31 मार्च, 2017

कागज के दुश्मन

कागज का आविष्कार चीन में हुआ। पंच काका का स्थाई आदेश है कि जब भी किसी का नाम लेने की बात हो, तो सावधानी रखो। मैं सोच रहा हूं कि चीन का नाम लिया जाए, या कह दिया जाए कि कागज का आविष्कार भारत में हुआ। कोई वास्तव में पक्का यह नहीं जानता कि कागज का आविष्कार कहां हुआ। कहते हैं कि ऐसा लिखा हुआ मिलता है। लिखने से मानते हो तो मैंने लिख दिया- ‘कागज का आविष्कार भारत में हुआ।’ मैंने लिखा तो आप संदेह कर रहे हैं। इसलिए बेहतर पंच काका की बात है कि कागज की बात करते हुए मैं इसके आविष्कारक की बात गोल कर जाऊं। किसी ने कब कहा है कि नाम लो। मोर नाचा जंगल में किसने देखा, आपकी बात सही है। पर मैं तो पंच काका के स्थाई आदेश की पालना में बात का आरंभ ही बदल देता हूं। हमारे कविराज कह गए- ‘हीमत कीमत होय, बिन हिमत कीमत नही। करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया॥’ वैसे यह केवल राजिया के ही समझने की बात नहीं है। यह मेरी हिम्मत है कि कवि का नाम नहीं लिया, और उनकी पंक्तियों का उल्लेख कर दिया। लिखते समय पूरा मार्जिन हाथ में रखता हूं। कागज और कलम हमारी है, तो फिर कंजूसी कैसी? वैसे कागद को चिट्ठी भी कहते हैं। और आजकल चिट्ठी आनी-जानी बंद-सी हो गई है। वह भी क्या दौर था- जब डाकिया डाक लाता था और हिंदी फिल्मों में ‘डाकिया डाक लाया...’ जैसे गाने लिखे गए थे। खुशी की बात यह है कि अब डाक और डाकिया दोनों ही कंपलीटली फ्री हो गए हैं। लेटर-बॉक्स देखे तो बरसों-बरस हो गए हैं। जैसे वे हमारी दुनिया से गायब हो गए हो। अब यह शिकायत भी दूर हो गई- “चिठिया हो तो हर कोई बांचे, भाग ना बांचे कोए....।” भाग्य का भाग्योदय हो गया है। ई-मेल और संदेश भेजने के नए-नए तरीके इजाद हो गए हैं। अब कागज के दुशमन तो गिने-चुने ही रहे हैं। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं ने भी ई-संस्करण सुलभ करा दिए हैं। अब कौन कचरा इक्कठा करे। यह ‘ई-युग’ है बाबा। देखिए ए-बी-सी-डी चार युगों के बाद ये ई-युग आया है। इसमें समझदारी नहीं कि अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के लिए इंतजार करो। सब कुछ नेट के ई में है भैया।
    पंच काका कागज की दूसरी ही बात बता रहे हैं। गली में लड़ाई हो गई। बात बस इतनी थी कि दो हजार के नए नोट पर कोई नया फोटो क्यों नहीं छापा? भगतसिंह का छप जाता, नहीं तो बाबा साहेब का छाप देते। देखिए ना फिर से छाप दिया- गांधी बाबा का। वे इतने छप चुके हैं, तो अब किसी नए का नंबर आना चाहिए था। इसी बात पर बहस हुई। किसी ने सुझाव दिया कि जब इतने नोट हैं, तो फिर अलग-अलग नोटों पर अलग-अलग फोटो छाप कर सब की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। वैसे यह बहस और लड़ाई की बात नहीं थी। पर क्या करें हो गई कि गांधी बाबा को करवट बदलवाने के चक्कर में क्यों सबको लाइन में खड़ा करा दिया। नोट पर गांधी लेफ्ट से राइट हुए कि राइट से लेफ्ट, पर पूरे देशवासियों ने बैंकों की लेफ्ट-राइट जरूरी की। आजादी इसी का नाम है कि सब के अपने-अपने सुझाव और विचार हैं।
    पंच काका ने उन्हें समझाया- ओछी राजनीति के चक्कर में आपने संबंध बर्बाद मत करो। सब के सब कागज और कलम ले आए और लिखने लगे। सबका कहना था कि हम प्रधानमंत्री जी कागद लिख सकते हैं। उन्होंने खुद कहा है- मुझे लिखो। गली के लोगों की कागज से दुश्मनी निकली। एक कागज लिखकर फाड़ते कि ठीक से लिखा नहीं गया। फिर दूसरा-तीसरा-चौथा। यह क्रम किसी नए कवि जैसे चलता रहा कि कविता लिखने के नाम पर बीसियों कागज बर्बाद करते हैं। अब इन्हें कौन समझाएं कि इस ‘ई-युग’ में कागज के दुश्मनों के लिए कोई जगह नहीं है। अब सब कुछ कागज-लेस हो रहा है।
नीरज दइया

टारगेटमयी मार्च

ब से मार्च का महीना आया है तब से हर सरकारी कार्यालय के गेट को देखता हूं तो पाता हूं कि वे इन दिनों जल्दी खुल जाते हैं और देरी से बंद होने लगे हैं। जिस कार्यलय में कर्मचारी सूरज के सिर पर आने के बाद भी दौड़ते-भगते पहुंचते थे, उन्हीं कार्यालयों में अब सूरज के आते हैं थोड़ी देर में एक-एक कर सभी कर्मचारी और अफसर आने लगे हैं। न केवल आने लगे हैं वरन अपने स्थान पर विजारित होकर फाइलों और बिलों में ऐसे खो जाते हैं कि दिन भर लगे रहने पर भी उनका सिर ऊंचा नहीं होता। यह सब देख कर लगता है कि देश बदल रहा है। ऐसे तो हमारी तरक्की को कोई रोक नहीं सकता। सबके अपने-अपने टारगेट हैं। टारगेट को प्राप्त करना बहुत जरूरी है। बाबू का टारगेट है और अफसर का अपना टारगेट। सब के अपने अपने टारगेट और खाते हैं। आदमी की हिम्मत और पद के हिसाब से सब का अपना अपना मुंह है। किसी का मुंह छोटा है वह कम खाता-पीता है, और जिसका मुंह बड़ा है वह ज्यादा खाता-पीता है। यह झूठ है कि हमारे देश में कोई भूखा सोता है। यहां भले कितनी ही गरीबी हो और भले गरीबी की किसी भी रेखा की बात हो, यहां कोई भूखा नहीं सोता है। सबके अपने अपने खाने-पीने के रास्ते बने हुए हैं। भिखारी से लेकर सेठ साहूकार तक के अपने अपने रास्ते हैं। कोई भगवान के नाम पर कुछ ले रहा है तो कोई दे रहा है। हरेक का अपना खाता है। जिसमें पाप-पुण्य है। आदमी एक जैसे ही हैं, पर कभी कोई भगवान के नाम पर तो कभी कोई वाहे गुरु और अल्लाह के नाम पर खाता-पीता अथवा खिलाता-पिलाता है। कार्यालय में साहब के कमरे के बाहर बैठने वाला अंतिम अधिकारी भी दफ्तर के हिसाब से खाता-पीता है। सबका नसीब है और यह नसीब मार्च के महीने में जोर शोर से चमक उठता है। मार्च का महीना यानी खाने-खिलाने का महीना। इस महीने में टारगेट पूरे करते-करते कई टारगेट पूरे हो जाते हैं। बकाया बिल और बकाया बजट को यूज करना मार्च में जरूरी होता है। सब चाहते हैं कि आया हुआ बजट जाना नहीं चाहिए। बिना खर्च के आया हुआ बजट वापस चला जाएगा तो यह सरासर हरामखोरी है। लापरवाही है। कार्य के प्रति उदासीनता है। अनुशासनहीनता है। सरकारी बजट का पूरा पूरा उपयोग होना ही चाहिए। यदि किसी करण से बजट मार्च में नहीं खत्म हो सकता है तो उसके लिए मार्च के महीने को खुला रखा जाता है। अप्रैल की दस-बीस तारीख तक मार्च महीने को चलाया जाता है। पिछली तारीखों में बिलों का लेन-देन और सब व्यवस्थित किया जाता है। बिना तारीख के बिल कबाड़े जाते हैं। साहब के खास आदमी दफ्तर में अपने हिसाब से बिलों पर तारीख लिखते और प्रमाणित करते हैं। ऐसा भी होता है कि बिल का सामान और काम-काज अपनी जगह छोड़ दिया जाता है। आज नहीं तो कल-परसों या फिर कभी सामान एडजेस्ट हो जाएगा, काम करा लिया जाएगा। परंतु अगर मार्च का महीना निकल गया और उसको अप्रैल में भी नहीं पकड़ पाए तो बजट लेफ्स हो जाएगा। सामान और काम की बजाय ध्यान बिल और कमीशन पर दिया जाना चाहिए। वांछित बिल समय पर आ जाए, पास हो जाए और सबका खाना-पीना बराबर हो जाए तो कोई समस्या नहीं है। बस एक बार दौड़ते-भागते टारगेटमयी मार्च को पकड़ लिया तो समझो पूरे साल भार का आराम हो गया। पंच काका कहते हैं कि मार्च की दौड़-भाग में कुछ कर्मचारी और अफसर ऐसे भी हैं, जिनको टारगेटमयी मार्च के पीछे दौड़ना-भागना नहीं आता। राम जाने वे किस मिट्टी से बने हैं। उनको ढंग से खाना-पीना नहीं आता। ऐसे में बेचारे सहायकों को चाय-पानी के लिए तरसना पड़ता है। बिना चाय-पानी के नौकरी किस काम की, इससे तो बेहतर है कहीं ढंग की जगह तबादला हो जाए।
नीरज दइया

28 मार्च, 2017

कुंवारों-कुंवारियों की धमाचौकड़ी

मारे देश में रोजगारों की कमी नहीं है। अगर हम अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाएं, तो एक नहीं बीस तरह के काम हैं, जिनको रोजगार के रूप में अपनाया जा सकता है। मैं आपको बीस के बीस तरह के रोजगार नहीं बता सकता, पर एक के बारे में कुछ खुलासा करता हूं। समझदार को तो इशारा ही काफी होता है। पिछले दिनों एक वैवाहिक साइट ने सर्वेक्षण करवाया कि कुंवारों-कुंवारियों की पहली पसंद में कौन-कौन शमिल है। पसंद की बात पर ऐसे-ऐसे नजारे सामने आए कि मत पूछिए बात। बॉलीवुड-हॉलीवुड और क्रिकेट-राजनीति के युवा चेहरों की तो जैसी लॉटरी निकल आई। दीवानों-दीवानियों के हाल-बेहाल, पसंद करना था एक को, और नाम बताए दस के। पूरी वेटिंग लिस्ट ही बना दी। ये नहीं तो ये, और ये नहीं तो ये चलेगा। ही और शी इस ये-यू के चक्कर में रहते हैं। अंततः गले और वरमाला पर किसी एक्स-वाई का नाम लिखा होता है। पसंद करने-कराने की छूट हो तो फिर पूरी छूट होनी चाहिए। पसंद तो पसंद होती है। कोई शादीशुदा है या नहीं, इससे कोई सरोकार नहीं। यह अंदर की बात होती है। दिल का मामला है साहेव। फिर जब सपनों में किसी के आने-जाने की कोई रोक-टोक नहीं है, तो यहां पसंद में रोक-टोक क्यों? देश में बड़े नाम ऐसे भी मिल जाएंगे जो शादीशुदा होते हुए भी कुंवारों और कुवारियों जैसे हैं। कोई अपने जीवन-साथी को वर्षों तक छोड़ दे, तो कोई समयावधि होनी चाहिए कि इतने वर्षों पूरे कर, आप कुंवरा-कुंवारी कहे जाने का प्रमाण-पत्र पा सकेंगे। झूठ बोलना किसे पसंद नहीं है। खुद को बरसों कुंवरा-कुंवारी कहलाने में गर्वानुभूति है। तो बात सर्वेक्षण की थी और उस में अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर, रितिक रोशन, विराट कोहली, राहुल गांधी से लेकर माननीय प्रधानमंत्री जी तक का नाम कुंवारियों की पसंद में सरपट आया। रूपसियों को तो छोड़िए कुंवारों का हाल तो इससे भी बुरा है। वे तो पासवाली आंटी तक का नाम लेने में नहीं शर्माते हैं। आप कुछ भी समझे, पर ये अंदर की बात है। दिल का मामला है। बहुत सी पुरानी बातें ऐसी हैं जो पुरानी होती ही नहीं। सदा प्रासंगिक रहती है। जैसे- भैया! शादी ऐसा लड्डू है, खाए सो पछताए और ना खाए पछताए। जब पछताना ही है तो खा लेना ही ठीक है। कुछ का मानना है कि पछताना ही है, तो अकेले ही ठीक है। मिलकर पछ्ताना ठीक है या अकेले, इसका कोई ढंग से खुलासा नहीं हुआ है। कुछ ट्रेलर देख कर पछताते हैं। किसी को आदर्श मानकर प्रेरणा ग्रहण करना गलत नहीं। राजनीति और समाज में कुछ प्रसिद्ध कंवारों और कंवारियों के नाम कुख्यात हैं। अपने जीवन को फकीरी जीवन कहने वाले और वालियों का कुछ तो जादू है। आह ! स्वतंत्रता से भरा जीवन कितना सुखद है। किसी का ना कहना, ना सुनना। जो जी में आए, सो करो। परिवार और शादी में कितने बंधन हो जाते हैं। इन दिनों यह एक बड़ा रोजगार बन गया है। बिन किसी इन्वेस्टमेंट के आमदनी होने लगती है।
          पंच काका रोमाटिंग मूड में आ कर कहने लगे हैं- जब दो दिल टकराते हैं तो बिजलियां कड़कती है, घर में बारिश और तूफान आता है। धीरे-धीरे दो पहियों पर दौड़ने वाली गाड़ी, सवारियों के बढ़ने पर बैलगाड़ी बन जाती है। बीस बातें सोचते हुए जीवन जीना पड़ता है। ऐसे में कुंवारों और कुंवारियों की धमाचौकड़ी देख कर जलन होती है। यह खेल निराला है- जो बंधन में हैं, आजादी चाहते हैं और जो आजाद है, वे बंधन के लिए बेताब है।
० नीरज दइया 

24 मार्च, 2017

मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने

पंच काका का मानना है कि हमारे देश में जिन राज्यों की चर्चा मुख्य धारा में रहती है, उनमें यूपी-बिहार प्रमुख हैं। वे कहते हैं कि लूटा उसे जाता है जिसके पास कुछ होता है। यूपी-बिहार में ही सब कुछ है। बिहार में लालूजी तो यूपी में मुलायमजी प्रसिद्ध है। ये तो बस दो ठो नाम लिए हूं। पर इतना जान लो के जिनके पास लुटाने के लिए बहुत कुछ होत रहा, वही लूट और लूटा सकत है। फिल्मी दुनिया में गाना ऐसे ही नहीं बन जात- ‘मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने’। इस गाने में ही लाइन थी- ‘दिल वालों का करार लूटने’। अब अगर गौर किया जाए तो गीतकार ने सबसे पहले ‘दिल वालों’ की जगह ‘दिल्ली वालों’ का करार लिखने की सोची थी। पंच काका ने ही कहा कि इसे इतना ओपनली नहीं लिखना है। माना कि दिल्ली का करार यूपी-बिहार से जुड़ा हुआ है। आपको याद हो तो एक समय भोजपुरी गाना हिट हुआ था- ‘कमर लचके तो यूपी-बिहार झुमेला।’ यह प्रमाण है कि यूपी-बिहार की लोकप्रियता अन्य राज्यों से अधिक है। वैसे यूपी, बिहार के लोगों की भावनाओं को ठेस भी बहुत जल्दी पहुंचती है। पूरे देश में यूपी-बिहार के लोग फैले हुए हैं। काफी जगह तो ऐसी है कि वहां सभी हिंदी-भाषी लोगों को ‘बिहारी’ कहा जाता है। हमारे एक मित्र यूपी वालों को नाराजगी में ‘यूप्ले’ कहा करते हैं। ऐसे ही एक परेशानी के दिन उन्होंने अपनी भाषा में यूपी वालों के लिए एक नया शब्द इजाद कर दिया- ‘यूप्ले’ यानी ‘तुम खेलो’, वे शब्द के प्रयोग को कोड-वर्ड की तरह काम लिया करते थे। कोड वर्ड का मतलब भय-खतरा है। क्या यूपी-बिहार में देश के लोगों को डाराने वाले लोग रहते हैं? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो यूपी-बिहार को किसी के ले लेने और किसी को दे देने से भला आपत्ति क्यों होती। एक किस्सा यूं हुआ कि फिल्म ‘छोटे सरकार’ के एक गाने को लेकर शिल्पा शेट्टी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो गई। कारण था उनकी फिल्म का  गाना- 'एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे और बदले में यूपी-बिहार ले ले...।’
         यूपी-बिहार को लूटने-लूटाने और झूमने-झुमाने तक तो बात ठीक थी, कि चलो भैया! लूट और झूम लो। यूपी हो या बिहार यहां के शीर्ष नेताओं का परिवार बड़े कुनबें के रूप में विख्यात है। यहां बस गिने-चुनों की चलती है। कुछ परिवारों का दबदबा है। जब-जब से वे सत्ता में आएं हैं, अपने भाई-बंधुओं का जमावड़ा किया है। मान कि यह अपने अपने घर का मसला है, और कोई ऐसे ही लुटता-लूटता नहीं। कैसे लुटता-लूटता है इसकी सब खबर रहती है। पर यह क्या है कि सब जब अपने ही आदमी है, तो किससे क्या कहा जाए? है तो यह सरासर गलत ही। यह क्या बात हुई कि एक ‘चुम्मा’, और वह भी उधार का। यानी उधार के चुम्मे के बदले में ‘यूपी-बिहार ले ले...’। कोई ऐसे क्यों ले लेगा। हम नहीं हैं क्या? एकदम पोल थोड़ी है। कोई ऐसे कैसे ले सकता है? इसी बात पर कोर्ट में मुकदमा दर्ज हो गया। सबको लाइन में लगा दिया। यह बात अलग है कि हमारे यहां नियम में भी नियम और उपनियमों के अनेक दाव हैं। कानून का खेल बड़ा है। यहां देर जरूर हो जाती है, पर अंधेर नहीं। अगर अंधेर होती तो कोई देने-लेने की बात करता ही क्यों? ऐसे ही लेन-देन नहीं हो जाता क्या? बिना बात के...। पंच काका करते हैं कि संयुक्त परिवार अच्छी बात है। इससे कभी मैं और कभी तुम का खेल चलता रहता है। ना इसकी बारी और ना उसकी बारी। हम ही हम है बारीबारी। आपस में मिल बांट कर खा लेते हैं। आप भले इसे बदलती राजनीति का खेल कहें। पर जनता टेस्ट बदलना चाहती है। हर रोज दाल खाने वालों को अब कुछ दूसरा टेस्ट मिलना चाहिए।

० नीरज दइया

22 मार्च, 2017

जाकेट की सर्दी और गर्मी

काफी दिनों से सोच रहा था कि मैं भी माननीय प्रधानमंत्री जैसी जाकेट खरीद लूं। जब अधिक इच्छा हो गई तो कीमत जान कर ही होश उड़ गए। उड़े हुए होश को जल्दी से संभाला और दुकानदार से बोला- प्रधानमंत्री जी को छोड़ो, किसी दूसरे किस्म की दिखाओ भैया। वह बोला- साहित्यकारों वाली दिखानी है या बाबाओं वाली। मैंने जिज्ञासावश कह दिया- दोनों ही दिखा दो। पास खड़ी श्रीमती जी कान के पास आ कर फुसफुसाई- बाबाओं वाली नहीं लेनी। आप लिखते हो इसलिए साहित्यकारों वाली जचेगी। मैंने मुस्कुरा कर हां की निगाहों से उसे देखा। उसके अधरों पर मुस्कान खिल उठी। मेरा मानना है कि कपड़े अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए ही हम पहनते हैं। दूसरों को अच्छे दिखने के लिए पहनने वाली साहित्यकारों वाली जाकेट की कीमत बजट में थी, सो खरीद कर हंसी-खुशी घर आए।
            अगले दिन जाकेट पहन कर आइने के सामने खड़ा हुआ तो लगा जाकेट में मैं नहीं कोई दूसरा दिखाई दे रहा है। सुंदर चीजें सभी को आकर्षित करती हैं। बहुत से मित्रों से मेरे जाकेट में जचने को स्वीकारा और मुझे बधाइयां मिली। न्यू पिंच का सुखद अहसास तब सौ गुना बढ़ गया जब हैडमास्टर ने पहले ही कालांश में आकर कहा- कैसे कहूं, क्या कहूं, कहूं या नहीं कहूं। बहुत सोच में पड़ गया हूं। मैं खुशी खुशी बोला- कहिए जो भी कहना है, आपको सब कुछ कहने का हक है। तब वे बड़े संकोच से बोले- आज क्या है कि फोटोग्राफर को बुलवाया है। हमारी प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के साथ फोटो खींची जानी है। अगर आपको बुरा नहीं लगे तो एक घंटे के लिए अपनी जाकेट दीजिए, फोटोग्राफर का फोन आ गया है कि वह आने वाला है। जीवन में अनेक मांगने वालों से वास्ता पड़ा था पर यह अनुभव पहला-पहला था। मैंने जाकेट उतारते हुए सोचा कि मैं कर्ण हूं और यह भगवान हैडमास्टर बन कर आया है। मैं संकोच में तो था कि जाकेट के चक्कर में शर्ट को ढंग से प्रेस नहीं किया था और जाकेट उतारते ही यह रहस्य भी खुलना था।
            एक घंटे का कह कर ले गए थे फिर दो घंटे में हो गए और वे लौटाने नहीं आए तो मैं खुद लेने पहुंचा गया। वे बोले- मैं तो भूल ही गया था। जाकेट आपसे अधिक मुझ पर फबती है। लिजिए आपकी जाकेट। और हां थेंक्यू। मैंने मुस्कुराते हुए अपनी जाकेट लेकर पहन ली। गनीमत रही कि शर्ट के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा। बुरा तो उसके अगले दिन हुआ जब मैं जाकेट पहन कर प्राथमिक विभाग से गुजर रहा था कि कुछ छोटे बालकों ने आ कर मुझे घेर लिया। पहले तो मैं समझ नहीं पाया कि माजरा क्या है। बच्चे मन के सच्चे होते हैं और उन्होंने सच्चाई जाहिर कर दी कि मैंने उनके हैडमास्टर जी का जाकेट क्यों पहन रखा है? बड़े बच्चे ऐसे सवाल करने वाले भोले नहीं होते, मैं भी कहां भोला था। मैंने बच्चों को यह कह कर टरकाया कि यह जाकेट मैंने हैडमास्टर जी की खरीद ली है। वे अब अपने लिए नई लाएंगे।
            पंच काका कहते हैं कि साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है। ये सर्दी-गर्मी को रोकने के लिए नहीं, बस ऐसी ही त्रासदियां भोगने और दिखाने के लिए होती हैं। समझ में नहीं आता कि लोग साहित्यकारों वाली जाकेट पहनते क्यों है? क्या बस दिखाने के लिए कि हमारे पास भी है या यह कोई ड्रेस-कोड है?

० नीरज दइया
 

18 मार्च, 2017

कविता का पंजाबी अनुवाद / अमरजीत कौंके

कैनेडा से निकलने वाली पत्रिका ‘‘पंजाब टुडे” के नए अंक में `भाषांतर’ में श्री अमरजीत कौंके द्वारा किए कविताओं के अनुवाद मेरी कविता भी शामिल हुई है। साथ अन्य कवि हैं- श्री मंगलेश डबराल, डा.अनीता सिंह, अन्नू प्रिया, डा. ऋतू भनोट, डा. संतोष अलेक्स, आशा पांडेय ओझा और ज्योति आर्य।
शुक्रिया पंजाब टुडे टीम और कवि मित्र कौंके जी
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ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ / ਨੀਰਜ  ਦਈਆ

ਮੈਂ
ਸੰਭਾਲ ਕੇ
ਰੱਖਿਆ ਹੈ
ਤੇਰਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ
ਗੁਲਾਬ

ਜਦੋਂ
ਤੂੰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ
ਉਦੋਂ ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਾਣਦਾ
ਉਸਨੂੰ ਲੈਣ ਦਾ
ਮਤਲਬ

ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਸੀ
ਮੈਂ
ਕਿ ਕਿਸੇ ਨੂੰ
ਵੀ ਮਿਲ ਸਕਦਾ ਹੈ
ਚਾਹੇ ਅਣਚਾਹੇ
ਕੋਈ ਵੀ ਗੁਲਾਬ

ਹੁਣ ਤੂੰ
ਮੇਰੀ ਆਤਮਾ ਦੇ
ਵਿਹੜੇ ਵਿਚ
ਗੁਲਾਬ ਦੇ
ਫੁੱਲ ਦੇ ਨਾਲ
ਜਿਉਂਦੀ ਹੈਂ

ਤੇ ਮੇਰੇ
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ
ਉਡੀਕ ਦੇ ਨਾਲ
ਵਗਦੀ ਹੈਂ......

हिंदी कविता 
शब्दों की नदी में

मैंने संभाल रखा है
तुम्हारा दिया हुआ-
गुलाब ।

जब तुमने दिया था
तब मैं नहीं जानता था
उसे लेने का अर्थ।

नहीं जानता था मैं
कि किसी को भी मिल सकता है
चाहे-अनचाहे अचानक
कोई भी गुलाब ।

अब तुम
मेरे अंतस के आंगन में
गुलाब के फूल के साथ जीती हो
और मेरे शब्दों की नदी में
इंतजार के साथ बहती हो ।
००००

17 मार्च, 2017

विकास का गणित

ह निर्विवादित सत्य कि है कि हर भी काम की तीन प्रतिक्रिया होती है। सिक्का उछालेंगे तो कभी अनिर्णय की स्थिति भी आ सकती है। सरल शब्दों में उदाहरण से बात करें तो जैसे मैं लिखता हूं, तो एक वर्ग कहेगा- क्या खूब लिखता है, दूसरा वर्ग कहेगा- बकवास लिखता है और तीसरा वर्ग ऐसा होगा जो कुछ नहीं कहेगा। जैसे उन्हें मेरे लिखने ना लिखने से कोई सरोकार नहीं हो। सकारात्मक और नकारात्मक के साथ यह जो मौन और निर्लिप्तता का भाव है, इसका हर जगह बड़े महत्त्व का है। राजनीति में तो कहना ही क्या! सत्ता सदैव वोटिंग पर चलती है। यहां एक पक्ष में बैठता है तो और दूसरा विपक्ष में। पक्ष किसी बात पर कहेगा- हां तो विपक्ष की मजबूरी है कि उसे कहना होगा- ना। और किसी काम के संदर्भ में विपक्ष कहेगा- हां तो पक्ष कहेगा- ना। दोनों एक साथ एक जैसा कुछ कह नहीं सकते हैं।
          सत्ता पक्ष कहेगा- देश विकास कर रहा है, तो विपक्ष का बयान आएगा- गर्त में जा रहा है। विकास और गर्त की अपनी-अपनी दिशाएं है। पर यह खेल जैसा है। क्यों कि कभी ऐसा नहीं हुआ है कि एक ने कुछ कहा और दूसरे ने सहमति में सिर हिलाया हो। लगता है कि हां और ना का कोई गणित है। जो सत्ता में होगा वह जो कुछ कहेगा, उसके विपरीत विपक्ष कहेगा। दोनों की यह त्रासदी है। जब से मैंने होश संभाला, देखा भारत प्रायः त्रासदी को झेलता रहा है। देश के विकास की गति कौन कैसे आंकता है? सबके अपने-अपने तर्क है। मैं भ्रम में हूं- कभी लगने लगता है कि सच में विकास हो रहा है। इसके साथ ही जब मैं दूसरे पक्ष की बात सुनता हूं तो मुझे वे भी ठीक लगते है कि देश गर्त में जा रहा है। मेरे अपने तर्क और पैमाने नहीं है। कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि देश दो दिशाओं में गति कर रहा है। विकास की दिशा में गति पक्ष को दिखाई देती है, और गर्त की दिशा वाली गति दिखने के लिए विपक्ष है। इसका अभिप्राय यह अवश्य है कि देश गतिशील है। देश की गति पर तो संदेह दोनों को नहीं है।
          इनके बीच एक तीसरा पक्ष मौन है। यह पक्ष जानबूझ कर मौन धारण किए है। हिरणां मून साध वन चरणा को निमंत्रण का इंतजार है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही निर्दलयी को कहते हैं- आ जाओ, आ जाओ। हमारे साथ आ जाओ। हमारी पार्टी में आ जाओ। किसी चुप्पी के बाद की ‘हां’-‘ना’ महत्त्वपूर्ण होती है। हमारे पक्ष का क्या होगा जिसे जनता-जनार्दन कहा है। हमें निमंत्रण बस चुनाव के समय मिलता है। वोट नहीं देना लोकतंत्र का अपमान है, अपमान पढ़े-लिखे लोग करते नहीं। हमारी कामना है देश विकास करे, आगे बढ़े। विकास की दिशा में सभी जुट जाएं। पर वोट जिन्हें नहीं मिलता, वे नाराज हो जाते हैं। वे सदा गर्त की दिशा का आकलन करते हैं। सत्ता में तीसरा मौनी-पक्ष कभी पटला खा सकता है। आफत मेरी है कि मुझे सभी का सुनना पड़ता है। पंच काका कहते हैं- सबकी सुनो। सबकी देखो और करो अपने मन की। किसी का मन भला बुरा कैसे हो सकता है, वह तो विकास की दिशा देखता है। देखना चाहता है। देश के कर्णधार भारतीय मन को समझ कर विकास की राह चलते चलेंगे तो बात बनेगी।
० नीरज दइया 

16 मार्च, 2017

मंचस्थ अध्यक्ष का सुख-दुख

ध्यक्ष का पदनाम बहुत बड़ा है, इसलिए इस पर विराजित होना छोटे-मझले किस्म के लोगों के बस की बात नहीं। छोटे और मझले किस्म के लोग अध्यक्ष को आजीवन ताकते हुए सपना संजोते हैं कि हम भी कभी इस पद को पा सकेंगे। वैसे अध्यक्ष पद के दावेदार बहुत बड़े किस्म के खूब लोग होते हैं, परंतु केवल बड़ा होना ही अध्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती है। लोकसभा, विधानसभा से लेकर किसी भी पार्टी का अध्यक्ष होना अपने आप में महत्त्वपूर्ण होना है। अध्यक्ष में आकार-प्रकार और आयु के बंधन नहीं होते। अध्यक्ष का पद सभी बंधनों और सीमाओं से परे होता है। ममता, जयललिता, मुलामसिंह और सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद को इतनी गरिमा प्रदान कर दी है कि बस एक बार अध्यक्ष पद को पाते ही व्यक्ति उम्र भर के लिए विशिष्ट-जन की श्रेणी में शामिल हो जाता है। अध्यक्ष पर जब किसी छोटे अथवा मझले किस्म के व्यक्ति को पदस्त कर दिया जाता है, तब वह तत्काल बड़ा हो जाता है।
किसी सभा-गोष्ठी और पार्टी सभी में अध्यक्ष का आसन महत्त्वपूर्ण होता है। पार्टी के सदस्य या किसी सभा के श्रोता आप हैं तो जरूरी नहीं कि आपका फोटो अखबारों में छपे, पर अध्यक्ष होना इस बात की गारंटी देता है कि इसकी संभावनाएं बहुत है कि फोटो छपेगा। अध्यक्ष होने के अनेक सुखों में यह भी है कि प्रत्येक वक्ता और सदस्य आपका नाम जान जाता है। सभी अपनी बात आप को संबोधित करते हैं, कोई अनुमति चाहिए तो अध्यक्ष अनुमति देता है। अध्यक्ष बनते ही हल्का-पुलका आदमी भी धीर-गंभीर बन जाता है। बिना गंभीरता के कोई अध्यक्ष बहुत बार अध्यक्ष-सा लगाता ही नहीं। उसके साथियों के समझाना पड़ता है- आप अध्यक्ष है और गंभीर बने रहना अध्यक्षता के लिए जरूरी आभूषण है। जब कोई एक बार अध्यक्ष बन जाता है और कालांतर में अध्यक्ष पद नहीं रहता तब भी वह स्वयं को अध्यक्ष समझने की भूल अनेक बार करता है। इसी भूल के कारण वह परामर्शक की मुद्रा धारण कर यदा-कदा हर किसी को कुछ कहने-सुनने का अधिकार मान बैठता है। पर अध्यक्ष का सबसे बड़ा दुख होता है कि पद छूटता नहीं। एक बार अध्यक्ष का आसन मिल जाए तो उस पर बैठे रहने का मन करता है। अध्यक्ष पद मन को सबल और बलवान बनाता रहता है। जो जितना पुराना और उम्रदराज अध्यक्ष होता है, उसमें बैठे रहने की शक्ति बहुत होती है। मंचस्थ अध्यक्ष का दुख होता है कि उसके बोलने की बारी सबसे अंत में आती है। कुछ अध्यक्ष चालाक होते हैं, जो कोई न कोई बहाना बना कर कहते हैं कि जल्दी जाना है, और उन्हें बीच में ही संबोधन करने का सुख प्राप्त होता है। जो मचस्थ अध्यक्ष ऐसे बहाने नहीं बनाते अथवा जिन्हें बहाने बनाने की छूट नहीं होती है, उन्हें तो समारोह के अंत तक रूकना होता है।
पंच काका कहते हैं कि अध्यक्ष-पद सदा शंकाओं से धिरा रहता है। किस्म-किस्म की शंकाएं लोग करते हैं। अध्यक्ष को सब कुछ संभालना होता है। उसे अपनी शंका भूल, दूसरों को समाधान देना होता है। त्रासदी तब होती है जब स्वयं अध्यक्ष दीर्घ या लघु-शंका से ग्रसित हो जाता है। चालू संवाद में उसकी बेताबी में रूकना-रोकना सबसे बड़ा दुख है। कुछ शर्म और लिहाज, थोड़ा इंतजार करते कराते जब शंका बेकाबू होने की स्थिति में पहुंचने को होती है, तो वह मुस्कान के साथ उठता है और दुर्भाग्य सभी उसी को ताकते हैं।
० नीरज दइया

10 मार्च, 2017

कविताओं के बारे में कविताएं : पाछो कुण आसी

    ‘पाछो कुण आसी’ डा. नीरज दइया का तीसरा राजस्थानी कविता संग्रह है। इससे पूर्व उनके ‘साख’, ‘देसूंटो’ राजस्थानी में और ‘ऊचटी हुई नींद’ हिंदी में कविता संग्रह प्रकाशित हैं। वे अनुवाद से भी जुड़े हैं, और उन्हें हिंदी के साथ अनेक भारतीय कवियों की कविताओं के अनुवाद का लंबा अनुभव भी है। यह यहां रेखांकित करने का अभिप्राय कि नीरज दइया समकालीन भारतीय कविता के वर्तमान स्वर से पूर्ण परिचित है। संभवतः यही कारण है कि इस संग्रह में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो उनके कवि रूप को पहले की तुलना में अधिक गंभीर और प्रमुखता से अवस्थित करता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वे जहां आरंभ में युवा मन की अनुभूतियां रचते थे, यहां तक पहुंचते हुए वे उम्र और अनुभव की आंच से कविता लोक का एक परिपक्व वितान रचते हैं। कहना होगा कि कवि नीरज दइया राजस्थानी के एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर के रूप में पहचाने जाने लगे हैं।
    संग्रह की कविताओं का पाठ बाहर से जितना सरल-सहज प्रस्तुत होता दिखता है, वह भीतर से उतना ही जटिल व गुंफित है। ‘पाछो कुछ आसी’ संग्रह की कविताएं अपने पाठ के पीछे जैसे कोई आक्रोश या कहें घनीभूत पीड़ा से प्रेरित है। यहां काव्यानुभूतिया का विस्तार भीतर से बाहर, व्यष्टि से समष्टि में होता हुआ चहुंदिश से हाहाकार करता उद्वेलित करता है। कुछ संकेतों को स्थूल अर्थों में लिया जाए तो यहां एक ओर निकटतम पारिवारिक रिश्तों की असल हकीकत, उनसे मिले नैराश्य-प्रताड़ना पर आत्ममंथन है तो दूसरी ओर सम्बन्धियों, मित्रो और व्यवस्था के दोगले चरित्र, व्यवहार का जीता-जागता लेखाजोखा भी है।
    “म्हारी वा मुळ्क/ मा री मुळ्क/ जिकी बिसरगी/ मुळकती- मुळकती/ म्हनै” एक अन्य कविता में- ”ठीक कोनी/ घणो सीधो सादो होवणो/ लोग मोको तकै” आज की कुछ ऐसी ही जीवंत स्थितियों की व्यंजनाएं हैं। ऐसी घनीभूत पीड़ादायी अनुभूतियों को कवि ने बहुत ही सहजता से अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है। ‘दोस म्हारो नीं/ थारै स्वाद रो है’ के माध्यम से वह साफ कहता है कि अगर उसका कहा, लिखा अगर आपको नहीं रुचता तो यह उसका नहीं वरन आपके स्वाद का दोष है। ‘समझो नै/ सीखो, कठै कांई सबद बोलणा चाइजै/ कद किसो सबद बरतणो चाइजै...” जैसी उक्तियां इस बात का संकेत है कि हम शब्दों के प्रयोग के प्रति कितने लापरवाह हैं। पीड़ा और चेतावनी के ये वेदना युक्त स्वर ‘पाछो कुण आसी’ कविता-संग्रह का केंदीय भाव है।
    कवि स्पष्ट शब्दों में लिखता है- ‘आवणियै काल खातर ओ सवाल जरूरी है- काल अर आज में कांई फरक है।’ मुझे लगता है ‘पाछो कुछ आसी’ की कविताएं इन्हीं सवालों से जूझती है। सम्बन्धों के स्खलन को किस खूबसूरती से नीरज ने अभिव्यक्त किया है- ‘जिको कीं दियो जा सकतो हो/ सो कीं देय दियो/ संपत खातर/ बगतसर पल्लै राखी/ थोड़ी सी’क सरम/ थोड़ो क नेठाव..” यह जो थोड़ी-सी शर्म और धैर्य रखने की बात कवि अपनी इस कविता में कर रहा है, वह केवल ‘पाछो कुण आसी’ के कवि की ही नहीं, वरन सभी कला रूपों और कला माध्यमों से जुड़े समज की सामूहिक अभिलाषा है।
    कविताएं ऐसे ही नहीं लिखी जाती। कविता लिखने और रचने का अपना सुख, अनुभव और शिल्प है। कविता को हम किसी यांत्रिक तकनीक के तहत सांचे में नहीं ढाळ सकते हैं। इस संग्रह में कवि ने कुछ कविताएं कविता की रचना प्रक्रिया को लेकर भी लिखी हैं। उदाहरण के लिए इन पंक्तियों को देखा जा सकता है- “आंगणै आवै कविता बादळां दांई/ बरसै तो बरसै नीं बरसै तो करता रैवै टाळ बादळ/ बरसां बरस कोनी बरसै बरसणिया बादळ/ किण री मजाल/ कै एक छांट ई बरसा लेवै/ बिना मरजी” कविता सर्जन के बारे में यह सोच ही किसी कवि को एक अच्छा कवि बनाता है। यह प्रविधि और स्पष्टता ही कविता से अच्छी कविता उम्मीदें बधांता है। निसंदेह नीरज दइया इस कसौटी पर प्रमाणित और खरे उतरने वाले कवि हैं। उनकी कविता और राजस्थानी भाषा को लेकर संग्रह में कुछ उल्लेखनीय कविताओं को देखते हुए इस तथ्य दोहराया जा सकता है कि इन कविताओं में समकालीन कविता के बदलते रंग और रंगत की अनुगूंज साफ सुनाई देती है। इतना होने के उपरांत भी इस संग्रह में अंत में शामिल की गई गद्य कविताओं से मैं इत्तेफाक नहीं रखता। मुझे गद्य कविताओं में कविताएं कम और लघुकथाएं अधिक अनुभूत होती हैं।
    अच्छी छपाई के लिए सर्जना और सुंदर आवरण के लिए भाई रामकिशन अडिग को बधाई! और आखिर में डा. नीरज की कविताओं के बारे में डा. आईदान सिंह भाटी से सहमत होते हुए उन्हीं के शब्दों को दोहराना चाहता हूं- “नीरज दइया री ऐ कवितावां आज अर बीत्योड़ै काल री तो कवितावां है ईज, आवणाआळै काल रा पळका ई आं कवितावां में पड़ै।”
० नवनीत पाण्डे
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पुस्तक : पाछो कुण आसी 
विधा : काविता 
भाषा : राजस्थानी
कवि  : नीरज दइया 
प्रकाशक : सर्जना, बीकानेर
संस्करण : 2015 प्रथम 

पृष्ठ : 96 
मूल्य : 140/-

09 मार्च, 2017

पुस्तक संस्कृति को समर्पित एक शहर बीकानेर

डॉ. नीरज दइया
     देश के पटल पर बीकानेर पापड़-भुजिया और रसगुल्लों के कारण तो विख्यात है ही, साथ ही छोटी-काशी और हजार हवेलियों का यह शहर एक आश्चर्यजनक किंतु सत्य घटना को साहित्यिक अवदान के रूप में जोड़ता है कि यहां हजार से अधिक लेखक सक्रिय हैं। हजार लेखकों और पाठकों का होना हिंदी साहित्य के विकास क्रम में वर्तमान समय की कोई कल्पना नहीं, वरन सत्य घटना है। बीकानेर शहर के एक सौ पचास कहानीकार की रचनात्मकता का प्रमाण है ‘कथारंग-दो’। इसके पहले अंक में इसी शहर 75 कहानीकार शामिल हुए थे और इस बार यह संख्या दुगनी है। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ‘कथारंग’ का अभिनव जन-अनावरण हुआ। कथारंग-दो की विशेष बात यह भी है कि कहानीकारों में 56 महिलाएं हैं। इस संग्रह में वर्ष 1931 से 1998 तक की अवधि में जन्मे कहानीकारों को शामिल किया गया है। किसी निर्धारित भौगोलिक सीमा में रहने वाले कहानीकारों का संभवतया देश में यह पहला संकलन है। जन-अनावरण के अंतर्गत शामिल होने वाले हर व्यक्ति ने किताब को आमंत्रण मूल्य 300/- में खरीदा और इस प्रक्रिया में शामिल हुआ। लगभग 300 लोगों का किताब को खरीद कर जन-अनावरण करना कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
    ‘कथारंग’ के संपादक युवा नाटककार हरीश बी. शर्मा कहते हैं कि किताबें खरीदकर आमजन शामिल होकर यदि लोकार्पण की प्रक्रिया में शामिल हुए हैं तो यह उनका पुस्तक-संस्कृति के प्रति समर्पण है। जन-सामान्य को सोचने-समझने के लिए कथारंग के माध्यम से एक दृष्टिकोण मिलेगा। साथ ही निकट भविष्य में कहानी-लेखन कार्यशाला के आयोजन द्वारा बीकानेर में कहानी रचनात्मकता को अधिक गति प्रदान करेंगे। लोगों का मानना है कि मूल बात साहित्य को जन जन तक पहुंचने में सफल होना है। साहित्य में कहानी ही जन के अधिक करीब पहुंच सकती है इसलिए संभतः कहानी को लेकर ऐसा अभिनव आयोजन रखा गया है। बीकानेर के धरणीधर में साहित्य महोत्सव की भांति संपन्न इस जन-अनावरण के विषय में कहा गया है कि यह केवल इस वर्ष ही नहीं, प्रति वर्ष होगा। कहानी को आम जन तक पहुंचाना और कविता के आस्वादन के साथ-साथ दिन भर के इस कार्यक्रम में संकलित कहानीकारों का सम्मान भी किया गया। साथ मेहनत और लगन से व्यावसायिक ऊंचाइयां छूने वाले बीकानेर के लोगों के जीवन-संघर्ष पर आधारित कृति ‘हुनर और हौसले की कहानियां’ को भी जन-अनावरण में शामिल किया गया। 
    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कविता कोश के संस्थापक ललित कुमार ने कहा कि आम व्यक्ति तक साहित्य पहुंचे, इससे बेहतर तो कोई बात हो ही नहीं सकती। पढ़ने की आदत जीवन में चामत्कारिक परिवर्तन कर सकती है। ललित कुमार ने बताया कि कविता कोश और गद्य कोश के माध्यम से वैश्विक स्तर पर साहित्य को प्रसारित करने का कार्य किया जा रहा है, इसी तरह से कथारंग का भी एक प्रयास है और इस तरह के प्रयासों से भाषा और साहित्य ही नहीं समाज का भी हित होगा। विशिष्ट अतिथि व्यवसायी कन्हैयालाल बोथरा ने अपने उद्वोधन में कहा कि साहित्य-कला के साथ-साथ बीकानेर व्यवसाय की दृष्टि से भी काफी उर्वर है और यही वजह हैं कि बीकानेर में व्यवसाय की अपार संभावनाएं  हैं। युवा पीढ़ी के लिए ‘हुनर और हौसले की कहानियां’ प्रेरक किताब साबित होगी। कार्यक्रम के अध्यक्ष समाजसेवी रामकिसन आचार्य ने कहा कि सृजन का प्रकाशन होना और देश-दुनिया के समाने आना ही उसकी सार्थकता होती है। ऐसे समय में बीकानेर के कथा-साहित्य के प्रकाशन में ‘कथारंग’ एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है।।
    स्वागताध्यक्ष साहित्यकार-पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कथारंग में दूसरी बार प्रकाशित कहानीकार इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि उन्होंने कहानी विधा को पूरे मन से स्वीकार किया है। बीकानेर के कथारंग में संकलित रचनाकार हिंदी कहानी में आने वाले समय में बीकानेर का नाम करेंगे ऐसी आशा की जानी चाहिए।
    दूसरे सत्र में काव्य-जुगलबंदी का आयोजन किया गया जिसमें ओजस्वी कवि-शायर राजेश ‘विद्रोही’ और आनंद वि. आचार्य ने अपनी काव्य रचनाओं से शमा बांधा। समापन सत्र में 150 कहानीकारों का सम्मान किया गया। कहानीकारों को सम्मान स्वरूप प्रतीक चिह्न के साथ दिए जाने वाले साहित्य में ‘दुनिया इन दिनों’ का कहानी अंक भी भेंट किया गया। सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि पंचायत राज मंत्री राजेंद्रसिंह राठौड़ ने कहा कि बीकानेर में 150 रचनाकारों की कहानियां का संग्रह अपने आप में अनूठा प्रयास है। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि बीकानेर में इतनी बड़ी संख्या में साहित्यकार जुटे हैं, जिनकी कलम में सृजन है। अध्यक्षता बीकानेर विधायक (पश्चिम) डॉ.गोपाल जोशी ने कहा ‘कथारंग’ जैसे प्रयास सम-सामयिक हैं। इस तरह के आयोजनों से न सिर्फ नए लेखकों को अवसर मिलता है, बल्कि संवाद की भी एक प्रक्रिया शुरू होती है।  कोलायत विधायक भँवर सिंह भाटी एवं राजस्थान विधानसभा प्रतिपक्ष नेता रामेश्वर डूडी ने भी कार्यक्रम में उपस्थित होकर कथारंग को समर्थन दिया। 
    साहित्य अकादेमी से हाल ही में राजस्थानी कहानी के लिए सम्मानित बुलाकी शर्मा का मानना है कि कथारंग के समानांतर यदि राजस्थान और पूरे भारत में साहित्य के लिए ऐसी लगन जाग्रत कर दी जाए तो आने वाला समय बहुत सुंदर होगा। आज के दौर में मिटती संवेदनाओं को ऐसे आयोजन और विचार ही जिंदा रख सकते हैं। समालोचक डॉ. मदन सैनी कहते है कि बीकानेर जैसे एक ही शहर की तीन पीढ़ियों के एक सौ पचास कहानीकारों को कथारंग द्वारा पाठकों से रू-ब-रू कराना एक ऐतिहासिक घटना है और इसके लोकार्पण पर आयोज्य ‘बीकानेर साहित्य महोत्सव’ किसी भी ‘लिटरेरी फेस्टिवल’ की आधारभूमि सिद्ध हो सकता है।
    कवि नवनीत पाण्डे का मानना है कि ‘कथारंग’ में संकलित कहानियां बेशक हिंदी कहानी के मानदंडों को पूरा ना करती हो किंतु यदि इनके रचनाकार साहित्य से जुड़ कर पाठक और पुस्तक संस्कृति के विकास में सहयोगी बनेंगे तो बहुत बड़ी घटना के रूप में यह प्रयास चिह्नित किया जाएगा। कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी इसे जन जन का साहित्य के प्रति जुड़ाव मानते हुए कहते हैं कि साहित्य कभी मर नहीं सकता क्यों कि कहानी के संस्कार हमारे खून में है। दादी-नानी की कहानियां भले अब नहीं रही किंतु कहानी की संस्कृति के जीवित होने का यह आयोजन एक प्रमाण है।
    निकट भविष्य में संभव है बीकानेर में एक ऐसा आयोजन किसी पुस्तक के रूप में सामने आए कि जिसमें एक हजार रचनाकारों की रचनात्मकता का समेकित प्रणाम देश और दुनिया को देखने को मिले।

गंभीरता की खोज

डॉ. नीरज दइया
    आज सुबह-सुबह एक अजीब बात हुई। जब मैं छत पर कपड़े सूखाने जा रहा था तो मेरा लड़का मेरे पीछे-पीछे लगभग दौड़ते हुए आया और बोला- ‘आप रहने दो। मैं कर लूंगा। आप ये सब क्यों करते हैं?’
    मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही, पहली बात तो आज वह इतना जल्दी कैसे उठ गया? दूसरा वह कपड़े सूखाने के लिए छत पर क्यों जा रहा है? मैं पूछे बिना नहीं रह सका- ‘माजरा क्या है?’
    वह तपाक से बोला- ‘आप समझते नहीं। लोग मजाक बनाते हैं।’
    दिन का आगाज ही कुछ अजीब सा हो रहा था, मेरा लड़का कह रहा है कि मैं समझता नहीं हूं। मैं इसका बाप हूं और इस सदी में जन्मा यह बेटा, मुझे मेरी ‘समझ’ के बारे में प्रमाण-पत्र जारी कर रहा है। मैं इस बात को किसी गम की तरह निगल गया और उससे पूछा- ‘लोग क्या मजाक बनाते है?’
    ‘अरे रहने दीजिए ना, आप कोई दूसरा काम देखिए। यह मैं कर दूंगा।’
    ‘नहीं, मुझे भी तो पता चले कि क्या मजाक बनाया जा रहा है?’
    ‘वे कहते हैं कि तम्हारे पापा कपड़े धोते हैं। हमने अपनी आंखों से उन्हें तुम्हारी मम्मी के कपड़े सूखाते देखा है।’
    ‘कौन कहते हैं ऐसा? वे ऐसा कहने वाले कौन होते हैं?’
    ‘अरे ऐसा मजाक होता है। मैंने कहा ना- आप छोड़िए और इसे भूल जाओ। अब से मैं जल्दी उठूंगा और कपड़े मैं सूखाने जाया करूंगा या फिर खुद मम्मी। आप हर्गिज नहीं जाएंगे। कपड़े सूखाने जाते आपको शर्म नहीं आती ?’
    ‘अरे इसमें शर्म कैसी? यह तो घर का काम है। मिल कर कर लेते हैं। तेरी मम्मी कपड़े धोती है और मैं छत पर उन्हें डालने चला जाता हूं। इसमें ऐसी कौनसी आफत आ जाती है। मिलजुल कर काम करना क्या बुरी बात है।’
    ‘आप भाषण मत दिया करो। मैं जैसा कहता हूं, वैसा कीजिए। वर्ना मेरी बहुत इंसल्ट होती है।’
    मैं मन ही मन इक्कीसवीं सदी की संतानों और उनके संस्कारों को लानत भेजता हूं। खुद को खुद ही कोसता हूं। कैसे नगीने पैदा किए हैं, जो अपने समझ पर शक करते हैं और नेक बातों को भाषण समझते हैं। सुबह-सुबह की जल्दबाजी में इस मुद्दे को छोड़ना ही ठीक था। वैसे किसे दोष दिया जाए। अपने लाडले को हमने अपने सिर पर खुद ही चढ़ाया है, और अब यह इतना ऊपर चढ़ चुका है कि कभी-कभी लगता है कि सिर पर बैठ कर जूते मार रहा है। मुझे लगा कि इसके साथी समझदार नहीं बेवकूफ हैं। यह भला क्या मजाक हुआ ! कौन अपने घर में क्या करता हूं और क्या नहीं, इन सब बातों से उन्हें क्या लेना-देना? अगर गली के पीछवाड़े अपनी पत्नी की साड़ी सूखाने में ऐसी आफत टूटती है, तो आगे से यह काम बंद। एक फिल्म आई थी- ‘नौकर बीबी का’ जिसमें गाना था जमाना तो है नौकर बीबी का...। मुझे लगा आज घर में फिल्म का नया संस्करण जारी हो गया है। मैं उसके दोस्तों के मजाक में मजाक बन कर रह गया हूं। 
    मैं अपने पुराने दिनों की यादों में खो गया। मजाक और होली का कितना पुराना संबंध रहा है। पर अब वे दिन कहां। अब तो होली हो या दीपावाली सब के सब ऐसे हो गए है कि पुरानी सब बातें तो भूलने में ही भला है। मन बार-बार बीते दिनों को याद करता है। वे भी क्या दिन थे। हम भी कभी मजाक किया करते थे और कोई हम से भी मजाक किया करता था। ससुराल और जीजा-साली की मजाक का आनंद अब किताबों की बातें बन कर रह गया है। जनसंख्या के कंटोल में जैसे वे सब मजाक भी कंटोल हो गए हैं। अब ससुरल जाओ तो सास मिलती है। सास से मजाक नहीं किया जा सकता है। मजाक तो घरवाली से भी कहां किया जा सकता है। दोस्तों से करें मजाक करे तो वे नाराज हो जाते हैं। लगता है कि लोग मजाक समझना ही भूल गए हैं। दूसरी तरफ यह नई पीढ़ी है जो मजाक बनाती है तो कैसे-कैसे। ऐसे मजाक के चलते मैं अपने घर में कपड़े सूखाने में बीबी की मदद भी नहीं कर सकता। यह विषय जरा गंभीर हो गया है। संपादक जी ने कहा कि कुछ हल्का-फुल्का व्यंग्य हो। संपादक जी का व्यंग्य है कि भारी व्यंग्य आजकल कोई समझता नहीं। सोचने की बात तो यह है कि क्या चारों तरफ गंभीरता का राज्य स्थापित हो गया है?  
    संयोग ऐसा बना कि ऑफिस पहुंचा तो वहां एक किस्सा हाथ लगा। मुझे लगा मजाक और गंभीरता दोनों की बातें फिकी पड़ गई हैं। हो ना हो अब गंभीरता की खोज करनी ही होगी। बॉस ने मिस्टर के. एल. राठौड़ को बुला कर कहा कि मिस्टर राठौड़ आप बिल्कुल सिरियस नहीं हैं।
    मि. राठौड़ बोले- ‘जी सर, मैं बिल्कुल सिरियस नहीं हूं। अगर सिरियस होता तो ऑफिस क्यों आता। होस्पिटल में जा कर एडमिट नहीं हो जाता।’ इतना कहना था कि बॉस का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। भला ऐसा भी कोई कर्मचारी होता है जो साहब की जरा-सी बात नहीं समझे। यह तो बात का बतंगड़ बनाना हुआ। यूनियन लीडर बीच में बोल रहा था कि हरेक बॉस का पारा सातवें आसमान पर रहता है और वर्करस के पारे को तो जैसे पाला मार गया है। राठौड़ जैसे दो-चार हों तो कुछ बात बने। काम सभी करते हैं फिर भेद-भाव क्यों? मुझे यह सवाल गंभीर लगा।
    मैं गंभीर चिंतन में खो गया। विचार करने लगा कि पूरे सिस्टम में गंभीर कौन है? कौन है जो अपने काम की गंभीरता नहीं समझता, कौन है जो हर वक्त मजाक-मस्ती में खोया रहता है? काम के समय काम होना चाहिए और मजाक-मस्ती का भी अपना समय होना चाहिए। कुछ का मानना है कि मजाक-मस्ती में दिन-रात निकल जाए और जिंदगी गुजर जाए तो अच्छा है। कुछ मानते हैं कि मजाक-मस्ती से जरूरी काम को मानना चाहिए। जीवन में काम ही सब कुछ होना चाहिए। यहां फिर मजाक करना चाहिए। जीवन में अब केवल ‘काम’ ही रास आता है। यह सस्ता मजाक है। गंभीर लोगों का मजाक भी गंभीर होना चाहिए। ये क्या हुआ कि मजाक मस्ती करते रहें। ये तो कभी भी कर लेंगे। ‘काम’ का अपना समय होता है और अगर वह निकल जाए तो लौटकर नहीं आता। जिंदगी के इस गणित को समझते-समझते अब मैं तो मजाक मस्ती को जैसे भूल ही गया हूं। पूरी गंभीरता से घर में काम करता हूं और दफ्तर में भी काम करता हूं। मैं तो दिन-रात बस काम में ही खोया रहता हूं। यह माना कि बिना अपनी उम्र का लिहाज किए काम में खोए रहना ठीक नहीं। मेरे काम में खोए रहने और कड़ी मेहनत के बाद जब ग्रेड देनी की बारी आती है तो साहब लिखते हैं- ‘गुड’। तेल और मक्खन लगाने वाले चम्मच भले कोई भी काम में करें, उन्हें देखने कहने सुनने वाला कोई नहीं। आज ऐसे लोगों का ही बोलबाला है।
    हमारे समय की त्रासदी है कि हर कोई समझता है कि सिर्फ वह गंभीर है, बाकी सब तो यूं ही झख मार रहे हैं। बस गाड़ी चल रही है। मैं नहीं चला रहा, तुम नहीं चला रहे और वे भी कुछ कर नहीं रहे। फिर समझ में नहीं आता कि देश किस के भरोसे चल रहा है। सत्ता पार्टी को भ्रम है कि वे देश को चला रहे हैं, किंतु विपक्ष कहता है कि देश चल नहीं रहा, रुक गया है। सुनता हूं कि देश के कर्णधार गंभीर नहीं है। सोचता हूं कि विज्ञान ने इतनी प्रगति की है तो काश ऐसा संभव हो जाए कि कोई दवाई गंभीरता की इजाद कर ली जाए। फिर जो गंभीर नहीं लगे, उन्हें गंभीरता की दवा दे कर गंभीर बना दिया जाएगा और देश गतिशील हो जाएगा। अपने काम और व्यवहार के प्रति गंभीर होना ही देश की तरक्की का मूल-मंत्र है। जब हम सब गंभीर होंगे तो किसी घर के या पराए देश तक की हिम्मत नहीं हो सकती कि हमारे गंभीरता को जरा भी कम कर दे।
    मैंने पंच काका से बात की तो वे बोले- भारत में गंभीरता नाम की एक चिड़िया थी। जिसे सब लोग सोने की चिड़िया कहा करते थे। सोने की चिड़िया उड़ गई और गंभीरता हमारे देश से गायब हो गई। अब तो ऊपर से लेकर नीचे तक सारे मजाकिया लोग इक्कठे हो गए हैं। स्कूल में बच्चे पढ़ते नहीं। मास्टर पढ़ाते नहीं। शिक्षा और संस्कार चौपट। सभी सरकारी दफ्तरों का बुरा हाल है। अस्पतालों में मरीजों के लिए माकूल व्यवस्था नहीं है। पुलिस का हाल बेहाल है। सब खाने में लगे हैं। कोई काम के प्रति गंभीर नहीं है। काम हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो भी ठीक। बच्चे गंभीरता को खोजोगे तो खोजते रह जाओगे। अगर गलती से गंभीरता कहीं मिल भी जाए तो मुझे बताना। उसकी जांच करनी होगी कि असली गंभीरता है या कि ओढ़ी हुई छद्म गंभीरता है।


08 मार्च, 2017

पुत्र पैदा होने की गारंटी

ब भी कहीं थाली बजती है तो पास-पड़ौस को पता चलता है कि फलां के घर लॉटरी लगी है। हमारे देश के लोग भी कितने भले हैं। अपने सुख की सूचना गला फाड़-फाड़ कर देते हैं और दुख को भीतर ही भीतर दबा लेते हैं। बेटी जन्म पर रोनी-सी सूरत लिए घर के सब समवेत ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं कि लगता है जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा है। मातमी ऐसा भयावह दृश्य इक्कीसवीं सदी में भी वही का वही है। भले बेटियों ने कितने ही गढ़ जीत लिए हो, फिर भी उनके प्रति हमारे मन का मैल घुला नहीं। शिक्षा और आधुनिकता के पास भी कोई ऐसा साबुन नहीं है कि इस मैल को धो दे। पुत्र-रत्न की आमद पर छत चढ़ कर थाली बजने का रिवाज जिसने भी आरंभ किया होगा, बड़ा समझदार रहा होगा। बिना समझदारी के भला ऐसा और इतना फर्क कैसे हो पाता। ऐसे में कुछ सिरफिर हैं जो बेटी के जन्म पर भी थाली ले कर छत पर चढ़ जाते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं। बेटियों को बेटों का दर्जा देना और बेटों जैसे ठाठ-बाट से पालना कहां का इंसाफ है। वे पराई अमानत होती हैं और ऐसा करना तो उन से मोह करना हुआ। हमारी इतनी विशाल परंपरा है कि बेटियों के लिए मां-बाप निर्मोही रहे। उन्हें पराया धन समझें और जिसमें हिम्मत देखे, उसे सौंप कर गंगा नहा लें।
          यह सनातन चक्र है। बेटे या बेटी की शादी के बाद इंतजार करते हैं कि कब थाली बजाने का अवसर आए। यह अवसर अगर नियत समय पर हाथ लगने के आसार दिखाई देता है, तो चेहरों पर मुस्कान आती है- बड़ी जल्दी की। और इसके विपरीत देरी होने पर इस अवसर का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हुए कहते सुना जाता सकता है- कब होगा, या होगा ही नहीं। बड़ी देर कर दी। इसने साथ जिन-जिन की शादियां हुई थी, सबके घर थाली बज गई। हमारे घर कब बजेगी? ऐसे में बसंत के बीतने के बाद फिर से बसंत को लाने में कई बार वर्षों के वर्ष लग जाते हैं, और कई बार तो बादल बिन बरसे ही रूठे रहते हैं।
          निसंतान दंपति निराश होकर आशा करते हैं कि कुछ भी हो जाए, पर हो जाए। अभी भारत देश में कई सदियां लगेगी, बांझ को अथाह अपमान से इक्कीसवीं सदी भी नहीं बचा सकती है। खोट भले खुद के लड़के में हो पर गालियां तो बहू के हिस्से ही आएगी। परिवार नाम की इस मिली-जुली सरकार में सदैव महिलाएं ही प्रताड़ित होती है। आश्चर्य यह कि महिलाओं द्वारा इस क्रम जारी रखा जा रहा है। ऐसे झगड़ों में पाखंडी तांत्रिक और ढोंगी साधू बाबाओं की लॉटरी लग जाती है। कहा है- या तो रोगी ठगाता है, या भोगी। ये रोगी-भोगी बाकायदा ऐसे-ऐसे रास्ते निकालते हैं कि सब कुछ लुटा के होश में आते हैं। जब आंखें खुलती हैं, बहुत देर हो चुकी होती है। बेटे की उम्मीद में बेटियों की हर बार आमद वालों को पुत्र पैदा होने की गारंटी देकर उनकी जान भी मांग सकते हैं। यह बात जुदा है कि पुत्र की आशा रखने वालों का अंतिम धेय यही होता है कि मरने पर कोई तो मुखाग्नि देने वाला चाहिए। पंच काका कहते हैं कि पुत्र पैदा होने की गारंटी छोड़िए। इस संसार में मरने के बाद हम सभी की गति और दिशा एक ही होनी है।
 ० नीरज दइया 

06 मार्च, 2017

फन्नेखां पर क्यों लिखूं?

लेखक का किसी पर लिखना अथवा नहीं लिखना किसके हाथ में है? क्या खुद लेखक के हाथ में है, या कई दूसरे घटक काम करते हैं। लेखक लिखता अथवा टाइप अपने हाथों से जरूर करता है, पर यह सब उसके वश में नहीं होता। भीतर-बाहर की प्रेरणा और परिस्थितियों से लिखा जाता है। कोई रोजाना लिखता है। सुबह-दोपहर और शाम लिखता है। रात को सोता नहीं और लिखता है। पर कुछ ऐसे भी है जो सालों-साल नहीं लिखते हैं। लिखना तो सभी चाहते हैं, पर लिखा नहीं जाता। अधिक ज्ञानी लेखक लिख नहीं सकते। वे जब कुछ भी लिखते अथवा लिखने की सोचते हैं तो उसका ज्ञान हावी हो जाता है। उन्हें लगता है- यह श्रेष्ठ नहीं है। ज्ञानी लेखक केवल श्रेष्ठ लिखने की सोचता है, और लिख नहीं पाता। ज्ञानी जिसे अज्ञानी और सामान्य समझता है वह अपने लेखन में लिखते-लिखते अनेक श्रेष्ठ रचनाएं लिख लेता है। यह ज्ञान कुछ तो वास्तविक होता है, और कुछ को भ्रम हो जाता है कि इतने साल हो गए सो अब तो हम ज्ञानी हो ही चुके हैं। कुछ अपनी उम्र से और कुछ अनुभव से परमज्ञानी होने का भ्रम पाल लेते हैं। वे फिर परामर्शक बन जाते हैं। ऐसा ही भ्रम एक लेखक को हो गया कि मैं लिखता हूं। मैं लिखता जरूर हूं पर ज्ञानी अथवा परमज्ञानी होने का भ्रम दूर रखता हूं। मैं लिखता जरूर हूं पर किसी के कहने पर लिखता नहीं हूं और किसी के कहने पर रुकता भी नहीं हूं। तो हुआ यूं कि एक लेखन महोदय ने अपनी किताब भेजी और लिखने का अनुरोध किया। उन्हें मैं किसी योग्य लगा तभी उन्होंने अनुरोध किया होगा। मैंने सहृदयतावश कह दिया- जी, मैं प्रयास करूंगा। यह कहना मेरा अपराध था। उनके साप्ताहिक फोन आने आरंभ हो गए। हर बार पूछते हैं- लिखा क्या? मेरी किताब पर लिखा क्या? कब तक लिख देंगे? किसी किताब पर लिखना कोई कठिन काम नहीं है। कोई भी लिख सकता है। किसी भी किताब पर लिख सकता है। कोई चाहे तो अपनी खुद की किताब पर खुद भी लिख सकता है। ऐसा हो सकता है कि खुद लिख कर अपने किसी मित्र का नाम अटका दिया जाए। कुछ लिखने वाले ऐसे भी हैं कि खुद आगे बढ़ कर अनुरोध करते हैं कि हम से लिखवा लो। हम लिख देते हैं। ऐसे बहुत से विकल्प हैं। फिर भी मैं उन मित्र पर नहीं लिख सका। मुझे किताब जमी नहीं कि उस पर कुछ लिखने का मन बना सकूं। किसी को सीधे-सीधे यह कहना भी अभद्रता है कि मुझे आपकी किताब ठीक नहीं लगी। माफ कीजिए, मैं नहीं लिख सकता। ऐसी अभ्रदता को बचाने के चक्कर में वे मेरा साप्ताहिक खून पीते रहे हैं और मैं अब तक पिलाता रहा हूं।
            एक दिन पंच काका मुझ से बोले- तुम, फन्नेखां पर क्यों नहीं लिखते? मैंने कहा- क्यों क्या हुआ? क्या बात है? क्या उन्होंने अपको भी फोन किया है? काका बोले- नहीं उसे छोड़, यह बता लिखने में तुझे समस्या क्या है? मैं क्या कहता, बस इतना ही कि आप कहेंगे तो लिख दूंगा। बहुत बार अनेक काम हम मन मार कर भी करते हैं। पर दूसरे ही पल सोचा- मैं फन्नेखां पर क्यों लिखूं? मेरा लिखना इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है, जिस के लिए फन्नेखां मरा जा रहा है। फोन पर फोन कर रहा था और अब काका तक पहुंच गया। आपने किताब लिखी, छपा ली और मुझे भेज कर प्रेम, मूर्खता अथवा आदर जो भी प्रगट करना था कर दिया। अब उन्हें भूल जाना चाहिए। मुझे अगर किताब अच्छी लगेगी अथवा मेरा मन करेगा तो उस पर लिखूंगा। यह कोई जवरदस्ती हुई कि लिखने के लिए मजबूर किया जाए। भाई फन्नेखां! बस करो यार। आगे से अब मुझे फोन मत करना। मेरे भीतर का भद्र इंसान अब अभद्र होने वाला है। वह अभ्रद कह देगा- दो कौड़ी का लेखन है तुम्हारा। जाओ मैं नहीं लिखता।
० नीरज दइया

05 मार्च, 2017

नियति के आगोश में

सुबह कितनी जल्दी हो जाती है पता ही नहीं चलता। लगा अभी थोड़ी देर पहले ही तो रात को सोए थे, और इतनी जल्दी कैसे पूरी रात गुजर गई। अभी मेरी आंखें पूरी खुली भी नहीं थी, खुलने को तैयार भी नहीं थी कि लगा कोई बाहर हमारा दरवाजा पीट रहा है। एक सपना अभी आंखों में अटका था, कुछ स्मृति में और कुछ विस्मृत होते हुए। किसी ने सपने की हत्या कर दी। मैं अपने सपने को भूल सोचने लगा कि कुछ लोग बेवकूफ होते हैं। वे किसी के घर का दरवाजा बजाना भी नहीं जानते, और वह भी सुबह-सुबह के वक्त। सोचते नहीं- अरे, कोई सो रहा होगा। क्यों किसी की नींद में खलल डाला जाए। कोई सपने न जाने कहां तक जाता कैसे पूरा होता। ऐसे लोगों को कौन समझाएं कि भैया किसी का दरवाजा बजाना सीखो। क्या यह नहीं होना चाहिए कि आहिस्ता से दरवाजे पर दस्तक करें और फिर इंतजार की मुद्रा में तकिन विश्राम। मानता हूं ऐसा थोड़ा-सा इंतजार भी बहुत बड़ा लगता है। पर यह भी तो सोचिए कि भीतर जो कोई भी है, उसे थोड़ा वक्त लगेगा या नहीं। क्या वह बस इसी इंतजार में है कि आप दरवाजा बजाएं और वह झट से खोल दें। ऐसा भी नहीं है कि आपने बटन दबाया और मेरे घर का दरवाजा किसी तिलस्म की तरह सिम-सिम पलक झपकते ही अपने आप खुल जाए।
      मैं झुंझलाते-झल्लाते हुए उठ कर नाराजगी लिए दरवाजे तक पहुंचा और दरवाजा खोला। सूनी आंखों से निहारते दो अपरिचित-से चेहरे थे। उन के पीछे कुछ दूरी पर सामने वाली आंटी खड़ी थी, जो अपने हाथ से इशारा करते हुए मुझ से कहने लगी- ‘सामने वाले दादा जी गुजर गए हैं।’ मैं सामने के घर की दिशा में देखते हुए उन लड़कों को पहचानने की कोशिश करने लगा। लगा अरे ये तो यहीं के, सामने घर में ही रहते हैं। काफी बार इनको देखा है। जिन दादा जी की बात बताई जा रही थी, वे उनके पोते हैं। मैं अपने सपने को याद करता हुआ इस सच को पहचान नहीं सका। मेरा पहले का गुस्सा और खीज जा चुके थे। वे चले गए और मैं भीतर आ गया। पत्नी ने पूछा- ‘कौन थे।’ मैंने सारी कहानी एक पंक्ति में बता दी- ‘सामने घर में दादा जी गुजर गए हैं।’ मैंने पाया बिना किसी भाव के वह बोली- ‘ये तो होना ही था। अच्छा हुआ जीवन सुधर गया। मुक्त हो गए, अगर एक दिन पहले संसार छोड़ते तो बड़ा पुन्न रहता। आब तो वैशाख भी उतर गया।’ मैं जिरह करने के मूड में जरा भी नहीं था, किंतु अब वैशाख के उतरने ने मुझे गहरे तक हिला कर रख दिया- ‘क्या फर्क पड़ता है इन सब बातों से। ये बातें बस कहने-सुनने में अच्छी लगती हैं। तुम तो जल्दी से चाय बनाओ।’ मेरे प्रतिवाद से वह कुछ झुंझला जरूर गई थी, किंतु मौत की खबर उस में किसी आश्चर्य या दुख के भाव को ला पाने में असमर्थ रही। मैं अपने सपने को जैसे पूरा भूल चुका था। मानो वह स्मृति कहीं चली गई थी और मैं उसका पीछा कर रहा था। अंततः मैं हार गया मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। मौत एक जीवन ले जा चुकी थी और मेरा सपना भी बिना किसी मौत के मुझ से दूर चला गया।
      मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि यह जीवन भी एक सपना है और उसे एक दिन चले जाना है। जीवन के रंगमंच पर जैसे कोई नया नाटक आरंभ हो चुका था। कोई भी मौत कभी नाटक नहीं, सच्चाई होती है। मैं सोचने लगा कि कितनी सहजता से हम किसी के अंत पर ऐसी चर्चा कर लेते हैं। कुछ विमर्श बाहरी-भीतरी यहां बस चलते रहते हैं। पूरे संसार में कहना-सुनना और निरंतर विचार करना जारी था, संसार तो बहुत बड़ा था। उसका हृदय भी बड़ा था। वह ऐसे कितने ही गम वर्षों से झेलता आया था। पर गली तो छोटी थी। बेहद तंग तो नहीं पर इतनी बड़ी भी नहीं। इतने लोगों के कारण गली तंग लगने लगी थी। सभी बड़ी सहजता-सरलता से अपने विचारों में खोए थे और अंतिम यात्रा के लिए जरूरी काम जारी थे।
      जीवन का सत्य क्या है? किसी जीवन की सच्चाई क्या है? जो जीवन जा चुका है, वही तो जानता है- अपनी सच्चाई। कैसे वह इस संसार से चला गया। वह गया है या उसे कोई ले कर गया है। वह किसी के साथ अपनी इच्छा से या अनिच्छा से चला गया। वह इस संसार में अकेला आया था और गया भी अकेले। पर ऐसे अकेले कोई कैसे जा सकता है। इस आने जाने में किसी की इच्छा क्यों नहीं होती। ऐसे कोई कहीं आना-जाना नहीं चाहता। सब यहीं रहना चाहते हैं। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं। ना हमारा आना, ना हमारा जाना और ना ही हमारा ठहरना। यही जीवन की सच्चाई है।  जब जीवन हमारा है, तो इस पर हमारा अधिकार क्यों नहीं है। जीवन पर हमारा अधिकार होना ही चाहिए। यह क्या भला, जीवन हमारा और अधिकार हमारे नहीं। मैं सोचने लगा कि मौत भी जब आती है, तब वह जीवन का दरवाजा पीटती है, या फिर हल्के-से दस्तक देकर थोड़ा इंतजार करती है। नहीं मौत तो बिना किसी दरवाजे पर दस्तक दिए आती है, उसके लिए कोई दरवाजा बंद हो नहीं सकता। मैं भी क्या-क्या सोचने लगा। मैं अभी जरा जल्दी में हूं और ये गंभीर बातें तो हमें आराम से करनी चाहिए। ऐसा हम कभी सोचते भी नहीं। ऐसा कुछ सोचने के लिए जीवन में अवकाश नहीं। आज अवकाश है- रविवार। मैं सोच रहा हूं। आज का दिन ही मौत ने चुना, जब मौत पास के घर में आई और किसी जीवन को चुरा कर ले गई। आना उसकी नियती है। 
      उसके आ कर जाने से गली में स्त्रियों का विलाप अब किसी गीत की भांति रुक रुक कर फिर फिर जारी हो रहा था। इस रोने में दर्द तो था, किंतु बहुत ठहरी हुई सहजता भी थी। जैसे उन सब से सोच रखा था कि ऐसा होना नियति है। दादा जी ने अस्सी बरस ले लिए। अब उनको इस संसार से जाना ही था। वे बीमार भी रहने लगे थे। घर-परिवार के सभी काम तो उन्होंने कब के कर दिए। उनका अब कोई काम नहीं था। जैसे वे पिछले काफी वर्षों से इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। मैं भी इंतजार कर रहा था कि कब घर से बाहर निकलूं। मुझे भी उन लोगों में शामिल होना था। चाय-नाश्ते के बाद अब मैं भी घर के बाहर अंतिम-यात्रा में शामिल होने पहुंचे लोगों के बीच पहुंच चुका था। मातम में पूरी गली जैसे मौन होकर विलाप सुन रही थी। वहां काफी लोग जमा थे, पर सभी मौन और भाव-शून्य बस शव-यात्रा की तैयारियों में व्यस्त थे। इन दिनों धूप अधिक होने लगी है, इसलिए सब कुछ जल्दी-जल्दी निपट जाए तो अच्छा। इस जल्दबाजी में मैं भी शामिल था। यह तो अच्छा हुआ, आज रविवार है नहीं तो एक छुट्टी शहीद हो जाती।
      मौत को डरावनी कहा जाता है पर हम सब को देख कर कोई हमें डरे हुए नहीं कह सकता था। हम मौत से डरे हुए नहीं थे। यह मौत जो एक जीवन ले कर चली गई थी, बड़ी जानी-पहचानी थी। हम सब जैसे तैयार थे कि उसको आना है। जिस देह में एक जीवन था वह जीवन भी अब थक चुका था। वह जीवन जहां वर्षों रहा था, वह शरीर अब किसी काम का नहीं था। अंततः जीवन मुक्त हो गया। जैसे जीवन जाते जाते अपनी छांया यहीं छोड़ गया। देह उस जीवन की प्रतिलिपि थी और घर वाले उस प्रतिलिपि को घर से बाहर कर देना चाहते थे। जीवन से रहित देह को रखने का स्थान घर नहीं होता। यह कोई नयी बात नहीं है, सभी यहां ऐसा ही करते हैं। करते क्या है, हम सब को ऐसे करना होता है। बस एक बंदरिया को देखा है जो अपने मृत बच्चे को छाती से चिपकाए-चिपकाए घूमती रहती है। हम ऐसा नहीं करते, ऐसा नहीं कर सकते। घर वालों के लिए खुशी की बात थी जो कोई किसी को कह नहीं रहा था पर उन सब ने स्वीकार कर लिया था कि दादा जी चले गए हैं तो घर में एक कमरा खाली हो जाएगा। यह उनका कमरा अब किसी और को मिल जाएगा। हमेशा के लिए नहीं। ठीक ऐसे ही जैसे दादा जी को कभी यह मिला था। उन के जाने से बाकी किसी दूसरे के हिस्से था। कहीं कुछ भी खाली नहीं हुआ था। कमरे के फिर से भर जाने की बात और सब कुछ भरा-भरा था। वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं।
      आज वह घर औरतों से भरा हुआ था और गली आदमियों से। औरतों को तो घर में ही रोने का काम करना था। और कुछ जानती थी कि उनको बस चुपचाप यहां काफी देर तक बैठना है। उन औरतों में जो बस अभी-अभी आईं थी, वे पूछ रही थी- ‘ऐसे कैसे हुआ?’ वे बस पूछने के लिए पूछ रही थी। उन सब को सब मालूम था। नहीं भी मालूम होता तो भी यह मालूम होना कोई बहुत जरूरी नहीं था। वे कुछ पूछने और बात करने का रिवाज निभा रहीं थीं। आदमियों में भी रिवाज निभाने वाले काफी थे।
      हम सब को शव-यात्रा के पीछे-पीछे जाना था। हमारी सब की अपनी अपनी समस्याएं थी। अलग-अलग समस्याओं थी पर मेरी कोई समस्या नहीं थी। आज रविवार जो था। मैं ऐसे लोगों में शामिल हूं जो हर रविवार को तो कम से कम समस्याओं की छुट्टी रखते हैं। मेरे पास बैठे सज्जन को रविवार के होते हुए भी दुख था कि नगर निगम को समय पर फोन कर के गाड़ी मंगावा लेते तो इतनी दूर पैदल नहीं चलता पड़ता। एक दूसरे सज्जन को समस्या थी कि हम नई पीढ़ी के लोग पुराने रस्मो-रिवाज भूलते जा रहे हैं। अब के लोगों को अर्थी तक बांधना नहीं आता। क्या हमें इन सब बातों को जानना नहीं चाहिए। कैसे-क्या संस्कार होने चाहिए यह तो सभी को ध्यान होना चाहिए। जो कुछ संस्कार जानते थे वे जो जानते थे वैसा कर रहे थे, उन करने वालों के कामों में भी कमियों का बखान कुछ अधिक जानने वाले लोगों में होने लगा। वे कर कुछ भी नहीं रहे थे। न रोका-टोकी बस एक दूसरे को बता रहे थे- ऐसे नहीं, हमारे तो ऐसा होता है।
      इतने में सुबह जो लड़का मुझे कहने आया था, वह आया और मेरे पास बैठे एक बुजुर्ग को पूछने लगा- ‘दादा जी, ये मोती और सोने का तुस कैसे करना है।’ दादा जी ने बताया- ‘आंखों में मोती और मुंह में सोने का तुस देना है।’ ये बात मुझे परेशान करने लगी कि ऐसे जानने वाले लोग जब चले जाएंगे तब कौन ध्यान रखेगा इन बातों का। मैंने पाया दादा जी के लड़के रमेश को भी ऐसा कुछ ध्यान नहीं था। बस सारा काम हो रहा था, अंतिम क्रिया का सामान लाने वालों से लेकर उस सामान का प्रयोग करने वालों तक का जैसे कोई क्रम बिना किसी निर्धारण के किया हुआ था।
      वह समय आया जब अर्थी को उठा कर गली में लाया गया और हम शमशान की तरफ ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए हजूम में चल निकले। अब घर से रोने के स्वर में काफी तेजी आई किंतु लोगों के समवेत स्वर-घोष में वह मंद लगा। शव को कंधा देने वाले जवान थे वे तेजी से चले तो पीछे चलने वालों पीछे छूटने लगे। किसी ने दौड़ कर शव को कंधा देने वालों को धीरे चलने का कहा तब पीछे वालों को थोड़ी राहत मिली। फिर भी चार जवानों और कुछ बूढ़ों की इस दौड़ में मुकाबला काफी देर तक होना था। सभी राम नाम की सत्यता को जैसे कंठस्त फिर फिर कर रहे थे। सभी को यह सत्य विदित था। इस झूठे जगत में जिस की सत्यता का जयघोष हो रहा था, वह कौन था? वह वहां आगे था या कहीं पीछे छूटता चला जा रहा था। ऐसा तो नहीं उस परम सत्य को बूढे दादा जी ने मौत से मिल कर पा लिया था और वे उस के पास पहुंच गए थे या हम उनको नियति के आगोश में सौंपने चले जा रहे थे।
००००

01 मार्च, 2017

चीं-चपड़, गटर-गूं और टीं-टा-टू

स बदलते समय में बहुत कुछ वदल रहा है। आए दिन कुछ न कुछ देखने-सुनने और भोगने को मिल रहा है। किसे सही कहें, और किसे गलत? सही और गलत दोनों पक्ष साथ-साथ चलते हैं। सवाल यह है कि हम किसे सही मानते हैं। यह सोचना होगा कि हम जिसके पक्ष में हैं, उसके पक्ष में क्यों है। कई बार हमारी आंखें, खुली होते हुए भी बंद होती है। जानबूझ कर आंखें बंद कर लेने वाले भी हमीं हैं। सही को सही और गलत को गलत बोलना चाहिए। मूक-दर्शकों की वजह से गलत अंततः लाइलाज बीमारी बन जाता है और हम बेबस हो जाते हैं।
           वही राजे-महाराजे हैं। अब बस राजा का चेहरा बदल गया है। घृतराष्ट-युग में लोग बहुत चीं-चा करते थे। आज भी चीं-चा करने का सिलसिला जारी है। सभी इस चीं-चीं और चीं-चा में शामिल होते हैं, पर जहां करना होता है वहां ‘चूं’ नहीं करते हैं। आवाज उठाने से कतराते हैं। डरते हैं। हम समूह-गान तो गा लेते हैं, पर एकल-गान जैसे हमारे बस की बात नहीं। लोग क्या कहेंगे? ऐसा सोचते हुए अपनी ‘चूं’ को भीतर का भीतर रखते हैं। गलत होता है तो ‘चूं’ होनी चाहिए। एक ‘चूं’ होने से संभव है दूसरे भी ‘चूं’ में शामिल हो जाएं। हमें संगठित होकर अपनी ‘चूं’ को समवेत सुर में गूंज बना देना होता है। पंच काका कहते हैं- हे निरीह प्राणियों! लोकतंत्र में ‘चूं’ का महत्त्व समझो। अपनी चूं को भीतर दबा लेना लोकतंत्र की हत्या है।
           जब चूहों की चूं-चा सुनाई देती है तो हम तुरंत उन्हें पकड़ कर घर से बाहर कर देना चाहते हैं। पिंजरा केवल चूहों के लिए नहीं हम सभी के लिए अलग-अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है। घर में कबूतर आते हैं और अपना गाना- ‘गटर-गूं, गटर-गूं’ के स्थाई अंतरे में सुनाते हैं। उनके गाने को हम सुनना नहीं चाहते, और उन्हें उड़ा देते हैं। वे फिर से आते हैं, और अपना पुराना छूटा हुआ राग गुनगुनाते हैं। हम चूं-चा और गटर-गूं जैसी कोई आवाज पसंद नहीं करते हैं। यह हमारी पसंद है कि कुछ कुत्तों-बिल्लियों की हाऊ-हाऊ और म्याऊ-म्याऊ पसंद है। जीवन के आस-पास अनेक जीवन है। मच्छर, मक्खी से लेकर ऊंट-हाथी तक के अनेक जीव-जंतु और पेड़-पौधों से हमारा परिचय सिमटता जा रहा है।
           यह आत्मबोध मुझे कल ही हुआ जब पंच काका ने सैर करते समय एक पेड़ के पास रूक कर अचानक पूछ लिया- जानते हो यह किसका पेड़ है? मैं बगले झांकने लगा। उस पेड़ को ऊपर-नीचे से गौर से देखते हुए सोच रहा था- काश! यह पेड़ खुद बोल पाता। काका हंसे और बोले- वाह बाहदुर, तुम्हारी पीढ़ी के क्या कहने। दिन-रात ना जाने किस-किस ‘टीं-टा-टू’ में खोए रहते हो। अपनी झेंप मिटाते हुए मैंने काका से कहा- हम प्रकृति से कट से गए हैं। बहुत से पेड़-पौधों के नाम हमें ध्यान नहीं। अनेक जीव-जंतुओं के नाम नहीं जानते हैं। काका बोले- नहीं जानते तभी तो पूछ रहा हूं। अब की पीढ़ी सो रही है। मैं पूछता हूं कि तुम लोग कब तक सोते रहोगे। कभी खुद से खुद को बाहर निकलो। अपने आस-पास को पहचानों। दुनिया बहुत बड़ी है। तुमने दुनिया को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया। जेब में बंद कर लिया है। ये क्या तुम्हारा इंटरनेट जो है, दिन-रात लगे रहते हो। सुनो, ये ‘शिरीष का पेड़’ है। कल तुम हजारी प्रसाद जी का निबंध पढ़ रहे थे।
 ० नीरज दइया