों में जो साहित्य सर्जना की है, बेहद मूल्यवान है। कविता संग्रह ‘साख’ (1997), देसूंटो (2000), हिंदी कविता- ‘उचटी हुई नींद (2013) तथा ‘आलोचना रै आंगणै’ (2011), ‘बिना हासलपाई’ (2014) आदि उम्दा रचाव के साक्ष्य हैं। वर्ष 2015 में सर्जना बीकानेर से प्रकाशित राजस्थानी कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं मनुष्य की आंतरिक संवेदनाओं व हेत-प्रेम की सशक्त अभिव्यक्ति है।
    वक्त की गिरफ्त में संवेदना शून्य हुए व्यक्ति को जगाने व पुनः संवेदित करने के सद्प्रयत्न में कवि बार-बार ‘हेलो’ करता है-
म्हैं हेलो करूं
हेला माथै हेलो करूं
बारंबार करूं
दिन-रात करूं
मन-आंगणै करूं...
कदैई तो सुणैला थूं। (हेलो)
    कवि की दृष्टि में संवेदनशील मानवीय चेतना से मिलन अथवा अनुभूति ही सही मायने में पुण्य कर्म या सौभाग्य है तथा उससे परे हो जाना ही पाप या दुर्भाग्य है। कवि को यह दृष्टि यथार्थ व आदर्श तथा विज्ञान व अध्यात्म को सुसमन्वित करती है-
        थारी ओळूं में जीवणो
        पुन्न है म्हारो
        थनै बिसरावणो पाप। (पाप-पुन्न)
    मनुष्य जीवन एक सत्य है परंतु मृत्यु उससे भी अधिक ठोस सत्य है। जीवनदात्री बहमाता जब अतिरिक्त जीवन शक्तियां देती हैं तो मुस्कुराती है। साथ ही कवि भी मुस्कुराता है। दोनों जानते हैं कि जीवन से पहले मृत्यु लिखी जा चुकी है-
        जीवण सूं पैली मौत लिखी
        कीं देवण लाग्या जद बैमाता
        मुळक्या
        मुळक देख’र मुळक्यो म्हैं। (बिसरगी मुळकती-मुळकती)
बहुत ही कम शब्दों में कवि नीरज दइया बहुत बड़ी बात कहने में सिद्धहस्त हैं-
        लोग मौको तकै
        ठाह ई कोनी लागण देवै
        काट’र लेय जावै नस। (लोग मौको तकै)
दइया की इन कविताओं में रोमांचक रूपक एवं बिम्ब योजनाएं दृष्टव्य है-
        आंख री छियां-छियां
दीठ लेय’र जावै
सुपना रै देस। (मिनख एकलो कोनी)
    अंतरंग रागात्मकता और मानवीय हेत-प्रेम मनुष्यता की कसौटी भी है जो इन कविताओं में बखूबी देखी जा सकती है-
थारी ओळ्यूं मांय
खदबदीजै काळजो
बरसै बादळां दांई
थारी हूंस... ! (हूंस)
    कवि मानव मन की इच्छा शक्ति तथा क्रियाशीलता को जिंदगी के लिए आवश्यक मानता है अन्यथा जिंदगी व मौत में कोई अंतर नहीं रह जाता। ‘सगळा मारग’ कविता से ये पंक्तियां शायद यही बात कहती है-
जे मिलण री हूंस नीं
कांई करैला संजोग
आपां रै मून रैयां
मर जावैला
सगळा मारग। (सगळा मारग)
    वस्तुतः ये कविताएं अमूर्त भावों की कोरी कल्पनाएं न होकर साधारण आदमी की जद्दोजहद एवं जीवट की मूर्त अभिव्यक्ति है। जिनमें संदेश भी है और प्रेरणाएं भी-
साची ! अंगूठो कैवतां ई
म्हारी आंख्यां साम्हीं आवै- गुरु द्रोण
जे कर लेवूं आंख्यां आडो हाथ
लखावै- गायब हुयग्या म्हारा अंगूठा...। (अंगूठो)
    ‘पाछो कुण आसी’ कविता संग्रह की सभी कविताओं में यूं तो छंद मुक्त कविताएं है जिनमें गद्य कविताओं की बानगी हैं, किंतु सही मायने में ‘गद्य कविताएं’ शीर्षक देकर जो संकलित है उनमें ‘चालो माजी कोटगेट’, ‘इंदरधनुस’, ‘ऊंट’, ‘चकारियो’, ‘भींत’, ‘धीरज’, ‘प्रेम’ आदि कविताएं पढ़ना व समझना जरूरी है। यह एक बेजोड़ संग्रह है। इनमें अतीत के गुणगान नहीं, वरन गुजरे वक्त की जीवंत बची धड़कने साफ सुनाई देती है। यहां समय के साथ कदमताल करती जिंदगी तथा बदलते समय की आबोहवा में सांस लेती मनुष्यता की लिखावट में तृष्णा और भटकाव है तो भविष्य की असल कथाएं कहती कविताएं भी। भले ये कविताएं सम्मोहन पैदा न करती हो, पर यथार्थ की परते खोलती हुई पथराई आंखों को खोलती है तथा सुप्त संवेदनाओं को जगाती है। यहां मानवीय जीवन का अद्भुत व सौम्य चित्रण सहज ही देखने को मिलता है। माटी की सौंधी महक से नहाए हुए शब्द एवं राजस्थानी मुहावरों से सुगुंफित कवितांश व काव्यावलियां पाठक को सहज ही प्रभावित करने वाली है।
पुस्तक-        पाछो कुण आसी
विधा-           राजस्थानी कविता संग्रह
कवि-           डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक-     सर्जना प्रकाशन, बीकानेर
कीमत-        140 रिपिया
संस्करण-     2015
पृष्ठ-             96


दैनिक युगपक्ष 07-11-2017 

16 अक्तूबर, 2017

चेखव की बंदूक बुलाकी शर्मा के पास है

० नीरज दइया

मैं सत्यनिष्ठ यह घोषणा करता हूँ कि आज से पहले मैंने कभी कोई संस्मरण नहीं लिखा है। साथ ही यह भी कि जिस व्यंग्य लेखक बुलाकी शर्मा पर संस्मरण लिखना है वे विल्कुल कोरे हैं, अर्थात उन पर कोई संस्मरण लिखा नहीं गया है। अगर आप अपनी रिक्स पर यह पढ़ना चाहते हैं तो आभार। एक संस्मरण क्या मैं इतना प्रतिभावान हूं कि शर्माजी की पूरी जीवनी लिख सकता हूं।
समस्या यह है कि आजकल कोई किसी को महान नहीं कहता। यहां गिव एंड टेक का फार्मूला बेस्ट है। तुम मुझे गोडफादर कहो, मैं तुम्हें जीनियस कहूंगा जैसी अटकलें सर्वविदित है। यह संस्मरण जिस पत्रिका में आप पढ़ रहे हैं, उसके संपादक बड़े खेले हुए खिलाड़ी है। इन्होंने व्यंग्य विधा को और व्यंग्य विधा ने इनको इतना मांजा है कि काले बालों का पूरा मैल उतर कर सफेद-झक्क हो गए। यह संस्मरण मैं जापानी तकनीक से बने एक ओटोमैटिक पेन से लिख रहा हूं। इस पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए हैं। लिखते समय अगर मैं तयशुदा पटरी से नीचे उतरा कि पेन लिखना बंद कर देगा। इतना ही नहीं देखिए- सुना आपने सीटी बजी ना।
बुलाकी शर्मा हिंदी और राजस्थानी दो भाषाओं में लिखते हैं। वे तीसकी भाषा अंग्रेजी जानते हैं। पर इतनी नहीं जानते कि साहित्य सृजन कर सकें। ऐसा भी कह सकते हैं कि इसमें उनको इतना कोन्फीडेंस नहीं हुआ कि कुछ लिखने का ट्राई करते। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बाल-साहित्य का राजस्थानी अनुवाद किया, जो साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। इस बीच एक रहस्य यह है कि बे बांगला नहीं जानते और मुस्कुराते हुए कहते हैं कि अनुवाद का अनुवाद किया है।
हम दोनों बीकानेर के मूल निवासी हूं। हमारे पास इसका प्रमाण-पत्र भी है। बिना प्रमाण पत्र के सत्य भी झूठ है। किंतु यह ऐसा सत्य है जिसे हम झूठलाना चाहते हैं। एक बार मैंने किसी अन्य प्रसंग में बुलाकी शर्मा के लिए जब लिखा बीकानेर के साहित्यकार तो बे बोले बीकानेर शब्द हटा दो। साहित्यकार किसी एक शहर का नहीं होता। मुझे भी यह ठीक लगा और मैंने उनके सामने ही बीकानेर शब्द के स्थान पर राजस्थान लिख दिया तब भी उन्हें आपत्ति थी। वे पूरे देश और विश्व के साहित्यकार होना चाहते थे। अब साहित्य अकादेमी का मुख्य पुरस्कार इस बात का प्रमाण है कि वे एक भारतीय साहित्यकार हैं।
भारतीय साहित्यकर बुलाकी शर्मा को अकादेमी पुरस्कार का रहस्य मेरी भाभी जी राधा शर्मा ने खोल दिया है। उनकी धर्मपत्नी यानी बकौल हमारी भाभी साहित्य अकादेमी पुरस्कार इसलिए मिला कि पुरस्कृत पुस्तक के लोकार्पण में वे उन्हें पहली बार साथ ले गए थे। बाकी किताबों का लेखा-जोखा यह है कि वे या तो लोकार्पण करवाते ही नहीं और कभी किसी कृति का लोकार्पण करवाया तो सपत्नीक नहीं पहुंचते। इसके साथ ही भाभी जी ने यह भी बताया कि पुरस्कार समारोह में भी वे उनके साथ दिल्ली गई थीं और भव्य आयोजन में वे उन्हें देख कर मुस्कुरा रहे थे।
बुलाकी शर्मा कवि नहीं है। उनका कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है। खबर है कि वे कविता के पाठक और प्रेमी है। गोपनीय बात यह है कि प्रेम-कविताएं छुप कर लिखते हैं और छुपा कर रखते हैं। सार्वजनीक बात यह है कि कविता-संग्रहों की समीक्षाएं लिखने से परहेज नहीं है। चूंकी वे कभी भी कवि हो सकते हैं क्यों कि कवि कम शब्दों में काम चला लेते हैं और कहानी-व्यंग्य में शब्दों का कुछ अधिक उपयोग करना होता है। इस पीड़ा का आंशिक इलाज उन्होंने व्यंग्य विधा में इस प्रकार किया है कि पहले वे लंबे व्यंग्य लिखा करते थे अब व्यंग्य लिखने से पहले मन में उसे धो लेते हैं और इतना धोते हैं कि धो धो कर उसे छोटे साइज का कर देते है।
‘धोना’ क्रिया के संग वे प्रेम से सपत्नीक संलग्न है। घर में बर्तन और कपड़े भाभीजी धोती हैं और वे व्यंग्य में अपनी मरजी से पूरे देश-दुनिया को धोते हैं। वे अपने चालीस वर्षीय अनुभव के आधार पर शरमाते हुए कहते हैं कि वर्ष 1978 में ‘मुक्त्ता’ पत्रिका में ‘बजरंगबली की डायरी’ से उन्होंने अपने आपको व्यंग्य लेखन मान लिया था। बाद में वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, आजकल, अमर उजाला, ट्रिब्यून, सन्मार्ग आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य समेत विविध विधाओं में प्रकाशित हुए। अब उनके पास खुद ऐसी कोई लिस्ट नहीं है कि वे कब-कब कहां-कहां छपे। इसलिए ऐसा कहना ठीक रहेगा कि उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।
बुलाकी शर्मा क्या मैं व्यंग्यकार हरिशंकर परसांई तक को बहुत बाद में पहचान पाया। यह तो भला हो के.पी. सक्सेना और श्वेत-श्याम टेलीविजन युग का कि उन्होंने एक कवि सम्मेलन में ऎखा व्यंग्य पढ़ा। मैंने व्यंग्य क्या सुना, मैं व्यंग्य का मुरीद हो गया। फिर तो शरद जोशी का प्रतिदिन कॉलम पढ़ने लागा। बहुत बाद में पता चला कि मेरे घर जो बहुत सारी पुस्तकें हैं और पिताजी लिखते-पढ़ते रहते हैं वे भी व्यंग्यकार हैं। मेरे स्व. पिता श्री सांवर दइया ने साहित्य के प्रति मेरी प्रतिभा का आकलन मेरी युवावस्था में कर लिया था। वे अपनी रचनाएं मुझे सुनाया करते थे। उनके राजस्थानी व्यंग्य मुझे सुनने पड़ते थे। बाद में उन्होंने मेरा प्रमोशन किया और मैं उनकी रचना का पहला पाठक होने लगा। पेन रुक रहा है। विषयांतर हो रहा है।
राजस्थानी के संदर्भ में हरिशंकर परसांई को दो टुकड़े करने पड़ेंगे। राजस्थानी के हरिशंकर परसांई बुलाकी शर्मा हैं या मेरे स्वर्गवासी पिता सांवर दइया हैं इस बात पर संदेह है। वोट किए जाएंगे तो दोनों को आधे आधे मत मिलेंगे। फिर पेन रुक रहा है। तो आप जान लिजिए कि राजस्थानी में बुलाकी शर्मा के दो व्यंग्य संग्रह ‘कवि कविता अर घरआळी’ (1987) तथा ‘इज्जत में इज्जाफो’ (2000) प्रकाशित हैं। जिनमें 32 व्यंग्य हैं। हिंदी में चार व्यंग्य संग्रह- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ (1997), ‘रफूगीरी का मौसम’ (2008), ‘चेखव की बंदूक’ (2016) और ‘आप तो बस आप ही हैं !’ (2017) प्रकाशित हैं। जिनमें 156 व्यंग्य हैं।
बुलाकी शर्मा कालम राइटिंग के लिए भी जाने जाते हैं। पहले जब धारदार व्यंग्य लिखते थे बहुत डरते थे। सोचते थे कहीं कोई लड़ाई नहीं कर बैठे इसलिए वे छद्म नाम से लिखा करते थे। अब तो यह रहस्य खुल गया कि दैनिक भास्कर बीकानेर में अफलातून नाम से लंबे समय तक ‘उलटबांसी’ लिखने वाले कोई दूसरे नहीं अफलातून शर्माजी हैं। लोगों को उन पर पहले भी शक था। बीकानेर के ‘विनायक’ में ‘तिर्यक की तीसरी आंख’ में भी डरपोक बुकाकी शर्मा लंबे समय तक लिखते रहे। बाद में जब सरकारी सेवा से शर्माजी ने ऐच्छिक सेवानिवृति ली, तब से ‘विनायक’ में तिर्यक का रहस्य भी खोल दिया। रहस्य यह भी है कि सरकारी सेवा से सामन्य ढंग से मुक्त होने पर लोगों को पता चल जाता है कि उम्र साठ हो चुकी है। बस साठ को छूने से दो-चार महीने आपने ऐच्छिक सेवानिवृति का नाटक दिखाया और घर बैठ गए। सरकार के घर बिठाने और खुद के घर में खुद बैठने में तनिक अंतर है। जवान शर्माजी को जो जानते हैं वे यह जान ले। भ्रम में मत रहना काल बाल जो दिखते हैं, सब डाई का कमाल है। लेखा-सेवा वाले सफेद को काले और काले को सफेद करने का मर्म बखूब जानते हैं। इतने वर्षों तक व्यंग्य लिखने वाले शर्माजी अब बहादुर बन चुके हैं। वे अपने नाम से लिखने लगे हैं। दैनिक युगपक्ष में ‘शब्द बाण’ कालम उनके नाम से प्रत्येक रविवार पढ़ा जा सकता है।
पहले बुलाकी शर्मा बड़े आकार के व्यंग्य लिखा करते थे आजकल व्यंग्य का आकार कालम के चक्कर में छोटा करते गए हैं। कहना चाहिए कि तलवार और गुप्ती का काम वे अब कटार और चाकू से निकालने का फार्मूला जान गए हैं। वैसे भी धारदार हथियार रखना कानून अपराध है। गुप्त बात यह है कि जब यह रहस्य उजागर हुआ कि ‘चेखव की बंदूक’ बुलाकी शर्मा के पास है। तब उन्होंने एक व्यंग्य लिखा ‘चेखव की बंदूक’ और कालांतर में इसी नाम से व्यंग्य संग्रह प्रकाशित करवा कर मित्रों को बांटने लगे जिससे कि असलियत इस मजाक में छिप जाए। हुआ यह कि कुछ मित्रों ने मेरी अक्कल निकाल ली और बोले- तुम शर्माजी को भाई साहब कहते हो और घर आते-जाते हो, पता करो कि चेखव की असली बूंदक उन्होंने कहा छिपा कर रखी है।
मैंने एक बार उनके घर मौका मिलने पर खोजा तो बंदूक तो नहीं मिली पर बारूद का खजाना मिला। बारूद इस अर्थ में कि वे ना जाने किस वर्ष से लगातार डायरी लिखते है और असली डायरी लिखते हैं जिसमें जिस किसी चेहर पर कोई मुखौटा अगर उन्होंने देखा है तो उसे भी दर्ज कर दिया है। बुलाकी शर्मा वास्तव में बजरंग बली है जो आज तक अच्छा-बुरा सब कुछ सहन कर सभी से अच्छे संबंध बनाएं हुए हैं किंतु डायरियां जो चुपके से सरसरी निगाह में देखी गई कुछ अंश पढ़े गए से ज्ञात होता है कि उनके आस-पास की असलियत क्या रही हैं। मित्रों के अनेक राज दफन किए हैं। किसी दिन सच्ची बही सामने आ गई तो यकीन जानिए कि वो बारूद का असला होगा कि बहुत-सी चलती दुकाने बंद हो जाएंगी। पेन रुक रहा है और वैसे भी ऐसी नितांत निजी बातें कम से कम मुझे सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए बेशक भले मेरी अक्कल निकाल ली गई हो फिर भी इतना होश तो मुझे है।
क्या यह कमाल नहीं है कि 188 व्यंग्य पुस्तकार होने के बाद भी अब भी उनके मन में यह बात बार बार आती है कि व्यंग्य संग्रह आना चाहिए। एक हिंदी में एक राजस्थानी में। उनके व्यंग्य खजाने में अब भी दस व्यंग्य प्रकाशित हो जाएं जितना मसाला है। संभव है कुछ ऐसा हो भी। होना भी चाहिए। उन्हें व्यंग्य विधा के लिए अनेक सम्मान मिले हैं। बीसवीं शताब्दी में यानी 1999 में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ने पुरस्कृत किया। नवीन शोध से पता चला है कि बुलाकी शर्मा बिना चोटी रखे देश में चोटी के व्यंग्यकार बनना चाहते हैं। पुरानी बात है कि एक चोटी वाले ज्योषित ने उन्हें कहा कि बुलाकी तुमको उदयपुर अकादमी से संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ के लिए पुरस्कार इसलिए मिला कि उस में 21 व्यंग्य थे। अब इस आंकड़े को पकड़ लो और अगर पुरस्कार पाना है तो अगले व्यंग्य संग्रह में 21 व्यंग्य ही आने चाहिए। हमारी भाभीजी वहीं बैठी वार्ता सुन रही थी जो तपाक से बोली- महाराज इन दिनों ये छोटे साइज के व्यंग्य लिखते हैं तो किताब छोटी होगी इसलिए कुछ दूसरा उपाय बताओ?
बुलाकी शर्मा पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वे पूरे विश्वासी है। कभी कभी अंधविश्वासी भी बन जाते हैं खासकर पुरस्कार लेने का मसला हो तो। ज्योषित ने बोला था कि 21 नहीं तो 42 व्यंग्य ले लो। देखिए उनके अगले व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम में’ यही हुआ है। जब मामला नहीं बैठा तो ‘चेखव की बंदूक’ में 51 व्यंग्य रखे गए और इसकी भनक जैसे ही ज्योषित महाराज को हुई वे उनके घर पहुंच गए और इसी वर्ष प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘आप तो आप ही हैं !’ में 42 व्यंग्य ही रखे गए हैं। मैं ज्योषित नहीं जानता पर राय देने का अवसर नहीं छोड़ना चाहता। कुछ अटपटी बात कहने से चर्चा होती है। सीधी-साधी बात पर कौन दिल फेंकता है। मेरा दावा है कि अगर इक्कीस-इक्कीस व्यंग्यों के इक्कीस संग्रह बुलाकी शर्मा के निकाले जाएं तो उन्हें चेखव की बंदूक जो असली वाली उन्होंने छिपा कर रखी है बेचनी पड़ेगी। एक पंथ दो काज का इससे बढ़िया उदाहरण नहीं हो सकता। यह एक झलक है हमारे स्वदेशी शोध की।
वैसे हमारे देश में शोध की हालत यह है कि बुलाकी शर्मा जैसे बड़े व्यंग्यकार पर कोई बड़ा शोध नहीं हुआ है। हां, बुलाकी शर्मा के लेखन पर यूनीवर्सिटी के कुछ बालक और बालिकाओं ने लघुशोध लिखें है, व्यक्तिगत और सामूहिक। सारी स्थितियों को देखते हुए और व्यंग्यकार शर्माजी की साठी-पाठी उम्र का ध्यान रखते हुए, एक नवजात व्यंग्यकार नीरज दइया ने उनके समग्र लेखन पर आलोचनात्मक पुस्तक का मानस बनाया है। व्यंग्य-यात्रा के संपादकजी संस्मरण में व्यंग्य की फुल मात्रा डालने का आदेश दे रहे हैं तो उनकी प्रेरणा से ही इस आलेख को मेरे मानस ग्रंथ का हिस्सा मान लिया जाए। मिलावट का दौर है। शुद्धता जैसी चीज बाजार में अब बची नहीं। बचा हुआ है अथवा अगर बचाना हो तो प्रेम को बचाएं। जहां प्रेम का आकाल हो तो प्रेम जनमेजय या बुलाकी शर्मा का स्मरण किया जाए। उनकी आत्मीयता से आपके हदय में प्रेम स्रोत से प्रेम छलकने लगेगा। देखिए- सुना आपने सीटी बजी। पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए थे इसलिए पेन रुक रहा है। लो एकदम रुक गया।
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लक्ष्मी-सरस्वती संवाद

डॉ. नीरज दइया
ताजा ताजा खबर है कि घटिया स्कूली शिक्षा देने के मामले में भारत को सिल्वर मेडल मिला है। वर्ल्ड बैंक के इस परिणाम में कहीं कोई चूक हुई है वर्ना हमें गोल्ड की उम्मीद थी। सर्वे और सैम्पल टैस्ट में हमारे बच्चों में नकल की बीमारी के कारण हम थोड़ा पिछड़ गए हैं। पिछड़े हुए है तो क्या हम मिडल क्लास परिवार वाले मंथली बजट में खाने-पीने के खर्चे के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्च शिक्षा पर करते हैं। सरस्वती हम पर मेहरबान हो इसलिए लक्ष्मी को लुटाते हैं। हाल यह है कि सरस्वती की कृपा होती नहीं और जो कुछ लक्ष्मी कृपा हमारे पास होती है उस से हाथ धो बैठते हैं। काश कि सरस्वती के चक्कर में लक्ष्मी को बर्बाद नहीं करते तो वर्ड बैंक द्वारा घटिया स्कूली शिक्षा में तो अव्वल घोषित हो जाते। इसी मुद्दे को लेकर लक्ष्मी-सरस्वती में जोरदार भिडंत हो गई।
लक्ष्मी - देश में रक्षा और शिक्षा पर सर्वाधिक अधिक खर्च होता है। फिर भी तुम निहाल क्यों नहीं करती?
सरस्वती - यह मेरी मर्जी है किसे निहाल करूं किसे बेहाल, तुम मुझे पूछने वाली होती कौन हो?
लक्ष्मी- मैं होती कौन हूं, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे सवाल करती हो। जुबान लड़ाती हो !
सरस्वती - जुवान लड़ाने से क्या मतलब है तुम्हारा। अरे सारा खेल ही इसी जुबान का है। बच्चों को स्कूल में सब बातें करनी आती है पर तुम्हारे गणित के सवाल ठीक से करने नहीं आते। जहां तुम तुम्हारा नाम वहां सब घोटाला।
लक्ष्मी - अरे जा जा, तुम भी दूध की धुली नहीं हो। मुझे क्या पता नहीं है कि बच्चे किताब पढ़ना ही नहीं जानते हैं। पहले तुम अपनी कृपा करो कि वे किताब ठीक से पढ़ना जान जाए। दो अंक ठीक से लिखेंगे तभी तो गणित के सवाल ठीक से कर पाएंगे।
सरस्वती - मैं तो सब कुछ कर दूं पर तुम जो बीच में टांग अड़ाती रहती हो, उसका क्या ? बात होती है शिक्षा की और सब बजट की बातें करते हैं। तुम को पाने के और अपने घर भरने के लिए नई नई योजनाएं लाते हैं, उसका क्या। अरे जब सबकी नजरों में तुम ही तुम हो तो मैं अपनी कृपा क्यों बरसाने लगी। मैं भी देखती हूं कि तुम्हारे बल पर ये कितनी उछल-कूद करते हैं।
लक्ष्मी - अरे रहने दे, रहने दे, मेरे बिना तो कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। तुम्हारे विद्या मंदिर के गुरुजी भजन कोई फ्री में नहीं करते। उन सब को मेरे से उम्मीद होती है। ये कहने को सरस्वती पुत्र जरूर है पर मेरी औलादों के बिना सब फीके हैं। पगार के कारण सारे खेल होते हैं।
सरस्वती - कलम के धनी साहित्यकार तो मेरे उपासक है।
लक्ष्मी - यहां भी तुम झूठी साबित हो जाओगी। देखती नहीं ये पुरस्कारों के लिए कैसे कैसे छल-छद्म करते हैं। सारी साठ-गांठ तिकड़म और सेठ-साहूकारों की माया से बनाने-बिगाड़ने वाले पुरस्कारों की है। ये नाम के सरस्वती पुत्र है पर भीतर ही भीतर सब के सब ढोंगी बाबा है।
सरस्वती - हे कलम के धनी साहित्यकार ! क्या तूं मेरा सच्चा उपासक है? बोल वत्स....
मैं असमंजस में पड़ गया कि कहीं मेरे झूठ को मां सरस्वती जान नहीं जाए फिर भी प्रत्येक में बोला- हां-हां मैं सच्चा उपासक हूं और अज्ञात भय के मारे आंखें खुल गई।
पास बैठे पंच काका पूछ रहे थे- क्या कोई सपना देखा? मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि रात को ये पढ़ना लिखना छोड़, पूरी नींद लिया कर। बात तो बराबर है, रात में जागता है और दिन में सोता है।
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09 अक्तूबर, 2017

टांय टांय फिस्स

पुस्तक समीक्षा-
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टांय टांय फिस्स   व्यंग्यकार : डॉ. नीरज दइया प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग) बीकानेर पृष्ठ : 96 मूल्य : 200/- संस्करण : 2017   
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    राजस्थान के व्यंग्य लेखन परिदृश्य में आज फारुख अफरीदी, अतुल चतुर्वेदी, अनुराग वाजपेयी, अजय अनुरागी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य आशावादी, नवनीत पांडेय और अब नीरज दइया भी शामिल हो गये। डॉ. नीरज दइया के सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ में उनके चालीस व्यंग्य संकलित हैं। इन व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कहा जा सकता है कि डॉ. नीरज दइया उन व्यंग्यकारों में से एक हैं जिनके लेखन में भौतिकतावादी संस्कृति का एहसास हावी नहीं हुआ हैं। अथवा यूं कह लीजिए कि वे अपनी चिंताओं में मनन करने वाले अन्वेषी हैं। अन्वेषक का काम ही अनुसंधान करने का होता है। नए-नए तथ्यों को तलाशना और उस पर मौजूं तरीके से अपनी बात को कहना होता है, जिस पर नीरज दइया को विशेष अधिकार प्राप्त है।
    नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती है, वहीं उनकी सक्रियता को भी दर्शाती है कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्य से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
    संग्रह के आरंभ में प्राक्कथन में वरिष्ठ साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने लिखा है- ‘डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है।’ इस उक्ति के साक्ष्य में देखें तो संग्रह में संकलित विविध वर्णी व्यंग्यों में नीरज के लेखन में एक ताजगी दिखती है, वह विषयों को समाज से ही उठाते है लेकिन उसको प्रस्तुत निराले ढंग से करते हैं।
    संग्रह की सभी व्यंग्य रचनाओं में एक स्थाई चरित्र के रूप में पंच काका की उपस्थिति से अपनी मौलिकता और निजता बनी है। पंच काका के माध्यम से अनेक सत्यों को उद्धाटित किया है तो व्यंग्यकार नीरज दइया ने व्यंग्य करते हुए खुद को भी नहीं छोड़ा है। वे अपने आप पर व्यंग्य करने का कौशल रखते हैं इसिलिए उनके व्यंग्य में शालिनता और शिष्टता एक स्थाई भाव के रूप में देखी जा सकती है।
    विगत दो वर्षों से मैं उनके लेखन का साक्षी रहा हूँ, वे नियमित रूप से कालम लेखन में भी हाथ आजमा रहे हैं। उनका यह हुनर पक्का तीरंदाज बनाने में कामयाब रहा है। रोजमर्रा के विषय कब व्यंग्य के विषय बन जाते है और कब विसंगतियां उस पर हावी हो जाती है। यह एक प्रकार की बैचैनी है, जो लेखक को औजार देती है कि अब आपका काम है कि रनदे से उस वास्तविकता को निखार कर उसे नए अर्थ से भर दें, या उसे परिभषित कर दें। नीरज दइया के लेखन में कहीं कोई दुराव या छिपाव नहीं है। जैसे बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद को बेचने के लिए हथकंडे अपनाती है। ऐसा कुछ भी यहां देखने को नहीं मिलेगा। कोई कंडीशन अप्लाई वाला बोर्ड यहां चस्पा नहीं। अपने लेखन से विशुद्ध सरोकार रखने वाले व्यंग्यकार नीरज दइया कभी किसी दौड़ में शामिल नहीं रहे। लेकिन लेखकीय गुण, माहौल उन्हें शुरू से ऐसा मिला कि वे खुद भी मौलिक लेखन के अंतर्गत कविता-आलोचना और अनुवाद-कर्म करते हुए व्यंग्य लेखन में पूरी ठसक के साथ आ गए।
    समकालीन व्यंग्य रचनाओं में बदलती स्थितियों के साथ त्वरित टिप्पणियां भी शामिल होने लगी है। हर्ष का विषय है कि इस संग्रह में समकालीनता का आग्रह होते हुए भी स्थितियों पर गहनता से सोच-विचार कर उनको आधार बनाया गया है। जीवनानुभव और जीवन की स्थितियों से मुठभेड़ करते हुए नीरज दइया ने मीठी आलोचना का मीठा फल!!, रचना की तमीज, ‘सामान्य’ शब्द कैसे है सामान्य, खाने-पीने की शिकायत, विकास का गणित, साहित्य माफिया, याद नहीं अब कुछ, बेईमानों पर पड़ी बड़ी मार और टांय टांय फिस्स आदि व्यंग्य लिखते हुए व्यंग्य की लाठी को बचाए रखा है। 
    नीरज दइया का लेखन विश्वसनीय है। समाज के विषय अब उनके विषय होते जा रहे हैं। व्यंग्य लेखन का दर्द वे समझते है और तभी उनके पास विसंगतियां आकर मुस्कराने लगती हैं। उनके तेवर को देख कर लगता है कि उनकी आलोचना में भी अच्छी पकड़ हो सकती हैं। विषय में से अपने हिस्से की धूप निकाल लेना नीरज दइया भली-भांति जानते है। टांय टांय फिस्स व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य निश्चित ही पठनीय है, और पाठकों द्वारा पढ़े जा रहे हैं। व्यंग्य-यात्रा के सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय का यह कहना कि व्यंग्य लेखन ऐसा धारधार विषय है कि वह इतना पैना है कि सामने वाले को भयभीत कर दें, लेकिन बिना अहित किए। इससे साफ जाहिर है कि नीरज दइया के पास एक सशक्त भाषा है जिसका उपयोग वे अपने लेखन में बेबाक तरीके से कर रहे हैं। कहीं-कहीं उनके लेखन में हरीश नवल जैसे अत्यंत शालीन व्यंग्यकार बोलते दिखते है तो लगता है कि ‘टॉय-टॉय फिस्स’ को पहचान मिलने में अब देर नहीं। नीरज दइया को लेखन में श्रीलाल शुक्ल होना है, तो मार्कें का सुभाष चन्दर भी। फिलहाल व्यंग्यकार डॉ. दइया को शुभकामनाएं कि उनका लेखन यशस्वी हो, वे अपने पाठक अर्जित करें। पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति के लिए प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं।
- डॉ लालित्य ललित
सम्पादक, नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया,
नेहरू भवन, 5,इंस्टिट्यूशनल एरिया,फेज-2,
वसन्त कुंज,नई दिल्ली-110070


हंसों और कव्वों की भई दोस्ती

० डॉ. नीरज दइया
    सच और झूठ के मेल से दुनिया चलती है। जब यह मेल गड़बड़ाता है तो गाड़ियां पटरियों से उतरने लगती है। पटरियां मजबूत है, पूरी व्यवस्था है। फिर भी यदि गाड़ियां अपना धर्म छोड़े क्या करें? जब धर्म की डोर में बंधे बाबा अपने धर्म से भ्रष्ट हो तो क्या करें? अब तो कौन कितना चोर हैं, पता नहीं! जो पकड़ा गया वह चोर और नहीं पकड़ा गया वह साहूकार। सच और झूठ का अनुपात ही राम-रहीम से जोड़ता और तोडता है। कोई कहता है कि राम सच्चा, कोई कहता रहीम। कौन सच्चा, कौन झूठा किसे पता? कवि कवीर ने वर्षों पहले कहा था- हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना,आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना। मेरा मानना है- सारा खेल समय और अनुपात का है। इस खेल में दोषी कौन उसे सावित करने की पूरी प्रकिया है। जिसमें समय लगेगा और अंत में दूध का दूध, पानी का पानी होगा। उससे पहले भले आप पानी-पानी होते रहो। माना आप जवानी में केस पाइल करते हैं और बाल सफेद होने पर फैसला आता है। उसके बाद भी अदालत एक नहीं, अनेक है। छोटी अदालत, बड़ी अदालत। नीचली अदालत और उसके बाद ऊपर की अदालत। अंत में सबसे बड़ी अदालत ऊपरवाले की अदालत।
    अगर पर्दे में सब ठीक है तो पर्दे उठाए क्यों जाते हैं? यह कोई नाटक है कि पर्दा उठता-गिरता हैं। यह असल जिंदगी ड्रामा नहीं है। अंधे को अंधा नहीं, सूरदास कहते हैं। हरदम केवल खरे सच से काम कहां चलता है। ना पूरा सच पचता है ना पूरा झूठ। सच की तुलना दूध से की जाती है। दूध यानि जिस में हर कोई अपने हिसाब से पानी मिला कर दूध धुला होने का दावा कर सके। सभी दूध के धुले हो जाएंगे तो दूध देश में कम पड़ जाएगा। दूध तो सबको चाहिए। बूढ़े-जवान-बच्चों सभी को दूध प्रिय होता है। इसलिए दूध और पानी का प्रेम है। इस प्रेम को कोई नहीं समझ सकता। कहा जरूर जाता है कि हंस दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। ऐसा नीर-क्षीर विवेक अब कहां है? अब तो वैसे, वे हंस भी कहां रहे! हालात बदल गए। सभी हंसों ने कव्वों से दोस्ती गांठ ली। वे एक-दूसरे का रूप बदल सकते हैं। ऐसा करना कलियुग में जरूरी हो गया था। मोती कोई खाद्य पदार्थ तो है नहीं, फिर हमारे रामचंद्र ने सिया से कह दिया- ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना-दुनका, कौआ मोती खाएगा। यहां कहने-सुनने में जरूर कुछ फर्क रहा होगा। वैसे तर्क की बात तो यह है कि कौआ मोती खाएगा तो मर नहीं जाएगा! किंतु कभी-कभी ऐसा लगता है कि नए जमाने के हंस ही कव्वों को मोती खाने को दे रहे हैं और ना जाने इनका ऐसा कैसा मेल है कि दोनों के घर भर रहे हैं।
    पंच काका कहते हैं- विद्या और बुद्धि की देवी का वाहन हंस नेताओं के रूप में इन दिनों ज्ञान का प्रकाश फैला रहा है। वे धवल वस्त्र धारण किए अपनी नई चाल में अपने दोस्त कव्वों को काला कोट पहना कर दूध का दूध और पानी का पानी करने का जिम्मा सौंप लोकराज में मस्त हो गए है। नए हंसों और नए कव्वों की मित्रता ने अनेक गाड़ियां पटरियों से उतार दी है, ओर तो ओर बाबाओं की गाड़ियां तो वे एक एक कर बंद करते जा रहें हैं। देखिए अब किसका नंबर है?
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04 अक्तूबर, 2017

मील का पत्थर : आधुनिक लघुकथाएं

पुस्तक: आधुनिक लघुकथाएं (अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में संकलित)
सम्पादक: डॉ. नीरज दइया/श्री राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक: सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर
संस्करण: 2017 ; मूल्य: 100 रूपये मात्र


सृजन-नगरी बीकानेर में 14वें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के पहले ही सत्र में पुस्तक आधुनिक लघुकथाएं का
लोकार्पण होना अपने आप में बीकानेर के लिए बहुआयामी उपलब्धि माना जाएगा। उपलब्धि की पहली बात तो यही है कि यह सम्मेलन यहाँ हो रहा है, इससे इतर उपलब्धियां इस आशय में कि बीकानेर के सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया एवं श्री राजेन्द्र जोशी द्वारा लघु अवधि में स्तरीय लघुकथाएं संकलित करने का सफल प्रयास सामने आया। साथ ही इन संकलित लघुकथाओं को पुस्तकाकार देने में  देशभर में विख्यात सूर्य प्रकाशन मन्दिर के डॉ प्रशान्त बिस्सा एवं उनकी टीम का परिश्रम रंग लाया। इसके उपरान्त विशिष्ट उपलब्धि यह कि इस पुस्तक का लोकार्पण देशभर के ख्यातनाम लघुकथाकारों के सान्निध्य में हो रहा है।
पुस्तक में संकलित लघुकथाएं पढ़ते समय पाठक को प्रत्येक लघुकथा में जहां मानवीय संवेदनाओं का ज्वार उठता महसूस होता है वहीं हर कथा का प्रत्येक पात्र आपको समाज में अपने आसपास देखा, जाना-पहचाना - सा लगता है। यही इन कथाओं की श्रेष्ठता और सफलता का द्योतक है। पुस्तक का आकर्षक आवरण बीकानेर के जाने-माने कलाकार गौरीशंकर आचार्य का बनाया हुआ है, जो कि एक नज़र देखने पर ही गौरीशंकर की अनूठी शैली स्मरण करवा देता है। लघुकथाएं संकलित कर पुस्तकाकार रूप में पाठकों तक पहुंचाने का यह प्रथम प्रयास नहीं है।
इससे पूर्व भी राजस्थान ही नहीं, देश के जाने-माने सृजनकर्ताओं ने श्रेष्ठ रूप में ऐसे सफल प्रयास किए हैं। किन्तु आधुनिक लघुकथाएं का यह संकलन इसलिए भी इतर माना जाना चाहिए कि  इन कथाओं  में एक ओर जीवन मूल्यों को महत्ता दी गई है तो साथ ही हमारे आसपास श्वांसें लेती विसंगतियों को तीक्ष्ण प्रहार के साथ उकेरा गया है। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि लघुकथा की पहचान के तत्वों को इस संकलन में देखा जा सकता है जैसे कि लघुकथा परम्परा में सकारात्मक पक्ष को विकसित करना। ऐसे तत्वों को पुस्तक की प्रथम रचना ‘पास‘ ( अर्जुनदान चारण ) से लेकर अंतिम कथा ‘पेट’ ( पारस दासोत ) तक पाठक बखूबी रेखांकित पाते है।
लघुकथा पास में आजादी के सिपाही और थाने के सिपाही के माध्यम से कथाकार ने देश को आधुनिक दौर तक पहुंचाने वालों की हालत को आसानी से उकेर दिया है। इस कथा में सरकारी, निजी, वृद्ध, जवान, राज का नौकर और निजी क्षेत्र का कामगार वर्ग की स्थिति का रेखांकन यूं हुआ है मानो आपकी आंखों में लगा सुरमा कोई निकाल ले गया और आपको खबर हुई तो हक्केबक्के रह गए। मानवीय संवेदनाओं का सागर लहराता दिखता है लघुकथा पेट में। श्रमिक वर्ग को यह मालूम ही नहीं कि जिस पेट के लिए वह दिनरात खटता है वह पेट होता क्या है? इससे बड़ी बात इतने कम शब्दों में पिरोने के लिए लघुकथाकार को सलाम। सलाम उन सभी लघुकथाकारों को भी, जिन्होंने लघुकथा परम्परा को बदलते समय और समाज के साथ समन्वय करते हुए संक्षेप में शाब्दिक रूप देते हुए गागर में सागर भर कर दिखाया है। पेज 28 पर भूत और इमली की सांटी/ जयप्रकाश मानस को पढ़ते समय आपको अपना बचपन जरूर याद आएगा। साथ ही याद आएंगी ऐसी अनेकानेक बातें, जिनमें अंधविश्वास और समाज की दशा/दिशा पर आपने यकीनन कई मर्तबा मंथन किया होगा।
पेज 63 पर लक्ष्मीनारायण रंगा की लघुकथा लोरी को आजादी से लेकर अब तक के सभी नेताओं को भी पढ़ना चाहिए। ईश्वर न करे, लघुकथा में वर्णित लोरी हमारी भावी पीढ़ी सुनने का दुर्भाग्य पाले। सच तो यह है कि इस पुस्तक की सभी लघुकथाओं में ऐसी-ऐसी विशिष्टताओं को पाठक पाएंगे जिन्हें वर्णित करने के लिए इस पुस्तक से भी अधिक पृष्ठों वाली एक और पुस्तक की रचना करनी पड़े।
अशफाक कादरी की राज, गोविन्द शर्मा की रक्षा, डा जसवीर चावला की एक दिव्य आत्म-हत्या, देवकिशन राजपुरोहित की माकूल जवाब, नदीम अहमद नदीम की दरबार, नीति केवलिया की नजरिया, फारूक आफरीदी की चोट, डा मदन गोपाल लढ़ा की गहराता सन्नाटा, माधव नागदा की पुराना दरवाजा, राजेंद्र शर्मा मुसाफिर की अहिंसा का स्मरण इत्यादि-इत्यादि सभी ऐसी कथाओं का सागर है आधुनिक लघुकथाएं। सोने पर सुहागा यह कि डॉ अशोक कुमार प्रसाद का अन्वेषणात्मक आलेख लघुकथा का वर्तमान, जयप्रकाश मानस की कलम से लघुकथा की शास़्त्रीयता जैसे शिक्षाप्रद और संग्रहणीय पाठ भी इस पुस्तक में शामिल हैं। शुभ कामनाएं कि निकट भविष्य में यह पुस्तक हमें सभी स्तरीय पुस्तकालयों, वाचनालयों में पढ़ने को मिलेगी तथा हिन्दी साहित्य पाठ्यक्रम में शिक्षण संस्थाओं द्वारा शामिल की जाएगी। आधुनिक लघुकथाएं पुस्तक के लिए सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया और श्री राजेन्द्र जोशी एवं प्रतिष्ठित सूर्य प्रकाशन मन्दिर एवं आवरण चित्रकार गौरीशंकर आचार्य को साधुवाद।
- मोहन थानवी

02 अक्तूबर, 2017

शब्दों की यात्रा / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
    नामी कवि, कहानीकार एवं व्यंग्यकार सांवर दइया के पुत्र होने के नाते डॉ. नीरज दइया को लिखने के संस्कार विरासत में मिले हैं। कहने को यह कहा तो जा सकता है, मगर क्या विरासत में लेखन में लेखन के संस्कार मिलने भर से कोई लेखक हो जाता है? अगर ऐसा होता तो तमाम बड़े लेखकों की विरासत उनकी संतानें संभाल लेती और लेखन के क्षेत्र में वंश परंपरा अनवरत चलती रहती। सच्चाई तो यह है कि संतानों द्वारा सुध नहीं लिए जाने से अधिकांश लेखकों के जाने के बाद उनकी किताबें धूल फांकती रहती है अथवा रद्दी में बेच दी जाती है। कई नामी लेखकों की अप्रकाशित पांडुलिपियां दीमकों का भोजन बन जाती है। लिहाजा विरासत की बात कहने सुनने में अच्छी लगती है मगर लिखने के लिए बीज रूप प्रतिभा का होना अनिवार्य है। अलबत्ता लेखक के घर का रचनात्मक परिवेश, किताबें-पत्रिकाओं की उपलब्धता, अन्य लेखकों का सान्निध्य, प्रकाशकों से संपर्क आदि खाद-पानी का काम करता है, जिससे प्रतिभा का बीज एक लहलहाते दरख्त में तब्दील हो जाता है। राजस्थानी एवं हिंदी में समान रूप से लिखने वाले चर्चित कवि, आलोचक एवं व्यंग्यकार डॉ. नीरज दइया के लिए यह बात सोलह आना खरी उतरती है।
    अपनी उद्भट प्रतिभा, व्यत्पत्ति एवं सतत अभ्यास के बल पर डॉ. नीरज दइया ने साहित्य अकदेमी पुरस्कार से सम्मानित अपने लेखक पिता सांवर दइया की समृद्ध विरासत को न केवल सहेजा बल्कि सतत साधना के बल पर उसे आगे बढ़ाया है। अथक परिश्रम व अटूट निष्ठा से की गई साधना का सुफल है कि साहित्य के समकालीन परिदृश्य में उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहा है। लेखक के रूप में लघुकथा विधा से शुरुआत करने वाले डॉ. नीरज दइया ने कविता, अनुवाद, व्यंग्य, आलोचना, बाल कहानी एवं साक्षात्कार आदि विधाओं में कलम चलाई है। राजस्थानी व हिंदी दोनों भाषाओं में अधिकारपूर्वक लिखने का सामर्थ्य अनवरत साधना का प्रतिफल है। तीन दशकों लंबी अब तक की साहित्यिक यात्रा में एक दर्जन से अधिक मौलिक कृतियां, दर्जन भर अनूदित कृतियां एवं करीब इतनी ही तादाद में संपादित कृतियां उनके खाते में दर्ज है। विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों को राजस्थानी भाषा में अनुवाद कर उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों में डॉ. चन्द्र प्रकाश देवल का नाम शीर्ष पर है। इस क्रम में डॉ. नीरज दइया ने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्द किशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना, ओम गोस्वामी आदि नामी लेखकों की चर्चित कृतियों को राजस्थानी में अनुवाद कर के भाषाओं के मध्य पुल बनाने का काम किया है। डॉ. नन्द किशोर आचार्य एवं सुधीर सक्सेना की अब तक की काव्य-यात्रा से चयनित कविताओं का संचयन और अनुवाद इन दिनों चर्चा में है। सुधीर सक्सेना की अनूदित कृति की विशेषता यह है कि इसमें अनुवाद के साथ मूल कविताओं को भी शामिल किया गया है, जिससे अनुवाद की गुणवत्ता सहज जांची-परखी जा सकती है। जो हिंदी और राजस्थानी के समान होने की बात कहते-करते हैं उनके लिए भी यह कृति एक मध्यम हो सकती है कि वे जान सकें दोनों भाषाओं में क्या और कितना विभेद है। डॉ. दइया की अनुवाद के क्षेत्र में एक अन्य उल्लेखनीय और रेखांकित की जाने वाली कृति ‘सबद-नाद’ भी है, जिसमें 24 भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधि कवियों की कविताओं का संचयन और अनुवाद उपलब्ध होना एक विशेष उपलब्धि है। प्रख्यात कवि अनिल जनविजय ने इस काम के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा- “भाई नीरज जी ! राजस्थानी में पूरे भारत की कविताएं देख कर मज़ा आ गया। ये बड़ा काम है। ऐसा काम तो अभी तक हिन्दी में भी किसी एक व्यक्ति ने शुरू नहीं किया है। मुझे आपसे ईर्ष्या हो रही है। अद्‌भुत ।”
            राजस्थानी भाषा में कविता व कहानी विधा में भरपूर लिखा गया है मगर आलोचना का पक्ष कमजोर रहा है। आलोचकीय काम के अपर्याप्त होने से अनेक रचनाकारों के रचना-संसार का सम्यक मूल्यांकन नहीं हो पाया। इस खालीपन को महसूस करते हुए डॉ. नीरज दइया ने आलोचना विधा में लिखना आरंभ किया। उनकी आलोचना विधा की चर्चित कृतियां ‘आलोचना रै आंगणै’ व ‘बिना हासलपाई’ इस कमी को दूर करने के ईमानदार प्रयास हैं। ‘आलोचना रै आंगणै’ में जहां विभिन्न विधाओं पर केंद्रित अठारह आलेख शामिल हुए हैं, वहीं ‘बिना हासलपाई’ कृति में राजस्थानी के पच्चीस प्रतिनिधि कहानीकारों के कथा-संसार की पड़ताल करते हुए कहानी आलोचना के मानकों की तलाश की गई है। बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘आंगळी-सीध’ जल्द ही प्रकाशित होगी, जो राजस्थानी उपन्यास यात्रा पर केंद्रित है।
            कविता डॉ. दइया की सबसे प्रिय विधा है। राजस्थानी में वर्ष 1997 में प्रकाशित प्रथम कविता संग्रह ‘साख’ ने उनके कवि रूप की साख बनाई तो लंबी कविता ‘देसूंटो’ को अपनी दार्शनिक पृष्ठभूमि व निराले शिल्प के कारण एक उल्लेखनीय प्रयोग के रूप में देखा माना गया। वर्ष 2015 में प्रकाशित कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं अपने समय व समाज की सच्चाइयों को निजी मुहावरे में उजागर करने से चर्चा में है। हिंदी कविता संग्रह ‘उचटी हुई नींद’ ने देखे-भोगे सच को बिना लाग-लपेट सहजता से अभिव्यक्त कर हिंदी पट्टी के आलोचकों का ध्यान खींचा।
    बच्चों के लिए लिखना सबसे कठिन है क्योंकि बाल साहित्य सृजन के लिए लेखक को खुद बच्चा बनना पड़ता है। नीरज दइया ने बाल मनोविज्ञान को साधते हुए ‘जादू रो पेन’ शीर्षक से जो बाल-कहानियां रचीं, वे राजस्थानी बाल-साहित्य में नया आयाम स्थापित करती है। सीख एवं उपदेश से इतर ये कहानियां बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन करते हुए उनको जीवन के विविध आयामों से रू-ब-रू करवाती है। ध्यातव्य है कि इस कृति को वर्ष 2014 के साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार से नवाजा गया।
            नामी कवि मोहन आलोक, देवकिशन राजपुरोहित, कन्हैयालाल भाटी की कहानियों का संचयन एवं संपादन कर दइया ने राजस्थानी कहानी विधा को नए सिरे से जांचने-परखने के लिए अवसर दिया है। ये वे कहानीकार है जो यादगार कहानियां लिखने के बावजूद विमर्श से बाहर रह गए। अनियतकालीन पत्रिका ‘नेगचार’ से चर्चा में आए डॉ. नीरज दइया ने राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का एक वर्ष से अधिक संपादक किया तथा वे अनेक पत्रिकाओं के अतिथि संपादक के रूप से कार्य कर चुके हैं। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर में राजस्थानी पाठ्यक्रम समिति के संयोजक एवं अकादमी कार्यकारणी सदस्य के रूप में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं रही हैं। उच्च माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल राजस्थानी पद्य संकलन के वे संपादक भी रहे हैं।
            ‘मंडाण’ के रूप में नीरज दइया ने संपादन का वह ऐतिहासिक काम किया जिसकी ख्याति परंपरा के हेमाणी अंक, राजस्थानी-एक, तीन बीसी पार व साख भरै सबद के क्रम में दर्ज की जाने योग्य है। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा प्रकाशित इस संकलन में राजस्थानी के 55 युवा कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को एक ही जिल्द में शामिल किया गया है। राजस्थानी की युवा कविता को समग्र रूप से जानने के लिए यह एक विश्वसनीय एवं जरूरी किताब है।
            साहित्य सृजन के साथ तकनीक के सहारे आभासी दुनिया में राजस्थानी रंग बरसाने वाले लोगों में डॉ. नीरज दइया अग्रणी है। वे राजस्थानी की रचनाओं को हिंदी में उपलब्ध करवाने वाले सुधी रचनाकारों में भी अग्रणी कहे जा सकते हैं। अंतर्जाल पर उनकी सक्रियता को नेगचार वेब पत्रिका, राजस्थानी डाइजेस्ट, कविता कोश के राजस्थानी विभाग व फेसबुक आदि अनेक स्थलों पर देखा जा सकता है। कहना न होगा नीरज दइया राजस्थान के उन चुनिंदा लेखकों में से है जिन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी लेखनी के बलबूते सशक्त हाजरी दर्ज की है। यही वजह है कि उनसे उम्मीदें बढ़ गई हैं।
          व्यंग्य विधा इन वर्षों में लोकप्रियता के शिखर पर है। समय व समाज की हकीकत व व्यवस्था की विसंगतियों को चुटीले अंदाज में उजागर करने में व्यंग्य विधा का कोई सानी नहीं है। डॉ. नीरज के दो व्यंग्य संग्रह हाल ही में प्रकाशित हुए हैं- ‘टांय टांय फिस्स’ एवं ‘पंच काका के जेबी बच्चे’। गौरतलब है कि दइया के व्यंग्य देश के नामी दैनिक पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं, जिससे व्यंग्य-पाठकों के बीच वे लोकप्रिय हैं। इसी क्रम में यहां यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. नीरज दइया ने अपने समकालीन दो वरिष्ठ लेखकों बुलाकी शर्मा एवं मधु आचार्य ‘आशावादी’ के समग्र सृजन के सरोकारों को आलोचक के रूप में देखने-परखने का काम भी किया है। ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ एवं ‘मधु आचार्य आशावादी के सृजन-सरोकार’ पुस्तकों के माध्यम से न केवल इन दोनों समकालीन लेखकों के सृजन के बहुआयामी पक्षों से परिचित हुआ जा सकता है वरन हिंदी आलोचना में विकसित होती आत्मीय भाषा, नवीन शिल्प एवं अभिनव दृष्टि को भी यहां चिन्हित किया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह क्रम अन्य रचनाकारों हेतु भी जारी रहेगा।
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 आभाअर : दुनिया इन दिनों / दिल्ली / अक्टूबर (प्रथम) 2017 / प्रधान संपादक : श्री सुधीर सक्सेना

 

गांधीजी का चश्मा

० डॉ. नीरज दइया
    मैंने नया चश्मा बनावा कर आफत मोल ले ली। मुझे जो भी देखता है कहता है- वाह गांधीजी का चश्मा। अरे भाई मेरा चश्मा है और मैंने नया बनवाया है। बात स्टाइल की है। बापू के साथ-साथ उनका चश्मा, घड़ी, लंगोटी, सैंडल और लाठी सभी प्रसिद्धि पा गए। इसी प्रसिद्धि के चक्कर में चरखा और खादी लोकप्रिय हुए। भले कोई गांधीजी को दागदार माने, पर यह तो मानना होगा कि वे सबसे कम दागदार है। इतने कम कि दाग नजर नहीं आते। उनको मानने वाले तो खैर उन्हें बेदाग मानते ही हैं। स्वच्छा अभियान में स्बच्छ गांधीजी के स्वच्छ चश्मे का उपयोग हुआ।
    दाग-प्रेमी कहते हैं कि चश्में की दो आंखों में देखिए एक पर स्वच्छ लिखा है दूसरी पर भारत। जहां स्वच्छ लिखा है वहां भारत नहीं है और जहां भारत लिखा है वहां स्वच्छता नहीं है। ऐसे कुतर्कों के कारण हंसी आती है। जब ईश्वर की दी हुई दो आंखें है, तो इतना फर्क क्यों सोचते हो? दोनों बिल्कुल पास-पास है। और अगर बात किसी एक आंख की ही करनी है तो तारक मेहता का उलटा चश्मा और जसपाल भट्टी के उलटा-पुलटा को याद करो। जब तुम्हारी इच्छा हो चश्मा सीधा करो और जब जब इच्छा हो उल्टा कर लो। आप को क्या देखना है यह आप खुद पर है। आप ऐसा भी कर सकते हैं कि स्वच्छता अभियान के दो चश्में लाएं, एक को सीधा दूसरे को उसी पर उल्टा लगाकर एक साथ स्वच्छ भारत देख सकते हैं।
    गांधी-चश्मा लगा कर कोई गांधी नहीं बनता, पर जब कोई गांधी चश्मा लगता है तो वह गांधी-चश्मा बन जाता है। मुझे यह परम ज्ञान प्राप्त हुआ। मैं गांधीजी का परम भक्त बन गया। वे हमारे राष्ट्रपिता कहे जाते हैं। महात्मा गाँधी के चश्मे वाली तस्वीर का स्वच्छ भारत शौचालय में देखा तो वहां जाने के मूल कर्म बिसराकर मैं पोस्टर फाड़ने लगा। यह तौहीन है कि स्वच्छ बापू के स्केच, फोटो का उपयोग गंदे स्थानों पर किया जाए। रहस्य यह भी है कि स्वच्छता अभियान गंदे स्थानों के लिए नहीं है। हम इतनी समझदारी तो रख सकते हैं कि अच्छे स्थानों को पहले थोड़ा सा गंदा करवाते हैं, फिर स्वच्छा अभियान में हिस्सेदारी प्रगट करने के लिए झाड़ू लेकर प्रेस फोटो का जुगाड़ करें।
    प्रचार-प्रसार जरूरी है पर इतना जरूरी नहीं है कि शौचालय की दीवारों तक बापू को पहुंचा दें। वहां की गंदगी देख कर बापू को बुरा लग सकता है। महात्मा गांधी का कहना था कि वे अपने चश्मों से आज़ाद भारत की तस्वीर देखते हैं। हे आजाद भारतवासियों ! उन्हें ऐसी तस्वीर तो मत दिखाओ। वैसे भी वे हत्‍या, लूटपाट, दुष्‍कर्म, मारा-मारी के साथ-साथ समुदाय विशेष के दंगों को देखकर आंसू बहा रहे है। चश्में का इतना क्रेज है कि दिल्ली के अति सुरक्षित राष्ट्रपति निवास के पास ग्यारह मूर्ति से कोई आपका चश्मा ले गया। पंच काका कहते हैं कि जिस चश्मे से आजाद भारत की तस्वीरें बापू देखा करते थे वे अब नहीं दिखाई देती। अब तो नई-नई तस्वीरें है। छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी... नए दौर में लिखेंगे, मिल कर नई कहानी हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी। बापू को भले पसंद नहीं आए, पर हमने कहानी शानदार लिखी है और लिखते चले जा रहे हैं।
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01 अक्तूबर, 2017

लड्डू

. नीरज दइया    आखिर इंतजार करते-करते वह बस आ गई जिससे मुझे यात्रा करनी थी। इसे संयोग कहेंगे कि बस भरी हुई थी। बस में चढते ही मैं सीट का जुगाड़ करने की फिराक में था, पर हर सीट पर किसी न किसी का कब्जा था। काफी सवारियां बस में खड़ी थी। मैंने विचार किया पीछे कोई एक-आध सीट खाली मिल सकती है। रास्ते में खड़ी सवारियों में आगे-पीछे धक्कम-पेल करते बड़ी मुश्किल से पीछे तक पहुंचा। मेरा अंदाजा ठीक था, एक सीट खाली दिखाई दी। मैंने पहले आओ, पहले पाओ के हिसाब से सीट पर कब्जा करने का जरा सा प्रयास किया ही था कि पास की सीट पर काबिज नवयुवक ने सीट पर रखे रुमाल की तरफ संकेत करते हुए कहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” 
    मैंने झेंपते हुए कहा- “अच्छा जी” और पास खड़ा रह गया। सोचा- नाहक हैरान हुआ। आगे भी खड़े होने के लिए पर्याप्त जगह थी। मैंने देखा- उस सीट के लिए एक-दो अन्य यात्री भी आए, किंतु पास बैठा आदमी पक्का पहरेदार था किसी को पल भर भी बैठने नहीं दिया। वह कहता रहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” इसी बीच एक सुंदर नैन-नक्स वाली लड़की को देखा जो मुस्कान बिखेरते हुए उसी आदमी से पूछ रही थी- “यह सीट खाली है क्या?” लड़की की मुस्कान से वह आदमी जैसे खिल उठा, उसकी आंखों में चमक आ गई थी। मुस्कुराते हुए वह कह रहा था- “हां-हां, आइए....। खाली है।” यह सुनते ही वह लड़की पीछे पलट कर ऊंचे स्वर में बोली- “ताऊजी! यहां आ जाएं। सीट मिल गई है।” वह आदमी मुंह बाए आगे खड़ी सवारियों में उसके ताऊजी को पहचानने की कोशिश करने लगा।  
    मुझे लगा उस आदमी के सपने बिखर कर चकना चूर हो गए हैं और वह मुंह बाए ऐसे दिखाई दे रहा था जैसे उसके मुंह में कोई लड्डू आते-आते रह गया हो। उस लड़की के ताऊजी को देखते हुए उस आदमी का मुंह ना जाने क्यों खुला रह गया था और मुझ से निगाहें मिलते ही उसने सकपकाकर मुंह बंद कर लिया। मैं अब कहां चूकने वाल था, मैंने मन ही मन कहा- “ क्यों, मिल गया लड्डू?”
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कथारंग-3 लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित

25 सितंबर, 2017

किस्म-किस्म के लोकार्पण

डॉ. नीरज दइया
    मुझे लोकार्पण बहुत अच्छे लगते हैं। मैं अत्यधिक पुस्तक प्रेमी हूं। कोई लोकार्पण हो, कहीं लोकार्पण हो, मेरी इच्छा रहती है कि पहुंच कर मैं शुभकामनाएं दूं। शुभकामनाओं में अपना क्या लगता है। फ्री की शुभकामनाएं मैं सब को देता हूं पर सामने वाला प्रायः फ्री में नहीं लेता। मुझे मेरी शुभकामनाओं को बदले चाय-पानी-ठंडा मिलना तो सामन्य बात है, कभी भरपेट नाश्ता और कभी-कभार भर पेट भोजन का जुगाड़ हो जाता है।
    जब मुझे मालूम चल जाता है कि फलां कार्यक्रम में भोजन भी है तो मैं घर के बच्चों और उनकी अम्मा को साथ लेकर पहुंचना फायदेमंद मानता रहा है। इससे फायदा यह होता है कि घर में चूल्हा जलाना नहीं पड़ता। सुबह ऐसा कोई कार्यक्रम होता है तो सब को पहले से समझाकर ले जाता हूं कि शाम को घर पर उपवास रहेगा जो खाना है वहीं खा लेना। कार्यक्रम अगर शाम का होता है तब हम सभी अगले दिन सुबह उपवास का कार्यक्रम रखते हैं।   
    साहित्य और खासकर पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में भव्य भोज का कार्यक्रम मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैं ऐसे आयोजनों में सपरिवार अक्सर थोड़ी देरी से पहुंचता हूं। दूरदृष्टि पक्का इरादा लिए मैं ऐसे आयोजनों के भरपूर ज्ञान से बचता हूं। मैं वक्ता की औकात जानता हूं। अगर कार्यक्रम के आयोजकों ने वक्ताओं को अच्छा पेमेंट किया होगा तो वे बहुत अच्छा अच्छा बोलते हैं। लोकार्पण कार्यक्रम असल में असत्य कार्यक्रम होता है। सच्ची और असली बात कोई प्रायः कहता नहीं। कुछ विद्वान तो लोकार्पण को पुत्र अथवा पुत्री के जन्मोत्सव की भांति केवल बधाई कार्यक्रम मानते हैं। पुस्तकों की विक्री की कमी को देखते हुए प्रकाशकों और आयोजकों को चाहिए कि वे पुस्तक का संस्करण जब तक पूरा बिक ना जाए तब तक बारबार लोकार्पण करें। अब मैं इतना एक्पर्ट हो गया हूं कि पुस्तकें भेंट लेने लगा हूं। कोई भेंट देना नहीं चाहे तो भी जो मैं ठान लेता हूं कर दिखाता हूं। देने वाला कब तक मुझसे बचेगा? मैं उसके सामने बीस बार ऐसे डोरे डालता हूं, कशीदे पढ़ता हूं और साथ खड़ा होकर मुस्कुराता हूं कि उसे शर्म आने लगती है। वह किताब भेंट कर ही देता है। कभी ऐसा भी होता है कि कुछ बेशर्मों के कारण बेशर्म मुझे बनना पड़ता है। किसी एक किताब की कीमत सौ या दो सौ रुपये से भला कम क्या होती है। फिर किताब देने वाला जल्दी में यदि उस पर दो शब्द भेंट के नहीं लिखता तो मैं उसे बेचने का प्रयास भी कर लेता हूं। ऐसी भेंट मिली किताबें जब अधिक  हो जाती है तो घरवाली झगड़ा करती है। घर में इतनी रद्दी किस काम की, बेच दो इन सब को।
    आजकल कुछ लेखक-कवि मेरे जैसे गुणी दर्शक-श्रोता के साथ घोखा करने लगे हैं। वे चुपचाप लोकार्पण कर लेते हैं और भनक लगने नहीं देते है। यह तो सुबह-सुबह अगले दिन अखबार से पता चलता है कि फलां की फलां किताब का फलां जगह लोकार्पण हुआ और फलां-फलां लोग थे।
    पंच काका कहते हैं कि ऐसा लोकार्पण जिसमें चार-पांच मित्र मिलकर फोटो ले लेते हैं और झूठी खबर से लोकार्पण प्रचारित करते हैं उन पर जुर्माना लगना चाहिए! बिना चाय-पानी और मिठाई के लोकार्पण को अवैध करार देकर कड़े नियम बनाने चाहिए। गुपचुप और चुपचाप ऐसे लोकार्पण संज्ञान में आने पर जुर्माने के तौर पर लोकार्पण रिपीट की सजा होनी चाहिए, जिसमें भर पेट भोजन अनिवार्य हो।
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