06 जुलाई, 2018

शब्द संस्थान सूरतगढ़ द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘कागद की कविताई'

साहित्यकार बोले- राजस्थानी भाषा के लिए कवि कागद के प्रयासों से युवा वर्ग ले प्रेरणा

सूरतगढ़| ओमपुरोहित कागद राजस्थानी व हिंदी जगत के लोकप्रिय रचनाकार थे। उन्होंने नवोदित रचनाकारों के प्रोत्साहन...

सूरतगढ़| ओमपुरोहित कागद राजस्थानी व हिंदी जगत के लोकप्रिय रचनाकार थे। उन्होंने नवोदित रचनाकारों के प्रोत्साहन के लिए किया गया ‘थार सप्तक’ का संपादन राजस्थानी साहित्य के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने योग्य है। यह बात वरिष्ठ समालोचक डॉ. नीरज दैया ने गुरुवार को ग्रामोत्थान स्कूल प्रांगण में कागद जयंती समारोह में बोलते हुए कही। उन्होंने कहा कागद की कविताएं शीर्षक से पांडुलिपि तैयार की है, जो जल्द ही पाठकों तक पहुंचेगी। समारोह में संभाग के वरिष्ठ रचनाकार शामिल हुए। साहित्यकार मोहन आलोक की अध्यक्षता में हुए समारोह में कागद की धर्मप|ी भगवती पुरोहित अतिथि के रूप में मौजूद थीं। डॉ. हरिमोहन सारस्वत ने कागद की राजस्थानी व हिंदी रचनाओं का वाचन किया। महेंद्रसिंह शेखावत ने स्मृति में रचित कविता पढ़ी। वक्ताओं ने कागद के रचनाकर्म के साथ उनके व्यक्तित्व पर संस्मरण सांझा किए। पत्रकार करणीदानसिंह राजपूत, संदेश त्यागी, डॉ. मदनगोपाल लड्ढा, राजूराम बिजारणियां, नवनीत पांडे, हरीश हैरी, सतीश छींपा, नरेश मेहन ने कागद के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू संस्मरण के माध्यम से बताए। साहित्यकार मोहन आलोक ने कहा कि राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए कागद ने अनूठे प्रयास किए थे, जिनसे प्ररेणा लें। भगवती पुरोहित ने आयोजन के लिए आभार जताते हुए कागद की स्मृति में रचित कविताएं प्रस्तुत की। कागद पुत्री भारती व अंकिता पुरोहित भी समारोह में मौजूद थीं। समारोह में डॉ. अरूण सहरिया, सुरेंद्र सुंदरम, विनोद वर्मा, प्रहलादराय पारीक, आशा शर्मा, सुमन शेखावत, जयश्री सारस्वत, दिनेश चंद्र शर्मा, लाजपतराय भाटिया, नरेश रिणवा, नरेश वर्मा, अनिल धानुका, रमेश माथुर शामिल हुए। संचालन आकाशवाणी के वरिष्ठ उदघोषक राजेश चड्ढा ने किया। गोपीराम गोदारा ने आभार जताया।

05 जुलाई, 2018

कागद हो तो हर कोई बांचे / डॉ. नीरज दइया

    कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ (05 जुलाई, 1957 - 12 अगस्त, 2016) के ब्लॉग का नाम है- ‘कागद हो तो हर कोई बांचे’। यह आज से करीब दस वर्ष पहले 2009 में जब बनाया था, तब उनके साथ मैं था। चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचे की तर्ज पर रखे इस शीर्षक में ‘भाग ना बांच्या जाय’ की व्यंजना आज अधिक व्यापक रूप में समझ आती है। कागदजी भाग्य बांचना भी जानते थे, लेकिन उन्होंने सदा कर्म पर ही विश्वास किया। वे एक आदर्श शिक्षक के रूप में अपना सामाजिक दायित्व निभाते हुए समाज में रचनाकार के रूप में भाषा, साहित्य और संस्कृति की अलख जगाते रहे। वे गीता के ज्ञान को आत्मसात किए निरंतर कर्मशील रहते हुए साहित्य-समाज में खोए रहे। राजस्थान शिक्षा विभाग में उन्होंने एक चित्रकला-शिक्षक के रूप में सेवाएं देते हुए, शैक्षिक प्रकोष्ठ अधिकारी पद तक का सफर किया।
    दो अवधारणाएं परस्पर विरोधी हैं। एक कहती है कि इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति कवि होता है। हरेक के पास कवि-मन है। ऐसा मन जिसका परिष्कार संभव है। दूसरी अवधारणा के अनुसार कवि जन्मजात होते हैं। वे बनाएं नहीं जाते। कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा को साहित्य-शास्त्र में अपने ढंग से समझाया गया है। कागद हो तो हर कोई बांचे में जो पठनीयता का भाव है वह सपाट बयानी किंतु संवेदनशीलता से पोषित है। बहुधा ऐसा भी होता है कि किसी एक कवि का चेहरा दूसरा कवि धारण कर लेता है। कहीं अंशिक साम्य और विरोधाभाव के साथ कविता-यात्रा के आरंभ में प्रत्येक कवि का संघर्ष खुद का व्यक्तिगत चेहरा निर्मित करता रहता है।
    कविता के क्षेत्र में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ एक ऐसा चेहरा है, जिन्होंने तीस  वर्षों की सतत साधाना से अपना व्यक्तिगत चेहरा निर्मित किया है। यह ऐसी निर्मिति है जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता। चार हिंदी और आठ राजस्थानी कविता-संग्रह ओम पुरोहित ‘कागज’ के प्रकाशित हुए हैं। अनेक कविताएं अब भी अप्रकाशित हैं। सही अर्थों में बड़ा कवि वही होता है जो अपनी विशिष्टताओं का दंभ नहीं पालता। ऐसे अनेक कवियों के बीच कागद जी हमें बराबर अहसास कराते रहे हैं कि वे कवि तो हैं पर किसी दूसरे लोक के प्राणी नहीं हैं। उनका जीवन इतना सहज और सरल रहा कि उनकी सहजता-सरलता के रहते बहुत बार वे कवि-रूप में अस्वीकार किए गए थे। किंतु कवि कागद को भी जैसे कवि होने से जरूरी नेक आदमी होना ही सदा मंजूर रहा।
    हम सब के बीच कागद जी एक सामान्य इंसान की भांति सखा भाव में रहते रहे। कभी उन्हें उग्र या प्रतिरोध की मुद्रा में आक्रोशित होते हुए नहीं देखा गया। उनके भीतर स्वाभाविक रूप से एक कवि  था, जो बेहद विनम्र, सौम्य, शांत, सरल था। ये वे गुण थे जिनसे वे हर किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। वे सदा संयमित होकर जीवन-राग की बातें किया करते थे। बहुत बार मैंने पाया कि वे बहुत कुछ भीतर छिपा कर भी बाहर सर्वानुकूल और सहजता धारण किए रहते थे।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ के समग्र साहित्य का अवलोकन करें तो वे भाषाओं के बंधनों से परे ऐसे भारतीय कवि के रूप में लगते हैें। हिंदी और राजस्थानी भाषा महज एक माध्यम है। वे हमारे मनोभावों और अनुभूतियों को वाणी देने वाले प्रमुख कवि हैं। अकाल और कालीबंगा पर आधारित कविताओं को क्या किसी भाषा के बंधनों में बांधा जा सकता है! यह शब्दों के माध्यम से रंगों और रेखाओं की ऐसी धरोहर है जिसे किसी सीमा में बांधना उचित नहीं है।
    हिंदी और राजस्थानी के साथ साथ आपको पंजाबी भाषा में भी समान गति प्राप्त थी। आपने कुछ काविताएं पंजाबी में भी लिखी हैं। भाषाओं का क्षेत्र इतना व्यापक और विशाल है कि भारत की किस भाषा में कहां क्या हो रहा है, यह सहजता से जानना कठिन है। अपने राजकोट प्रवास के दौरान कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ की अकाल से संबंधित कुछ कविताओं का गुजराती अनुवाद मैंने प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘कविता’ में देखे। मैं बहुत खुश हुआ और कवि को बधाई का फोन लगाया। जब बात हुई तो पता चला कि उन्हें इसकी खबर तक नहीं है! यह अनुवादक और संपादक की गलत परंपरा है। ऐसा भी संभव है कि उन्हें सूचना दी गई हो और मिली नहीं हो। किंतु अनुवाद बिना कवि की अनुमति के प्रकाशित नहीं होना चाहिए।
    यहां एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि समय, समाज, संस्कृति और देश-काल से जुड़ी रचनात्मकता किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। उसकी महक दूर-दूर तक किसी न किसी रूप में किसी माध्यम से पहुंच ही जाती है। प्रत्येक क्षेत्र और आंख की अपनी-अपनी सीमाएं हैं, इन सीमाओं का अतिक्रमण करने वाली रचनात्मकता को मैं प्रणाम करता हूं। निसंदेह कागदजी व्यापक जन-सरोकारों के कवि हैं। ‘कागद की कविताई’ उनकी कविता के साथ उनके कवि-मन और अंतर्संबंधों को देखने-दिखाने का एक छोटा सा प्रयास है। 
    बचपन से ही ओम पुरोहित को कागज इकट्ठा कर उसे जेब में रखने का शौक था। यही कारण था कि उन्हें उनके नाना श्री तेजमाल बोहरा ‘कागदिया’ कह कर बुलाया करते थे। ‘कागज’ को राजस्थानी में ‘कागद’ कहते हैं। लोक में प्रसिद्ध है- ‘हीमत कीमत होय, विन हिमत कीमत नही। / करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया॥’ नाना जी का स्नेहिल ‘कागदिया’ जैसे इसी सोरठे से प्रेरणा ग्रहण कर हमारी पूरी पीढ़ी के आदरणीय बन गए। उनको दिशा देने वाला घर-परिवार और विद्यालय मिला।
    जन्म जिस घर परिवार में हुआ वहां घर-आंगन में कविता खेला करती थी। पिता श्री रिद्धकरण पुरोहित साहित्यिक रुचि से सुसम्पन्न लोक साहित्य के मर्मज्ञ थे। पिताजी कविता के इस कदर रसिक थे कि कविता सुनना-सुनाना और पढऩा-पढ़ाना उनकी दैनिक दिनचर्या में था। अनेक लोककथाएं, लोकगीत और लोक कहावतों के मर्म पर गंभीरता से चर्चा करते थे। उन्होंने न केवल राजस्थानी वरन हिंदी साहित्य की अनेक कृतियों को घर में सहेज रखा था। वे मीरा, कबीर, बिहारी, तुलसी से अमीर खुसरो की बातों में खो जाते थे। ढोला मारू रा दूहा, वीर सतसई उनकी प्रिय पुस्तकें थी। अनेक चारण कवि मित्रों की रचनाएं उन्हें कंठस्थ थी। इस साहित्यिक विरासरत में बालक ओम पुरोहित को कविताई सिखाई जाने लगी।
    वर्ष 1970 में ज्ञान ज्योति उच्च माध्यमिक विद्यालय, श्रीकरनपुर (श्रीगंगानगर) ने प्रवेश लिया और वहां प्रिंसिपल प्रख्यात कवि जनकराज पारीक का मिलना संयोग बना। आखिर एक दिन वह आया जब स्कूल में पारीकजी को लगा बालक ओम में काव्य-प्रतिभा है। वैसे ओम पुरोहित ने 9 वर्ष की आयु में कविता लिखना आरंभ कर दिया था। मराठी के प्रख्यात लेखक आनंद यादव के आत्मकथात्मक उपनयास ‘जूझ’ में जिस भांति बालक आनंद का कविता प्रेम स्कूल में जाग्रत होता है, कुछ वैसे ही भविष्य के एक कवि ओम पुरोहित ने भी अपने गुरु की भांति कविताएं गाने का प्रयास किया। उसे बहुत जल्द ही पता चल गया कि गुरुजी की भांति कविताएं, गीत-गायन उसके बस की बात नहीं है।
    ओम पुरोहित बताते थे कि उन पर सुरीले कंठ के धनी उनके गुरु जनकराज जी पारीक का कवि-रूप छाया रहता था। उनकी आरंभिक रचनाओं में कोरा आदर्शवाद था। वर्ष भर के अंतराल के बाद उनकी रुचि व्यंग्य-कविता की दिशा में बढ़ी। उनकी हास्य-व्यंग्य की कविताएं 1975-76 में लोकप्रिय होने लगी। इन्हीं दिनों श्रीगंगानगर के कवि और डांखला विधा के प्रेरक कवि मोहन आलोक से उनकी मुलाकात हुई। मोहन आलोक के सान्निध्य ने ओम पुरोहित के कवि को दिशा दी। कागद जी का जीवन पर्यंत मानना रहा कि इस आपाधापी और अपसंस्कृति के दौर में मनुष्य का कोई साथी नहीं है, केवल कविता ही एक हथियार है जो हमें संवेदनशील बनाती है।
    विचित्र संयोग यह है कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के कवि को पहले पहल पहचानने वाले उनके गुरुजी जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की कोई किताब वर्षों तक नहीं आई और अपने गुरुजी की अप्रकाशित कविताओं को उनके शिष्य ‘कागद’ ने ‘थार सप्तक-5’ में प्रकाशित किया। बाद में जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की स्वतंत्रत पुस्तक प्रकाशित हुई।
    मान-सम्मान और पुरस्कारों की बात करें तो ओम पुरोहित ‘कागद’ को कविता संग्रह ‘आदमी नहीं है’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’, राजस्थानी कविता संग्रह ‘बात तो ही’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से काव्य विधा का गणेशी लाल व्यास ‘उस्ताद’ पुरस्कार अर्पित किया गया। उन्हें भारतीय कला साहित्य परिषद, भादरा का कवि गोपी कृष्ण ‘दादा’ राजस्थानी पुरस्कार मिला, सरस्वती साहित्यिक संस्था (परलीका) और जिला प्रशासन, हनुमानगढ़, कन्हैयाला सेठिया सम्मान, छोटीखाटू आदि द्वारा सम्मानित किया गया।  सन् 1989 में राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित ‘राजस्थान के कवि’ शृंखला के तीसरे भाग ‘रेत पर नंगे पाँव’ (संपादक-नंद भारद्वाज) में उनकी कविताएं संकलित की गई हैं।
    कागदजी का मानना था कि हमारे यहां राजस्थानी आलोचना विधा में पर्याप्त कार्य होना शेष है। संभवत: यही कारण था कि जब मेरी पहली आलोचनात्मक कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ प्रकाशित हुई तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि मेरे ऐसे कार्यों से आलोचना का सूनापन दूर होगा। वे कहते थे कि कवि कुं.चंद्रसिंह बिरकाळी से लेकर पारस अरोड़ा तक और कहानीकार नृसिंह राजपुरोहित से लेकर सांवर दइया तक की यात्रा में आधुनिक राजस्थानी गद्य-पद्य साहित्य का पर्याप्त विकास हुआ है किंतु राजस्थानी आलोचना ठहरी हुई है। उनका मानना था कि डा.किरण नाहटा के शोधग्रंथ से वह आगे नहीं बढ़ी और यदि बी.एल. माळी के हाथों विकसित हुई तो नंद भारद्वाज के हाथों उसे सजने-संवरने का उसे किंचित अवसर मिला। अनेक कार्यों को लेकर कुछ सहमतियों-असहमतियों के विषय में भी हमारी चर्चा खुल कर होती थी। उनका मत था कि कुंदन माळी, डा. अर्जुनदेव चारण, डा.रमेश मयंक, श्यामसुन्दर भारती ने भी आलोचना की दिशा में कार्य किया है, किंतु केवल आलोचक के रूप में किसी की ख्याति नहीं बनी है। मुझे इसके लिए प्रयास करना चाहिए। मैं कहता- ऐसा सोच कर कुछ करने के पक्ष में मैं नहीं हूं। किंतु यह सच है कि आधुनिक साहित्य और खासकर आजादी के बाद के साहित्य का विकास और समृद्धि का परचम आलोचना के अभाव में पूरा लहराने से वंचित है।
    राजस्थानी के आधुनिक साहित्य की भारतीय भाषाओं तक पहुंच जरूरी है और इसके लिए हमें आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में बहुत कार्य करना होगा। फु टकर आलोचनाओं से ना वे संतुष्ट थे और ना मैं। पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न आलेखों और साहित्यिक कार्यक्रमों में पढ़े जाने वाले पत्रवाचनों में एक बंधे बंधाए प्रारूप और कुछ विशेष रचनाकारों को ही केंद्र में रखे जाने पर वे असहमत थे। धड़ैबंध आलोचना उनको रास नहीं आती थी। वे कहते थे कि यदि कोई आलोचक आलोचना के नाम पर केवल वाह-वाह बटोरने के लिए तारीफ ही तारीफ लिखे और सबको संतुष्ट रखने का प्रयास करे तो उसे सात सलाम। यह आलोचक और आलोचना का धर्म नहीं है। आलोचना में तो रचना के पाठ से मुठभेड़ होनी चाहिए। हमारे साहित्यकार भी कितने भोले और मासूम हैं कि वे ऐसे आलेखों में अपने नाम जुड़े होने से मुंह के ताले रखते हैं। कागदजी राजस्थानी साहित्य के वैज्ञानिक काल विभाजन, विधागत बदलाव-विकास-दशा-दिशा, प्रवृत्तियां, सरोकारों और बदलते प्रतिमानों की स्थापनाओं पर गंभीरता से कार्य किए जाने की सलाह देते थे।
    उन्हें स्मरण कराया कि ‘सबद गळगळा’ पर युगपक्ष में 1995 में और ‘बात तो ही’ पर जागती जोत में 2003 में मैंने उनकी समीक्षाएं लिखी। ‘बात तो ही पण बैठी कोनी’ समीक्षा से वे कुछ असहमत भी हुए, किंतु उन्होंने स्वीकार किया कि वे कविता में सजग हुए हैं। आलोचना की सजगता ही रचनाकार को सजगता की दिशा देती है। आलोचना का अभिप्राय केवल कमियां निकालना नहीं वरन प्रेरणा और प्रोत्साहन भी होता है। कुछ संभावनाओं को देखकर ही आलोचना में कुछ निर्णय अग्रिम रूप से भी प्रस्तावित करने होते हैं। मुझे हर्ष है कि मैंने ‘राजस्थली’ त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका के 100वें अंक के लिए जो आलेख ‘राजस्थानी कविता रा साठ बरस’ लिखा, उसमें उन्हें मैंने दस महत्त्वपूर्ण कवियों में शामिल किया था। ओम पुरोहित ‘कागद’ के साहित्यिक अवदान पर बहुत कम लिखा गया है किंतु कागदजी पर विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने लघु-शोध लिखें हैं- ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संचेतना (2008), ओम पुरोहित ‘कागद’ द्वारा रचित ‘थिरकती है तृष्णा’ में अकाल की विभीषिका (2008-09), कवि ओम पुरोहित का हिंदी-काव्य : एक मूल्यांकन (2008-09), ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संवेदना और शिल्प (2011-12) आदि।
ओम पुरोहित ‘कागद’ ने अनुवाद के रूप में अनेक रचनाओं का राजस्थानी, पंजाबी और हिंदी में परस्पर अनुवाद किए। अनूदित पुस्तक अभी कोई प्रकाशित नहीं हुई है किंतु कवि मायामृग के हिंदी कविता-संग्रह का उन्होंने राजस्थानी अनुवाद ‘कै जीवण कठैई ठैर नीं जावै’ नाम से किया है। उनकी अनेक रचनाओं का इतर भारतीय भाषाओं में अनुवाद होने के अनेक उदाहरण है, किंतु किसी संपूर्ण कृति के अनुवाद का प्रकाशन नहीं हुआ है। कुछ राजस्थानी कविता-संग्रह अंकिता पुरोहित ‘कागदांश’ द्वारा अनुवाद किए गए हैं जो ‘कविता कोश’ अंतरजाल पृष्ठों पर देखे जा सकते हैं।  
    ओम पुरोहित ‘कागद’ राजस्थानी-हिंदी कविता में एक मुकाम पर पहुंचने के बाद भी अंत तक कविता और रचना-प्रक्रिया को लेकर बहुत विनीत रहे। छोटा होते हुए भी मुझे बहुत स्नेह और मान देते थे। इतना मान दिया कि मुझे लगता है कि उनकी मुझे लेकर जो आशाएं-संभावनाएं थीं उन्हें जिम्मेदारी से पूरित करना है। उनका कहना था कि मेरी आलोचना पुस्तक ‘आलोचना रै आंगणै’ को यश मिलेगा क्यों कि इस कृति के माध्यम से मैंने साहित्य आलोचना के पर्याप्त दरवाजों को खोलने का प्रयास किया है। यह सच भी हुआ कि मुझे आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का सर्वोच्च पुरस्कार अर्पित किया गया। उनके नहीं रहने पर ‘कागद सम्मान’ का मिलना भी मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है। वैसे उन्होंने अपने जीवन काल में ही मुझे और मेरी कृति को बहुत बड़ा सम्मान दे दिया था। उन्होंने राजस्थानी साहित्य को एक अलग दिशा देने वाली कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ के पक्ष में अपनी सार्वजिक टिप्पणी में लिखा था- ‘आ पोथी आगै री आलोचना सारू च्यानणो करसी, जकै री खासा दरकार ही। नीरज री इण पोथी में कमियां हो सकै पण नीत में खोट नीं। कोई सडयंतर नीं! आज तक घणकरी राजस्थानी आलोचना में नीत रै खोट री बात होंवती ही, अब ईमानदारी री बात चालसी! आज ताईं थरपीज्यैड़ै कूड़ रै टूटण रा चरड़का भी सुणीजसी!’
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29 जून, 2018

पैसे का चक्कर / नीरज दइया

पैसा एक वचन है और इसका बहुवचन जब भी होता है वह बहुत भारी होता है। अब इसके एक वचन से किसी को कोई मतलब नहीं रह गया है। जहां कहीं भी मुद्रा में पोइंट के बाद कुछ लिखा होता है उसे हमारे सिस्टम अपने आप अपग्रेड कर देते हैं। इस राउंट-अप करने की प्रक्रिया में अब वे दिन लद गए जब इसके एक वचन अथवा बहुवचन होने के भी कोई अर्थ होते थे। मुझे अपने बचपन के दिन याद आते हैं, जब हाथ में पैसे होते थे तब एक अजीव सी खुशी होती थी। अब यह हाल है कि जब कोई हाथ में पैसों की शक्ल वाले सिक्के खुल्ले के चक्कर में पकड़ा देता है तो लगता है कि कह दें कि भैया इन्हें तुम ही रख लो। नोट है तो दे दो पर ऐसे चिल्लर से जेब फटने और खन-खन होने का डर है। हाय रे हमारा वह जमाना जब हम पैसों की इसी खन-खन से हर्षित होते थे और अब यहीं खनखनाहट कानों को खटकने लगी है। अतः यह निर्विवादित सत्य के रूप में कहा जा सकता है कि पैसे का सिम्पल बहुवचन हमारे भीतर नफरत भरने वाला है। पैसे का सुपर डिग्री बड़े वाला बहुवचन जिसमें बहुत सारे बहुवचन मिले हो और वह भी पैसे की शक्ल में हर्गिज नहीं हो तब हमारे काम का है।
एक रुपया यानी सौ पैसे और सौ पैसे में अब कुछ नहीं आता है। बच्चों को मनी जिसे हम पुराने जमाने में बहुत बाद में हाथ खर्च के नाम से जानने लगे थे आजकल वह सब डिजिटल हो गया है। बच्चों को कार्ड चाहिए और उससे कुछ भी करने की छूट। अब पैसों की तो बात ही मत करो, कम से कम सौ रुपये को शून्य मानते हुए जो भी करना है स्टार्ड करो। आप को बच्चों की जरा-भी खुशी का ख्याल है या फिर उसकी एक झलक देखने की इच्छा है तो बात पांच सौ देने लेने से कम मत करना। यदि आपका पहला फिगर दो हजार हो तो कुछ बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। अब ऐसी जनरेशन है कि बिना संकोच के सीधे कहती है- ‘पैसा पैसा क्या होता है पैसे की लगा दूँ ढेरी...’ भारतीय मुद्रा के विषय में यदि इस गीत के जैसे कि कहा ‘मैं बारिश कर दूँ पैसे की जो तू हो जाये मेरी’। किसी दिन यह तेरी मेरी वाला खेल सच में हो गया और किसी ने पैसों की बारिश करा दी शायद हमारे अच्छे दिन आ जाएंगे। पर इसमें अच्छे दिनों की तुलना में मुझे खतरा अधिक लगता है कि जिस किसी क्षेत्र में पैसों की बारिश होगी वह दिवानों और दिवानियों की संख्या के बल को देखते हुए होगी। खुदा ना करे कि हम सब उन्हीं पैसों के ढेर के नीच दब जाएं।
वैसे भी अभी हमारी हालत कुछ अच्छी नहीं है। सुनते हैं कि पूरा देश कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। देश के दबे होने में आप अपने पर कितना दबाब महसूस करते हैं आप की आप जाने पर मैं तो मेरी ही कह सकता हूं। मेरे गणित के अध्यापक ने ढंग से गिनती में निपुण नहीं किया या कहें कि मेरी ही नालायकी थी कि बड़ी गणित देखकर जी धबराने लगता है। बात लाखों से पार होते ही केस किसी दूसरे को रेफर करना पड़ता है। रोज दाल-रोटी मिल जाए इसी में भारतीय जनता की भांति मेरी भी खुशी है। अपनी अक्षमता को मैं स्वाभिमानी हूं इसलिए ‘सादा जीवन उच्च विचार’ कह कर गौरव की अनुभूति करता हूं। हमारे बुजुर्गों ने पैसों को हाथ का मैल कहा था सो मैं तो इस मैले से हाथ की अधिक निकटता का पक्षधर नहीं हूं। पंच काका की बात भी ठीक है कि जिनको पैसों का असली सूत्र मालूम है वे चुप रहते हैं। नासमझ लोग ही ‘पैसे पैसे क्या करती है’ ऐसा शोर-शराबा करते हैं। ए मुनिया! इस पैसों की ढेरी के चक्कर में नहीं आना है।
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अट्टहास, जुलाई, 2018 में प्रकाशित



25 जून, 2018

जय प्रकाश मानस : गूगल से भी आगे / नीरज दइया

जयप्रकाश मानस से मेरा परिचय बहुत पुराना है। कोई जान-पहचान दो दशक को छूने लगे तो उसे पुराना कहा जा सकता है। समय परिचय को प्रगाढ़ करे अथवा नहीं करें किंतु किसी व्यक्ति आकलन में मदद जरूर करता है। इस दौरान हम अपने संबंधों को ठीक-ठीक समझ और परिभाषित कर सकते हैं। मैं मेरे और मानस जी के विषय में कुछ लिखने से पहले उस दिन का स्मरण करना चाहता हूं जब जयप्रकास जी ने मेरे मानस में एक दस्तक दी। बात उन दिनों की है जब मैंने राजस्थान सरकार की अपनी मास्टरी छोड़कर केंद्रीय विद्यालय, राजकोट में पी.जी.टी. हिंदी के रूप में वर्ष 2003 में कार्यग्रहण किया था। वहां मुझे उच्च माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में हिंदी अध्यापन के साथ राजभाषा हिंदी और अन्य कार्य भी मिले थे।
किसी तारीख, दिन और महीने के चक्कर में पड़े बिना सीधे-सीधे कहना यह है कि जयप्रकाश मानस मेरे मानस गुरु उन्हीं दिनों बने थे। ऐसे गुरु जिन्हें वर्षों तक खबर नहीं हुई कि उनका कोई शिष्य नीरज दइया राजकोट गुजरात में बैठा है। भले उस समय मैं अपने इस संबंध को परिभाषित नहीं कर सका पर अब यह पक्का है कि वे मेरे गुरुजनों की श्रेणी में हैं। मेरे कुछ मित्रों को मुझ से शिकायत है कि मेरे गुरुजनों की संख्या अधिक है। मैं मानता रहा हूं जिससे हम कुछ सीखते हैं, जो हमें कुछ सीखाता है वह आदरणीय गुरु ही होता है। उन्होंने मुझे कंप्यूटर के भीतर छुपी हुई राजभाषा हिंदी लेखन से परिचित होने की प्रेरणा दी। उन दिनों मैं कंप्यूटर द्वारा देवनागरी हिंदी में लिखने का प्रयास बेबदुनिया के की-बोर्ड से किसी प्राथमिक स्तर के विद्यार्थी जैसे कर रहा था। मेरे पास एक ई-मेल आया। ऐसा मेल जिसे मैं अपने याहू आई-डी पर पढ़ नहीं पा रहा था। जानकार मित्र ने बताया कि यह फोंट की समस्या हो सकती है, यहां खुल नहीं रहे हैं। मित्र के सुझाव दिया और वह मेल जीमेल एकाउंट मैं पढा गया। सृजनगाथा संपादक के रूप में जयप्रकाश मानस के मेल से पता चला कि उन्होंने मेरे दो अनुवाद प्रकाशित किए हैं।
यह किसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा की बात है। कुछ बातें हम कह देते हैं और कुछ मनों में रह जाती है। मैं शब्दों के माध्यम से जयप्रकास मानस जी मिलता रहा हूं। उनसे संवाद का भी लंबा सिलसिला रहा हैं। बीकानेर में हमारी पहली रू-ब-रू मुलाकात वर्ष 2017 में हुई। जब वे अपने दल-बल के साथ ‘द्वितीय अंतराष्ट्रीय लघुकथा हिन्दी सम्मेलन’ के दौरान मेरे शहर में आए थे। मैंने उन्हें अपनी इन भावनों से अवगत कराया तो वे हंसने लगे और ‘अरे नहीं’ शब्द उनके मुख से निकले। उनके ‘अरे नहीं’ कहने और हंसने से मैं अपना शिष्य पद छोड़ने वाला नहीं था और नहीं छोड़ा है। वे भले मुझे मित्र, छोटा भाई या एक लेखक जैसा जो कुछ समझे उनका अपना दृष्टिकोण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिस श्रद्धा-भक्ति का पाठ पढ़ाया है उससे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैं तो जय, प्रकाश और मानस तीनों से शब्दों के गहरे अर्थों से प्रभावित होता रहा हूं, फिर ऐसे दुर्लभ संयोग को कैसे छोड़ सकता हूं।
मेरा उनसे संबंध कवि-अनुवादक के रूप में भी रहा है। मैंने उनकी कुछ कविताओं के राजस्थानी अनुवाद किए थे। जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं। आप और हम उन्हें फेसबुक पर लंबे समय से सक्रिय देख रहे हैं। वे किसी एनसाइक्लोपीडिया की भांति इतनी जानकारिया और स्रोत का भंडार है कि उन्हें प्रणाम करने का मन करता है। खैर मैं तो उन्हें अपना गुरु मान चुका हूं और उनकी इन सभी सेवाओं के लिए उन्हें हार्दिक वंदन करता ही हूं। अंत मैं मेरा बस इतना सा आग्रह है कि जो तटस्थ रहेगा, समय लिखेगा उसका भी इतिहास, फैसला आपका है कि आप अपना इतिहास कैसा चाहते हैं। मुझे तटस्थ की भूमिका से बेहतर स्नेह और आशीष का आकांक्षी होना बेहतर लगता है। मैं अपने गुरु जयप्रकाश रथ के रथ के साथ हूं और रहूंगा।
व्यक्ति का स्वभाव है कि वह थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है। मैं कुछ अधिक हूं और जयप्रकास रथ यानी मानस जी के संदर्भ में इतने लंबे समय में मुझे उनके कार्य, व्यवहार और अदम्य उत्साह में अनेकानेक स्वार्थ नजर आते हैं। वे एक सक्रिय रचनाकार के साथ गहरे अध्येता हैं। अपने समय और परिवेश से जुड़ कर वे जैसा जो कुछ कर चुके हैं अथवा अब भी कर रहे हैं बहुत उल्लेखनीय है। किसी एक व्यक्ति में इतनी क्षमताएं और योग्यताएं होना अद्वितीय है। उन्होंने साहित्य लेखन के साथ संपादक और हिंदी के प्रचार-प्रसार-विकास के लिए अतुलनीय कार्य किए हैं। यह सब उनके परिचय में विस्तार से देखा जा सकता है। अगर आपको यह सब पता नहीं तो गूगल जिंदाबाद तो आप जानते ही हैं। गूगल के साथ मेरे गुरुजी मानस जी को भी जिंदाबाद इसलिए कहना है कि वे बहुत सी बातों में गूगल से भी आगे हैं।
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24 जून, 2018

आज तुम याद बेहिसाब आए / डॉ. नीरज दइया

25 जून स्मृति दिवस पर विशेष-
स्मृति-शेष साहित्यकार श्री महेशचन्द्र जोशी


    मैं अपने ही काम-काज में खोया था कि बहुत दिनों बाद मन्दा (मन्दाकिनी जोशी) का फोन आया। एक छोटे से संवाद ने मुझे समय के उस बिंदु तक पहुंचा दिया जहां से हमारे परिचय का स्मरण मैं करने लगा। मेरे बचपन के दिनों में कहानीकार महेशचन्द्र जोशी (1935-2012) को मैंने सबसे पहले बाल साहित्य के लेखकों के रूप में पहचाना था। वे मेरे पिता को गहरे दोस्त रहे और मेरे लिए ऐसे लेखक हैं जिन्होंने मुझे अपना बाल उपन्यास भेंट कर शब्दों की इस दुनिया के लिए प्रेरित किया था। जोशी की पुत्री मन्दा से मेरा परिचय कब हुआ यह अब ठीक-ठीक स्मरण नहीं आता। उसे मेरे पिता सांवर दइया ने उसे बेटी की तरह प्यार दिया और वह मेरे लिए सदा बड़ी बहन की भांति आदरणीय रही हैं। उसकी सादगी, सहजता और सरलता प्रभावित करती है।  
    मन्दा बचपन से ही नाटकों में काम करती थी, उसे मेकअप और बिना मेकअप दोनों रूपों में देखा है। उसे और उसकी छोटी बहन अनु (अनुपमा) में मैंने पाया कि एक छिपी हुई रहती थी और दूसरी मुझसे मेरे हाल चाल पूछा करती थी। आज सोचता हूं तो लगता है कि मैंने उसे कभी सीधी-सरल लड़की के रूप में तो देखा ही नहीं, वह तो सदा से मुझे एक परी जैसी लगती रही है। मेरे बाल मन में पंखों वाली परियों की जो कहानियां रहीं उसमें मन्दा बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान को पर्याप्त मान-सम्मान मिला है। परियों तो हमेशा हंसती रहती है पर वह ऐसी परी है जो 25 जून, 2012 को बहुत रोई थी। उसने अपने पापा और हम सब के आदरणीय कहानीकार महेशचन्द्र जोशी को इसी दिन मुखाग्नि दी थी। उसने यह साबित कर दिया कि वह अपने पापा की बहादुर बेटी नहीं बेटा है। उसके संघर्ष और कार्यों को देखते हुए अगर मैं उसे परी कहता हूं तो गलत नहीं है। यह बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान की कहानियां बरसों हम में प्रेरण और हिम्मत भरती रहेगी। वह नारी शक्ति और अदम्य जीजीविषा का एक उदाहरण है। पिछले दिनों बीमारी से लंबा संघर्ष कर फिर से अपनी अदम्य मुस्कान से साबित किया है कि वह सचमुच परी ही हैं जो कभी हारती नहीं है।   
    मन्दाकिनी जोशी इसका पूरा श्रेय अपने पापा को देती हैं। वह उन्हें याद करते हुए कहतीं हैं- ‘मेरे प्रेरक मेरे पापा रहे हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। एक संपन्न परिवार में जन्म लेने के बाद भी पापा आर्थिक संकटों से जूझते रहे, पर हमें कभी आर्थिक अभाव महसूस नहीं होने दिए। जब तक माँ रहीं, दु:ख क्या होता है, शायद हमने दोनों बहनों ने जाना ही नहीं। जब 31 मार्च, 1993 को मेरी माँ (हेमप्रभा) का असामयिक निधन हुआ पापा ने हमें हिम्मत बंधाई। उन्होंने हमें भरपूर प्यार दिया। हम दोनों बहनों को बेटों की तरह पाला। हमें जीने की, कुछ करने की पूरी आजादी दी। इसी आजादी की वजह से मैंने रंगमंच पर लगभग 15 वर्ष की लंबी पारी पूरी की। पापा अस्वस्थ होने के बाद भी मुझे कभी रंगकर्म के लिए नहीं रोकते थे, वरन् मेरी कला को सराहते हुए सदा प्रेरित-प्रोत्साहित करते रहे।’
    मन्दा की इस यात्रा में मैंने उसके कुछ नाटक देखे हैं। महेशचन्द्र जोशी को अपने पुराने अजीज दोस्त सांवर दइया को याद करते हुए देखा है। वे बहुत भावुक इंसान थे और उनका गला भर आता था। वे बीमारी में भी जीवन से भरपूर उत्साहित रहते थे। उनकी बातों में पुराने किस्से और साहित्य की दुनिया के अलावा कुछ नहीं होता था। वे भी मन्दा को मन्दा कहते थे, मेरे पिता भी मन्दा कहा करते थे। शायद यही कारण रहा होगा कि हम घर में उसे मन्दा कहा करते थे। वह कविताएं लिखती है पर उसकी कोई किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है।
    किसी रचनाकार के जीवन में उसके माता-पिता का स्थान बहुत बड़ा होता है। वह बड़ा स्थान कुछ अधिक बड़ा हो जाता है जब पिता महेशचन्द्र जोशी जैसे हो। वरिष्ठ साहित्यकार महेशचन्द्र जोशी सन 1965 से अनवरत् लिखते रहे और वे राजस्थान ही नहीं राष्टीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहे । उनका जन्म 30  अगस्त, 1935 जसपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे मूलतः कुमाऊँनी थे। उनके जीवन काल में सात किताबें- मोम का घोड़ा (बाल उपन्यास), नशा (उपन्यास 1985), अधूरी तस्वीर(1972), मुझे भूल जाओ (1996), तलाश जारी है (1998), आठवाँ फेरा (2001), मेरा घर कहाँ है (2004) प्रकाशित हुई और आठवी किताब ओल्ड डोक्यूमेंट (2013) उनके निधनोपरांत प्रकाशित हुई। इसमें बड़ी भूमिका मन्दा यानी परी दीदी की रही है।
    आज महेशचन्द्र जोशी को इस संसार से विदा हुए 6 साल हो चुके हैं। वे अपने शब्दों के द्वारा अब भी हमारे बीच बने हुए हैं। उनकी ढेर सारी यादें और बातें अब भी हमें प्रेरित करती हैं। दुनिया की नजरों में वे चले गए हैं पर बहुत बार उनके जाने के बाद मुझे ऐसा लगता रहा है कि वे बीच-बीच में कभी कभार मुझे देखने आते हैं। मैं उन्हें मन्दा की आंखों से झांकता हुआ पाता हूं कि वे मुझे देख रहे हैं। उनका स्नेह और आशीर्वाद हमेशा हमेशा से बना हुआ है और इस बार जब वे झांक रहे थे तब कुछ कह भी रहे थे। उनका कहा मैंने मन्दा से कह दिया है कि वे चाहते हैं अभिनेत्री और रंगमंच की कलाकार अब कवयित्री के रूप में आए। शब्दों की दुनिया बहुत बड़ी है और इस बड़ी दुनिया में एक छोटी सी दुनिया मेरी है। मैं अपनी दुनिया में फैज अहमद फैज की पंक्तियां याद करता हुआ कहना चाहता हूं- कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब, आज तुम याद बेहिसाब आए।
००००


ना जाने कैसी ऊहापोह / डॉ. नीरज दइया

स्मृति शेष कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का स्मरण

    वह दिन और महीना कौनसा था, अब ठीक-ठीक स्मृति में नहीं है। वैसे मैं जिस दिन और महीने में अभी पहुंचा हूं और जिस स्मृति तक आपको ले जाना चाहता हूं, वहां यह सूचना इतनी आवश्यक भी नहीं है। आवश्यक यह है कि मैं आज से करीब आठ साल पहले बारिश के बाद के किसी उजले दिन में कालीबंगा में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के साथ था।
    राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा ऐतिहासिक महत्त्व का स्थल है। इसी जिले के कवि कागद राजस्थानी और हिंदी के ही नहीं वरन भारतीय कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। आपका जन्म 05 जुलाई, 1957 को केसरीसिंहपुर (श्रीगंगानगर) में हुआ और 12 अगस्त, 2016 को इस संसार से विदा होना अंकित किया गया है। वे विदा जरूर हो गए हैं किंतु ऐसा बहुत कुछ है जो अब भी अहसास करता रहा है कि वे यहीं कहीं हमारे आस-पास है। यहीं हमारे आस-पास उनके होने की अनेक स्मृतियां है।
    मैं स्मरण कर रहा हूं, उस दिन उन्होंने मुझे कहा कि कालीबंगा के इन थेहड़ों में वे अनुभूत करते हैं कि किसी विगत समय में वे यहीं आदिम जाति के संग-संग रहे हैं। जैसे वे समय के पार बहुत दूर विगत में धड़कते जीवन की धड़कनें अपनी सांसों में महसूस करते हुए कहीं दूसरे ही लोक में खो गए थे। मैंने उनके चेहरे पर अजीब से भावों को देखा था। उनके मन में ना जाने कैसी ऊहापोह चल रही थी।
    हमारी तमाम तकनीकी उपलब्धियों के बाद भी मन के भावों और भीतर चलने वाली ऊहापोह की थाह बेहद मुश्किल है। साहित्य इस मुश्किल को आसान करता है। खासकर काव्य में ऐसे जटिल और गुंफित भावों की अभिव्यक्ति होती है। कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का राजस्थानी कविता-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ (2009) है, जो उन्हीं दिनों आया था। यह संयोग है कि इस कृति का ब्लर्ब मैंने लिखा था। इस संग्रह में ‘कालीबंगा’ शृंखला के अंतर्गत इक्कीस कविताएं हैं। सघन अनुभूतियों से इन कविताओं में कालीबंगा को कवि ने शब्दों में साकार किया है।
    एक वरिष्ठ कवि ने कहा कि इस पुस्तक का नाम ‘आंख भर चितराम’ ठीक नहीं है। हथेली चित्रों से भरी हो सकती हैं, पर आंख का भरना तो रोना होता है। इस नाम का सुझाव भी मेरा था, जिसे कागद जी बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया था। इसलिए इसका यश-अपयश मेरा भी है। इस संग्रह में बहुत-सी कविताएं चित्रात्मक है, उन्होंने काफी कविताओं में शब्दों के माध्यम से जैसे अनेक चित्रों को प्रस्तुत किया है। हर आंख री सीमा है, पर हर आंख में असीम भाव भरे हुए हैं। आंख एक ऐसा आइना है, जिनमें ना जाने कितने चित्र समाहित हैं। हमारे जीवन के सभी चित्रों की आंख एक शरण-स्थली है। कठौती में गंगा कहने वाला राजस्थानी समाज क्या आंख को चित्रों का अक्षय-पात्र नहीं मान सकता है। शब्द के अर्थों को विस्तारित भावों के साथ लिया जाना चाहिए या संकुचित और रूढ़ अर्थों तक हमें रुक जाना चाहिए?
    दृश्य के रूप में एक चित्र हमारी आंखों के ठीक सामने उपस्थित होता है और दूसरा चित्र ऐसे किसी दृश्य की अनुभूति से कवि सृजित करता है। किनारों के रूप में ऐसे दोनों छोर मेरे सामने थे। कालीबंगा का वर्तमान अपने अतीत को लिए सामने था और कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ की कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं की अनुभूतियां अंतस में हिलोरे ले रही थीं। यह समय का ऐसा पुल था, जिस के पार कवि के साथ चहलकदमी करते हुए मैं पहुंच गया था। कवि के साथ ऐसे ही किसी पुल पर मैं खड़ा था। मुझे डर लगने लगा था।
    कालीबंगा के उस सूने उजाड़ में कोई नहीं बस हम दो ही थे। कागद जी की भावुकता मुझे भीगने पर विवश कर रही थी। मैं कवि के व्यक्तिगत जीवन के कुछ पन्नों का अध्येयता था, इसलिए डरता था कि उनकी तबियत बिगड़ गई तो क्या होगा? मैं उस समय कहना तो बहुत चाहता था, पर मुझे मौन ने जकड़े रखा। मेरा मौन रहना ही उचित था, क्योंकि ऐसे समय में जो कुछ भी मैं कह सकता था उससे वे भली-भांति परिचित थे। फिर मैं कवि होकर किसी अग्रज कवि को यह कैसे कहता कि भाई साहब इतना भावुक होना ठीक नहीं है!
    मैं तो हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम के संदर्भ पर अज्ञेय जी की कविता- ‘एक दिन सहसा / सूरज निकला / अरे क्षितिज पर नहीं, / नगर के चौक / धूप बरसी / पर अंतरिक्ष से नहीं, / फटी मिट्टी से।’ में खोया हुआ था। साथ ही उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात को ओम पुरोहित ‘कागद’ से जोड़ कर देख रहा था कि यह होता है किसी विषय में डूबना। कवि  अज्ञेय जी की भांति ओम पुरोहित ‘कागद’ भी कालीबंगा को आत्मसात कर के कविताएं रच सके थे। 
    ‘थेहड में सोए शहर / कालीबंगा की गलियां / कहीं तो जाती हैं / जिनमें आते-जाते होंगे / लोग / अब घूमती है / सांय-सांय करती हवा...’
    कालीबंगा में मिले कितने ही अवशेषों को सुरक्षित कर लिया गया है।  संग्रहालयों के लिए न जाने यहां से कितने अवशेषों को ले जाया जा चुका हैं। समय के लंबे अंतराल के बाद भी यहां की मिट्टी चुप नहीं है, वह बहुत कुछ बोलती है। उसे सुनने वाले कान चाहिए। कागद जी ने इसी मिट्टी का बोलना बहुत पहले सुना था और कविताओं के रूप में हमें अब सुनाया है। वे पारखी हाथ किसी इतिहासकार या भूगोलवेत्ता के नहीं वरन एक कवि के थे, जिन्होंने कुछ अवशेष बटोर लिए थे। कुछ ठीकरियां और चमकदार मिट्टी के अलग-अलग आकारों के पतले बरते जैसे कुछ अवशेष मेरी हथेली पर रख देते हैं। यह कोई जादू ही था कि वे अवशेष वे मेरे हाथ में किसी बड़े बर्तन और ढक्कनों के साथ छोट-छोटे गोल पहियों के रूप में मुझे दिखाई देने लगते हैं।
    किसी वृत्ताकार घेरे को देखकर मुझे कालीबंगा में कागज जी की पंक्तियों का स्मरण होने लगता- ‘मिट्टी का / यह गोल घेरा / कोई मांडणा नहीं / चिह्न है / डफ का / काठ से / मिट्टी होने की / यात्रा का।’ इन कविताओं के माध्यम से कालीबंगा का जीवन हमारे भीतर प्राणवाना होता है और हम कवि की उन भावनाओं तक पहुंचने में सक्षम होते हैं तो यह कवि कागद की सबसे बड़ी सफलता कही जानी चाहिए। ‘कालीबंगा’ शीर्षक की राजस्थानी कविताओं का हिंदी अनुवाद डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ने किया है।
    कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं पर मर्मज्ञ सामूहिक रूप से ध्यान देंगे तो पाएंगे कि इतिहास केंद्रित इतनी सांद्र संवेदनाओं से पूरित इन कविताओं की तुलना में बहुत कम कविताओं को हम रख सकेंगे। घरातल की बात करें तो कुछ कवियों की कुछ कविताएं स्वतंत्र रूप से भले अपना अस्थित्व नहीं बना पाती हो, किंतु उनकी शृंखला अथवा सामूहिक प्रारूप से जो काव्य-बोध होता है वह लंबे समय तक अपनी उपस्थिति का अहसास कराता रहता है।

17 जून, 2018

डॉ. नीरज दइया की तीन कविताएं-

घर वह घर नहीं है

पता तो वही है
घर वह घर नहीं है
जो था आपका
पिताजी !

नाम तो वही है
भाई पर भाई नहीं है
जो था आपके रहते
पिताजी !

घर जिस में आप रहते थे पिताजी।
भाई जिस में मैं था पिताजी।
पता ही नहीं चला
कव कैसे क्या हो गया...।

पुराने घर को गिरा कर
खड़ा किया नया घर।
पिताजी ! आपने बनवाया
वह घर अब नहीं है।
भाई कहता है- पुश्तैनी घर है।
इस घर के बारे में
अब मैं क्या कहूं पिताजी ?
००

कोई बात नहीं !

बहुत पुरानी हो गई
फिर भी अपनी मुस्कान लिए
दीवार पर सजी है-
तश्वीर पिताजी की।

सुबह-सवेरे वे रोज
भरते हैं मुझ में नया जीवन
घर से निकते समय देखता हूं उन्हें
जीवन की भागा-दौड़ में
सोचता हूं- इस रविवार को
तश्वीर साफ करूंगा।

काफी महीने हो गए
वह रविवार नहीं आया,
मैं ग्लानि से भरता हूं
फिर भी दीवार पर-
तश्वीर में पिताजी
मुस्कान लिए कहते हैं-
कोई बात नहीं !
००

अधूरी कविताओं के बारे में

मुझे कविताओं को सौंपा पिताजी ने
पर नहीं सौंपी मुझे
आपनी कविताएं।

कई कविताएं
जो सहेजती है मुझे
और जिन्हें सहेजता हूं मैं
नहीं लगी अच्छी
क्यों कि वे नहीं हो सकी
पूरी!

उन कविताओं के लिए
मेरा बड़ा दुख है
कि वे रह गईं हैं अधूरी।

जब-जब मैं बतियाता हूं उनसे
वे रोती हैं, साथ मेरे
उनकी पीड़ा परखने वाला
मेरे अतिरिक्त
कोई नहीं है।
कोई नहीं है अन्य !
००

05 जून, 2018

दो व्यंग्य संग्रह- डॉ. नीरज दइया / समीक्षा- रजनी मोरवाल

रजनी मोरवाल
पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
पंच काका के जेबी बच्चे
    व्यंग्य का अभिप्राय अमूमन हास्य, ताना, उपहास, मजाक, तंज़, त्वरित टिप्पणी या प्रतिक्रिया से लगाया जाता है, जिसके प्रभाव स्वरूप तिलमिला देने वाली प्रतिक्रिया उत्पन्न की जा सके। जबकि पारिभाषिक अर्थों में देखें तो अभिव्यंजना शक्ति द्वारा निकलने वाला अर्थ ही व्यंग्य होता है। डॉ. नीरज दइया की व्यंग्य कृति “पंच काका के जेबी बच्चे” इन तमाम पारिभाषिक अर्थों पर पूर्णतया खरी उतरती है। संग्रह में कुल 39 व्यंग्य हैं जिनमें पंच काका के माध्यम से वर्तमान युग की सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया गया है।
    संग्रह के पहले व्यंग्य में पंच काका का सवला हैं- “व्यंग्य क्या होता है?” और अंत में वे स्वयं ही कहते है- “ये शरारतियों का काम है।” पंच काका एक पात्र इजाद किया गया है जो लगभग सभी व्यंग्य में अपनी उपस्थित दर्ज कराते हुए जैसे अंतिम स्टोक लगा कर किसी बात को पूरा करते हैं। पंच काका नामक यह अनूठा पात्र कभी-कभी अपने मन की बात तो अधिकतर व्यंगकार के मन की बात करता है, किंतु इतनी मार्मिकता और कलाकारी के साथ कि स्वयं को उसमें गौण रखते हुए भी सतत विद्यमान है। पंच काका के माध्यम से इस व्यंग्य-संग्रह में गज़ब की किस्सागोई उत्पन्न हुई है।
    ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ संग्रह का शीर्षक प्रारम्भ से अंत तक उत्सुकता बनाए रखता है, मसलन प्राकृतिक बच्चे, परखनली बच्चे, सेरोगेट बच्चे तो सभी सुनते आ रहें हैं, किन्तु ‘जेबी बच्चे’ एक ऐसा अनूठा प्रयोग है जो संग्रह के अंत में जाकर अपना भेद खोलता है। दरअसल लेखक ने अपनी विचारशक्ति से इस अद्भुत शब्द का आविष्कार किया जो एक उपलब्धि के रूप में उनके नाम दर्ज किया जाना चाहिए। इस शब्द के साथ वे चुटकी लेते हैं कि जेब से उत्पन्न होने वाले बच्चे ‘जेबी बच्चे’ कहलाते हैं जो कि इस अवसरवादी, महत्वकांक्षी और पैसों की दुनिया में जेब से पैदा होते हैं।
    व्यंग्य ‘गुट, गुटका और गुटकी’ में नीरज दइया साहित्य की उठा-पटक पर तंज़ कसते हुए कहते हैं कि “गैर गुट वाले गुटका-गुटकी के नशे में लडखडाते हैं, साहित्य के ऐसे सूरमाओं के मुख पर ऐसे-ऐसे विशेषण और आप्त कथन आते हैं कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं, दो-चार गुटकी भरते ही वे पीढ़ियों तक को सुशोभित करते हुए ज्ञान के घोड़े पर सवार हो जाते हैं।” विषयानुरूप सहज-सरल भाषा में डॉ. दइया पाठकों से सीधा संवाद करते हैं और यही उनका वैशिष्टय है जो पाठकों को जोड़ता है।
    व्यंग्यों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि दइया किसी बात में से बात निकालने की खूबी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि हर बात से व्यंग्य नहीं निकालता और यदि व्यंग्य के लक्षण मिल भी जाएं तो उसे साहित्य के रूप में ढालने से पूर्व कठिन तपस्या करनी पड़ती हैं। वे तमाम बातों के सागर से उस सीप को खोज लाते हैं जिस में मोती होता है, फिर उसी मोती पर व्यंग्य केन्द्रित करते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। वे निरंतर इस विधा के अनुशासन में रहते हुए अपने मंतव्य पर दृष्टि गढ़ाए रहते हैं।
    ‘सर्वश्रेष्ठ वाद-अवसरवाद’ व्यंग्य के बहाने समाज में बढ़ती अवसरवादी प्रवृति पर डॉ. दइया लिखते हैं- “अवसरवाद सिद्धांत के अनुसार दिल खोलकर दिखावा करो, दिखावा करने से ही अवसर मिलते हैं। किस अवसर के लिए तेल कौनसे ब्रांड का खरीदना है यह महत्त्वपूर्ण है। तेल, साबुन क्रीम से आपकी हैसियत का पता चलता है और गेंहू, दाल, चावल तो आपके पेट में चले जाते हैं।” बेहद सधा हुआ व्यंग्य और यथार्थवादी भी।
    ‘डिज़िटल इंडिया’ और ‘दाढ़ी रखूं या नहीं’ के माध्यम से उन्होंने सोशल मीडिया पर समय के दुरुपयोग पर कटाक्ष किया है तो वहीं देश में बिजली की समस्या को आधार बनाकर ‘डिजिटल इंडिया’ और विकास के नारे पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाया है। सरकारी नीतियों के कारण स्कूलों में हर क्रियाविधि की सूचना कार्यालय को सबूतमय भेजनी पड़ती है, शिक्षक पढ़ाने से अधिक बच्चों के संग सेल्फी लेते नज़र आते हैं ‘बच्चे के संग सेल्फी’ व्यंग्य के द्वारा उन्होंने नई शिक्षा नीति पर बड़ी गंभीरता से करारा व्यंग्य ढूंढा है। ‘टारगेटमयी मार्च’ के द्वारा वे काम के बढ़ते बोझ से उत्पन्न तनाव पर निशाना साधते हैं कि कैसे एक निश्चित समयावधि में टारगेट और आंकड़ों की जद्दोजहद में फंसे कर्मचारी मानसिक व शारीरिक रूप से बढ़ते तनाव की वजह से जूझते हैं।
    ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो संग्रह से दिए जा सकते हैं, हर रचना में पंच काका के पंच हैं, व्यंग्य के ये तीर दरअसल नीरज दइया द्वारा ही छोड़े गए हैं जो अपने गंतव्य पर पहुंचकर लोगों को गुदगुदाते तो हैं साथ ही बढ़ी गंभीरता से अपनी बात का असर भी छोड़ जाते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि व्यंग्य महज़ हास्य बनकर न रह जाए इसीलिए वे अपने व्यंग्यों में बिम्ब, प्रतीक, वक्रता के साथ-साथ भाषा की सहजता व सरलता पर भी ध्यान देते हैं और यही विशेषताएं उनके लेखन को समृद्ध बनाती हैं।
००००
टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
टांय टांय फिस्स
    व्यंग्य संग्रह “टांय टांय फिस्स” अपने अनूठे शीर्षक से प्रभावित करता है। यूँ तो आम मायनों में इसका अर्थ होता है- जिसका परिणाम कुछ न निकले, किंतु व्यंग्य संग्रह की 40 रचनाओं को पढ़कर लगता है कि जैसे किसी खजाने की कूंची हाथ लग गई हो। लेखक नीरज दइया ने ऐसे-ऐसे वाक्यों का प्रयोग करते हुए कुछ नए मुहावरे भी गढ़े हैं कि व्यंग्यकार के रूप में उनकी छवि यादगार कही जा सकती है।
    व्यंग्य में अपनी उत्कृष्ट भाषा शैली से नीरज दइया छोटी से छोटी बात को भी वे इस ढंग से चुटीला बना देते हैं कि बात के नए अर्थ उभरकर पाठकों के सामने आते हैं। यह इसलिए भी है कि वे राजस्थानी भाषा और जिस लोक से जुड़े हैं उनका व्यंग्य में एक नया ‘फ्लेवर’ उन्हें अन्य व्यंग्यकारों से भिन्न और कुछ खास भी बनाता है। उनका विशद अध्ययन है जिससे समसामयिका के साथ अनेक प्रसंग और ब्यौरे उनकी रचनाओं को तो समृद्ध बनाते हैं। व्यंग्यों में जिस ‘पंच काका’ नामक अनोखे किरदार को गढ़ा है वे काका यहां भी अपने पंच छोड़ते हुए सतत विद्यमान हैं । इस संग्रह में कुछ नए पात्र- फन्ने खां, स्वामी चेतानानंद, आदि आचार्य श्री बैगनाचार्य आदि हैं जो व्यंग्य को आगे बढाने में सहायक प्रतीत होते हैं। 
    इन रचनाओं से गुजरते हुए लगता है कि नीरज दइया जानते हैं कि देश के माहौल, परिवार, साहित्यिक गतिविधियों, लेखकों, स्कूल, समसामयिक घटनाओं, चर्चाओं, बातों, कार्यस्थल व भिन्न-भिन्न स्थानों पर किस तरह अपनी सहमति-अहसमति के द्वंद्व में व्यंग्य का मौका मिल सकता है। उनकी अनेक रचनाओं में व्यंग्य के साथ कोई न कोई गंभीर संदेश होता है जिसे वे शब्दों की आड़ लेकर बेहद करीने से पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य हास्य तो उत्पन्न करते ही है, साथ ही नैतिक मूल्यों की पैरवी भी करते हैं।
    नीरज दइया विभिन्न विषयों से पाठकों को हतप्रभ करते चलते हैं। कागज के दुश्मन, कुंवारे-कुंवारियों की धमाचौकड़ी, हम सबकी गति एक, वी.आई.पी. कल्चर, बाबाजी के चेलों खूब खाओ बैंगन, खुल्ले मिलेंगे क्या, काला धन देश में पकड़ा, ई-होली हुडदंग आदि अनेक ऐसे व्यंग्य हैं जहाँ वे समसामयिक समस्याओं पर करारा प्रहार करते हैं। पूरा संग्रह ही व्यंग्य से सराबोर है किन्तु कुछ उदहारण जो मुझे निजी रूप से सुंदर पंच लगे उनमें से चयनित पांच पंच प्रस्तुत है-
कागज के दुश्मन- ई-युग ने डाक-डाकिया को परमानेंटली फ्री कर दिया।
हम सबकी गति एक- जहाँ बूढे दादाजी के मरने पर परिवार वाले फूट-फूटकर रोते हैं, वहीँ घर में कन्या के जन्म पर रोनी सूरत बनाए रखते हैं, बेटा हो या बेटी सबकी गति और दिशा एक ही होनी चाहिए।
जाकेट की सर्दी-गर्मी- साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है, ये त्रासदियाँ भोगने के लिए नहीं दिखाने के लिए भी होती है , क्या जाकेट साहित्यकारों का कोई ड्रेस कोड बन गई है ?
होमवर्क, स्कूल और पेरेंट का त्रिभुज– यह एक गणित है और इस त्रिभुज में टोटल तनाव वही का वही रहता है अब यह आपकी मर्ज़ी है कि इसे कब, कहाँ व कैसे भोगना है ?
वी आई की खान भारत- ये सब नाटक है ढकोसला है, दुनिया एक रंगमंच है और हम इसकी कठपुतलियाँ, कब-कौन-कैसे उठेगा ये कोई नहीं जानता...बाबु मोशाए ...वी आई पी की खान भारत तो गया...अब मुठ्ठी भर पूर्व वी आई पी सारे नवजात वी आईपियों को मारेंगे।
    डॉ. नीरज दइया की भाषा की कलात्मकता और कसावट के साथ वैविद्ध्यपूर्ण विषयों पर लिखते हुए गुणवत्ता से व्यंग्य का मंतव्य साधते हैं। अपने गंभीर-चिंतन सूक्ष्म सर्वेक्षण, व्यंजनामूलक विशिष्ट जीवन दृष्टि द्वारा समाज में फैली विद्रूपताओं पर चोट करने के निर्भीक प्रयास में वे शत-प्रतिशत खरे उतरते हैं। पंच काका का आशीर्वाद तो उनके साथ है ही। कृति “टांय टांय फिस्स” में उनकी पहचान को और अधिक पुख्ता धरातल मिलता है। आशा है वे एक प्रखर व्यंग्यकार के रूप में नए-नए आयाम गढ़ते रहेंगे।
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रजनी मोरवाल, 
23/97 “आर्ष”, स्वर्ण पथ, मानसरोवर, जयपुर 302020
मोबाइल-09824160612

नहाना-धोना / डॉ. नीरज दइया

पको जानकर बिल्कुल हैरानी नहीं होगी कि हमारे जीवन का सार बस ‘नहाना-धोना’ ही है। आप तो मुझे ऐसे देखने लगे हैं, जैसे आपको हैरानी हो रही है। चलिए मुझे अपनी बात को बदल कर कहना चाहिए- आपको जानकर बहुत हैरानी होगी कि हमारे जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ है। कमाल हो गया साहब, जब मैं कहता हूं कि हैरानी नहीं होगी तब हैरान होते हैं और जब हैरानी होगी कहता हूं तो हैरान होना छोड़ देते हैं! आप तो यह भी नहीं जानते कि कब हैरान होना है और कब नहीं होना है। बेशक आप जानते होंगे पर मैं तो यही कहूंगा कि नहीं जानते हैं। किसी के जानने या नहीं जानने या फिर होने या ना होने से भी ज्यादा जरूरी मेरा कहना है। जब मैं खुद ही मेरे कुछ कहने को जरूरी नहीं मानूंगा तो दूसरे भला क्यों मानेंगे? क्यों मैं ठीक कर रहा हूं ना?
    पहले आप मन में अच्छे से यह फैसला करें कि आपको हैरानी है अथवा नहीं है। अरे यह बात भी भूल गए, मैं पूछ रहा हूं कि नहाने-धोने की बात पर आपको हैरानी है अथवा नहीं है? वैसे आपके हैरान होने अथवा नहीं होने के अतिरिक्त भी एक तीसरी स्थिति है आपकी संवेदनहीनता। यानी आपको कुछ पता चल रहा है अथवा नहीं चल रहा इसका कोई फर्क नहीं पड़ता। आप ही से मैं पूछ रहा हूं- क्या आप अब भी जिंदा है? यह कोई बेहूदा सवाल नहीं है। जीवन और मृत्यु के विषय में अब भी बहुत सारी भ्रांतियां हैं। इसका कारण हमारा होना और नहीं होना दोनों का बहुत पास-पास होना है। इतना पास-पास कि क्षण भर में और कहें उससे भी कम समय में हम कभी भी इधर से उधर जा सकते हैं। ‘गीता’ कहती है कि जीवन बार-बार वस्त्र बदलता है। अभिप्राय यही है कि जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ ही है। कुछ को नहाने-धोने की जल्दी लगी रहती है। जब फिर फिर नहाना-धोना है तो डरना कैसा!
    कुछ लोग चिंतन करते हैं कि जीवन इतने वर्षों से चल आ रहा है और चलता जा रहा है। यहां इतने लोग जन्में और मरे, पर नतीजा क्या निकला? सभी इधर से उधर और उधर से इधर चले आ रहे हैं। यह कोई निरा उपदेश नहीं है भैया। मैं आपसे बतियाने के चक्कर में पंच काका के बारे में बताना ही भूल गया। अगला-पिछला जीवन तो याद नहीं पर इस जीवन को तो याद रखना है। मैं घर में हूं और मेरे काका-काकी मुझे बहुत प्यार करते हैं। काका आज सवेरे से ही गार्डन में खोए हैं। मैंने सोचा लौट आएंगे पर बहुत देर लगा दी तो मुझे चिंता होनी चाहिए कि नहीं। मैं उन्हें देखने पहुंचा तो वे घास-फूस में कुछ ढूंढ रहे थे।
    मैंने पूछा- काका, यहां क्या खोजने लगे हो? उन्होंने गर्दन उठाई और बोले- कोई जड़ी-बूंटी खोज रहा हूं। तुझे बताया था ना कि तेरी काकी को जवान करूंगा और फिर हनीमून। इतने में भीतर से काकी चिल्लाई- अरे इतनी देर कर दी, आज नहाना-धोना नहीं है क्या?
    देखिए आप को फिर से थोड़ी हैरानी हुई है। नहीं हुई तो आप ठीक से खुद को समझ नहीं पा रहे हैं। आप को पता ही नहीं चलता कि आपके भीतर-बाहर क्या हो रहा है। आप वही है जो मैंने कहा- संवेदनहीन। आपको संवेदनहीन कहने से आपकी संवेदनाएं जाग गई है और मुझ पर गुस्सा होने लगे हैं। अपना गुस्सा कंट्रोल कीजिए। सेहत के लिए गुस्सा अच्छा नहीं होता है। पता नहीं कितनी-कितनी बीमारियों ने आपको घेर रखा है। ऐसे गर्दन हिलाने से कुछ नहीं होगा। आप बीमार हैं या नहीं, आपको कहां पता है। आपके कहने से कुछ नहीं होता। पांच सौ रुपये देकर चैक-अप कराओ। देखिए कितनी कितनी बीमारियां हैं आपको। पांच हजार के कुछ टेस्ट कराने की फीस बड़ी है या आपका जीवन? पैसा तो क्या है, आपके हाथ का मैल ही है। आप तो जानते हैं- मैल बीमारी की जड़ है। इसी जड़ को हम खत्म करना चाहते हैं। नहाना-धोना भी असल में मैल-मुक्ति है और हमारी काकी जी इसके लिए चिल्ला रही हैं। अब आप मुस्कुराने लगे...... तो क्या आप सही में संवेदनहीन नहीं है? आपमें संवेदनाएं बची हुई है। अरे वाह, आप अब भी जिंदा है!
    अब तो मेरा आपको बस यह बताना शेष है कि पंच काका पागल है। उनसे यह कहना नहीं कि मैंने उन्हें पागल कहा है। लोग क्या बस इधर-उधर ही करते रहते हैं। वे सोचते हैं जीवन का असली आनंद इधर-उधर करने में है। यहां सब कुछ देखा-भाला है और पुरानी चीजों को नए-नए ब्रांड के रूप में बेचते हैं। नया कुछ भी नहीं है। आप और हम सभी, नहा-धो कर फिर से फिर फिर कर आएं हैं। यह जो गार्डन में जड़ी-बूटी ढूंढ़ने का नाटक कर रहे हैं, बहुत पहुंचे हुए आदमी है। कहते हैं कि जवान करने का नुस्का ढूंढ़ रहा हूं, तेरी काकी को जवान करूंगा... ठीक कहा था ना इन्हें मैंने पागल, अरे अगर काकी जवान हो गई तो लोग कहेंगे- बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम। नहीं कहेंगे क्या? और हां, मैं यह कहना तो भूल ही गया कि आप संवेदनशील हैं।
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20 अप्रैल, 2018

नाक का बांका बाल / डॉ. नीरज दइया

    साहब के आगे बाबू ने एक पत्र किया और बोला- इसका क्या करना है.... साहब ने इस आग्रह पर गौर फरमाते हुए पत्र पर एक सरसरी दृष्टि डाली और बोले- अरे ! मैंने तो इसे पढ़ा नहीं, तुम्हीं बताओ क्या है? बाबू ने साहब को बताया- हेड ऑफिस में इसी महीने आठ तारीख को अधिकारियों की एक कार्यशाला होनी है। जिस में आपको ‘नाक का बांका बाल’ विषय पर व्याख्यान देना है। साहब सोच में पड़ गए। यह भी क्या अजीब सा विषय दिया। प्रत्यक्ष में बोले- हां तो तुम डीएफए तैयार करो। बाबू ने अपनी सीमाओं को उल्लेखित किया तो साहब ने तत्काल अर्जेट मिटिंग रख दी और बाहर चपरासी को बता दिया किसी को अंदर नहीं आने दिया जाए।
    ऑफिस के खास खास कर्मचारी मंत्रणा के लिए साहब के कमरे में पहुंच गए और बाहर पहरेदार चपरासी ने रटा-रटाया हुआ जुमला- ‘साहब बीजी है, अर्जेंट मिटिंग ले रहे हैं।’ मुंह में दबा लिया, जिससे कोई भी आए या पूछे तो तुरंत जबाब दिया जा सके। साहब बड़े नेकदिल और नियम पसंद आदमी है इसलिए ऑफिस बड़े ढंग से चलता है। ऐसे साहब अगर हरेक ऑफिस में हो जाए तो देश ढंग से चलने लग जाए। मिटिंग में देश के ढंग से नहीं चलने के सबूत पर चर्चा हो रही थी। बड़े बाबू कह रहे थे कि देश अगर ढंग से चलता तो यह गलत विषय साहब तक नहीं आता। विषय में बदलाव बिना हेड ऑफिस की मंजूरी के हो नहीं सकता और अगर विषय केवल ‘नाक का बाल’ होता तो सरलता रहती। अब समस्या यह है कि नाक का बाल बांका है, जिसके बांकपन से छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। हिंदी अधिकारी अपना ज्ञान दे रहा था कि सर, जरूर कुछ मिस्टेक हुआ है। यह कोई दूसरा विषय होगा- ‘बाल तक बांका न होना’ उसमें से यह बांका सब इधर सिफ्ट हो गया है। जैसे हम समस्या से परेशान हो रहे हैं वैसे ही कोई दूसरा ऑफिस भी समस्या में होगा। जाहिर है उन्हें विषय मिला होगा- ‘बाल तक न होना’। सर आप अपने जानकारों को फोन पर बात कर पूछिए कि उन्हें क्या क्या विषय मिला है।
    साहब जरा बिदक गए- इसमें दूसरों को फोन करने वाली कौनसी बात है। जिसे जो मिला है उसे उसी पर काम करना होता है। आप लोग यहां मेरे सामने इतना बोल लेते हैं, आपको खबर होनी चाहिए कि हम हमारे उच्चाधिकारियों से ऐसे चपर-चपर थोड़ी कर सकते हैं। ‘बाल तक न होना’ की तुलना में ‘नाक का बांक बाल’ विषय जरा टेढ़ा है। बाल तक न होना तो सीधा-साधा है कि गंजेपन के बारे में बात करनी है। साहब में डबल एओ साहब की तरफ देखा जो नाक में अंगुली डाले ना जाने किस कार्य में व्यस्त थे।
    वे स्थिति को भांपते हुए जरा चौंक कर बोले- यह सब आपके बस का रोग नहीं है छोटे बाबू। अगर होता तो खुद ही कुछ ना कर लिए होते। साहब ने हाथ के संकेत से उन्हें रोका तो वे कहने लगे- साहब आप पहले चाय-नाश्ते का बोलो, तभी कुछ दिमाग चलेगा। भूखे भजन ना होत गोपाला। साहब कैसे भी हो एकाउंट वाले उन्हें अज्ञाकारी बना ही लेते हैं। डबल एओ साहब का मान रखते हुए साहब ने झटपट व्यवस्था के लिए आदेश जारी किए। फिर मिटिंग में जोश आना ही था। डबल एओ साहब बोले- सर इसके लिए एक पैनल बना देते हैं जो कुछ खोज खबर करेगा फिर जो रिपोर्ट आएगी उसको नोटसीट पर ले लेंगे और हमारा काम बन जाएगा। कोई भी काम हो उसे विधिसम्मत करने से बाद में परेशानी नहीं आती। नहीं तो बाद में यह मुद्दा बनेगा कि हमने तो नाक के दाहिने भाग बाले बांके बाल का लिखा था और अपने बाएं भाग वाले बाल की चर्चा कर दी है। ऐसे ओब्जेक्शन में यह भी ध्यान रखें कि बाल कितना बांका है यह इस पत्र में स्पष्ट नहीं लिखा है। सर, एक बात गौर की आपने.... देखिए इस लेटर में बाल की लेंथ के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया है।  
    साहब चहकते हुए बोले- यही तो मैं कहता हूं कि हेड ऑफिस में सारे मूर्ख भरे पड़े हैं। क्या करते हैं और क्या नहीं करते हैं कुछ मालूम नहीं चलता। देश में वैसे ही इतनी अफरा-तफरी है ऐसे में नाक जैसे संवेदनशील मुद्दे को टच ही क्यों किया जाए। देखना ये नाक बड़ा इश्यू बन जाएगा। स्टेनो जो अब तक चुप चाप बैठी थी ने हस्तक्षेप किया और बोली- सर, मेरे ध्यान में हमारे शहर में एक लेखक है जो लिखता-पढ़ता है। आप कहें तो उन से बात करें। अच्छा रहेगा कि उनसे ही लिखवा लें।
    ‘गुड, वेरी गुड।’ और साहब ने कहा- ‘ओके, काम बन गया। ऐसा करो पैनल में ये जो है लेखक उसका नाम डाल कर फाइल पुट अप कीजिए। साथ ही एक मिटिंग भी प्रपोज कर देना।’ सब कुछ साहब के आदेशानुसार हुआ। लेखक महाश्य पधारे और अपने विशद ज्ञानी होने का प्रमाण भी उन्होंने प्रस्तुत कर दिया। अफिस के सभी कर्मचारी तो कर्मचारी साहब भी उनके ज्ञान का लोहा मान गए। लेखक महाश्य ने बताया कि नाक के बाल अगर बांके नहीं हो तो नाक के रास्‍ते से धूल और दूसरी गंदगी सीधे फेंफड़ों तक पहुंच जाती है। ऐसे में सीधी बालों की तुलना में बालों को बांका रखा जाना चाहिए। यह विषय बड़ा सोच-समझ कर दिया गया है। कोई रचनात्मक रुचि सम्पन्न अधिकारी रहा होगा जिसने यह विषय रखा है। बांका बाल सौंदर्य-शास्त्र का विषय है। वैसे दूसरा पक्ष भी देखिए अगर बाल बांके होंगे तो वे नाक में एडजेस्ट हो जाएंगे और बढ़ने पर भी आपको या फिर हमको शर्मिंदा नहीं करेंगे। 
    लेखक महाश्य ने नाक के बालों की ट्रिमिंग के अनेक तरीकों को आजमाने की सलाह भी नोट करवा दी। हैरत तो साहब को तब हुई जब लेखक महाश्य ने बताया कि 'हेयरी नोज़' नामक एक फिल्म चीन में  बनी है जो वायु प्रदूषण के मुद्दे को उठाती हुई शहरी चीनियों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर रही है। साहब ने माना कि सरकारी लोग बस सरकारी होते हैं। ये लेखक किस्म के गैर सरकारी लोग ही सही सूचनाएं रखते हैं। अब देखिए ना इतनी बड़ी सूचना हमें नहीं थी। लेखक महाश्य अगर नहीं बताते तो हमें मालूम ही नहीं चलता कि पिछले साल 'नेचर' पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें चीन में प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या 13 लाख बताई गई थी।
    फिर क्या था साहब के लिए ‘नाक का बांका बाल’ एक नियत मानदेय पर तैयार हो गया। साहब ने अपने बड़े साहब को यह ब्रीफ बताने का विचार किया। उन्होंने सोचा कि मैं बताता हूं कि ‘हेयरी नोज’ फिल्म में बहुत सारे स्टाइलिश चीनी लोगों और एक कुत्ते को दिखाया गया है। जिन्होंने 'बदबूदार, दमघोंटू हवा और कभी ख़त्म न होने वाली धुंध' के बीच जीने का तरीका नाक के लंबे बालों के जरिए ढूंढ़ निकाला है। तो बड़े साहब को झटका लगेगा। साहब मन ही मन में मुदित होते सोचने लगे इस बार तो उन्हें बोलना ही पड़ेगा- कमाल कर दिया है तुमने। रियली यू आर ग्रेट। ये ‘नाक का बांका बाल’ बस तुम्हीं सीधा कर पाए हो। दूसरों को देखो, नोनसेंस। इतनें में बाबू आया और उत्साह के साथ बोला- सर, आठ तारीख वाली कार्यशाला केंसिल हो गई है।... साहब ने उसके हाथ से कागज लिया और यह देखा तो उनका उत्साह ठंडा हो गया।
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15 अप्रैल, 2018

हर समस्या का समाधान है नई समस्या

नीरज दइया
    मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सभी जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बात बिल्कुल छोटी सी है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह एक बेहतर स्थिति है। इससे आप भी मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र रहा है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं।
    हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि जो हम नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो हमने दिया और हम पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। हमें प्रर्दशन बिल्कुल पसंद नहीं है और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
    अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में जरा कंजूस-सा हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ स्थानांतरित हो जाएगी। अस्तु आप थोड़े में संतोष करें। संतोषी सदा सुखी होते हैं। मैं मेरी समझ का शेष पूरा भाग मेरे पास रखना अपना अधिकार मानता हूं। देखिए ना बाज वक्त मेरी यह समझ मेरे और आपके काम आनी है। हां, तो जैसा कि मैंने कहा लोहा लोहे को काटता है, यह हमारा आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में बहुत से लोग हरदम रोते ही रहते हैं।
    अब बेरोजगारी की समस्या की ही बात करते हैं। असल में हमें हमारी मूल समस्या का पता नहीं है और हमारे नेता यह अच्छे से जानते हैं कि जैसे लोहा लोहे को काटता है ठीक वैसे ही समस्या समस्या को काटती है। बस हमने हमारी एक समस्या को काटने के लिए दूसरी और दूसरी को काटने के लिए तीसरी समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है। अब हमारे यहां समस्याओं का एक अम्बार बन गया है। समस्या समस्या को काटती है की तर्ज पर बहुत से प्रयोग किए गए हैं। अब चुनाव की बात करें तो पार्टी पार्टी को काटती है।
    वैसे हमारी हर समस्या से भी देश में खुशहाली बढ़ी है। सुनने में तो बेरोजगारी की समस्या बड़ी लगती है पर इसी की बदौलत कितने ही लोग रोजगार पा रहे हैं। इसी बेरोजगारी से तो हमारी सरकार भी माला माल हो रही है। चार पोस्ट निकालती है और उसके लिए फार्म और फीस के नाम पर वारे न्यारे हैं। अब फार्मों के अंबार की समस्या जब आई तो सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जिनके लिए यह ऑन लाइन समस्या है उनके लिए भी हम किसी दूसरी समस्या का इजाद करेंगे। अब सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। इससे पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी अंत हुआ कि नहीं हुआ? बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल गर्दन नहीं हिलानी है। झूठ और सच में अंतर करना सीखो भाई। अब समय आ गया है कि सच को सच कहें और झूठ को झूठ।
    चलिए जो मन में है उसे कहना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं। जब वे कुछ छुपा कर नहीं रखते तो हम और तुम यानी आम आदमियों की औकात ही क्या है। सच में अब सभी को अपने अपने मन की बात कहनी चाहिए। समस्या यह है कि मन की बात कहना कठिन है।
    पंच काका का तो मानना है कि गोपियों की भांति हमारे मन को कोई कृष्ण ले गया है। हम बिना मन वाले भला मन की कोई बात कह ही कैसे सकते हैं। याद रखना किसी झूठ पर गर्दन हिलाने से पहले नेक-प्रोब्लम और बाद में नोज-प्रोब्लम हो सकती है।
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21 मार्च, 2018

बाल मनोविज्ञान के जादूगर / डॉ. नीरज दइया

बाल साहित्य को गंभीरता से अंगीकार कर विकसित करने का बड़ा कार्य करने वाले लेखकों में दीनदयाल शर्मा का नाम प्रथम पंक्ति में लिखा जाता है। दीनदयालजी ने बाल साहित्य की अलग अलग विधाओं में सतत रूप से हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में रचनाएं दी हैं। लेखन के साथ संपादन का कार्य भी महत्त्वपूर्ण कहा जाएगा। लंकेश्वर, महाप्रयाग, दिनेश्वर, दीद आदि अनेक उपनामों से भी आपने निरंतर लेखन किया है। शर्मा के लेखक का मिलनसार अर स्नेहिल स्वभाव का होना अतिरिक्त विशेषता कही जा सकती है।     आपका जन्म 15 जुलाई 1956 को हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गांव जसाना में हुआ। राजस्थानी बाल साहित्य की पुस्तकों की बात करें तो अब तक आपकी चन्दर री चतराई (1992), टाबर टोळी (1994), शंखेसर रा सींग (1997),तूं कांईं बणसी (1999), म्हारा गुरुजी (1999), बात रा दाम (2003) और बाळपणै री बातां (2009) आदि पुस्तकें निरंतर सृजन की साक्षी है। पाक्षिक समाचार पत्र टाबर टोल़ी का संपादन का श्रेय भी आपको ही है। सुणो के स्याणो, घणी स्याणप, डुक पच्चीसी, गिदगिदी आदि पुस्तकों की राजस्थानी में हास्य व्यंग्य के खाते बहुत कीर्ति है। 
    राजस्थानी में बच्चों के लिखते लिखते दीनदायल शर्मा ने कुछ आधुनिक कविताएं भी लिख कर व्यस्क लेखक होने का प्रयास किया है। आपकी नई कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रीत अर प्रीत’ राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इन की कविताओं में हम कवि का व्यक्तिगत जीवन अनेक प्रसंगों से जुड़ी उनकी हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति देख सकते हैं। वर्ष 1975 से आरंभ हुई आपकी लेखन यात्रा से भरोसा होता है कि राजस्थानी बाल साहित्य और दीनदयाल शर्मा एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं।
    कहा जा सकता है कि राजस्थानी बाल साहित्य की बात आरंभ करते ही पहला जो चेहरा स्मृति पटल पर कौंधता है वह दीनदयाल शर्मा का होता है। अपना सम्पूर्ण जीवन बाल साहित्य को समर्पित करने वाले शर्मा बाल मनोविज्ञान के जादूगर है। शिक्षा विभाग की नौकरी और बाल साहित्य सृजन में अपना मन रमने वाले शर्मा सदैव बच्चों के प्रिय शिक्षक और लेखक रहे हैं। साहित्य की यही लगन ऐसी है कि उन्होंने अपने पूरे परिवार को साहित्य से जोड़ कर एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। राजस्थानी भाषा-साहित्य के लिए परलीका तो एक साहित्यिक गांव है और दीनदयाल जी का पूरा -घर-परिवार साहित्यिक है, अस्तु उनका घर भी एक साहित्यिक तीर्थ है। 
    केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का बाल साहित्य पुरस्कार वर्ष 2012 का पुस्तक ‘बाळपणै री बातां’ के लिए अर्पित किया जाना पुरस्कार का सम्मान है। राजस्थानी संस्मरण लेखन के लिहाज से यह पुस्तक अब तक प्रकाशित पुस्तकों में अपना विशेष स्थान रखती है। युगबोध और विषयगत बदलाव के मानदंड से यह कृति महत्त्वपूर्ण है। इस पुरस्कृत पुस्तक में 47 आलेख हैं, जो अपनी सहज सरल भाषा और आत्मीय घटना प्रसंगों से जिस शिल्प में प्रस्तुत की गई है वह अनेक स्थलों पर बेहद मार्मिक है।
    बाल साहित्य लेखन के लिए पहली शर्त है कि बाल मन रचनाकार का होना चाहिए। वैसा बाल मन दीनदयाल शर्मा के पास वर्षों से है। बचपना इतना है कि ‘बाळपणै री बातां’ की भूमिका में मन की बातें वे इतनी लंबी खींचते हैं कि भूमिका ही किसी बाल-पुस्तक जैसी है। परिवार के बच्चों के बीच एक लेखक का खेलना-कूदना ‘बाळपणै री बातां’ में सांगोपांग उजागर हुआ है। इनके घर-परिवार के प्रतीक में हम समय के साथ बदलते अनेक बदलाव संकेत रूप में देख-समझ सकते हैं। बाल नाटकों में दीनदयाल शर्मा बेहद सावधानी से रचना करते हैं कि कम कालावधि और अनुकूल साज-सज्जा से आधुनिक नाटक खेले जा सकते हैं। ‘म्हारा गुरुजी’ बाल नाटक अपने व्यंग्य के कारण, ‘बात रा दाम’ चतराई की बात और ‘तूं कांईं बणसी’ अपनी शिक्षा के कारण स्मरणीय है। हिन्दी में भी आपरी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। जैसे- सारी खुदाई एक तरफ..., मैं उल्लू हूं (व्यंग्य) चिंटू-पिंटू की सूझ, पापा झूठ नहीं बोलते, चमत्कारी चूर्ण, बड़ों के बचपन की कहानियां, सूरज एक सितारा है, सपने, कर दो बस्ता हल्का, फैसला, फैसला बदल गया (बाल साहित्य) आदि।        
    देश और प्रांतीय अकादमियों से बाल साहित्य के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित दीनदयाल जी को अनेक संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से अनेक प्रसारण हुए हैं। अंतरजाल देखें तो केई ब्लोग, फेसबुक और यू-ट्यूब के आंगन में अपनी पूरी ऊर्जा और लगन के साथ दीनदयाल शर्मा का बहुत व्यापक मित्र और समार्थक परिवार देखा जा सकता है। दुनियाभर के अनेक कामों के बीच अब भी वे बहुत आराम से बात करते हुए राजस्थानी बाल साहित्य की समृद्धि का सपना संजोए हैं। बाल साहित्य के विकास हेतु त्रैमासिक पत्रिका पारसमणि का प्रकाशन उनके इसी सपने का परिणाम है। टाबर टोल़ी पाक्षिक का नियमित प्रकाशन हो रहा है और अनेक संभावनाएं अभी भविष्य के गर्भ में है। देखें आने वाले समय में 60 वर्षीय युवा दीनदयाल शर्मा व्यस्क कवि के रूप में साहित्य में नजर आएंगे या फिर प्रेमचंद जी की उक्ति बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है को सिद्ध करते हुए बच्चों के लिए सृजन करते रहेंगे। वैसे वे दोनों काम एक साथ करने में भी समर्थ है। उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं।
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18 मार्च, 2018

मेरे लिए हर रचना अपनी ही तलाश है : डॉ. नीरज दइया

डॉ.नीरज दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत
(मेरे लिए हर नयी रचना स्वयं की तलाश है, यह कहते हैं, कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में जाने माने नाम डॉ. नीरज दइया। आपने “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर शोध किया है। आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें राजस्थानी और हिंदी में प्रकाशित हुई है। डॉ. दइया को साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा मुख्य पुरस्कार एवं बाल साहित्य पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों मान-सम्मानों से नवाजा जा चुका है। डॉ. दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं)

'बिना हासलपाई' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (राजस्थानी) की घोषणा से कैसा अनुभव कर रहे हैं?

पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता, जाहिर है मुझे भी अच्छा लगा किंतु बहुत आश्चर्य हुआ कि गत वर्ष कहानीकार बुलाकी शर्मा और उनसे पूर्व उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह पुरस्कार मिला था। संयोग से दोनों कथाकार बीकानेर के हैं। इस बार बीकानेर में यह तीसरा पुरस्कार प्रमाणित करता है कि अकादेमी और निर्णायकों के मूल्यांनक में पुस्तक ही सर्वोपरि होती है। लेखक के लिए कोई भी पुरस्कार सामाजिक प्रतिष्ठा के अतिरिक्त कुछ महत्त्व नहीं रखता है। बतौर लेखक यह पुरस्कार मेरे लिए नई जिम्मेदारियां लाया है।
राजस्थानी के समकालीन परिदृश्य को किस रूप में देखते हैं?
‘बिना हासलपाई’ आधुनिक राजस्थानी कहानी पर केंद्रित पुस्तक है। भारतीय कहानी अथवा साहित्य का चेहरा हिंदी के साथ प्रादेशिक भाषाओं से निर्मित होता है। राजस्थानी भाषा के समकालीन साहित्य को हिंदी और अन्य भाषाओं के साहित्य से कदम मिलाकर चलने के साथ ही उसका लौकिक स्वरूप और माटी की सौंधी महक को भी संजोए रखना चाहिए।
हिंदी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में कई विधाओं को एक साथ कैसे साध पाते हैं?
मेरे लिए जीना और लिखना पर्याय है। वैसे लेखन के संस्कार मुझे मेरे दिवंगत लेखक पिता सांवर दइया से मिले हैं। मैं केवल लिखने के नहीं लिखता हूं, मेरा मानना है कि मेरे भीतर एक बेचैन लेखक रहता है। वही मुझे लेखन के लिए बाध्य करता है। उसे प्रतिदिन लिखने के लिए अवकाश देना मेरी नियति है। राजभाषा हिंदी व मातृभाषा राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने को मैं देशभक्ति और मातृभक्ति से रूप में देखता हूं। शरीर को हिंदी और आत्मा को राजस्थानी पोषित करती है। विधाओं का चयन परिस्थितियां और सम-सापेक्ष है।
कभी ऐसा लगा कि आलोचना की राह में बहुत कांटे हैं?
बिल्कुल, ऐसे कांटें हैं जिन को चाह कर भी कोई बुहार नहीं सकता है। किसी रचना अथवा रचनाकार की आलोचना एक अंगुली से संकेत करने जैसा है। जब हम किसी दिशा में एक अंगुली करते है तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ स्वतः मुड़ जाती है। खुद से मैं तीन सवाल करने के बाद ही प्रतिपक्ष से सवाल किए जाने के पक्ष में हूं। आलोचन में अनेकानेक सवालों से मुठभेड़ होती है। कृति और कृतिकार की दिशा से मैं चीजों को देखने-समझने का प्रयास करता हूं। किसी रचना के प्रति पूर्वधारणाओं की बजाए नए आयुधों की तलाश में रहता हूं। परंपरा और आधुनिक विकास-यात्रा में रचना के मर्म को जानना-समझना और मूल्यांकन करना हमारे पाठ के आनंद को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसलिए सच्ची, खरी और बेलाग आलोचना तो सदा हमारे पाठक ही किया करते हैं।
आपने अनुवाद के क्षेत्र में खूब काम किया है। अनुवाद के लिए रचना का चयन कैसे करते हैं?
अनुवाद को मैं अनुसृजन मानता हूं। किन्हीं दो भाषाओं के बीच पुल बनाने का काम अनुवाद से संभव होता है। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना जैसे अनेक रचनाकारों से भारतीय साहित्य का चेहरा बनता है। इनको अपनी भाषा में लाकर मैंने भाषा के सामर्थ्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया है। अनुवाद का चयन रचना और रचनाकार की गुणवत्ता से स्वयं प्रभावित होकर करता हूं। भारतीय कविता की एक झांकी देखने दिखाने के लिए ‘सबद-नाद’ में लगभग सभी भारतीय भाषाओं की कविताएं राजस्थानी में देख सकते हैं।
अन्य भाषाओं से राजस्थानी में हुए अनुवाद की तुलना में राजस्थानी से अन्य भाषाओं में अनुवाद बहुत कम हुए हैं?
राजस्थानी भाषा की रचनाओं को अधिक मात्रा में हमें हिंदी और अंग्रेजी में लाना होगा। माध्यम भाषा से फिर आगे अनुवाद होने संभव हो सकेंगे। मोहन आलोक की काव्य-कृति ‘ग-गीत’ का मेरा हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। अब मधु आचार्य ‘आशावादी’ के उपन्यास ‘गवाड़’ का हिंदी अनुवाद आने वाला है।
खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- कवि, आलोचक, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, अनुवादक या संपादक?
मैं मूल रूप से तो इन सब का एक आवास-स्थल हूं। मेरे भीतर का लेखक ही हर बार यह चयनित करता है कि वह क्या करने वाला है। मैं लेखक के रूप में लिखने की कोई मशीन नहीं हूं, रचना के समय ही सब कुछ निर्धारित होता है। बादल आते हैं तब यह कहां तय होता है कि वे बरसने वाले हैं। कभी कभी किसी विधा का एक दौर चलता है जैसे बरसात की झड़ी लगती है।
आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता क्या है?
मैं अपने भीतर के लेखक को कभी दायरों में कैद करने के पक्ष में नहीं हूं। कुछ मित्र मेरे लेखन के आधार पर मुझे वाद अथवा धाराओं में बांधते हैं और मैं उनकी घोषणाओं पर सहमति प्रकट करता हूं किंतु मैं हमेशा के लिए यहीं स्थिर रहूंगा यह वादा नहीं कर सकता। मेरी आस्था विचार के स्तर पर सही के पक्ष में खड़ा रहने की मेरी आस्था है और रहेगी।
आप किन लेखकों से प्रभावित हुए?
मेरा सौभाग्य यह रहा कि मैं लेखक सांवर दइया के घर जन्मा और मेरे अनेक गुरुजन साहित्य-लेखन से जुड़े थे। दिखावा नहीं करता कि फलां-फलां को पढ़ा और प्रभावित हुआ। अनेक देशी-विदेशी लेखकों से सीखने का प्रयास किया है। जब भी कोई नई रचना लिखता हूं तो मेरा पूर्व अध्ययन अथवा लेखन-कौशल काम नहीं आता। मैं हर बार खुद को खाली हाथ पाता हूं और अनुभूति के महासागर से रचना में कुछ नया लेकर लौटने का प्रयास करता हूं। मेरे लिए रचना स्वयं की तलाश है। मैं प्रयास करूंगा कि अपने लेखन की योजनाओं को फलीभूत कर सकूं।
राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से क्या हिंदी कमजोर हो जाएगी?
यह कुछ मूढ़ों ने भ्रम फैलाया है कि हिंदी कमजोर हो जाएगी। आदिकाल से हिंदी को राजस्थानी पोषित करती रही है। पृथ्वीराज रासो से मीरा तक की यात्रा के बाद आधुनिक काल में तो हिंदी के हित में राजस्थानी ने अपना बलिदान दिया। राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी उऋण ही होगी।
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