24 मार्च, 2017

मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने

पंच काका का मानना है कि हमारे देश में जिन राज्यों की चर्चा मुख्य धारा में रहती है, उनमें यूपी-बिहार प्रमुख हैं। वे कहते हैं कि लूटा उसे जाता है जिसके पास कुछ होता है। यूपी-बिहार में ही सब कुछ है। बिहार में लालूजी तो यूपी में मुलायमजी प्रसिद्ध है। ये तो बस दो ठो नाम लिए हूं। पर इतना जान लो के जिनके पास लुटाने के लिए बहुत कुछ होत रहा, वही लूट और लूटा सकत है। फिल्मी दुनिया में गाना ऐसे ही नहीं बन जात- ‘मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने’। इस गाने में ही लाइन थी- ‘दिल वालों का करार लूटने’। अब अगर गौर किया जाए तो गीतकार ने सबसे पहले ‘दिल वालों’ की जगह ‘दिल्ली वालों’ का करार लिखने की सोची थी। पंच काका ने ही कहा कि इसे इतना ओपनली नहीं लिखना है। माना कि दिल्ली का करार यूपी-बिहार से जुड़ा हुआ है। आपको याद हो तो एक समय भोजपुरी गाना हिट हुआ था- ‘कमर लचके तो यूपी-बिहार झुमेला।’ यह प्रमाण है कि यूपी-बिहार की लोकप्रियता अन्य राज्यों से अधिक है। वैसे यूपी, बिहार के लोगों की भावनाओं को ठेस भी बहुत जल्दी पहुंचती है। पूरे देश में यूपी-बिहार के लोग फैले हुए हैं। काफी जगह तो ऐसी है कि वहां सभी हिंदी-भाषी लोगों को ‘बिहारी’ कहा जाता है। हमारे एक मित्र यूपी वालों को नाराजगी में ‘यूप्ले’ कहा करते हैं। ऐसे ही एक परेशानी के दिन उन्होंने अपनी भाषा में यूपी वालों के लिए एक नया शब्द इजाद कर दिया- ‘यूप्ले’ यानी ‘तुम खेलो’, वे शब्द के प्रयोग को कोड-वर्ड की तरह काम लिया करते थे। कोड वर्ड का मतलब भय-खतरा है। क्या यूपी-बिहार में देश के लोगों को डाराने वाले लोग रहते हैं? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो यूपी-बिहार को किसी के ले लेने और किसी को दे देने से भला आपत्ति क्यों होती। एक किस्सा यूं हुआ कि फिल्म ‘छोटे सरकार’ के एक गाने को लेकर शिल्पा शेट्टी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो गई। कारण था उनकी फिल्म का  गाना- 'एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे और बदले में यूपी-बिहार ले ले...।’
         यूपी-बिहार को लूटने-लूटाने और झूमने-झुमाने तक तो बात ठीक थी, कि चलो भैया! लूट और झूम लो। यूपी हो या बिहार यहां के शीर्ष नेताओं का परिवार बड़े कुनबें के रूप में विख्यात है। यहां बस गिने-चुनों की चलती है। कुछ परिवारों का दबदबा है। जब-जब से वे सत्ता में आएं हैं, अपने भाई-बंधुओं का जमावड़ा किया है। मान कि यह अपने अपने घर का मसला है, और कोई ऐसे ही लुटता-लूटता नहीं। कैसे लुटता-लूटता है इसकी सब खबर रहती है। पर यह क्या है कि सब जब अपने ही आदमी है, तो किससे क्या कहा जाए? है तो यह सरासर गलत ही। यह क्या बात हुई कि एक ‘चुम्मा’, और वह भी उधार का। यानी उधार के चुम्मे के बदले में ‘यूपी-बिहार ले ले...’। कोई ऐसे क्यों ले लेगा। हम नहीं हैं क्या? एकदम पोल थोड़ी है। कोई ऐसे कैसे ले सकता है? इसी बात पर कोर्ट में मुकदमा दर्ज हो गया। सबको लाइन में लगा दिया। यह बात अलग है कि हमारे यहां नियम में भी नियम और उपनियमों के अनेक दाव हैं। कानून का खेल बड़ा है। यहां देर जरूर हो जाती है, पर अंधेर नहीं। अगर अंधेर होती तो कोई देने-लेने की बात करता ही क्यों? ऐसे ही लेन-देन नहीं हो जाता क्या? बिना बात के...। पंच काका करते हैं कि संयुक्त परिवार अच्छी बात है। इससे कभी मैं और कभी तुम का खेल चलता रहता है। ना इसकी बारी और ना उसकी बारी। हम ही हम है बारीबारी। आपस में मिल बांट कर खा लेते हैं। आप भले इसे बदलती राजनीति का खेल कहें। पर जनता टेस्ट बदलना चाहती है। हर रोज दाल खाने वालों को अब कुछ दूसरा टेस्ट मिलना चाहिए।

० नीरज दइया

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