11 जुलाई, 2016

कहां तक पहुंचा उड़ता पंजाब?

फिल्म 'उड़ता पंजाब' के निर्माता-निर्देशकों को कड़ा झटका लगाने का रहस्य पंच चाचा ने जाहिर कर दिया है। आज युवाओं से बात करते हुए पंच चाचा ने बताया कि वे फिल्म का नाम प्रचारित होते ही निर्देशन अभिषेक चौबे से बात करना चाहते थे पर कर नहीं सके। पंच चाचा ने कहा कि पहले तो अभिषेक चौबे भी मुझे चाचा मानता था, चाचा तो मैं अब भी हूं उसका। पर क्या है जब से वह फिल्म लाइन में गया है मुझे भूल सा गया है। उसने बताया ही नहीं कहां तक पहुंचा उड़ता पंजाब?
अभिषेक चौबे को बचपन से ही उड़ता शब्द से बहुत लगाव था और देश भक्ति का जज्बा उस में मनोज कुमार की फिल्में देख कर जाग गया था। भारत नाम से लगाव होने के कारण अभिषेक पहले फिल्म का नाम उड़ता भारत रखने वाला था, तब पंच चाचा ने उसे कहा कि ऐसा मत कर। अगर फिल्म हिट हो गई तो उड़ता भारत एक, उड़ता भारत दो और फिर तीन-चार न जाने कितने कितने भारत बनाने पड़ेगें। भारत एक है और एक ही रहना चाहिए। इस पर अभिषेक ने चाचा से कहा कि मेरा सपना है कि भारत तरक्की करे, आकाश में खूब ऊंचा उड़े। इसका समाधान पंच चाचा ने बताया कि तुम पहले-पहल पंजाब से शुरुआत करो, बनाओ उड़ता पंजाब। फिल्म हिट हो जाए तो बनाना- उड़ता राजस्थान, उड़ता हरियाणा, उड़ता उत्तर प्रदेश, उड़ता मध्य प्रदेश, उड़ता गुजरात। ऐसी बहुत सी फिल्में अगर बनेगी तो तुम्हारा सपना पूरा हो जाएगा और इन सभी फिल्मों के कोम्बो पैक को नाम देना ‘उड़ता भारत’।
अब जब फिल्म ऑनलाइन लीक हो गई है और मामला पुलिस साइबर विंग में चल गया है तो फिल्म से सभी भाई-बहनों का गुस्सा साफ नजर आना ही है। पंच चाचा ने कहा कि मैं कब से कहता आ रहा हूं कि पाइरेसी को ना बोलें और फिल्में थियेटर में ही देखें पर तुम बच्चे लोग कहां मानते हो। दे दना दन डाउनलोड पर डाउनलोड। देखो मेरी बात भले मानो ना मानो पर अपना शाहिद कपूर नाराज हो रहा है उसकी बात तो मान लो। चाचा जरा से हंसे और बोले मैं भी न जाने क्या क्या कह जाता हूं। अरे भाई अभिषेक चौबे और शाहिद कपूर जैसे मेरे भतीजे भी किसी की बात नहीं मानते, और अपनी मर्जी की करते हैं तो फिर दूसरे भतीजों को क्या दोष। मैं किसी को हाथ पकड़ कर तो रोक नहीं सकता।
पंच चाचा ने कहा कि जब सेंसर बोर्ड ने ‘उड़ता पंजाब’ को ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया, उससे पहले की बात है। फिल्म पर विवाद हुआ करीब 89 सीन कट लगाने का बोर्ड ने कहा था। मामला कोर्ट तक पहुंचा और हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब सिर्फ एक कट के साथ फिल्म को रिलीज होना चौबे जी ने तय किया तो भैया 88 सीन वाली फिल्म भी नहीं उड़ेगी तो कौनसी उड़ेगी। ‘उड़ता पंजाब’ तो ऐसी फिल्म है कि दिन में उड़ेगी, रात में उड़ेगी और दोपहर में भी उड़ेगी। यानी जब देखो जिसे देखो जब तक फिल्म को उड़ा नहीं लेगा, आराम से नहीं बैठेगा। कोई डाउनलोड करके उड़ाएगा, कोई मित्र से मांग कर उड़ाएगा, पर हर कोई उड़ाएगा जरूर। अब देखना यह है कि ऐसे उड़-उड़ के पंजाब कहां तक पहुंचेगा?
मैंने पूछ ही लिया- ‘इस उड़ते तीर को रोका कैसे जाए।’ चाचा के माथे पर सलवटें आई और बोले- ‘आलिया भट्ट ने ट्वीट किया है- आप हमारी दो सालों की मेहनत, खून, पसीना और आंसूओं को बर्बाद मत कीजिएगा। प्लीज 'उड़ता पंजाब' को थियेटर में ही देखिएगा।’ या तो हम आलिया की बात माने या फिर ऐसा भी हो सकता है कि अभिषेक चौबे नई फिल्म ‘उड़ता पाकिस्तान’ बनाए। फिर देखो, सभी पाकिस्तान के पीछे ना भागे तो कहना। भैया, भारत ऐसा देश है जहां कोई किसी को अधिक उड़ने नहीं देता।’

08 जुलाई, 2016

ये मन बड़ा पगा कर रहा

            ‘मन’ का अर्थ समझना-समझाना बेहद कठिन है। बचपन में तो मालूम नहीं था कि भीतर कुछ बला की चीज मन भी लेकर मैं पैदा हुआ हूं। मुझे मेरे मन के बारे में किसी ने कुछ नहीं बताया। स्कूल में गणित के मास्टरजी ‘मन’ को चालीस किलो बताते रहे और हिंदी के मास्टरजी कुछ दूसरा ही अर्थ बताते थे। तोल का ख्याल तो अब भी समझ में आता है पर सूरदास को पढ़ते हुए गोपियों के मन की व्यथा न तब समझ में आती थी न अब। उस व्यथा को तो जैसे-तैसे रट-रट कर पेपर में पूछे जाने पर उत्तर के रूप में लिखा था अब भी जब ‘उधो मन ना भये दस बीस, एक हुतो जो गयो श्याम संग’ पढ़ता-पढ़ता हूं तो विनोद करने को जी करता है।
            गोपियों के समय फोटो प्रतिलिपियों का चलन नहीं था। पर अब तो खूब है। अब कोई ‘ओरिजनल डोक्यूमेंट’ किसी के संग जाने नहीं देता। हर जगह फोटो-प्रतिलिपि। एक दिन सोचा कि मन की फोटोप्रतिलि कर ली जाए। मगर मन है कि पकड़ में नहीं आता, फिर फोटो प्रतिलिपि कैसे बनावाएं? मन और मनमीत को सोचते एक गाना याद आता है- मन रे तू काहे ना धीर धरे / वो निर्मोही मोह ना जाने, जिनका मोह करे’ मन को मनमीत का मोह होना लाजमी है पर वह निर्मोही क्यों है। यह स्पष्ट है कि मन का एक गुणधर्म मोह करना है। मोह से बचने के लिए मन को पकड़ कर रखो। मैं मन को पकड़ने के प्रयास करता हूं, पर अभी तक तो पकड़ में नहीं आया। मैं सोचता हूं कि मेरा मन छोटा है या बड़ा? कभी लगता है छोटा है और कभी लगता है नहीं यह तो बहुत बड़ा है। ऐसे में मैं दूसरों के मनों की बात क्यों करूं।
      कभी-कभी सोचता हूं मन को इस बार पकड़ लिया, वश में कर लिया। पर मन है कि वो गया ये गया का छलावा ही करता रहता है। मन का एक गुणधर्म मचलना भी है, जिसे इस गाने में गीतकार ने लिखा है- ‘जब भी कोई कंगना बोले पायल छनक जाये / सोयी-सोयी दिल की धड़कन सुलग-सुलग जाये / करूँ जतन लाख मगर मन मचल मचल जाये।’ ये कंगना और पायल जरूर मेरे जी का जंजाल बनते, पर ऐसा होते-होते बीच में कलम आ गई और उसी से मुझे प्यार हो गया।
      अगर कभी ऐसा महसूस हो कि मन का अर्थ समझ आ गया तो फिर से मन में सवाल उठ खड़ा होता है। ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ कहने वाले ने यह नहीं बताया कि मन अगर दर्पण है तो फिर दर्पण क्या है? दर्पण अगर मन है, तो दोनों नामों की अदला-बदली क्यों? मन का मतलब एक मित्र ने ‘दिल’ बताया, मैंने उसे डांट दिया। भैया यहां मन का अर्थ ही समझ नहीं आ रहा है, और अगर मन का अर्थ दिल मान लूंगा तो अनर्थ मन में आ जमेंगे। दिल तो पागल है जैसे गीतों ने दिल की मिट्टी-पलीत कर दी। दिल को समझदार नहीं कह कर पागल कहने वाले गीतकार को सम्मानित करने वाले संस्थान असहनीय है। मन के अस्थिर होने का की व्यंजना एक गीत में है, जिसमें गीतकार ने ‘मन के नैन हजार’ कहे हैं। कहां आपके हमारे दो नैन या फिर चार नैन और कहां हजार। अरे भाई कोई मुकाबला ही नहीं है।
      मैं उस वक्त चौंका जब मेरा बेटा आज पंच काका को पूछ रहा था- ‘ये जन-गम-मन में मन का मतलब क्या है?’ तब मुझे चुपके से खड़े होकर वहीं कान लगाने को मजबूर होना ही था। पंच चाचा ने उसे मन का अर्थ माइंड यानी दिमाग बताया। यह सुनते ही मैं वहां से इधर-उधर हो गया। सोचा मुझे वे अपनी बातों में शामिल ना कर लें। मन यानी माइंड और दिल यानी हृदय। ये मन बड़ा पंगा कर रहा है। मन ने मेरा अमन, चैन, संतोष और सुख छीन लिया।
naya arjun 01.02.2017 Parat Dar Parat