31 दिसंबर, 2016

हमारा डिजिटल-युग में प्रवेश

जो कोई लेख लिखता है, वह लेखक होता है। जो सुलेख लिखता है, वह सुलेखक होता है। जो कुछ भी नहीं लिखता उसे क्या कहेंगे? सोचने की बात है कि अगर ऐसे लेखक, सुलेखक और अलेखक मानेंगे तो चारों तरफ लेखक ही लेखक हो जाएंगे। हो जाएंगे नहीं, हो गए हैं। पूरा इंडिया डिजिटल युग में प्रवेश कर रहा है। करना कुछ नहीं है, बस मोबाइल-क्रांति से पूरा देश जुड़ गया है। पूरे देश में लेखकों और विचारकों के साथ क्रांतिकारियों की फौज खड़ी हो गई है। आस-पास के भाई-बंधुओं में भले सोशल रिलेशन कम हुआ हो पर नेट और नोट की इस नई दुनिया में हम पूरे विश्व से बातें कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आपके बस ‘गुड मोर्निग’ लिखने की देर है कि कुछ ही मिनटों में वहां मोर्निग को तुरंत गुड करने वाले आ जाएंगे। यह डिजिटल युग है, आप घर के बाहर खड़े हो कर जोर से बोलिए- ‘गुड मोर्निग।’ देखिए कितनों का जबाब आता है। आपने जोर से बोला तो संभव है कोई डांट दे, या लड़ाई कर ले। आपके ‘गुड मोर्निग’ का जबाब तो आता सा आएगा, पहले सामने वाला पूछेगा- ‘हम बहरे हैं क्या? ये सुबह सुबह काहे की गुड मोर्निग, गुड मोर्निग लगा रखी है।’ आपके ही घर वाले आपको पागल हो गए तक कह जाएंगे कि गली में जाकर आपने गुड मोर्निंग बोलने का अपराध क्यों किया। वह पुराना युग था, जब आप अपने घर-परिवार और गली-मौहल्ले को कुछ पूछा करते, कुछ कहा करते थे। अब अगर कुछ पूछना-कहना है तो पूरा देश आपको बताने-सुनने को तैयार है। एक से बढ़कर एक हुनरमंद मित्र मौजूद है। बस आप एक लाइन लिख दें- ‘मोबाइल खरीदना है कौनसा लूं?’ फिर देखिए कि आप को बताने वाले कहां-कहां से और क्या-क्या ज्ञान देने लगेंगे। यह तो बस एक उदाहरण है। आप इन-बॉक्स में भी बहुत कुछ पूछ सकते हैं।
यह नेट-क्रांति ऐसी है कि यहां सब कुछ मिलता है। सब कुछ यानी आपकी अपनी पसंद। आप कुछ भी गूगल बाबा में सर्च करो। एक विज्ञापन आता था- सब कुछ दिखता है। जी हां, यहां सब कुछ दिखता है। बस आप देखने बैठ जाएं, निराश नहीं होंगे। एक पेन के विज्ञापन में पंक्ति आई थी- लिखते-लिखते लव हो जाए। पर मैं तो बरसों से लिख रहा हूं, और किसी ने लव नहीं किया। यह भी हो सकता है किसी ने किया हो और मुझ मूर्ख को खबर ही नहीं हुई हो। इंटरनेट का कमाल है कि वह ऐसा-वैसा खुद फैसला नहीं करता, आप जो चाहे वह तो बस उपलब्ध करता है। इतना सुख है फिर भी क्या आप बाबा आदम के युग में रहना पसंद करेंगे। मर्जी आपकी, जैसा चाहे करें। नियम है- अब तो देश को डिजिट-युग में आना ही है।
एक मास्टर जी का डिजिटल-युग में प्रवेश हुआ। ई-मेल और फेसबुक के साथ-साथ इंटरनेट के माध्यम से फी-मेल और कामसूत्र-बुक भी देखने में खो गए। जब मास्टर जी भी यही सब कुछ करने लगेंगे तो फिर शिष्यों और शिष्याओं को दोष देना गलत है। जीओ का कमाल है कि छोटे-छोटे बच्चे इंटरनेट-फ्रेंडली हो चुके हैं। इस डिजिटल इंडिया में ऐसे रंग-रोगन देख रहे हैं कि देश खड़ा हो रहा है। बच्चे जल्दी से जल्दी समझदार हो रहे हैं तो देश बहुत आगे नहीं बढ़ गया क्या?
डिजिटल-युग में मैंने और पंच काका ने भी दाखिला ले लिया है। अब हम हैं, और हमारे फोन, कंप्यूटर, इंटरनेट है। साथ बैठने की जरूरत नहीं, हमने परिवार-ग्रुप बना लिया है। मोर्निग से लेकर नाइट तक सब लिख कर बातें होती हैं। एक दूसरों को कुछ का कुछ भेजते रहते हैं। सच जानिए कि लिखने-पढ़ने से मुक्ति मिल गई। यहां सब कुछ रेडिमेड है। साहित्य की गंभीरता और किताबों को अब कौन सूंधता है? साहब कुछ जब हाथ में इंटरनेट है तो गोर्की-प्रेमचंद के साथ साहित्य का पूरा कुनबा यहीं उपलब्ध है ना।

० नीरज दइया
 

27 दिसंबर, 2016

संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दें

ज चारों तरफ संपर्क का ही बोलबाला है। यह ऐसी बोलती हुई बाला है कि सब इसके दीवाने हैं। इसके बिना कहीं कुछ नहीं होता। हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने जन-जन से संपर्क किया और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ से जो कुछ किया, वह सब के सामने है। कहने वाले बेशक कुछ भी कहते रहे, पर सच्चाई यह है कि बिना संपर्क के कुछ भी नहीं हो सकता। चुनाव तो सदा पार्टियों का होता रहा है। यह तकनीकी कमाल था कि संपर्क से किसी पार्टी का पर्याय एक उम्मीदवार बना। यह संपर्क की जीत है। अस्तु यह सूत्र के रूप में लिखा जाना चाहिए कि संपर्क बढ़ाने पर ध्यान देंगे तो सिद्धि-प्रसिद्धि मिलेगी। संपर्क बनाने और साधने के अनेक तरीके हैं। यह बहुत सरल है। ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल में किसी का नम्बर डायल करते हैं। आपको इंटरनेट फेंडली होना है। अपने काम के आदमी का मुखड़ा सामने आते ही उसका खास नंबर प्रेस कीजिए। नहीं समझे, अरे भाई बिना नंबर तो किसी से बात नहीं हो सकती है। सबसे पहले नंबर पता कीजिए कि किसका क्या नंबर है। गलत नंबर डायल करना खतरनाक हो सकता है। किसी को चापलूसी पसंद है, और किसी को थोड़ी-थोड़ी। पर कुछ ऐसे भी हैं जिनको चापलूसी, बस चापलूसी के नाम से नापसंद है। आप अपनी चापलूसी का नाम बदल कर ही उनको खुश कर सकते हैं। मान लिजिए कि आप एक आम आदमी हैं। कोई छोटी मोटी नौकरी करते हैं। देखिए आपके जीवन की फ्रिक करने वाले आपकी बीमा करना चाहते हैं। बैंक आपको लोन देना चाहता है। आप गाड़ी और बंगला क्यों नहीं खरीदते हैं? आपके पास नौकरी है और एक बंधी बंधाई पगार है। उसे लूटने के लिए बहुत से चापलूस आपसे संपर्क करना चाहते हैं। बिना नौकरी के ये सब सुविधाएं नहीं मिलने वाली। आप ने क्या सोच रखा है कि हम बहुत भले हैं। हम में संवेदनाएं कूट-कूट कर भरी हुई है। बिल्कुल नहीं। हम ऐसे हैं कि रास्ते पर चलते हुए किसी को लिफ्ट नहीं देते हैं। किसी का क्या भरोसा? हर काम हम बस केवल अपने फायदे के लिए करते हैं। गली में स्वच्छता अभियान चला तो प्रेस वाले फोटो लेने आए। सबसे पहले सफाई पसंद के रूप में हम ही कूदे थे। झाडू लेकर फोटो के लिए दौड़ना, मन को कितना सकून देता है। वह एक ऐतिहासिक दिन था। हमने झाडू हाथ में लिया था। गली के नेता जी के साथ हमारी शानदार मुस्कान और हंसी का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है। हम सही वक्त पर सही नाटक करते हैं। मुखौटा लगाते हैं।
संपर्क ही वह मुखौटा है, जिसे देखते ही बड़ी-बड़ी बीमारियां ठीक हो जाती है। मान लिजिए आपका पेट गैस से भरा है। बिना किसी से बोले तो आपकी यह बीमारी बढ़ती जाएगी। जन संपर्क होगा तभी तो बोल-बतिया सकेंगे। दीवारों से तो बातें करेंगे नहीं ना। इसलिए कहा कि संपर्क से हर बिगड़ा काम बन जाता है। कोई फाइल अटकी है या भटकी है, तो उसका एक ही तरीका है- संपर्क। हमारे राजस्थान में तो सम्पर्क का कुछ अधिक ही महत्त्व स्वीकार करते हुए जन सामान्य की शिकायतों को दर्ज करने और समस्याओं के निराकरण हेतु अभिनव प्रयास का नाम ही राजस्थान संपर्क रख दिया गया है। यहां बिना कार्यालय में उपस्थित हुए समस्याओं को ऑनलाइन दर्ज करने की सुविधा दी गई है। संपर्क की महिमा है कि जिलों में संपर्क कार्यालय खुले हैं। हमारी समस्याओं को हल करने के लिए सरकार ने भी संपर्क को चुना है। पंच काका का मानना हैं कि आज के युग में संपर्क ही लोकप्रिय बला है। मुझ से वे अक्सर कहते हैं कि केवल लिखने-पढ़ने से कुछ नहीं होगा। किसी रचना को ढंग की जगह छपवाना है, तो संपर्क सही करो, फिर देखो कमाल। काका के कहने पर मैं संकल्प लेता हूं कि अब संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दूंगा।
 ० नीरज दइया
 

16 दिसंबर, 2016

नियम वहां, जहां कोई पूछे

सुबह-सुबह का वक्त था। मैं किसी काम से मोटर साइकल पर कहीं जा रहा था। हाइवे के मोड़ के करीब था, इतने में एक मोटर साइकिल ने ओवरटेक किया। दो सज्जनों की यह सवारी तेज गति से आगे निकली तो ध्यान जाना स्वभाविक था। मुझे गुस्सा आया कि एक तो बिना हेलमेट के हाइवे पर छावनी क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, और गति भी आवश्यकता से अधिक है। पर यह क्या मैंने देखा कि चालू बाइक पर दोनों सज्जनों ने जल्दी-जल्दी अपने-अपने हेलमेट पहन लिए। ओह, कितने चालक है ये लोग। पता है कि यहां चैकिंग हो सकती है, तो नियम में आ गए। मैंने चलते-चलते अपने गतिमान मन को समझाय कि हे पगले मन ! ऐसे कितनों की सोच करेगा। नियम तो सब अपनी जगह होते हैं। उनको कब-कहां मानना है अथवा कहां नहीं मानना, इसका निर्धारण खुद नियम तो करते नहीं है। यातायात का एक नियम मानकर मैं महान बन गया, और उपदेश की मुद्रा में पहुंच गया हूं। मैंने विचार किया कि मैं भी घर के आस-पास कहीं निकलता हूं तो हेलमेट कहां पहनता हूं। नियम भंग तो भंग ही है, चाहे कभी भी करो। बात हमारी सुरक्षा और भले की है। फिर भी हम जो हैं, अपने फायदे के अनुसार ही नियमों का पालन करते हैं।
पंच काका कहते हैं कि सरकार खुद चाहती है कि लोग नियम तोड़े। जिसे बर्बाद होना है उसे बर्बाद होने देना क्या है? नहीं समझे, देखो बीड़ी-सिगरेट और वाइन आदमी की स्वास्थ्य को बर्बाद करती है। ठीक बात है तो कहो- हां। तो पंच काका का मानना है कि स्वास्थ्य के लिए जो हानिकार चीजे हैं, उन पर सरकार रोक क्यों नहीं लगाती है। उन्हें बंद क्यों नहीं करती है। मैंने कहा कि वहां चेतावनी लिखी रहती है फिर भी लोग अगर सेवन करते हैं तो सरकार की गलती कहां है। पंच काका को मेरा बीच में बोलना बर्दाश्त नहीं होता। पंच काका क्या किसी भी बड़े-बुजुर्ग को अपनों से छोटों का बीच में बोलना सहन नहीं होता। उन्होंने जबाब दिया कि बहुत बारीक अक्षरों में लिखा होता है। उन्हें पढ़ने के लिए हम आंखें कहां से लाएं? इतने बारीक अक्षरों में लिखने से नियम का पालना हो गया पूरा। बीड़ी-सिगरेट, पान-जर्दा या फिर दारू-मारू ये सब बंद क्यों नहीं करते हो। जब ये चीजें गुणकारी-लाभप्रद नहीं, फिर बेचने-खरीदने की पाबंदी क्यों नहीं। माना कि पाबंद का अर्थ पूरी रोक नहीं होता। पाबंदी पूरी पाबंदी तो कभी होती ही नहीं। एक राज्य में शराबबंदी के चलते लोग सैर-सपाटा करने दूसरे राज्य में चले आते हैं, अपने आनंद को मानाते हुए लौटते हैं। चोरी-छिपे जो गोरखधंधा होता है, वह तो होता ही रहेगा। सारी पाबंद और बंदी बस कुछ लोगों को दिखाने के रास्ते हैं। हाथी के हांत हैं। नोटबंदी में बुरा हाल हुआ तो गरीबों का हुआ, पर अमीरों के आनंद में कौनसा खलल पड़ा। पंच काका बोले- सची बात है कि नियमों में ही कुछ ऐसा किया-धरा होता है कि रामजी बच कर निकल जाते हैं, और श्यामजी फस जाते हैं। एक बच के निकल जाए और दूसरा फस जाए, तो इसे कहते हैं- राम राज्य? मैंने फिर प्रतिवाद किया कि काका यह तो व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर है कि उसे क्या आता है और क्या नहीं आता। मान लो किन्हीं दो आदमियों को पानी में फैंका जाता है, तो एक निकल कर बाहर आ जाए और दूसरा डूब जाए तो इसे क्या कहोगे? जो निकल आया है, उसे तैरना आता था और जो डूब गया वह लल्लू था जो तैरना नहीं जानता था। यह सीधा-सा सिद्धांत है कि नियमों के जाल से जिसे बचना आता है वह बच जाता है और जो बचना नहीं जानता वह बेचार फस जाता है। चाचा जी, नियम तो बेचारे उस जाल की तरह है जिसे एक बहेलिये ने बिछाया तो पक्षियों को पकड़ने के लिए था, पर वे होसियार निकले। पूरे जाल को ही लेकर उड गए। अब चाचा जी हंसे और बोले- यह बात जोरदर कही।

- नीरज दइया

14 दिसंबर, 2016

एबी कुत्ता और खेबी बिल्ली

मुझे याद है कि पंच काका और काकी जी में इस बात को लेकर लड़ाई हुई थी कि कुत्ता खरीदें या कुतिया। फैसला टॉस से हुआ। हमारे घर एक कुत्ता आया। मैंने पूछा- काका इसका नाम क्या रखें? वे बोले- नाम में क्या है, कुछ भी रख लो। चलो एबी रख लेते हैं। पर देखना तुम्हारी काकी जरूर खेबी करेगी। यह नाम चल निकला, बाद में मेरे लड़के ने बताया कि एबी तो बहुत अच्छा नाम है। उसका तर्क था कि दक्षिण अफ्रीका के सबसे तेज़ शतक लगाने वाले क्रिकेट खिलाड़ी का नाम भी एबी है। यह पंच काका ने सुना तो जोर से हंसे और बोले- अपने अमिताभ बच्चन का सोर्ट नेम क्या है भैया? मैं थोड़ा नाराज हुआ, कहा- यह बात ठीक नहीं है। एबी हमारा कुत्ता है, और उसके नाम से किसी का कोई लेना-देना नहीं है।
हमने कुत्ता क्या लिया कि बधाई देने वालों का तांता लग गया। लोग मुबारकबाद देने लगे तो देते ही गए। वे गिफ्ट लाते और कितना अच्छा लगा हमें। सब एबी-एबी करते हुए हमारे कुत्ते को देख कर खुश होते। उन्हें खुश देख कर हम खुश होते। यही तो जीवन है। इसमें खुशियां ढूंढ़नी पड़ती है। उसके बाद तो यह सिलसिला चला जो भी घर आता, एबी से बिना मिले नहीं जाता। उसके बारे में बातें करने वालों की संख्या दिन-दूनी और रात-चौगुनी होने लगी। इस संख्या का हमें पता तब चला जब एबी बीमार हुआ। पंच काका और एबी के प्रशंसक बीमार एबी का हालचाल जानने घर आने लगे। आपके कुत्ते के प्रशंसक कैसे हैं, यह आप जाने। हमारे वाले तो देखिए- कोई सेव ला रहा है, कोई केले, कोई बिस्किट, कोई नमकीन और मिठाई तक ला रहा है। मैंने एक शरारत की। एक आगंतुक से पूछ लिया- यह सब क्यों लाएं है? एबी तो कुछ खाता नहीं। वे बोले- कोई बात नहीं। आप सब तो हैं ही। हम सब थे जो एबी के नाम से आने वाली चीजों को ग्रहण कर रहे थे। पंच काका के मन में क्या था, यह तो मैं नहीं जानता पर मैं सोच रहा था- हम तो कभी किसी के घर ऐसा कुछ लेकर गए नहीं, फिर ये सब कोई बोझ उतार रहें या चढ़ा रहे हैं।
एबी के जीवन का तीसरा परिच्छेद आया। पर यह इतना जल्दी आएगा हमने सोचा नहीं था। बेहद दुख और भारी मन से हमने सभी को सूचित किया- एबी इज नो मोर। फिर से वही लोग जो पहले आए थे, शोक प्रदर्शित करने के लिए आने लगे। दुख और संकट की घड़ियों में भी उन आने वालों में से कुछ ऐसे भले लोग भी आते थे, जो कुछ न कुछ छोटा-मोटा उपहार ले आते। वे कहते- किसी के यहां खाली हाथ जाना हमें अच्छा नहीं लगता। यह हमारा सम्मान था कि उनका सम्मान था। पर कुछ न कुछ सामान लाने वाले हमें बहुत अच्छे लगने लगे। बाद में तो इतने अच्छे लगने लगे कि खाली हाथ आने वालों को हम देखते और मन ही मन कहते कि आप भी इन लोगों से कुछ प्रेरणा क्यों नहीं लेते।
पंच काका और काकी दोनों बैठे थे कि उनका कोई अजीज मित्र आया। वह बोला- अब एबी के बिना आप का मन कैसे लगेगा। आप में आपस में कितना प्यार हो गया था। वह आगे बोला- मुझे याद है आप मेरे घर के मूर्हत और खाने पर आने वाले थे, पर नहीं आए। बाद में पता चला कि एबी बीमार हो गया था। तभी मैं सोच रहा था कि आप जरूर आते, पर ऐसी स्थिति में कैसे आते। मेरा एक सुझाव है कि आप अपना मन बहलाने के लिए कोई दूसरा कुत्ता-कुत्ती या बिल्ला-बिल्ली खरीद लो। पंच काका सहमत हो गए, मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। यह क्या बिल्ला खरीदें या बिल्ली इस पर टॉस भी हो गया। इस बार काकी की जीत हुई और तय हुआ हम बिल्ला नहीं बिल्ली खरीदेंगे। मैं ऐसा मौका क्यों छोड़ने वाला था, तुरंत प्रकट हुआ बीच में बोला- काका, हम बिल्ली का नाम खेबी रखेंगे।
- नीरज दइया
 

12 दिसंबर, 2016

अंकज्योषित का चक्कर

कोई माने या ना माने, मुझे तो अंकज्योतिष पर पूरा विश्वास है। सब कुछ नाम में ही तो समाया है। अगर नाम में शक्ति नहीं होती तो हजारों वर्षों से नाम की महिमा यूं ही नहीं चली आती। नाम सुमरिन से तो बेड़ा पार हो जाता है। मुक्ति का आधार ही नाम है और नए जमाने में तो बस सब कुछ नाम का ही खेल है। जो है नाम वाला वही तो बदनाम है। नाम हो या बदनाम हो, होता तो आखिर नाम ही है ना। हमें तो सब को बस अपने-अपने नाम और काम से मतलब होना चाहिए। अंकज्योतिष ने जब आज जब दुनिया भर के लोगों के जीवन में महत्त्व हासिल कर लिया है, तब एक नाम का एक नया अर्थ और दूसरे नाम का दूसरा नया अर्थ निकला जाना स्वाभाविक है। यह सब स्वरों और व्यंजनों का खेल है। बस जरा-सा फेर-फार और आपकी किसमत का बंद ताला खटाक से खुल जाएगा।
अंकज्योतिष की अवधारणा है कि आपके नाम की जरा-सी स्पेलिंग बदलने से आपके साथ घटित होने वाला सब कुछ जो उलटा-पुलटा है उसे ठीक किया जा सकता है। अंग्रेजी नाम में किसी एक लेटर को जोड़ देने, कम कर देने या बदल देने से अंकभार घटा-बढ़ा कर सब कुछ बदला जा सकता है। आपको बस एक बार यकीन करना होगा कि आपके भी अच्छे दिन आ सकते हैं। अच्छे दिनों को लाने के लिए हम सब ने अब तक क्या-क्या नहीं किया? जब इतना कुछ किया है तो क्या थोड़ा सा यह भी नहीं कर सकते हैं? करना क्या है आपको? बस यही कि आप अंकज्योतिष पर यकीन कर लेंवे।
यह आपके जीवन में एक बहुत अच्छा निर्णय हो गया है कि आपने अंकज्योतिष पर यकीन कर लिया है। मुझे नहीं मालूम कि आपको इसकी जानकारी है भी अथवा नहीं है कि ज्योतिष दुनिया में सबसे प्राचीन और आधुनिक विज्ञान के बीच जगह बनाता है। आप जब एक अंकज्योतिष के पास सलाह लेने पहुंचेंगे और बातों पर यकीन करेंगे तो पाएंगे कि कुछ महीने बात मान लेने से परिवर्तन साफ दिखाई देगा। आपके आस-पास सभी चीजे बेहतर होने लगेगी। आपके व्यक्तिगत और पेशेवर जिंदगी में आपको लगेगा कि आपने मोर्चा मार लिया है। लोग भले इसे महसूस करें या नहीं करें पर आपको लगने लगेगा कि खुद में जबरदस्त आंतरिक परिवर्तन होने लगा है। ठहराव ठीक नहीं इसलिए यह बदलाव जरूरी है।
मेरे साथ सब कुछ ठीक हो रहा है और ठीक चल रहा है फिर मुझे अंकज्योतिष के पास जाने की क्या जरूरत ऐसा सोचना ही गलत है। अगर सभी लोग ऐसे ही सोचने लगे तो उनका धंधा कैसे चलेगा। हमें तो आंखें मूंद कर विश्वास करने की आवश्यकता है। मेरे जैसे बहुत लोग हैं जो अंकज्योषित के पास जाते है और आंखें खोल कर विश्वास करते हैं। यह सकारात्मकता का एक रास्ता है, जिसे पा लेना जरूरी है।
बेशक पंच काका का मानना है कि ग्रह, नक्षेत्र, राशि, अंक ढेर सारे जाल गणित पर आधारित है। गौर करने की बात यह है कि हम सब के भीतर सकारात्मकता और नकारात्मकता होती है। यह बस हमारे मानने कि बात है कि हम अपनी सकारात्मकता को पहचान लें। सकारात्मकता अंदर महसूस करने की चीज है और एक बेहतर जीवन व्यतीत करने में यही मदद करती है। वे कहते हैं कि हर आदमी को एक रास्ता चाहिए। रास्ता तो खुद हमारे पास है। रास्ते की पहचान होनी चाहिए। इसी पहचान को हम फ्री में प्राप्त कर सकते हैं या फिर कोई भी हो सकता है जिस पर हम विश्वास करते हैं और कुछ खर्च कर के यही ज्ञान प्राप्त करते हैं। अब अंकज्योतिष को ही लो। यह अंकों का खेल है जो अगर कोई पढ़ा-लिखा या कम पढ़ा-लिखा थोड़े दिन इस में माथापच्ची करे तो पूरी जानकारी हासिल कर सकता है।
- नीरज दइया
 

07 दिसंबर, 2016

बच्चों के संग शिक्षक की सेल्फी

चाणक्य ने बहुत पहले कहा था कि शिक्षक की गोद में प्रलय और निर्माण नाम के दो बच्चे पलते हैं। अब जब शिक्षकों द्वारा पाले गए प्रलय और निर्माण काफी बड़े या कहें कि इतने बूढ़े हो चले हैं कि उनके बच्चों के बच्चों का जमाना आ गया है। इतने वर्षों से अगर अब भी शिक्षक उन्हीं दो बच्चों के बच्चों और पीढ़ियों को पालता है तो यह हमारे समाज की बहुत बड़ी भूल है। प्रलय और निर्माण को वर्षों पहले जब पहचान लिया गया तो उन्हें अलग अलग क्यों नहीं किया गया। उन्हें पृथक नहीं किए जाने का ही आज यह नतीजा हमारी आंखों के सामने है कि हम प्रलय और निर्माण को पहचान नहीं पा रहे हैं। प्रलय आ कर कहता है कि मैं निर्माण हूं तो हम मान जाते हैं और लगातार गर्त की तरफ बढ़ते हैं। इतना सब होने के बाद भी हम शिक्षकों की गोद में पलने वाले प्रलय भैया और निर्माण भैया को पहचान नहीं सके हैं। अब तो प्रलय और निर्माण के अनेकानेक भाई-बहन स्कूलों में जगह जगह भर्ती हो चुके हैं। उन भर्ती हुए बच्चों में कुछ स्कूल आते हैं और कुछ अपनी इच्छा से आते हैं या इच्छा नहीं हो तो नहीं आते हैं। शिक्षक को उनकी उपस्थिति रखनी होती है। देखा गया कि इनके हिसाब-किताब में घोटाला है। जमीन सच्चाई को सरकारों के सामने सही सही रखा जाना चाहिए किंतु जब शिक्षक अपनी गोद में इतने वर्षों से प्रलय और निर्माण को पालते आ रहे हैं तो उन में भी बहुत से गुण-अवगुण आने स्वभाविक है। पंच काका ने बताया कि उन्हें किसी समाचार-पत्र से पता चला है कि महाराष्ट्र के सरकारी स्कूल में बच्चों की उपस्थिति को बढ़ाने के लिए शिक्षक बच्चों के साथ सेल्फी लेकर उसे राज्य के एजुकेशन डेटाबेस (सरल) पर अपलोड करेंगे। यह काम बच्चों की उपस्थिति सुधारने के चक्कर में हो रहा है पर शिक्षक समुदाय का कहना है कि वे पढ़ाएं या कि सेल्फी लें। कक्षा के दस-दस बच्चों के साथ सेल्फी लेना और मुस्कुराना कितना आनंददायक होगा पर शायद इसके साथ सेल्फी लेकर सभी बच्चों के नाम और आधार नंबर के साथ डाटाबेस पर अपलोड करना जिन शिक्षकों को झंझट का काम लग रहा है वे इसको अनुचित बता रहे हैं। यह शिक्षक का हक नहीं है कि किसी सरकारी फरमान को वे उचित या अनुचित माने या बताए। मानना तो फिर भी ठीक है कि आप अपने मन मन में मानते रहो, पर यह जो बताना है वह तो बिल्कुल ही ठीक नहीं है। पंच काका का मानना है कि यह अवगुण शिक्षकों में इतने वर्षों से लगातार निर्माण और प्रलय को पालने के कारण ही हुआ है। आंकड़ों की सुने तो आंकड़े बताते है कि महाराष्ट्र में नौ प्रतिशत बच्चे पढ़ाई पूरी होने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, हालांकि राष्ट्रीय औसत पन्द्रह प्रतिशत है। बच्चों के संग शिक्षक की सेल्फी का नजारा यह है कि देश में 85 प्रतिशत बच्चे ही पढ़ाई करते हैं और उनमें से अब नई शिक्षा योजना के अंतर्गत आठवीं कक्षा तक एक बड़े प्रतिशत का हाल यह है कि वे रहते तो स्कूल में ही है पर स्कूल में रहते हुए भी स्कूल छोड़ने जैसी हालत में रहते हैं। उन्हें कुछ आता-जाता नहीं। स्कूलें अपने नियमों में बंधी हैं। बच्चों को कुछ आए या नहीं आए, यहां तक कि बच्चा स्कूल आए या नहीं आए उसे फेल नहीं किया जा सकता। बच्चा स्कूल नहीं आता है तो उसे प्यार से समझाना है। एक शिक्षक के पास बच्चों को समझाते समझाते प्यार की इतनी कमी हो चुकी है कि बच्चा शिक्षक के प्यार को प्यार समझता ही नहीं। वह तो समय से पहले ही किसी दूसरे प्यार के चक्कर में खोया हुआ है। बच्चों के माता-पिता और अभिभावकों के पास अब इतना समय ही कहां कि वे बच्चे का भविष्य देखें। बच्चों का भविष्य देश से जुड़ा है और देश का भविष्य बच्चों से। भविष्य के साथ सेल्फी ले ही लो भैया।

० नीरज दइया 

05 दिसंबर, 2016

डिस्काउंट का मौसम

डिस्काउंट किसे अच्छा नहीं लगता। बड़ा डिस्काउंट हो या छोटा बस होना चाहिए। बिना डिस्काउंट के मजा नहीं आता। मजा तो आता है फेस्टिव सीजन की महासेल में, जिसमें डिस्काउंट ही डिस्काउंट मिलता है। कितना अच्छा लगता है जब डिस्काउंट पर डिस्काउंट मिले। यदि डिस्काउंट पर डिस्काउंट और डिस्काउंट पर डिस्काउंट मिलता हो, तो लगता तो बहुत अच्छा है। माना कि ये गणित का खेल नहीं आता, पर फिर भी हमें फायदा है। फ्लेट डिस्काउंट का खेल निराला है कि हर कोई इसके चक्कर में नहीं आता है।
किसी भी प्रॉडक्ट्स पर भारी डिस्काउंट हो तो खरीदने का मन बन ही जाता है। अरे वह आम जनता ही क्या जिसे कोई धमाका नहीं सुनाई दे। धमाका करने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अब 80% तक का डिस्काउंट है! तो भी आप क्या सोये रहेंगे। यह तो पागलपन है- ‘जागो।’ यह सोने का समय नहीं है। डिस्काउंट के पीछे ‘पागल’ होने का समय है। मैं तो ऐसे अवसर की घोषणा होने पर रात के बारह बजे सबसे पहला ग्राहक बनने का सुख लूटना चाहता हूं। कोई भी ऑफर ऐसे ही नहीं आता और तुरत-फुरत नहीं आता। इन सब के लिए खूब पब्लिसिटी होती है। फिर भी ये कुछ पब्लिक सोती ही रहती है। सेल बंद होने के बाद कहती है- `अरे हमे तो बताया ही नहीं, वर्ना हम भी मंगवा लेते।'
ज्ञानियों को तो कुछ कहने समझाने की जरूरत होती नहीं और अज्ञानियों को कुछ कह समझा कर समय क्यों खराब किया जाए। जाहिर है ज्ञानी अपने आप समझेंगे और अज्ञानी को हम समझा नहीं सकते। ये पंच चाचा ने हमारे घर में सब कुछ उलटा-पुलटा कर दिया है। मैं कुछ भी मंगवा लूं, उनको कभी पसंद नहीं आता। कुछ खरीद तो मैं रहा हूं, इसमें पैसे भी मेरे लग रहे हैं और परेशानी उनको होती है। उनकी परेशानी का यह हाल है कि मेरे बेटे को भी अपनी तरफ मिला लिया है। कहते शर्म आती है कि आजकल घर में मेरा बेटा ही मेरा बाप बनता है। मुझे वह समझता है कि ये डिस्काउंट उल्लू बनाने का तरीका है। यही सुनना रह गया था। कलयुग आया है कि बेटा बाप को उल्लू कहने में भी संकोच नहीं करता है।
मैं मूर्ख हूं या समझदार, यह तो पंच चाचा या मेरा बेटा मुझे समझा नहीं सकते है। मैं जो हूं सो हूं। इसमें दादा-पोता भले ही एकमत हो जाए कि डिस्काउंट वाले पुराना माल बेचते हैं। वे दाम बढ़ा कर डिस्काउंट देते हैं। डिस्काउंट में भी उनका फायदा होता है। ये बाजारवाद है। माल बेचने के तरीके हैं। आपको एक बार इस जाल में फंसा कर फिर लूटते जाएंगे। अब मैं क्या-क्या बताऊं। मैंने तो तय कर लिया कि इन बातों को नहीं मानना, तो नहीं मानना। सुनकर बहुत-सी बातें हम अनसुनी करते हैं, तो ये भी अनसुनी की जा सकती है। किसी भी बात को अनसुना करना सभी को आता है। अगर हम सभी बातें सुन-सुन कर अपने भीतर रखने लग जाएं, तो हमारी मैमोरी फुल नहीं हो जाएगी! स्टोरेज की भी एक सीमा होती है। हमारी भी सीमा है। इसलिए हम सुनाने वालों को अपनी सीमा में नहीं आने देते हैं, और अगर कोई जबरदस्ती आ भी जाता है तो हमारे लिए एक कान से सुनना और दूसरे से निकलने का विकल्प सुरक्षित है।
देश ने इतनी तरक्की की है कि भले व्यापरी पूरे देश में जीओ और ‘डाटा’ फ्री पाओ स्कीम लाएं हैं। फिर भी ये ज्ञानियों और डेढ़ हुस्यारों की जमता है कि हर समय हर काम में खोट देखती है। माना कि तुम्हारी बात सही हो सकती है कि कोई डिस्काउंट देने वाला अपनी रेट को बढ़ा कर डिस्काउंट देता है और हमें किसी न किसी तरह लूटता है पर अब इसमें लूट कैसी जब सब कुछ फ्री है। अरे अबकी बार जब सब कुछ फ्री में है तो भला इसमें क्या ठगी है?
० नीरज दइया

03 दिसंबर, 2016

अनपढ़ से ग्रेजुऐट रहना प्लस खाना

हा जाता है कि कवि कबीर का भाषा पर जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में कहलवा लिया। सीधे–सीधे, नहीं दरेरा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार–सी नज़र आती है। आज जब कबीर नहीं है, किंतु उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में विज्ञापनों का बड़ा योगदान समझा जा सकता है। भाषा को लाचार-सा कर, कुछ का कुछ कहने और बनाने का साहस अब केवल विज्ञापनों में ही बचा है। ऐसी हिम्मत कि कुछ का कुछ हो जाए, पर एक बार देखना-सुनना पड़ेगा। झटका लगेगा। फ़क्कड़ाना प्रकृति के लोग भी लप-लप करती भाषा से कुछ का कुछ कर जाते हैं। ये बाजारवाद है। जहां वर्षों पहले कबीरा जी खड़े थे, उसी बाजार की बात है। यह बात अलग है कि अब खैर किसी की नहीं। सभी को गिरफ्त में करने के जतन कर लूटने और सामने वाले को लुटता देखने में खैर समझी जाती है। बैर और दोस्ती से परे सब से अपना उल्लू सीधा करने की प्रवृति का उत्कर्ष इस कलिकाल में देखा जा सकता है। कहते हैं कि विज्ञापन का काम तो वस्तु को बेचना है। इसमें गलत-सही नहीं देखा जाता। क्या और कुछ नहीं देखा जाता है। यहां भाषा-व्याकरण और नियमों का भले ही कचरा हो जाए, पर कचरे को भी बेचने का हुनर विज्ञापनों में होना चाहिए।
सब जानते हैं कि अगर तेल चाहिए तो तिलों से निकाला जाएगा। यह तरक्की का कमाल है कि बिना तिलों के भी तेल निकाला जा रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि जहां दस-बीस प्रतिशत की गुंजाइश हो वहां अस्सी-नब्बे या फिर पूरे सौ प्रतिशत तेल निकाला जाता है। हे हुनरमंदो ! यदि ठगना ही है तो किसी सेठ-साहूकार और दौलतमंद के पास जाओ, पर ये जो तुम बेरोजगारों को घाणी में डाल कर तेल निकालने का अद्भुद कौशल दिखाते हो, उसमें तनिक तो संकोच-शर्म करो। गली में एक पेंपलेट बांटा गया। हालत यह हो गई है कि हर घर में दूसरा-तीसरा बेरोजगार है। जिसे रोजगार प्राप्त है, वह भी संतुष्ट नहीं है। मान लें, यदि कोई मास्टर जी बन गए हैं, तो बरसों कलेक्टर बनने के सपनें देखते हुए मासूम बालकों के साथ अन्याय करते हैं। भविष्य-निर्माता मास्टर जब तक अपने सारे सपनों को देखते हुए उम्र की सीढ़ियां चढ़ता जाता है, तब तक उसे अपने असली काम से सरोकार नहीं होता। बाद में ओवरऐज होने पर वह मन बनाने की जगह टूटे सपनों के मातम में खोया रहता है। उस पेंपलेट में नौकरी के कुछ सपने थे। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- अनपढ़ से ग्रेजुऐट रहना प्लस खाना।
पंच काका ने दूर से देखा तो बोले बिना नहीं रह सके- यह तो फुसलाने वाली भाषा है। दिखाना जरा ये पर्चा क्या लिखा है? मैंने उन्हें पर्चा थमाया तो वे फिर बोले- सब बकवास है, मूर्ख बनाते हैं। अनपढ़ के लिए काम है और ग्रेजुऐट के लिए भी काम है, साथ में खाना-पीना और रहना फ्री में देंगे। ये नहीं हो सकता। असल में बेरोजगारों को समझ लेना चाहिए कि ग्रेजुऐट से अनपढ़ रहना और खाना-पीना अच्छी बात है। ग्रेजुऐट जब देश में बेरोजगार है, तो बेचारे अनपढ़ जाए तो कहां जाए। हालत यह हो गई है कि अनपढ़ों की नौकरियां तो ग्रेजुऐट और पोस्ट ग्रेजुऐट छीन लेते हैं। बेरोजगारी की भयावयता से पढ़ा-लिखा आदमी आज कुछ भी करने को तैयार है। सब जगह हालत यह है कि एक आवाज लगाओ, नौकरी के लिए हजार दौड़े चले आते हैं। मुझे पता था कि जब पंच चाचा का भाषण चालू हो जाता है तो रुकता नहीं। मैंने रोकने लिए टोका- तो काका, आप ही बताओ हल? काका बोले- अब कहां रहे हल? पहले खेत हुआ करते थे, तो हल भी होते थे। अब तो खेत भी अपना नहीं, फिर काहे का हल? और कैसा हल? सब बेहल है।

० नीरज दइया

01 दिसंबर, 2016

मच्छर, पतंग, मस्ती, वसंत

पंच काका को आखिर बैंक से दो हजार का एक नोट मिल ही गया है। नोट तो मिल गया, पर वे अब भी परेशान है। पहले जब नोट नहीं मिला तो भी परेशान थे। काका कहते हैं कि जब बैंक वालों के पास ही नोटों की इतनी तंगी है तो हमारा क्या होगा। यह तो ऊंट के मुंह में जीरा है। ना मालूम क्या हो गया है और क्या होने वाला है। बैंक में पैसे हमारे हैं, और माजरा यह कि हमीं काम में नहीं ले सकते हैं। अरे भाई, खून-पसीने की कमाई है। अब जब अपनी रकम निकालने के सांसें पड़ जाए, तो इसे क्या कहेंगे ! काका की बड़ी परेशानी यह है कि कोई दो हजार रुपये के खुल्ले नहीं देता। काका का काम है बीड़ी पीना और पाना खाना। पान वाले के पास खुल्ले नहीं है। दूसरा काम पंच काका का सब्जी लाना है। पर माजरा यह है कि सब्जी वाले के पास भी खुल्ले नहीं है। हालत अब यह हो गई है कि पंच काका मांग मांग कर बीड़ी पीने को मजबूर हैं। कोई बीड़ी पी रहा हो तो मांग कर काम चलाया जा सकता है, पर पान का क्या करे? क्या पान खा रहे किसी भतीजे से कहे कि थोड़ा-सा तोड़ कर पान मुझे भी दे दे। पंच काका आजकल दो हजार का नोट दिखा कर हर छोटी-बड़ी दुकान में पूछते घूमते हैं- ‘खुल्ले मिलेंग क्या?’ कोई छोटे से सौदे के लिए या फिर ऐसे ही दो हजार रुपये के खुल्ले क्यों देने लगा। मुझ डर है कि ऐसे में ‘खुल्ले मिलेंगे क्या?’ कहीं उनका तकिया कलाम ना बन जाए।
केवल पंच काका एक नहीं है, ऐसे बहुत से लोग है जो खुल्लों की समस्या से परेशान है। जरूर कुछ घोटाला है। जिनके पास बहुत खुल्ले हैं, उनसे यह परेशानी है कि गिन-गिन कर पैसे लेने में समय लगता है। यह तो बाजार मंदा है इसलिए समय है और खुल्ले गिन कर सौदा दे देते हैं। मुझे लगाता है कि बंधों और खुल्लों का एक गणित। यह गणित सत्ता से बंधे और खुल्ले नेताओं द्वारा संचालित है। आम आदमी के नजरिये से देखें तो वह बंधे नेताओं यानी सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा लगाए नियमों से संचालित होता है। खुल्ले नेता सत्ता में नहीं है तो उनका स्थान विपक्ष है। खुल्लों का जो बंधे हैं उनका विरोध करना अधिकार है। यह सारा खेल वोटों से होता है। भोली जनता के पास सत्ता की दुकानदारी है। वह किसी को बांधने का अधिकार सौंपती है, बाकी खुल्ले रह जाते हैं। बंधे और खुल्लों का चक्कर पहले गुपचुप चलता था। अब नोटबंदी के कारण सब के समाने आ गया है। खुल्लों के खल्ले यानी विपक्ष के जूते, आवाज करने लगे हैं। कितना अच्छा हो समस्याओं में सब साथ साथ चलें। कोई हिसाब है तो उसे बंधे और खुल्ले दोनों मिल करें। यह बात तो छोटी सी है। सार की बात है। छोटे लोगों को समझ आ रही है, तो बड़ों को भी आनी चाहिए। खींचातान से प्रेम बड़ा होता है। प्रेम तो हर जगह हर किसी से सदा बड़ा ही होता है। प्रेम को छोटा करने वाले, और कहने वाले खुद छोटे हुआ करते हैं। किसी समस्या का हल देश बंद का आह्वाहन नहीं हुआ करता है। सभी खुल्ले दलों का स्वार्थ है कि बंद को घेर रहे हैं। यह सत्ता का मोह है। कहते हैं कि मोह और प्रेम अंधा होता है। यह अंधा शोर है- बंद करो, भाई बंद करो। बंद ही बंद होना चाहिए। नहीं होना चाहिए?
पंच काका का कहना है कि यह विपक्ष का नितांत निजी स्वार्थ है। वे आज तक जनता के असली मुद्दों पर मौन बैठे थे। यकायक वे क्यों जागे हैं। विपक्ष का जागरण, खुद पर चोट लगने से हुआ है। गनीमत है कि अब होश में आने का समय आ गया है। अपने होने का अहसास कराने के लिए कोई काम बंद नहीं होना चाहिए। आम जनता के बहाने भड़ास निकालने और जनता को उल्लू बनाने का यह सुनहरा मौका मिल गया तो देश के घाटे और आम आदमी की तकलीफ का क्या होगा?
 
० नीरज दइया 

28 नवंबर, 2016

आज की युवा कविता / डॉ. नीरज दइया

किसी भी समय की कविता को उसकी काव्य-परंपरा में देखा जाना अनिवार्य है। बिना परंपरा अथवा विगत की बात किए वर्तमान की बात आधारहीन है और इसके अभाव में सुनहरे भविष्य के सपने बुने नहीं जा सकते।
    समकालीन राजस्थानी युवा कविता एक ऐसी काव्य-परंपरा की कविता से जुड़ी है जिसमें युद्धों का शंखनाद है, कविता में कीर्ति वर्णन के साथ शत्रु से ‘लड़ जा-भीड़ जा’ का स्थाई स्वर रहा है। ऐसी सुदीर्घ परंपरा में प्रथमत: कवि सत्यप्रकाश जोशी (1926-1990) ने ‘राधा’ काव्य-कृति में राधा के श्रीमुख से मन के मीत कान्हा से गुहार की ‘मुडज़ा फौजां नै पाछी मोड़ ले...’ यह एक नवीन सूत्रपात है। जहां महाकवि सूर्यमल्ल मीसण (1815-1868) जैसे अनेक कवियों का स्वर था-
‘इळा न देणी आपणी, हालरियै हुलराय। पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥’
    इस  स्वर से अलहदा शांति के लिए युद्ध रोके जाने का स्वर समय की मांग और अनिवार्यता थी।
    देश की आजादी के समय राजस्थान ने अपनी जुबान काट कर राष्ट्रभाषा हिंदी के चरणों में अर्पित कर दी और जहां रजवाड़ों में राजकाज की भाषा राजस्थानी थी, राजस्थानियों ने हिंदी सीख कर देश हित के सवाल पर हिंदी को अपनाया। विड़बना है कि ऐसे बलिदानी राजस्थान राज्य को अब तक अपने भाषाई-हक से महरूम रखा गया है, और संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषा को शामिल किए जाने का संघर्ष समकालीन पीढ़ी को करना पड़ रहा है।
    महाकवि कन्हैयालाल सेठिया (1919-2008) भारतीय कवि के रूप में विख्यात है, भाषा प्रेम में रची कविताओं का संकलन आपकी काव्य कृति ‘मायड़ रो हेलो’ है। आज की युवा कविता को इसी पृष्ठभूमि के साथ नवीन कथ्य और शिल्प की विविधताओं को सहेजते-संवारते हुए अपनी रासो काव्य परंपरा से चली आ रही विरासत लिए गर्व भारतीय कविता के हमकदम चलते देखा जा सकता है।
    वर्तमान समय में अन्य भारतीय भाषाओं की भांति ही नए तकनीकी माध्यमों के बल पर कविता को जल्द से जल्द प्रस्तुत कर देने की गतिशीलता राजस्थानी में भी है। काव्य-भाषा, विषय और शिल्प के साथ कविता की बारीक बातों में जाने का अवकाश युवा पीढ़ी में निसंदेह कम देखा जा रहा है किंतु पूरे परिदृश्य को पूर्ण निराशा जनक नहीं कहा जा सकता है।
    जहां परंपरा के मोह या जुड़ाव से छंद-बद्ध कविताओं का दौर युवा कवियों में अब भी चल रहा है। भारतीय भाषाओं की रचनाओं और संदर्भों से अनविज्ञ अपने राग में खोए अनुभवों को बेहद सामान्य ढंग से अपने आनंद और आह्लाद में डूबे युवा कवि देखे जा सकते हैं। इन कवियों में कुछ सजग और गंभीर स्वर लिए ऐसे कवि भी हैं, जिनको हम भारतीय कविता के प्रांगण में गर्व से साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के प्रयासों में संलग्न पाते हैं।
    ‘मंडाण’ के संपादकीय में लिखी कुछ बाते यहां दोहराना चाहता हूं। किसी रचनाकार के लिए अपनी मातृभाषा को अंगीकार करना और सृजनरत होना बड़ी बात है। कुछ मित्र सिर्फ और सिर्फ राजस्थानी कविता की दरिद्रता का रोना रोते हैं और मुझे लगता है कि वे सोचते हैं कि उनके ऐसे प्रलापों से यह दरिद्रता दूर हो जाएगी। जिम्मेदारी और जबाबदेही पुरानी पीढ़ी की भी बनती है कि वे नई पीढ़ी के लिए क्या कुछ कर रहे हैं। दोष देना तो बेहद सरल है आवश्यकता आज इस बात कि है कि नई पौध में जो संभावनाएं हैं उन्हें सहेजा-संवारा जाए। प्रकाशन और पत्र-पत्रिकाओं के संकट के चलते अनेक रचनाकारों की सक्रियता समय के साथ अपने आवेग को क्षीण होते जाने की त्रासदी झेलती है।
    कविता से सतत संलग्नता के लिए कहीं विदेश जाने की आवश्यकता नहीं होती है। युवा कवि को अपने आस-पास के घर-संसार को देखना, समझना और परखना है। घर-परिवार-समाज से सजी कवि की दुनिया ही उसके सृजन की जमीन हो सकती है। कवि की निजता और क्षेत्रीयता में अकूत संभावनाएं हैं। कवि को कविता में क्या लिखना है और किसे छोड़ देना है, यह विचार भी उस के लिए अनिवार्य है।
    किसी कवि को कविता लिखने से पहले खुद से सवाल करना चाहिए कि मैं कविता क्यों और किस के लिए लिखता हूं? ऐसे कुछ अन्य सवाल जरूरी है, जिनके जबाब हर युवा कवि को खोजने होते हैं। यहां यह कहना भी अनिवार्य लगता है कि आरंभिक मोह के चलते युवा कवियों को अपनी लिखी प्रत्येक पंक्ति में भरपूर कविता का अहसास होता है, परंतु समय के साथ अपनी संभावनाओं और सीमाओं को वह जान लेता है। यह सतत अभ्यास का विषय है कि कविता का प्रत्येक शब्द और उसे दिया जा रहा स्थान-क्रम भी महत्त्वपूर्ण होता है। यह कोरा ज्ञान नहीं सत्य है कि कवि को अपने भीतर काव्य मर्मज्ञ के साथ ही आलोचकीय दृष्टि का उत्थान करना चाहिए।
    कवि और कविता की कोई हद नहीं होती। जहां-जहां तक शब्दों के माध्यम से वह पहुंच सकता है, उस यात्रा और अनुभव को कागज पर मूर्त करना आसान नहीं है। ऐसे में कुछ जाहिर करते हुए भी, बहुत कुछ जाहिर होने से रह जाता है। कुछ छूट जाता है। यह हद से अनहद की यात्रा है। राजस्थानी के युवा कवि कुछ संकेतों से बात साधने का प्रयास करते हैं। रसिक कविता को पढ़ अथवा सुन कर उस अनहद तक पहुंच सकते हैं। कुछ हमारी अपनी सीमाओं को पहचानते हुए इन दोनों के बारे में बात शब्दों की सीमाओं में ही संभव है। कवि और कविता के लिए पूर्व ज्ञान कुछ भी काम नहीं आता, उसे तो हर बार हर कविता में एक नई मुठभेड़ करनी होती है।
    विज्ञान भले लाख तरक्की का दाव करे, पर कोई मशीन कविता लिखने की इजाद नहीं कर सकता। कविता को कोई किसी निश्चित सांचे या प्रारूप में स्थापित नहीं कर सकता। कविता के रूप में कवि जैसे अपनी रचना संभव करता है। रचना के लिए पीड़ा की आवश्यकता होती है। क्या बिना किसी पीड़ा या प्रसव के किसी रचना का जन्म असंभव है? क्या रचना पीड़ा का ही पर्याय है, या फिर सुख का पार्याय भी संभव है। यह गहरी और गंभीर बात इस में संलग्न रहने वाले ही जान सकेंगे।
    अब तक गाए जा रहे रागों-सुरों और साधना में कुछ नए राग-आयाम और साधक भारतीय कविता के प्रांगण में देखे जा सकते हैं। कुछ राजस्थानी के कवि निश्चय ही बड़े गर्व के साथ इसी परंपरा में देख सकते हैं।
    नई पीढ़ी से नए स्वरों की आशाएं है। इनकी नवीनता में पुरानी पीढिय़ों की भांति वयण-सगाई, छंद अथवा उपमा का मोह नहीं, समकालीन युवा कविता में नवीन शब्दावली, बदलती भाषा और अपने भावों को पहुंचाने का नवीन कौशल देखने के लिए गत वर्षों प्रकाशित युवा कवियों के कुछ संकलन देखे जा सकते हैं। जैसे- जळ-विरह, कविता देवै दीठ,  म्हारै पांती री चिंतावां, उजाळो बारणै सूं पाछो नीं मुड़ जावै, रणखार, एंजेलिना जोली अर समेस्ता, चाल भतूळिया रेत रमां, संजीवणी, जद बी माँडबा बैठूँ छू कविता, सपनां संजोवती हीरां आदि।
    राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्वारा प्रकाशित 55 युवा कवियों की कविताओं का संकलन ‘मंडाण’ (सं.- नीरज दइया) युवा कविता के संदर्भ और अप्रकाशित रहे कवियों को प्रकाश में लाने की दृष्टि से ‘थार-सप्तक’ (सं.- ओम पुरोहित ‘कागद’) जैसे उल्लेखनीय-सराहनीय कदम राजस्थानी काव्य-धारा में नए स्वरों का शुक्लपक्ष माना जाएगा।
    इस क्षेत्र में ये कृतियां सर्वाधिक प्रतिभाओं को उजागर करने वाली हैं। मंडाण की कविताओं के संदर्भ में संपादक का कथन है- ‘इन कविताओं में सरलता, सहजता, भाषा-कौशल एवं शिल्प की नवीन दृष्टि से ये ऊर्जावान कवि अपनी पृथक पहचान बनाने में सक्षम हैं।’
    राजस्थानी युवा कविता ही नहीं पूरी कविता यात्रा में अनेक कवि ऐसे हैं जिनकी स्वतंत्र पुस्तकें अब तक सामने नहीं आ सकी है। ऐसी ही पीड़ा को लेकर कवि-संपादक ओम पुरोहित ‘कागद’ ने संग्रह के रूप में अब तक अप्रकाशित कवियों की कविताओं का संकलन-संपादन ‘थार सप्तक’ के सात भागों में किया।
    थार-सप्तकों द्वारा 49 कवियों की कविताएं सामने आई जिनमें संभावनाशील अनेक युवा कवि भी सामने आए, जैसे- गौतम अरोड़ा, राजू सारसर, मनोज पुरोहित, राजूराम बिजारणियां, अंकिता पुरोहित, गौरीशंकर, पृथ्वी परिहार, सतीश गोल्याण, संजय पुरोहित, कुंजन आचार्य, मोहन पुरी, सिया चौधरी, ऋतुप्रिया, नरेंद्र व्यास, अजय कुमार सोनी, हरीश हैरी, धनपत स्वामी, जितेंद्र कुमार सोनी, ओम अंकुर, मनमीत सोनी आदि।
    पुरानी और नई कविता में मूलभूत अंतर के कारणों पर विचार करते हुए हमें आस-पास की दुनिया और देशों पर भी विचार करना होगा। आज जब पूरी दुनिया की परिकल्पना एक गांव के रूप में समझी जाने लगी है तब हमारे अपने ही घर में अथवा पास-पड़ोस से होती जा रही दूरियों के बारे में भी विचार करना होगा। लगता है इस शताब्दी में हम दौड़ते-भगते किसी युद्ध का हिस्सा बन गए हैं- यह युद्ध मनुष्य और मशीन के बीच का तो है ही, साथ ही साथ मनुष्य से मनुष्य का युद्ध भी यह है। घर, परिवार, समाज और देश-दुनिया की अथाह भीड़ में आदमी नितांत अकेला होता जा रहा है।
    कितना बेहतर होता यदि यह युद्ध किसी युद्ध के मैदान में होता। ऐसे में किसी दिन उसके अंत की संभावना तो होती, किंतु इस नित्य के युद्ध को शांति कैसे मिले। अंतस-अतंस और आंगन-आंगन चलते युद्ध से जीवन-रस के स्वर ही भंग हो गए हैं। शायद यही सब कारण है, या ऐसे ही कुछ अन्य कारण हैं, जिन के रहते नई चुनौतियों और संभावनाओं के साथ नई पीढ़ी (जिसे युवा पीढ़ी कहा जा रहा है) की नजर में सब कुछ देखने की संभावना विकल्पों के साथ मौजूद है।
    राजस्थानी कविता के क्षेत्र में अनेक संभावनाशील युवा कवियों के नामों के बीच कवयित्री संतोष मायामोहन (1974) की चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि आपको अपने प्रथम संग्रह ‘सिमरण’ (1999) के लिए वर्ष 2003 का साहित्य अकादेमी सम्मान मिला, यह युवा राजस्थानी कविता का सम्मान था। साहित्य अकादेमी के लिए भी यह ऐतिहासिक घटना है कि तीस वर्ष से कम उम्र की कवयित्री को यह सम्मान मिला, इससे पूर्व यह कीर्तिमान डोगरी की पद्मा सचदेव के नाम दर्ज था।
    राजस्थानी की अन्य कवयित्रियों में किरण राजपुरोहित, मोनिका गौड़, रचना शेखावत, गीता सामौर, सिया चौधरी, रीना मेनारिया, ऋतुप्रिया, अंकिता पुरोहित आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। कवियों की तुलना में कवयित्रियां संख्या में कम है और उनमें प्रयोगशीलता के प्रति आग्रह भी कम है।
    सभी का उल्लेख संभव नहीं है फिर भी युवा कविता के क्षेत्र में साहित्य अकादेमी द्वारा युवा पुरस्कार से सम्मानित कवियों के नाम हैं- ओम नागर, कुमार अजय, राजू राम बिजारणियां और ऋतुप्रिया के अलावा प्रमुख युवा कवियों में राजेश कुमार व्यास, डॉ. मदन गोपाल लढ़ा, दुष्यत, जितेंद्र कुमार सोनी, हरीश बी. शर्मा, पृथ्वी परिहार, शिवदानसिंह जोलावास, सतीश छिम्पा, किशोर कुमार निर्वाण, संजय आचार्य, विनोद स्वामी, महेंद्र मील, सुनील गज्जाणी, कुंजन आचार्य, गौतम अरोड़ा, जय नारयाण त्रिपाठी, गौरीशंकर और गंगासागर शर्मा आदि के नाम लिए जा सकते हैं।    
    समग्र रूप से राजस्थानी की युवा कविता के लिए कहा जा सकता है कि युवा कवियों के रचाव में समकालीनता से जुड़े आज के यथार्थ की प्रस्तुतियां हैं तो कुछ नए सवालों के साथ दुनिया को बदलने के उमंग भरे सपने और हौसले भी है।
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बईमानों पर बरसी बड़ी मार

प ईमानदार है या बईमान? ये मैं आप सरकार की पार्टी नहीं, मैं तो आपकी यानी तुम्हारी बात कर रहा हूं। कितना कठिन समय है कि मैं कहना कुछ चाहता हूं और समझा कुछ और जाता है। यहां यह भी लिखना कितना कठिन है कि आप समझते कुछ है। असल बात तो यही है कि बाप बेटे को नहीं समझता और बेटा बाप को फिर ये आप और हम-तुम है ही किस खेत की मूली। भाषा में मुहवारों का प्रयोग भी खतरनाक हो गया है। पंच काका तो लोक से जुड़े है सो बात बात में उनके लोकोक्तियां और मुहावरे स्वाभाविक रूप से आते रहते हैं पर लोग है कि कुछ का कुछ समझ लेते हैं और नाराज हो जाते हैं। मैं उन्हें मना करता हूं कि ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों करते हैं कि किसी को नाराजगी हो। उन्होंने कहा बाप ने मारी मेढ़की और बेटा तीरंदाज। मैंने प्रसंग को तो नहीं सुना पर उन्हें यह मेरे बेटे के सामने बोलते जब सुना तो मुझे अच्छा नहीं लगा। माना कि मेरे काका है। घर के आका हैं तो क्या हुआ। क्या किसी को बस आका होने से कुछ भी करने, कहने और सुनने का अवसर मिल जाता है।
हां तो पूछना चाहता हूं कि हमारी ईमानदारी कितने प्रतिशत है? कहा जा सकता है कि हमारे देश में बस पांच फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे ईमानदार हैं। आजकल ये जो काला धन वाली बेईमानी की बाते है उनकी संख्या तो पांच फीसदी से भी बहुत कम होगी। अब ठीक ठीक तो पता नहीं पर देश में जब इतने ईमानदार है तब क्या आटे में नमक की तरह यह जो बईमान और काली कमाई बाले हमारे भाई-बहन है जो खुद को हमारे भाई-बहन समझते ही नहीं। इसके भी बहुत कारण है। पहला तो ये कि ये अपनी काली-सफेद सारी कमाई विदेशी बैंकों में रखते हैं। छिपा कर रखने वाले और छिप छिप कर देश के साथ गद्दारी करने वाले ये हमारे भाई ही अधिक है। मैंने तो पहले ही कह दिया कि मतलब आप कुछ भी निकालें और भले ही किसी भाई को बुरा लगे। और हां आप यदि किसी भाई के चमचे हैं तो हुए तो भाई ही। चलिए मान लेता हूं कि आप कभी स्कूल नहीं गए और आपने कभी प्रतिज्ञा नहीं की। फिर भी जब भारत आपका देश है तो समस्त भारतीय इस नाते से भाई-बहन ही कहे जाते हैं। होने और कहे जाने के साथ माने जाने के बीच भी बहुत दूरियां है। होने को तो पंच काका सभी के काका हैं और कहे भी जाते हैं पर उनको दिल से काका मानने वाले बहुत कम है। कहते हैं मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली बात हो गई। आप काका को भले काका नहीं माने और आका को आका। इसके कुछ फर्क नहीं पड़ता। काका तो सदा काका ही रहेंगे और आका का फैसला पांच साल में होता ही है। पंच काका कहते हैं कि अबकी बार बईमानों पर बरसी बड़ी मार। पर मुझे यह आकलन समझ में नहीं आता। अरे मारते क्यों हो वे भी तो हमारे ही भाई बंधु है। करना यह था तो फिर पूरे देश को लाइन में क्यों खड़ा कर दिया। बचपन में स्कूल में लाइन में खड़े होने वाले अब कम से कम लाइन बनाना सीख गए। कमाल यह कि इतनी लाइन पक्की बनना सीख गए हैं कि कुछ भी हो जाए फिर भी लाइन की गरिमा भंग नहीं करते। कोई मरे, खपे, लड़े, भीड़े या कुछ भी हो अपना नंबर लाइन का नहीं छोड़ना है। आप भले इसे संवेदनहीनता कहें और बड़ा शब्द काम में लेना चाहे तो अमानवीयता कह ले पर ऐसे शब्दों और कोरे भाषणों का हम पर हम असर होने ही नहीं देंगे। नोट और वोट बदलवाने के लिए क्या क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। पंच काका भी कमाल के हैं। वे कहते हैं कि बेरुत की दिवाली आ गई है। पूरे देश में लोग काली कमाई पर सफेद करने में जुटे हैं। पांच सौ रुपये की पेंशन पाने वाला बूढ़ा डरता है कि मेरे सात हजार बैंक में जमा करा दिए तो कहीं पेंशन बंद नहीं हो जाए।
० नीरज दइया

26 नवंबर, 2016

प्रेम का कांटा

लेखक परिचय
मधु आचार्य ‘आशावादी’
जन्म : 27 मार्च, 1960 (विश्व रंगमंच दिवस)
शिक्षा : एम. ए. (राजनीति विज्ञान), एलएल.बी.
सृजन : 1990 से हिंदी और राजस्थानी की विविध विधाओं में निरंतर लेखन। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध।
प्रकाशन : राजस्थानी साहित्य : ‘अंतस उजास’ (नाटक), ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’ (उपन्यास) ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (कहाणी-संग्रह), ‘अमर उडीक’ (कविता-संग्रह), ‘सबद साख’ (राजस्थानी विविधा) का शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए संपादन।
हिन्दी साहित्य : ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य काहनियां’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’ (कविता-संग्रह), ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘रंगकर्मी रणवीर सिंह’ (मोनोग्राफ) अपना होता सपना (बाल उपन्यास)
पुरस्कार : उपन्यास ‘गवाड़’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर द्वारा ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्राकारिता पुरस्कार’
अन्य : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य, लगभग 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय, कुछ रचनाएं अन्य भारतीय भासाओं में अनूदित-प्रकाशित। विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य।
स्थाई संपर्क : कलकत्तिया भवन, आचार्यां का चौक, बीकानेर (राजस्थान)
ई मेल : ashawaadi@gmail.com  /  मो. 9672869385
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राजस्थानी कहानी
प्रेम का कांटा
मूल : मधु आचार्य ‘आशावादी’ ० अनुवाद : नीरज दइया
    बचपन से ही उसे घर में सारी सुविधाएं मिल गई। इसलिए मंजू उम्र से पहले ही व्यस्क हो गई। घर में ए.सी. था, एल.ई.डी. था, हाथ में स्मार्ट फोन था और कहीं आने-जाने की आजादी के साथ स्कूटी थी। ये सभी चीजें कुछ उम्र लेने पर किसी को मिला करती है, परंतु मंजू को तो समझ पकड़ते ही सब कुच मिल गया था।
    घर में किसी भी काम-काज के लिए नौकर थे, इसलिए कुछ काम तो उसे करना ही नहीं पड़ता था। मुह से बाहर आए शब्दों के साथ ही सब कुछ हाजिर हो जाता। समय ही समय था। हाथों में स्मार्ट फोन था इसलिए जैसा मन करता, वही करती। नई तकनीक और फोन ने तो दुनिया को मुट्ठी में ला दिया।
    घर बैठे पूरे संसार का भ्रमण, चाहे विदेश जाओ। कई भांति के तरीके हैं जिस से दूर बैठों को नजदीक देखो। आमने-सामने बात कर लो। एक दूसरे की तश्वीरें देख लो। चैटिंग कर लो। फेसबुक जैसा साधन है, जिसे चाहो दोस्त बनाओ और बातें करो। इंटरनेट ने दुनिया की सारी दूरियां तो पाट ही दी। फेसबुक तो लिखने और लिखे हुए पर कुछ कहने का बड़ा साधन बन गया। मंजू भी फेसबुक का बहुत उपयोग करती। उसकी फ्रेंडलिस्ट बहुत लंबी थी। उसी में वह दिन-रात लगी रहती।
    मां रोटी खाने के किए आवाजे लगाती रहती, तो मंजू कहा करती- मां, अभी मेरी अमेरिका की सहेली से बात चल रही है। यह पूरी हो जाए तो आती हूं।
    - तुमने तुम्हारी उस सहेली को देखा है क्या?
    - मां, फोटो लगी हुई है ना।
    - उसके बारे में जानती है क्या?
    - जानने की क्या जरूरत है। अपने को तो बातें करनी हैं।
    - बिना पहचाने कोई किसी का दोस्त कैसे हो सकता है।
    - मां, अब जमाना बदल गया है।
    - क्या बदल गया।
    - इंटरनेट से तो लोग व्यापार चलाते हैं और इस से बड़े-बड़े दूसरे काम भी करते हैं।
    - मुझे भी बता तो सही कि क्या क्या काम करते हैं।
    - अरे मां, तुम नासमझ हो। तुमको कुछ समझ नहीं आता।
    - मुझे समझ नहीं आता तभी तो तुझ से कह रही हूं कि तू समझा।
    - देख मां, पहले नेता चुनाव के समय वोट मांगने घर-घर जाया करते थे। पर अब तो एक साथ सभी वोटरों से वर्ता कर लेते हैं। पान की दुकान हो, चाय की दुकान हो या गांव की चौपाल, दूर बैठे उन से सीधी बात कर लेते हैं नेता।
    - हां, मैंने अखबार में पढ़ा तो था।
    - यह सच्ची बात है मां ! देख लो लोगों ने इसी इंटरनेट के बल पर सरकारें उखाड़ दी और खुद कुर्सी पर बैठ गए। चारों तरफ इसी इंटरनेट का जोर है, तुमको पता है क्या?
    - किस बात का।
    - एक सरकार तो इसलिए बन गई कि उसने सत्ता में आते ही सभी जगह इंटरनेट फ्री कर देने का कहा। लड़के-लड़कियां पीछे पड़ गए और उस पार्टी की सरकार बनवा दी।   
    - मेरी बिटिया, इस तुम्हारे इंटरनेट से सारी चीजें दूर से देखते हैं। एक न एक दिन तो उनकी पोल खुलती ही है।
    - फिर चाहे पोल खुलो, पर एक बार तो सत्ता में आ गए ना।
    - मुझे तो तुम्हारी बातें पसंद नहीं आती। तुम्हारे इस नेट को छोड़ और पहले खाना खा ले। खाना खा कर फिर से चला लेना। यह कहीं जा थोड़ी ही रहा है।
    - हां, यह बात तुम्हारी ठीक है। चलो, खाना खाते हैं।
    मंजू उठ कर मां के साथ रसोईघर में आ गई। खाना खाने बैठी। पापा भी आ गए थे। वे भी खाना खाने बैठ गए। मां ने खाना खाते खाते फिर बात चालू की।
    - यह तुम्हारी बेटी तो सभी काम नेट से करती है। पूरा दिन उसी से चिपकी रहती है।
    - आजकल इसी का चलन है। यह क्या गलत करती है।
    - अरे नेट पर सब कुछ अच्छा ही नहीं होता। यह भी तो लोग कहते हैं।
    - जो नेट चलता है उसको अच्छे-बुरे का ज्ञान होता है।
    - छोड़ो तब तो आपकी सह हो गई इसे। चलाना बेटी, मर्जी है तुम्हारी और तुम्हारे पापा की।
    पिता-पुत्री ने खाना खाया और अपने-अपने कमरे में आ गए। मां नेट को लेकर बड़-बड़ करती रही, पर दोनों पर कुछ असर नहीं था।

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    उस दिन मंजू के इनबॉक्स में एक मैसेज था। उस में किसी लड़के ने उसे फ्रेंड रिक्वेक्ट मंजूर करने का लिखा था। मंजू ने उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी। वह जवान था और फोटो में सुंदर दिखाई देता था। उस की टाइम लाइन पर या तो कविताएं थी या फिर भगवान के चित्रों के साथ भक्ति की पंक्तियां। किसी प्रकार की बुरी पोस्ट तो एक भी नहीं थी। मंजू को लगा कि इसे मित्र बनाने में ना नहीं करनी चाहिए। ठीक ही दिखाई देता है। उस की फ्रेंड रिक्वेट उसने एक्सेप्ट कर ली।
    बस, बन गए दोनों दोस्त। उसने बहुत ही सुंदर शब्दों में हाथोहाथ मंजू का आभार प्रदर्शित किया। उसका नाम अरुण था। फिर तो रोजाना कविता की पंक्तियां डालनी आरंभ कर दी। टाइम जब भी मिलता चैटिंग चालू कर देते। उसने बताया कि वह इंजीनियर है और एक कंपनी में काम करता है। घर में माता-पिता और दो बहने हैं, जिन का विवाह कर दिया। खुद ने अभी तक विवाह नहीं किया है।
    अरुण ने जब इतना बताया तो मंजू ने भी अपने घर के बारे में सब बातें बता दी। यह भी बता दिया कि वह करोड़पति पिता की इकलौती संतान है और घर में किसी चीज की कमी नहीं है, उसके पूछने पर यह भी बता दिया कि अभी तक ना तो मेरा विवाह हुआ है और ना सगाई।
    अरुण दूसरे शहर में रहता था। अब तो दिन में कई बार अरुण और मंजू चैटिंग करने लगे। बहुत बातें होने से दोनों नजदीक आते हैं, यह तो स्वभाविक ही है। अब दोनों ने आपस में ‘जी’ लगाना छोड़ कर मन लगा लिया। नाम से ही एक दूजे को लिखने लगे। दिन-भर की हर बात एक दूसरे को बताते रहते और यह भी कि बताते कि अभी कहां हैं।
    इंटरनेट ने उन दोनों के बीच की सारी दूरियों को कम कर दिया। अब तो रात को भी लंबी-लंबी चैटिंग होने लगी। दोस्ती की बातें प्रेम में बदलने लगी। आरंभ में तो दोनों डरते रहे, पर उम्र के असर के चलते एक दिन मंजू ने हां कह दिया। अब तो आपस में बहुत बातें होने लगी और बातें प्रेम की ही होती। दोनों आपस में वे बातें भी करने लगे जिनसे लोग बचा करते हैं। यह भी तय कर लिया कि यदि घर वाले नहीं मानेगे तो भाग कर विवाह कर लेंगे। मंजू में अब बदलाव आने लगा था, जो उसकी मां को तो साफ दिखाई देता था।
    एक दिन मंजू ने अपनी मां के सामने अरुण की बात की और कह दिया कि मैं शादी उसी से करूंगी। मां ने मंजू के पापा के सामने यह बात तो उन्हें धक्का लगा। इंटरनेट की दुनिया से खोजा गए दुल्हे की बात हलक से नहीं उतरी।
    माता-पिता ने मंजू को बहुत समझाने की कोशिश की, पर वह तो टस से मस नहीं हुई। कह दिया कि आप हंसी-खुशी शादी कर दें तो ठीक है, नहीं तो हम दोनों अपने आप ही शादी कर लेंगे। मां का मानना था यह सब इंटरनेट के कारण ही हुआ है। इसे बंद करवाएं। पर बेटी की जिद के सामने अड़ना पिता के भी बस की बात नहीं रही।

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    विवाह के इस झगड़े में कई दिन निकल गए। मंजू और अरुण की रोजाना बातें होती थीं। मंजू ने एक दिन उसे अपने शहर में आने का कहा। पहले तो उसने ना कह दिया लेकिन फिर आने के लिए राजी हो गया। मंजू उसके शहर नहीं जा सकती थी।
    आमने-सामने तो अब तक कभी वे नहीं हुए थे। इसलिए ही मंजू ने ऐसा कहा था। दिन तय हो गया और अरुण ने आने का कह दिया। दोनों मन खोल कर मिले। शादी की बात हुई और तय कर लिया कि घर वाले यदि नहीं मनते हैं तो हम अपने निर्णय पर अटल रहेंगे।
    शादी कब करेंगे इस विषय पर बातें हुई। मंजू ने तो उसी दिन साथ चलने की बात कर ली थी। अरुण ने बताया हुआ था कि उसने घरवालों से बात कर रखी है उन्हें कोई ऐतराज नहीं है। मंजू ने कहा कि बस मुझे तो तुम्हारे घर में ही रहना है। यहां से चलें। नहीं तो घरवाले हमें एक नहीं होने देंगे।
    अरुण ने यह नहीं सोचा था कि मंजू तुरंत ही साथ चलने का कह देगी। वह कुछ असमंजस में पड़ गया। मंजू अपने मां-पापा की बात जानती थी। चाहे वे शादी के लिए हां नहीं कर रहे हो, पर मंजू उनकी इकलौती बेटी थी, इसलिए उसकी बात टालने की हिम्मत उनमें नहीं थी।
    मंजू ने देखा कि अरुण कुछ डर रहा है तो उसने अपने घर चलने का कह दिया। पर अरुण को यह भी ठीक नहीं लगा। उसने बातों में उसे राजी किया और एक महीने के बाद शादी करने की हां कर दी। साथ में यह भी कह दिया कि अगर घरवाले नहीं मानेंगे तो हम खुद शादी कर लेंगे।
    अरुण ने जाते-जाते मंजू को कल की फेसबुक पोस्ट देखने का कहा। मंजू ने कहा कि मैं तो हमेशा ही देखती हूं। पर उसने अखरा कर फिर कहा कि कल जरूर देखना। कसमें खा कर दोनों एक दूसरे से जुदा हुए। अरुण अपने शहर वापिस चल गया। मंजू खुशी-खुशी घर लौट आई। एक महीने की ही तो बात है। यह समय भी जल्दी-जल्दी बीत जाएगा।
    उस दिन वह मां से नहीं झगड़ी। हंसती रही। मां को भी यह बात कुछ अजीब लगी, पर उससे कुछ नहीं पूछा। रात को सोने गई तो सुबह का इंतजार था। अरुण कह गया था कि फेसबुक की पोस्ट देखनी है। मंजू ने सोचा कि वह कोई कविता लिखेगा।
    आज उसे अरुण से चैटिंग करनी थी पर वह एक बार भी ऑनलाइन नहीं आया। फोन मिलाया तो स्विच ऑफ था। पर इस बात को मंजू ने गंभीरता से नहीं लिया। उसे तो सुबह की पोस्ट और एक महीने का इंतजार था। इसी में खोई रही वह।
    सुबह मंजू की आंख जल्दी खुल गई। चाय भी नहीं पी। उसे अरुण की बात याद थी। इसलिए सबसे पहले फेसबुक खोली और उस की प्रोफाइल पर गई। देख कर चक्कर आ गया।
    अरुण ने अपनी पत्नी और दो लड़कों का चित्र डाल रखा था। लिखा हुआ था कि आज मेरी बारहवीं एनीवर्सी है। मंजू को यकीन नहीं हुआ। फिर फिर देखा। फोन लगाया तो स्विच ऑफ था। उस की निगाह प्रोफाइल पर गई तो प्रोफाइल की बातें भी बदली हुई थी। खुद को ‘मैरिड’ बताया हुआ था और पत्नी का नाम गीता लिख रखा था।
    इंटरनेट से बने हुए सारे सपने टूट गए। सच सामने आ गया। मंजू ने सब से पहले तो अरुण को ‘अनफ्रेंड किया। मोबाइल में से उसके नंबर निकाले और ‘रिजेक्ट लिस्ट’ में डाल दिए। फिर उठ कर खुद ही चाय पीने गई।
    वहां मां-पापा दोनों बैठे थे। चाय ली और सामने बैठ गई।
    - पापा, यह स्मार्ट फोन रखिए। मुझे अब फोन नहीं रखना। और घर का इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा देना।
    दोनों चक्करा गए, यकायक यह क्या हुआ, कुछ मालूम नहीं चला। मंजू उठी और चलते-चलते बोली- आप जहां कहेंगे वहां शादी करूंगी। बस मेरी एक प्रार्थना है कि मुझे उम्रभर फोन मत देना। यदि फोन दें तो इंटरनेट मत देना।
    पिता बात समझ गए।
    - बेटा, इंटरनेट खराब नहीं है। पर इंसानी रिश्तों में केवल इसी से काम नहीं चलता। इस के लिए तो सभी कुछ देखना होता है। इसे केवल जानकारी के लिए काम में लेंवे तो कोई खराबी नहीं है। तुम यह फोन रखो और इंटरनेट भी रहेगा। बस तुम इसे रिश्तों का नहीं, बस जानकारी का साधन समझना शुरू कर दो।
    मंजू ने निगाहें झुका ली। फोन उठाया और धीमें कदमों से अपने कमरे की तरफ चल दी।
००००००
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया
  

25 नवंबर, 2016

काला धन देस में पकड़ा

जकल दिन-रात हमें बस हमारे पंच काका की चिंता है। भाग-दौड़ इतनी है कि पता ही नहीं चलता कब दिन निकला, कब रात हुई। जनाब समय का कुछ पता ही नहीं चलता। कब दिन निकलता है और कब रात हो जाती है। समय ने ऐसी करवट ली है। हम खुद को बंद कमरों में बंद किए बैठे हैं। हमें कुछ होश नहीं है। पहले भी हमारे होश उडे हुए थे। पर अब जैसा हाल बेहाल नहीं था। अब माजरा यह कि पांच सौ-हजार के नोटों ने होश उडा दिए हैं। पहले इसको जमा करने में सब कुछ खो दिया। अब चारों तरफ ऐसी हवा चली कि बाहर मुंह निकालते ही बेहोश होने का डर है। थोड़े से नोट क्या जमा कर लिए, लगता है कि अब गिरे.... अब गिरे। माननीय ने एक ही झटके में ऐसा गिराया है कि जैसे अब उठने की हिम्मत जाती रही। देखो जिसे घाव कुरेदने को आमादा है। नोटों की ही बात कर रहा है। सुन-सुन के कान पक गए। देश में चर्चा के सारे मुद्दे धरे रह गए हैं। भूला दिए गए हैं सारे मुद्दे। बस एक ही रट है। और इस नए नोटों के गीत में देश खो गया है। हर कोई एक ही गीत गा रहा है। सरकार ने पूरे देश को गाने के लिए एक नया राग दे दिया है। नोटों का गीत आज घर-घर में गाया जा रहा है। अब इसे आप सुख कहें या दुख। यह सच्चाई है कि सारे पिछले सुख-दुख हवा हो गए हैं। कोई पिछली बातें नहीं करता। जैसे सारी समस्याएं इस नोट-पुराण ने हजम कर ली हैं।
काका तो नोटों की बातें सुनते ही जैसे आपा खो बैठते हैं। उनका खून खौलता है। वे कहते हैं कि अरे पैसा जोड़ने के लिए दिन-रात एक किया। तब कहीं जाकर दो पैसे जमा हुए। अब किसे कहें और कौन सुनेगा कि बरसों अपना खून जलाया, तब कहीं जा कर ये दो पैसे हाथ आए हैं। हमने रख छोड़े कि बाज जरूरत काम आएंगे। अब काम क्या खाख आएंगे। उनका मानना है कि कोई ऐसे कैसे कह सकता है कि ये नोट नहीं चलेंगे। आपने दिए, तब चलते थे। अब क्या हो गया। पंच काका को दिन-रात चक्कर आते हैं। निवाला हलक से नीचे नहीं उतरता। ना भूख लगती है ना प्यास। बेचैन रहते हैं। ऐसे में दिन क्या और रात क्या। हमारे तो दिन-रात एक जैसे हो गए हैं। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा छा गया है। क्या पता कौन कब-कहां आकर पकड़ लेगा। न जाने ये क्या चक्कर चला है। पंच काका के साथ हमारी भी शामत पक्की है।
पहले सुना करते थे कि विदेशों में काला धन जमा है। कला धन देश में लाएंगे। अब काला-काला करते ये बड़ा खेल घर में ही कर दिया है। अब तो रंगीला देश बदरंग-सा लगता है। ये काला धन क्या निकालने लगे कि लगने लगा है कि सब रंग बेरंग हो गए हैं। काला धन अब विदेशों से लाने की जरूरत ही नहीं रही, देश में ही खूब मिल गया। पंच काका का मानना है कि धन तो धन होता है। उसका काहे का काला और गोरा। सच्चाई यह है कि कोई धन आपके सामने रख दिया जाए तो एक जैसा ही लगेगा। फिर आप काहे काला-सफेद बोलते हैं। बात तो बस इतनी-सी है कि ऐसा धन जिस पर आयकर लगता है और वैसा धन जिस पर आयकार नहीं लगाता। फिर ऐसा का वैसा और वैसे का ऐसा कर देने से क्या पूरा देश बेरंग नहीं हो जाएगा। जिसे देखो डरा हुआ है। पूरा माजरा ही बेरंग हो गया है। बड़े नोटों के हाथ लगाते ही डर लगता है। चवन्नी-अठन्नी देख कर खुशी मिलती है। अब औकात चवन्नी जैसी कर दी। फिर बातें भी ऐसी ही चवन्नी छाप। जेब कितनी ही भरी हो, लगता है- खाली है। काला यानी ब्लेक, वाइट का अपोजिट। ब्लेक मनी के चक्कर मेम दिन भी अब वाइट नहीं रहा। सब कुछ फीका-फीका लगता है। माना देश तो सोने की चिड़िया था और फिर से बन जाएगा पर क्या हम सभी को फिर से बंदर बनना होगा।

० नीरज दइया 

 

21 नवंबर, 2016

पाई-पाई का हिसाब

पंच काका ने मुझे से पूछा- तुम्हें पता है पाई का मतलब? मैं सिर हिलाकर पूछा- आप कौनसी पाई की बात कर रहे हो? क्या आर्यभट्ट वाली पाई, जिसका मान बाइस बट्टा सात होता है। काका बोले- नहीं मैं तो उस पाई की बात कर रहा हूं जो मुझे बचपन में मेरे दादाजी दिया करते थे। तुम लोग क्या जानो उस समय हम क्या का क्या कर देते थे एक पाई में। इतना सुन मैं बीच में बोल- हां समझ गया, बापू जब इंग्लैण्ड गए थे तब वहां वे पाई-पाई का हिसाब रखते थे। मैंने ना तो बापू वाली पाई कभी देखी है और ना ही आपने आप वाली दिखाई है। मैं तो गणित का विद्यार्थी रहा हूं और बस इतना जानता हूं कि ज्यामिती में किसी वृत्त की परिधि की लंबाई और व्यास की लंबाई के अनुपात को पाई कहते हैं।
पंच चाचा तुनक गए। बोले- आग लगे इस ‘गणित’ को। यह गणित ही है जो बेड़ा गर्क कर देती है। सबकी पोल खोलने वाली गणित को मैं पसंद नहीं करता। अब सुन हमारे पीएम माननीय नरेंद्र मोदीजी ने महाराष्ट्र के सिंधखेड़ा में कह तो दिया है कि साठ महीने की पाई-पाई का हिसाब दूंगा। पर देंगे कैसे? इतना बड़ा देश और हिसाब भी इतना बड़ा। भला किसी से हो सकता है क्या? चाचा कुछ आगे कहते, मुझे बीच में बोलना पड़ा- देखिए चाचाजी, मैं आपसे साफ-साफ शब्दों में कहे देता हूं कि मैं ऐसी-वैसी कोई बात नहीं करना चाहता, जिस पर बाद में कोई बखेड़ा हो। कोई क्या करता है और क्या कहता है, उस से मुझे तनिक भी मतलब नहीं है। मैं तो बस अपने काम को देखूंगा कि मैं क्या करता हूं, क्या कर सकता हूं। आजकल कुछ भी कहना खतरनाक है। मैं तो इसी हिसाब में फसा रहता हूं कि क्या कुछ बोलना ठीक है। डर लगता है कि कहीं कुछ गलत बोल गया तो कौन-सी का कब-कहां आ कर कोई हिसाब मांग ले। मैं भला और मेरी चुप्पी भली। हम देशवासियों पर बहुत से नियम लगते हैं। हम नियमों के जाल में फसे हुए हैं।
पंच चाचा मुस्कुराए और बोले- यह तो बहुत समझदारी दिखाई तुमने। तुम सोचते बहुत अच्छा हो, ऐसा सोचते रहो। सोचने-समझने पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगा सकता है। मैंने खुश हो कर सहमति में सिर हिलाया तो वे बोले- सुनो! देश में इतनी उथल-पुथल हो रही है और तुम जो अपने आप को बुद्धिजीवी कहे या पढ़-लिखे लोग, कहें जिन्हें लोकतंत्र पर भरोसा है। तुम्हारा-हमारा वर्ग बड़ा शक्तिशाली माना जाता है। पर क्या करें तुमने तो चुप बैठने का निर्णय ले लिया है। पंच चाचा ने गहरी मार कर दी तो मुझे मजबूरी में फिर बोलना पड़ा- देखिए, आप समझते नहीं। मैंने आपसे जो कहना था कह दिया और पूरे सोच-विचार के बाद ही जो कुछ कहा है.... ठीक कहा है। मुझे अपनी जिंदगी बसर करनी है और काम-धंधा करना है। घर-परिवार और बच्चों की सरी जिम्मेदारियां अभी सामने पड़ी है। आप तो अपनी पारी खेल चुके हैं। इसलिए मैं झमेलों में पड़ना ही नहीं चाहता। मुझे माफ कर दीजिए।
पंच चाचा बोले- मैं तो माफ कर दूंगा पर यह देश और जनता कभी किसी को माफ नहीं करती। इस देश का कर्ज है हमारे ऊपर। तुझे पता है कि नहीं अभी एक रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायमसिंह यादव का संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ विकास के मामले में लगातार पिछड़ता जा रहा है। इसके साथ ही गणित यह भी सामने है कि हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और विपक्षी दल कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधीजी का अमेठी भी पिछड़ता जा रहा है। ये पाई-पाई का हिसाब तो सभी को करना चाहिए। बहुत अच्छी बात है, पर क्या सबसे पहले सभी को अपनों-अपनों का हिसाब भी तो मिला लेना चाहिए। जहां से हम आगे बढ़ते हैं, उनका भी बड़ा ऋण होता है।

17 नवंबर, 2016

नमक नमकीन हो गया

फवाह का क्या, कुछ भी फैल सकती है। इसके कई कारण हैं। प्रमुख तो यह कि ‘अफवाह’ उड़ती या उड़ाई जाती है। उड़ने वालों की गति चलने वालों से सदैव अधिक होती है। हमारे देश में बड़ी समस्या जनसंख्या और बेरोजगारी का कोढ़ है। जनता-जनार्दन में निठल्ले लोग हैं, जिनके पास कोई काम-धंधा नहीं। वे बस सोचते हैं। सोचना हर नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। सोचने और बिना सोचे बोलने का क्या है, कुछ भी सोचा और बका जा सकता है। दिमाग का दोष है वह कहीं का कहीं चला जाता है। सोचने पर तो पाबंद नहीं लग सकती। बोलने पर पाबंदी लगाई जा सकती है। कोई जैसा जी में आए अंट-संट ऐसे कैसे बोल सकता है। नियम-कानून नहीं है क्या? सब के होते हुए भी यह खतरा उठाने वाले बहुत हैं। कुछ का कुछ बोलते हैं और न जाने कहां खिसक जाते हैं।
नियम कानून मुझ पर लगते हैं और मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। पर जनाब, भारत मेरा देश है और समस्त भारतीय मेरे भाई-बहनों में से बहुत बिगड़े हुए भाई-बहन भी है। कहीं भी कुछ का कुछ बोल देते हैं। आपको और हम को पता नहीं चल सकता कि हमारे किस भाई अथवा बहन ने यह करतूत की है। दूर क्यों जाएं, अब नमक की ही बात लें। मान लिया कि बाद में पता चल गया कि अफवाह थी। दाम में इतना हेर-फेर नहीं हो सकता। फिर भी कुछ घंटों के लिए तो पूरे देश को नमकीन कर दिया। न मालूम इस थोड़े से समय में कितनों की जिंदाबाद और मुर्दाबाद हो गई।
मेरी घरवाली को मैं बस-स्टैंड छोड़ के आ रहा था कि बीच राह फोन आया। फोन पर और वैसे भी वह कैसा भी बोलती हो, पर मैं यही कहूंगा कि उसकी मधुर वाणी से मुझे सुनने को मिला कि घर जाते समय पांच थेली नमक खरीद के ले जाना। मैंने मन की बात उसे कह दी कि कल ही तो नमक मंगवाया था। एक थेली घर में रखी है। वह बोली- आज का अखबार पढ़ा क्या? उसके ऐसे फालतू सबालों से मैं परेशान हूं। वह जानती है कि मैंने नहीं पढ़ा, फिर ऐसा सवाल क्यों जिसका जबाब पता हो। मैंने हार मान कह दिया- ठीक है घर जाते हुए दस थेली नमक ले जाऊंगा और नमक का हलवा बना कर खा लूंगा। अब वह नरम होती बोली- तुम तो नाराज हो जाते हो। आज के अखबार में छपा है कि नमक पांच सौ रुपये किलो हो गया है। इसलिए स्टोक करना जरूरी है। देखना हमें बहुत फायदा हो जाएगा। मैं फायदे में विश्वास करता हूं. मैंने तुरंत कहा ‘ठीक है’ और फोन काट दिया। मैं ऐसे फायदे में विश्वास रखता हूं।
मैं रास्ते में सोचने- आजकल लोग नमक का महत्त्व समझते ही नहीं। नमक खा कर देश का और गद्दारी करते हैं। पहले नमक का कितना मान-सम्मान था, हो सकता हो उसी मान सम्मान को लौटाने के लिए भाव बढ़ाए हों। खैर मेरी समझदारी कि घर के पास वाली दुकान से पांच थेली नमक खरीद लिया। पर यह क्या कुछ ही देर में उस दुकान का लड़का मेरे घर आ पहुंचा। कहने लगा- चाचाजी, नमक के दो हजार रुपये मंगवा रहे हैं। मैं चौंक पड़ा, यह कैसा हिसाब है? क्यों दो हजार क्यों? गुस्से में यह सवाल मुंह से निकल पड़ा। वह दयनीय स्वर में बोला- चाचाजी कह रहें है कि पंच चाचा का भतीजा बड़ा उस्ताद निकला। नमक के भाव बढ़ गए और वह पुरानी रेट में सुबह-सुबह नमक खरीद कर चपत मार गया। मैं अब भला बच्चे से क्या लड़ाई करता। उसे हजार-हजार के दो नोट पकड़ाने लगा, तो वह मुस्कुराया और बोला- मुझे भी उल्लू बनाना चाहते हैं, ये नहीं चलेंगे। मरता मैं क्या न करता, घर के भीतर गया और वे नमक की थेलियां उठाया लाया। उसे पकड़ाते हुए बोला- “बोलना छुट्टे नहीं है, होंगे तब खरीद लेंगे।’

14 नवंबर, 2016

बाल की खाल निकालना

‘बाल की खाल निकालना’ का अर्थ आप के लिए भले ‘व्यर्थ तर्क करना’ अथवा ‘व्यर्थ का दोष निकालना रहे’, पर मेरे लिए कुछ अलग है। यह मेरे अनुभव की बात है। मेरे बाल बहुत कम है और जो बाल मेरा साथ छोड़कर चले गए हैं उनमें से कोई भी बाल अपनी खाल साथ लेकर नहीं गया। कोई गया भी है तो मुझे इसकी खबर नहीं। शायद यही कारण है कि मैं कभी किसी के बाल की खाल नहीं निकालता। बाल शब्द बाल-गोपाल से जुड़ कर मुझे आनंदित करता है। बो कृष्ण कन्हैया, माखनचोर मटकीफोड़ जैसे भीतर ही भीतर गुदगुदाता है। अब वैसे बाल-गोपाल और आनंद कहां।
आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे भारत देश में वर्ष 5 से 14 तक के बाल-गोपालों की संख्यां 25.96 करोड़ है, और इनमें से 1.01 करोड़ बालक-बालिकाओं की खाल दिन-प्रतिदिन निकाली जा रही है। अब तक तो बाल की खाल निकालने वालों की इस संख्या में निश्चित रूप से काफी बढ़ोत्तरी हो गई होगी।
मैं तो किसी एक बाल-गोपाल की खाल आंखों के सामने निकलते देखता हूं तो मेरा खून खोल उठता है। मेरे जैसे भाई-बंधुओं का खून इतना खौला और खौलता है फिर भी आलम यह है कि अब तक हम कुछ भी कर नहीं सके हैं। किसी होटल, ढाबे, मैकेनिक, दुकान अथवा सार्वजनिक संस्थान में काम करते हुए देश के नन्हें-नन्हें बालक-बालिकाएं जीवन की आग में समय से पहले ही पक रहे हैं। हम इन काम करने वाले बालों-गोपालों और गोपिकाओं की खाल इतनी निकाल लेंगे कि वे खाल रहित हो जाएंगे। मोटी चमड़ी और खाल रहित लोग देश को कहां से कहां तक पहुंचाएंगे यह कहने-सुनने का विषय नहीं है। अब अगर आपकी समझ पर इतना भी शक करूं तो हो गया बेड़ा गर्क। शिक्षा और साक्षरता का भले असर नहीं हो पर आपक इस देश में रहने का अनुभव क्या काफी नहीं है, इन सब बातों के लिए।
बचपन में ही हम इतनी बड़ी आबादी के इतने बड़े हिस्से को बिना खाल का बना देंगे तो ये बिना खाल वाले भावी नौजवान देश के लिए कैसे सपने और भविष्य की कल्पना करेंगे। कवि राजेश जोशी ने अपनी कविता में लिखा- “सारी चीज़ें हस्बवमामूल/ पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए/ बच्चेा, बहुत छोटे-छोटे बच्चेज/ काम पर जा रहे हैं।” बच्चे काम पर जा नहीं रहे उनको जाना पड़ रहा है। कवि की भांति मेरा भी यह कहना है कि अब दुनिया में शायद कुछ भी बचा नहीं है। दया-शर्म, प्रेम-सद्भवाना, नियम-कानून सब जैसे होते हुए भी बेअसर हो गए हैं। बालश्रम के सारे कानून धरे के धरे रहते हैं और माता-पिता बच्चों को काम पर भेज रहे हैं। और जिनके काम है वे इस बात से बेपरवाह कि कभी कहीं उनकी भी खाल कोई तो निकालेगा ही। मान लिया कि आपके पास ऐसा हुनर है कि कोई अपाका बाल तक बाँका नहीं कर सकता।
हे लक्ष्मी पुत्रों हम आपसे अनुनय करते हैं कि बाल की खाल निकालना बंद करो। माना सब की अपनी अपनी मजबूरियां हैं। गरीबी, बेरोजगारी के इस आलम में जब पढ़े-लिखें और समझदार लोग अपना शोषण कराने के लिए विवश है तो ऐसे बाल-गोपालों को तो अपने भविष्य के बारे में पूरा पता भी नहीं है।
हमारे सब के अपने अपने काम है। समय ही कहां है। इस दौड़-भाग में बस फुर्सत इतनी है कि ऐसे बाल-गोपाल जहां कहीं मिलते हैं उन्हें देख भर लेते हैं। हमारे मशीन होते शरीर में बची-खुची थोड़ी संवेदनाएं जाग्रत हुई तो बस उनके बल पर अधिक से अधिक छोटा सा संवाद भर होता है।
- बेटा तू कितने बरस का है?
या भाषा भी ऐसी कि ‘ऐ तेरी उम्र कितनी है?’
हमारे देश और उनके सपनों से हमें क्या लेना-देना। इतने हमारे काम-काज के बीच हम मन में यह जो इतना सोचते भर है वह बहुत है। किसी से बैर करने में क्या फायदा। हम बिना मतलब के फजीहत करने में विश्वास नहीं रखते। हां हमारा मतलब हो तो हम हमारे दो रुपये के लिए फजीहत कर सकते हैं।
देश का जो कानून है वह अपने आप चल-फिर भी नहीं सकता। उसे चलाने-फिराने वाले कानून को घुमाने-फिराने के ऐसे लेन-देन में उलझे हैं कि कोई उम्मीद की किरण दिखाई नहीं देती है। आखिर उनका भी तो अपना घर-परिवार है और महंगाई है जो देश में इस कदर बढ़ती चली जा रही है। कभी कोई सिरफिरा कुछ करता भी है तो कहानी का अंत सभी पक्षों की तरफ बस एक-सा ही होता है कि यार बाल-बाल बच गए। वर्ना लपेटने वाले बहुत है। हम बाल-बाल बचते आएं है और मेरे बारे में तो आपको बता दूं कि मेरे तो बाल भी बहुत कम बचे हैं। जो भी बचे हुए बाल है उनको बाल-बाल बचाना बहुत जरूरी है।
पंच काका कहते हैं कि जो कोई समाजसुधारक बनकर समाज को सुधारने चलता है, तो उसे यह समाज और इसके कानूनों से यह संसार अपने पहले ही अनुभव में इतना कुछ सुधार कर ठीक कर देता है कि फिर आगे कभी वह किसी सुधार का नाम लेने की हिम्मत नहीं करता। काका तो बड़े अनुभवी हैं। कहते हैं- बच्चों, हमें बस अपना ध्यान रखना है। यह हमारा मसला कभी नहीं होना चाहिए कि क्यों कोई किसी बाल की खाल निकाल रहा है? अगर ऐसा विचार आए तो मेरे पास विगत घटनाओं का भंडार है। जान लें सभी बाल बाल बचे हैं। उन कहानियों को सुनकर आपके रोंगटे खड़े नहीं हो जाए तो कहना।
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12 नवंबर, 2016

पांच सौ और हजार के नोट का चक्कर

मेरे बेटे ने मुझे आवाज दी- “पापा जल्दी आओ। ये मोदी जी ने क्या कर दिया?” मैं किताब पढ़ने में खोया था जहां था वहीं से पढ़ते-पढ़ते बोला- “कौनसे मोदी जी ने क्या कर दिया?” उसकी उतेजना बढ़ गई और वह लगभग भागता हुआ आया और मेरा हाथ पकड़ कर टीवी वाले कमरे में ले गया। वह कह रहा था कि हमारे देश में मोदी जी कोई दस-बीस थोड़ी ही है बस एक ही मोदी जी हैं। पांच सौ और हजार के नोटों को बंद करने की घोषणा माननीय प्रधानमंत्री जी के श्रीमुख से सुनकर सन्न रह गया। जैसे लड़के ने मुझे आवाज दी, वैसे ही मैंने गृह-मंत्रालाय को पुकारा। “अरे सुनती हो, इधर आना जरा।” मुझ में और मेरी पत्नी में कुछ बड़े अंतर है उनमें एक अंतर यह है कि मैं अक्सर किताब में खोया मिलता हूं और वह रसोईघर में। हाथ आटे से सने हुए वह आई तो मुझे पुरानी फिल्म के किसी खास सीन की याद आनी चाहिए थी पर मैं तो ‘मुद्राराक्षस’ के नए पाठ से उसका साक्षात्कार करवाने को उत्सुक था। उसके स्वर में प्रेम नहीं झल्लाहट थी कि क्या हुआ मुझे क्यों बुलाया है। मैं उसे कुछ बताता-समझता इतने में पंच काका अपने कमरे से निकल कर मेरी तरफ आते दिखाई दिए। वे कह रहे थे- “शोर क्यों मचा रहे हो? क्या हुआ?”
अब मैं वक्ता था और मेरे श्रोता में गृहमंत्रालय के वरिष्ठतम सदस्य पंच काका भी शामिल थे। उन्हें मैं क्या समझता। मैंने कहा- “आप खुद अपनी आंखों से देख लो क्या हुआ है?” समाचार वाचक और माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी फिर-फिर एक ही किस्सा बड़े आराम से दोहरा रहे थे, और हम सब का आराम जैसे उनकी घोषणा से खराब हो रहा था। पत्नी ने कहा- “ऐसे थोड़ी ही हो सकता है?” और पंच काका का सवाल था- “अब क्या होगा?” दोनों के अपने अपने संदर्भ थे। मुझे पत्नी को समझना था कि ऐसा हो चुका है और पंच काका को यह कि अब कुछ नहीं हो सकता है। हमारे नोटों का कचरा हो गया है। अभी कुछ ही दिनों पहले पंच काका ने अपनी एक दुकान और जमीन बेची थी और करोड़पति होने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हो चुका था। मुझे डर लगने लगा कि कहीं हार्ट अटेक नहीं आ जाए क्यों कि दुकान और जमीन से प्राप्त रकम में काला और सफेद धन का कुछ चक्कर ऐसा था कि बहुत सारी रकम उन्होंने अपने लॉकर में और घर में रख ली थी। पंच काका सोफे पर ऐसे बैठे ही अब क्या होगा बोलने के बाद एकदम शांत चित हो कर जैसे कहीं खो गए। मैंने लड़के से कह कर पानी मंगवाया और पंच काका को पीने का निवेदन किया तो उन्होंने गिलास को फेंक कर पटक दिया और चिल्लाते हुए बोले कि मैं इस घर में बड़ा हूं तो क्या हुआ तुम भी अब छोटे नहीं हो। फिर तुमने मुझे जोर देकर क्यों नहीं कहा कि सारा रुपया बैंक में जमा करा दो अथवा कहीं ठीक ढंग से लगा दो। अब मैं बूढ़ा हो गया हूं। धन रोक कर बैठ गया और अब बर्बाद हो गया ना। अब चीखने की बारी गृहमंत्रालय यानी मेरी पत्नी की थी। वह मेरे हाथ जोड़ती हुई बोली- “मुझे माफ कर दीजिए।” मैंने कहा- “क्यों क्या हुआ?” उसने जो कुछ बताया उससे मुझे ज्ञात हो गया कि मेरा शक सही था, बहुत बार मुझे लगता कि रुपयों-पैसों में कुछ गड़बड़ हो जाती है। वह कभी पांच सौ का नोट तो कभी हजार का नोट जेब से मार कर छुपा कर रख देती। अब सारी पोल सामने आ गई। इन सब के बीच एक तीसरा धमका भी मुझे सुनना था। टीवी वाले कमरे में मेरे बेटे ने अपना गुल्लक लाकर फोड़ दिया। अब जमीन पर हमारे समाने कुछ नोट पांच सौ के कुछ हजार के बिखरे पड़े थे। अगर कोई दूसरा दिन होता तो गुल्लक के बिखरे हुए नोटों में मेरा बेटा पांच सौ और हजार के नोट पहले उठाता। उसने छोटे नोट और सिक्के पहले उठाए और अंत में सभी पांच सौ और हजार के नोट उठाए और बोला- “लो ये आपके लिए।”
० नीरज दइया
 

11 नवंबर, 2016

यारबाज आलोचक को नमन

साहित्य में कवि-कहानीकार और लेखकों की जमात में एक आलोचक नाम का तुर्मखां होता है। इस तुर्मखां का नाम चाहे कोई हो पर जन उसके नाम के आगे आलोचक लिखा जाने लगता है उसी दिन से समझ लेना चाहिए कि यह ऐसा है कि जिसका कोई भरोसा नहीं कर सकता। भरोसा इस अर्थ में कि कब क्या कह दे या लिख दे, पहले से कोई कुछ भी नहीं जान सकता। कभी कभी मुझे तो ऐसा लगता है कि ये जनाब खुद तुर्मखां जी भी अपने बारे में यह नहीं जानते कि कब कौनसा गुल खिला देंगे। पता नहीं किसको हंसा और किसको रुला देंगे। नए शोध खोज से यह भी पता चला है कि ये महाशय आलोचना करते हैं मगर अपनी ही मित्र-मंडली और इनको जहां कुछ लाभ दिखता है बस उनकी ही।
वैसे मेरे मन की बात आपको मैं बता देता हूं यह जानते हुए भी कि आप अपने मन की बात कभी नहीं बाताते फिर भी मैं मूर्ख हो हूं ऐसा मूर्ख ही रहना चाहता हूं। इसका कारण भी साफ है कि मैं अपने मन के बोझ को ऐसे हलका कर लेता हूं और आप हैं कि अपने मन पर कितना कितना बोझ लादे हैं। ऐसे में आपकी इस समझदारी और यारबाज आलोचक को नमन करना जरूरी है। आपको नमन करने से आप खुश होगें और कहेंगे कि देखा खुद को खुद ही मूर्ख कहता है तब हम समझदार कैसे कहें। यह बात भी आप प्रत्यक्ष नहीं कहते बस मन पर ऐसा सोच कर बोझ बढ़ाते हैं। प्रत्यक्ष में तो हल्की सी मुस्कान देते हैं इस मूर्खता पर जिसमें आपकी विद्वता का पाखंड भी झलकता है। यारबाज आलोचक को नमन इसलिए कि ऐसे नमन से ही कभी हमारा भी नंबर लग जाए शायद।
अगर मैं किसी पत्रिका का संपादक होता तो अपने दोस्तों की किताबों की समीक्षा के लिए ऐसे यारबाज आलोचक को पत्र के साथ किताबे भेजता और फिर देखता कि वह लिखता है कि नहीं लिखता। एक भेजता और दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी भेजता रहता जब तक कि वह लिख नहीं देता। मानदेय का लालच दिखा कर भी आलोचक को चित किया जा सकता है। अधिक से अधिक क्या करना होगा किसी कार्यक्रम में कोई पद देकर बुलाना पड़ता और खर्च भी कितना आने जाने का रहने ठहरने और खाने पीने का होता है। मानदेय के नाम पर स्मृति चिह्न और श्रीफल-शॉल में तो सब गद्गद हो जाते हैं। ऐसे में पांच-पच्चीस क्या दिखा दिए कि बल्ले-बल्ले हो जाती।
ऐसे यारबाज आलोचकों को पटाने की दूसरी विधियां भी हैं। किसी होटल का या घर में ही कुछ प्रबंध कर देना होता है और चाहिए क्या बस शाम को कुछ गम गलत करा दिया जाए तो माता सरस्वती की ऐसे कृपा होती है कि शाम के इंतजार में ये कुछ भी कर गुजरते हैं। अगर आपकी जरा-सी सहमति हो तो कुछ अचूक विधियां भी है जिनके इतेमाल से तो यारबाज आलोचक उम्र भर के लिए चित हो जाते हैं। आप को बस इतना समझ लेना है कि मधुर स्वर और गीत-संगीत के साथ राग-रंग हर किसी की कमजोरी होता है। ये यारबाज आलोचक तो बस जरा-सा लटका-झटका दिखाया कि हांजी हांजी बोलने के अलावा सब कुछ भूल जाते हैं। आपकी हल्की-सी मुस्कान और जरा-सी अदा नाज-नखरे अनमोल है और जो मोल में नहीं खरीदा जा सकता उसे खरीदने के लिए कुछ अनमोल ही चाहिए।
अफसोच है कि मैं किसी पत्रिका का संपादक नहीं हूं, संस्था का पदाधिकारी भी नहीं और गुरुओं ने ऐसे संस्कार डाले कि ऐसा-वैसा कुछ करने से डरता हूं। मेरे साथ बस मेरी सच्चाई है। पंच चाचा कहते हैं- आलोचना से कुछ नहीं होता। आलोचक में ही अगर दम-खम होता तो वह खुद कुछ नहीं लिख लेता क्या?
 
० नीरज दइया

03 नवंबर, 2016

शुद्ध चीजों का गणित

जैसे-जैसे हमारे देश ने विकास किया है, वैसे-वैसे चीजों की शुद्धता दर घटती गई है। जहां देखो वहीं कुछ न कुछ चर्चा होती रहती है। चर्चा का क्या है? अच्छी और बुरी दोनों ही प्रकार की चर्चाएं होती हैं। क्या सच में अब ना तो पहले जैसा दूध रहा है, ना धी। समय के साथ सब कुछ बदल गया, तब दूध-धी को भी तो बदलना था कि नहीं? फिर भी बहुत लोग पुराना राग क्यों आलापते हैं? यह तो अच्छा हुआ कि चीजों के भाव अब आसमान छूने लगे हैं। पहले जैसे भाव अब नहीं रहे। पर लोग है कि पहले के भावों को याद करते रहते हैं। कहते हैं- अब पहले जैसे भाव नहीं रहे। अगर आज के इस दौर में पहले जैसे भाव हो जाए तो शामत किसकी आएगी। मरेगा तो बेचारा गरीब आदमी ही। वह तो पहले से ही अधमरा है, उसे क्यों पूरा मारने की मन में लिए बैठे हो?
पहले की बातें अब भूल भी जाएं। अरे भाई पहले तो भाव को पकड़ने और परखने वाले बहुत भले लोग हुआ करते थे। ऐसे लेखक भी होते थे, जो लोक प्रचलित अनेक बातों को खुद का मिर्च-मसाल और अपना मौलिक तेल का फौवा लगाकर ऐसी खुशबू जोड़ते थे कि सब कुछ अपने नाम के ब्रांड में बदल देने का हुनर जो जानते थे। पुराने माल को नया बनाकर वे बेचने में उस्ताद थे। बिना उदाहरण के तो आप को कोई बात समझ ही आती नहीं। नया जमाना है तो समझ भी विकसित होनी चाहिए। पर नहीं आप तो जरा सी बात क्या सुनते हैं कि अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाकर न जाने क्या का क्या अर्थ निकाल लेते हैं।
‘रायां रा भाव रातै ई गया’ जैसी सामान्य-सी अनेक लोक-उक्तियों से कथाओं का जन्म क्या कोई मामूली बात है। उससे भी गैर मामूली बात है कि लोक की बातों पर अपनी मुहर लगा कर अपनी मौलिक कहना और अपने नाम से बेचना। आम कहां से आए? यह बात आम खाने वाले को बताए या नहीं बताएं, क्या इससे आम के स्वाद में कोई फर्क पड़ता है? आप बस आम खाएं, और बगीचा चाहे मेरा हो मेरे पिता का हो या फिर पंच चाचा का आपको क्या मतलब। अगर आपमें भी कुछ करने का ऐसा हुनर छिपा है तो कीजिए। कौन कलम या हाथ पकड़ रहा है? कहा ना, यह काम हर कोई कहां कर सकता है? और कोई इसे करता है तो उसकी आत्मा जानती है कि किस कदर लोक का चीरहरण कर अपने शब्दों में पिरोने का महान कार्य किया जाता है।
सब कुछ रेडिमेड बरतने वालों को खबर ही कहां कि कौनसी चीजें कहां से आती है। शुद्ध चीजों का गणित समझना कोई आसान काम नहीं। आपको पता है कि मिर्च कितने प्रकार की होती हैं? चलिए आप तो बस यह बताएं कि मिर्च कितने रंगों में पाई जाती है? छोड़िए, यह तो पता होगा कि किसी को मिर्ची लगाई कैसे जाती है? अरे क्या कभी आपने मिर्च लगाने का महत्त्वपूर्ण काम नहीं किया। आपको कुछ तो अनुभव होगा ही, क्यों किसी को मिर्ची लगती है? पंच काका मिर्च की थेली लाएं हैं और उनके कुछ भतीजे खंख से परेशान हो रहे हैं। शुद्ध चीजों का गणित इतना गड़बड़ा गया है कि अब शुद्ध चीजों को हजम करना मुश्किल हो गया है। अरे किसी को कोई शुद्ध बात कह कर देख लो, तुरंत मिर्ची लगने लगेगी। समय के बहाव में हम और हमारे स्वार्थ इस कदर हम पर हावी हो चुके हैं कि कहीं भी हमें हमारे फायदे और नाम में कुछ किंतु-परंतु दिखाई देता है, या कोई अलग झलक नजर आए तो हम तुरंत बेचैन हो जाते हैं। सही को सही और गलत को गलत स्वीकार करने की शुद्धता का गणित हमारे पास अब बचा नहीं है। अब तो ‘अहो रूपम, अहो ध्वनि!’ का युग है।
० नीरज दइया

02 नवंबर, 2016

संकट में इन्हें सूचित कीजिए

अंग्रेज भारत क्या आए, सब कुछ उलटा-पुलटा कर गए। यह मैं नहीं पंच चाचा कह रहे हैं। उनकी डायरी बोल रही है। मेरी हालत ऐसा कुछ कहने या लिखने की नहीं है। आपकी हो तो आप जाने। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मेरे ऐसा कहने-लिखने पर बहुत से सवाल होते हैं। एक सीधी-सी बात में लोगों को अनेक पेच दिखाई देते हैं। वैसे यह बात हमारे पंच चाचा जितनी सीधी-सपाट है। डायरी में लिखा है कि पहले सब मानते थे कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हिंदू नव संवत्सर प्रारंभ होता है। राजस्थानी समाज का नया साल दीपावली के दिन से आरंभ होता है। गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन से आरंभ करते हैं। पंजाब में नया साल बैशाखी के साथ आता है और इस्लामिक कैलेंडर का नया साल मुहर्रम से आरंभ होता है। यह नववर्ष के सिलसिले में जनवरी-फरवरी को अपनाते हुए हमने धर्मनिरपेक्षता का परिचय दिया है। सब अपना अपना नया साल मनाओ पर जनवरी-फरवरी या कहें अप्रैल-मई में ऐसे अटके है कि यह हमारी अनेकता में एकता का लाजबाब उदाहरण बन गया है। साला कोई साल का समापन दिसम्बर में करता है, तो कोई मार्च को साल का ऐंडिंग बताता है। अजीब माथापच्ची है।
    इन सब बातों का दोष पंच चाचा अपनी डायरी में अंगेजों को देते हुए अनेक बातें लिखते हैं। आज संयोग ऐसा बैठा है कि वे अपनी डाय़री बाहर भूल गए और यह मेरे हाथ लग गई। हमारे धर्मनिरपेक्ष देश के बारे में पंच चाचा के विचार मुझे प्रभावित करते हैं। वे तो आज भी नववर्ष का शुभारंभ दीपावली से करते हैं। आप भले पंच चाचा को ठेठ मारवाड़ी या राजस्थानी कह लें, पर वे अपनी आस्था पर अडिग है। सच में यह बहुत बड़ी बात है कि पंच चाचा की आस्था में उनका सुख, समृद्धि, वैभव और ऐश्वर्य समाहित है।
    पंच चाचा की आस्था का अनुपम उदाहरण उनकी डायरी के पहले पन्ने पर देख रहा हूं। अनेक जानकारियों के बाद बड़े अक्षरों में छपा है- ‘संकट में इन्हें सूचित कीजिए।’ पंच चाचा ने जहां मेरा नाम लिखा होना चाहिए वहां हमारे शहर और आस-पास के अनेक देवी-देवताओं के नाम लिख दिए हैं। लिखा है कि संकट में इन्हें सूचित कीजिए : कोड़मदेसर भैंरूनाथ, हनुमानजी, गढ़ गणेशजी, देशनोक करणी माता, नगणेचीजी माताजी, सालासर बालाजी, पूनरासर बालाजी, मोरखाणा सुसाणीदेवी...। मैं तो इतने नाम देख कर हैरान हूं कि अगर संकट के समय इन्हें सूचित करना पड़ा तो कैसे सूचित करूंगा। काश कि यहां मेरा नाम और मोबाइल नंबर लिखे हुए होते तो मैं सोचता कि पंच चाचा को मुझ पर भरोसा है। पंच चाचा खुदा ना करे कि आप पर कोई संकट आ जाता है तो मैं क्या करूंगा। मैं कर भी क्या सकता हूं। सच में तो करेंगे ये सभी जिनके अपाने नाम लिखें हैं। डॉक्टर भी सब कुछ करने के बाद भी कहते हैं- सब ऊपर वाले के हाथ में है। ये ऊपर वाला अनेक नामों से हमारे आस-पास अपने कुछ स्थान बनाकर बैठा है। पंच चाचा का भरोसा है कि संकट के समय ये सभी या इन में से कोई एक-आधा मदद जरूर करेगा।
    मैं उस युग की कल्पना कर रहा हूं जब इन सभी देवी-देवताओं के पास भी मोबाइल आ जाएगा और पंच चाचा जैसे हमारे चाचा जिस किसी भी नाम लिखेंगे साथ में मोबाइल नंबर भी लिखेंगे। मुझे पता नहीं कि मैं संकट में इन्हें सूचित कर सकूंगा या नहीं, फिलहाल संकट में तो मैं आने वाला हूं क्यों कि दरवाजा बजा है और संभव है कि पंच चाचा आ रहे हो। मैं यहां उनकी डायरी को लिए बैठा हूं यह जानकर वे नाराज जरूर होंगे। मैं भला उन्हें क्यों नाराज करने लगा। मैंने कुछ नहीं देखा, कुछ नहीं पढ़ा और हां आपसे पूछे तो आप भी कह देना कि मैंने आपको कुछ नहीं बताया।