28 फ़रवरी, 2017

याद नहीं अब कुछ

साहिर लुधियानवी साहब का बहुत पुराना गान है जिसमें नायिका नायक को भूलने की बात पर कहती है कि मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है। नए संदर्भों में यह गाना आब बेहद प्रासंगिक हो गया है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी को हक था कि उन्होंने बड़े नोटों को एक झटके में भूलाने का प्रबंध कर दिया। नोटों से हमारी मोहब्बत बहुत पुरानी थी, भला ऐसे कैसे भूल जाएं। काश ‘भूल जाना’ कहना जितना आसान है, उतना ही असल में भूल जाना आसान होता। कुछ कहना सरल होता है, और कहे हुए को लिखना भी अधिक कठिन नहीं होता, पर कहे-लिखे पर अमल करना बेहद कठिन होता है।
           प्रेम में सब कुछ भूला जा सकता है, पर नोटों से ऐसा प्रेम करने वाले भी है जिन्होंने सब कुछ भूला कर बस नोटों को ही याद रखा है। राम-राम जपना, पराया माल अपना.... की तर्ज पर वे सबका माल अपने माल में शामिल करते चले आ रहे थे कि जैसे चालीस चोरों के सामने अलीबाबा आ गए। सारे चोरों ने शोर मचाया- ‘उड़ी बाबा, उड़ी बाबा।’ पर किसी ने नहीं सुना। असल में ये हुआ था कि ऐसी घोषणा सुन कर सारे चोरों की जबान तालु के चिपक गई। साथ में पैर भी जमीन से चिपक गए। वे हिल-डुल भी नहीं सके। ऐसे सुन्न हुए कि अब तक होश नहीं आया है। भूल गए सब कुछ, याद नहीं अब कुछ.... गाने में तो नायक ‘जूली’ की याद में सब कुछ भूल कर, केवल अपने प्यार को याद रखे जाने का ऐलान करता है। आनंद बक्षी साहब के इस गाने का यदि आप स्मरण करें तो पाएंगे कि इसमें सार की बात कही गई है। वैसे बात तो नायक और नायिका की है, पर अब बात बड़े नोटों पर लागू हो रही है। इतना भी दूर मत जाओ कि पास आना हो मुश्किल, और इतना भी पास मत आओ कि दूर जाना हो मुश्किल। यानी धन से पर्याप्त दूरी जरूरी है। नोटों में चोर तो ऐसे घुल-मिल गए कि उन्हें होश ही नहीं था कि ऐसा कुछ हो सकता है।ऐसो को भला कहां याद रहता है कि किस-किस का कहां-कहां से खजाना लूटा। लूटे और लुटे हुए का हिसाब बड़ा कठिन है। बचते-बचाते फिरो अब। अगर पकड़ कर धर लिए गए तो हिसाब कैसे दिया जाएगा। प्यार के मामले में तो ‘आई लव यू’ कहा और काम चल गया। इनकम टेक्स वाले बेदर्द होते हैं, उनके लिए ‘आई लव यू, धाई लव यू’ कुछ नहीं होता। वे बस इतना ही पूछते हैं- ‘आयो कहां से धनश्याम, रैना बिताई किस धाम.. हाय राम।’ इनकम टैक्स के इस अनोखे गीत-संगीत से डरने वाले अब निर्धनों की मनुहारें कर रहे थे- ‘ले लो ना भैया। भाई साहब आप ले लो। बहन जी आप ले लो। अपने खाते में जमा करा दो। जब जी में आए देना। जितना मन करे देना। चलो नहीं देना। जब आप को लगे कि दे सकते हैं, तब देना। सच्ची कसम से हम नहीं मांगेंगे। आपको दे कर ये गाना गाएंगे- ‘भूल गया सब कुछ, याद नहीं अब कुछ....। ’काश ! ये धनवान लोग पहले कभी अपना जरा-सा भी प्यार दिखाते। अरे हमें नहीं तो अपनों को और अपने आस-पास वालों पर ही दिखाते। जिसके पास भरा-पूरा तालाब है। वे आप जितना पीना है, पी लें भाई। नहाना है तो नहा लो। पर अपने आस-पास जो प्यासे मार रहे हैं, उधर भी मुंडी धुमा कर देख लो। कुछ बूंदें या एक-आध गिलास उन बेचारों के नाम कर दो। मान तुम्हारा और तुम्हारे बाप-दादों का धन है। वे यहां छोड़ गए थे। जाते-जाते तुम भी छोड़ जाओगे। कल किसने देखा भैया। यहां का हिसाब यहीं है। पंच काका कहते हैं- ‘काल करे सो आज कर। आज करै सो अब।’ भैया, अब तुम्हारी दौलत तुम से कह रही है- ‘तुम मुझे भूल भी जाओ, ये हक है तुमको..।’

* नीरज दइया

20 फ़रवरी, 2017

पत्नियां, पार्टियां और पटरियां

त्नियां, पार्टियां और पटरियां की राशि एक है। पत्नी के विषय में किसी को क्या संदेह हो सकता है कि वे जानदार होती हैं। पार्टियों में जान फूंकनी पड़ती है। पटरियां ना जानदार होती हैं और ना ही उन में जान फूंक कर जानदार बनाया जा सकता है। वे बेचारी बेजान होती है। हर फूंक से बेअसर रहती हैं। पत्नियों और पार्टियों के पटरियों पर चलने के विषय में आपका क्या मत है? मैं समझता हूं कि पटरियों पर पत्नी हो या पार्टी, किसी को भी चलना-चलाना सरल बात नहीं होती। दूसरी तरफ अगर आप ने अगर अपनी या किसी की भी पत्नी के विषय में पटगरियों के संबंध में कोई भी बयान दे दिया तो आपकी खैर नहीं है। बेहतर यह है कि पत्नियों और पर्टियों के विषय में पटरी पर होने या उतारने की घोषणा गोपनीय रखी जाए। इसी में लाभा है कि ऐसी किसी भी प्रकार की गतिविधि को देख कर भी अनदेखा किया जाए। आपने भूल कर अपनी पत्नी को कह दिया- तुम पटरी पर चल रही हो, अथवा कह दिया- तुम पटरी पर नहीं चल रही, तो दोनों स्थितियों में कलह का प्रबल योग है।
          मैं केवल पतियों की बात नहीं कर रहा, इसे आप अपने या दूसरे के पति पर प्रयोग के रूप में अजमा कर देख लें- तुम पटरी पर चल रहे हो अथवा तुम पटरी पर नहीं चल रहे, कहना मूर्खता है। पति-पत्नी दोनों शब्दों की राशि एक है और ऐसे संवाद दोनों को बिदकाते हैं। अस्तु यह संबाद कहना-सुनना खतरनाक और हानिकार समझा जाए। सोचिए कि जब खुद के घर में नहीं कहा जा सकता, तो बाहरी सदस्य के लिए प्रयोग कर लिया गया तो बड़ा चक्कर चल जाएगा। पटरी पर होने या न होने से भी खतरनाक है- पटरी पर नहीं होना पाया जाना अथवा पकड़े जाना। आज ऐसा कौन है जो दावे के साथ कह सके कि मैं पटरी पर हूं। न पति पटरी पर है और न पत्नियां, फिर पार्टियों की तो बात ही छोड़ देनी चाहिए। पार्टियों के लोग पार्टियां बदलते रहते हैं और कभी जब ऐसा संभव नहीं होता, तो अपनी ही पार्टी का नाम बदल लेते हैं। बदलाव की मांग से ही कुछ बदलने की प्रक्रिया आरंभ होती है।
          आगरा के चौधरी बशीर और गजाला लारी बसापा में थे तो मायावती ने शादी कराई थी और सपा में आने के बाद तलाक हो गया। पति-पत्नी और पार्टी बदलने वाले बार बार सोचते हैं कि अब हम पटरी पर हैं, पर पटरियों की माया इतनी सरल कहां होती है। पटरियां भले बेजान हो किंतु वे उन्हीं लोगों के लिए होती हैं जो खुद चलते हैं। राजा भोज की लोककथा की भांति ये पटरियां कहीं नहीं जाती पर इन पर चलने वाले भले इन पे चले या इनके आस-पास चलें, और चलते रहें तो मंजिल पा सकते हैं। जो पटरियों से उतर कर बहुत दूर चले जाते हैं, उसका राम ही मालिक होता है। चौधरी बशीर जी का बीएसपी से समाजवादी पार्टी, उसके बाद कांग्रेस, फिर राष्ट्रीय समानता दल और आखिर में लौटकर फिर बीएसपी में पहुंचना विदित है। विधायक रहे बशीर चौधरी के पास अब न तो पत्नी है और न ही कोई पार्टी।
          पंच काका कहते हैं कि पति-पत्नी को पार्टी कहना ही गलत है, फिर भी वकील इनको दो पार्टियां मानते हैं। इनकी जब आपस में पटरी नहीं बैठती तो ये पार्टियां रेल की पटरियों की तरह जुदा होकर भटकती-भटकाती हैं। 
 ० नीरज दइया

17 फ़रवरी, 2017

खाने-पीने की शिकायत

बिना खाए-पीए कोई जिंदा नहीं रह सकता। जिंदा रहने के लिए खाना-पीना बेहद जरूरी है। अब यह बात अलग है कि कोई आटे में नमक जितना खाता-पीता है और कोई नमक को छोड़ कर केवल आटा खाता है। आटे और नमक का रिस्ता ही कुछ ऐसा है कि इनके कुछ ऐसे भी दिवाने हैं कि आटा और नमक दोनों ही खा जाते हैं। किसी के लिए कुछ नहीं छोड़ने पर समस्याएं आरंभ होती है। कहते हैं कि कोई आटे में नमक जितना खाए तो जायज बात है और जो खाने का अनुपात बिगाड़े यानी आटे जितना खाए तो वह बड़ा हिम्मत वाला शेर दिल होता है। उसके फसने की संभावनाएं अधिक रहती है। यह तो पूरे मरने जैसा काम है कि सब कुछ खा जाएं। बुजुर्ग कह गए कि खाना-पीना सदैव छिप कर होना चाहिए। सभी चुपचाप खाने में विश्वास रखते हैं। अपने-अपने नियम है कि कोई खाने से पहले पीता हैं तो कोई खाने के अंतराल को बीच-बीच में पी कर भरता है। कुछ ना खाने के पहले, ना बीच में और ना ही बाद में पीते हैं। पीने से दूर रहने वाले बहुत है, तो ऐसे भी हैं कि कुछ पीने को मिल जाए तो खाने की छुट्टी। जो भी हो किंतु खाना और पीना सार्वजनिक क्रियाएं नहीं है अथवा नहीं होनी चाहिए।
            पीने के छूट हर किसी को नहीं होती, किंतु जवानों को तो पीने का परमिट मिला होता है। सेना में नियम इतने कठोर है कि सभी का हाजमा दुरुस्त रहता है। जहां सभी पेच कसे हुए हो तो मशीन कम खराब होती है। अगर वहां किसी का हाजमा खराब हो जाए, तो पुखता इंतजाम है। बी.एस.एफ. का एक जवान अपना तेज फेसबुक पर वीडियो के जरिए जगजाहिर कर देता है। सारी आंखें खुल जाती है। जय जबान और जय किसान का सच सामने आ चुका है। किसानों की तो पहले से ही दाल पतली थी। वे तो दाल को खाते हैं और जहां पीने का मन हुआ तो दल को ही पी लेते हैं। सभी ऐसा सोचते थे कि जवानों तो खाने-पीने की ऐश है। वे मजे से है। देश के रक्षक और सुरक्षा-प्रहरी या हमारे अन्नदाता किसान दोनों ही मोर्चे बेहद जरूरी है। आजाद देश में कोई कुछ भी करता है तो उस पर नियम-कानून और अनेक धाराएं हैं। अब अगर आपका दिल कमजोर है और काबू में नहीं रहता तो अपराधियों को अच्छा खाना दे दिया। ऐसा नहीं करना था यह तो शिकायत का मामला बनता है।
            ना खाने की शिकायत होनी चाहिए और ना खिलाने की। ना पीने की शिकायत होनी चाहिए और ना पिलाने की। यानी खाने-पीने की शिकायत नहीं होनी चाहिए। खाना-पीना तो सब जगह चलता रहता है। सरे-आम नहीं तो चोरी-छिप्पे। जिनको खाना-पीना है, वे खाएंगे-पिएंगे और जिनको रोना-धोना है वे रोएंगे-धोएंगे। दुष्यंत ने माकूल लिखा था- “न हो कमीज तो पांवों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।” पर अब लगता है कि जो लोग मुनासिब थे कूच कर गए। अब समय बदल गया है और लोग अपना पेट ऐसे-वैसे नहीं ढकते। पंच काका कहते हैं कि अपना देश अजीब है। यहां खाने-पीने पर भी पहरे हैं। लोग पीने की शिकायत करते हैं। अरे ये तो कुदरत का दिया हसीं इनाम है। इस इनाम को दो नाजुक होंठों से छू लेने दो एंड सिंग विथ मी- छलकाए जाम, आईये आप की आंखों के नाम, होठों के नाम।
नीरज दइया

14 फ़रवरी, 2017

पंच काका के जेबी-बच्चे

ब भी मैं अपनी टोपी खोलता हूं तो उस के भीतर झांकता हूं। मुझे मेरी टोपी खाली मिलती है। सिर में बाल बहुत कम बचे हैं, कभी-कभार कोई भूला-भटका नन्हा-सा बाल बाल टोपी में नजर आ जाता है। सिर में घने लंबे बाल और जूंए हो तो टोपी में कुछ पाए जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है। जब मैं छोटा था, मुझे टोपी पहननी नहीं आती था। धीरे धीरे मैंने जब टोपी पहननी सीख ली तो मैंने दूसरों को टोपी पहनाना भी सीखा। बहुत बार मैं अपने साथी की टोपी को दूसरे साथी को पहनना देता, और दूसरे की तीसरे को। एक की टोपी दूसरे के सिर पर रखने में जो आनंद है, वह कोई हुनरमंद या भुगतभोगी ही जान-समझ सकता है। वे अज्ञानता में जीते हैं, जो इस कला का महत्त्व नहीं जानते। अगर कोई अज्ञानता में जीता भी हो, तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए कि मैं अज्ञानता में जी रहा हूं। इक्कीसवीं सदी के आजाद भारत में हम किसी को अज्ञानता में कैसे जीने दे सकते हैं। मैंने किसी ज्ञान की टोपी या विशेष चश्मा नहीं पहना, पर इतना तो जान गया कि टोपी बहुत कुछ कर सकती है। कुछ का तो मानना है कि टोपी सब कुछ कर सकती है। देश में किस्म-किस्म की टोपियां पाई जाती है। टोपी पहनना और पहनाना हरेक को आना चाहिए।
नेता और जादूगर की टोपी से मैं बड़ा प्रभावित रहा हूं। टोपी की पहचान रखना जरूरी है। जादूगर अपनी टोपी से कुछ भी निकालकर दिखा सकता है। हम चकित-ठगे से देखते हैं। अपनी टोपी पहने नेताजी पांच बरस पूरे होते ही आते हैं। हमें ठगते हैं और गई पांच साल की। हरेक टोपी की अपनी मियाद होती है। अगर जादूगर चाहे तो अपने संदूक या जूतों से भी बहुत कुछ निकाल सकता है। कहते हैं यह आंखों का धोखा है। वे हमारी नजर को बांध देते हैं। एक बार नजर बंधते ही वे जो दिखाना चाहते हैं हमें बस वही दिखता है। हमारी अपनी कोई नजर नहीं बचती है, क्यों कि वे हमारे चश्मा लगा देते हैं। हरा चश्मा दिखाता है कि सब हरा-हरा है और काला चश्मा दिखाता है कि सब काला-काला है। जो जैसा है वैसा तो हमें दिखाई नहीं देता, हम आपस में वाद-विवाद करते हैं।
मेरी इसे कमजोरी कहें या अक्लमंद कि मेरे पेट में कोई बात खटती नहीं। सब कुच पंच काका को बता देता हूं। आज पंच काका ने कहा है कि सारे नेता और जादूगर उनके भतीजे हैं। मैं सोच रहा हूं- भला ऐसे कैसे हो सकता है? सारे नेता, जादूगर और हम सभी पंच काका के भतीजे कैसे हुए। लगता है कि पंच काका ने भी कोई चश्मा पहन रखा है। मैंने प्रतिवाद किया कि यदि काका हम सब आपके भतीजे हैं, तो आप नेता और जादूगर जैसी कोई कलाबाजी दिखाओ। पंच काका ने एक किताब निकाल कर मेरे हाथों में थमा दी। वे बोले- पढ़ो इसकी भूमिका। आंखें खुल जाएगी। मैंने पढ़ा तो सच में मेरी आंखें खुल गई। किताब के लेखक ने बा होशो-हवास में स्वीकार किया था कि हम पंच काका के जेबी बच्चे हैं। मैं मानता हूं कि किसी भी शब्द-शिल्पी का जन्म प्राकृतिक ही संभव है यह जेब से अप्राकृतिक रूप से जन्म लेने का अनोखा कारनाम ऐसा है कि मैं सोच में पड़ गया हूं। सोच रहा हूं कि मैं नमन काका की जेब को करूं या उनकी जेबी-बच्चों को।
० नीरज दइया

13 फ़रवरी, 2017

पूर्णता की तलाश है अलग-अलग विधाओं में लिखना : डॉ. नीरज दइया

साक्षात्कारकर्त्ता : देवकिशन राजपुरोहित
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हर रचना का जन्म सुख देता है। यह समय और मनःस्थितियों की बात होती है कि एक रचनाकार विविध विधाओं में लेखन करता है। लिखना और अलग अलग विधाओं में लिखना असल में किसी पूर्णता की तलाश है। जो बात एक विधा में नहीं है वह दूसरी में होती है और इस प्रकार बहुत सी विधाएं मिलकर ही एक रचनाकार का सुख निर्मित करती है। सब का अपना अपना महत्त्व है और निरंतर लिखना और सक्रिय रहना असल में किसी स्थाई सृजन-सुख की लालसा है। यह कहना है केंद्रीय साहित्य अकादेमी से बाल साहित्य में पुरस्कृत कवि, कहानीकार, अनुवादक, संपादक और आलोचक डा. नीरज दइया का। जो उन्होंने देवकिशन राजपुरोहित से बातचीत में व्यक्त किया।
- राजस्थानी की नई कविता परंपरागत कविता से अलग क्यों हो गई है?
० हरेक विधा और रचना का अपना एक युग और कालखंड होता है। परंपरागत कविताओं की जड़ें ही नई कविता को पोषित करने वाली रही है। समय के साथ प्राथमिकताएं और चुनौतियां बदले हुए रूप में सामने आती है। नई कविता में भी परंपरागत कविता का सौंदर्य नाद और शब्द विन्यास में देखा जा सकता है।
- आपकी आलोचक के रूप में पहचान बानने के क्या कारण रहे?
० मैं नहीं जानता और मानता भी नहीं कि आलोचक के रूप में मेरी पहचान बनी है या नहीं बनी है। यह मेरा काम नहीं है। मेरा उद्देश्य आलोचना में रचना की पहचान करना रहता है। मेरा काम तो बस आलोचना को सृजन जैसे रचना है। मैंने प्रयास किया है कि मैं प्रामाणिकता के साथ अपनी रचना का अहसास बटोरते हुए कुछ तथ्यात्मक और मूलभूत बातों को समझने का प्रयास कर सकूं। इस क्षेत्र में हमें बहुत काम करना होगा।
- मौलिक लेखन के साथ अनुवाद का कार्य कहीं मूल लेखन में बाधा तो नहीं बनाता ?
० अनुवाद से बहुत कुछ सीखने-समझने को मिलता है। असल में अनुवाद जहां भाषाओं में मध्य पुल का कार्य करता है वहीं अनुवादक को नए नए वितान और अनुभव प्रदान करता है। ‘सबद-नाद’ जैसी कृतियों से हम पूरी भारतीय कविता थोड़ा-सा अहसास पा सकते हैं। भारतीय भाषाओं के अलग अलग स्वरों को जानने-समझने के लिए अनुवाद ही एक मात्र रास्ता है।
- इन दिनों हिंदी में खूब व्यंग्य लेखन कर रहे हैं? ऐसा क्यों? क्या राजस्थानी लेखन से मन भर गया है, जो हिंदी में लिख रहे हैं।
० राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी है सो रक्त में घुली हुई भाषा से मन कैसे भर सकता है। राजस्थानी लेखन के साथ हिंदी में लिखना गलत तो नहीं है। हां गलत तब है जब लिखें तो हिंदी में और लाभ के लिए उसे ही अनुवाद कर मूल के रूप में राजस्थानी में प्रस्तुत कर दिया जाए। ऐसे लाभ लेने वाले हिंदी के कुछ रचनाकार हैं। मेरे लेखन में मुझे मेरा लाभ सृजन-सुख लगता रहा है। दैनिक नवज्योति ने मुझे व्यंग्यकार के रूप में लगातार प्रकाशित कर अब जब व्यंग्यकार बना दिया है तो कुछ इस क्षेत्र में भी बड़ा काम करने की अभिलाषा है।
- अंतिम सवाल राजस्थानी की मान्यता के बारे में।
० राजस्थानी के लिए बीकानेर में मुक्ति संस्था ने संकल्प यात्रा आरंभ की है। मुझे भरोसा है कि मान्यता राजस्थानी को मिल कर रहेगी। भाषा वैज्ञानिक और सभी शिक्षाविदों के साथ जन-जन का समर्थन इसे मिल चुका है।


10 फ़रवरी, 2017

बटज की गड़बड़ -हड़बड़

ब बजट आ रहा है। बजट का आना और जाना फिक्स है। देश में चुनाव भी होने हैं। चुनाव का होना और कब होना कोई फिक्स नहीं होता है। चुनाव और बजट का अपना-अपना समय होता है। दोनों ही लोकतंत्र के बड़े मेहमान हैं। समस्या तब होती है जब दोनों साथ-साथ आते हैं। वैसे अलग अलग आते हैं तो भी दूसरी समस्याएं होती हैं। समस्या से रहित ना चुनाव होता है और ना ही बजट। देश की त्रासदी है कि समस्याएं इतनी हैं कि कोई आए तो समस्या, नहीं आए तो भी समस्या। अगर देश में चुनाव नहीं आए तो बड़ी समस्या हो जाएगी विपक्ष वालों के लिए। अगर आ जाए तो उससे भी बड़ी समस्या है। क्या होगा क्या नहीं का चिंतन होता है। यही हाल बजट का है। फिलहाल समस्या यह सवाल है कि चुनाव से पहले बजट क्यों आ रहा है?
          बजट और चुनाव का सीधा संबंध है। कहने वाले कहते हैं इन दोनों का सीधा-संबंध गलत संबंध है। बजट के बिना चुनाव नहीं होता, और चुनाव इसलिए होता है कि बजट ठीक-ठाक किया जा सके। बजट का चुनाव में और चुनाव में बजट का खेल निराला है। चुनाव और बजट ही दो ऐसी बालाएं नहीं, बलाएं है जो पूरे देश को डांस करवाती है। इतना हो-हल्ला होता है कि सुस्त से सुस्त आदमी भी हाथ पैर मारने लगता है। देखने वालों को डूबता हुआ आदमी भी नृत्य करता हुआ दिखाई देता है। चुनाव के समय देश के डूबने और उसे बचाने की चिंता रहती है। कल की बात है कि श्रीमती जी ने बड़े प्यार से कहा- सुनो जी, ये जो इस बार बजट आ रहा है। इसे ध्यान से देखना। सब कुछ एक बार सस्ता हो जाएगा, क्यों कि चुनाव से पहले सरकार जनता को खुश करेगी। आप भी मुझे खुश करना। मैं ठहरा भोला-भाला कि पूछ बैठा कि क्या अभी तुम दुखी हो? खुश ही तो हो। सब कुछ है तुम्हारे पास। वह बोली- अरे आप तो बिल्कुल नहीं समझते। मेरे कहने का मतलब यह है कि जो जो चीजे सस्ती हो जाएं, वे सभी बिना देरी किए हम खरीद लेंगे। पत्नी के इस प्यार की केवल मेरी समस्या नहीं है, सभी ग्रसित हैं। अखिर भारतीय समस्या है कि पत्नियों की खरीददारी कभी खत्म नहीं होती। वे बार बार पतियों को बाजार ले जाती हैं, बाजार भेजती है और अब तो ले जाने और भेजने का झंझट ही खत्म हो गया है। ऑनलाइन ने ऐसी वला की गाज गिराई है कि सुबह अच्छा भला पति घर से बाहर कमाने जाता है और शाम को लौटता है तो देखता है कितनी क्या नई-नई खरीददारी हो गई है। बजट से पहले ही सरे बजट की टें बोल चुकी है।
          पंच काका कहते हैं कि इस बार बजट में ऐसा बाजा बजने वाला है कि दुनिया भर का बाजार भारतीयों का कचूमर निकाल कर ही दम लेगा। पहले बाजार जाते थे तो घर से तय करके निकलते थे कि क्या लेना है? कितनी हमारी औकात है? अब तो सारी औकात ऑनलाइन को मालूम है। ऐसा सुखी बनाया कि सारी कैशलेस दुनिया से पूरा बाजार घर में घुस आया है। ऐश ने नाम पर ऐश चौपट हो रही है। ऑनलाइन और कैशलेस दुनिया में दिन गिन-गिन के निकालने के सिवाय कोई चारा नहीं है। बटज की गड़बड़-हड़बड़ तो होगी तब होगी, यहां तो नित्य गड़बड़-हड़बड़ झेल रहे हैं।
नीरज दइया

07 फ़रवरी, 2017

जे.एल.एफ. में पंच काका

बीएसएनएल के लिए कुछ बंधु कहते हैं- इसका फुल फोर्म ‘भाई साहब नहीं लगेगा’ है। माना कि सही नाम ‘भारत संचार निगम लिमिटेड’ है, पर कुछ इन भाई-बंधुओं और बहनों का क्या करें जो इस लिमिटेड को अनलिमिटेड कर ऐसी घुसपैठ करते हैं। सच में ऐसी मेधा पर आश्चर्य होता है। नाम का संक्षिप्त रूप और उसका वितारित रूप कुछ का कुछ बनाना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है कि नाम का बंटाधार कर देना। यह कल्पना शक्ति का कमाल है कि कुछ का कुछ करना उनके लिए सहज होता है। जब जयपुर-साहित्योत्सव को एक लेखक ने ‘गधों का मेला’ कहा, मुझे उनकी अनलिमिटेड मेधा पर ईर्ष्या हुई। ऐसा उन्होंने जब सोचा और लिख कर बुद्धि-प्रदर्शन किया तो कुछ दूसरे लेखक भी कहां चूकने वाले थे। जो लेखक मेले में बुलाने से चूक गए, वे सभी बुलाए गए लेखकों को गधे कहने पर मुंडी हिलाने लगे। इसके साथ ही तीसरे किस्म के लेखकों का एक सवाल आया- जनाब, हजूरेआला आपको जब वहां बुलाया गया और आप गए भी थे, तब क्या वह गधों का मेला नहीं था। जाहिर है यह आपका पराक्रम रहा होगा कि सारे गघे उस समय घोड़े नजर आ रहे होंगे। इंसान आजकल रूप बदलने में माहिर है। वैसे कहा जाता रहा है कि इंसान असल में जानवर ही था और अनेक घटना-प्रसंगों के हवाले उसमें अब भी भीतर का जानवर यदा-कदा प्रगट होता रहता है। कभी-कभी इंसान कुत्ता-कुतिया बनता है, तो कभी-कभी भेड़िया और चींटियां। ये अलग अलग रंग-रूप धारण करने वाले इच्छाधारी इंसान है। ऐसा भी हो सकता है कि कोई ऐनक इजाद हो गया हो कि गधों वाले ऐनक को लगाने से सभी इंसान गधे दिखाई देने लगे। जे.एल.एफ. में पंच काका भी गधों की भीड़ में शामिल दिखाई दिए।
          गधे को गधा कहना चाहिए पर जो गधा नहीं हो उसे क्या गधा कहना चाहिए? गधे को इंसान अथवा इंसानों को गधा कहना दोनों का अपमान है। इंसान गधा कैसे हो सकता है, और गधा इंसान कैसे हो सकता है? जाहिर है कि नई ऐनकी-विद्या यानी आंखों पर ऐनक लगाए रखने की विद्या है, जिससे कोई ऊंट बन सकता है और कोई शेर-बिल्ला या फिर बिल्ली बन सकता है। कुता-कुत्तिया और गधा-गधी का असली रूप ऐनक उतार कर ही देखा जा सकता है। ऐसे बड़े बोल बोलने वाले बिल्ले और बिल्लियां जरा बरसात अथवा पानी से बच कर रहें। अगर वे बरसात में भीग गए तो उन्हें देखते ही सब भीगा बिल्ला या भीगी बिल्ली कहेंगे। इन जंतुओं का भीगना और किसी के सामने से आना-भागना अशुभ अपशुगन माना जाता है। पंच काका को जब किसी ने जे.एल.एफ. को गधों का मेला कहने का किस्सा सुनाया तो वे तपाक से बोले- ओह वह खुद तो ऊंट है। उससे खुद अपनी तो संभलती नहीं, संभली नहीं गई और अब काचर का बीज बना सौ मण दूध फाड़ना चाहता है। भैया, जे.एल.एफ की इतनी भीड़ सिद्ध करती है कि किंगफिशर और दोस्तों के साथ विश्व साहित्य से जुड़ने की गजब की चाहत युवाओं में है। वे अपने साथी और समूह के साथ विभिन्न रसों का आस्वाद लेते हैं। एक साथ समानान्तर चल रहे सारे सत्र तो कोई देख नहीं सकता, इसलिए सूंधने वालों की भरमार है। इंटरनेट फ्रेंडली है तो सब देखो घर बैठे और घर बैठे उपलब्ध नहीं है तो वह है सेल्फी और फोटो-सुख। सेल्फी का चसका ऊपर से लेकर नीचे तरफ यहां चमचमाता है। असल में फोटो में चमचमाना और नहीं चमचमाया ही जे.एल.एफ. की माया और चर्चा का कारण है।
 नीरज दइया

01 फ़रवरी, 2017

लोक देवता का देवत्व

लोक पर किसी एक की मिल्कियत नहीं होती, फिर भी कुछ मुगालते में रहते हैं। उन्होंने लोक को अपनी बपोती बना लिया है। हमारा लोक भी ऐसा भोला-भोला कि वह बपोती बन जाता है। हम सभी के लोक को कुछ धोक कर और कुछ धोखा दे कर खुद का मानवाने लगते हैं। कुछ भाई-बंधु जो वर्षों से लोक पर धणियाप जमाए हुए हैं तो कुछ इस संसार से इसे काख में लिए-लिए कूच कर गए। जब वे इस असार संसार को छोड़ गए तो लोक पीछे छूट गया। वे ले कर जाना चाहते थे पर अपने साथ लोक को नहीं ले जा सके। उनके पक्षधर कहते हैं कि उनके चले जाने से लोक अनाथ हो गया। यह तो गनीमत है कि लोक अनेक खांचे में बंटा हुआ है। खांचे भी ऐसे कि कोई कहीं भी खुद को फिट कर सकता है। लोक कलाओं के छद्म-मर्मज्ञ और लोकगीतों-लोककथाओं के हत्यारे-डाकू लोक की दुकानें चलाने के लिए समाज की आंखों में धूल झोंकते रहेंगे। बिना धूल झोंके तो नजारा साफ साफ नजर आ जाता है। यह इस धूलि की तासीर है जो वर्षों से फायदेमंद रही है और रहेगी। रहे भी क्यों नहीं, हम इस माटी के जाये-जनमें हैं, और इसी माटी से बने हैं। लोक तो हमारे रक्त में है। जो इस हमारे इस लोक को नहीं जानता, उसके लिए हमारा पाखंड पाखंड नहीं सर्वोत्तम सत्य है।
लोक में हीरे-नगीने-जवारात बरसों से गुमशुदा पड़े थे। एक काल खंड ऐसा आया कि उनको हमारे एक महान लेखक ने खोज-खोज कर निकाला और सभी लोककथाओं में लोककथाओं को सुनाने वाले सुजान का नाम भी ससम्मान ग्रंथों में अंकित किया। किंतु आगे चलकर लोककथाओं का मन मचलने लगा। लोककथाओं ने कहा कि हमें तो मौलिकता के खांचे में डाल दो। फिर क्या था, कहने और सुनने भर की देरी थी। सारी लोक संपदा को अपने नाम के मौलिकता के खाते में डालना आरंभ किया गया। साथ कर लिए कुछ लठैत कि कोई ‘चूं’ नहीं करे। जिसकी जरा भी ‘चूं-चा’ की, उसे चुप करा दिया गया। इस सब के बीच बड़े मान-सम्मान और बड़ी-बड़ी दुकानों से गठबंधन हुआ। जितना लाभ बटोरा जा सकता था, बटोर लिया गया। शेष रहा खाली बर्तन। पर यह बर्तन भी अक्षय-पात्र निकला। अब भी वैसी ही परंपरा निभा रहा है।
इस सदी में एक नए पद ‘लोक देवता’ का आविष्कार किया गया है। शास्त्र और लोक के अनुसार तो कोई मरने पर ही देवता या दानवों की श्रेणी में जाता है। जीते-जी देवता और दानवों की श्रेणी में गमन का सूत्रपात हो चुका है। लोक देवता के पद पर देश के महान से महान बुद्धिजीवी, लेखक, दार्शनिक और बैज्ञानिक बिराजने को आतुर और उत्सुक हैं। पंच काका ने एक लोक देवता की खोज कर उन्हें इस पदबीं से सम्मानित कर दिया और भला हो उस घड़ी का कि जिस घड़ी उन्होंने लोक देवता जैसा पद स्वीकार कर लिया। वैसे वे महान आत्मा के धनी लोक देवता से भी उच्च पद के अधिकारी हैं। वे कारीगर ऐसे हैं कि अच्छे भले मिनख को गधा बना कर उसके आगे गाजर बांध देते हैं। गधा गाजर के लिए पीछे-पीछे फिरता है, पर गाजर है कि उसके आगे-आगे चलती है। यह गुण ही लोक-देवता का देवत्व है कि गधों को वे चाहे जितना फिराते हैं और गाजर को भी बचाए रखते हैं। तो बोलिए इस सदी के स्वनामधन्य लोक-देवता फलाणचंद जी की जय। 
-नीरज दइया