02 फ़रवरी, 2014

कोई आवाज सुनाई दी है

राजस्थानी कहानी :  भंवरलाल ‘भ्रमर’
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया


“क्या लाऊं सरजी ?”
“एक कप चाय और एक कैवेंडर सिगरेट।”
    नजर चारों तरफ दौड़ाते हुए सरजी ने सिगरेट-कश खींच कर घुंए से गोल-गोल चक्कर बनाने लगे। वह घुंए के बादलों में खो गए। उन्हें स्कूल की बातें याद आने लगी। ओफ्फ यह भी कोई नौकरी है ? रोजना लड़ाई-झगड़ा। कभी टाइम-टेबल का झगड़ा तो कभी ट्यूशन का और कभी परीक्षा का। हेडमास्टर भी साला खुद को खुदा समझता है।
    पिछले तीन-चार दिन रो रोज सिर खाता है कि रिजल्ट सुधारिए.. रिजल्ट सुधारिए। यह क्या मेरे बस की बात है ! लड़कों को पूरा क भी नहीं आता लेकिन आदेश दे देते हैं रिजल्ट अच्छा रहना चाहिए। वे कुछ न कुछ लिखेंगे तभी यह होगा। मैं खाली कापी में तो नम्बर देने से रहा। ऐसे तो देश गर्त में जा रहा है और रसातल में चला जाएगा।
    हुंह ! टारगेट प्रतिशत वाली बात भी सिरदर्दी है। मास्टरों को बांध देते हैं कि इतना तो परिणाम रहना ही चाहिए। नहीं तो वेतन-वृद्धि बंद। तब हमें भी जबरदस्ती नम्बर बढ़ा कर पास करना पड़ता है लड़कों को।
    हेडमास्टर भी कहता है- “सभी का भला हो ऐसा काम ही करना चाहिए, बच्चों का परिणाम अच्छा तो बच्चे खुश और उनके मां-बाप भी खुश। हेडमास्टर खुश और इस्पैक्टर खुश मतलब सभी खुश। हमारा क्या ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य।
    बुद्धि निकल गई है साले की, कहता है कि हमारा क्या लिया ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य। अरे उनका कैसा दुर्भाग्य ? दुर्भाग्य तो इस देश का है जिसमें ऐसे मास्टर और ऐसे हेडमास्टर हैं।
    मैंने तो जालिम को साफ कह दिया कि मैं कापियों में अंक-वृद्धि नहीं करूंगा। लेकिन आज सभी साथियों के कहने से एक के दस और दो के बीस करने पड़े, रिजल्ट जो सुधारना था। आपसदारी में साथ वालों का तो कहना मानना ही पड़ता है।
    परिणाम सुन कर सभी लड़के हंस रहे थे। हेडमास्टर और स्टाफ भी खुश नजर आ रहा था। परीक्षा-परिणाम सुनने आए अभिभावक भी खुश थे। देखिए परिणाम कितना अच्छा रहा। यहां के मास्टर मेहनती हैं। परंतु मेरा तो कलेजा जल रहा था। घायल की गति घायल जाने, दूसरे किसी को क्या समझ। इस प्रकार जबरदस्ती पास हुए लड़के आगे चलकर देश का क्या भला करेंगे ? यदि यही सब कुछ चलता रहा तो इस देश को फिर से गुलाम होना पड़ सकता है।
    इन बच्चों को जबरदस्ती पास करवा कर उनके साथ भी अन्याय करवाया गया है। स्कूल प्रशासन ने उनकी जिंदगियां बर्बाद की है। इससे बढ़ कर और क्या अपराध हो सकता है ?
    “सर ! चाय लिजिए....।” आवाज सुनकर वह चौंका। चाय की चुस्कियां लेते हुए उसने चारों तरफ गौर किया। पास ही दो-तीन आदमी ऊन की कूटाई वाले आए हुए थे और चाय पी रहे थे। वे आपसी बातों में मशगूल थे। इस कहानी के कथा-नायक सरजी का ध्यान उनकी तरफ चला गया।
“यार तूने वह वूलन मील वाली नौकरी छोड़ कर भूल ही कर दी। वहां मशीनों पर आराम का काम था। अब हाथ में कामड़ी लिए दिनभर माथा-फोड़ी करनी पड़ती है। बंधी-बंधाई नौकरी की कोई होड थोड़े ही होती है।”
    उसने गर्वोन्नत जबाब दिया, “दोस्त मैं दबता क्यों रहूं ? मैनेजर का बच्चा कोई मुझे उधार तोलता है क्या ? पगार फ्री की तो देता नहीं.... बिना काम की गालियां किस बात की सुनता ? मेहनत कर कमता-खाता हूं। हाथ में काम हो तो काम की किसे कमी ? लोग पीछे भाग भाग कर काम करवाते हैं। अब ऊन कूट के कमाई करता हूं तो किसी की सुननी तो नहीं पड़ती ना ?” यह कह कर वह रुक गया। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था और कानों के पास की नशे तन हुई थी।
    वह आगे बोला, “मैं मेरे हिसाब से जितनी ऊन तोलवाता हूं उतनी कूट कर दे देता हूं। वह यदि गड़बड करेगा या अक्कड़ दिखाएगा तो दूसरे बहुतेरे काम है। काम में सुनना किस बात का। यह तो मैं आठवीं पास हूं। यदि बी.ए. पास होता तो भी क्या हुआ ? इज्जत गिरवी रख कर मैं काम नहीं कर सकता। भला... आत्मा को कोई बेचा जा सकता है।”   
    इन बातों के हवाले मास्टर ने सोचा कि यह एक मजदूर आदमी है, पर कितना स्वाभिमानी है ! कितनी सच्ची बात कहता है। इसे नौकरी की कोई परवाह ही नहीं.. और एक मैं हूं जो जान-बूझ कर भी इतना अधीन हो गया। जैसे समझदारी में रेत गिर गई।
    फिर मन ही मन विचार किया कि यदि मैं नौकरी छोड़ देता तो करता क्या ? मेरे घर तो खाने-पीने का संकट हो जाएगा। इन हाथों को कोई काम करना ही नहीं आता। और अगर थोड़ा कुछ आता भी है तो अब कैसे करूंगा ? मास्टर हूं मैं तो... अच्छा लगेगा क्या ? मन ही मन मुस्कुरा कर वह उठ गए और चाय-सिगरेट के पैसे चुका कर बाहर निकल गए।
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राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा ‘सातूं सुख’ कहानी संग्रह के लिए पुरस्कृत भंवरलाल ‘भ्रमर’ का जन्म 22 अक्टूबर, 1946 को बीकानेर में हुआ। आप राजस्थानी नई कहानी के प्रमुख काहनीकारों में से एक हैं, साथ ही राजस्थानी भाषा में कहानी केंद्रित पहली पत्रिका ‘मरवण’ के संपादक भी रहे हैं। आपके तीन मौलिक कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक संपादित कहानी संग्रह और एक उपन्यस प्रकाशित हैं।