21 मार्च, 2018

बाल मनोविज्ञान के जादूगर / डॉ. नीरज दइया

बाल साहित्य को गंभीरता से अंगीकार कर विकसित करने का बड़ा कार्य करने वाले लेखकों में दीनदयाल शर्मा का नाम प्रथम पंक्ति में लिखा जाता है। दीनदयालजी ने बाल साहित्य की अलग अलग विधाओं में सतत रूप से हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में रचनाएं दी हैं। लेखन के साथ संपादन का कार्य भी महत्त्वपूर्ण कहा जाएगा। लंकेश्वर, महाप्रयाग, दिनेश्वर, दीद आदि अनेक उपनामों से भी आपने निरंतर लेखन किया है। शर्मा के लेखक का मिलनसार अर स्नेहिल स्वभाव का होना अतिरिक्त विशेषता कही जा सकती है।     आपका जन्म 15 जुलाई 1956 को हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गांव जसाना में हुआ। राजस्थानी बाल साहित्य की पुस्तकों की बात करें तो अब तक आपकी चन्दर री चतराई (1992), टाबर टोळी (1994), शंखेसर रा सींग (1997),तूं कांईं बणसी (1999), म्हारा गुरुजी (1999), बात रा दाम (2003) और बाळपणै री बातां (2009) आदि पुस्तकें निरंतर सृजन की साक्षी है। पाक्षिक समाचार पत्र टाबर टोल़ी का संपादन का श्रेय भी आपको ही है। सुणो के स्याणो, घणी स्याणप, डुक पच्चीसी, गिदगिदी आदि पुस्तकों की राजस्थानी में हास्य व्यंग्य के खाते बहुत कीर्ति है। 
    राजस्थानी में बच्चों के लिखते लिखते दीनदायल शर्मा ने कुछ आधुनिक कविताएं भी लिख कर व्यस्क लेखक होने का प्रयास किया है। आपकी नई कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रीत अर प्रीत’ राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इन की कविताओं में हम कवि का व्यक्तिगत जीवन अनेक प्रसंगों से जुड़ी उनकी हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति देख सकते हैं। वर्ष 1975 से आरंभ हुई आपकी लेखन यात्रा से भरोसा होता है कि राजस्थानी बाल साहित्य और दीनदयाल शर्मा एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं।
    कहा जा सकता है कि राजस्थानी बाल साहित्य की बात आरंभ करते ही पहला जो चेहरा स्मृति पटल पर कौंधता है वह दीनदयाल शर्मा का होता है। अपना सम्पूर्ण जीवन बाल साहित्य को समर्पित करने वाले शर्मा बाल मनोविज्ञान के जादूगर है। शिक्षा विभाग की नौकरी और बाल साहित्य सृजन में अपना मन रमने वाले शर्मा सदैव बच्चों के प्रिय शिक्षक और लेखक रहे हैं। साहित्य की यही लगन ऐसी है कि उन्होंने अपने पूरे परिवार को साहित्य से जोड़ कर एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। राजस्थानी भाषा-साहित्य के लिए परलीका तो एक साहित्यिक गांव है और दीनदयाल जी का पूरा -घर-परिवार साहित्यिक है, अस्तु उनका घर भी एक साहित्यिक तीर्थ है। 
    केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का बाल साहित्य पुरस्कार वर्ष 2012 का पुस्तक ‘बाळपणै री बातां’ के लिए अर्पित किया जाना पुरस्कार का सम्मान है। राजस्थानी संस्मरण लेखन के लिहाज से यह पुस्तक अब तक प्रकाशित पुस्तकों में अपना विशेष स्थान रखती है। युगबोध और विषयगत बदलाव के मानदंड से यह कृति महत्त्वपूर्ण है। इस पुरस्कृत पुस्तक में 47 आलेख हैं, जो अपनी सहज सरल भाषा और आत्मीय घटना प्रसंगों से जिस शिल्प में प्रस्तुत की गई है वह अनेक स्थलों पर बेहद मार्मिक है।
    बाल साहित्य लेखन के लिए पहली शर्त है कि बाल मन रचनाकार का होना चाहिए। वैसा बाल मन दीनदयाल शर्मा के पास वर्षों से है। बचपना इतना है कि ‘बाळपणै री बातां’ की भूमिका में मन की बातें वे इतनी लंबी खींचते हैं कि भूमिका ही किसी बाल-पुस्तक जैसी है। परिवार के बच्चों के बीच एक लेखक का खेलना-कूदना ‘बाळपणै री बातां’ में सांगोपांग उजागर हुआ है। इनके घर-परिवार के प्रतीक में हम समय के साथ बदलते अनेक बदलाव संकेत रूप में देख-समझ सकते हैं। बाल नाटकों में दीनदयाल शर्मा बेहद सावधानी से रचना करते हैं कि कम कालावधि और अनुकूल साज-सज्जा से आधुनिक नाटक खेले जा सकते हैं। ‘म्हारा गुरुजी’ बाल नाटक अपने व्यंग्य के कारण, ‘बात रा दाम’ चतराई की बात और ‘तूं कांईं बणसी’ अपनी शिक्षा के कारण स्मरणीय है। हिन्दी में भी आपरी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। जैसे- सारी खुदाई एक तरफ..., मैं उल्लू हूं (व्यंग्य) चिंटू-पिंटू की सूझ, पापा झूठ नहीं बोलते, चमत्कारी चूर्ण, बड़ों के बचपन की कहानियां, सूरज एक सितारा है, सपने, कर दो बस्ता हल्का, फैसला, फैसला बदल गया (बाल साहित्य) आदि।        
    देश और प्रांतीय अकादमियों से बाल साहित्य के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित दीनदयाल जी को अनेक संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से अनेक प्रसारण हुए हैं। अंतरजाल देखें तो केई ब्लोग, फेसबुक और यू-ट्यूब के आंगन में अपनी पूरी ऊर्जा और लगन के साथ दीनदयाल शर्मा का बहुत व्यापक मित्र और समार्थक परिवार देखा जा सकता है। दुनियाभर के अनेक कामों के बीच अब भी वे बहुत आराम से बात करते हुए राजस्थानी बाल साहित्य की समृद्धि का सपना संजोए हैं। बाल साहित्य के विकास हेतु त्रैमासिक पत्रिका पारसमणि का प्रकाशन उनके इसी सपने का परिणाम है। टाबर टोल़ी पाक्षिक का नियमित प्रकाशन हो रहा है और अनेक संभावनाएं अभी भविष्य के गर्भ में है। देखें आने वाले समय में 60 वर्षीय युवा दीनदयाल शर्मा व्यस्क कवि के रूप में साहित्य में नजर आएंगे या फिर प्रेमचंद जी की उक्ति बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है को सिद्ध करते हुए बच्चों के लिए सृजन करते रहेंगे। वैसे वे दोनों काम एक साथ करने में भी समर्थ है। उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं।
०००००

18 मार्च, 2018

मेरे लिए हर रचना अपनी ही तलाश है : डॉ. नीरज दइया

डॉ.नीरज दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत
(मेरे लिए हर नयी रचना स्वयं की तलाश है, यह कहते हैं, कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में जाने माने नाम डॉ. नीरज दइया। आपने “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर शोध किया है। आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें राजस्थानी और हिंदी में प्रकाशित हुई है। डॉ. दइया को साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा मुख्य पुरस्कार एवं बाल साहित्य पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों मान-सम्मानों से नवाजा जा चुका है। डॉ. दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं)

'बिना हासलपाई' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (राजस्थानी) की घोषणा से कैसा अनुभव कर रहे हैं?

पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता, जाहिर है मुझे भी अच्छा लगा किंतु बहुत आश्चर्य हुआ कि गत वर्ष कहानीकार बुलाकी शर्मा और उनसे पूर्व उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह पुरस्कार मिला था। संयोग से दोनों कथाकार बीकानेर के हैं। इस बार बीकानेर में यह तीसरा पुरस्कार प्रमाणित करता है कि अकादेमी और निर्णायकों के मूल्यांनक में पुस्तक ही सर्वोपरि होती है। लेखक के लिए कोई भी पुरस्कार सामाजिक प्रतिष्ठा के अतिरिक्त कुछ महत्त्व नहीं रखता है। बतौर लेखक यह पुरस्कार मेरे लिए नई जिम्मेदारियां लाया है।
राजस्थानी के समकालीन परिदृश्य को किस रूप में देखते हैं?
‘बिना हासलपाई’ आधुनिक राजस्थानी कहानी पर केंद्रित पुस्तक है। भारतीय कहानी अथवा साहित्य का चेहरा हिंदी के साथ प्रादेशिक भाषाओं से निर्मित होता है। राजस्थानी भाषा के समकालीन साहित्य को हिंदी और अन्य भाषाओं के साहित्य से कदम मिलाकर चलने के साथ ही उसका लौकिक स्वरूप और माटी की सौंधी महक को भी संजोए रखना चाहिए।
हिंदी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में कई विधाओं को एक साथ कैसे साध पाते हैं?
मेरे लिए जीना और लिखना पर्याय है। वैसे लेखन के संस्कार मुझे मेरे दिवंगत लेखक पिता सांवर दइया से मिले हैं। मैं केवल लिखने के नहीं लिखता हूं, मेरा मानना है कि मेरे भीतर एक बेचैन लेखक रहता है। वही मुझे लेखन के लिए बाध्य करता है। उसे प्रतिदिन लिखने के लिए अवकाश देना मेरी नियति है। राजभाषा हिंदी व मातृभाषा राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने को मैं देशभक्ति और मातृभक्ति से रूप में देखता हूं। शरीर को हिंदी और आत्मा को राजस्थानी पोषित करती है। विधाओं का चयन परिस्थितियां और सम-सापेक्ष है।
कभी ऐसा लगा कि आलोचना की राह में बहुत कांटे हैं?
बिल्कुल, ऐसे कांटें हैं जिन को चाह कर भी कोई बुहार नहीं सकता है। किसी रचना अथवा रचनाकार की आलोचना एक अंगुली से संकेत करने जैसा है। जब हम किसी दिशा में एक अंगुली करते है तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ स्वतः मुड़ जाती है। खुद से मैं तीन सवाल करने के बाद ही प्रतिपक्ष से सवाल किए जाने के पक्ष में हूं। आलोचन में अनेकानेक सवालों से मुठभेड़ होती है। कृति और कृतिकार की दिशा से मैं चीजों को देखने-समझने का प्रयास करता हूं। किसी रचना के प्रति पूर्वधारणाओं की बजाए नए आयुधों की तलाश में रहता हूं। परंपरा और आधुनिक विकास-यात्रा में रचना के मर्म को जानना-समझना और मूल्यांकन करना हमारे पाठ के आनंद को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसलिए सच्ची, खरी और बेलाग आलोचना तो सदा हमारे पाठक ही किया करते हैं।
आपने अनुवाद के क्षेत्र में खूब काम किया है। अनुवाद के लिए रचना का चयन कैसे करते हैं?
अनुवाद को मैं अनुसृजन मानता हूं। किन्हीं दो भाषाओं के बीच पुल बनाने का काम अनुवाद से संभव होता है। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना जैसे अनेक रचनाकारों से भारतीय साहित्य का चेहरा बनता है। इनको अपनी भाषा में लाकर मैंने भाषा के सामर्थ्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया है। अनुवाद का चयन रचना और रचनाकार की गुणवत्ता से स्वयं प्रभावित होकर करता हूं। भारतीय कविता की एक झांकी देखने दिखाने के लिए ‘सबद-नाद’ में लगभग सभी भारतीय भाषाओं की कविताएं राजस्थानी में देख सकते हैं।
अन्य भाषाओं से राजस्थानी में हुए अनुवाद की तुलना में राजस्थानी से अन्य भाषाओं में अनुवाद बहुत कम हुए हैं?
राजस्थानी भाषा की रचनाओं को अधिक मात्रा में हमें हिंदी और अंग्रेजी में लाना होगा। माध्यम भाषा से फिर आगे अनुवाद होने संभव हो सकेंगे। मोहन आलोक की काव्य-कृति ‘ग-गीत’ का मेरा हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। अब मधु आचार्य ‘आशावादी’ के उपन्यास ‘गवाड़’ का हिंदी अनुवाद आने वाला है।
खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- कवि, आलोचक, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, अनुवादक या संपादक?
मैं मूल रूप से तो इन सब का एक आवास-स्थल हूं। मेरे भीतर का लेखक ही हर बार यह चयनित करता है कि वह क्या करने वाला है। मैं लेखक के रूप में लिखने की कोई मशीन नहीं हूं, रचना के समय ही सब कुछ निर्धारित होता है। बादल आते हैं तब यह कहां तय होता है कि वे बरसने वाले हैं। कभी कभी किसी विधा का एक दौर चलता है जैसे बरसात की झड़ी लगती है।
आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता क्या है?
मैं अपने भीतर के लेखक को कभी दायरों में कैद करने के पक्ष में नहीं हूं। कुछ मित्र मेरे लेखन के आधार पर मुझे वाद अथवा धाराओं में बांधते हैं और मैं उनकी घोषणाओं पर सहमति प्रकट करता हूं किंतु मैं हमेशा के लिए यहीं स्थिर रहूंगा यह वादा नहीं कर सकता। मेरी आस्था विचार के स्तर पर सही के पक्ष में खड़ा रहने की मेरी आस्था है और रहेगी।
आप किन लेखकों से प्रभावित हुए?
मेरा सौभाग्य यह रहा कि मैं लेखक सांवर दइया के घर जन्मा और मेरे अनेक गुरुजन साहित्य-लेखन से जुड़े थे। दिखावा नहीं करता कि फलां-फलां को पढ़ा और प्रभावित हुआ। अनेक देशी-विदेशी लेखकों से सीखने का प्रयास किया है। जब भी कोई नई रचना लिखता हूं तो मेरा पूर्व अध्ययन अथवा लेखन-कौशल काम नहीं आता। मैं हर बार खुद को खाली हाथ पाता हूं और अनुभूति के महासागर से रचना में कुछ नया लेकर लौटने का प्रयास करता हूं। मेरे लिए रचना स्वयं की तलाश है। मैं प्रयास करूंगा कि अपने लेखन की योजनाओं को फलीभूत कर सकूं।
राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से क्या हिंदी कमजोर हो जाएगी?
यह कुछ मूढ़ों ने भ्रम फैलाया है कि हिंदी कमजोर हो जाएगी। आदिकाल से हिंदी को राजस्थानी पोषित करती रही है। पृथ्वीराज रासो से मीरा तक की यात्रा के बाद आधुनिक काल में तो हिंदी के हित में राजस्थानी ने अपना बलिदान दिया। राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी उऋण ही होगी।
०००००००००

15 मार्च, 2018

रंग-भंग यानी रंग में भंग

डॉ. नीरज दइया
    पंच काका कुछ उदास और खोए-खोए से लग रहे हैं। उनकी यह हालत देखकर पूछा- काका, क्या बात है? तबियत तो ठीक है ना? वे बोले- तबियत को क्या हुआ है, और अब हो भी क्या सकता है? अब तो उसके घर से बुलावा आना बाकी है, देखते हैं कब बुलाता है। ऐसी वीत-राग सुनकर मैंने उन्हें टोका- काका! ऐसा क्यों सोचते हो, अभी तो बहुत काम बाकी है। माना कि आपने एक उम्र गुजार दी पर अभी इतने बूढ़े भी नहीं हुए हैं। काका असहज हो गए और बोले- बूढ़ा तो उसी दिन हो गया जिस दिन तेरी काकी इस संसार से गई, वह अब मुझे बुला रही है। मैंने मजाक में कहा- काका अब तो होली आने वाली है, उसके बाद ऐसी बातें करना। ऐसा मजाक मत करो जो सहन नहीं हो। अभी तो कुछ रंग-भंग की बातें कीजिए। मैंने सोचा कि काका कहेंगे- जा बेटा, भांग ले कर आ, पर हुआ उल्टा ही। काका हंसे और बोले- एकदम ठीक, जीवन से यह मेरा रंग-भंग ही तो गया है। तेरी काकी गई भगवान के पास और अब मुझे वहां से आवाजें दे रही है। बार-बार कहती है कि कब आओगे। अब आना-जाना मेरे हाथ में तो नहीं है।
    मैंने अब साफ-साफ कहना ठीक जाना- काका, भांग लेकर आता हूं। आज हो जाए कुछ... । काका ने फिर टोक दिया- नहीं अब काहे का भांग-धतूरा। ये मोदी जी ने सारे देश के रंग में भंग डाल दिया रे। पूछ मुझसे कि कैसे? मैंने पूछा- कैसे? उन्होंने चिंतन की मुद्रा बनाते हुए कहा- मैं बताता हूं, पहले नोटबंदी फिर होंठबंदी और अब ऊपर से ये जीएसटी। कर दी ना चौपट सारी होली। मैं होली को ऐसे कैसे चौपट होने देता, तुरंत बोला- इसमें भला क्या तुक है? ऐसे-कैसे चौपट हो गई होली? होली तो होगी और खूब जोरदार होगी देखना।
    काका जरा तेश में आ गए- बोले बेटा, कैसे होगी होली... मैं भी देखता हूं। अगर होली होगी तो स्वच्छा अभियान को क्या बोलेगे। अब तो है तुक, बोलो। हर बात में तुक खोजते हो, भला जीवन कोई पुरानी कविता है कि हर बंध में कोई न कोई तुक होगा ही होगा। बेतुके लोग और तुक की उम्मीद करते हो। चलो मिला दिया हमने तुक। होली में तुम पानी को बर्बाद करोगे और चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़ कर दोगे, फिर यह कौनसा अभियान हुआ? भैया बताना जरा! और हां, रंग खेलोगे तो क्या गंदगी नहीं होगी? मैंने माथे पर सलवटे डाल ली और बोला- रंग में कौनसी गंदगी हुई, रंग तो खुद ही स्वच्छता है काका। काका कब हार मानने वाले थे, बोले- तो फिर आर टी आई लगा के खुद मोदी बाबा से ही पूछ लेता हूं कि होली में गंदगी होगी या फिर स्वच्छ होगी। अगर स्वच्छा ही होती है तो फिर भैया रोज खेलो होली और कर लो पूरा देश स्वच्छ। ये दो तरह की बातें नहीं चलेगी। होली पर क्या स्वच्छा अभियान को ऑफ कर दोगे एक-दो दिन के लिए या फिर मदिरा की दुकानों जैसे होली का भी कुछ सरकारी टाइमिंग कर दोगे। अब तुम कहोगे- मैं कौन होता हूं टाइमिंग करने वाला या फिर ऑन-ऑफ वाला। तो मितरों देश ऐसे नहीं चलता...
    मैं एकदम फेड-अप हो गया। एक छोटी सी बात को ये बुढ़ऊ काका कहां से कहां ले गए। काकी जब से स्वर्गवासी हुई जरा सठिया गए हैं। हम सोचते हैं कि बड़े-बूढ़े हैं और उनसे बात करनी चाहिए पर यह तो जैसे हर बात में मोदी जी को लेकर आ जाते हैं, जैसे हम मोदी जी सगे-संबंधी है और इनकी बात उन तक पहुंचा देंगे। समझ नहीं आता- अब काका जी से आगे क्या बात करूं । कोई बहाना बना कर मैं तो खिसकता हूं। आप में बहुत हिम्मत हो तो कर लो काका जी से होली की राम-राम। पहले से कह देता हूं- जरा टाइम निकाल कर आना, फिर ना कहना कि ऐसा तो कहा नहीं था।  
०००००