31 दिसंबर, 2016

हमारा डिजिटल-युग में प्रवेश

जो कोई लेख लिखता है, वह लेखक होता है। जो सुलेख लिखता है, वह सुलेखक होता है। जो कुछ भी नहीं लिखता उसे क्या कहेंगे? सोचने की बात है कि अगर ऐसे लेखक, सुलेखक और अलेखक मानेंगे तो चारों तरफ लेखक ही लेखक हो जाएंगे। हो जाएंगे नहीं, हो गए हैं। पूरा इंडिया डिजिटल युग में प्रवेश कर रहा है। करना कुछ नहीं है, बस मोबाइल-क्रांति से पूरा देश जुड़ गया है। पूरे देश में लेखकों और विचारकों के साथ क्रांतिकारियों की फौज खड़ी हो गई है। आस-पास के भाई-बंधुओं में भले सोशल रिलेशन कम हुआ हो पर नेट और नोट की इस नई दुनिया में हम पूरे विश्व से बातें कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आपके बस ‘गुड मोर्निग’ लिखने की देर है कि कुछ ही मिनटों में वहां मोर्निग को तुरंत गुड करने वाले आ जाएंगे। यह डिजिटल युग है, आप घर के बाहर खड़े हो कर जोर से बोलिए- ‘गुड मोर्निग।’ देखिए कितनों का जबाब आता है। आपने जोर से बोला तो संभव है कोई डांट दे, या लड़ाई कर ले। आपके ‘गुड मोर्निग’ का जबाब तो आता सा आएगा, पहले सामने वाला पूछेगा- ‘हम बहरे हैं क्या? ये सुबह सुबह काहे की गुड मोर्निग, गुड मोर्निग लगा रखी है।’ आपके ही घर वाले आपको पागल हो गए तक कह जाएंगे कि गली में जाकर आपने गुड मोर्निंग बोलने का अपराध क्यों किया। वह पुराना युग था, जब आप अपने घर-परिवार और गली-मौहल्ले को कुछ पूछा करते, कुछ कहा करते थे। अब अगर कुछ पूछना-कहना है तो पूरा देश आपको बताने-सुनने को तैयार है। एक से बढ़कर एक हुनरमंद मित्र मौजूद है। बस आप एक लाइन लिख दें- ‘मोबाइल खरीदना है कौनसा लूं?’ फिर देखिए कि आप को बताने वाले कहां-कहां से और क्या-क्या ज्ञान देने लगेंगे। यह तो बस एक उदाहरण है। आप इन-बॉक्स में भी बहुत कुछ पूछ सकते हैं।
यह नेट-क्रांति ऐसी है कि यहां सब कुछ मिलता है। सब कुछ यानी आपकी अपनी पसंद। आप कुछ भी गूगल बाबा में सर्च करो। एक विज्ञापन आता था- सब कुछ दिखता है। जी हां, यहां सब कुछ दिखता है। बस आप देखने बैठ जाएं, निराश नहीं होंगे। एक पेन के विज्ञापन में पंक्ति आई थी- लिखते-लिखते लव हो जाए। पर मैं तो बरसों से लिख रहा हूं, और किसी ने लव नहीं किया। यह भी हो सकता है किसी ने किया हो और मुझ मूर्ख को खबर ही नहीं हुई हो। इंटरनेट का कमाल है कि वह ऐसा-वैसा खुद फैसला नहीं करता, आप जो चाहे वह तो बस उपलब्ध करता है। इतना सुख है फिर भी क्या आप बाबा आदम के युग में रहना पसंद करेंगे। मर्जी आपकी, जैसा चाहे करें। नियम है- अब तो देश को डिजिट-युग में आना ही है।
एक मास्टर जी का डिजिटल-युग में प्रवेश हुआ। ई-मेल और फेसबुक के साथ-साथ इंटरनेट के माध्यम से फी-मेल और कामसूत्र-बुक भी देखने में खो गए। जब मास्टर जी भी यही सब कुछ करने लगेंगे तो फिर शिष्यों और शिष्याओं को दोष देना गलत है। जीओ का कमाल है कि छोटे-छोटे बच्चे इंटरनेट-फ्रेंडली हो चुके हैं। इस डिजिटल इंडिया में ऐसे रंग-रोगन देख रहे हैं कि देश खड़ा हो रहा है। बच्चे जल्दी से जल्दी समझदार हो रहे हैं तो देश बहुत आगे नहीं बढ़ गया क्या?
डिजिटल-युग में मैंने और पंच काका ने भी दाखिला ले लिया है। अब हम हैं, और हमारे फोन, कंप्यूटर, इंटरनेट है। साथ बैठने की जरूरत नहीं, हमने परिवार-ग्रुप बना लिया है। मोर्निग से लेकर नाइट तक सब लिख कर बातें होती हैं। एक दूसरों को कुछ का कुछ भेजते रहते हैं। सच जानिए कि लिखने-पढ़ने से मुक्ति मिल गई। यहां सब कुछ रेडिमेड है। साहित्य की गंभीरता और किताबों को अब कौन सूंधता है? साहब कुछ जब हाथ में इंटरनेट है तो गोर्की-प्रेमचंद के साथ साहित्य का पूरा कुनबा यहीं उपलब्ध है ना।

० नीरज दइया
 

27 दिसंबर, 2016

संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दें

ज चारों तरफ संपर्क का ही बोलबाला है। यह ऐसी बोलती हुई बाला है कि सब इसके दीवाने हैं। इसके बिना कहीं कुछ नहीं होता। हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने जन-जन से संपर्क किया और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ से जो कुछ किया, वह सब के सामने है। कहने वाले बेशक कुछ भी कहते रहे, पर सच्चाई यह है कि बिना संपर्क के कुछ भी नहीं हो सकता। चुनाव तो सदा पार्टियों का होता रहा है। यह तकनीकी कमाल था कि संपर्क से किसी पार्टी का पर्याय एक उम्मीदवार बना। यह संपर्क की जीत है। अस्तु यह सूत्र के रूप में लिखा जाना चाहिए कि संपर्क बढ़ाने पर ध्यान देंगे तो सिद्धि-प्रसिद्धि मिलेगी। संपर्क बनाने और साधने के अनेक तरीके हैं। यह बहुत सरल है। ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल में किसी का नम्बर डायल करते हैं। आपको इंटरनेट फेंडली होना है। अपने काम के आदमी का मुखड़ा सामने आते ही उसका खास नंबर प्रेस कीजिए। नहीं समझे, अरे भाई बिना नंबर तो किसी से बात नहीं हो सकती है। सबसे पहले नंबर पता कीजिए कि किसका क्या नंबर है। गलत नंबर डायल करना खतरनाक हो सकता है। किसी को चापलूसी पसंद है, और किसी को थोड़ी-थोड़ी। पर कुछ ऐसे भी हैं जिनको चापलूसी, बस चापलूसी के नाम से नापसंद है। आप अपनी चापलूसी का नाम बदल कर ही उनको खुश कर सकते हैं। मान लिजिए कि आप एक आम आदमी हैं। कोई छोटी मोटी नौकरी करते हैं। देखिए आपके जीवन की फ्रिक करने वाले आपकी बीमा करना चाहते हैं। बैंक आपको लोन देना चाहता है। आप गाड़ी और बंगला क्यों नहीं खरीदते हैं? आपके पास नौकरी है और एक बंधी बंधाई पगार है। उसे लूटने के लिए बहुत से चापलूस आपसे संपर्क करना चाहते हैं। बिना नौकरी के ये सब सुविधाएं नहीं मिलने वाली। आप ने क्या सोच रखा है कि हम बहुत भले हैं। हम में संवेदनाएं कूट-कूट कर भरी हुई है। बिल्कुल नहीं। हम ऐसे हैं कि रास्ते पर चलते हुए किसी को लिफ्ट नहीं देते हैं। किसी का क्या भरोसा? हर काम हम बस केवल अपने फायदे के लिए करते हैं। गली में स्वच्छता अभियान चला तो प्रेस वाले फोटो लेने आए। सबसे पहले सफाई पसंद के रूप में हम ही कूदे थे। झाडू लेकर फोटो के लिए दौड़ना, मन को कितना सकून देता है। वह एक ऐतिहासिक दिन था। हमने झाडू हाथ में लिया था। गली के नेता जी के साथ हमारी शानदार मुस्कान और हंसी का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है। हम सही वक्त पर सही नाटक करते हैं। मुखौटा लगाते हैं।
संपर्क ही वह मुखौटा है, जिसे देखते ही बड़ी-बड़ी बीमारियां ठीक हो जाती है। मान लिजिए आपका पेट गैस से भरा है। बिना किसी से बोले तो आपकी यह बीमारी बढ़ती जाएगी। जन संपर्क होगा तभी तो बोल-बतिया सकेंगे। दीवारों से तो बातें करेंगे नहीं ना। इसलिए कहा कि संपर्क से हर बिगड़ा काम बन जाता है। कोई फाइल अटकी है या भटकी है, तो उसका एक ही तरीका है- संपर्क। हमारे राजस्थान में तो सम्पर्क का कुछ अधिक ही महत्त्व स्वीकार करते हुए जन सामान्य की शिकायतों को दर्ज करने और समस्याओं के निराकरण हेतु अभिनव प्रयास का नाम ही राजस्थान संपर्क रख दिया गया है। यहां बिना कार्यालय में उपस्थित हुए समस्याओं को ऑनलाइन दर्ज करने की सुविधा दी गई है। संपर्क की महिमा है कि जिलों में संपर्क कार्यालय खुले हैं। हमारी समस्याओं को हल करने के लिए सरकार ने भी संपर्क को चुना है। पंच काका का मानना हैं कि आज के युग में संपर्क ही लोकप्रिय बला है। मुझ से वे अक्सर कहते हैं कि केवल लिखने-पढ़ने से कुछ नहीं होगा। किसी रचना को ढंग की जगह छपवाना है, तो संपर्क सही करो, फिर देखो कमाल। काका के कहने पर मैं संकल्प लेता हूं कि अब संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दूंगा।
 ० नीरज दइया
 

16 दिसंबर, 2016

नियम वहां, जहां कोई पूछे

सुबह-सुबह का वक्त था। मैं किसी काम से मोटर साइकल पर कहीं जा रहा था। हाइवे के मोड़ के करीब था, इतने में एक मोटर साइकिल ने ओवरटेक किया। दो सज्जनों की यह सवारी तेज गति से आगे निकली तो ध्यान जाना स्वभाविक था। मुझे गुस्सा आया कि एक तो बिना हेलमेट के हाइवे पर छावनी क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, और गति भी आवश्यकता से अधिक है। पर यह क्या मैंने देखा कि चालू बाइक पर दोनों सज्जनों ने जल्दी-जल्दी अपने-अपने हेलमेट पहन लिए। ओह, कितने चालक है ये लोग। पता है कि यहां चैकिंग हो सकती है, तो नियम में आ गए। मैंने चलते-चलते अपने गतिमान मन को समझाय कि हे पगले मन ! ऐसे कितनों की सोच करेगा। नियम तो सब अपनी जगह होते हैं। उनको कब-कहां मानना है अथवा कहां नहीं मानना, इसका निर्धारण खुद नियम तो करते नहीं है। यातायात का एक नियम मानकर मैं महान बन गया, और उपदेश की मुद्रा में पहुंच गया हूं। मैंने विचार किया कि मैं भी घर के आस-पास कहीं निकलता हूं तो हेलमेट कहां पहनता हूं। नियम भंग तो भंग ही है, चाहे कभी भी करो। बात हमारी सुरक्षा और भले की है। फिर भी हम जो हैं, अपने फायदे के अनुसार ही नियमों का पालन करते हैं।
पंच काका कहते हैं कि सरकार खुद चाहती है कि लोग नियम तोड़े। जिसे बर्बाद होना है उसे बर्बाद होने देना क्या है? नहीं समझे, देखो बीड़ी-सिगरेट और वाइन आदमी की स्वास्थ्य को बर्बाद करती है। ठीक बात है तो कहो- हां। तो पंच काका का मानना है कि स्वास्थ्य के लिए जो हानिकार चीजे हैं, उन पर सरकार रोक क्यों नहीं लगाती है। उन्हें बंद क्यों नहीं करती है। मैंने कहा कि वहां चेतावनी लिखी रहती है फिर भी लोग अगर सेवन करते हैं तो सरकार की गलती कहां है। पंच काका को मेरा बीच में बोलना बर्दाश्त नहीं होता। पंच काका क्या किसी भी बड़े-बुजुर्ग को अपनों से छोटों का बीच में बोलना सहन नहीं होता। उन्होंने जबाब दिया कि बहुत बारीक अक्षरों में लिखा होता है। उन्हें पढ़ने के लिए हम आंखें कहां से लाएं? इतने बारीक अक्षरों में लिखने से नियम का पालना हो गया पूरा। बीड़ी-सिगरेट, पान-जर्दा या फिर दारू-मारू ये सब बंद क्यों नहीं करते हो। जब ये चीजें गुणकारी-लाभप्रद नहीं, फिर बेचने-खरीदने की पाबंदी क्यों नहीं। माना कि पाबंद का अर्थ पूरी रोक नहीं होता। पाबंदी पूरी पाबंदी तो कभी होती ही नहीं। एक राज्य में शराबबंदी के चलते लोग सैर-सपाटा करने दूसरे राज्य में चले आते हैं, अपने आनंद को मानाते हुए लौटते हैं। चोरी-छिपे जो गोरखधंधा होता है, वह तो होता ही रहेगा। सारी पाबंद और बंदी बस कुछ लोगों को दिखाने के रास्ते हैं। हाथी के हांत हैं। नोटबंदी में बुरा हाल हुआ तो गरीबों का हुआ, पर अमीरों के आनंद में कौनसा खलल पड़ा। पंच काका बोले- सची बात है कि नियमों में ही कुछ ऐसा किया-धरा होता है कि रामजी बच कर निकल जाते हैं, और श्यामजी फस जाते हैं। एक बच के निकल जाए और दूसरा फस जाए, तो इसे कहते हैं- राम राज्य? मैंने फिर प्रतिवाद किया कि काका यह तो व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर है कि उसे क्या आता है और क्या नहीं आता। मान लो किन्हीं दो आदमियों को पानी में फैंका जाता है, तो एक निकल कर बाहर आ जाए और दूसरा डूब जाए तो इसे क्या कहोगे? जो निकल आया है, उसे तैरना आता था और जो डूब गया वह लल्लू था जो तैरना नहीं जानता था। यह सीधा-सा सिद्धांत है कि नियमों के जाल से जिसे बचना आता है वह बच जाता है और जो बचना नहीं जानता वह बेचार फस जाता है। चाचा जी, नियम तो बेचारे उस जाल की तरह है जिसे एक बहेलिये ने बिछाया तो पक्षियों को पकड़ने के लिए था, पर वे होसियार निकले। पूरे जाल को ही लेकर उड गए। अब चाचा जी हंसे और बोले- यह बात जोरदर कही।

- नीरज दइया

14 दिसंबर, 2016

एबी कुत्ता और खेबी बिल्ली

मुझे याद है कि पंच काका और काकी जी में इस बात को लेकर लड़ाई हुई थी कि कुत्ता खरीदें या कुतिया। फैसला टॉस से हुआ। हमारे घर एक कुत्ता आया। मैंने पूछा- काका इसका नाम क्या रखें? वे बोले- नाम में क्या है, कुछ भी रख लो। चलो एबी रख लेते हैं। पर देखना तुम्हारी काकी जरूर खेबी करेगी। यह नाम चल निकला, बाद में मेरे लड़के ने बताया कि एबी तो बहुत अच्छा नाम है। उसका तर्क था कि दक्षिण अफ्रीका के सबसे तेज़ शतक लगाने वाले क्रिकेट खिलाड़ी का नाम भी एबी है। यह पंच काका ने सुना तो जोर से हंसे और बोले- अपने अमिताभ बच्चन का सोर्ट नेम क्या है भैया? मैं थोड़ा नाराज हुआ, कहा- यह बात ठीक नहीं है। एबी हमारा कुत्ता है, और उसके नाम से किसी का कोई लेना-देना नहीं है।
हमने कुत्ता क्या लिया कि बधाई देने वालों का तांता लग गया। लोग मुबारकबाद देने लगे तो देते ही गए। वे गिफ्ट लाते और कितना अच्छा लगा हमें। सब एबी-एबी करते हुए हमारे कुत्ते को देख कर खुश होते। उन्हें खुश देख कर हम खुश होते। यही तो जीवन है। इसमें खुशियां ढूंढ़नी पड़ती है। उसके बाद तो यह सिलसिला चला जो भी घर आता, एबी से बिना मिले नहीं जाता। उसके बारे में बातें करने वालों की संख्या दिन-दूनी और रात-चौगुनी होने लगी। इस संख्या का हमें पता तब चला जब एबी बीमार हुआ। पंच काका और एबी के प्रशंसक बीमार एबी का हालचाल जानने घर आने लगे। आपके कुत्ते के प्रशंसक कैसे हैं, यह आप जाने। हमारे वाले तो देखिए- कोई सेव ला रहा है, कोई केले, कोई बिस्किट, कोई नमकीन और मिठाई तक ला रहा है। मैंने एक शरारत की। एक आगंतुक से पूछ लिया- यह सब क्यों लाएं है? एबी तो कुछ खाता नहीं। वे बोले- कोई बात नहीं। आप सब तो हैं ही। हम सब थे जो एबी के नाम से आने वाली चीजों को ग्रहण कर रहे थे। पंच काका के मन में क्या था, यह तो मैं नहीं जानता पर मैं सोच रहा था- हम तो कभी किसी के घर ऐसा कुछ लेकर गए नहीं, फिर ये सब कोई बोझ उतार रहें या चढ़ा रहे हैं।
एबी के जीवन का तीसरा परिच्छेद आया। पर यह इतना जल्दी आएगा हमने सोचा नहीं था। बेहद दुख और भारी मन से हमने सभी को सूचित किया- एबी इज नो मोर। फिर से वही लोग जो पहले आए थे, शोक प्रदर्शित करने के लिए आने लगे। दुख और संकट की घड़ियों में भी उन आने वालों में से कुछ ऐसे भले लोग भी आते थे, जो कुछ न कुछ छोटा-मोटा उपहार ले आते। वे कहते- किसी के यहां खाली हाथ जाना हमें अच्छा नहीं लगता। यह हमारा सम्मान था कि उनका सम्मान था। पर कुछ न कुछ सामान लाने वाले हमें बहुत अच्छे लगने लगे। बाद में तो इतने अच्छे लगने लगे कि खाली हाथ आने वालों को हम देखते और मन ही मन कहते कि आप भी इन लोगों से कुछ प्रेरणा क्यों नहीं लेते।
पंच काका और काकी दोनों बैठे थे कि उनका कोई अजीज मित्र आया। वह बोला- अब एबी के बिना आप का मन कैसे लगेगा। आप में आपस में कितना प्यार हो गया था। वह आगे बोला- मुझे याद है आप मेरे घर के मूर्हत और खाने पर आने वाले थे, पर नहीं आए। बाद में पता चला कि एबी बीमार हो गया था। तभी मैं सोच रहा था कि आप जरूर आते, पर ऐसी स्थिति में कैसे आते। मेरा एक सुझाव है कि आप अपना मन बहलाने के लिए कोई दूसरा कुत्ता-कुत्ती या बिल्ला-बिल्ली खरीद लो। पंच काका सहमत हो गए, मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। यह क्या बिल्ला खरीदें या बिल्ली इस पर टॉस भी हो गया। इस बार काकी की जीत हुई और तय हुआ हम बिल्ला नहीं बिल्ली खरीदेंगे। मैं ऐसा मौका क्यों छोड़ने वाला था, तुरंत प्रकट हुआ बीच में बोला- काका, हम बिल्ली का नाम खेबी रखेंगे।
- नीरज दइया
 

12 दिसंबर, 2016

अंकज्योषित का चक्कर

कोई माने या ना माने, मुझे तो अंकज्योतिष पर पूरा विश्वास है। सब कुछ नाम में ही तो समाया है। अगर नाम में शक्ति नहीं होती तो हजारों वर्षों से नाम की महिमा यूं ही नहीं चली आती। नाम सुमरिन से तो बेड़ा पार हो जाता है। मुक्ति का आधार ही नाम है और नए जमाने में तो बस सब कुछ नाम का ही खेल है। जो है नाम वाला वही तो बदनाम है। नाम हो या बदनाम हो, होता तो आखिर नाम ही है ना। हमें तो सब को बस अपने-अपने नाम और काम से मतलब होना चाहिए। अंकज्योतिष ने जब आज जब दुनिया भर के लोगों के जीवन में महत्त्व हासिल कर लिया है, तब एक नाम का एक नया अर्थ और दूसरे नाम का दूसरा नया अर्थ निकला जाना स्वाभाविक है। यह सब स्वरों और व्यंजनों का खेल है। बस जरा-सा फेर-फार और आपकी किसमत का बंद ताला खटाक से खुल जाएगा।
अंकज्योतिष की अवधारणा है कि आपके नाम की जरा-सी स्पेलिंग बदलने से आपके साथ घटित होने वाला सब कुछ जो उलटा-पुलटा है उसे ठीक किया जा सकता है। अंग्रेजी नाम में किसी एक लेटर को जोड़ देने, कम कर देने या बदल देने से अंकभार घटा-बढ़ा कर सब कुछ बदला जा सकता है। आपको बस एक बार यकीन करना होगा कि आपके भी अच्छे दिन आ सकते हैं। अच्छे दिनों को लाने के लिए हम सब ने अब तक क्या-क्या नहीं किया? जब इतना कुछ किया है तो क्या थोड़ा सा यह भी नहीं कर सकते हैं? करना क्या है आपको? बस यही कि आप अंकज्योतिष पर यकीन कर लेंवे।
यह आपके जीवन में एक बहुत अच्छा निर्णय हो गया है कि आपने अंकज्योतिष पर यकीन कर लिया है। मुझे नहीं मालूम कि आपको इसकी जानकारी है भी अथवा नहीं है कि ज्योतिष दुनिया में सबसे प्राचीन और आधुनिक विज्ञान के बीच जगह बनाता है। आप जब एक अंकज्योतिष के पास सलाह लेने पहुंचेंगे और बातों पर यकीन करेंगे तो पाएंगे कि कुछ महीने बात मान लेने से परिवर्तन साफ दिखाई देगा। आपके आस-पास सभी चीजे बेहतर होने लगेगी। आपके व्यक्तिगत और पेशेवर जिंदगी में आपको लगेगा कि आपने मोर्चा मार लिया है। लोग भले इसे महसूस करें या नहीं करें पर आपको लगने लगेगा कि खुद में जबरदस्त आंतरिक परिवर्तन होने लगा है। ठहराव ठीक नहीं इसलिए यह बदलाव जरूरी है।
मेरे साथ सब कुछ ठीक हो रहा है और ठीक चल रहा है फिर मुझे अंकज्योतिष के पास जाने की क्या जरूरत ऐसा सोचना ही गलत है। अगर सभी लोग ऐसे ही सोचने लगे तो उनका धंधा कैसे चलेगा। हमें तो आंखें मूंद कर विश्वास करने की आवश्यकता है। मेरे जैसे बहुत लोग हैं जो अंकज्योषित के पास जाते है और आंखें खोल कर विश्वास करते हैं। यह सकारात्मकता का एक रास्ता है, जिसे पा लेना जरूरी है।
बेशक पंच काका का मानना है कि ग्रह, नक्षेत्र, राशि, अंक ढेर सारे जाल गणित पर आधारित है। गौर करने की बात यह है कि हम सब के भीतर सकारात्मकता और नकारात्मकता होती है। यह बस हमारे मानने कि बात है कि हम अपनी सकारात्मकता को पहचान लें। सकारात्मकता अंदर महसूस करने की चीज है और एक बेहतर जीवन व्यतीत करने में यही मदद करती है। वे कहते हैं कि हर आदमी को एक रास्ता चाहिए। रास्ता तो खुद हमारे पास है। रास्ते की पहचान होनी चाहिए। इसी पहचान को हम फ्री में प्राप्त कर सकते हैं या फिर कोई भी हो सकता है जिस पर हम विश्वास करते हैं और कुछ खर्च कर के यही ज्ञान प्राप्त करते हैं। अब अंकज्योतिष को ही लो। यह अंकों का खेल है जो अगर कोई पढ़ा-लिखा या कम पढ़ा-लिखा थोड़े दिन इस में माथापच्ची करे तो पूरी जानकारी हासिल कर सकता है।
- नीरज दइया
 

07 दिसंबर, 2016

बच्चों के संग शिक्षक की सेल्फी

चाणक्य ने बहुत पहले कहा था कि शिक्षक की गोद में प्रलय और निर्माण नाम के दो बच्चे पलते हैं। अब जब शिक्षकों द्वारा पाले गए प्रलय और निर्माण काफी बड़े या कहें कि इतने बूढ़े हो चले हैं कि उनके बच्चों के बच्चों का जमाना आ गया है। इतने वर्षों से अगर अब भी शिक्षक उन्हीं दो बच्चों के बच्चों और पीढ़ियों को पालता है तो यह हमारे समाज की बहुत बड़ी भूल है। प्रलय और निर्माण को वर्षों पहले जब पहचान लिया गया तो उन्हें अलग अलग क्यों नहीं किया गया। उन्हें पृथक नहीं किए जाने का ही आज यह नतीजा हमारी आंखों के सामने है कि हम प्रलय और निर्माण को पहचान नहीं पा रहे हैं। प्रलय आ कर कहता है कि मैं निर्माण हूं तो हम मान जाते हैं और लगातार गर्त की तरफ बढ़ते हैं। इतना सब होने के बाद भी हम शिक्षकों की गोद में पलने वाले प्रलय भैया और निर्माण भैया को पहचान नहीं सके हैं। अब तो प्रलय और निर्माण के अनेकानेक भाई-बहन स्कूलों में जगह जगह भर्ती हो चुके हैं। उन भर्ती हुए बच्चों में कुछ स्कूल आते हैं और कुछ अपनी इच्छा से आते हैं या इच्छा नहीं हो तो नहीं आते हैं। शिक्षक को उनकी उपस्थिति रखनी होती है। देखा गया कि इनके हिसाब-किताब में घोटाला है। जमीन सच्चाई को सरकारों के सामने सही सही रखा जाना चाहिए किंतु जब शिक्षक अपनी गोद में इतने वर्षों से प्रलय और निर्माण को पालते आ रहे हैं तो उन में भी बहुत से गुण-अवगुण आने स्वभाविक है। पंच काका ने बताया कि उन्हें किसी समाचार-पत्र से पता चला है कि महाराष्ट्र के सरकारी स्कूल में बच्चों की उपस्थिति को बढ़ाने के लिए शिक्षक बच्चों के साथ सेल्फी लेकर उसे राज्य के एजुकेशन डेटाबेस (सरल) पर अपलोड करेंगे। यह काम बच्चों की उपस्थिति सुधारने के चक्कर में हो रहा है पर शिक्षक समुदाय का कहना है कि वे पढ़ाएं या कि सेल्फी लें। कक्षा के दस-दस बच्चों के साथ सेल्फी लेना और मुस्कुराना कितना आनंददायक होगा पर शायद इसके साथ सेल्फी लेकर सभी बच्चों के नाम और आधार नंबर के साथ डाटाबेस पर अपलोड करना जिन शिक्षकों को झंझट का काम लग रहा है वे इसको अनुचित बता रहे हैं। यह शिक्षक का हक नहीं है कि किसी सरकारी फरमान को वे उचित या अनुचित माने या बताए। मानना तो फिर भी ठीक है कि आप अपने मन मन में मानते रहो, पर यह जो बताना है वह तो बिल्कुल ही ठीक नहीं है। पंच काका का मानना है कि यह अवगुण शिक्षकों में इतने वर्षों से लगातार निर्माण और प्रलय को पालने के कारण ही हुआ है। आंकड़ों की सुने तो आंकड़े बताते है कि महाराष्ट्र में नौ प्रतिशत बच्चे पढ़ाई पूरी होने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, हालांकि राष्ट्रीय औसत पन्द्रह प्रतिशत है। बच्चों के संग शिक्षक की सेल्फी का नजारा यह है कि देश में 85 प्रतिशत बच्चे ही पढ़ाई करते हैं और उनमें से अब नई शिक्षा योजना के अंतर्गत आठवीं कक्षा तक एक बड़े प्रतिशत का हाल यह है कि वे रहते तो स्कूल में ही है पर स्कूल में रहते हुए भी स्कूल छोड़ने जैसी हालत में रहते हैं। उन्हें कुछ आता-जाता नहीं। स्कूलें अपने नियमों में बंधी हैं। बच्चों को कुछ आए या नहीं आए, यहां तक कि बच्चा स्कूल आए या नहीं आए उसे फेल नहीं किया जा सकता। बच्चा स्कूल नहीं आता है तो उसे प्यार से समझाना है। एक शिक्षक के पास बच्चों को समझाते समझाते प्यार की इतनी कमी हो चुकी है कि बच्चा शिक्षक के प्यार को प्यार समझता ही नहीं। वह तो समय से पहले ही किसी दूसरे प्यार के चक्कर में खोया हुआ है। बच्चों के माता-पिता और अभिभावकों के पास अब इतना समय ही कहां कि वे बच्चे का भविष्य देखें। बच्चों का भविष्य देश से जुड़ा है और देश का भविष्य बच्चों से। भविष्य के साथ सेल्फी ले ही लो भैया।

० नीरज दइया 

05 दिसंबर, 2016

डिस्काउंट का मौसम

डिस्काउंट किसे अच्छा नहीं लगता। बड़ा डिस्काउंट हो या छोटा बस होना चाहिए। बिना डिस्काउंट के मजा नहीं आता। मजा तो आता है फेस्टिव सीजन की महासेल में, जिसमें डिस्काउंट ही डिस्काउंट मिलता है। कितना अच्छा लगता है जब डिस्काउंट पर डिस्काउंट मिले। यदि डिस्काउंट पर डिस्काउंट और डिस्काउंट पर डिस्काउंट मिलता हो, तो लगता तो बहुत अच्छा है। माना कि ये गणित का खेल नहीं आता, पर फिर भी हमें फायदा है। फ्लेट डिस्काउंट का खेल निराला है कि हर कोई इसके चक्कर में नहीं आता है।
किसी भी प्रॉडक्ट्स पर भारी डिस्काउंट हो तो खरीदने का मन बन ही जाता है। अरे वह आम जनता ही क्या जिसे कोई धमाका नहीं सुनाई दे। धमाका करने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अब 80% तक का डिस्काउंट है! तो भी आप क्या सोये रहेंगे। यह तो पागलपन है- ‘जागो।’ यह सोने का समय नहीं है। डिस्काउंट के पीछे ‘पागल’ होने का समय है। मैं तो ऐसे अवसर की घोषणा होने पर रात के बारह बजे सबसे पहला ग्राहक बनने का सुख लूटना चाहता हूं। कोई भी ऑफर ऐसे ही नहीं आता और तुरत-फुरत नहीं आता। इन सब के लिए खूब पब्लिसिटी होती है। फिर भी ये कुछ पब्लिक सोती ही रहती है। सेल बंद होने के बाद कहती है- `अरे हमे तो बताया ही नहीं, वर्ना हम भी मंगवा लेते।'
ज्ञानियों को तो कुछ कहने समझाने की जरूरत होती नहीं और अज्ञानियों को कुछ कह समझा कर समय क्यों खराब किया जाए। जाहिर है ज्ञानी अपने आप समझेंगे और अज्ञानी को हम समझा नहीं सकते। ये पंच चाचा ने हमारे घर में सब कुछ उलटा-पुलटा कर दिया है। मैं कुछ भी मंगवा लूं, उनको कभी पसंद नहीं आता। कुछ खरीद तो मैं रहा हूं, इसमें पैसे भी मेरे लग रहे हैं और परेशानी उनको होती है। उनकी परेशानी का यह हाल है कि मेरे बेटे को भी अपनी तरफ मिला लिया है। कहते शर्म आती है कि आजकल घर में मेरा बेटा ही मेरा बाप बनता है। मुझे वह समझता है कि ये डिस्काउंट उल्लू बनाने का तरीका है। यही सुनना रह गया था। कलयुग आया है कि बेटा बाप को उल्लू कहने में भी संकोच नहीं करता है।
मैं मूर्ख हूं या समझदार, यह तो पंच चाचा या मेरा बेटा मुझे समझा नहीं सकते है। मैं जो हूं सो हूं। इसमें दादा-पोता भले ही एकमत हो जाए कि डिस्काउंट वाले पुराना माल बेचते हैं। वे दाम बढ़ा कर डिस्काउंट देते हैं। डिस्काउंट में भी उनका फायदा होता है। ये बाजारवाद है। माल बेचने के तरीके हैं। आपको एक बार इस जाल में फंसा कर फिर लूटते जाएंगे। अब मैं क्या-क्या बताऊं। मैंने तो तय कर लिया कि इन बातों को नहीं मानना, तो नहीं मानना। सुनकर बहुत-सी बातें हम अनसुनी करते हैं, तो ये भी अनसुनी की जा सकती है। किसी भी बात को अनसुना करना सभी को आता है। अगर हम सभी बातें सुन-सुन कर अपने भीतर रखने लग जाएं, तो हमारी मैमोरी फुल नहीं हो जाएगी! स्टोरेज की भी एक सीमा होती है। हमारी भी सीमा है। इसलिए हम सुनाने वालों को अपनी सीमा में नहीं आने देते हैं, और अगर कोई जबरदस्ती आ भी जाता है तो हमारे लिए एक कान से सुनना और दूसरे से निकलने का विकल्प सुरक्षित है।
देश ने इतनी तरक्की की है कि भले व्यापरी पूरे देश में जीओ और ‘डाटा’ फ्री पाओ स्कीम लाएं हैं। फिर भी ये ज्ञानियों और डेढ़ हुस्यारों की जमता है कि हर समय हर काम में खोट देखती है। माना कि तुम्हारी बात सही हो सकती है कि कोई डिस्काउंट देने वाला अपनी रेट को बढ़ा कर डिस्काउंट देता है और हमें किसी न किसी तरह लूटता है पर अब इसमें लूट कैसी जब सब कुछ फ्री है। अरे अबकी बार जब सब कुछ फ्री में है तो भला इसमें क्या ठगी है?
० नीरज दइया

03 दिसंबर, 2016

अनपढ़ से ग्रेजुऐट रहना प्लस खाना

हा जाता है कि कवि कबीर का भाषा पर जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में कहलवा लिया। सीधे–सीधे, नहीं दरेरा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार–सी नज़र आती है। आज जब कबीर नहीं है, किंतु उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में विज्ञापनों का बड़ा योगदान समझा जा सकता है। भाषा को लाचार-सा कर, कुछ का कुछ कहने और बनाने का साहस अब केवल विज्ञापनों में ही बचा है। ऐसी हिम्मत कि कुछ का कुछ हो जाए, पर एक बार देखना-सुनना पड़ेगा। झटका लगेगा। फ़क्कड़ाना प्रकृति के लोग भी लप-लप करती भाषा से कुछ का कुछ कर जाते हैं। ये बाजारवाद है। जहां वर्षों पहले कबीरा जी खड़े थे, उसी बाजार की बात है। यह बात अलग है कि अब खैर किसी की नहीं। सभी को गिरफ्त में करने के जतन कर लूटने और सामने वाले को लुटता देखने में खैर समझी जाती है। बैर और दोस्ती से परे सब से अपना उल्लू सीधा करने की प्रवृति का उत्कर्ष इस कलिकाल में देखा जा सकता है। कहते हैं कि विज्ञापन का काम तो वस्तु को बेचना है। इसमें गलत-सही नहीं देखा जाता। क्या और कुछ नहीं देखा जाता है। यहां भाषा-व्याकरण और नियमों का भले ही कचरा हो जाए, पर कचरे को भी बेचने का हुनर विज्ञापनों में होना चाहिए।
सब जानते हैं कि अगर तेल चाहिए तो तिलों से निकाला जाएगा। यह तरक्की का कमाल है कि बिना तिलों के भी तेल निकाला जा रहा है। ऐसा भी हो सकता है कि जहां दस-बीस प्रतिशत की गुंजाइश हो वहां अस्सी-नब्बे या फिर पूरे सौ प्रतिशत तेल निकाला जाता है। हे हुनरमंदो ! यदि ठगना ही है तो किसी सेठ-साहूकार और दौलतमंद के पास जाओ, पर ये जो तुम बेरोजगारों को घाणी में डाल कर तेल निकालने का अद्भुद कौशल दिखाते हो, उसमें तनिक तो संकोच-शर्म करो। गली में एक पेंपलेट बांटा गया। हालत यह हो गई है कि हर घर में दूसरा-तीसरा बेरोजगार है। जिसे रोजगार प्राप्त है, वह भी संतुष्ट नहीं है। मान लें, यदि कोई मास्टर जी बन गए हैं, तो बरसों कलेक्टर बनने के सपनें देखते हुए मासूम बालकों के साथ अन्याय करते हैं। भविष्य-निर्माता मास्टर जब तक अपने सारे सपनों को देखते हुए उम्र की सीढ़ियां चढ़ता जाता है, तब तक उसे अपने असली काम से सरोकार नहीं होता। बाद में ओवरऐज होने पर वह मन बनाने की जगह टूटे सपनों के मातम में खोया रहता है। उस पेंपलेट में नौकरी के कुछ सपने थे। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- अनपढ़ से ग्रेजुऐट रहना प्लस खाना।
पंच काका ने दूर से देखा तो बोले बिना नहीं रह सके- यह तो फुसलाने वाली भाषा है। दिखाना जरा ये पर्चा क्या लिखा है? मैंने उन्हें पर्चा थमाया तो वे फिर बोले- सब बकवास है, मूर्ख बनाते हैं। अनपढ़ के लिए काम है और ग्रेजुऐट के लिए भी काम है, साथ में खाना-पीना और रहना फ्री में देंगे। ये नहीं हो सकता। असल में बेरोजगारों को समझ लेना चाहिए कि ग्रेजुऐट से अनपढ़ रहना और खाना-पीना अच्छी बात है। ग्रेजुऐट जब देश में बेरोजगार है, तो बेचारे अनपढ़ जाए तो कहां जाए। हालत यह हो गई है कि अनपढ़ों की नौकरियां तो ग्रेजुऐट और पोस्ट ग्रेजुऐट छीन लेते हैं। बेरोजगारी की भयावयता से पढ़ा-लिखा आदमी आज कुछ भी करने को तैयार है। सब जगह हालत यह है कि एक आवाज लगाओ, नौकरी के लिए हजार दौड़े चले आते हैं। मुझे पता था कि जब पंच चाचा का भाषण चालू हो जाता है तो रुकता नहीं। मैंने रोकने लिए टोका- तो काका, आप ही बताओ हल? काका बोले- अब कहां रहे हल? पहले खेत हुआ करते थे, तो हल भी होते थे। अब तो खेत भी अपना नहीं, फिर काहे का हल? और कैसा हल? सब बेहल है।

० नीरज दइया

01 दिसंबर, 2016

मच्छर, पतंग, मस्ती, वसंत

पंच काका को आखिर बैंक से दो हजार का एक नोट मिल ही गया है। नोट तो मिल गया, पर वे अब भी परेशान है। पहले जब नोट नहीं मिला तो भी परेशान थे। काका कहते हैं कि जब बैंक वालों के पास ही नोटों की इतनी तंगी है तो हमारा क्या होगा। यह तो ऊंट के मुंह में जीरा है। ना मालूम क्या हो गया है और क्या होने वाला है। बैंक में पैसे हमारे हैं, और माजरा यह कि हमीं काम में नहीं ले सकते हैं। अरे भाई, खून-पसीने की कमाई है। अब जब अपनी रकम निकालने के सांसें पड़ जाए, तो इसे क्या कहेंगे ! काका की बड़ी परेशानी यह है कि कोई दो हजार रुपये के खुल्ले नहीं देता। काका का काम है बीड़ी पीना और पाना खाना। पान वाले के पास खुल्ले नहीं है। दूसरा काम पंच काका का सब्जी लाना है। पर माजरा यह है कि सब्जी वाले के पास भी खुल्ले नहीं है। हालत अब यह हो गई है कि पंच काका मांग मांग कर बीड़ी पीने को मजबूर हैं। कोई बीड़ी पी रहा हो तो मांग कर काम चलाया जा सकता है, पर पान का क्या करे? क्या पान खा रहे किसी भतीजे से कहे कि थोड़ा-सा तोड़ कर पान मुझे भी दे दे। पंच काका आजकल दो हजार का नोट दिखा कर हर छोटी-बड़ी दुकान में पूछते घूमते हैं- ‘खुल्ले मिलेंग क्या?’ कोई छोटे से सौदे के लिए या फिर ऐसे ही दो हजार रुपये के खुल्ले क्यों देने लगा। मुझ डर है कि ऐसे में ‘खुल्ले मिलेंगे क्या?’ कहीं उनका तकिया कलाम ना बन जाए।
केवल पंच काका एक नहीं है, ऐसे बहुत से लोग है जो खुल्लों की समस्या से परेशान है। जरूर कुछ घोटाला है। जिनके पास बहुत खुल्ले हैं, उनसे यह परेशानी है कि गिन-गिन कर पैसे लेने में समय लगता है। यह तो बाजार मंदा है इसलिए समय है और खुल्ले गिन कर सौदा दे देते हैं। मुझे लगाता है कि बंधों और खुल्लों का एक गणित। यह गणित सत्ता से बंधे और खुल्ले नेताओं द्वारा संचालित है। आम आदमी के नजरिये से देखें तो वह बंधे नेताओं यानी सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा लगाए नियमों से संचालित होता है। खुल्ले नेता सत्ता में नहीं है तो उनका स्थान विपक्ष है। खुल्लों का जो बंधे हैं उनका विरोध करना अधिकार है। यह सारा खेल वोटों से होता है। भोली जनता के पास सत्ता की दुकानदारी है। वह किसी को बांधने का अधिकार सौंपती है, बाकी खुल्ले रह जाते हैं। बंधे और खुल्लों का चक्कर पहले गुपचुप चलता था। अब नोटबंदी के कारण सब के समाने आ गया है। खुल्लों के खल्ले यानी विपक्ष के जूते, आवाज करने लगे हैं। कितना अच्छा हो समस्याओं में सब साथ साथ चलें। कोई हिसाब है तो उसे बंधे और खुल्ले दोनों मिल करें। यह बात तो छोटी सी है। सार की बात है। छोटे लोगों को समझ आ रही है, तो बड़ों को भी आनी चाहिए। खींचातान से प्रेम बड़ा होता है। प्रेम तो हर जगह हर किसी से सदा बड़ा ही होता है। प्रेम को छोटा करने वाले, और कहने वाले खुद छोटे हुआ करते हैं। किसी समस्या का हल देश बंद का आह्वाहन नहीं हुआ करता है। सभी खुल्ले दलों का स्वार्थ है कि बंद को घेर रहे हैं। यह सत्ता का मोह है। कहते हैं कि मोह और प्रेम अंधा होता है। यह अंधा शोर है- बंद करो, भाई बंद करो। बंद ही बंद होना चाहिए। नहीं होना चाहिए?
पंच काका का कहना है कि यह विपक्ष का नितांत निजी स्वार्थ है। वे आज तक जनता के असली मुद्दों पर मौन बैठे थे। यकायक वे क्यों जागे हैं। विपक्ष का जागरण, खुद पर चोट लगने से हुआ है। गनीमत है कि अब होश में आने का समय आ गया है। अपने होने का अहसास कराने के लिए कोई काम बंद नहीं होना चाहिए। आम जनता के बहाने भड़ास निकालने और जनता को उल्लू बनाने का यह सुनहरा मौका मिल गया तो देश के घाटे और आम आदमी की तकलीफ का क्या होगा?
 
० नीरज दइया