05 मार्च, 2017

नियति के आगोश में

सुबह कितनी जल्दी हो जाती है पता ही नहीं चलता। लगा अभी थोड़ी देर पहले ही तो रात को सोए थे, और इतनी जल्दी कैसे पूरी रात गुजर गई। अभी मेरी आंखें पूरी खुली भी नहीं थी, खुलने को तैयार भी नहीं थी कि लगा कोई बाहर हमारा दरवाजा पीट रहा है। एक सपना अभी आंखों में अटका था, कुछ स्मृति में और कुछ विस्मृत होते हुए। किसी ने सपने की हत्या कर दी। मैं अपने सपने को भूल सोचने लगा कि कुछ लोग बेवकूफ होते हैं। वे किसी के घर का दरवाजा बजाना भी नहीं जानते, और वह भी सुबह-सुबह के वक्त। सोचते नहीं- अरे, कोई सो रहा होगा। क्यों किसी की नींद में खलल डाला जाए। कोई सपने न जाने कहां तक जाता कैसे पूरा होता। ऐसे लोगों को कौन समझाएं कि भैया किसी का दरवाजा बजाना सीखो। क्या यह नहीं होना चाहिए कि आहिस्ता से दरवाजे पर दस्तक करें और फिर इंतजार की मुद्रा में तकिन विश्राम। मानता हूं ऐसा थोड़ा-सा इंतजार भी बहुत बड़ा लगता है। पर यह भी तो सोचिए कि भीतर जो कोई भी है, उसे थोड़ा वक्त लगेगा या नहीं। क्या वह बस इसी इंतजार में है कि आप दरवाजा बजाएं और वह झट से खोल दें। ऐसा भी नहीं है कि आपने बटन दबाया और मेरे घर का दरवाजा किसी तिलस्म की तरह सिम-सिम पलक झपकते ही अपने आप खुल जाए।
      मैं झुंझलाते-झल्लाते हुए उठ कर नाराजगी लिए दरवाजे तक पहुंचा और दरवाजा खोला। सूनी आंखों से निहारते दो अपरिचित-से चेहरे थे। उन के पीछे कुछ दूरी पर सामने वाली आंटी खड़ी थी, जो अपने हाथ से इशारा करते हुए मुझ से कहने लगी- ‘सामने वाले दादा जी गुजर गए हैं।’ मैं सामने के घर की दिशा में देखते हुए उन लड़कों को पहचानने की कोशिश करने लगा। लगा अरे ये तो यहीं के, सामने घर में ही रहते हैं। काफी बार इनको देखा है। जिन दादा जी की बात बताई जा रही थी, वे उनके पोते हैं। मैं अपने सपने को याद करता हुआ इस सच को पहचान नहीं सका। मेरा पहले का गुस्सा और खीज जा चुके थे। वे चले गए और मैं भीतर आ गया। पत्नी ने पूछा- ‘कौन थे।’ मैंने सारी कहानी एक पंक्ति में बता दी- ‘सामने घर में दादा जी गुजर गए हैं।’ मैंने पाया बिना किसी भाव के वह बोली- ‘ये तो होना ही था। अच्छा हुआ जीवन सुधर गया। मुक्त हो गए, अगर एक दिन पहले संसार छोड़ते तो बड़ा पुन्न रहता। आब तो वैशाख भी उतर गया।’ मैं जिरह करने के मूड में जरा भी नहीं था, किंतु अब वैशाख के उतरने ने मुझे गहरे तक हिला कर रख दिया- ‘क्या फर्क पड़ता है इन सब बातों से। ये बातें बस कहने-सुनने में अच्छी लगती हैं। तुम तो जल्दी से चाय बनाओ।’ मेरे प्रतिवाद से वह कुछ झुंझला जरूर गई थी, किंतु मौत की खबर उस में किसी आश्चर्य या दुख के भाव को ला पाने में असमर्थ रही। मैं अपने सपने को जैसे पूरा भूल चुका था। मानो वह स्मृति कहीं चली गई थी और मैं उसका पीछा कर रहा था। अंततः मैं हार गया मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। मौत एक जीवन ले जा चुकी थी और मेरा सपना भी बिना किसी मौत के मुझ से दूर चला गया।
      मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि यह जीवन भी एक सपना है और उसे एक दिन चले जाना है। जीवन के रंगमंच पर जैसे कोई नया नाटक आरंभ हो चुका था। कोई भी मौत कभी नाटक नहीं, सच्चाई होती है। मैं सोचने लगा कि कितनी सहजता से हम किसी के अंत पर ऐसी चर्चा कर लेते हैं। कुछ विमर्श बाहरी-भीतरी यहां बस चलते रहते हैं। पूरे संसार में कहना-सुनना और निरंतर विचार करना जारी था, संसार तो बहुत बड़ा था। उसका हृदय भी बड़ा था। वह ऐसे कितने ही गम वर्षों से झेलता आया था। पर गली तो छोटी थी। बेहद तंग तो नहीं पर इतनी बड़ी भी नहीं। इतने लोगों के कारण गली तंग लगने लगी थी। सभी बड़ी सहजता-सरलता से अपने विचारों में खोए थे और अंतिम यात्रा के लिए जरूरी काम जारी थे।
      जीवन का सत्य क्या है? किसी जीवन की सच्चाई क्या है? जो जीवन जा चुका है, वही तो जानता है- अपनी सच्चाई। कैसे वह इस संसार से चला गया। वह गया है या उसे कोई ले कर गया है। वह किसी के साथ अपनी इच्छा से या अनिच्छा से चला गया। वह इस संसार में अकेला आया था और गया भी अकेले। पर ऐसे अकेले कोई कैसे जा सकता है। इस आने जाने में किसी की इच्छा क्यों नहीं होती। ऐसे कोई कहीं आना-जाना नहीं चाहता। सब यहीं रहना चाहते हैं। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं। ना हमारा आना, ना हमारा जाना और ना ही हमारा ठहरना। यही जीवन की सच्चाई है।  जब जीवन हमारा है, तो इस पर हमारा अधिकार क्यों नहीं है। जीवन पर हमारा अधिकार होना ही चाहिए। यह क्या भला, जीवन हमारा और अधिकार हमारे नहीं। मैं सोचने लगा कि मौत भी जब आती है, तब वह जीवन का दरवाजा पीटती है, या फिर हल्के-से दस्तक देकर थोड़ा इंतजार करती है। नहीं मौत तो बिना किसी दरवाजे पर दस्तक दिए आती है, उसके लिए कोई दरवाजा बंद हो नहीं सकता। मैं भी क्या-क्या सोचने लगा। मैं अभी जरा जल्दी में हूं और ये गंभीर बातें तो हमें आराम से करनी चाहिए। ऐसा हम कभी सोचते भी नहीं। ऐसा कुछ सोचने के लिए जीवन में अवकाश नहीं। आज अवकाश है- रविवार। मैं सोच रहा हूं। आज का दिन ही मौत ने चुना, जब मौत पास के घर में आई और किसी जीवन को चुरा कर ले गई। आना उसकी नियती है। 
      उसके आ कर जाने से गली में स्त्रियों का विलाप अब किसी गीत की भांति रुक रुक कर फिर फिर जारी हो रहा था। इस रोने में दर्द तो था, किंतु बहुत ठहरी हुई सहजता भी थी। जैसे उन सब से सोच रखा था कि ऐसा होना नियति है। दादा जी ने अस्सी बरस ले लिए। अब उनको इस संसार से जाना ही था। वे बीमार भी रहने लगे थे। घर-परिवार के सभी काम तो उन्होंने कब के कर दिए। उनका अब कोई काम नहीं था। जैसे वे पिछले काफी वर्षों से इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। मैं भी इंतजार कर रहा था कि कब घर से बाहर निकलूं। मुझे भी उन लोगों में शामिल होना था। चाय-नाश्ते के बाद अब मैं भी घर के बाहर अंतिम-यात्रा में शामिल होने पहुंचे लोगों के बीच पहुंच चुका था। मातम में पूरी गली जैसे मौन होकर विलाप सुन रही थी। वहां काफी लोग जमा थे, पर सभी मौन और भाव-शून्य बस शव-यात्रा की तैयारियों में व्यस्त थे। इन दिनों धूप अधिक होने लगी है, इसलिए सब कुछ जल्दी-जल्दी निपट जाए तो अच्छा। इस जल्दबाजी में मैं भी शामिल था। यह तो अच्छा हुआ, आज रविवार है नहीं तो एक छुट्टी शहीद हो जाती।
      मौत को डरावनी कहा जाता है पर हम सब को देख कर कोई हमें डरे हुए नहीं कह सकता था। हम मौत से डरे हुए नहीं थे। यह मौत जो एक जीवन ले कर चली गई थी, बड़ी जानी-पहचानी थी। हम सब जैसे तैयार थे कि उसको आना है। जिस देह में एक जीवन था वह जीवन भी अब थक चुका था। वह जीवन जहां वर्षों रहा था, वह शरीर अब किसी काम का नहीं था। अंततः जीवन मुक्त हो गया। जैसे जीवन जाते जाते अपनी छांया यहीं छोड़ गया। देह उस जीवन की प्रतिलिपि थी और घर वाले उस प्रतिलिपि को घर से बाहर कर देना चाहते थे। जीवन से रहित देह को रखने का स्थान घर नहीं होता। यह कोई नयी बात नहीं है, सभी यहां ऐसा ही करते हैं। करते क्या है, हम सब को ऐसे करना होता है। बस एक बंदरिया को देखा है जो अपने मृत बच्चे को छाती से चिपकाए-चिपकाए घूमती रहती है। हम ऐसा नहीं करते, ऐसा नहीं कर सकते। घर वालों के लिए खुशी की बात थी जो कोई किसी को कह नहीं रहा था पर उन सब ने स्वीकार कर लिया था कि दादा जी चले गए हैं तो घर में एक कमरा खाली हो जाएगा। यह उनका कमरा अब किसी और को मिल जाएगा। हमेशा के लिए नहीं। ठीक ऐसे ही जैसे दादा जी को कभी यह मिला था। उन के जाने से बाकी किसी दूसरे के हिस्से था। कहीं कुछ भी खाली नहीं हुआ था। कमरे के फिर से भर जाने की बात और सब कुछ भरा-भरा था। वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं।
      आज वह घर औरतों से भरा हुआ था और गली आदमियों से। औरतों को तो घर में ही रोने का काम करना था। और कुछ जानती थी कि उनको बस चुपचाप यहां काफी देर तक बैठना है। उन औरतों में जो बस अभी-अभी आईं थी, वे पूछ रही थी- ‘ऐसे कैसे हुआ?’ वे बस पूछने के लिए पूछ रही थी। उन सब को सब मालूम था। नहीं भी मालूम होता तो भी यह मालूम होना कोई बहुत जरूरी नहीं था। वे कुछ पूछने और बात करने का रिवाज निभा रहीं थीं। आदमियों में भी रिवाज निभाने वाले काफी थे।
      हम सब को शव-यात्रा के पीछे-पीछे जाना था। हमारी सब की अपनी अपनी समस्याएं थी। अलग-अलग समस्याओं थी पर मेरी कोई समस्या नहीं थी। आज रविवार जो था। मैं ऐसे लोगों में शामिल हूं जो हर रविवार को तो कम से कम समस्याओं की छुट्टी रखते हैं। मेरे पास बैठे सज्जन को रविवार के होते हुए भी दुख था कि नगर निगम को समय पर फोन कर के गाड़ी मंगावा लेते तो इतनी दूर पैदल नहीं चलता पड़ता। एक दूसरे सज्जन को समस्या थी कि हम नई पीढ़ी के लोग पुराने रस्मो-रिवाज भूलते जा रहे हैं। अब के लोगों को अर्थी तक बांधना नहीं आता। क्या हमें इन सब बातों को जानना नहीं चाहिए। कैसे-क्या संस्कार होने चाहिए यह तो सभी को ध्यान होना चाहिए। जो कुछ संस्कार जानते थे वे जो जानते थे वैसा कर रहे थे, उन करने वालों के कामों में भी कमियों का बखान कुछ अधिक जानने वाले लोगों में होने लगा। वे कर कुछ भी नहीं रहे थे। न रोका-टोकी बस एक दूसरे को बता रहे थे- ऐसे नहीं, हमारे तो ऐसा होता है।
      इतने में सुबह जो लड़का मुझे कहने आया था, वह आया और मेरे पास बैठे एक बुजुर्ग को पूछने लगा- ‘दादा जी, ये मोती और सोने का तुस कैसे करना है।’ दादा जी ने बताया- ‘आंखों में मोती और मुंह में सोने का तुस देना है।’ ये बात मुझे परेशान करने लगी कि ऐसे जानने वाले लोग जब चले जाएंगे तब कौन ध्यान रखेगा इन बातों का। मैंने पाया दादा जी के लड़के रमेश को भी ऐसा कुछ ध्यान नहीं था। बस सारा काम हो रहा था, अंतिम क्रिया का सामान लाने वालों से लेकर उस सामान का प्रयोग करने वालों तक का जैसे कोई क्रम बिना किसी निर्धारण के किया हुआ था।
      वह समय आया जब अर्थी को उठा कर गली में लाया गया और हम शमशान की तरफ ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए हजूम में चल निकले। अब घर से रोने के स्वर में काफी तेजी आई किंतु लोगों के समवेत स्वर-घोष में वह मंद लगा। शव को कंधा देने वाले जवान थे वे तेजी से चले तो पीछे चलने वालों पीछे छूटने लगे। किसी ने दौड़ कर शव को कंधा देने वालों को धीरे चलने का कहा तब पीछे वालों को थोड़ी राहत मिली। फिर भी चार जवानों और कुछ बूढ़ों की इस दौड़ में मुकाबला काफी देर तक होना था। सभी राम नाम की सत्यता को जैसे कंठस्त फिर फिर कर रहे थे। सभी को यह सत्य विदित था। इस झूठे जगत में जिस की सत्यता का जयघोष हो रहा था, वह कौन था? वह वहां आगे था या कहीं पीछे छूटता चला जा रहा था। ऐसा तो नहीं उस परम सत्य को बूढे दादा जी ने मौत से मिल कर पा लिया था और वे उस के पास पहुंच गए थे या हम उनको नियति के आगोश में सौंपने चले जा रहे थे।
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