27 अप्रैल, 2017

राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी : देवकिशन राजपुरोहित

बातचीत / डॉ. नीरज दइया

     श्री देवकिशन राजपुरोहित एक ऐसा नाम है जिनके परिचय में कुछ कहा जाना इसलिए जरूरी नहीं है कि उनके बारे में हम सब बहुत कुछ जानते हैं। बहुत कुछ जानते हुए भी उनके अनेक पहलुओं से हम अब भी अनजान हैं। आपकी लंबी साधाना के अनेक मुकाम है। शिक्षा विभाग में शिक्षक, बाद में पत्रकार और संपादक के साथ यायावरी का आपको लंबा अनुभव है। राजस्थानी और हिंदी की विविध विधाओं में विपुल साहित्य सृजन करते हुए अनेक दौर आपने ना केवल देखे-सुने वरन अनुभूत किए हैं। कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, संस्मरण आदि में सृजनरत रहते हुए वे देश-प्रदेश की राजनीति, समाज और साहित्य के अनेक पक्षों के गंभीर जानकार के रूप में पहचाने गए हैं। आपने लोक साहित्य और संस्कृति का विशद अध्ययन, मनन और चिंतन किया है। देश-विदेश की अनेक यात्राएं की हैं तो आप राजस्थानी भाषा के प्रवल पैरोकार और प्रखर वक्ता हैं। छद्म और आड़म्बर से परे सदा खरी-खरी बात कहने वाले आप समालोचक हैं। मीरा के जीवन और साहित्य पर काम करने वाले विशेष विद्वानों की श्रेणी में आपकी गणना देश में कोटी के शोधकर्ता के रूप में की जाती हैं, इन सब से परे आप हमारे ऐसे आत्मीय पुरखे है जो सभी छोटे, बड़े और अपने समव्यस्कों पर समान रूप से स्नेह और आत्मीयता की वर्षा करते हुए अविस्मरणीय-अद्वितीय इंसान है। हमारे आग्रह पर ‘मरु नवकिरण’ के लिए खास तौर से एक संवाद कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने राजपुरोहित जी से किया है। यहां प्रस्तुत है चयनित अंश। -संपादक

० इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?
- लिखे बिना किसी भी लेखक का जीना संभव नहीं। वह अगर लेखक है तो उसे अपना लेखन जीवित रखना चाहिए। इन दिनों में व्यंग्य लिख रहा हूं, कुछ विषयों पर स्वतंत्र निबंध लिखें हैं तो इन दिनों कुछ समसामयिक निबंध भी मैंने लिखे हैं। कुछ छपे हैं पत्र-पत्रिकाओं में और कुछ छपने वाले हैं।
० आप अनेक विधाओं में सृजनरत रहे हैं तो जाहिर है कि एक जिज्ञासा है कि आपकी प्रिय विधा कौनसी है?
- लेखक की प्रिय विधा जैसा कोई विचार मैंने नहीं किया। मैं या कोई भी लेखक जिस समय जिस विधा में काम करता है वह उसकी प्रिय विधा ही होती है। लगभग सभी विधाओं में काम करते हुए मैंने अपने लेखन से प्रेम किया है। विधाएं मेरी प्रिय रही हैं फिर भी अगर इसका जबाब ही देना हो तो मैं अपनी प्रिय विधा के रूप में उपन्यास, संस्मरण और व्यंग्य का नाम लेना चाहूंगा।
० आप को क्या कहलाना पसन्द है- आपके अनेक रूप हैं- पत्रकार, संपादक, साहित्यकार, व्यंग्यकार, हिंदी लेखक, राजस्थानी रचनाकार, गुरूजी, फिल्मी कलाकार, दाता अनेक नाम हैं। आप बहुत से क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं।
- इन सब रूपों में तो मैं हूं ही लेखन इन सब से पहले मैं एक संवेदनशील इंसान के रूप में खुद को पाता हूं। मुझे घर-परिवार और देश-दुनिया की बहुत सी बातें प्रभावित करती है। मैं अपसंस्कृति और विकृत होती मानसिकता से बहुत आहत होता हूं। मैं कोई योद्धा या नेता तो हूं नहीं। अब राजा-महाराजा का युग भी चला गया। ऐसे में किसी परिवर्तन के लिए कोई एक आदेश कहीं से जारी नहीं हो सकता। मेरे पास मेरे शब्द हैं जो मैं एक साहित्यकर और पत्रकार के रूप में काम में लेता रहा हूं। मैं असल में अनेक रूपों में खुद के भीतर एक साहित्यकार और पत्रकार को सदा महसूस करता हूं। मेरा संपादक होना भी इसमें सामिल है। वैसे फिल्मी कलाकार आदि के रूप में कभी कार्य कर लेना तो केबल रूचि है।
० भाषाओं की बात करें तो आप खुद को हिंदी साहित्यकार कहेंगे या राजस्थानी साहित्यकार?
- पहले राजस्थानी और बाद में कोई दूसरा। राजस्थानी हमारी मातृभाषा है। मां का दर्जा कोई नहीं ले सकता। मां आखिर मां होती है और हरेक की होती है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। मां भाषा राजस्थानी से रक्त का संबंध है तो हिंदी ने हमें संस्कार और रोजी-रोटी दी। दोनों का ही ऋण है। राजस्थान तो नमक के लिए विख्यात है कि हम राजस्थानी हिंदी की अवमाना कर ही नहीं सकते हैं। देशभक्ति और स्वाभिमान हमारे रक्त में है।
० आपने पहले राजस्थानी में लिखा या हिंदी में?
- जिसे लिखना जैसा कुछ कहा जा सकता है तो वह राजस्थानी में ही लिखा। राजस्थानी से ही मैंने हिंदी को सीखा। आगे चल कर राजस्थानी से ही बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान कराया। राजस्थानी में पत्रकारिता का सपना देखा। काम भी किया। किसी काम की सफलता और असफलता से बड़ी बात मैं किसी काम को अंजाम देने को मानता हूं। पत्रिकारिता के इतिहास जब कभी लिखा जाएगा उसमें ‘मरुधर ज्योति’ पत्रिका की चर्चा जरूर होगी। राजस्थानी के लिए दिन-रात एक किया है। भाषा, साहित्य के काम के लिए ना दिन देखा ना रात। पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूं इसलिए कह सकता हूं कि दिन-रात कुछ नहीं होता बस काम ही काम होता है। दुनिया जब सोती हैं तब पत्रकार और लेखक जागते हैं।   
० आप एक पत्रकार और साहित्यकार के लेखन में क्या कोई अंतर पाते हैं?
- अंतर इन दोनों के लेखन के जीवन को लेकर है। पत्रकारिता में लिखा हुआ शब्द समय विशेष तक जिंदा रहता है। आज का अखबार कल बासी हो जाता है। पत्रिकाएं जब नई पत्रिका आ जाती है तो पुरानी हो जाती है। साहित्य में कालजयी साहित्य टिका रहता है। किताब कभी पुरानी नहीं होती। आज का अखबार पांच-दस वर्ष बाद फिर से नहीं प्रकाशित होता जब कि किताबों के नए संस्करण प्रकाशित होते हैं। लोकप्रियता लेखन की लंबे समय तक रहती है। मेरा मानना है कि जो सामयिक और अच्छा लिख पाते है वे पत्रकार ही साहित्य-लेखन में सफल होते हैं। जो खुद को केवल खबरों तक सीमित रहते हैं, वे केवल पत्रकार ही रहते हैं।
० अपने लेखन के विषय में क्या कहना चाहते हैं?
- मैं वर्ष 1967 से निरन्तर लिख रहा हूं। नवरात्रि 2017 में मेरे लेखन के 50 वर्ष पूरे होंगे। मैं सबसे पहले नवज्योति में 1967 में छपा था। मुझे याद है तब भी नवरात्रि ही चल रही थी। अब तक मेरी 65 पुस्तकें आ चुकी है। आगमी दिनों में एक बड़ा अभिनंदन कार्यक्रम और ग्रंथ मित्रों द्वारा प्रस्तावित है।
० राजस्थानी की मान्यता के विषय में आपका क्या मानना है?
- मैं तो राजस्थानी के सुनहरे भविष्य को देखता हूं। पूरे दावे के साथ कह रहा हूं कि राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी। आज नहीं तो कल इस भाषा को मान्यता देनी ही पड़ेगी। मान्यता देने में देरी कर सकते हैं पर इसे मान्यता मिलना अटल है।
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दो नंबर की बही

खुद को सभी नंबर वन मानते हैं और चाहते है कि सदा-सदा के लिए वे नंबर वन पर ही बने रहें। जिंदगी के खेल में पास-फेल का सिलसिला चलता है। जैसे धूप-छांव वैसे ही नंबर वन-टू। अंधेरे के साथ उजाला जरूरी है और काले के साथ सफेद। जीवन में इसी विरोधाभास के कारण गति है। वन-टू का फोर करने वाले गति को पसंद करते हैं। गति कैसी भी हो, संतुलन की मांग करती है। हमारा सार्वजनिक जीवन वन है तो निजी जीवन टू है, इन दोनों के बीच संतुलन होना फोर है। सेठ हीरालाल जी सर्दियों के मौसम में अपने कोट की एक जेब में चना-चबेना, मूफली और दूसरी जेव में काजू-बिदाम, किसमिस रखा करते थे। उसका संतुलन यह था कि कोई उन्हें देखता अथवा मिल जाता तो वे सेठजी बन कर काजू-बिदाम की जेब से अपना सार्वजनिक जीवन उजागर करते, और निजी जीवन में वह चने-चबेने, मूफली से काम चलते। मूल बात यह है कि हम जो असल में होते हैं, वह असल में दिखना पसंद नहीं करते हैं। असल में हैं चोर, और बन कर घूमते हैं साहूकार। झूठे-मक्कार लोग सदा हरीशचंद्र का मुखौटा लगाए घूमना चाहते हैं। दागी बेदाग दिखाना चाहते हैं। कुछ मुखौटे इतने पुराने हो चले हैं कि अब उनके असली चेहरा खुद-ब-खुद झांकने लगे हैं।
जीवन के हिसाब-किताब की दो बहियां होती है। एक असली, दूसरी नकली। एक में काला धन और दूसरी में सफेद धन। हमारे निजी जीवन में वैसे ही बहुत कुछ काला होता है, जिसे हम सफेद करते हैं। करना चाहते हैं। कला छिपाना कला है। ठीक वैसे ही जैसे दो नंबर को एक नंबर करना। लेखक ईनामदार होते हैं, उनके काले-सफेद और सफेद-काले के चक्कर होते हैं पर ऐसा करने में उनकी आत्मा लहूलुहान हो जाती है। लेखक होना यानी एकदम सच्चा और ईमानदार होना है। लेखक से बेईमानी की उम्मीद किसी को नहीं होती। ना पक्ष और ना विपक्ष को। अगर लेखक ही बईमानी करने लगा, तो समाज का क्या होगा? नैतिक शिक्षा कौन देगा? लेखक का भ्रष्ट होना पूरे समाज और तंत्र का भ्रष्ट होना है। इसलिए लेखक का सदा स्वच्छ रहना और बेदाग होना जरूरी होता है। लेखक स्वच्छ हो, या नहीं हो, वह स्वच्छ दिखना चाहिए। धुला-धुला, निरखा-निखरा। उसका काम समाज की गंदगी और बुराइयों को दूर करना है। वह खुद मैला-कुचैला या ऐसा-वैसा कैसे हो सकता है? अगर वह गंदा और बुरा हो जाएगा तो उसे लेखक कौन कहेगा! प्रेमचंदजी ने लेखकों को बहुत पहले ऐसी मशालें हाथों में थमा दी कि उन्हें तब से अब तक सदा आगे चलने वाला ही माना जा रहा है। वे समाज को रोशनी दिखाने वाले हैं। महानता का लबादा पहने हुए हमारे लेखक भले थक जाए पर उन्हें आगे ही चलना है। लेखकों का यह फर्ज है कि वह बुरे को अच्छा देखे और उसे अच्छा बनाकर प्रस्तुत करे। बुरे को बुरा कहने की सामाजिक मानसिकता बदल चुकी। क्यों कि जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये। इसलिए बुरा कहीं है ही नहीं। यह भी कितना नेक और पवित्र विचार है कि यदि करनी है तो बुराई से नफरत करो, बुरे से नहीं। अस्तु बुरा यानी नंबर टू तो सदा प्यार के काबिल है। फिर दो नंबर बही को एक नंबर की बना देना ही कला है। हमें दो नंबर को असली कहना है। लोगों का क्या है, लोग तो वही मानेंगे, जो हम कहेंगे।
पंच काका कहते हैं कि नकली को असली जैसा प्रस्तुत करना ही वर्तमान समय की कला है। बही कैसी भी हो वह सदा नंबर वन ही होती है। नंबर टू तो दिखाई नहीं जाती। धन काला हो या सफेद, उस पर उसका नाम काला या सफेद नहीं लिखा होता। नोटों की माया इतनी मोहक होती है कि उसकी बढ़त में बुरे से बुरा अच्छा हो जाता है। लक्ष्मी में इतनी शक्ति है कि वह स्वयं तो पूजनीय है ही, साथ ही वह जहां और जिसके पास रहती है उसे भी पूजनीय बना देती है।

 ० नीरज दइया


 

19 अप्रैल, 2017

सबकी अपनी-अपनी दुकानदारी

ह नाहक दुख की चर्चा क्यों है? अभी तो हमारे अच्छे दिन है। यह संसार सुखी लोगों से भरा पड़ा है। सुखी लोग यानी- खाने और रोने वाले लोग। जागने वाले और रोने वाले लोग सुखी नहीं होते। जिनके भाग्य में जागना और रोना लिखा है ऐसे दुखी लोग गिनती के होते हैं। यह उनके भाग्य की बात है। कर्मों का लेखा है। इस रहस्य को वर्षों पहले कबीरदास ने उद्घाटित किया- ‘सुखिया सब संसार है, खावे और सोए। दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए।’ जागने वाला और रोने वाला कोई कबीर सरीखा बिरला व्यक्ति होता है। आज सब की अपनी-अपनी दुकानदारी है, कोई कबीर जैसा कहां है। दुकानदारी के चलते सभी खाते हैं और सो जाते हैं। कौन भूखा है, यह सोचने-जानने की जरूरत किसे है? हमने जब खा लिया और चैन से सो लिए, तो हिसाब यही कहता है कि अपनी दुकानदारी में लगे रहें। अपने खाने और सोने की चिंता करना ही अच्छे दिन होते हैं। दुखिया दास कबीर पहले एक थे। अब बढ़ कर कितने हो गए होंगे। ऐसे दासों की परवाह सुखिया संसार के प्राणियों को बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। बात जब खाने की चली है तो जैसे किसी ने दुखती रग पर हाथ रख दिया है। क्या बताएं भैया, बुरा हाल है। खाना सबका अपना-अपना निजी होता है। किस घर की देगची में क्या पक रहा है, इसकी चर्चा बाजार तक जा पहुंची है। यह हमारी निजता पर हमला है। व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है। कबीर कभी मारे नहीं जा सकते हैं। वे मर भी जाते हैं तो उनका रोना जारी रहता है। उस आसन को कोई दूसरा संभाल लेता है। हमें क्या खाना है और क्या नहीं खाना, इस पर गहन चिंतन-मनन किया जा रहा है। क्या हम नहीं जानते कि शाकाहार स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। वनस्पति और जीव-जंतु दोनों की जान में अंतर होता है। देश की एकता और अखंडता विषय पर महाकवि दिनकर ने चिंतन करते हुए लिखा कि शाकाहार को राष्ट्रीय आहार के रूप में पूरे देश में अपनाया नहीं जा सकता है। कवयित्री मीरा कहती हैं- ‘भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई!’ जगत को देख कर मीरा को रोना पड़ा पर कबीर तो रोते हुए जागते रहे। उन्हें नींद नहीं आई। उनका रोना किसी ने नहीं देखा। इसलिए उन्होंने इस सच्चाई को लिख दिया। एक युग मीरा का था तब सभी लोग भगत नहीं थे। एक युग आज का है तब भी सभी लोग भगत नहीं हैं। इस जगत में भगवा धारण किए हुए कुछ भगत हैं, तो कुछ बिना भगवा के भी भगवा के भगत हैं। बाकी बचे हुए रंग-बिरंगे जगत के लिए भी अपनी दुकानदारी है। यहां दो पाट दो दुकानदारियों के हैं। लगता है कि अब साबुत नहीं बचेंगे। दुकानदारी का यह चक्कर है कि एक चालू और चलती दुकान में जो सामान है, नियम बना दो कि वही बेचा जाएगा। बाकी सभी दुकानदारियां फेल हैं, सारी बेकार है। आप सुखी संसार में खाना और सोना चाहते हैं तो कबीर की बात मान लो। किसी बिल में एक बिल पास हुआ मान लिया जाए कि जगत की सारी दुकानें आज से घास बेचा करेंगी, जिसको खाना हो खाओ। अच्छे दिन हैं कि सभी घास खाएं और रोएं। माना कि आपने आज तक घास नहीं खाया तो क्या आगे भी नहीं खाएंगे। हम घास खिला के रहेंगे। पंच काका कहते हैं कि प्रजातंत्र में कानून सर्वोपरि होता है। शाकाहारी कानून बना दिया है तो परेशानी किस को है। अब शेर राजा भी घास खाएगा, और कभी मांस खाने की इच्छा होगी तो छिप कर कहीं गुप-चुप खा लेगा। फिर स्टेज पर आकर घास के पास मुंह किए खड़ा होकर शाकाहार का विज्ञापन करेगा। शेर-चूहे सब की अपनी दुकानदारी है। जब बात देखने-दिखाने की हो तो सब कुछ सही और सलीके से होना चाहिए। अच्छे दिन यही है कि चूहे-शेर मिलकर करे कुछ भी, पर यह नाहक दुख की चर्चा क्यों है? 
- नीरज दइया 

13 अप्रैल, 2017

व्यंग्य की ए बी सी डी

पंच काका ने पूछा- व्यंग्य क्या होता है? यह सवाल सीधा है पर मुझे इसका कोई सीधा जबाब नहीं सूझ रहा था, इसलिए कहा- व्यंग्य व्यंग्य होता है। यही सवाल अगर बादशाह अकबर बीरबल से पूछते तो जाहिर है बीरबल कहते- जहांपना मैं कल जबाब दूंगा। बीरबल के जितने भी जबाब है वे तुरंत नहीं दिए हुए है। बीरबल से हमें सीखना चाहिए कि तुरंत जबाब देने में खतरा है। किसी भी सवाल को कल पर टालना ही समझदारी है। सोचने के लिए समय मिल जाता है। पंच काका मेरा समय लेने के मूड में थे, इसलिए उन्होंने फिर कहा- ये भी भला क्या जबाब हुआ कि व्यंग्य व्यंग्य होता है। यह तो वही बात हुई कि दो दोस्तों को उनके घरों के बारे में पूछा गया तो पहले ने जबाब दिया- मेरा घर इसके घर के सामने है, और दूसरे ने भी कहां कि मेरा घर इसके सामने है। जब पूछा गया कि दोनों के घर कहां हैं तो जबाब आया- आमने-सामने। अब जो आमने-सामने घर हैं उन्हें कैसे ढूंढ़ा जाए? मेरा बात को घूमाना लाजमी था, मैंने कहा- काका, आप बड़े विद्वान है और व्यंग्य क्या होता है यह बखूबी जानते हैं। इस जबाब पर काका मुस्कुराए और बोले- वाह ! बेटा, उस्ताद से उस्तादी। चलो मान लिया कि मुझे पता है और यह भी मानता हूं कि तुम्हें भी पता है, फिर भी अगर कोई यह सवाल पूछे तो उसे कहा क्या जाए? मेरी मुसिबत यह थी कि काका को यह भी नहीं कह सकता कि व्यंग्य की ए बी सी डी इतनी सरल नहीं है कि हर कोई समझ सके। बहुत बार चीजें बहुत सरल लगती हैं, पर वास्तव में वे कठिन होती है। जैसे- व्यंग्य असल में ऐबी यानी शरारती लोगों का काम है। यह सीडी ऐसी है जो बिना कंप्यूटर के भी चलती है। इससे भी आगे कहा जाए तो ऐसी सीढ़ी है जो बहुत दूर तक हमें पहुंचाती है। ऐसे-ऐसे नजारे दिखाते हैं कि चक्कर आने लगते हैं। हमारा मन धरातल पर आने को मचलता है। बहुत पहले जसपाल भट्टी ने जो उलटा-पुलटा दिखाया था, वह व्यंग्य था। मान लिजिए कि हम घर देरी से पहुंचते हैं और देरी से पहुंचने पर भी सुनने को मिले- बहुत जल्दी आ गए। यह व्यंग्य है। टेढ़ा मसला है कि जो बात सीधे-सीधे कहनी चाहिए उसे व्यंग्य के जरिये तोड़ते-मरोड़ते और रस पैदा करते हैं। कहते कि इससे जायका आता है। जायका यहां यह है कि काका ने मेरी फीत उतार ली। कोई भी फीत चलते-चलते उतार सकती है। सीधा एकदम सरल सवाल करो। गीतकार शैलेंद्र ने लिखा था- हर सवाल का सवाल ही जवाब हो। जैसे- हम जिंदा क्यों है? जीवन-मृत्यु क्या है? मैं क्या हूं? ऐसे में पता चलेगा कि रहस्यों से भरा संसार है। हर आदमी के पास अपने-अपने सवाल है। सवाल यदि एक है तो जबाब भी एक होना चाहिए। यहां सवाल यह था कि व्यंग्य क्या है? तो जबाब है कि व्यंग्य यही है। यहीं है। जो मैं लिखता हूं और जो आप पढ़ते हैं, वही व्यंग्य है। बाकी सब क्या है यह कहना मेरा काम नहीं है। पंच काका मेरी हालत ताड़ गए और कहने लगे- किसी भी चीज के लिए ये ‘क्या’ बड़ा सवाल होता है। मैं क्या हूं और तुम क्या हो, इससे बड़ी बात यह है कि हम क्या हैं? हम बुद्धिजीवी हैं और बुद्धिजीवियों का काम है कि दुनिया के हर सवाल पर चिंतन-मनन करें। इस संसार में हम सभी भटक रहे हैं। सब को इतना भ्रमित कर देना चाहिए कि सामने सवाल पूछने की कोई हिम्मत करे तो दस बार सोचे। सच्चाई यह है कि सही मार्ग कोई नहीं जानता। अलग-अलग विद्वान हर बात पर मतांतर रखते हैं। यह जरूरी है कि अगर हम विद्वान हैं और बने रहना चाहते हैं तो अपना अलग मत रखें। सब को भटकाने वाल मत। मत यह है कि भटकना-भटकाना ही व्यंग्य है।  
- नीरज दइया

10 अप्रैल, 2017

मास्टरजी का चोला

    किसी के कुछ होने या नहीं होने से जरूरी होता है दिखना और लगना। बिना दिखे और लगे, कुछ होना या नहीं होना किसी काम का नहीं है। अब मास्टरजी को ही लो, मास्टरजी इन दिनों जिंस-टी-शर्ट और न जाने क्या क्या वस्त्र धारण कर के आते हैं कि वे मास्टरजी जैसे लगते ही नहीं। मास्टरनियां भी कहां कम है, वे भी अपने निराले अंदाज में अदाएं बिखेरती स्कूल पहुंचती हैं। जवान तो जवानी के जोश में होती है पर यहां तो बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम तक के उदाहरण देखने को मिलते हैं। उम्र का अपना हिसाब और सलीका होता है। विद्या के मंदिर में भड़कीले रंगों और चमक-दमक का भला क्या काम। जब आप ऐसे आएंगे तो आदर्श और संस्कारों का क्या होगा। बच्चों को कैसे समझाएंगे। जब खुद ही ऐसे निराले अंदाज में हीरो-हिरोइन बन कर विद्यालय पधारेंगे तो संस्कृति गर्त में चली जाएगी। कभी फेंच कट दाढ़ी तो कभी ऐसे-ऐसे कट में कि उनका नाम भी आप ही बता कर विज्ञापन करते हैं। जैसे स्कूल स्कूल न होकर कोई फैशन-ग्राउंड हो गया हो। कार्यालय के कर्मचारी बाबू अपने रंग-ढंग में मस्त है। उन्हें कहने-सुनने की हिम्मत किसी में नहीं है। वे स्कूल के सभी कर्मचारियों की पगार बनाते हैं, फीस का हिसाब रखते हैं। वे बजट को हिसाब से बरतते हैं। वे साहब को नियम और पेच बताते हैं। वे तो जो कुछ जानते हैं, कोई दूसरा कहां जानता है। इसलिए उनके अंदाज भी निराले होने ही चाहिए। वे साहब से भी बढ़-चढ़ कर सज-धज कर अपनी मर्जी से आते हैं और जाते भी अपनी मर्जी से हैं। जब सारा हिसाब-किताब उनके हाथ में है, तो फिर डर किस का। पहले वाले स्कूलों में मास्टरजी टाइप जो लुक दिखता था, अब वह नहीं दिखता है। कुछ मास्टर तो छोरे-छपारे जैसे लगते हैं, और नहीं लगते तो वे वैसे ही बन-ठन कर आते हैं। नई मास्टरनियां और छोरियां दोनों एक जैसी लगती है। किसी मास्टरनी को बड़ी कक्षा में बैठा दिया जाए तो अंतर मामूल नहीं चलेगा। पहले का जमाना दूसरा था, जब मास्टरनीजी को ‘बहनजी’ कहा करते थे। उस जमाने में वे कितनी शांत-शालीन थी। वे जब से मैड़म बनी है तब से मत पूछिए बात। अंग्रेजी रंग-ढंग और नाज़-नखरे पूरे होने चाहिए। वे ऐसे क्रीम-पॉउडर मल-मल के आती हैं कि कोस्मेटिक की दुकानें उन्हीं से चलने लगी हैं। कहीं गुलाब महकता है तो कहीं चंदन। कहीं केवड़ा तो कहीं चमेली। स्टाफ रूप में तीन-चार मेडम हो तो लगता है कहीं पास में फुलवाड़ियां महक रही हैं। रंग-रूप और साज-सज्जा अथवा सुगंध के मामले में मास्टरजी भला कब पीछे रहने वाले हैं। वे भी कम नहीं, डियो और इत्र लगाकर आते हैं, या डियो-इत्र से स्नान कर के आते हैं कहना मुश्किल है। डियो अथवा इत्र की तीखी महक जब नाक में तीर जैसे घुसती है तो विचार आता है कि ये भाई-बंधु नहा-धो कर कभी आते भी हैं या यूं ही छू-छा, फुस-फुस किए और निकल आते हैं। नकली और असली में यही फर्क है कि पुराने वाले दिनों वाले मास्टरजी का रौब होता था, गरिमा होती थी। अब इन पर इनके चेले-चपाटों का रौब और आतंक है। कहते हैं कि ट्रेंड बदल गया है। अब सब फ्रेंडली है। गुरु-शिष्य परंपरा को नए चेले और चेलियों ने तहस-नहस कर फ्रेंडली दुनिया में सब कुछ फ्रेंडली बना दिया है। ऐसे माहौल में यदि कोई योगी-महात्मा का तेज जाग जाए तो अतिश्योक्ति नहीं है। पंच काका कहते हैं कि जब विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए ड्रेस कोड है तो फिर वहां काम करने वाले सभी कर्मचारियों और शिक्षकों को भी इस परिधि में लेना चाहिए। माना कि मास्टरजी को अब पुराने वाला वह धोती-चोला पसंद नहीं है, पर जब आपने मास्टरजी का चोला धारण किया है तो कुछ तो परंपरा-संस्कृति और संस्कार का लिहाज होना चाहिए। खैर छोड़िए मास्टरजी आपको बस इतना ध्यान रखाना है कि विद्यालय में रोमियो बन कर नहीं आना है।   
- नीरज दइया

06 अप्रैल, 2017

पिताजी के जूते

पको खबर है या नहीं- समय बदल गया है। बदलते समय के साथ बहुत सारी चीजें बदल गई हैं। बहुत सारे रिश्ते और टेस्ट बदल गए हैं। जो नहीं बदलने थे, वे भी बदल गए हैं। मसलन पहले हमारे घरों में जो पिताजी हुआ करते थे, उन्हें भी बदल दिया गया है। आजकल वे अपने बदले-बदले रूप में पाए जाते हैं। पिताजी कितना ओल्ड नेम है। अब नए दौर में सब कुछ नया-नया होना चाहिए। पिताजी तो बदले नहीं जा सकते, पर उनका नाम बदल कर कुछ नए का असहास तो ला साकते हैं। बेशक, पापा या डेड जैसे किसी संबोधन में पिताजी वाली गरिमा नहीं है। ना हो गरिमा, करना क्या है गरिमा का। नए जमाने में जब सब कुछ बदल रहा है, तो यह बदलाव भी जरूरी है। नाम बदलने से बहुत फर्क पड़ता है। कुत्ते को कुत्ता कहो तो लगता है किसी गली के आवारा कुत्ते की बात हो रही है। यही अगर कुत्ते को बस ‘टोमी’ कह कर चर्चा कीजिए, तुरंत बात कहने-सुनने वालों का स्तर उच्च हो जाता हैं। पीढ़ियों की मानसिकता में यही तो अंतर है कि वे बात को दिल पर ले लेते हैं। पिताजी की बात में कुत्ता आने से प्रसंग में कोई हल्कापन आने की बात सोचे, तो समझ लिजिए पुराने खयालों का दिमाग है। नए ख्यालों में इन छोटी-बड़ी बातों को इगनोर करना पड़ता है। पिताजी में से जब से ‘जी’ निकला है तो पिता के पर्यायवाची- डेड, पापा जैसे शब्द हो गए। कुछ अब भी ‘जी’ को घसीटते हुए इस युग तक ले आए हैं। वे पापाजी और डेडीजी कहते हैं। उनका यह ‘जी’ को बचाए रखने का प्रयास है। पहले वाले पिताजी का रुतबा हुआ करता था, लेकिन अब पिताजी ने डेडीजी का चोगा पहना है वे बहुत फ्रेंडली हो गए हैं। वे जमाने के साथ बदल रहे हैं। पहले वाले रौब को छोड़, वे थके-मांदे एडजेस्टिव नेचर के होते जा रहे हैं। इस शताब्दी में सरवाइव करना है तो एडजेस्टिव होना पड़ेगा। लोक की मान्यता है कि अगर बेटे के पैर में बाप का जूता आने लगे तो समझो वह बड़ा हो गया है। अब फ्रेंडली जनरेशन में तो बेटों के पैर जन्म से ही बड़े-बड़े होने लगे हैं। ‘तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राज दुलारा...’ पिताजी का गाना था और अब बेटाजी का गाना है- ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा, मगर ये तो, कोई ना जाने... के मेरी मंज़िल, है कहाँ।’ बेटे की मंजिल पापा नहीं जानते हैं, क्यों कि बेटों की मंजिल बदल गई है। पिताजी का बड़ा नाम रौशन करने में उनकी कोई रुचि नहीं है। इसका एक बड़ा कारण ‘जूते’ हैं। अब कहने को बस जूते शब्द रह गया है। देश से असली जूते गायब हो चुके हैं। किसी के पैरों में कोई जूता नहीं, बस भ्रम है कि जूते हैं। अगर गलती से कोई जूता है, तो वह बेकार है। उसे पैरों में पहनने पर ना बचाव करता है ना उसे खोल कर उठाया जा सकता है। पहले पिताजी पैर में जूता रखते थे, स्कूल में मास्टरजी जूता रखते थे, गली-समाज में कुछ बड़े-बूढ़े लोग जूता रखते थे, पंच-सरपंच के भी जूते हुआ करते थे।
          पंच काका कहते हैं कि अब जूतों की प्रजाति लुप्त हो गई है। सबसे पहले घरों से पिताजी के जूते गायब हुए। स्कूल के सारे जूते चुरा लिए गए। बंटाधार हो गया। बच्चों के हित में बड़े-बड़े कानून है। थाने-कोर्ट-कचेड़ी आदि सब के जूते शोफानी हो गए। हाथ के दात जैसे सिर्फ दिखाने के जूते। अब तो हुआ यह है कि कभी बच्चे ना जाने कहां से जूते ले आते हैं, और अपने अभिभावकों, शिक्षकों तक को नहीं छोड़ते। कहां गए हमारे संस्कार? कहां गए हमारे जीवन-मूल्य? हाय पहले वाली शिक्षा कहां गई?
० नीरज दइया   

03 अप्रैल, 2017

फलके सा चेहरा और अप्रैल-फूल

मैं सुबह-सुबह जब दफ्तर के लिए निकलने लगा तो पंच काका ने कहा- ये फलके सा चेहरा लिए कहां जा रहा है? मुझे यह उम्मीद तो नहीं थी कि काका मुझे मूर्ख बनाएंगे और मैं बन जाऊंगा। मैं जानता हूं कि ज्ञानियों के मजाक भी उच्च स्तरीय होते हैं, हर कोई समझ नहीं सकते हैं। मैं फलके सा चेहरा लिए कहां जा रहा हूं इस बात पर मौन रहा तो काका ने पूछा- अरे बोलता क्यों नहीं, फलके सा मुंह लिए कहा जा रहा है। मैं अटकता अटकता बोला- द... फ्त.. र। और घर से निकल तो गया पर यह क्या दफ्तर पहुंचा तो गेट पर खड़ा कर्मचारी भी हंसते हुए बोला- साहब आज तो फलके सा चेहरा लेकर आए हो। मेरी हैरानी का पार नहीं, ये क्या माजरा है कि सब फलके सा चेहरा कह रहे हैं। सीट पर बैठा तो पास वाली सीट पर बैठा मेरा सहकर्मी भी यही बात बोल कर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम करने के लिए काफी था। मैं चिंता में पड़ गया कि ये सब आज फलके सा चेहरा क्यों कह रहे हैं। यह तो अच्छा हुआ कि मैं बेहोश नहीं हुआ साहब ने बुलाया और उन्होंने भी मुझे पंच काका वाली बात कही- आज फलके सा चेहरा लिए कैसे हो? मैं भीतर ही भीतर शर्माता और बाहर मुस्कुराता बोला- सर ये फलके सा चेहरा क्या होता है। जबाब हथोड़े जैसा था- आइना देखो, तुम्हारा चेहरा आज फलके सा है। साहब की गंभीरता अब भी कायम थी और फाइल हस्ताक्षर करा के मैं लौट आया। फाइल रख कर वॉश रूम में गया तो वहां मेरा मित्र वर्मा पहले से ही अपना मुंह आइने में देख रहा था। मैं भी परेशान सा पास खड़ा होकर आइना देखने लगा कि ये फलके सा चेहरा क्या माजरा है। वर्मा से हंसी रुकी नहीं और उसने भेद खोल दिया- अप्रैल फूल बना रहे हैं। मेरी हालत रोने जैसी थी, मैं चीखा- ये क्या मजाक हुआ? वर्मा बोला- मजाक ही तो है। फलका यानी रोटी, तेरा मुंह गोल रोटी जैसा है। इसमें क्या गलत है। मजाक को समझा करो यार।
      मैं मजाक को समझा कि नहीं इससे जरूरी है कि मैं एक अप्रैल को समझ लेता हूं। एक अप्रैल का किसी भी प्रकार के फूल से कोई संबंध नहीं है, फिर भी वर्षों से अप्रैल-फूल का ऐसा राग क्यों गाया जाता है? प्रतिवर्ष इस राग को सुन-सुन कर यकीन करने को जी करता है कि इस प्रकार का कोई दुर्भल जाति का फूल भी होता है। यह भेड़ चाल है, कोई किसी से सवाल नहीं करता, बस नाचते-गाते हैं- अप्रैल-फूल आ गया, आ गया। अरे क्या आ गया, जीवन में इतने अप्रैल आए और गए... पर अप्रैल फूल इस बार जैसा कभी नहीं आया। माना यह एक-दूसरे को मूर्ख बनाने-बनने का दिवस है। देश की प्रगति में अब अप्रैल फूल केवल एक अप्रैल को ही नहीं, तीन सौ पेंसठ दिन मनाया जाता है। हमको खबर भी नहीं होती है और हम हर दिन अलग अलग जगह मूर्ख बनते हैं, बनाए जाते हैं। अप्रैल फूल का लोकप्रिय संस्करण ‘उल्लू के पठ्ठे’ के रूप में विख्यात है। जब पंच काका को पूछा तो उन्होंने बताया- बाबा आदम को सर्प ने मूर्ख बनाकर पहली अप्रैल को सेव खिलाया था। जिससे उन्हें ज्ञान हुआ, और आगे क्या हुआ हम सब जानते हैं। आदम और हव्वा ने एक-दूसरे को मूर्ख बनाया। यह चक्कर आगे चलता रहा। उल्लू के पठ्ठों का विकास हुआ। उन्हें यह ज्ञान हुआ कि बिना ज्ञान के कोई किसी को मूर्ख नहीं बना सकता। अज्ञान तो खुद मूर्खता का पर्याय है। मूर्ख को मूर्ख नहीं बनाया जाता- उसे महामूर्ख बनाना पड़ता है। अब तो महामूर्खों की भी कई श्रेणियां हैं। हम ऐसे लोक में पहुंच चुके हैं जहां हमारी मूर्खताओं की पावर इतनी बढ़ गई है कि हमें हर कोई आसानी से मूर्ख बना सकता है। जैसे मैंने तुझे ‘फलके सा चेहरा’ कह कर मूर्ख बनाया।
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02 अप्रैल, 2017

राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद भाषा भारती में प्रकाशित


मैं कविता की प्रतीक्षा में हूं 
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डा. नीरज दइया
अनुवाद : नवनीत पाण्डे 
 
ढूंढ़ने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
जब भी करना चाहता हूं संवाद
तो नहीं मिलता कोई ठीक-ठाक प्रश्न
प्रश्न यह है कि कोई कवि क्या पूछे कविता से
क्या किसी कविता से पहचान के बाद भी जरूरी होता है प्रश्न
प्रश्न कि समय क्या हुआ है?
प्रश्न कि बाहर जा रहे हो कब लौटोगे?
प्रश्न कि खाना अभी खाएंगे कि ठहर कर?
प्रश्न कि चाय बना देती हूं पिएंगे क्या?
प्रश्न कि नींद आ रही है लाइट कब ऑफ करोगे?
प्रश्न कि इन किताबों में सारे दिन क्या ढूंढते रहते हो?
प्रश्न कि कोई पैसे-टके का काम क्यूं नहीं करते?
प्रश्न.. प्रश्न... प्रश्न ? शेष है प्रश्न-प्रतिप्रश्न?
किंतु सिर्फ प्रश्नों से क्या बन सकता है?
क्या सभी प्रश्नों को इकठ्ठा कर रच दूं कोई कविता?
पर क्या करुं-
अभी-अभी आया है जो प्रश्न आपके संज्ञान में
इसीलिए तो मैंने सर्वप्रथम लिखा था-
ढूंढने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
कविता यह है कि मैं कविता की प्रतीक्षा कर रहा हूं
अगर आपकी भेंट हो
तो कहना उसे कि मैं प्रतीक्षारत हूं।

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मूल कविता-
म्हैं उडीकूं कविता
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डा. नीरज दइया
 
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
जद करणी चावूं बतळावण
तो कोनी सूझै
कोई सावळ सवाल
सवाल ओ पण है-
कोई कवि कविता सूं
कांई करै सवाल?
कांई कविता सूं ओळख पछै ई
जरूरी होवै कोई सवाल?
सवाल है कै कित्ती बजी है?
सवाल है कै बारै जावो पाछा कणा आसो?
सवाल है कै अबार जीमसो का पछै?
सवाल है कै चाय बणा दूं पीसो कांई?
सवाल है कै नींद आवै बत्ती कद बंद करसो?
सवाल है कै आं पोथ्यां में सारो दिन कांई सोधो?
सवाल है कै कोई पइसा-टक्कां रो काम क्यूं नीं करो...?
सवाल... सवाल... सवाल।
सवाल भळै है केई सवाल
पण कोरा सवालां सूं कांई संधै!
कांई सगळा सवाल रळा’र
सांध देवूं कोई कविता
पण कांई करूं
अबार-अबार ई जलम्यो है जिको सवाल
आप रै मगज मांय
इणी खातर तो सगळा सूं पैली कैयो—
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
कविता आ है
कै म्हैं उडीकूं कविता
जे थानै सूझै कविता
तो उण नै खबर जरूर करजो
-कै म्हैं उडीकूं।
००००
(भाषा भारती में प्रकाशित)