17 मार्च, 2017

विकास का गणित

ह निर्विवादित सत्य कि है कि हर भी काम की तीन प्रतिक्रिया होती है। सिक्का उछालेंगे तो कभी अनिर्णय की स्थिति भी आ सकती है। सरल शब्दों में उदाहरण से बात करें तो जैसे मैं लिखता हूं, तो एक वर्ग कहेगा- क्या खूब लिखता है, दूसरा वर्ग कहेगा- बकवास लिखता है और तीसरा वर्ग ऐसा होगा जो कुछ नहीं कहेगा। जैसे उन्हें मेरे लिखने ना लिखने से कोई सरोकार नहीं हो। सकारात्मक और नकारात्मक के साथ यह जो मौन और निर्लिप्तता का भाव है, इसका हर जगह बड़े महत्त्व का है। राजनीति में तो कहना ही क्या! सत्ता सदैव वोटिंग पर चलती है। यहां एक पक्ष में बैठता है तो और दूसरा विपक्ष में। पक्ष किसी बात पर कहेगा- हां तो विपक्ष की मजबूरी है कि उसे कहना होगा- ना। और किसी काम के संदर्भ में विपक्ष कहेगा- हां तो पक्ष कहेगा- ना। दोनों एक साथ एक जैसा कुछ कह नहीं सकते हैं।
          सत्ता पक्ष कहेगा- देश विकास कर रहा है, तो विपक्ष का बयान आएगा- गर्त में जा रहा है। विकास और गर्त की अपनी-अपनी दिशाएं है। पर यह खेल जैसा है। क्यों कि कभी ऐसा नहीं हुआ है कि एक ने कुछ कहा और दूसरे ने सहमति में सिर हिलाया हो। लगता है कि हां और ना का कोई गणित है। जो सत्ता में होगा वह जो कुछ कहेगा, उसके विपरीत विपक्ष कहेगा। दोनों की यह त्रासदी है। जब से मैंने होश संभाला, देखा भारत प्रायः त्रासदी को झेलता रहा है। देश के विकास की गति कौन कैसे आंकता है? सबके अपने-अपने तर्क है। मैं भ्रम में हूं- कभी लगने लगता है कि सच में विकास हो रहा है। इसके साथ ही जब मैं दूसरे पक्ष की बात सुनता हूं तो मुझे वे भी ठीक लगते है कि देश गर्त में जा रहा है। मेरे अपने तर्क और पैमाने नहीं है। कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि देश दो दिशाओं में गति कर रहा है। विकास की दिशा में गति पक्ष को दिखाई देती है, और गर्त की दिशा वाली गति दिखने के लिए विपक्ष है। इसका अभिप्राय यह अवश्य है कि देश गतिशील है। देश की गति पर तो संदेह दोनों को नहीं है।
          इनके बीच एक तीसरा पक्ष मौन है। यह पक्ष जानबूझ कर मौन धारण किए है। हिरणां मून साध वन चरणा को निमंत्रण का इंतजार है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही निर्दलयी को कहते हैं- आ जाओ, आ जाओ। हमारे साथ आ जाओ। हमारी पार्टी में आ जाओ। किसी चुप्पी के बाद की ‘हां’-‘ना’ महत्त्वपूर्ण होती है। हमारे पक्ष का क्या होगा जिसे जनता-जनार्दन कहा है। हमें निमंत्रण बस चुनाव के समय मिलता है। वोट नहीं देना लोकतंत्र का अपमान है, अपमान पढ़े-लिखे लोग करते नहीं। हमारी कामना है देश विकास करे, आगे बढ़े। विकास की दिशा में सभी जुट जाएं। पर वोट जिन्हें नहीं मिलता, वे नाराज हो जाते हैं। वे सदा गर्त की दिशा का आकलन करते हैं। सत्ता में तीसरा मौनी-पक्ष कभी पटला खा सकता है। आफत मेरी है कि मुझे सभी का सुनना पड़ता है। पंच काका कहते हैं- सबकी सुनो। सबकी देखो और करो अपने मन की। किसी का मन भला बुरा कैसे हो सकता है, वह तो विकास की दिशा देखता है। देखना चाहता है। देश के कर्णधार भारतीय मन को समझ कर विकास की राह चलते चलेंगे तो बात बनेगी।
० नीरज दइया 

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