30 अगस्त, 2017

शाश्वत जीवन और छलांग

    कुछ चीजें जो हम पाना चाहते हैं, वे  कैसे मिल सकती है? कहते हैं कुछ चीजें सोचने से मिलती हैं। जो पाना है उसके बारे में सोचते रहो और वे एक दिन मिल जाएंगी। सोचने की अवधि के बारे में कुछ विवरण नहीं है। यह उस चीज और आपके सोचने की क्षमता पर निर्भर है। यह बड़ी गहरी बात है। एक दूसरी बात कि कुछ चीजों को पाने के लिए बिना सोचे-समझे छलांग लगानी पड़ती है। अगर आप कुछ चीज को पाने के लिए छलांग लगाते हैं और आपके हाथ-पैर या कुछ भी टूट-फूट होती है तो जिम्मेदार मैं नहीं हूं। यह ज्ञान मेरा नहीं है। यह गहन चिंतन-मनन भगवान ओशो का है। वे तो यहां तक कह गए हैं कि जिस किसी ने कहा होगा कि कोई भी छलांग लगाने के पहले हजार बार सोचना चाहिए, कहने वाला कोई कायर या कमजोर रहा होगा। बकौल ओशो- छलांग पहले लगा लो, सोचना कभी भी। शाश्वत जीवन पड़ा है, जब दिल आए सोच लेना, मगर छलांग तो लगा लो। ठीक बात है बाद में अस्पताल या घर में पड़े-पड़े आराम से सोचा जा सकता है। वैसे जेल सोचने के लिए बेहद उपयुक्त जगह है। जेल में सोचने और सोचने के अनेक प्रमाण हम अनेक कृतियों के रूप में गिना सकते हैं, जो जेल में लिखी गई हैं। 
    बिना सोचे और कम सोचे छलांग लगाने वालों में युवा पीढ़ी बड़ों को भी पीछे छोड़ चुकी है। खेल खेल में वे छलांग लगा कर मौत को गले लगा लेते हैं। कभी प्रेमी छलांग लगाता है कभी प्रेमिका। कभी खुशी में छलांग लगाई जाती है तो कभी गम में। कभी मिलन में छलांग का दृश्य आता है और कभी विरह में। छलांग के बारे में इसलिए ओशो ने कहा कि सोचना नहीं है। पीछे घरवालों के बारे में अपने परिवार और मित्रों के बारे में बिल्कुल सोचने नहीं है। क्यों कि सोचने वाला छलांग लगा ही नहीं सकता। कहते हैं कि जितनी चादर है उतने पैर फैलाओ की बातें ऐसे लोगों पर लागू नहीं होती है। उनका मानना है कि पैर लंबे हैं तो क्या काट लें? हम तो खुल कर और जी भर के पैर फैलाएंगे। कर्ज लेकर चादर को लंबा-चौड़ा करेंगे, और बाद में छलांग लगाएंगे। ऐसी छलांग में देश से भाग जाने वालों के अनुपम उदाहरण हम जानते हैं। नीति और धर्म की बातें बताने वाले ही जब अलमस्त हो कर छलांगें लागने में व्यक्त है तो फिर रोकने वाला है कौन? समझाने वाला ही मूर्खताएं करें तो फिर किसे दोष ? 
    देश में ओशो को मानने वाले बहुत है। धर्मगुरु और बाबाओं ने भी ओशो के इस चिंतन पर ममन किया और कई छलांग लगा चुके हैं, कुछ तैयारी में है। बिना सोचे-समझे छलांग लगा कर सफलता हासिल करने का सुख तो उन्हें मिला ही किंतु बाद में जो कुछ हुआ और जो कुछ हो रहा है वह बस नसीब की बातें है। पहुंचे हुए धर्मगुरु, साधु, संन्यासी जो कहते हैं करते हैं उनमें इतनी गूढ़ता होती है कि सामान्य व्यक्ति के समझने की बात होती ही नहीं। वे ईश्वर की भांति इस संसार में लीला करने आते हैं और कुछ की लीला गुप्त रहती है कुछ की जगजाहिर हो जाती है। बापू आशाराम से राम-रहीम की यात्रा में यही हुआ कि आम आदमी हैरान हो गया। सामान्य आदमी की तो औकात ही क्या, इस खेल को तो विशिष्ट आदमी भी देखते रह गए।
    पंच काका कहते हैं कि यह होना स्वभाविक था, क्योंकि छलांग शब्द को गंभीरता से देखें। इसमें अनेक ध्वनियां और अर्थ छुपे हैं। छलांग में जो ‘लांग’ है वह धोती की लांग का संकेत हैं। छ वर्ण असल में छह की ध्बनि देता है। वे तो यहां तक मानते हैं कि छलांग में मूल शब्द ‘छल’ है और उसमें ‘अंग’ जोड़ कर छलांग बना है। छल और अंग की व्याख्या ऐसे संतों ने अपने अपने ढंग से की है। 
     ० नीरज दइया

25 अगस्त, 2017

मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना

डॉ. नीरज दइया
यह संयोग है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ का जन्म 27 मार्च, 1960 को विश्व रंगमंच दिवस के दिन हुआ। यह भी संयोग है कि विद्यासागर आचार्य के आंगन में हुआ जिन्होंने नाटक के लिए अपने दोनों बेटों को समर्पित कर दिया। संभवत: इसी कारण और अपनी लगन के बल पर मधु आचार्य ने नाटक, रंगमंच, पत्रकारिता और साहित्य में ऐसा मुकाम हासिल किया, जिस पर देश और दुनिया की नजर है। कवि-कथाकार मित्र राजेन्द्र जोशी के शब्दों में कहें तो मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना और बीकानेर जैसे शहर में होना, अपने आप में बहुत मायने रखता है। बीकानेर एक ऐसा शहर है जिसमें रचनात्मकता के ऐसे बीज हैं जो अपना पर्यावरण खुद निर्मित कर लेते हैं। यहां कला, साहित्य और संस्कृ ति की एक अखूट परंपरा रही है जो निरंतर प्रवाहशील होते हुए मधु आचार्य तक पहुंचती है। नाटक और साहिय के संस्कार अगर घर में मिल जाए तो किसी के कला माध्यम में कुछ खास करने की संभावनाएं बढ़ जाती है। आनंद वी. आचार्य और मधु आचार्य ‘आशावादी’ इसके प्रमाण हैं कि जिन्होंने अपने पिता की थाती को धरोहर की तरह न केवल संभाला, बल्कि उसे विकसित भी किया। मधु आचार्य के साथ एक संयोग चेतना आचार्य से विवाह के साथ जुड़ा। इसे संयोग इसलिए कह जाएगा कि पिता के साथ ससुर भी साहित्यिक परंपरा से जुड़े होने से पूरी पारिवारिक पृष्ठभूमि मधु आचार्य के साथ जुड़ती है और दूर तक चलती है। बीकानेर के जनकवि बुलाकी दास ‘बावरा’ ने अपने समय में मंचीय कवि के रूप में धूम मचा रखी थी। उनका आशीर्वाद आचार्य के साहित्यिक-संस्कारों को द्विगुणित करने वाला कहा जा सकता है।
बाल्यकाल से ही मधु आचार्य का अनेक विख्यात नामों के साथ पारिवारिक जुड़ाव रहा। शिक्षा और साहित्य के वातावरण में पले-बढ़े छात्र मधु ने जीवन में अनेक मुकाम पार करते हुए, राजनीति विज्ञान से एम. ए. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा ग्रहण की। अध्ययन के दौरान गुरु-मार्गदर्शक के रूप में भवानी शंकर शर्मा का सान्निध्य मिला। विभिन्न मंचों पर अनेक नाटकों में कलाकार और निर्देशक की भूमिकाओं का सफल निर्वाह करने वाले मधु आचार्य ने कभी किसी काम से गुरेज नहीं किया। उनके संस्कार ही ऐसे थे कि स्टेज पर और जीवन में भी किसी भी काम को कभी छोटा-बड़ा नहीं समझा। वर्षों तक नाटक के लिए कुछ भी करने और करवाने का जुनून-जिद पालते रहे। इसी यात्रा में आपने 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। साहित्य सृजक के रूप में वर्ष 1990 से जुड़ाव हुआ। तब से अब तक विविध विधाओं मंन निरंतर लिख-पढ़ रहे हैं। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध-कार्य भी किया है।
साहित्य-लेखन की यात्रा का आगाज राजस्थानी नाटक ‘अंतस उजास’ (1995) से हुआ। यह एक प्रयोग था कि किसी जन कवि की कविताओं को नाटक में प्रयुक्त किया जाए। मंच पर लोक-रंग को बिखेरने वाला यह नाटक जितनी बार मंचित हुआ सफल रहा। बाद में यह नाटक राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी, बीकानेर की पांडुलिपि प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित हुआ। पत्रकारिता से जुड़े मधु आचार्य ‘आशावादी’ के दैनिक राष्ट्रदूत से दैनिक भास्कर तक की यात्रा के अनेक मुकाम और पड़ाव हैं। रंगकर्मी-नाटककार और पत्रकार के रूप में अपना लौहा मनवा चुके आशावादी ने साहित्य में ‘गवाड़’ के माध्यम से जैसे दूसरी पारी का श्रीगणेश किया। इस बार साहित्य-प्रांगण में एक के बाद एक और कभी एकसाथ अनेक पुस्तकें और विधाओं में अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत करते गए, जो अब भी जारी है। विशाल अनुभव लिए मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने साहित्यिक दुनिया को नवीन आभा देने का प्रेरणास्पद आगाज बीकानेर में किया है। प्रकाशन के बाद भव्य लोकार्पण अपनी पूरी टीम के साथ मिलकर करने में वर्तमान समय और समाज में साहित्य की गरिमामय पुनस्र्थापना का लक्ष्य अंतर्निहित है।
अब तक राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें हैं- ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’, ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (उपन्यास); ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’, ‘हेत रो हेलो’ (कहानी-संग्रह); ‘अमर उडीक’, ‘अेक पग आभै मांय’ (कविता-संग्रह)। आपने शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए ‘सबद साख’ (विविधा) पुस्तक का संपादन भी किया है। हिन्दी में भी विविध विधाओं में 26 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं। यथा- ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’, ‘दलाल’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’, ‘चिड़िया मुंडेर पर’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’, ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’, ‘गुमान में खड़ा आकाश’, मौन में उसे देखना' (कविता-संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह) ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’, ‘खुद लिखें अपनी कहानी’, ‘सुनना, गुनना और चुनना’ (बाल साहित्य)।
बीकानेर में मधु आचार्य का होना एक संयोग है और मेरा उनकी इस साहित्यिक यात्रा को करीब से देखना भी संयोग है। साहित्य में पुरस्कारों के विषय में मानते हैं कि पुरस्कार संयोग होते हैं। मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने लेखन में पुरस्कारों के स्थान पर सतत लेखन को महत्त्व दिया है। संयोग है राजस्थानी उपन्यास ‘गवाड़’ पर उन्हें जहां राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’ अर्पित किया गया और इसी कृ ति पर वर्ष 2015 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी अर्पित किया गया है।
अन्य पुरस्कार और सम्मान है- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर से ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्रकारिता पुरस्कार’, सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से ‘तैस्सितोरी अवार्ड’ एवं नगर विकास न्यास द्वारा भी पुरस्कृ त-सम्मानित। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के आप उपाध्यक्ष रहे तथा साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय सहभागिता है। आपकी अनेक रचनाओं के विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं और विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य भी हुआ है। प्रतिदिन लिखना-पढऩा केवल अनिवार्य मानते ही नहीं वरन मधु आचार्य ‘आशावादी’ प्रतिदिन करणीनगर स्थिति अपने निजी आवास में इतना पढ़ते-लिखते हैं कि लोगों को आश्चर्य होता है। इतना ही नहीं इस लिखने-पढऩे के बीच अपने मित्रों और परिजनों से मिलने जुलने के साथ ही जन-जन के चहेते मधु आचार्य अपनी व्यस्तताओं के बीच नित्य समय-प्रबंधन ऐसा करते हैं कि वे सभी जगह मौजूद मिलते हैं। आचार्यों के चौक स्थित अपने पैतृक आवास कलकत्तिया भवन में रहते हैं। नित्य बेहद सरल, सीधे मिलनसार आत्मीय मधु आचार्य अपने पत्रकारिता, साहित्यिक व्यक्तित्व के बिना किसी आवरण पाटों पर बैठे हथाई करते मिलते हैं। अपने सभी रूपों को विस्मृत कर वे संजीदा इंसान के रूप में मिलते हैं। कला माध्यम से जुड़े अथवा शीर्ष पर पहुंचे व्यक्ति का जीवन में एक योग्य इंसान होना ही उसका असल है। अपनी रचनाओं के माध्यम से निर्माण के नवीन विचार एक अच्छा इंसान ही बेहतर दे सकता है।
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मधु आचार्य का प्रकाशित साहित्य
• 1995 अतंस उजास (नाटक)
• 2012 ‘गवाड़’ (राजस्थानी उपन्यास)
• 2013 ‘हे मनु!’ (उपन्यास), ‘चेहरे से परे’ (कविता संग्रह) ‘सबद साख’ (संपादन)
• 2014 ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इंसानों की मंडी’ (उपन्यास), ‘अवधूत’, (राजस्थानी उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’(कहानी संग्रह), ‘उग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’ (कविता संग्रह), ‘रास्ते हैं, चले तो सही’ (प्रेरक निबंध)
• 2015 ‘@24 घंटे’ (उपन्यास), ‘आडा-तिरछा लोग’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘सुन पगली’, (कहानी संग्रह), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं है जिंदगी’ (कविता संग्रह) ‘अमर उडीक’ (राजस्थानी कविता संग्रह)
• 2016 ‘अपने हिस्से का रिश्ता’(उपन्यास), ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’ (कहानी संग्रह), ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’ (कविता संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’ (बाल उपन्यास) ‘खुद लिखें अपनी कहानी’(बाल कथाएं) ‘सुनना, गुनना और चुनना’(बाल कविताएं)
• 2017 ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘हेत रो हेलो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘एक पग आभै मांय’ (राजस्थानी कविता संग्रह) दलाल (उपन्यास) मुंडेर पर चिड़िया (कहानी संग्रह) गुमान में खड़ा आकाश, मौन में उसे देखना (कविता संग्रह)
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बुलाकी शर्मा की सृजन में आलोचना-दृष्टि से प्रवेश

हिन्दी साहित्य का यह सबसे बड़ा और कटु सत्य है कि यहां विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों द्वारा शोध, आलोचकों द्वारा की रचना की बजाय नाम को महत्त्व अधिक दिया जाता है, कमोबेश यह भेड़चाल है जिसका खामियाज़ा हर अच्छे लिखनेवाले को भुगतना पड़ता है और अच्छा-सराहनीय लिखने के बावज़ूद वह हाशिए पर, अचर्चित और गुमनाम-सा ही रह जाता है। राजस्थान के लेखकों के साथ ये दुर्घटनाएं सबसे अधिक हुयीं हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह कि खुद यहां के बड़े- बड़े तथाकथित नामधारी, आलोचना में चर्चित आलोचको ने यहां के शब्दकारों की बजाए उन दिल्ली, भोपाली लेखकों के लेखन पर ज्यादा काम किया जो उन्हें अधिक से अधिक प्रोजेक्ट लाभ, नाम- इकराम, किसी न किसी अकादमी, संस्था, फाउंडेशन में फिट करा सकते थे। इस दिशा में यह सुखद लगता है कि बीकानेर के राजस्थानी-हिन्दी में समान अधिकार से लिखनेवाले युवा कवि, आलोचक डा. नीरज दइया ने इस ओर ध्यान दिया और उनकी दो किताबें बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार व मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर से आयी हैं। अभी मैं “बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार” से गुजर रहा हूं चूंकि मैं बुलाकी शर्मा, उनके लेखन से व्यक्तिश: जुड़ा हूं, उनकी सृजन-यात्रा के के हर पड़ाव का न केवल साक्षी रहा हूं अपितु उन्हें निकटता से जानने का दावा तो नहीं करता लेकिन अवसर जरूर मिलता रहा है और मुझे इस बात का संतोष और खुशी है कि डा. नीरज दइया मुझ से भी कहीं गहरे बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व को जानने में सफल हुए हैं।
बुलाकी शर्मा शब्द-जगत में बीकानेर की ऐसी शख्सियत है जिस पर हर शहर ऐसी शख्सियत के अपने शहर में होने का गर्व कर सकता है एक ऐसा समन्वयवादी दोस्त- दुश्मन सभी से मधुरभाषी, व्यवहार-कुशल व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में एक शब्द ’अजात शत्रु’ बिज्जी ने सही ही कहा था। चालीस बरसों से राजस्थानी- हिन्दी में व्यंग्य- कथा साहित्य में निर्बाध रूप से निरंतर उनकी कलम चल रही है। राजस्थानी- हिन्दी दोनों ही भाषाओं में अकादमी सम्मान के अलावा उन्हें कई सम्मान से भी अधिक लेखकों-पाठकों के बीच गहरी पहचान उनकी कलम की बदौलत हासिल है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व देखते हुए सहज ऐसी अपेक्षा और आवश्यकता बेमानी नहीं है कि उनके रचनाकर्म पर विस्तार से आलोचनात्मक आलेख, बातचीत, बहस और मूल्यांकन आदि हो।
एक ऐसा समय जब जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति आत्ममुग्धता में जी रहा है, कला- साहित्य में तो यह चरम पर है। सब एक-दूसरे की टांग खींचने में जुटे हैं, कौन मित्र-शत्रु है, कौन शत्रु-मित्र, पहचान मुश्किल है, हर कार्य-करम किसी न किसी स्वार्थ, हित में निहित हो चुका हो, ऐसे में किसी के व्यक्तित्व, सृजन का सम्यक मूल्यांकन का विचार ही आश्चर्यजनक लगता है, पर जैसा कि नीरज दइया को जाननेवाले जानते हैं, वे ऐसे आश्चर्यजनक शुभ करते रहते हैं, उन्हंत ऐसे सभी शुभ के लिए साधुवाद।
बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार कृति में डा. नीरज दइया ने अथ श्रीबजरंग बली की डायरी, धूमिल होते समय के एलबम के पन्ने, अफलातून की धूम, अजात शत्रु की काया- माया, लिखा तो ठीक ही है, बात एक कालजयी कहानी की, नवीन कथा शैली में सम्बन्धों के ग्राफ, सुनने- सुनाने और पढ़ने- पढ़ाने की कहानियां, राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई, खुद घायल होने का हौंसला और हुनर, चेखव की बन्दूक यानी बीएस फिफ्टी वन, वरिष्ठ व्यंग्यकार की श्रेणी में, सदा स्मरणीय बाल साहित्यकार, नाटककार, अनुवादक और सम्पादक के रूप में, बुलाकी शर्मा से सृजन-संवाद और अंत में बुलाकी शर्मा की सृजन- यात्रा जैसे आकर्षक शीर्षकों से बुलाकी शर्मा के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को एक मंच पर सामने लाने का जो सद्प्रयास किया है, उस में वे सफल रहे हैं। पुस्तक के अंत में बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व की परतें खोलनेवाला साक्षात्कार दिया गया है जो महत्त्वपूर्ण हैं, जिस में इस किताब को तैयार करते समय उनके लेखन और व्यक्तित्व के बारे में उपजी हमारी कुछ शंकाओं से सम्बन्धित सवालों के लेखक द्वारा दिए गए माकूल जबाब, कुछ और प्रश्नो की राह खोलते हैं, हो सकता है उन प्रश्नों के उत्तर लेखक आगे कभी दें। एक प्रश्न बहुभाषाओं में लिखनेवाले लेखक अपनी रचनाओं को दोनों भाषाओं की किताबों में रखते हैं , उन रचनाओं की मौलिकता के बारे में हैं, वह किस भाषा में मौलिक है, का उत्तर जो उन्होंने दिया है, से तो मैं भी सहमत नहीं। मेरा मानना है यह रचना के प्रति अतिरिक्त मोह के अलावा कुछ नहीं हैं जो वह उसी एक रचना को लेखक अपने लेखन की हर भाषा में देखना-दिखाना चाहता है।
सुन्दर आवरण के लिए प्रख्यात चित्रकार-कवि कुंवर रवीन्द्र एवं सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर के डॉ. प्रशांत बिस्सा बधाई के पात्र हैं।
- नवनीत पाण्डे
(लेखक वरिष्ठ कवि-कथाकार है)
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पुस्तक : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) / लेखक : डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन, मंदिर, बीकानेर ; पृष्ठ-88 ; संस्करण 2017 ; मूल्य-200/-
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24 अगस्त, 2017

आकंठ आत्मीयता में डूबे कवि सुधीर सक्सेना

डॉ. नीरज दइया
       असल में बड़ा आदमी वह होता है जिसके साथ हमें या किसी को भी आपनी लघुता का अहसास नहीं होता। इस विचार के आलोक में सुधीर सक्सेना बड़े आदमी हैं। मेरे शब्दों पर उनके परिचित और मित्र मोहर लगाएंगे कि उनके साथ जब कभी साथ होने का अवसर आता है, हमें हमेशा यही अहसास रहता है कि जैसे कोई अपना सगा-संबंधी आत्मीय जन हमारे साथ है। इस आत्मीयता के आस्वाद में वे भूले से भी कभी कहीं किसी भी क्षण ऐसा कुछ नहीं छोड़ते कि जिस पर कोई संदेह या शक किया जा सके। चंद मुलाकातों और थोड़े से संवाद में वे धीरे-धीरे हर दूरी को पाटने की क्षमता रखते हैं।
    मैंने सुधीर सक्सेना को बड़ा आदमी इसलिए कहा है कि वे संबंधों में ऐसे समानता और समव्यस्कता के घरातल पर पहुंच जाते हैं, जहां छोटे-बड़े का अहसास लुप्त हो जाता है। जाहिर है कि यह अनायास यूं ही नहीं होता, ऐसा अहसास बहुत कम बड़े रचनाकारों के साथ हम पाते हैं। उनकी सहजता हमारी धरोहर है। यह मेरा अनुभव है कि वे नए और युवा रचनाकारों से बतियाते हुए अक्सर उम्र के ढलान से जैसे लुढ़ते हुए समानता के धरातल पर बिना कोई अहसास कराए खुद को उतार लेते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे हमसे बतियाते हुए हमारे पंख लगा देते हैं और हमें उड़ते हुए अपने तक पहुंचने में सक्षम बना देते हैं। उनका यह ऐसा हुनर है कि हर किसी की पकड़ में नहीं आता। वे कहीं ऐसा कोई संदेह या शक होने से पहले ही उसे पाट देते हैं। कोई स्थान रिक्त नहीं छोड़ते कि जहां कोई सूराख हो सके, और हम ऐसे किसी रहस्य तक पहुंच सकें।
    यह अंधेरे में तीर छोड़ा ऐसा एक तीर है जो सीधा निशाने पर जा कर लगा है। इसके प्रमाण एक-एक कर मैं जाहिर करता हूं। पहले-पहल तो सुधीर सक्सेना अपनी किताबों में उम्र का हवाला दिया करते थे, लेकिन काफी समय से यह सिलसिला बंद है। शायद उन्हें लगने लगा होगा कि उम्र का हवाला नहीं देने से ‘काल को भी नहीं पता’ चलेगा कि वे समय के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं। हां, यह भी हो सकता है कि वे वर्तमान से भविष्य की तरफ दौड़ते समय में कुछ रफ़तार का अहसास कम करने की फिराक़ में हैं। वे स्मृतियों और अतीत में अधिक से अधिक बने रहने की संभावनाएं तलाशते हैं। साफ शब्दों में कहा जाए तो उन्हें रचनात्मकता के तौर पर अतीत, संभावना और बदलते समय के रंग अधिक पसंद हैं।  
आकंठ आत्मीयता में डूबे कवि सुधीर सक्सेना न केवल आत्मीयता से लबरेज गहरे इंसान है, वरन उन्हें एक दिव्यात्मा कहना अधिक उपर्युक्त होगा। दिव्यात्मा इसलिए कि उनकी आत्मीयता हर छोटे-बड़े के साथ समानता का एक आदर्श भाव लिए हुए है। इंसान जब मसीनों में तब्दील हो गए हैं, तब ऐसे समय में ऐसा क्यों हैं? यह बदला हुआ समय और सब कुछ बदलते जाने का अहसास कराने वाला समय है। ऐसे कुहासे के समय में सुधीर सक्सेना अक्सर हमें लडाते हुए, किसी स्मृति में सहलाते हुए, चुपचाप अपनी कविताओं में सतत रूप से ऐसा मर्म अपने विविध पाठों में उद्घाटित करते हैं कि हमसे मिलने वाले हर इंसान हमारी आत्मीयता का ऐसा ही अहसास कर सके। क्या इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि सुधीर सक्सेना ऐसा क्या करते हैं कि वे हम सब को अपने घनिष्ट, निजी, अंतरंग और आत्मीय लगते हैं।
    मैं सुधीर जी से न केवल उम्र के लिहाज से वरन रचनात्मकता के हिसाब से मैं खुद को उनके पीछे-पीछे दौड़ते हुए पाता हूं। यह दौड़ना इसलिए भी जरूरी है कि वे आचार-विचार और व्यवहार से इतना उत्साह, आत्मीयता और जोश से भर देते हैं कि मुझे लगने लगने लगता है मुझे भी सुधीर सक्सेना जैसे आकंठ आत्मीयता में डूब जाना चाहिए। वे अपने समय से इतना समय निकाल लेते हैं कि नए रचनाकारों से सम्मान और स्नेह से भरपूर उनका संवाद होता है।
    यह सम्मान और स्नेह ही है कि मैं अतीत में उस जगह पहुंच गया हूं, जहां सुधीर सक्सेना से मेरी पहली मुलाकात सूरतगढ़ में हुई थी। यह संयोग बना कि वे हमारे मित्र रविदत्त मोहता के यहां मेहमान बन कर आए थे। आकाशवाणी सूरतगढ़ में मोहता के सहकर्मी उद्घोषक एवं कवि-गीतकार राजेश चढ्ढा व अन्य स्थानीय रचनाकारों के आग्रह से एक संवाद-कार्यक्रम रखा गया, असल में यह हमारी पहली मुलाकात का एक बहाना बना। मिलकर लगा जैसे कोई पहचान थी, बस हमारा मिलना ही बाकी था।
    सूरतगढ़ जैसे छोटे कस्बे में भले सुधीर सक्सेना के पाठक अधिक नहीं हो, किंतु कविता कोश पर चस्पा उनकी कविताएं हम सब मित्रों के लिए उनके कवि को पहचानने-परखने की पहली सीढ़ी कही जाएगी। जिस दिन राजेश चढ्ढा ने मुझे फोन पर इस कार्यक्रम का आमंत्रण दिया, संयोग से मेरे मित्र नंदकिशोर सोमानी साथ थे। मुझे याद आता है कि उनके पूछने पर मैंने उन्हें कहा था कि कुछ कविताएं और आलेख सुधीर सक्सेना के पढ़े हुए हैं, पर सुधीर सक्सेना तो दो हैं। पता नहीं ये कौनसे वाले आएं है।
    सुधीर सक्सेना ‘सुधि’ और सुधीर सक्सेना के बारे में उसी दिन एक बार नए सिरे से अंतरजाल पर गूगल से खोज-खबर ली। राजेश चढ्ढ़ा से बात कर यह भी पक्का कर लिया कि आने वाले ‘सुधि’ नहीं हैं, पर मित्र ऐसे हैं कि हम सभी की ‘सुधी’ बराबर लेते-देते रहेंगे। और यही हुआ, पहली ही मुलाकात में हम मित्रों ने जान लिया कि साहित्यकार सुधीर सक्सेना का व्यक्तित्व चुम्बकीय है। उन्होंने मेरे साथ वहां के सभी साथी रचनाकारों और सुधि पाठकों को पहली नजर में आकर्षित किया। फेंचकट दाड़ी और चश्मा पहने जो कवि मेरे सामने आया, वह किसी कहानी के नायक से कम नहीं था। जब बतियाना आरंभ किया तो जैसे उनका जादू पूरे सभागार में बढ़-चढ़ कर बोलने लगा। लंबे अंतराल के बाद सूरतगढ़ में किसी को सुनना और मिलना हमें महत्त्वपूर्ण लगा था।
    ये लगभग पांच वर्षों से अधिक पुरानी बातें हैं। उन्होंने उस दिन कुछ कविताएं और अपनी यात्राओं की स्मृतियां साझा करते हुए व्याख्यान दिया था। कविता में स्मृतियों और ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़े कुछ अहसास और शब्दों की अनुगूंज अब भी किसी संगीत की भांति भीतर कहीं दफन है, किंतु वे शब्द अब पकड़ में नहीं आते। जैसे स्मरण में उस दिन के संवाद का पूरा ब्यौरा कहीं खो गया। किंतु उनके संवाद में स्थानीयता और राजस्थान के विषय में जानने की उत्कंठा और अद्भुद लालसा का स्मरण मैं भूला नहीं हूं। वे जिस तन्मयता के साथ कुरेद-कुरेद कर सवाल-दर-सवाल करते हुए हमारी बातों को ध्यान-मगन हो कर सुन रहे थे, और उसी समय स्मृति में किसी फिल्म की भांति कैद भी होते जा रहे थे। वह स्मृति अब वैसी नहीं है, इन विगत कुछ दृश्यों में आवाजें नहीं रहीं। रील चल भी नहीं रही, बस एक चित्र पर अटकी हुई है। सुधीर सक्सेना का उस समय में होना और हम सब से मिलना। तब से अब तक सुधीन सक्सेना स्नेहिल बने रहे हैं, इसे ऐसे भी कहा जाना चाहिए कि मेरे प्रति उनके स्नेह में निरंतर इजाफा हो रहा है।
    जिक्र ‘दुनिया इन दिनों’ पत्रिका का भी आया था। साथ ही यह भी कि दिल्ली-भोपाल के विषय में सुना कि सरकारी विज्ञापनों के बल पर बहुत पत्रिकाएं निकल रही हैं। सुधीर जी ने हम मित्रों के आग्रह का मान रखते हुए एक बंडल बना कर पत्रिका के कुछ अंक भिजवाए। ‘दुनिया इन दिनों’ के वे विशेषांक फिल्म जगत के कलाकारों पर बेहद मेहनत से तैयार किए गए थे। वे अंक बेहद आकर्षक और प्रभावशाली लगे। मेरी राय आज भी यही है कि प्रधान संपादक सुधीर सक्सेना की मेहनत के बल पर ‘दुनिया इन दिनों’ पाक्षिक पत्रिका सदा मित्रों को सम्मोहित करने वाली बनी रहेगी।
    इस बीच एक लंबा अंतराल गुजर गया। कभी-कभार दुआ सलाम हो जाती। मैं बिना काम हाय-हेलो करने वाला नहीं हूं किंतु दोस्तों-दुश्मनों की याद बराबर बनी रहती है। बहुत अच्छा हुआ कि फेसबुक पर एक बार फिर सुधीर सक्सेना से मित्रता और संवाद का सिलसिला बना। मेरे हिंदी कविता-संग्रह ‘उचटी हुई नींद’ की समीक्षा ‘दुनिया इन दिनों’ में प्रकाशित कर उन्होंने मुझे उपकृत किया। ऐसा इसलिए कि राजस्थानी भाषा में तो पत्र-पत्रिकाएं बेहद कम है और जब हिंदी कविता-संग्रह आया तो जिन बहुत-सी पत्र-पत्रिकाओं का दंभ हिंदी ओढ़े है, उन में से काफी को समीक्षार्थ पुस्तकें भिजवाने पर भी निराशा हाथ लगी।
    सुधीर सक्सेना का आभार इसलिए भी कि ‘दुनिया इन दिनों’ के आगे के अंकों में उन्होंने मुझे सक्रियता से जोड़े रखा। जब मैंने चयनित राजस्थानी कवियों की कविताओं के प्रकाशन का सुझाव दिया तो उसे न केवल सहर्ष स्वीकार किया वरन मेरी मातृभाषा के कई कवियों को किसी स्तंभ की भांति पत्रिका में लगातार सुंदर साज-सज्जा के साथ स्थान दिया। 
    फोन और इंटरनेट संवाद के लंबे सिलसिले के बाद एक बार फिर उन से रू-ब-रू होने का संयोग बना। दैनिक भास्कर बीकानेर संस्करण के मुख्य-संपादक मधु आचार्य ‘आशावादी’ और उनके बड़े भाई आनंद वि. आचार्य की पुस्तकों के लोकार्पण के कार्यक्रम की रूपरेखा जब मित्र बना रहे थे, तब बहार से बुलाए जाने वाले मुख्य अतिथियों के प्रस्तावित नामों में एक नाम सुधीर सक्सेना का भी था। जिसे आयोजन से जुड़ी मित्र मंडली द्वारा सर्वसहमति से स्वीकार किया। बीकानेर के लेखकों में मधु आचार्य ‘आशावादी’ की सक्रियता जान कर सुधीर सक्सेना बहुत प्रसन्न हुए।
    लोकार्पित होने वाली पुस्तकें उनको ई-मेल पर उपलब्ध करवाने के बाद हमारी चर्चा का लंबा सिलसिला चला। राजस्थानी और बीकानेर सुधीर सक्सेना के लिए आकर्षकण का केंद्र इसलिए भी रहा है कि उनके पूर्वज यहीं के थे, और अब भी उनके अनेक सगे-संबंधियों के निवास राजस्थान में हैं। जिन दिन सुधीर जी को दिल्ली से बीकानेर आना था उसी दिन भास्कर के धीरेंद्र आचार्य ने दूरभाष पर उनसे लंबी चर्चा कर एक शानदार साक्षत्कार तैयार किया जो आगले दिन भास्कर में प्रकाशित हुआ। मेरे आग्रह पर सुधीर जी ने अपनी तीन-चार कविताओं को राजस्थानी में अनूदित करने की अनुमति दी। यह संयोग बनाया गया कि जिस दिन वे बीकानेर में रहें, उसी दिन ‘दैनिक युगपक्ष’ में उनकी हिंदी कविताओं के राजस्थानी अनुवाद उनके सम्मान में प्रकाशित हो सकें।
    रेल्वे स्टेशन पर बहुत आत्मीयता से सुधीर जी का मिलना और वहां से होटल तक के छोटे से सफर में बेहद आत्मीयता भरी बातें, मेरी निजी धरोहर है। मधु आचार्य ‘आशावादी’ के हर लोकार्पण-कार्यक्रम की भांति यह कार्यक्रम भी टाउन हॉल में भव्यता के साथ हुआ। खूब साहित्य-प्रेमी जुटे। बहुत कम समय में सुधीर सक्सेना ने अपनी लिखित टिप्पणी तैयार कर की थी। उस दिन साहित्य, समाज और कविताओं पर उनकी सारगर्भित टिप्पणी सभी को प्रभावित करने वाली लगी। मैं नहीं भूला हूं कि टाउन हॉल में कार्यक्रम के बाद वे भोज का जितना रस ले रहे थे, उससे कहीं अधिक उनकों रस मित्रों से बातों करने में आ रहा था। वे इतनी आत्मीयता के साथ मधुर संवाद में खोए रहे कि किसी को यह अहसास नहीं होने दिया कि वे दिल्ली से आएं हैं और सफर के साथ दिन भर की थकवट हमारे इस मेहमान ने पूरे दिन भूलाए रखी। ऐसा लगा कि यह मेहमान मेजबान जैसा है।
    मैं जितना सुधीर सक्सेना को याद करता हूं उतना भीतर डूबता जाता हूं। असंख्य यादों में सुधीर जी के साथ मेरी और मित्र हरीश बी. शर्मा की देशनोक-यात्रा भी शामिल है, तो उनका बीकानेर की हवेलियों को देखने का चाव भी अविस्मरणीय है। इसी प्रसंग में उनका एकांत क्षणों में साथ बैठने का आग्रह और मुझे ‘सूफी संत’ की उपमा से विभूषित करना। ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो मेरे भीतर रोमांच भर देते हैं।
    ‘दुनिया इन दिनों’ में प्रकाशन का क्रम और हमारी चर्चाएं निर्बाध गति से चलती रही। इसी बीच इस बार उनकी तरफ से सूचना मिली कि वे जल्द ही बीकानेर आ रहे हैं। पता चला एक लोकार्पण-कार्यक्रम में वे और ज्योतिष जोशी आने वाले हैं। सुधीर जी अक्सर चर्चा में पूछते रहते हैं- और इन दिनों क्या चल रहा है? मैं इस सवाल को लेखन से जोड़ते हुए अपनी गतिविधियों के बारे में बताता हूं और वे अपने बारे में।
    एक दिन जब मैंने उन्हें बताया कि मैं नंदकिशोर आचार्य की चयनित कविताओं की एक कविता पूरी कर चुका हूं, तब उन्होंने कहा कि वे बीकानेर आएंगे तब उस किताब को देखना चाहेंगे। उनकी इस चाहना में एक दूसरी किताब का हमारा स्वपन छिपा था। योजना बनी कि सुधीर सक्सेना की चयनित कविताओं की एक किताब राजस्थानी में आए। उनका सुझाव था कि अनुवाद के साथ मूल कविताओं का पाठ भी साथ में प्रकाशित होना चाहिए। 
    उनके उपलब्ध संग्रह में पढ़ता रहा और बिना कवि-आग्रह के मैं कविताएं चयनित करने लगा। मैं चाहता था कि उनकी सभी कविताएं और सारे संग्रह पढ़ सकूं। जो उपलब्ध नहीं थे, वे उन्होंने मेरे लगातार आग्रह पर पीडीएफ फाइल के रूप में उपलब्ध करवाए। अच्छा तो यह रहता कि वे खुद अपनी प्रतिनिधि कविताएं अनुवाद के लिए चयनित कर देते, पर उन्होंने ऐसा नहीं करते हुए मुझ पर विश्वास बनाए रखा और मुझे निरंतर प्रोत्साहित करते रहे। उनकी कविताओं का मैं ऐसा भिखारी बन गया कि जहां कहीं कोई सुराग मिलता, मैं पीछा करने लगता। कहीं ऐसा नहीं हो कि उनकी कोई कविता मेरी आंखों के आगे आने से रह जाए। कुछ भी छोड़ना मुझे गवारा नहीं था।
    कविता-पाठ करते उनका एक चित्र इसी खोज-खबर के बीच हाथ लगा और मैंने पाया कि उनके हाथ के नीचे डायरी और किताब जैसा कुछ है। मैंने फोटो डाउनलोड कर उसे एनलार्ज कर उत्सुकतावश देखा तो समझ में आया कि संभवतः एक किताब अब भी मुझे दूर है। मैंने उसी दिन आग्रह किया और अपने पिछले आग्रहों के इतिहास को याद करते हुए नए संग्रह की सोफ्ट कॉपी भेजने का अनुनय किया। बाद में सुधीर जी ने इसे मेरी ‘बनिक-वृति’ की संज्ञा देते हुए, मुझे अपने उस उपहार से विभूषित किया था।      
    इस बीच साहित्य अकादेमी का राजस्थानी भाषा के लिए पुरस्कार मधु आचार्य ‘आशावादी’ के उपन्यास ‘गवाड़’ को मिलना और ‘दुनिया इन दिनों’ के लिए बेहद उत्साह और आत्मीयता से उपन्यास-अंश के अनुवाद का आग्रह मिलना, जैसी अनेक बातें हैं लिखने को। अंत में मैं अपनी डायरी-अंश अथवा कहूं कुछ पंक्तियां सुधीर सक्सेना के काव्य-संग्रहों पर नोट्स के रूप में प्रस्तुत करते हुए ‘जय हिंद’ कहना चाहता हूं। 

कविता संग्रहों पर कुछ तरतीब और बेतरतीब बातें

कविता संग्रह ‘ईश्वर हां, नहीं.... तो’ का नाम ही बेजोड़-अद्वितीय है। मुझे ज्ञात नहीं कि हिंदी कविता के इतिहास में ऐसा नामकरण विन्यास किसी कवि ने अपने कविता संग्रह के में किया होगा। उस परमपिता और शक्ति को लेकर इन कविताओं में किसी संत कवि-सी दार्शनिकता है, तो साथ ही इतिहास के विराट रूप को दृष्टि में रखते हुए असमंजस, संशय, द्वंद्व और विरोधाभास जैसे अनेक घटक हमें अद्वितीय अनुभव और विस्तार देते हैं। इस संग्रह की लगभग सभी कविताएं कवि के दो तरफा आत्म-संवाद से जुड़ी हैं। यहां विशेष उल्लेखनीय यह है कि जो ईश्वर से अपरिमित दूरी है अथवा होना न होना जिस संशय-द्वंद्व में है, उसके अस्थित्व को कवि ने आशा और विश्वास से भाषा में अभिव्यंजित किया है।
००००
‘किरच-किरच यकीन’ सुधीर सक्सेना का नई कविता को समृद्ध करने वाला कविता-संकलन है। छोटी और मध्यम आकार की इन कविताओं में कम शब्दों में कवि ने अपने काव्य-कौशल एवं शिल्प के बल पर जैसे प्रभावशाली कविताओं को सहजता से रचने का हुनर पा लिया है। 
००००
‘काल को भी नहीं पता’ संग्रह सुधीर सक्सेना के कवि की कीर्ति को अभिवृद्धि करते हुए अलगा पड़ाव है। यहां कवि की चिर परिचित भाषा और कहन को हम पहचान सकते हैं। इस संग्रह से हमें पुखता अहसास होता है कि यह कवि सामान्य नहीं वरन विशेष है, जो हिंदी कविता में प्रयोग और अपने अद्वितीय विचार-बल पर कविता की ऊंचाई पर ले जाने वाला कहा जाएगा। तूतनखामेन के लिए तीस कविताओं की रचना करना यानी खुद को एक समय से दूसरे समय में ले जाकर, वहीं लंबे समय तक ठहर जाना है। बिना ठहराव के यहां जो अनुभूतियां शब्दों के रूपांतरित होकर हमारे सामने है, वे कदापि संभव नहीं थी। ये कविता कोरा ऐतिहासिक ज्ञान अथवा विमर्श नहीं, वरन कवि के वर्तमान से अतीत को छूने की चाह में उस बिंदु तक पहुंच जाना है जहां कोई कवि काल को विजित करता है।  
००००
संग्रह ‘रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी’ में प्रेम में पगी मोहक कविताएं हैं। यहां कवि का सांसारिक और प्रकृतिक-प्रेम एक ऐसे विन्यास में समायोजित है कि कविताएं विराट को व्यंजित करती हुई, बेहद निजता को भी अनेकार्थों में जुड़ती हुई भीतर समाहित करती है। 
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लंबी कविता ‘धूसर में बिलासपुर’ संभवतः किसी शहर पर अपने ढंग की अद्भुद विराट कविता है। यहां एक ऐसा बिलासपुर है जिस की छाया में हमें अपना अपना बिलासपुर दिखता है। बदलाव की आंधी में आधुनिक समय के साथ बदलते इतिहास और एक शहर का यह दस्तावेज एक आईना है।
००००
मेरे विचार से समग्र आधुनिक भारतीय कविता में कविता संग्रह ‘किताबें दीवार नहीं होतीं’ रेखांकित किए जाने योग्य है। इस संग्रह में कवि सुधीर सक्सेना ने अपने आत्मीय मित्रों और परिवारिक जनों पर जो कविताएं लिखी हैं, वे असल में अनकी आत्मानुभूतियां और हमारा जीवन हैं। इस कविता संग्रह को हिंदी कविता में कवि के व्यक्तिगत जीवन के विशेष काल-खंडों और आत्मीय क्षणों का काव्यात्मक-रूपांतरण कर सहेजने-संवारने का अनुपन उदाहण कहा जाएगा।
००००
लंबी कविता ‘बीसवीं सदी इक्कीसवीं सदी’ बेहद उत्सुकता के साथ समय में झांकने का रचनात्मक प्रयास है। यहां समय के बदलाव को देखने-समझने का विन्रम प्रयास निसंदेह रेखांकित किए जाने योग्य है। कवि का मानना है कि समय तो एक समय के बाद अपनी सीमा-रेखा को लांध कर, अंकों के बदलाव के साथ दूसरे में रूपांतरित हो जाता है। किंतु उस बदलाव के साथ बदलने वाले सभी घटकों का बदलाब क्या सच में होता है? या यह एक कृतिम और आभाषित स्थित है? इस भ्रम में खोये हम हैं। और कविता के अंत तक पहुंचते पहुंचते स्वयं प्रश्न-मुद्रा में समय के बदलाव को नियति की विडंबना मान कर चुप रहने की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं। 
००००
‘समरकंद में बाबर’ अपनी सहजता, संप्रेषणीयता, सृजनात्मकता और विषयगत विविधता के कारण एक संग्रहणीय कविता-संग्रह है। इस संग्रह में उनकी लंबी कविता ‘बीसवीं सदी इक्कीसवीं सदी’ भी संकलित है। सुधीर सक्सेना की सभी कविता-संग्रह एक साथ देखते हैं तो कुछ कविताएं अभनिष्ठ है। संभवतः ये ऐसी कुछ कविताएं है जो उन्हें प्रिय रही हैं, अथवा उन्हें लगता है कि इनका पूरा मूल्यांकन नहीं हुआ है।
००००
‘कुछ भी नहीं अंतिम’ की विविध कविताओं और इससे पहले के संग्रहों में संकलित कविताओं में कुछ शब्दों के प्रयोग को लेकर मुझे लगता है कि सुधीर सक्सेना जैसे कवि हमारे भाषा-ज्ञान का विस्तार करते हैं। कुछ ऐसे शब्द हैं जो एक पाठक और रचनाकार के रूप में सुधीर सक्सेना को पढ़ते हुए मैंने सीखें हैं। कविता के प्रवाह और आवेग में कहीं कोई ऐसा शब्द अटक जाता है कि हम उस शब्द का पीछा करते हैं। हम शब्दकोश तक पहुंचते हैं और लोक में उसे तलाशते हैं। संग्रह की कविताओं के पाठ को फिर-फिर पढ़ने का उपक्रम असल में हमारा कविता में डूबना है। बहुत गहरे उतरना है। जहां हम पाते हैं कि एक ऐसा दृश्य है जो हमारी आंखों के सामने होते हुए भी अब तक हमसे अदृश्य रहा है। सुधीर सक्सेना की कविताएं हमें हमारे चिरपरिचित संसार में बहुत कम परिचित अथवा कहें समाहित अदृश्य संसार को दृश्य की सीमा में प्रस्तुत करती है। सच तो यह है कि ‘कुछ भी नहीं अंतिम’ संग्रह में गहन संभवनाएं हैं। यहां उनकी काव्य-यात्रा के परिभाषित-अपरिभाषित अनेक संकेत देखे जाने शेष हैं।
००००
    सुधीर सक्सेना के मोह और प्रेम में मैं डूबा हुआ हूं, भविष्य में उनकी कविता-यात्रा पर विस्तार से लिखने की अभिलाषा है।
डॉ. नीरज दइया
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युग सहचर - सुधीर सक्सेना / संपादक : प्रद्युमन कुमार सिंह / लोकोदय प्रकाशन, 65/44, शंकरपुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ- 226001 दूरभाष : 7897201523 / संस्करण : 2017 / मूल्य : 160/- /पृष्ठ : 160
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21 अगस्त, 2017

दो बाल-कविताएं ० नीरज दइया

खाऊंगा

आलू नहीं खाऊंगा
मटर नहीं खाऊंगा
खाना ही है मुझको
तो रसगुल्ला खाऊंगा।

मिर्ची नहीं खाऊंगा
बेंगन नहीं खाऊंगा
खाना ही है मुझको
तो मालपुआ खाऊंगा।

केला नहीं खाऊंगा
आम नहीं खाऊंगा
खाना ही है मुझको
तो ब्रेड-फकोड़ा खाऊंगा।
००

भुजिया का स्कूल
बीकानेरी भुजिया
कैसे नबंर वन आता
कोई जरा समझा दो...

दादाजी लाते-
दो नबंर भुजिया

दादीजी मंगवती-
तीन नंबर भुजिया

ऐसे कितने-कितने
होते भुजिया के नंबर

ठीक पढ़ते नहीं भुजिया
अपने स्कूल में
तभी तो पाते है-
इतने कम नंबर।
००

16 अगस्त, 2017

111 कविताएँ कवि : सुधीर सक्सेना

पुस्तक समीक्षा /  डॉ. नीरज दइया
    हिंदी कविता में विगत चार दशकों से सक्रिय कवि सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘111 कविताएं’ उनके सात पूर्व प्रकाशित कविता-संग्रहों- ‘कुछ भी नहीं अंतिम’, ‘समरकन्द में बाबर’, ‘रात जब चन्द्रमा बजाता है बाँसुरी’, ‘किताबें दीवार नहीं होती’, ‘किरच किरच यकीन’, ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ एवं ‘धूसर में बिलासपुर’ से चयनित कविताएं है। संग्रह में इन सात कविता-संकलनओं से चयनित कविताएं कवि के इंद्रधनुषी सफर को प्रस्तुत करती हैं, वहीं इन सात रंगों में अनेक रंगों और वर्णों की आभा भी सुसज्जित नजर आती है। कहना होगा कि एक लेखक-कवि और संपादक के रूप में सुधीर सक्सेना की रचनाशीलता के अनेक आयाम हैं। वे किसी एक शहर अथवा आजीविका से बंधकर नहीं रहे, साथ ही वे विविध विधाओं में सामान्य और औसत लेखन से अलग सदैव कुछ अलग और विशिष्ट करने के प्रयास में आरंभ से ही कुछ ऐसा करते रहे हैं कि उनकी सक्रिय उपस्थिति को रेखांकित किया गया है। उनका कविता-संसार एक रेखीय अथवा सरल रेखीय संसार नहीं है कि जिसमें बंधी-बंधाई और किसी एक लीक पर चलने वाली कविताएं हो। जाहिर है यह चयन और संकलन उनकी इसी विविधता और बहुवर्णी काव्य-सरोकारों को जानने-समझने का मजीद अहमद द्वारा किया गया एक उपक्रम है। सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा के विषय में संपादक के कथन- ‘उनकी कविओं की शक्ति, सुन्दरता के आयामों की विविधता ही कवि को समकालीन हिंदी कविता की अग्रिम पंक्त में ला खड़ा करती है।’ से निसंदेह पाठकों और आलोचकों की सहमति पुस्तक के माध्यम से भी होती है।
    पुस्तक के आरंभ में कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालती सुधी आलोचक ओम भारती की विस्तृत एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है। साथ ही वरिष्ट कवि-आलोचक नरेन्द्र मोहन का कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-साधना पर एक पत्र पुस्तक में ‘मंतव्य’ के अंतर्गत दिया गया है। इससे यह पुस्तक शोधार्थियों और सुधी पाठकों के लिए विशेष महत्त्व की हो गई है। कविता-यात्रा के विविध पड़ावों पर यह गंभीर अध्ययन-मनन कविताओं के विविध उद्धरणों के माध्यम से नवीन दृष्टि और दिशा देने वाले हैं। इन आलेखों में जहां कवि के साथ अंतरंग-प्रसंगों को साझा किया गया है वहीं समकालीन कविता और सुधीर सक्सेना की कविता को लेकर विमर्श में हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना का योगदान भी रेखांकित हुआ है। संग्रह में संकलित कविताओं में जहां कवि के काव्य-विकास और संभावनाओं की बानगी है, वहीं उनके सधे-तीखे तेवर और निजता में अद्वितीय अभिव्यंजना का लोक भी उद्घाटित हुआ हैं। इसी को संकेत करते ओम भारती लिखते हैं- ‘सुधीर की कविता बरसों का रियाज, सधे-सुरों और सहज आलाप समेटती पुरयकीन कविता है। इसमें व्यंजना का रचाव है,तो लक्ष्णा का ठाठ भी है।’
    संकलित कविताएं वर्तमान जीवन के यथार्थ-बोध के साथ कुछ ऐसे अनुभवों और अनुभूतियों का उपवन है जिसमें हम उनकी विविध पक्षों के प्रति सकारात्मकता, सार्थकता और आगे बढ़ने-बढ़ाने की अनेक संभवनाएं देख सकते हैं। कविताओं में कवि की निजता और अंतरंगता में प्रवाह है तो साथ ही पाठक को उसके स्तर तक पहुंच कर संवेदित करने का कौशल भी है। वे कविताओं के माध्यम से जैसे एक संवाद साधते हैं। कविताओं में कवि की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति से अधिक उल्लेखनीय उनकी सहजता, सरलता और सादगी में अभिव्यंजित होती विचारधारा है। जिसके रहते वे विषय और उसके प्रस्तुतीकरण के प्रति सजग-सचेत और हर बार नई भंगिमाओं की तलाश में उत्सुकता जगाते हुए अपने पाठकों को हर बार आकर्पित करते हैं। ‘कुछ भी नहीं अंतिम’ संग्रह के नाम को सार्थक करता यह संकलन अपनी यात्रा में बहुत बार हमें अहसास करता है कि सच में कवि के लिए कविता का कोई प्रारूप अंतिम और रूढ़ नहीं है। ‘समरकंद में बाबर’ के प्रकाशन के साथ ही हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना को बहुत गंभीरता से लिया जाने लगा। वे जब ईश्वर के विषय में फैले अथवा बने हुए संशयों को कविता में वाणी देते हैं तो अपने अंतःकरण के निर्माण में अपने इष्ट मित्रों और साथियों की स्मृतियों-अनुभूतियों को भी खोल कर रखते हैं। ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ और ‘किताबें दीवार नहीं होती’ जैसे संग्रहों की कविताएं सुधीर सक्सेना को हिंदी समकालीन कविता के दूसरे हस्ताक्षरों से न केवल पृथ्क करती है वरन यह उनके अद्वितीय होने का प्रमाण भी है। प्रेम कविताएं हो अथवा निजता के प्रसंगों की कविताएं सभी में उनकी अपनी दृष्टि की अद्वितीयता प्रभावशाली कही जा सकती है। ये कविताएं कवि के विशद अध्ययन-मनन और चिंतन की कविताएं हैं जिन में विषयों की विविधता के साथ ऐसे विषयों को छूने का प्रयास भी है जिन पर बहुत कम लिखा गया है। कवि को विश्वास है- ‘वह सुख/ हम नहीं तो हमारी सततियां/ तलाश ही लेंगी एक न एक दिन/ इसी दुनिया में।’ वे अपनी दुनिया में इस संभावना के साथ आगे बढ़ते हैं।
    ‘धूसर में बिलासपुर’ लंबी कविता इसका प्रमाण है कि किसी शहर को उसके ऐतिहासिक सत्यों और अपनी अनुभूतियों के द्वारा सजीव करना सुधीर सक्सेना के कवि का अतिरिक्त काव्य-कौशल है। कविता की अंतिम पंक्तियां है- ‘किसे पता था/ कि ऐसा भी वक्त आयेगा/ बिलासपुर के भाग्य में/ कि सब कुछ धूसर हो जायेगा/ और इसी में तलाशेगा/ श्वेत-श्याम गोलार्द्धों से गुजरता बिलासपुर/ अपनी नयी पहचान।’ अस्तु कहा जा सकता है कि जिस नई पहचान को संकेतित यह कविता है वैसी ही हिंदी कविता यात्रा की नई पहचान के एक मुकम्मल कवि के रूप में सुधीर सक्सेना को पहचाना जा सकता है।
    अच्छा होता कि इस संकलन में संग्रहों और कविताओं के साथ उनका रचनाकाल भी उल्लेखित कर दिया जाता जिससे हिंदी कविता के समानांतर सज्जित इन कविता यात्रा को काल सापेक्ष भी देखने-परखने का मार्ग सुलभ हो सकता था। साथ ही यहां यह भी अपेक्षा संपादक से की जा सकती है कि वे अपना और कवि का एक संवाद इस पुस्तक में देते अथवा कवि सुधीर सक्सेना से उनका आत्मकथ्य इस पुस्तक में शामिल करते। इन सब के बाद भी यह एक महत्त्वपूर्ण और उपयोग कविता संचयन कहा जाएगा। सुंदर सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति से कविताओं का प्रभाव द्विगुणित हुआ है।
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111 कविताएँ / कवि : सुधीर सक्सेना चयन एवं संपादन : मजीद अहमद प्रकाशक- लोकमित्र, 1/6588, पूर्व रोहतास नगर, शाहदरा, दिल्ली पृष्ठ : 224 मूल्य : 395/- संस्करण : 2016 
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11 अगस्त, 2017

असत्य के प्रयोग

    बापू की आत्मकथा का नाम है। सत्य के प्रयोग। उन्होंने बताया जो मैं पहले से जानता था, पर नई बात यह थी कि वे किताब लिख रहे हैं- असत्य के प्रयोग। केवल किताब ही नहीं लिख रहे, उन्होंने कहा कि वे प्रयोग भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि सत्य से भला क्या प्रयोग करना? जो सत्य है, वह तो सत्य है। प्रयोग का विषय तो असत्य है। अब जमाना सत्य का नहीं, केवल और केवल असत्य का ही जमाना है। अब तो झूठों का बोलबाला और सच्चे का मुंह काला वाली अनेक बातें और स्थितियां हमारे समाने हैं। वे महाश्य मुंह खोल कर खड़े थे और बीच-बीच में बोल रहे थे- मुझसे मुंह मत खुलवाओ, आपको सबको पता है कि कहां क्या-क्या हो रहा है। मैंने उन्हें टोका- मुझे कुछ भी नहीं पता कि कहां क्या-क्या हो रहा है?
    उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा- अखबार नहीं पढ़ते हो या समाचार नहीं सुनते हो। छोड़िए इन दोनों को, क्या चौक में नहीं बैठते हो। आस-पास की गप्प-गोष्ठी का आनंद तो लेते ही हो। फिर भी भोले बनते हो। क्या आप भी मेरी तरह असत्य का कोई प्रयोग मुझ पर करने लग गए हो? देखिए, यह आपका विषय नहीं है। मैंने इसे खोजा है और इस पर मुझे काम करने दो। मेरी किताब छप जाए फिर देखना सबकी आंखें खुल जाएगी। मुझे फिर उनको टोकना पड़ा- जनाब आंखें तो सभी की खुली हुई है।
    वे तनिक गुस्से से बोले- आप सब कुछ समझकर भी नादान बनते हैं, उसका कोई क्या कर सकता है! आंखें तो खुली हुई है, पर फिर भी खुली हुई नहीं है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमारा आदर्श वाक्य है- सत्यमेव जयते। जानते हैं ना? मैंने गर्दन स्वीकृति में हिलाई तो वे बोले- मेरी किताब पढ़ने के बाद वही वाक्य नए रूप में दिखाई देने लग जाएगा। आज सत्य की जीत कहां हो रही है। झूठ बेचा जा रहा है, खरीदा जा रहा है। चारों तरफ झूठे लोग भरे पड़े हैं। जिसे देखो- झूठ बोलते हैं और सरासर झूठ बोलते हैं। सफेद झूठ को रंग-बिरंगे लुभावने रंगों में सजा कर पेश किया जा रहा है। नहीं समझें? मैं विज्ञापनों की बात कर रहा हूं। वस्तुओं की कीमत की बात कर रहा हूं। दो रुपये के माल को बीस रुपये में बेचने वाले एम.आर.पी. के नाम पर भोली भाली जनता को ठग रहे हैं।
    मैंने बीच में पूछना मुनासिब समझा कि असत्य के प्रयोग किताब में क्या इन्हीं सब बातों पर प्रवचन मिलेंगे? वे हंसने लगे और बोले- आप भी ना कितने भोले हैं। देखिए मैं प्रयोग कर रहा हूं। किताब लिखने की बात कर रहा हूं और अगर किताब लिख दी तो फिर यह असत्य, कैसे असत्य रहेगा? बात को समझा करो, मैं सच में असत्य के प्रयोग कर रहा हूं। मैंने उन्हें प्रणाम कर बस इतना ही कहा- धन्य हैं आप। धन्य है आपकी धरा और धन्य जननी। जैसे उन्हें मेरे इसी धन्य का इंतजार था। वे मुडे और चल दिए।
    मैं उन्हें मंथर गति से जाते हुए देख रहा था कि पंच काका आ पहुंचे, बोले- ये पागल क्यों आया था। इसकी ज्यादा मत सुना करो। सबके पास ऊल-जलूल बातें करता फिरता है। यह अच्छा किया इसे घर में नहीं बैठाया। इसके घरवाले भी इससे परेशान है। इस से होता कुछ नहीं, इसे करना कुछ नहीं। बस फालतू बातें करता रहता हैं। इसका काम लोगों के दिमाग खराब करना है।
० नीरज दइया