31 मार्च, 2017

टारगेटमयी मार्च

ब से मार्च का महीना आया है तब से हर सरकारी कार्यालय के गेट को देखता हूं तो पाता हूं कि वे इन दिनों जल्दी खुल जाते हैं और देरी से बंद होने लगे हैं। जिस कार्यलय में कर्मचारी सूरज के सिर पर आने के बाद भी दौड़ते-भगते पहुंचते थे, उन्हीं कार्यालयों में अब सूरज के आते हैं थोड़ी देर में एक-एक कर सभी कर्मचारी और अफसर आने लगे हैं। न केवल आने लगे हैं वरन अपने स्थान पर विजारित होकर फाइलों और बिलों में ऐसे खो जाते हैं कि दिन भर लगे रहने पर भी उनका सिर ऊंचा नहीं होता। यह सब देख कर लगता है कि देश बदल रहा है। ऐसे तो हमारी तरक्की को कोई रोक नहीं सकता। सबके अपने-अपने टारगेट हैं। टारगेट को प्राप्त करना बहुत जरूरी है। बाबू का टारगेट है और अफसर का अपना टारगेट। सब के अपने अपने टारगेट और खाते हैं। आदमी की हिम्मत और पद के हिसाब से सब का अपना अपना मुंह है। किसी का मुंह छोटा है वह कम खाता-पीता है, और जिसका मुंह बड़ा है वह ज्यादा खाता-पीता है। यह झूठ है कि हमारे देश में कोई भूखा सोता है। यहां भले कितनी ही गरीबी हो और भले गरीबी की किसी भी रेखा की बात हो, यहां कोई भूखा नहीं सोता है। सबके अपने अपने खाने-पीने के रास्ते बने हुए हैं। भिखारी से लेकर सेठ साहूकार तक के अपने अपने रास्ते हैं। कोई भगवान के नाम पर कुछ ले रहा है तो कोई दे रहा है। हरेक का अपना खाता है। जिसमें पाप-पुण्य है। आदमी एक जैसे ही हैं, पर कभी कोई भगवान के नाम पर तो कभी कोई वाहे गुरु और अल्लाह के नाम पर खाता-पीता अथवा खिलाता-पिलाता है। कार्यालय में साहब के कमरे के बाहर बैठने वाला अंतिम अधिकारी भी दफ्तर के हिसाब से खाता-पीता है। सबका नसीब है और यह नसीब मार्च के महीने में जोर शोर से चमक उठता है। मार्च का महीना यानी खाने-खिलाने का महीना। इस महीने में टारगेट पूरे करते-करते कई टारगेट पूरे हो जाते हैं। बकाया बिल और बकाया बजट को यूज करना मार्च में जरूरी होता है। सब चाहते हैं कि आया हुआ बजट जाना नहीं चाहिए। बिना खर्च के आया हुआ बजट वापस चला जाएगा तो यह सरासर हरामखोरी है। लापरवाही है। कार्य के प्रति उदासीनता है। अनुशासनहीनता है। सरकारी बजट का पूरा पूरा उपयोग होना ही चाहिए। यदि किसी करण से बजट मार्च में नहीं खत्म हो सकता है तो उसके लिए मार्च के महीने को खुला रखा जाता है। अप्रैल की दस-बीस तारीख तक मार्च महीने को चलाया जाता है। पिछली तारीखों में बिलों का लेन-देन और सब व्यवस्थित किया जाता है। बिना तारीख के बिल कबाड़े जाते हैं। साहब के खास आदमी दफ्तर में अपने हिसाब से बिलों पर तारीख लिखते और प्रमाणित करते हैं। ऐसा भी होता है कि बिल का सामान और काम-काज अपनी जगह छोड़ दिया जाता है। आज नहीं तो कल-परसों या फिर कभी सामान एडजेस्ट हो जाएगा, काम करा लिया जाएगा। परंतु अगर मार्च का महीना निकल गया और उसको अप्रैल में भी नहीं पकड़ पाए तो बजट लेफ्स हो जाएगा। सामान और काम की बजाय ध्यान बिल और कमीशन पर दिया जाना चाहिए। वांछित बिल समय पर आ जाए, पास हो जाए और सबका खाना-पीना बराबर हो जाए तो कोई समस्या नहीं है। बस एक बार दौड़ते-भागते टारगेटमयी मार्च को पकड़ लिया तो समझो पूरे साल भार का आराम हो गया। पंच काका कहते हैं कि मार्च की दौड़-भाग में कुछ कर्मचारी और अफसर ऐसे भी हैं, जिनको टारगेटमयी मार्च के पीछे दौड़ना-भागना नहीं आता। राम जाने वे किस मिट्टी से बने हैं। उनको ढंग से खाना-पीना नहीं आता। ऐसे में बेचारे सहायकों को चाय-पानी के लिए तरसना पड़ता है। बिना चाय-पानी के नौकरी किस काम की, इससे तो बेहतर है कहीं ढंग की जगह तबादला हो जाए।
नीरज दइया

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