28 फ़रवरी, 2017

याद नहीं अब कुछ

साहिर लुधियानवी साहब का बहुत पुराना गान है जिसमें नायिका नायक को भूलने की बात पर कहती है कि मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है। नए संदर्भों में यह गाना आब बेहद प्रासंगिक हो गया है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी को हक था कि उन्होंने बड़े नोटों को एक झटके में भूलाने का प्रबंध कर दिया। नोटों से हमारी मोहब्बत बहुत पुरानी थी, भला ऐसे कैसे भूल जाएं। काश ‘भूल जाना’ कहना जितना आसान है, उतना ही असल में भूल जाना आसान होता। कुछ कहना सरल होता है, और कहे हुए को लिखना भी अधिक कठिन नहीं होता, पर कहे-लिखे पर अमल करना बेहद कठिन होता है।
           प्रेम में सब कुछ भूला जा सकता है, पर नोटों से ऐसा प्रेम करने वाले भी है जिन्होंने सब कुछ भूला कर बस नोटों को ही याद रखा है। राम-राम जपना, पराया माल अपना.... की तर्ज पर वे सबका माल अपने माल में शामिल करते चले आ रहे थे कि जैसे चालीस चोरों के सामने अलीबाबा आ गए। सारे चोरों ने शोर मचाया- ‘उड़ी बाबा, उड़ी बाबा।’ पर किसी ने नहीं सुना। असल में ये हुआ था कि ऐसी घोषणा सुन कर सारे चोरों की जबान तालु के चिपक गई। साथ में पैर भी जमीन से चिपक गए। वे हिल-डुल भी नहीं सके। ऐसे सुन्न हुए कि अब तक होश नहीं आया है। भूल गए सब कुछ, याद नहीं अब कुछ.... गाने में तो नायक ‘जूली’ की याद में सब कुछ भूल कर, केवल अपने प्यार को याद रखे जाने का ऐलान करता है। आनंद बक्षी साहब के इस गाने का यदि आप स्मरण करें तो पाएंगे कि इसमें सार की बात कही गई है। वैसे बात तो नायक और नायिका की है, पर अब बात बड़े नोटों पर लागू हो रही है। इतना भी दूर मत जाओ कि पास आना हो मुश्किल, और इतना भी पास मत आओ कि दूर जाना हो मुश्किल। यानी धन से पर्याप्त दूरी जरूरी है। नोटों में चोर तो ऐसे घुल-मिल गए कि उन्हें होश ही नहीं था कि ऐसा कुछ हो सकता है।ऐसो को भला कहां याद रहता है कि किस-किस का कहां-कहां से खजाना लूटा। लूटे और लुटे हुए का हिसाब बड़ा कठिन है। बचते-बचाते फिरो अब। अगर पकड़ कर धर लिए गए तो हिसाब कैसे दिया जाएगा। प्यार के मामले में तो ‘आई लव यू’ कहा और काम चल गया। इनकम टेक्स वाले बेदर्द होते हैं, उनके लिए ‘आई लव यू, धाई लव यू’ कुछ नहीं होता। वे बस इतना ही पूछते हैं- ‘आयो कहां से धनश्याम, रैना बिताई किस धाम.. हाय राम।’ इनकम टैक्स के इस अनोखे गीत-संगीत से डरने वाले अब निर्धनों की मनुहारें कर रहे थे- ‘ले लो ना भैया। भाई साहब आप ले लो। बहन जी आप ले लो। अपने खाते में जमा करा दो। जब जी में आए देना। जितना मन करे देना। चलो नहीं देना। जब आप को लगे कि दे सकते हैं, तब देना। सच्ची कसम से हम नहीं मांगेंगे। आपको दे कर ये गाना गाएंगे- ‘भूल गया सब कुछ, याद नहीं अब कुछ....। ’काश ! ये धनवान लोग पहले कभी अपना जरा-सा भी प्यार दिखाते। अरे हमें नहीं तो अपनों को और अपने आस-पास वालों पर ही दिखाते। जिसके पास भरा-पूरा तालाब है। वे आप जितना पीना है, पी लें भाई। नहाना है तो नहा लो। पर अपने आस-पास जो प्यासे मार रहे हैं, उधर भी मुंडी धुमा कर देख लो। कुछ बूंदें या एक-आध गिलास उन बेचारों के नाम कर दो। मान तुम्हारा और तुम्हारे बाप-दादों का धन है। वे यहां छोड़ गए थे। जाते-जाते तुम भी छोड़ जाओगे। कल किसने देखा भैया। यहां का हिसाब यहीं है। पंच काका कहते हैं- ‘काल करे सो आज कर। आज करै सो अब।’ भैया, अब तुम्हारी दौलत तुम से कह रही है- ‘तुम मुझे भूल भी जाओ, ये हक है तुमको..।’

* नीरज दइया

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें