28 अक्तूबर, 2016

दीप जलाए

सभी को
लीलता है-
अंधकार
मूर्त-अमूर्त
नहीं छोड़ता
वह किसी को
मगर मन में
जगमग करता है-
एक दीप सदा....

इस मन-दीपक को
आस-उम्मीद की
रोशनी देते रहना तुम।

तुम जो बैठे हो
दीप जलाएं
मेरे मन-आंगन !

-नीरज दइया

23 अक्तूबर, 2016

दो कविताएं • नीरज दइया

तुम को संबोधित

कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।

मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !
हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।
तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००

जान से खेल जाती हैं

क्या चिंटियां घूमती हैं-
बस भोजन की तलाश में...
ऐसा क्यों सोचते हो तुम ?
जब भी वे आतीं है पास
बचते हैं हम और तुम
खुद को बचाते हुए
बचते हुए, दूर करते हैं
दूर हो जाना चाहते हैं
फिर भी वे, पास आती हैं
बार-बार आती हैं....
रास्ता बदल-बदल कर आती हैं
क्या हर बार वे आती हैं-
भोजन की तलाश में ?
जान से खेल जाती हैं
कभी-कभी जिद्दी चिंटियां
क्या चिंटियां घूमती हैं-
अपनी मृत्यु का सपना लेकर।
००००

20 अक्तूबर, 2016

मुझे ‘भूत’ बना दो

सुबह-सुबह कॉल-बेल बजी तो लगा कोई आया है। देखा तो एक सज्जन कुर्ता-पायजामा धारण किए चप्पल पहने और झोला लटकाए बाहर खड़े थे। देखते ही बोले- ‘पंच चाचा।’ मैंने कहा- ‘हां अंदर है, आएं।’ वह होले-होले कदम बढ़ते मेरे पीछे-पीछे कमरे तक पहुंचे और कमरे में पंच चाचा को देखते ही उनके चरणों में झुक गए। पंच चाचा बोलो- ‘अरे बैठो-बैठो।’
      मैं कमरे से बहार निकलने वाला ही था कि ‘मुझे भूत बना दो।’ उस झोलाछाप के शब्दों को सुन वहीं रूकने का निश्चय किया। सोचा यह कौन पागल है जो भूत बनना चाहता है। पंच चाचा ने कभी ऐसा भी नहीं बताया था कि वे किसी को भूत बनाने की कला भी जानते हैं। मैं वहीं पास बैठ गया देखें अब चाचा क्या कहते हैं? पंच चाचा बोले- ‘क्यों भाई तुम भूत क्यों बनना चाहते हो?’
      वह आदमी बोला- ‘जीवन में जो कुछ नहीं कर सका, वह अब भूत बन कर करने की इच्छा हो गई है। घर-परिवार और बीबी-बच्चों से परेशान हूं, कोई कहना नहीं मानता। भूत बन कर सब को सीधा कर दूंगा।’ पंच चाचा मुस्कुराए, बोले- ‘अच्छा। ऐसे कैसे सीधा कर दोगे? तुम्हें पता है भूत तो खुद ऊलटा होता है और जब तुम भूत बन जाओगे तुम्हें सभी जो यहां ऊलटा है सीधा दिखेगा और जो सीधा है वह ऊलटा दिखेगा।’
      ‘चाचा अच्छा किया जो आपने पहले बता दिया। वर्ना मैं भूत बन कर सब ऊलटा-पुलटा कर देता। अब ठीक है। जो सीधा दिखेगा, उसी को मैं सीधा करूंगा।’ उस आदमी के कहते ही चाचा अपने स्थान से उठ खड़े हुए और उसका हाथ पकड़ करा अपने हाथ में ले लिया। मैं हैरान कि चाचा को क्या हो गया। ऐसा पहले तो कभी हुआ नहीं था। वे देर तक चुपचाप उसके हाथ को थामे मौन साधे रहे फिर बोले- ‘अभी तुम्हारा भूत बनने का समय नहीं आया है।’ उसका हाथ छोड़ चाचा अपने स्थान पर जाकर बैठ गए और मेरे तरफ देख कर बोले- ‘पानी तो पिलाओ।’
      मैं बेमन से उठा यह सोचते हुए कि न जाने पंच चाचा उस से क्या कुछ मेरी अनुपस्थिति में कह डाले और मैं सुनने से वंचित रह जाऊं। मैं जल्दी-जल्दी पानी लाने की फिराक में यह गया और यह आया की स्थिति पाना चाहता था। सच में अब तो मेरी भी इच्छा हो रही थी कि पंच चाचा से कहूं- ‘मुझे भूत बना दो।’ अगर मैं भूत होता तो वहीं बैठे-बैठे हाथ लंबा करता और पानी की व्यवस्था कर देता। मैं भूत नहीं था फिर भी भूतों सी जल्दबादी तो मेरे भीतर थी। मैं जब पानी लेकर वापिस आया देखा कि वह आदमी जोर-जोर से रो रहा था और पंच चाचा जोर-जोर से हंस रहे थे।
      मैंने दोनों को जैसे टोकते हुए कहा- ‘पानी।’ दोनों यकायक चुप हो गए। पानी पीकर वह आदमी और पंच चाचा मेरी तरफ देखने लगे तो मैंने कहा- ‘क्या? आप हंस और यह भाई साहब रो क्यों रहे थे?’
      पंच चाचा बोले- ‘देखा, मैंने कहा था कि नहीं। यही तो भूत है जिसे हम पाना चाहते हैं। तुम यहां नहीं थे तो तुम्हारा भूत था यहां। उसने सब देखा-सुना पर वह तुम को नहीं बता सकता। मैं कहता हूं हम सब के अपने अपने भूत है जो हमारे भीतर-बाहर रहते हैं। हम सब हमारे अपने भूतों के साथ रहते हैं। हम सब की समस्या यह है कि हम उल्टे को सीधा करने की सोचते रहते हैं। उल्टे को सीधा करना सरल नहीं है। सरल है सीधे को सीधा करना। मतलब अगर हर कोई उल्टे को सीधा करने में लग गया, तो सीधा हमारे हाथ से चला जाएगा और वह भी उल्टा हो जाएगा। सीधों को सीधा रखो भैया।’

18 अक्तूबर, 2016

‘सामान्य’ शब्द पर आपत्ति

वैसे तो ‘सामान्य’ शब्द इतना सामान्य है, कि इस पर कोई आपत्ति मान्य नहीं। आप सहृदय हैं। देखिए जब इस शब्द की आत्मा ‘मान्य’ में है, तो यह आपत्ति भी मान्य समझ कर सुनना मंजूर कीजिए। जानते हैं कि देश और दुनिया में बहुत सी बातों पर अनेक आपत्तियां है। हम लंबी-चौड़ी बात नहीं बस एक बार करने की अनुमति चाहता हूं। आपकी सदाश्यता होगी कि इस आपत्ति को सुनना स्वीकार करेंगे।लिजिए जनाब हुआ कुछ ऐसा कि सात बार प्रतियोगिता परीक्षा में फेल होकर आत्महत्या को उतारू एक युवा को पंच काका ने एक बार तो रोक लिया है। पर पंच काका कहां-कहां किस किस को रोकेंगे। इसलिए यह सुनना अधिक जरूरी है। उसके युवा के अंधकारमय भविष्य का श्रेय परीक्षाओं के ‘सामान्य ज्ञान’ के प्रश्नों को जाता है। आजकल सभी परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान के कुछ ऐसे अति-विशिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं। वह हतोत्साहित युवा कह रहा था कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री से लेकर देश के सभी नेता हर दिन कुछ न कुछ करते हैं। तकलीफ उनके कार्य को हमारे सामान्य ज्ञान बना देने से। प्रधानमंत्री जी कब कहां गए, और उन्होंने कहां क्या-क्या किया-कहा? भला यह कोई सामान्य ज्ञान है। इतनी योजनाएं, इतना बड़ा देश और इतनी बड़ी जनसंख्या। हमारा पुराना इतिहास, भूगोल, विज्ञान, खेल-कूद सभी कुछ जब सामान्य ज्ञान है तो हद हो गई। सामान्य का अभिप्राय है ऐसा कि जिसमें कोई विशेष न हो। यहां तो बस सामान्य हम है हम पर लाद रहे हो विशेष। आपको जो मामूली बात लगती है वह हम रट-रट कर कितनी रटें। ग्रह कितने हैं, कौनसा छोटा और कौन बड़ा? कौन सा किस नंबर पर? सब याद रहता है भला। शरीर में हड्डियां कितनी और पसलियां कितनी? इन सब ने दिमाग खराब कर दिया है। कौनसा विटामिन और कौनसा खून किस-किस को दिया और नहीं दिया जा सकता है। क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल के साथ सभी खेल सामान्य हैं। कौन जीता, कब जीता... कितने सवाल बना डाले इन किताबों में। सामान्य ज्ञान को प्रणाम।आम का मतलब फल होता है और आम मतलब हम यानी सामान्य। आज हर कोई सामान्य से निकल कर, किसी न किसी कोटे में फिट होने की अभिलाषा रखता है। देश की विकास दर बढ़ रही है। आम आदमी खुशहाल हो रहा है। पर असलित में इन आमों में कुछ आम बेहद सडे हुए हैं। सडते जा रहे हैं। इन सडे हुए आमों का रस निकाल कर पीने वाले पी रहे हैं। वे अपनी सेहत बना रहे हैं। बेरोजगारी में पांच हजार का काम पांच सौ तक में करने को विवश ये सामान्य जन पढ़े-लिखें है, पर ‘सामान्य ज्ञान’ के मारे हुए हैं। अगर पन्द्राह-बीस वर्षों तक किताबों में आंखों को उलझाए ये युवा ‘सामान्य ज्ञान’ के स्तर को भी प्राप्त नहीं हुए हैं तो इन स्कूलों और कॉलेजों ने इतने सालों क्या किया? जो पढ़ाया वह किस काम का? अरे जीवन भर पढ़ाते कुछ हो, परीक्षाओं में नौकरियों के लिए पूछते कुछ हो। यह क्या खेल है? पढ़ी हमने रामकथा और सवाल आया महाभारत से। बाजार का भी बुरा हाल है। एक परीक्षा के लिए लाखों की संख्या में आवेदन किए जाते हैं, और बाजार में रातों-रात अनेक किताबें पहुंच जाती है। कौनसी खरीदे और कौनसी नहीं? दो-चार खरीद कर दिन-रात पढ़ते हैं। पढ़ते क्या घोट घोट कर पीते हैं। खाना-पीना-सोना सब कुछ हराम। केवल और केवल पढ़ाई। सपना कि कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाए। सामान्य जन की कोई बड़ी अभिलाषा नहीं है। ये पेपर बनाने वाले जनाब ना मालूम किस-किस जगह से प्रश्न बटोर कर सामने परोसते हैं कि सामान्य बस सामान्य ही बन कर रह जाता है। हर बार की तरह इस बार भी गई भैंस पानी में। अरे हम सामान्य को इतना गणमान्य बना दिया है हमारे उद्धार की तो सोचो।

16 अक्तूबर, 2016

आलोचना में कोई मित्र नहीं होता : डॉ. नीरज दइया

 डॉ. नीरज दइया से राजेन्द्र जोशी की बातचीत (आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कविता, आलोचना, अनुवाद, संपादन और बाल साहित्य आदि क्षेत्र में बहुत तेजी से उभते हुए लेखक के रूप में डॉ. नीरज दइया ने अपने काम के बल पर एक ऐसी स्थिति ला खड़ी कर दी है कि वे राजस्थानी साहित्य के एक जरूरी लेखक माने जाने लगे हैं। आपको बाल साहित्य पर साहित्य अकदेमी का बाल साहित्य पुरस्कार और अनुवाद कार्य पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने सम्मानित किया साथ ही अनेक संस्थाओं ने भी पुरस्कृत किया है। हाल ही में आपको आलोचना पुस्तक बिना हासलपाई पर इक्कीस हजार का पुरस्कार रोटरी क्लब द्वारा घोषित हुआ है। डॉ. नीरज दइया से पुरस्कृत पुस्तक और उनकी आलोचना प्रक्रिया पर कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने लंबी बातचीत की है। जिसका संपादित अंश पाठकों के लिए प्रस्तुत है। ० संपादक )
आपकी आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर रोटरी क्लब का पहला-पहल राज्य स्तरीय पुरस्कार घोषित होने पर कैसा लगा?
इसका जबाब तो आप जानते ही हैं। अच्छा लगा। पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता? खुशी की बात है कि मुझे आलोचना विधा की पुस्तक पर पुरस्कार मिलेगा।
कहा जाता है कि राजस्थानी में आलोचना विधा पर लेखन बहुत कम हुआ है और जो हुआ है उसमें भी बहुत बातें हैं। जैसे आलोचना के नाम पर जो लिखा जा रहा है वह आलोचना है भी या नहीं इस पर भी संदेह है।
केवल राजस्थानी आलोचना ही क्यों, क्या हम समग्र आधुनिक राजस्थानी साहित्य लेखन से संतुष्ट हैं? हम ऐसी बात करते हुए कटघरे में तो बीसियों को रखते हुए अनेक बातों में व्यर्थ समय बर्बाद कर सकते हैं पर मैं मानता हूं कि एक लेखक के रूप में अपने आप से सबाल करना चाहिए कि जो मैंने लिखा है वह पर्याप्त है क्या? साथ में यह भी कि यदि आप राजस्थान में रहते हैं और राजस्थानी भाषा आपकी आपनी है तो आपने क्या किया है इसके लिए? अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए हम सभी की साझी जिम्मेदारी है। क्या पाठक और लेखक के रूप में आपने राजस्थानी किताब को खरीद कर पढ़ाने की आदत डाल ली है? स्थिति बेहद दुखद है कि लेखक किताब भेंट करते हैं और मित्र लेखक पढ़ते भी नहीं है। ऐसे लेखक मित्रों को मैं अनपढ़ कहा करता हूं। संभवतः आलोचना के बारे में संदेह करने वाले ऐसे ही हमारे अनपढ़ लेखक मित्र हैं, उन्हें खुद जानने-पढ़ने की जरूरत है कि आलोचना क्या होती है। तथ्य और तर्क के बिना कही गई बात का कोई महत्त्व नहीं होता।
ऐसे अनपढ़ कहना हमारे लेखकों द्वारा शायद अपमान समझा जाएगा।
यदि इसे अपमान समझ कर भी वे कुछ पढ़ने-लिखने लगे तो राजस्थानी के लिए अच्छा होगा। अनपढ़ लेखक केवल बातें करते और बातें बनाते हैं। यह साहित्य का भला नहीं।
मेरा सवाल अधूरा रह गया कि आज जो आलोचना के नाम पर लिखा जा रहा है और आपने जो अपनी किताब में लिखा है उसमें बहुत लेखकों को शामिल नहीं किया है।
यदि आप मेरी किताब में बस लेखकों के नाम ही देख रहे हैं तो माफ करें आपको लेखक परिचय कोष देखना चाहिए। आधुनिक राजस्थानी कहानी को मैंने समझने का प्रयास किया है। इस प्रयास में कहानी विधा के विकास की बात बिना कहानीकरों और कहानियों के नहीं हो सकती थी। इसलिए पच्चीस कहानीकारों को प्रमुखता के साथ आधार बनाया है। इसमें आरंभ में दो आलेख अलग से है, जिनमें कहानी आलोचना और शिल्प-संवेदना के पक्षों पर चर्चा है। मेरा मानना है कि वर्तमान में आधुनिक कहानी पर यह पुस्तक पर्याप्त विवेक के साथ मैंने लिखन की एक कोशिस की है। 
कहानी आलोचना पर आप से पहले डॉ. अर्जुन देव चारण ने ‘आधुनिक राजस्थानी कहाणी : परंपरा विकास’ पुस्तक में सभी कहानीकारों की चर्चा की थी पर आपने सभी को नहीं लिया।
यदि आपने उस पुस्तक को देखा है तो यह भी कहिए कि डॉ. चारण ने पांच कहानीकारों पर विशेष आधार बना कर विवेचना की थी और अब जब मैंने पांच से पच्चीस कहानीकारों को आधार बनाया है। इस क्षेत्र में बहुत काम करने की आवश्यकता है। मैं मूलतः रचनाकार था और रचनाकार ही हूं, आलोचना का काम भी उसे रचना मान कर ही करता हूं। 
ऐसे में हम क्या यह समझे कि बिना हासलपाई में आलोचना की हासलपाई यह है कि आपने जानबूझ कर अपने मित्र कहानीकारों को ले लिया है और कुछ नामी गिरामी कहानीकारों को छोड़ दिया है।
‘बिना हासलपाई’ आलोचना पुस्तक की एक सीमा है, हर पुस्तक की होती है और मेरा मानना है कि आलोचना में कोई मित्र नहीं होता। इसमें शामिल बहुत से कहानीकारों से मेरा परिचय बस उनकी रचनात्मता से है। मैंने राजस्थानी के लगभग सभी कहानीकारों को पढ़ा है और इस आलोचना पुस्तक में छूटे हुए कहानीकारों से भी गहरे मित्रवत संबंध है। ऐसे मित्रों को मैं अपने पारिवारिक आयोजन में आमंत्रण भेज सकूंगा पर आलोचना लिखते समय जब मैं अपने पिता सांवर दइया को भी एक कहानीकार के रूप में पढ़कर ही आलोचना लिखने का प्रयास करता हूं, आप स्वयं इसका आकलन कर सकते हैं कि मैंने अपने पिता पर नहीं एक कहानीकार पर लिखा है, जो राजस्थानी के बड़े कहानीकर माने जाते हैं। असल में ‘बिना हालपाई’ में कहानीकारों के मेरे संबंधों को नहीं उनकी कहानियों के सभी पक्षों को उद्घाटित करने का उदाहरण बनाने का प्रयास है। केवल तारीफ ही तारीफ या फिर परिचय और सूचियां आलोचना नहीं हुआ करती। आदरणीय कवि पारस अरोड़ा ने एक दिन मुझे फोन किया और बोले- नीरज तुझे समीक्षा लिखनी नहीं आती। मैं हैरान रह गया। पूछा- ऐसा क्या लिख दिया मैंने? उन्होंने जो कहा अब वह मेरे लिए किसी बड़े पुरस्कार या प्रमाण-पत्र से कम नहीं है। वे बोले थे- तुम समीक्षा के नाम पर आलोचना लिखते हो। असल में किसी भी समीक्षा का धेय ही आलोचना हो जाना होता है। आलोचना रचना को गहरे अर्थों में स्वीकार करती है।
ऐसे में आपने शामिल पच्चीस कहानीकारों का चयन कैसे किया। किसे लिया जाए और किसे नहीं लिया जाए? इसका कोई तो आधार या बात आप ने ध्यान में रखी होगी?
‘बिना हासलपाई’ का कोई भी किताब जब प्रकाशन की राह आती है तो उसमें रचनाकार के मित्रों और सहयोगियों के साथ अग्रज साहित्यकारों की भी भूमिका होती है। मेरे साथ हमेशा ऐसा रहा है। ‘आलोचना रै आंगणै’ भाई साहब बुलाकी शर्मा और रवि पुरोहित को समर्पित थी और ‘बिना हासलपाई’ भाई साहब मदन सैनी और नवनीत पाण्डे को समर्पित है। इसका फ्लैप नंद भारद्वाज जी ने लिखा है। पहली पुस्तक से इतर जब दूसरी पुस्तक आने वाली थी तब हम सब ने तय किया कि पुस्तक विधा केंद्रित होनी चाहिए। बहुत से आलेखों को बिना हासलपाई में शामिल करने से पहले मैंने अनेक बार देखा परखा। आलोचना जब पत्र-पत्रिकाओं में किसी त्वरा में लिखी जाती है तब कुछ बातें और प्रसंग साथ होते हैं ऐसे में उनका वैसे का वैसा किताब में जाना ठीक नहीं होता है। पत्र-पत्रिका और अखबार का महत्त्व कुछ दिनों और महीनों तक होता है जबकि किताब को तो सालों-साल रहना होता है। ऐसे में उनकी भाषा और वस्तु-भाव सभी को परिमार्जित किया जाना जरूरी समझता हूं। बिना हासलपाई में उन कहानीकारों को लिया गया जिन पर पर्याप्त ध्यान आलोचना ने नहीं दिया है। शामिल कहानीकारों के अलावा भी ऐसे कहानीकार है जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पर कुछ ऐसे कहानीकारों को छोड़ दिया गया, जिन्होंने कहानियां तो बहुत कम लिखी है और बातें बहुत की है अथवा अपने कहानीकार होने को उन्होंने खूब प्रचारित करवाया है। आलोचना का काम अज्ञात बातों और बिंदुओं को सामने लाना होता है, ऐसे में कुछ प्रयास मैंने किया है। जो पसंद किया गया है तभी मेरी किताब के बारे में बात होती है। 
आलोचना लिखते समय आप विशेष क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखते हैं?
लिखना आज के दौर में बेहद कठिन कार्य है और आलोचना तो उससे भी कठिन। मैं राजस्थानी साहित्य का पाठक हूं इसलिए लेखक हूं। कुछ किताबें और लेखक मुझे प्रभावित करते हैं और वे किताबें ही मुझे आलोचना लिखने की प्रेरणा देती है। ऐसा भी है कि संपादकों के आग्रह पर भी मैंने आलोचना लिखने का प्रयास किया है। आलोचना में समय के साथ नया दृष्टिकोण होना जरूरी है। मैंने आधुनिक कविता के संदर्भ में कवियों के सिलसिले में टोप टेन कवियों की अवधारणा बाजारीकरण के चलते प्रस्तुत की थी जिस पर भिन्न भिन्न प्रतिक्रिया हुई। मैं मानता हूं कि आजादी के बाद के मेरे बताए दस कवियों में से आप सात-आठ पर सहमत हैं तो मेरी आलोचना के मानदंड ठीक है। मैं यह उम्मीद भी नहीं करता कि आप शत प्रतिशत मुझसे सहमत होंगे। आपको सहमत होना भी नहीं चाहिए। यदि आप पूरे सहमत हो जाएंगे तो मैं अपने आप में सुधार क्या करूंगा। अंत में एक बात मन से कहता हूं कि साहित्य की कोई विधा हो बेशक वह आलोचना हो या कोई दूसरी हो, आलोचना का कोई तयशुदा फार्मूला नहीं होता। मैं क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखता हूं आपके सवाल पर मेरा कहना है कि मैं लिखते समय बस लिखता हूं। जिस दिन यह क्या और किन-किन का ध्यान रखने लग जाऊंगा तब तो मेरा लेखन ही अवरुद्ध हो जाएगा। भीतर की प्रेरणा और विचार प्रवाह की कुछ ऐसे स्थितियों से मैं अपने भीतर धिर जाता हूं तब यह जानिए कि बिना लिखे रह नहीं सकता और मैं लिखता हूं। हां उसके प्रकाशन से पूर्व जरूर इन क्या और किन-किन के बारे में सोचता हूं। आलोचना में किसी लेखक के आत्म-सम्मान पर चोट नहीं हो यह ध्यान रखता हूं साथ ही मैं अपने लेखक को बड़ा मान कर ही उसके पीछे पीछे चलने का प्रयास करता हूं। मेरी भाषा और तर्क पर्याप्त सुसंगत हो यह भी दुबारा पढ़ते समय देखता हूं। असल में सभी कहानीकारों का अपना अपना ढंग है, इसिलिए सभी लेखकों-कहानीकारों का अपना-अपना महत्त्व है। इस महत्त्व के आलोक में आलोचक अपनी दृष्टि से समय और समाज के अनेक प्रश्नों के साथ किसी व्यापक परिदृश्य अथवा कहें साहित्य की विशाल परंपरा में उन्हें देखने-समझने का प्रयास करता है।
राजेन्द्र जोशी, तपसी भवन, नत्‍थूसर बास, बीकानेर - 334004

(दैनिक युगपक्ष 16-11-2016 रविवार को प्रकाशित)

15 अक्तूबर, 2016

राजस्थानी कहानी : देश बिराना है

मूल : नवनीत पाण्डे
अनुवाद : नीरज दइया
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कहानीकार का परिचय : 
 नवनीत पाण्डे जन्म: 26 दिसम्बर, 1962 बीकानेर, राजस्थान। राजस्थानी और हिंदी में समान गति से लेखन। प्रमुख कृतियाँ : हेत रा रंग (कहानी संग्रह) माटी जूण (उपन्यास) और बाल साहित्य की कई पुस्तकें राजस्थानी में। सच के आस पास’, ‘छूटे हुए संदर्भ’ और ‘जैसे जिनके धनुष’ (हिंदी कविता संग्रह) प्रकाशित। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी एवं राजस्थान साहित्य अकादमी से सम्मानित।
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    बात छोटी-सी है कि सरकारी कॉलोनी में क्वाटर आवंटित हो गया है। इस छोटी-सी बात को घर में बताना कितना कठिन है। पिताजी क्या सोचेंगे? बड़े भाई साहब क्या कहेंगे? और मां- वह तो बस.. जैसे सुनते ही रोने लगेगी। कोई रास्ता नहीं, कुछ तो करना ही होगा। सभी को खुश रखना भी जरूरी है। आज ही श्याम बाबू कॉलोनी जाकर आएं हैं, कितने सुंदर क्वाटर्स बने हैं। सभी तिमंजिले, किसी फिल्मी तिलस्म से लुभाते। हरेक में बॉलकोनी और सामने लंबी-चौड़ी सड़क। कितनी खुश होगी सुशीला। उनको सुशीला पर जैसे दया आई- बेचारी! क्या सुख मिला उसे। सुबह-सवेरे सब से पहले उठना, उठते ही चौका-बर्तन। मां-पिताजी, भैया-भाभी और विमला की चाकरी करना, उनको खुश रखना और सांझ ढले थक-हार कर सोने का इंतजार करना। ‘कितने दिन गुजर गए उसे मुझसे बात किए हुए..!’ यह सोच श्याम बाबू अनमने-से हो गए। सुशीला से बतियाए उनको पूरे दो सप्ताह हो गए। इस बीच एक रात को पूरा घर सो गया तो श्याम बाबू उसके करीब पहुंचे तो वह नींद में थी और अचानक किसी को आया देख बेहद डर गई, श्याम बाबू ने कितने मुश्किल से समझाया कि मैं तेरा पति हूं। सात फेरे लिए हैं साथ। उठाकर नहीं लाया। लेकिन वह पत्त्थर कहां समझी। बस- ‘मां उठ जाएगी, विमाला दीदी जाग जाएंगी’ की रट लगाए श्याम बाबू को दूर करती रही। गुस्सा तो बहुत आया पर क्या करते कोई रास्ता नहीं था। अगले ही दिन सरकारी क्वाटर के लिए आवेदन किया और हाथों-हाथ आवटंन भी करवाया। ऐसा कर इतनी खुशी हुई कि शायद ही पहले किसी दिन हुई होगी।
    - क्या बात है, आज गुमसुम कैसे बैठे हो? तबियत तो ठीक है? पिताजी ने पूछा।
    - नहीं कुछ नहीं। श्याम बाबू सवाल सुनकर हकबका गए। बात तो थी और कहना भी चाहते थे किंतु कैसे कहे? पिताजी जैसे स्थिति समझ गए या अपने बेटे का मन पढ़ लिया हो। बोले- कुछ तो है..।
    - बात यह है कि पिताजी.. । बाहर आते आते फिर बात कहीं भीतर अटक गई।
    - बोलो-बताओ। मन पर कोई बोझ नहीं रहना चाहिए। पिताजी ने पीठ पर हाथ फिराते हुए हिम्मत दी।
    - मुझे सरकारी क्वाटर मिल गया है। श्याम बाबू ने जैसे एक ही सांस में भीतर धधकता लावा जैसे उगल दिया।
    - क्या? पिताजी का हाथ जहां था वहीं जड़ हो गया और श्याम बाबू तो जैसे उस बोझ से धरती में धसे जा रहे थे। बेबस थे कहना तो था ही, आज नहीं तो कल।
    - हां S.. पिताजी, कितनी तकलीफ होती है हमें यहां। इतने बड़े परिवार में देखिए इन तीन छोटे-छोटे कमरों से क्या होता है। ना तो ढंग से बैठ सकते हैं और ना रह सकते हैं। श्याम बाबू ने जैसे सफाई दी।
    - पर आज ही ऐसी कौनसी बात हो गई। हमारी तो पुश्तें कट गई यहीं इन कमरों में। क्या तकलीफ है तुम्हें यहां? अलग कमरा चाहिए तो बता, बनवा देता हूं। पिताजी शांत दबे स्वर में बोले।
    - नहीं-नहीं, मैं तो बस...। श्याम बाबू आगे कुछ बता नहीं सके।
    - लोग क्या कहेंगे? रिस्तेदार क्या सोचेंगे। पिताजी लड़खड़ाए स्वर में बुदबुदाए।
    इसी बीच मां और भैया भी आ गए।
    - श्याम अलग होना चाहता है। पिताजी लंबी सांस लेकर बोले।
    - श्याम अलग होना चाहता है। मां और बड़े भैया ने एक साथ दोहराया। भीतर कमरे में ऐसी ही फुसफुसाहट विमला और भाभी की सुनाई दी।
    - बता क्या कुछ बात हो गई? किसी ने कुछ कहा तो अभी फैसला हो जाएगा। बड़े भैया ने कहा।
    - हां कोई बात है तो बता .. । मां की आंखें डबडबा आईं।
    - बात कुछ नहीं, इतने जनों में यह दुखी हो रहा है। पिताजी के स्वर में व्यंग उभरा तो श्याम बाबू ने गर्दन झुका ली।
    - देख श्याम! मैं मानता हूं कि साथ रहने में थोड़ी-बहुत तकलीफ जरूर होती होगी पर अपनापन तो है। सब एक दूजे के सुख-दुख में शरीक हैं। जगह की तंगी जरूर है पर मनों में प्रेम का सागर उमड़ा रहता है। और तू तो जानता ही है कि एक जीव के सौ झंझट होते हैं उसका कौन मालिक होता है। भाई साहब समझा रहे थे।
    - पर मैं कोई लड़ाई कर के थोड़ी ना जा रहा हूं। आना-जाना लगा रहेगा। श्याम बाबू नाराज होते बोले।
    - किंतु घर तो दो हो गए ना। मां आगे बोली- सुशीला ने तो कुछ नहीं कहा। मां का दिमाग चकरा गया।
    - उसे तो कुछ पता भी नहीं। श्याम बाबू ने खीज कर कहा।
    - मुझे तो ये लच्छन उसी के लगते हैं। मां भीतर कमरे में जाती हुई क्या बोल गई कि कमरे से रोने की आवाज आने लगी। बेचारी सुशीला ने शायद मां की बात सुन ली।
    फिर किसी ने कुछ नहीं कहा और एक एक कर सभी इधर-उधर हो लिए। पीछे रह गए एक अकेले श्याम बाबू।
    - कितना छोटा होता है मन। सुशीला सोच रही थी। पांच वर्षों से घर की प्यारी और लाडली बहू पांच सैकिंड में ऐसी हो गई। क्या कुछ नहीं किया-सहा इस घर के लिए। पांच वर्षों में मुश्किल से पांच मिनिट भी पति के साथ बैठकर बतियाई होंगी। घर से साथ निकलना तो जैसे सपना था। क्यों मैं इंसान नहीं। क्या मेरा कोई मन हीं। हम कब-कहां साथ बैठें! कब सुख-दुख की कोई बात की। विवाह का क्या मतलब है? घर में लड़ाई नहीं हो, बस यही सोचकर कि कोई यह ना कह दे कि घर में पत्नी के आते ही बेटा पराया हो गया। इसे कौन देखे कि हमने अपनी सभी इच्छाओं का गला घोंट दिया। कितना भी कर लो, मर-खप जाओ फिर भी दोष का भांडा औरत के सिर पर ही फूटेगा। औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन। पहली बार सुशीला को मां जैसी सास डायन सरीखी लगने लगी।
    - रोते क्यों है? यह तो होता आया है। गनीमत समझ कि तेरा पति तेरे मुताबिक सोचता है। मुझे देख पन्द्राह बरस हो गए। पर कोई नहीं सोचता। जेठानी ने सुशीला के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा। उसकी आंखें बरस रही थीं- टप टप। सुशीला के जी में जैसे जान आई।
    अगले पांच दिन घर में पांच युगों जैसे बीते। आपसी संवाद नपी-तुली बातों में सिमट गया। वे मीठे बोल, हंसी-मजाक और साथ उठना-बैठना-बतियाना जैसे हवा हो गए।
    सुशीला खुश थी। दूसरी मंजिल के क्वाटर में सारा सामान घर से दो-तीन चक्कर में यहां आ गया। वह काफी समय अपनी बॉलकोनी में खड़ी सामने के क्वाटर को देखती मन ही मन हर्षित होती रही। एक के अलावा सभी क्वाटरों के दरवाजे बंद थे। खुले दरवाजे के क्वाटर के बाहर टैंट लगा था। रंगीन लाइटों की सजावट टांगी जा रही थी। सुंदर गीत-संगीत बज रहा था। उसने सोचा जरूर कोई शादी होगी, पर अपने यहां तो कोई बुलावा आया ही नहीं। आ जाएगा। सुशीला को हंसी आ गई। उन बेचारों को क्या मालूम कि इस क्वाटर में कोई आया है।
    सुशीला पलंग पर लेट गई। वह बहुत खुश थी। उसे घर की याद आने लगी। सास-ससुर, जेठ-जेठानी, ननद सब थे घर में और यहां कौन है? कोई नहीं, अकेले में सूनापन जैसे काट खाने को दौड़ता। श्याम बाबू भी शाम ढले लौटेंगे। क्या वह इसी घड़ी के लिए कल्पनाएं किया करती थीं। पर इस में वह सुख कहां है। उस समय तो बहुत खुश हो रही थी और अब जैसे कोई आफत गले आ पड़ी हो। समय काटना ही मुसिबत हो गया। जितने बार भी दरवाजा खोले बाहर सामने बंद दरवाजे दिखाई देते। दिन काटना जैसे पहाड़ चढ़ना हो गया।
    - धीरे-धीरे सब आदत हो जाएगी। श्याम बाबू ने शाम को हंसते हुए समझाया।
    - सामने के क्वाटर में क्या है? सुशीला ने पूछा।
    - ए. ओ. साहब के यहां लड़की की शादी है। शाम को मुझे जान है।  श्याम बाबू ने कहा तो जैसे सुशीला की समझ में कुछ नहीं आया, उसने पूछा- और मैं?
    - बेवकूप है तू.. यह अपना गली-मौहल्ला तो नहीं ना। यहां के अपने कानून कायदे हैं। यहां लोग आना-जाना, उठना-बैठना हिसाब से रखते हैं। अब तो शाम को बस हाजरी देनी है। श्याम बाबू समझाने लगे।
    - यह क्या बात हुई? गली में तो शादी वगैरा में लोग एक दूसरे को बड़े सम्मान मनुहार के साथ ले जाते थे ... फिर वहां अपनापन और लगाव। सुशीला सोचने लगी।
    जाते जाते श्याम बाबू बोले- यह अपनी गली नहीं है पगली। दरवाजा बंद कर ले। मुझे आते-आते थोड़ी देर हो जाएगी। रोटी बना कर खा लेना, मैं तो वहीं खाना खा कर आऊंगा।
    - क्या कॉलोनी के आदमी खाना खिला देते हैं? सुशीला व्यंग में बोली। श्याम बाबू हंसे और चल दिए।
    सप्ताह भर में ही सुशीला की समझ आ गया कि उसका यहां निबाह मुश्किल है। श्याम बाबू भी कुछ अनमने थे। उन्हें अचरज था कि यहां के लोग आदमी है या पत्थर। घरों के दरवाजे केवल दफ्तर आने-जाने के लिए ही खुलते और बंद होते थे। कोई किसी से मेल-मुलाकात चाहता ही नहीं। बैठना-बतियाना तो दूर की बात ठीक सामने मिल जाए तो बस नाम की दुआ-समाल। यहां का सारा हिसाब-किताब ही कुछ अलग लगा।
    आज तो हद हो गई। जरा-जरा सी बातों को यहां के लोग कितना बड़ा बना देते हैं। नीचे के क्वाटर से कोई आया कि बॉलकोनी में कपड़े वगैरह ना सुखाया करें, नीचे छींटें गिरते हैं। सुशीला के तो जैसे आग लग गई। श्याम बाबू भी गुस्सा हुए, पर क्या करें? कहा- ठीक है आगे से ध्यान रखेंगे।
    यह क्या बात हुई? कपड़े सुखेंगे कहां-कैसे? सुशीला को गुस्सा आया।
    - नहीं नहीं। यह बात नहीं। नीचे भी तो लोग रहते हैं, ध्यान तो रखना ही होगा। श्याम बाबू समझाने लगे।
    - नीचे लोग रहते हैं, ऊपर लोग रहते हैं। फिर कपड़े सुखेंगे कहां? कमरे में। सुशीला अभी तक गुस्से में थी।
    - मैं नीचे तार बांध दूंगा। श्याम बाबू ने रास्ता सुझाया।
    - मेरा मन यहां नहीं लगता। घर चलें। सुशीला घर की याद से घिर गई और आंखें भर आईं।
    क्या! क्या सुख है वहां, ना तो आराम से रह सकते हैं और ना ही साथ बैठकर दो घड़ी बतिया सकते हैं। थोड़ा धीरज रख। सब आदत हो जाएगी। श्याम बाबू का मन घर का नाम सुनते ही जैसे खट्टा हो गया।
    - मुझे घर में सब के साथ रहने के सुख के साथ सारे दुख मंजूर है। सुशीला की इस सीधी सच्ची बात का जबाब देना उनकी बस की बात नहीं थी।
    इस सूनेपन में सुशीला का मन अपनी जगह छोड़ चुका था। वह काफी देर तक अकेली सुबकती रही।
    - आंटी-आंटी। बाहर से आवाज आई।
    - क्या है? सामने ऊपर के क्वाटर से सोनीजी की लड़की को अचानक आया देख पहले तो सुशीला हर्षित हुई कि आज कोई तो आया, पर यह क्या लड़की ने पूछा- अंकल है क्या? पापा को ऑफिस से बुलाना है। दादाजी मर गए है। और लड़की रोने लगी।
    - क्या.. ! सुशीला की आंखें फटी की फटी रह गई। सारी खुशी गम में बदल गई। वह ताला लगाकर सोनीजी के क्वाटर में पहुंची। दोपहर के समय कोई आदमी नहीं था, सभी दफ्तर थे, खबर कैसे पहुंचाए। कोई साधन नहीं। बस तीन-चार औरतें थीं। उनके आते-आते शाम हो गई और रिस्तेदारों को खबर करते-करते रात हो गई। दाह-संस्कार अगले दिन हुआ और उसमें भी दूरी के रहते गिनती के लोग आ सकें।
    सुशीला के मन में जैसे युद्ध चल रहा था। वह घर में अकेली थी। बेचैन इधर-उधर टहल रही थी। मन में अशांति और उथल-पुथल। श्याम बाबू समशान गए हुए थे।
    दावाजे पर दस्तक सुनते ही एक निश्चय मन में कर उसने दरवाजा खोला। श्याम बाबू काफी देर तक उसको देखते रहे और फिर आहिस्ता से बोले- जल्द ही घर लौट चलेंगे।
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समकालीन भारतीय साहित्य के अंक 187 सितम्बर-अक्टूबर 2016 में प्रकाशित 
  
 
 
 

13 अक्तूबर, 2016

जुगाड़ू लेखक का सम्मान

जुगाड़की महिमा निराली है। ऐसे ऐसे जुगाड़ सामने आते हैं कि देख-सुन कर आश्चर्य होता है कि ऐसा तो हमने कभी सोचा नहीं था। आज जब चारों तरफ जुगाड़ तो फिर साहित्य में क्यों नहीं? साहित्य का रोल वर्तमान में समाज ने गोल कर दिया है। साहित्य को समाज का पथप्रदर्शक और मशाल समझने का समय अब गया। अब तो इतने पथ है कि किसी पथ की कमी नहीं, फिर पथप्रदर्शक की जरूरत ही क्या? और ये मशाल वशाल तो पुरानी चीजें है। लाइट की जरूरत हो तो बहुत है हमारे पास और जुगाड़ के रूप में मोबाइल में लाइट है हरदम हमारे साथ। ऐसा पहले नहीं अब भी है कि साहित्य विशाल सागर है। जिसमें अनेक मछलियां और अनेक मगरमच्छ रहते हैं। साहित्य के कुछ तालाब भी है जहां मेढ़कों की एक पूरी फौज है। कुछ बाबाओं का रूप धारण कर खुद को आयोजनधर्मी बनाते हुए इतने चेलों का मुंडन कर दिया है कि पूछिए मत। हर तरफ बस उनकी ही जय-जयकार है। इन आयोजनधर्मी बाबाओं ने इतना जुगाड़ कर दिया है कि रात को किताब लिखो, सुबह पुरस्कार घोषणा। पुरस्कार और सम्मान किसे नहीं भाता? जो पुरस्कार और सम्मान के बारे में नकारात्मक बोलते हैं वे उनका बाहरी दिखावा होता है पर मन में भीतर तो यह लालसा ऐसी घर किए होती है कि वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। ऐसे ही एक जुगाड़ू लेखक का सम्मान होने जा रहा था और मुझ से उस पर आलेख मांगा गया। मैंने देखा कि छोटी उम्र में उसने कमाल तो कर दिया था, पर कमाल इतना भी नहीं था कि ऐसा धमाल किया जाए। जुगाड़ू लेखक के पास एक संस्था थी और वह पत्र-पत्रिकाएं भी निकालता था, तिस पर यह कि संस्था से पुरस्कार-सम्मान के आयोजन भी करता था। ऐसे आदमी को सीधे सीधे नाराज करना भला किसे अच्छा लगाता है। हमारे पूरे देश का यह मूल मंत्र है- ‘कोई कुछ भी करें, हमें क्या?’ फिर साहित्य और मैं भला देश-विरोधी थोड़े ही हूं कि इस मंत्र के बाहर कोई आचरण करने लगूं।
       लिखना बहुत आसान है। आप किसी पर लिखें कुछ बातें तो वर्षों पुरानी ही काम आती है। इस क्षेत्र में हमारी प्रगति यह भी है कि ऐसे कुछ आलेख भी तैयार है कि बस आप नाम बदल लें और वह किसी के भी काम आ जाएगा। फलां की जगह फलां नाम आजकल तो कंप्यूटर के तेज युग में पलक झपते ही हो सकता है। कटिंग-पेस्टिंग के इस दौर में जुगाड़ के पौ-बारह पच्चीस हो रहे हैं। कंप्यूटर का यह कमाल कि इतना सारा मैटर भर दिया है कि कहीं झोली फैलाने की जरूरत नहीं। किसी के मान-मनुहार में बीस नखरे उठाएं, इससे तो बेहतर है कि सर्च इंजन पर लिखिए कि आपको क्या चाहिए। और जिन्न की तरफ कंप्यूटर-स्क्रीन पर सब कुछ हाजिर हो जाता है। इसमें शर्म-संकोच करने की जरूरत नहीं है। आपके मन की दबी हुई सभी लालसाएं भी यहां फलीभूत हो सकती है। हुआ यह कि मैंने भी जुगाड़ू लेखक के सम्मान में प्रकाशित होने वाली स्मारिका के लिए आलेख का जुगाड़ कर लिया और जैसे ही भेजने वाला था कि मेरा अंतर्मन जाग उठा। मेरा अंतर्मन वैसे तो सदा सोया रहता है पर जब से घर में पंच काका आ गए हैं तब से वे कभी-कभार ऐसा कुछ कह देते हैं कि अंतर्मन की नींद खुल जाती है। बात नुकसान-फायदे की नहीं, बस मन की बात है कि मेरा मन जाग गया है। पंच चाचा ने कहा- ‘जुगाड़ू-सम्मान में आपने नाम को जोड़कर क्यों खराब करते हो। जो कुछ तुम्हारी गरिमा है, उसे बचाए रखो। जुगाड़ू के लिए तो तुमने नहीं लिखा तो वह तुम्हारा भी जुगाड़ कर लेगा।’