31 जनवरी, 2017

‘हां’ कहने के हजार दुःख

क्सर माइक पर जिसे बुलाया जाता है उस से ‘दो शब्द’ कहने का अनुनय होता है, फिर भी बोलने वाला सीमा का उलंधन करता हुआ अधिकादिक शब्द बोलता है। काफी बार तो यह अधिकता जानलेवा होती है। यह तो गनीमत है कि हम हमारी सहनशीलता और संवेदनशीलता के कारण ‘दो शब्द’ के नाम पर लंबे-चौड़े भाषण और शब्दों का रायता पचा जाते हैं। हां तो कहानी यह है कि एक बार मुझे भी ‘दो शब्द’ कहने के लिए आमंत्रित किया गया। वैसे तो मुझे गिनती हमेशा याद रहती है। अब मैं ‘दो शब्द’ के लिए बुलाया गया हूं, तो तीसरा-चौथा और बहुत सारे शब्दों की जमात को एक के बाद एक कैसे परोस दूं। ‘दो शब्द’ का मर्म केवल दो शब्द नहीं होता। कुछ शब्द को अगर दो शब्द कहा जाता है तो फिर यह प्रचलन कैसे चल निकला। इस विषय पर शोध-खोज होनी चाहिए।
          मंच पर पहुंचते ही मैंने एक आइडिया लगाया, संभव है यह आपके भी काम आए। यही सोच कर मैं साझा करता हूं। मेरी आदत है कि मैं मंच पर पहुंचते ही माइक पकड़ लेता हूं, और कुछ ऐसे भी वक्ता होते हैं जिनको माइक पकड़ लेता है। तो मैंने माइक पकड़ कर कहा- ‘मैं दो शब्द कहना चाहता हूं और साथ में अपने कहे दो शब्दों की तीन कहानियां। ‘दो शब्द’ कह रहा हूं, ध्यान से सुनिएगा- पहला शब्द है ‘हां’- और दूसरा है ‘ना’। हो गए ‘दो शब्द’। ये दो शब्द तो आपने सुने ही हैं, पर इनकी जो चार कहानियां मैं बताने जा रहा हूं, वे संभवत: आपके लिए नई हो सकती है।
          इन दो शब्दों से हमारा पूरा घर-संसार और परिवार जुड़ा है। यहां तक कि मैं और आप सब भी इन दो शब्दों से ही जुड़े हैं। मुझे बुलाया, मैं ‘हां’ कह कर आया। आप सुन रहे हैं- ‘हां’ कह कर ही सुनना होता है। मेरा मानना है कि हमारे जीवन में ‘हां’ और ‘ना’ का गहरा सरोकार है। ये दो शब्द हमारे भीतर-बाहर, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे यहां तक कि आमने-सामने आते-जाते रहते हैं। दोनों में बरंबार लड़ाई होती है। तकरार है छोटा-मोटा तो प्यार भी बहुत है। आखिर है तो दोनों शब्द भाई-भाई, पर ऐसा लगता है कि कभी-कभी दोनों जानी दुश्मन बन गए हैं। आपने देखा होगा, देखा क्या हम सब महसूस करते हैं कि जब भी आपका मन ‘हां’ कहने को करता है, सोचते हैं ‘ना’ कह दूं और बहुत बार ‘ना’ कहते कहते ‘हां’ कहने को मन करता है। हमारा मन इन दो किनारों पर झुलता है।
          पंच चाचा की फिलोसफी का आधार बस ये दो शब्द ‘हां’ और ‘ना’ है। ‘हां-ना’ को पूरे संसार का जनक कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे कहते हैं- ‘इस संसार का आगाज़ हां-ना से हुआ, और अंजाम भी हां-ना से होगा। बाकी जो कुछ संसार में है, वह छलावा और भ्रम है।’ चाचा पहुंचे हुए आदमी हैं। उनकी बातें कम से कम मुझे तो समझ में आती नहीं। मैंने पूछ ही लिया- ‘चाचा अंजाम तो होगा तब देखा जाएगा, अंजाम के बारे में भले ना बताएं पर यह तो कहिए कि ‘हां-ना’ से आगाज कैसे होगा?’
          चाचा ने दांत दिखाएं और बोले- ‘इत्ती-सी बात नहीं जानते। अरे बाबा आदम का असली नाम ना था।’
          ‘अच्छा। तब तो हां नाम हव्वा का होगा।’
          ‘सही पकड़े हो।’
          मैंने आगे कुछ कहा नहीं, पर सच है कि हम हमारे चाचा जैसे कहां-कब सही पकड़ पाते हैं। इस ‘हां-ना’ के बीच चाचाजी के चक्कर में वे मेरी चार कहानियां कहीं पीछे ना छूट जाए। सो सीधे-सीधे अब कहानियों पर आता हूं। इन कहानियां के पूरी होते ही समझ लिजिएगा कि मेरे ‘दो शब्द’ की व्याख्या और यह आमंत्रण मेरा पूरा हुआ।
          चार दिन की हमारी छोटी-सी जिंदगी है। पेश है चार छोटी-छोटी मौलिक कहानियां।
          मैं पंच चाचा के साथ रहता जरूर हूं, पर यह वहम करने की जरूरत नहीं है कि ये कहानियां मेरी नहीं पंच चाचा की है। वैसे करो वहम, मेरा क्या मेरे पास तो हस्तलिखित है। मेरी खुद की राइटिंग में है। जब प्रमाण की जरूरत होगी पेश कर दी जाएंगी।

पहली कहानी : ‘हां’ की कहानी
          ‘हां’ तो यह हां की कहानी है। हां से ही मिलता-जुलता इसका जुड़वा भाई है- ‘हूं’। जो लोग ‘हां-हूं’ के मंत्र का जाप करते हैं, और भीतर ही भीतर ‘ना-नूं’ को याद करते हैं.... वे सदा सुखी रहते हैं। ‘हां’ की कहानी में कोई सुख नहीं है। ‘हां’ कहने के हजार दुःख पहले भी थे, और अब भी हैं। इतने वर्षों बाद भी इन दुःखों में कोई कमी-बेसी नहीं हुई है। अगर हुई भी है तो उसे स्वीकारा नहीं गया है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि साहित्य में हजार का मलतब हजार नहीं होता। भैया मेरा मानना है कि बाजार में तो हजार का मतलब हजार ही होता है। अब आप साहित्य वाले ‘हजार’ का मतलब छोटा-बड़ा कुछ भी करते रहो। कहानी अगर दुःख की हो तो ऐसी कहानी का क्या कहना और क्या सुनना। आज दुःख को कोई सुनना ही नहीं चाहता। दुःख नहीं सुनने का बड़ा कारण यह है कि दुःख सुनाने-सुनने से कम होता है। हमें फुर्सत हो तब ना, क्या हम अपना दुःख लेकर बैठेंगे और किसी को पूछेंगे- ‘भैया टाइम है क्या?’ हर सुनने वाला कहेगा- ‘ना।’
लोकतंत्र में कोई किसी का दुःख कम करे भी तो कैसे? फुर्सत ही नहीं है अपने ही काम करने से। यहां तो खुद के ही काम कम नहीं है। फिर फ्री में क्यों किसी का दुःख हल्का करें। हर काम में जब हिसाब-किताब है तो इसमें भी होना चाहिए।
          हां तो ‘हां’ की यही कहानी है कि आज हर व्यक्ति अपना दुःख लिए फिरता है। सार की बात यह है कि यह दुःख असल में हर काम के लिए ‘हां-हां’ कहने से जन्म लेता है। सुख पाना है तो ‘हां’ बोलने से परहेज करो। जैसे डॉक्टर ने ‘हां’ बोलने के लिए मना कर रखा हो। कभी मुश्किल में ‘हां’ कहना भी पड़े तो मन से ‘हां’ मत कहो। नेता जी की भांति बार-बार मुंडी हिलाओ। मुख पर भले ही ‘हां-हां’ हजार बार कहो पर मुंडी हिला हिलाकर साथ में ‘ना-ना’ कहना भी जारी रखो। ‘हां’ को मारने वाली अमोघ शक्ति ‘ना’ के पास है। नेता जी के सुख का मूल मंत्र है- हजार लोगों को ‘हां-हां’ कह कर भी कभी कोई काम नहीं करते। यह कहानी वैसे तो बहुत लंबी और बहुत विस्तार से कही जाती है, फिलहाल इसे यहीं विराम देता हूं। समझने वालो के लिए तो जरा सा संकेत ही काफी होता है। तो आखिर में सब बोलो- ‘हां’। अरे खोपड़िया हिला कर साथ में ‘ना’ भी बोल दो।

दूसरी कहानी : ‘ना’ की कहानी
          ‘ना’ कहने के हजार सुख है। सुख कौन नहीं पाना चाहता है। ‘ना’ का सुख इतना प्रभावशाली है कि दो बार ‘ना’-‘ना’ बोलते हैं, तो ‘नाना’ की याद आने लगती है। नाना हमारे सुख की ‘पूरी’ खान है, अगर किसी को अहसमति हो तो बोलो- ‘ना’। देखिए किसी ने नहीं बोला ‘ना’। अस्तु यह तय हुआ कि ‘ना’ में हमारे सुख की ‘आधी’ खान है। इसी ज्ञान से कुछ कहने वाले कहते हैं कि कुछ ना कहना ही बेहतर कहना है। तो कहिए ‘ना’ किसने रोका है। ‘ना’ कहने से हर काम से मुक्ति रहती है। ‘हां’ की हजार बीमारियां एक ‘ना’ कहते ही छू-मंतर हो जाती हैं। वैसे सज्जनों के लिए ‘ना’ कहना जरा कठिन है किंतु अगर आप ने एक बार ‘ना’ कहना सीख लिया तो मजा आ जाएगा, और फिर आगे हमेशा के लिए ‘ना’ और ‘ना’ के साथ एकदम ‘ना’ फिर साफ ‘ना’ बोलना सीख जाएंगे। आप किसी बात की चिंता-विंता ना करें। हर काम होगा। बस इतना जान लें कि कोई काम रुकता नहीं है। अरे भाई ऐसा नहीं है कि आप नहीं करेंगे तो होगा ही नहीं। पूरा बोझ आप जो लिए फिरते हैं, इसे धड़ाम से नीचे पटक कर मुक्त हो जाएं। सब हो जाएगा। आप के और हमारे मरने पर भी यह संसार चलेगा कि थम जाएगा। इतने गए इतने आए। कोई हिसाब है क्या आने जाने का। चला चली का खेला है भाई। ‘ना’ कहने का यह गुरु-ज्ञान जानते हुए भी हमारे देश में मूर्खों की कमी नहीं है। ऐसे मूर्ख ही हमारे सारे काम करेंगे और हमारा यह देश निरंतर आगे बढ़ेगा।

तीसरी कहानी : ‘हां-ना’ की कहानी
          अंततः हर ‘हां’ का ‘ना’ में रूपांतरण हो जाता है। जीवन में जहां भी ‘हां’ है, वहां ‘ना’ को स्थान देना अनिवार्य है। यह प्रकृति का नियम है, जैसे एक सिक्के के जैसे दो पहलू हुआ करते हैं। दोनों साथ-साथ रहेंगे। अगल-बगल रहेंगे। बार-बार हां-हां कह कह कर जब कोई बोर हो जाता है तो ना-ना कहना स्वीकार लेता है। जीवन का मूल दर्शन है कि हर प्राणी सदैव ‘हां’ या ‘ना’ की दिशा में चलता है। हमारा जन्म-मरण भी ‘हां’ और ‘ना’ से जुड़ा है। गहरे अर्थों में हर किसी का जन्म ‘हां’ रूपी प्रेम-प्याले अथवा ‘ना’ की जबरदस्ती नाव में किसी अनचाहे सवार के चढ़ जाने से हुआ है। जिनका आगाज ‘हां’ से हुआ वे अनंतः ‘ना’ कि दिशा में गमन करते हैं, और जिनका आगाज ‘ना’ से हुआ है जाहिर है वे ‘हां’ की दिशा में गमन करते हैं अथवा करना चाहते हैं।
          तो बंधुओ! हमारे जीवन का सार है- ‘हां’ और ‘ना’।
          हां यदि जीवन है, तो ना मृत्यु और फिर से हां ही हमारा पुनर्जन्म है।
          यह ‘हां-ना’ का चक्कर ही भवसागर है प्यारे।

चौथी कहानी : ‘ना-हां’ की कहानी
          एक दिन ‘हां’ और ‘ना’ में लड़ाई हो गई। दोनों खाना खा रहे थे।
          हां ने कहा- ‘पहली रोटी मैं खाऊंगा’ और ना ने कहा- ‘मैं खाऊंगा।’ दोनों की लड़ाई बढ़ गई पर परोसने वाल सयाना आलोचक था। वह बोला- ‘जीवन में तुम दोनों का होना जरूरी है। एक के बिना दूसरे का महत्त्व नहीं। अब मुझे फैसला करना है तो मैं पहले ना को रोटी दूंगा।’
          इस पर तुरंत ‘हां’ ने प्रतिवाद किया तो आलोचक ने उसे माकूल जबाब दिया- ‘इसमें मेरा कोई दोष नहीं। शब्दकोश में तुम्हारा स्थान मेरे प्यारे हां भैया बाद में आता है। इसलिए यहां भी तुम को बाद में रहना पड़ेगा। अकादि क्रम समझते हो कि नहीं’
          ऐसा झगड़ा सुलझाना सरल नहीं होता। कोई सयाना संपादक होता तो कहता- ‘दोनों आपस में लड़ाई मत करो। मैं दोनों को रोटी पहले खिला सकता हूं। ये लो आधी रोटी ना तुम्हारी और ये लो आधी हां तुम्हारी।’ मैं भी कोई कम हूं क्या? मुझे ‘दो शब्द’ कहने को आमंत्रित किया, तो मैंने ‘दो शब्द’ ही कहे हैं- ‘हां’-‘ना’। है ना? आपको मेरे ये ‘दो शब्द’ सदा याद रहेंगे। ये देखिए आपने बोला- ‘हां’। बोला ‘ना’ हां?
नीरज दइया
 
 

गुट, गुटका और गुटकी

हते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। अगर बहुत सारे चने मिल जाए तो संभव है कि भाड़ को फोड़ दें। यहां यह समझना जरूरी है कि आखिर भाड़ को फोड़ने पर इतना जोर क्यों दिया जाता है। क्या बिना किसी तोड़-फोड़ के शांतिपूर्वक कुछ नहीं किया जा सकता है। अगर कोई अकेला चना कुछ नहीं कर सकता है तो वह शांति से बैठ तो सकता है। पर जब जब भी कोई चना शांति से चुप-चाप बैठ कर चिंतन करता है, तो दूसरे साथी चने उसे कहते हैं- तू भाड़ में जा। हम जा रहे हैं भाड़ फोड़ने। चने की नियति भाड़ है और भाड़ की चना इसी प्रकार साहित्य और साहित्यकार का अंतर्संबंध है। जो लोग साहित्य के महत्त्व को नहीं समझते वे साहित्य लेखक को चना और साहित्य लेखन को भाड़ समझते हैं। अस्तु दुनिया ने भड़भूंजे की भांति साहित्यकारों को भाड़ के हवाल कर दिया है।
             एक अकेला साहित्यकार लिखता है तो उसे दूसरे और तीसरे के साथ अपने मित्र साहित्यकारों की संगत बल देती है। वह सलाह करता है और चिंतन पर परामर्श करता है। ऐसे में ऐसे गतिशील साहित्यकारों के समूह को अगतिशील और जंग खाए लेखकों द्वारा दूसरे किस्म की जंग छेड़ी जाती है। जो लिखेगा वह छपेगा और जो लिखेगा-छपेगा उसे कभी पुरस्कार-सम्मान भी मिलेगा। समस्या यहीं से आरंभ होती है। एक गुट विशेष की चर्चा शहर से गांव तक खुशबू की भांति फैलती और हर तरफ चर्चा होती है। जो लेखन के ताप को झेल नहीं सकते वे ठंडे लेखक ऐसे गुट से परेशान होते हैं और हानिकार होते हुए भी गुटका खाते है। समय गुजारने के लिए और लेखन की तलब मिटाने में गुटका मददगार होता है। प्रतिबंध के बाद भी गुटका खाने वाले ऐसे ही कुछ मित्रों के बीच बैठ कर गुट की गाथा को बारंबार सुनते-सुनाते हैं। वे चाहते हैं कि धोबी बन कर पछाड़-पछाड़ कर सभी को धो-पौंछ कर गुट से तितर-बितर कर दें। एक बार जो गुट बन जाता है उसे तितर-बितर करना सहज नहीं होता। उनकी इस सहजता से दुखी गम गलत करने वाले गुटका खाते खाते गुटकी की शरण में जाते हैं। गुटकी और गुटकी के शौकीन मिल बैठ जाते हैं तो अनेक समझौतों पर अलिखित हस्ताक्षर होते हैं।
             गैर-गुट वाले गुटका-गुटकी के नशे में लड़खड़ाते हैं। साहित्य के ऐसे सूरमाओं के मुख पर ऐसे-ऐसे शब्द से मिश्रित वाक्य और आप्त कथन आते हैं कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं। वे दो-चार गुटकी भरते ही पीढ़ियों तक को शुभोषित करते हुए ज्ञान को घोड़ों पर सवार हो जाते हैं और बहुत आगे निकल जाते हैं। न जाने कहां कहां की कौड़िया लाते हैं। कहीं की ईंट और कहीं का पत्थर भानूमति ने कुनबा जोड़ा की तर्ज पर यह कुनवा रात के अंधेरे-अंधेरे में पूरी दुनिया का कायाकल्प कर डालता है किंतु सवेरा होते ही सारे संकल्प और योजनाएं धरी रह जाती है। सूरज के साथ थोड़ा सा चलते ही शाम का स्मरण हो जाता है और पूरे दिन शाम की रंगीन के साजो-सामान की व्यवस्था योजना में दिन का देहांत हो जाता है। पंच काका कहते हैं कि ऐसे गुटनिर्पेक्ष, निर्दलीय और संत साहित्यकार कहे जाने वालों के जीवन में जाल और माल ऐसा होता है कि हर किसी को फासने-गिराने, चीरने-फाड़ने और उठाने-पटकने की रणनीति के अलावा कुछ कर ही नहीं सकते। अगर इन गुटका-गुटकी वालों का बस चले तो ये चौबीसों घंटे दिन का देहांत करने को तैयार है। 

- नीरज दइया

30 जनवरी, 2017

सर्वश्रेष्ठ वाद - अवसरवाद

जकल जहां देखो वहां विकल्पों के वितान खुल गए हैं। बाजार में कोई छोटी सी चीज लेने जाते हैं तो बहुत देर लगती है। कारण यह कि कौनसी लें, नहीं लें यह फैसला कैसे करें। इसमें समय लगता है। तेल, साबुन, क्रीम से लेकर गेहूं, चावल और दाल आदि सभी चीजों का यही हाल है। तेल लेना है तो कौनसा तेल लें? साबुन तो कौनसा साबुन लें? बाजार में हर वस्तु के अलग-अलग ब्रांड में उपलब्ध है। विज्ञापनों का जादू ऐसा कि हमें हमारी पसंद बार-बार बदलने पर मजबूर करते हैं। हमें पूरी तरह से भ्रमित किया जा रहा है। असल में विकल्प होते ही भ्रमित करने के लिए हैं। परीक्षाओं में प्रश्नों के उत्तर में चार-पांच विकल्प दिए होते हैं, और सही उत्तर छांटने बैठते हैं तो प्रायः सभी सही लगते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि सर्वश्रेष्ठ और सही का चुनाव कैसे किया जाए?
           आवश्यकता आविष्कार की जननी है और इसी आवश्यकता के बल पर एक बार फिर आविष्कार हो गया है। अब इसे आविष्कार माने या नहीं माने, आपकी इच्छा। सभी अवसरों पर सर्वश्रेष्ठ अवसरवादिता है। वादों और कसमों में अवसरवाद बेमिशाल है। मान लें कि आपको तेल लेने जाने का अवसर मिलता है। कौनसा तेल लेंगे यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण है कि किस अवसर के लिए तेल लेंना है। अवसर ही महत्त्वपूर्ण होता है। अगर दफ्तर में साहब को तेल लगाना है, तो इंजन-छाप लेना चाहिए। पत्नी ने मंगवाया है अपनी टांग दूर रखें, और जो जैसा कहा गया है वैसा ही तेल घर लें जाएं। आप अपनी बुद्धि का प्रयोग बिल्कुल नहीं करें। यह सदा याद रखें कि आपकी पत्नी आपसे अधिक बुद्धिमान है। अगर आप दुकानदार हैं और ग्राहकों के लिए तेल लें रहे हैं तो अवसरवाद कहता है कि नकली तेल खरीदें, जो सस्ता और जल्दी मिलता है। इससे आपको और ग्राहकों दोनों को फायदा होगा। सारे दुकानदार जब नकली और कम कीमत वाला तेल, बड़ा लाभ कमाते हुए बेच रहे हैं तो अवसरवाद कहता है कि आपको देश और जनता की चिंता बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। साबुन और क्रीम में मामले में अवसरवाद कहता है कि हाथी के दांत सिद्धांत यहां अनुकूल रहेगा। अगर कहीं जा रहे हैं तो ब्रांड में समझौता नहीं करें। तेल, साबुन और क्रीम से आपकी हैसियत का पता चलता है। गेहूं, चावल और दाल तो पेट में चले जाते हैं और फिर दिखाई नहीं देते। क्या खाया-पीया यह कोई नहीं पूछता। हां, कौनसा तेल लगाया, किस साबुन का उपयोग किया और क्रीम कौनसी इस्तेमाल करते हैं... यह चर्चा कभी भी हो सकती है। अगर नहीं हो तो आपको करनी चाहिए। बिना पूछे ही बताएं कि आप क्या क्या और कौनसा-कौनसा ब्रांड इस्तेमाल करते हैं। अवसरवाद सिद्धांत के अनुसार दिल खोल कर खूब दिखावा करो। दिखावा करने से ही अवसर मिलते हैं। अवसर पर दिखावा करने से ही आपकी प्रतिभा की पहचान होगी। अगर आप महिला है फिर तो कहने ही क्या। यहां अवसरवाद का कहना है कि आपको हर अवसर मिल सकता है। अपने लटके-झटके और दांत दिखाने के साथ-साथ आधुनिक होने का लबादा ओढ़ लें। पुराने विचार और मूल्यों को बीती सदी की बातें कहते हुए छोड़ देना है। पंच काका कहते हैं कि अवसरवाद का मौलिक जन्मदाता हर कोई बन सकता है। जरूर बस इतनी है कि अपने स्वाभिमान और सिद्धांतों को भूल जाओ और अवसर के लिए गधा बनना पड़े तो भी चूको मत।
० नीरज दइया 

20 जनवरी, 2017

पारे का पराक्रम

मौसम के अनुसार कभी ऊपर चढ़ना और कभी नीचे उतरना पारे की नियति है। मौसम बदले तो पारे के विश्राम में खलल पड़ता है। पारे और मौसम का गणित तो समझा जा सकता है, परंतु श्रीमती जी और उनके पारे का गणित दुनिया के किसी कोने में आज तक नहीं समझा जा सका है। यह केवल भारत की बात नहीं, दुनिया के सारे वैज्ञानिक पतियों-गणितज्ञयों के यहां यही हालात है, तो सामान्य पतियों की तो बात ही क्या करें। पारे का गणित समझने में अब तक असफलता का एक कारण यह भी है कि जरा सी बात पर इनका पत्नियों का पारा सीधे सातवें आसामान तक जा पहुंचता है। पारे की गति का रहस्य बना हुआ है। अब कल की ही बात है, मैंने कह दिया कि आज दाल में शायद कुछ कमी रह गई। इतनी सी बात कहने पर श्रीमती जी न केवल नाराज हुई, बल्कि अपने पारे को सातवें आसमान पर ले गईं। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन ऑफिस जाने से पहले मुझे ही रोटी-सब्जी बनानी पड़ी। सीधे मुंह जब पत्नियां पतियों से बात नहीं करती हैं, तो उन बेचारों का पूरा दिन खराब जाता है। मूड का बाजा बजा हुआ हो तो कहीं मन नहीं लगता। बार बार चिंता सताती है कि पारा सातवें असमान से नीचे आया कि नहीं। फिर चाहे खुद के मोबाइल से फोन करो या ऑफिस के सरकारी फोन से। पत्नी फोन नहीं उठाए तो समझ लिजिए, अभी स्थिति अनियंत्रित है और पारा सातवें आसमान पर ही है। वर्ना बहुत बार ऐसा होता है कि सरकारी फोन पर पत्नियों से बतियाने में जो दोनों तरफ सुख का अहसास होता है, वह मोबाइल में भला कहां। घर बिल आता है, तो दिल जलता है पर फ्री के फोन का समय-ग्राफ जैसे-जैसे ऊपर उठता है वैसे वैसे प्रेम में श्रीवृद्धि होती है।
मैंने अनुभवी पतियों से पूछा- पारे को सातवें आसमान से नीचे कैसे उतारा जाए। सभी ने हाथ खड़े कर दिए कि इसका कोई तयसुदा फार्मूला नहीं है। ऐसी परिस्थियों में कुछ भी हो सकता है। बात किसी उपहार से बन सकती है, या फिर एक-दो दिन घर में दोनों सिफ्ट काम करने से हालत सुधरने की संभावना बनेगी। दिन-रात ऐसे अवसर को खोजना होगा जिससे कि पारे को जरा राहत की स्थिति में लाया जा सके। पंच काका घर में होते हैं तब उनके लिहाज का असर रहता है। अपनी उपस्थित मात्र से स्थितियों को वे सामान्य बना देते हैं। घर में शीत-युद्ध होता है किंतु भीतर ही भीतर। अब जब पंच काका कहीं गए हुए हैं, तो हालत सुधार में देरी की संभावना दिख रही है। मैंने फोन कर पूछा कि अब क्या करूं? पंच काका ठहरे पारखी और दुनिया देखे हुए। बोले- कुछ नहीं करना, शाम का खाना बाजार से पैक करा के ले जाना और खूब खर्चा कर डाल। मंहगी साड़ी खरीद कर ले जा। कोई विदेशी इत्र या फिर गहने तक की औकात हो तो कहने ही क्या। सोने की रकम देखते ही हर पत्नी का पारा फटाक से नीचे आ जाता है। तुरंत राहत का यह अचूक नुस्खा है। नोट बंदी और तंगी के इन हालात में जैसे-तैसे मैंने कुछ खर्चा किया। बजट को इतना सेट किया कि पत्नी का पारा कहीं रहे, पर मेरी दाल जरा सी गल जाए। सारा खेल दाल से ही तो शुरू हुआ था, इसलिए जैसे ही दाल गलेगी पारा नीचे आ जाएगा।
० नीरज दइया

16 जनवरी, 2017

मेक-अप का महत्त्व

जो है जैसा है उसे वैसा देखना-दिखाना अपराध माना जाना चाहिए। यह तो आइना दिखाना हुआ। समय की मांग है- वास्तविकता कुछ भी हो, पर उसे बढ़ा चढ़ा के बताया-दिखाया जाना चाहिए। आजकल पैकिंग का और ऊपरी दिखावे रंग-रोगन का जमाना है। बाहर और ऊपर सब कुछ अच्छा दिखना चाहिए, भीतर चाहे जो जैसा हो। बाहरी आकर्षण से ही तो यह दुनिया इतनी हसीन लगती है। हसीनाओं की तो बात ही क्या करें, वे तो बिना लिपाई-पुताई के कुछ की कुछ दिखाई देंगी। रंग-रोगन का कमाल है कि भैंस को गाय और गधे को घोड़े दिखाया जा सकता है। इस दुनिया में सभी का अपना-अपना महत्त्व है, पर यह बात कोई मानने को तैयार नहीं है। पूरी दुनिया की भैंसे गाएं बनना चाहती हैं और सारे गधे घोड़े हो जाना चाहते हैं। कहा गया है कि चाहने से क्या नहीं हो सकता है, यह हमारी चाहत है कि पत्थर को भगवान बना देती है। यह सारी माया मेक-अप की है। असलियत भले जो हो, पर असलियत छुपाना और अच्छा-अच्छा देखिए कितना भला लगता है।
कई खास मौकों पर चेहरे की सुंदरता को निखारने के लिए या फिर रोजाना लाइफ में मेक-अप करना कोई नई बात नहीं है। मन में बैठी ब्यूटी के इस कमाल को दुकानदारों और उनके विज्ञापनों ने बखूबी पकड़ा है। ये मर्दों वाली क्रीम और त्वचा के अलग-अलग प्रकार की क्रीम बताते हुए उनकी हर संभव कोशिश होती है कि हमारी जेब सदा साफ रहे। कितने भले हैं ये दुकानदार कि फिलहाल तंगी के दौर में सब कुछ फ्री और जीरो डाउनपेमेंट पर हमारे घरों तक पहुंचाने को राजी हैं। बाजार ठप्प है पर फिर भी किसी न किसी प्रकार से दुकानदार मिल कर इस मिशन में लगे हैं। दुकानदारी का असूल है कि मुनाफा होना चाहिए, भले कैसे भी हो। कभी कम और कभी ज्यादा। धंधे में धंधे की कसर निकाल ली जाती है। आपने अगर कसर निकालने की कला सीख ली, तो आप सफल हैं। कोई आपको रोक नहीं सकता। आप कसर निकाल देंगे बस ऐसा विश्वास बनाएं रखें। चेहरे-मोहरे की कसर निकालने के लिए मेक-अप बहुत जरूरी है।
बिना मेक-अप के सब कुछ डाउन-डाउन सा लगता है। क्या अब भी आपको सादा जीवन और उच्च विचार पर यकीन है? अरे ये तो वर्षों पुरानी घिसी-पिटी उक्ति है। आज इक्कीसवीं सदी के जीवन और उस पुराने जीवन में कितना फासला है। पंच काका का जमाना था- जब लड़का-लड़की शादी से पहले एक दूसरे को देखने नहीं जाया करते थे। जो भी परिणाम निकला होता, वह पहली रात को ही उनके सामने आता। अब की बात अलग है। लड़के और लड़की को देखना-दिखाना बिना मेक-अप के भला कैसे संभव है। इस समय की नियति है कि एक को राजकुमार और दूसरी को राजकुमारी बना कर पेश किया जाए। ग्लैमरी दुनिया में चट मंगनी पट शादी के दिन लद गए। पहले लड़का-लड़की अपने पैरों पर खड़े होने की बात कहेंगे। फिर एक दूसरे को देखेंगे-समझेगे। विचारों को जाने-समझे पूरी जिंदगी का फैसला कोई इक्कीसवीं सदी में कैसे ले सकता है। सारे घोड़े अरबी घोड़े बनें फिरते हैं, और सारे गधे भी जैसे तैसे घोड़ों की शक्ल लिए घूमते हैं। पंच काका कहते हैं कि दुनिया वही हमारे वाली है या पूरी बदल गई है। ये जगह-जगह हाथ-मुंह-पैर मारने वाले क्या इसी पृथ्वीलोक के हैं? इस संसार में खलनायक नायक बने घूमते हैं। ऐसे बिरले होते हैं जो यह कह सकने की हिम्मत रखते हैं- ‘नायक नहीं खलनायक हूं मैं।’ बाकी तो सत्यानाश हो इस मेक-अप और बदली हुई दुनिया का, कि लड़का-लड़की दोनों एक से दिखते हैं।
० नीरज दइया  

15 जनवरी, 2017

बाबा जी के चेलों, खूब खाओ बैंगन

बीबीसी ने हड़प्पा सभ्यता के बैंगन का खुलासा क्या किया, हमारे सामने चार हजार साल पुराने खट्टे-मीठे बैंगन का इतिहास जवान हो गया। पंच चाचा पूछ रहे हैं- आदि-आचार्य श्री बैंगनाचार्य ने वर्षों पहले बैंगन खाने पर प्रतिबंध लगया था, मगर क्यों?
    मैंने कहा- मुझे नहीं मालूम ये आदि आचार्य कौन थे और उन्होंने ऐसा प्रतिबंध भी लगया था। आप जानते हैं तो बताएं। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मुझे बैंगन से परहेज नहीं है। वैसे अधिक पसंद नहीं करता हूं। पंच चाचा मूड में आ गए, बोले- भतीजे, लोग कहते हैं बै-गुन, यानी बिना गुन था। नासमझ है, देखते ही नहीं कि बैंगन के सिर पर ताज है। वह राजा है। हींग और लहसुन से तैयार करो बैंगन का सूप तो पीने से पेट फूलना, गैस, बदहजमी व अपच जैसी बीमारियां नहीं होती। भुने हुए बैंगन को खाओ तो कफ निकल कर खांसी ठीक कर देता है। भुने हुए बैंगन में शक्कर डालकर खाली पेट खाओ एनीमिया दूर। स्किन कैंसर, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, दिल के रोगियों के लिए भी बैंगन फायदेमंद है। तुमको पता है इसमें निकोटिन होता है और स्मोकिंग छुड़ा सकता है। भैया जो लोग गंजे होते जाते हैं वे अगर बैंगन खाए तो बालों का झडऩा बंद हो सकता है। बैंगन कॉलेस्ट्रोल कंट्रोल करता है।
    मैंने कहा- चाचा जी, मैं बोरी एक बैंगन ला देता हूं। अगर आप जगह-जगह बांटना चाहते हैं तो। मुझे नहीं सुनना बैंगन पुराण। मैंने पहले ही कह दिया मुझे अधिक पसंद नहीं है। जब घर में बनता है मैं खा लेता हूं। आप तो यह बताएं कि वह प्रतिबंध कैसे लगा था।
    पंच चाचा बोले- ये आदि आचार्य बैंगनाचार्य लोक में बाबाजी के नाम से प्रसिद्ध है। ये वे बाबाजी थे जिन्होंने अपने सभी चेलों को बैंगन खाने से मना किया था और खुद खाते थे। मैंने बीच में प्रतिवाद किया- यही तो बताएं कि खुद खाते थे तो दूसरों को मना क्यों किया था।
    पंच चाचा जरा परेशानी में बोले- वर्षों से बाबाजी को बैंगन बहुत पसंद थे, वे बड़े चाव से खाते थे। लेकिन उनको खुद याद नहीं, कब उन्होंने चेलों को बैंगन खाने से मना किया था। भेड़ चाल है किसी चेले को बैंगन पसंद नहीं था तो उस ने चर्चा फैला दी कि बाबाजी ने मना किया है। या ऐसा भी हो सकता है कि गुरुकुल में बैंगन कम आए होंगे और रसौइया जरा शातिर होगा। उसने सोचा- बैंगन कम है सो उसने चालाकी दिखाई और बोल दिया बाबाजी ने सब चेलों को बैंगन खाने से मना किया है। एक बार कोई बात चल निकलती है फिर उसे रोकना मुश्किल होता है। हुया यह कि आज वर्षों बाद किसी दुखीराम नामक चेले ने प्रतिवाद किया तो मामला समझ में आया।
    वर्षों बाद बाबाजी को मालूम चला कि चेले भी बैंगन खाना चाहते हैं। फिर क्या था उन्होंने फेसबुक स्टेटस लिखा है- बाबा जी चेलो, खूब खाओ बैंगन। बीच में मैंने तपाक से सवाल किया- पंच चाचा, ये बाबाजी अब तक जिंदा है और फेसबुक यूजर है? दुखीराम जैसे चेले मूर्ख है। अगर बैंगन ही खाने थे तो बाबाजी से बिना पूछे भी खा सकते थे। चाचाजी, आपकी कहानियों में काल-साम्य नहीं दिखता।
    पंच चाचा के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आई। बोले- ये बैंगन जितना सीधा दिखता है उतना साम्य में नहीं आता। कई किस्से मशहूर है। एक बार अकबर के सामने बीरबल ने बैंगन की तारीफ कर दी और दूसरे दिन भद्द, तो अकबर ने पूछा- बीरबल जनाब, ऐसा क्यों? बीरबल ने जबाब दिया- जहांपनाह, कल बैंगन खाया, बहुत अच्छा लगा। रात बैंगन ने खराबी कर दी। कल वाली बात फिर दोहरा कैसे सकता हूं।
० नीरज दइया
naya arjun 15.01.2017

09 जनवरी, 2017

हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार

        सुबह सुबह एक लेखक मित्र अपने साजो सामान के साथ मेरे घर पहुंच गए। गले में झोला और हाथ में बैग उठाए वे अपने शॉल को ठीक करते बाहर खड़े थे। मैं पहुंचा तो मुस्कुराते हुए बोले- “नमस्कार। बहुत दिनों से सोच रहा था कि पंच काका से मिलना है। संयोग ऐसा बना कि आज बिना बताए आ ही गया हूं। काका है तो घर में ही?” मैंने मुस्कुरा कर हां कहा और बिन बुलाए मेहमान को भीतर लिया। यह सुखद आश्चर्य था कि वे थे तो मेरे मित्र, और मिलने आए थे काका से। खैर उन्हें मैंने काका जी से मिलवाया। वे ऐसे मिले जैसे उन्हें बरसों से जानते हो। पांव-धोक के बाद उन्होंने अपने श्रद्धा-सुमनों के तौर पर पंच काका के समक्ष किसी मदारी की भांति अपने झोले और बैग से ना जाने क्या-क्या निकाल कर जैसे पूरी दुकान ही सजा डाली। उनका इतना प्रेम और आदर देखकर शुक्र है कि मेरी आंखें नहीं झलझालाई। चाय के बाद उन्हीं के प्रसाद से हमने सुबह का नाश्ता किया। मैंने सोचा अब ठीक मौका है, पूछ लूं कि भैया कैसे आना हुआ। मैंने पूछा तो उन्होंने फिर वही रटा-रटाया जबाब दिया कि बहुत दिनों से सोच रहा था कि पंच काका से मिलना है। सो बिना बताए आ गया। मैं कब हार मानने वाला था। दोस्तों में कभी हार माननी भी नहीं चाहिए। सीधे पूछ लिया- “आए हो तो काका जी से कुछ काम होगा, तभी तो आए हो।” वे बोले- “हां, तो फिर क्या हुआ। जिससे काम होगा करेंगे। तुमसे मतलब।”
          मुझे इतने रुखे जबाब की उम्मीद नहीं थी। मैंने सोचा बच्चू तू भले मत बता। बाद में काका जी से पता कर लूंगा। मैं अपने काम का कह कर दूसरे कमरे में आ गया। सोचा ये मेरा मित्र हो न हो किसी अटके काम के लिए ही आया है। वे कुछ बाते कर रहे हैं, तब तक कुछ लिख लूं। कल रात दोस्तों के साथ बातें करते हुए हाल ही घोषित पुरस्कार पर कुछ पीड़ाएं और चिंताएं पता चली थी। सोचा वैसे तो पुरस्कार विषय नया नहीं है। इस पर बहुत कुछ लिखा गया है। फिर भी यह विषय हरि अनंत हरिकथा अनंता की भांति लिखने लायक और समसामयिक है। पहले सोचा कि गीत लिखता हूं। तो मुखड़ा बनाया- ‘हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार’। पर मेरी छवि तो गीतकार वाली है नहीं इसलिए गीत लिखने का विचार त्याग दिया। लिखना आसान काम नहीं है। पहले तो क्या लिखूं और फिर किस विधा में लिखूं का तनाव झेलना पड़ता है। ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं ये लेखक भाई आया है वह किसी पुरस्कार की अभिलाषा में ही आया हो। पंच काका कहीं किसी पुरस्कार में निर्णायक तो नहीं बना दिए गए हैं। ‘हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार’ मुखड़ा ऐसे मुखों पर फबता है, जिन्हे पुरस्कार की लालसा थी पर नहीं मिला। जिन्हें पुरस्कार मिल गया है वे थोड़े समय बाद इसे अपने मुख की शोभा बना सकते हैं। रहस्य यह है कि इस गीत के बिना साहित्यकारों का साहित्यकार होना बेकार है। कहने को कहा कुछ भी जाए। जैसे कि मैं पुरस्कार के लिए नहीं लिखता हूं। पुरस्कार तो बस लॉटरी है। पुरस्कार श्रेष्ठ लेखन का पैमान नहीं है। ऐसे अनेक हैडिंग हैं, पर सच्चाई यह है कि ऐसा कोई बिरला ही होगा जो पुरस्कारों के लिए नहीं लिखता। मैं इतना लिख कर पंच काका को दिखाने गया तो देखा मेरे मेहमान मित्र पंच काका के पैर दबा रहे हैं। मित्र संकुचाए, मैंने संकोच किया तो काका ने कहा- “आ जाओ। अब जब आ ही गए हो तो।” “मैंने अपनी नई रचना आरंभ की सोचा आपसे सलाह ले लूं।” पर यह क्या मेरे लिखे को सुनकर दोस्त कपड़ों से बाहर हो गया। बोला- “तुम बड़े बेशर्म हो। छुप-छुप कर हमारी बातें सुनते हो। व्यंग्य लिखते हो। कोई दूसरा नहीं मिला क्या? अरे पुरस्कार के लिए मरते हैं तो यह हक है हमारा। चाचा जी और मेरी बात पक्की है।”
० नीरज दइया 
 

06 जनवरी, 2017

अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक

ह सत्य नहीं है कि जो लिखता है, लेखक उसे कहते हैं। लिखते तो बहुत हैं, सभी लिखने वाले लेखक नहीं कहलाते। लेखक कहलाने के लिए केवल लिखना जरूरी नहीं, कुछ दिखना और दिखाना भी होता है। हमें जो कुछ दिखाते और दिखते हैं लेखक, वे प्रायः वैसे नहीं होते हैं। दिखना और वास्तविकता अक्सर अलग होती है। जो असलियत नहीं है उसे दिखाना और हमारा देखते रहना ही हमारी समस्या है। एक अखबार द्वारा एक लेखक को मानदेय दिया जाता था और वह लेखक इसे प्रचारित भी करता था। वह कहता रहता मुझे इतने रुपये मिलते हैं। यह पर्याप्त मानदेय है। इसे संयोग कहें या मेरा प्रयास कहिए कि मेरा भी नंबर उस अखबार लग गया। मैं छपा तो मानदेय का इंतजार करने लगा। यह मेरे भाग्य का ही दोष रहा होगा कि मुझे मानदेय भिजवाना वे भूल गए। भूल सुधार करने के प्रयास में एक दिन समय निकाल कर अखबार के दफ्तर पहुंचा और मानदेय का जिक्र किया। सामने बैठे महोदय को सांप सूंघ गया। पहले तो चुप्पी साधे रहे। मैं इंतजार करता रहा कि कुछ कहेंगे। मेरी दाल नहीं गली तो मैंने पूरी कहानी परोस दी कि अमुख साहब लेखक को मानदेय दिया जाता हैं। मुझे भी मिलना चाहिए। मैंने देखा कि पूरी कहानी सुनकर उनकी सांसें लौट गई। बोले- आप जिन अमुख लेखक की बात कर रहे हैं, वे सच में ही अमुख लेखक है। यहां अमुख साहब यहां आते हैं। हमारे ना ना करते हुए भी अमुख साहब बहुत खर्चा कर जाते हैं। अमुख जी छापने की मिन्नतें करते हैं। मैंने प्रतिप्रश्न किया- अमुख का मतलब क्या है? वे बोले- अमुख से हमारा अभिप्राय है कि उनका मुख नहीं है। वैसे तो मुख सभी के होता है, उनके भी है। वे बोलते बहुत हैं। साफ शब्दों में कहें तो हमारे गरीब और जरूरतमंद मित्र हैं। ऐसे तो वे हमसे मांग नहीं सकते और मांगेंगे भी कब तक। उन्हें मांगने में शर्म और हमें देने में शर्म। इसलिए कभी कभार अमुख को हम कुछ मुख के लिए दे दिया करते हैं। आप अपने अमुख को कुछ देंगे और हम जो खुद को प्रमुख मान बैठे हैं, हमें कुछ नहीं देंगे। वे भड़क गए। बोले- आप प्रमुख कब से हो गए। और आपके पास देने को क्या है? रचनाएं लिखना और भेज देना इसमें प्रमुख क्या है? प्रमुख होता है- मुखिया। बहुत से लेखकों को साथ लेकर जो चलता है और दो-चार संस्थाएं जिसकी जेब हो। कुछ पुरस्कार और सम्मान भी हाथ में होने चाहिए। पत्रिकाओं पर होल्ड होना चाहिए या खुद की अपनी पत्रिका होनी चाहिए। जो उठा-पटक और अखाड़ेबाज होता है, उसे हम प्रमुख कहते हैं। आप हमारे लिए ना तो अमुख हैं और ना प्रमुख। बोला- आप मुझे जानते नहीं। मैं क्या हूं। ये तो आप अपने अमुख और प्रमुख लेखकों से पूछ लेना। फिलहाल आपको बता देना जरूरी है कि इन तथाकथित अमुख और प्रमुख लेखकों की किताबों के आमुख मैं ही लिखा करता हूं। उन्हें ठीक करता हूं। वे मेरे सुझाव मानते हैं। मैं क्या सड़कछाप लेखक हूं? मानदेय नहीं देना तो मना कर सकते हैं। मैं तो मानदेय केवल अपने मान को ही मानता हूं। आपका मुझे मान देना यानी लेखन मान लेना ही मेरा मानदेय है। पर एक को देना और दूसरे को नहीं देना, यह सरासर गलत है। वे मुस्कुराते हुए बोले- सही-गलत की बात आप कर रहे हैं? हम अखबारवाले कभी गलत नहीं होते। हमें बहुत काम रहते हैं। आपकी गलतफहमी दूर किए देते हैं कि हमने आपको क्यों छापा? आप समझते होंगे कि आपकी रचना में दम था इसलिए छपा। ऐसा नहीं है बंधु ! यह तो हमें पंच काका ने कहा था कि कि आप अच्छा लिखते हैं। आपको अवसर मिलना चाहिए। तब मिल गया। समझे आप। 
० नीरज दइया 

अपनी धरा और धारा के विशिष्ट कहानीकार : बुलाकी शर्मा

भारतीय साहित्य में अपने विपुल लोक साहित्य के बल पर राजस्थानी साहित्य अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। आधुनिक युग में आरंभ के बहुत वर्षों तक यहां के कुछ रचनाकारों ने लोककथाओं के संरक्षण के लिए जहां लोककथाओं को लिपिबद्ध किया, वहीं कुछ रचनाकारों ने समकालीन भारतीय कहानी के समानांतर राजस्थानी कहानी के विकार की दिशा में कदम बढ़ाए। वहीं आगे चलकर अपनी परंपरा और लोक धरोहर को कुछ कहानीकारों ने आधुनिक संदर्भों में प्रयुक्त किया, जिससे राजस्थानी साहित्य की श्रीवृद्धि हुई।
इसी क्रम में वर्ष 2016 के लिए साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत कहानीकार बुलाकी शर्मा की बात करें, जिन्हें दूसरे कहानी संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ (2013) के लिए हाल ही में पुरस्कार की घोषणा हुई है। एक प्रसिद्ध लोककथा का स्मरण कराना चाहूंगा- “जसमल ओडण”। इस लोककथा का एक पाठ राणी लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत के संग्रह “माझळ रात” में भी देखा जा सकता है। इसी पाठ के बिलकुल समानांतर बुलाकी शर्मा के प्रथम कहानी-संग्रह “हिलोरो” (1994) की शीर्षक कहाणी को देखेंगे तो लगेगा कि जसमल ओडण के स्थान पर नायिका चिड़कली को कहणीकार ने युग-संदर्भों से सहजते हुए जैसे नवीन सृजना के धरातल पर सृजित किया है।
लोकथा में जसमल पर राव खंगार रीझता है और इस कहाणी में नायिका चिड़कली पर ठेकेदार हमीद रीझता है। यह महज संजोग है कि लोककथा में राव खंगार ने जसमल का हाथ पकड़ा और बुलाकी शर्मा की कहाणी में चाय के कप के साथ ही हमीद ने चिड़कली का हाथ पकड़ लिया। स्त्रि की कहानी वर्षों बाद भी एक जैसी नजर आती है। राजा के नए रूप में ठेकेदार जैसे चरित्र हमारे समाज में हैं। लोककथा में जसमल अपने सत की डोर से बंधी अंततः स्वयं को अग्नि के सुपर्द कर प्राण होमती है, और कहाणी की नायिका चिड़कली चूंकि किसी लोककथा की नायिका नहीं है इसलिए उस के हृदय में कहानी की अंतिम पंक्ति में कहानीकार एक हिलोर उठते दिखाता है कि ठेकेदारजी इन दिनों एक बार भी नहीं आए, क्या हुआ होगा उन्हें.... एक बार आए तो कितना अच्छा रहे। यह पूरे समय और संदर्भों का बदल जाना है।
अपने समय और संदर्भों को स्वर देने वाले बुलाकी शर्मा इसी मार्मिकता के लिए राजस्थानी कहानी के क्षेत्र में पहचाने जाते हैं। राजस्थानी कहानी में परंपरा विस्तार का श्रेय बुलाकी शर्मा जैसे कहानीकारों को दिया जाएगा। जसमल का चिड़कली के रूप में अवतरण प्रगतिशील सोच का परिणाम भी कहा जा सकता है। कवि मनीषी कन्हैयालाल सेठिया के इस कहानी के संदर्भ में विचार देखें- “हिलोरो राजस्थानी भाषा की कहानी विधा को बहुत आगे बढ़ाती है और यह कहाणी कहानीकार बुलाकी शर्मा को अमर करने वाली रचना है।” अब यह उक्ति किसी बड़े पुरस्कार से कमतर नहीं है। बुलाकी शर्मा वर्ष 1978 से निरंतर राजस्थानी और हिंदी में सृजनरत हैं। आपके हिंदी में दो कहानी संग्रह और चार व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हैं। वहीं बाल साहित्य की भी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। मौकिक साहित्य की राजस्थानी में छः पुस्तकें प्रकाशित हैं। संपादन और अनुवाद का कार्य भी आपने किया है। गत वर्ष आपका साहित्य अकादेमी से राजस्थानी अनुवाद ‘रवीन्द्रनाथ रो बाल-साहित्य’ दो खंडों में प्रकाशित हुआ है। 
समाज के मध्यम वर्ग के घर-संसार, उनके क्रिया-कलापों और परस्पर संबंधों को उजागर करती बुलाकी शर्मा की कहानियों की दुनिया उनकी अपनी निजी दुनिया से जुड़ी है। अपने जीवन-जगत और राजस्थानी पर्यावरण को कहानी के रूप में ढालते हुए वे कुछ परिवर्तन जरूर करते हैं फिर भी मूल सत्य और वास्तविकताएं कहीं न कहीं कहानी के पाठ में झांकती है। अगर कहा जाए कि कहानियों की संवेदना में शर्मा का व्यंग्यकार होना बेहद असरकारक रहता है तो बात अधिक स्पष्ट होगी। वे उन सामाजिक पीड़ाओं और अव्यवस्थाओं को चुनते हैं जिन से उन्हें लगता है कि यह ठीक नहीं हो रहा। शब्द ही वह साधना है जिसके माध्यम से कोई लेखक अपना प्रतिकार और प्रतिरोध प्रस्तुत करता है।
किसी रचनाकार के समग्र मूल्यांकन में उसके लेखन-ग्राफ को देखा जाना चाहिए। समाज के बदलाव को आज हम जिस रूप में देखते हैं उसका अहसास अथवा संकेत बहुत से रचनाकार अपनी रचनाओं में बहुत पहले ही कर दिया करते हैं। बुलाकी शर्मा ऐसे ही रचनाकार हैं। पुरस्कृत संग्रह की कहानियां- मरजात, घाव और बर्थ डे प्रजेंट की नायिकाएं समय के सामने हार नहीं मानती हैं। इन नायिकाओं का प्रतिरोध और विश्वास ही पूरे बदलाव के उपरांत भी कहीं कुछ गहरे संस्कारों और आदर्शों पर आस्था बनाए रखने का परचम थामें हैं। हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं, जो किसी भी हमले को आत्मसात करने में सक्षम है। संपूर्ण जातिय अस्मिता से जुड़ी इन कहानियों में कहानीकार जीवन मूल्यों की बात असरदार ढंग से करता है, वहीं इन कहानियों में नवीन भाषा और शिल्प में सधे अनेक चेहरों को साफ देखा जा सकता है। अनेक चरित्रों को हमारी स्मृति में स्थान मिलता है। कहानियों में जहां परंपरा है तो राजस्थानी रीति-रिवाजों में उलझा समाज है। कहानी “ऐब” में केंद्रिय विषय तो दहेज है किंतु इसका विचित्र मानसिक आधार भी यहां रेखांकित हुआ है। समधी ने मांग से अधिक दहेज दे दिया तो संतोष नहीं वरन ऐसी शंका है कि जरूर कहीं कोई लड़की में दोष है। इसी के रहते अपनी नई बहू में कमियों को ढूंढ़ने के प्रयासों में नई व्यंजनाएं कहानी उद्धाटित करती है। कुछ कहानियों में व्यंग्य और बाल मनोविग्यान के रंग दिखाई देते हैं तो कुछ में प्रयोग भी हैं। कहानियों में संस्मरण और डायरी विधा का भी सुंदर प्रयोग कहानीकार ने किया है। कोई रचनाकार जब विविध विधाओं में लिखता है तो उसकी विधाओं में दूसरी विधाएं भी अपना असर छोड़ती है।
बुलाकी शर्मा री कहानियों को यदि हम एक उक्ति में समेटना चाहे तो कहा जा सकता है कि इन में बनते-बिगड़ते संबंधों और संबंधों के ठंडे और निरस होते जाने की पीड़ाएं उजागर होती है। कहानी के माध्यम से वे जीवन में ऊर्जा, उष्मा और उत्साह के लिए प्रयासरत है। उल्लेखनीय है कि शर्मा अपनी कहानियों में कहीं कोई रास्ता अथवा समास्याओं का हल आरोपित नहीं करते। सहज-सरल प्रवाहमयी भाषा में अंतर्द्वंद्वों को उजागर करती इन कहानियों की विशिष्टता के रहते अलग से पहचाना जा सकता है। संभवतः साहित्य अकादेमी पुरस्कार इन कहानियों का अपनी धरा और धारा में विशिष्ट होने का प्रमाण है।
० नीरज दइया

(दुनिया इन दिनों पाक्षिक 15 जनवरी, 2017 संपादक श्री सुधीर सक्सेना)



04 जनवरी, 2017

साहित्य में माफिया

माफिया कोई भी हो, घातक होता है। साहित्य माफिया भी कम घातक नहीं होता। भू-माफिया, खनन-माफिया आदि अनेक माफिया के साथ साहित्यिक-माफिया के सक्रिय होने की चर्चा इन दिनों जोर-शोर से है। पंच काका का मानना है कि सारे माफियाओं में साहित्य-माफिया सबसे खतरनाक होता है, इसके आगे सारे माफिया पानी भरते हैं। जिस प्रकार कर में परोक्ष-अपरोक्ष दो प्रकार के कर होते हैं, वैसे ही साहित-माफिया एक प्रकार का परोक्ष माफिया होता है। इस माफिया के अनेक विभेद है। गांव से लेकर शहर और महानगरों में इसकी अनेक स्वतंत्र-परतंत्र शाखाएं खुली हुई है। कहीं-कहीं लाभ के लिए गठबंधन बंध चुके हैं, और कहीं तैयारिया चल रही है। इस माफिया का धेय वाक्य है ‘अपना उल्लू सीधा करो।’ वैसे आज हर कोई केवल और केवल अपना उल्लू सीधा करने में लगा है, तब कोई कैसे मान ले कि साहित्य लिख कर कोई किसी दूसरे का उल्लू सीधा करेगा। जो कुछ भी कोई करता है, तो सबसे पहले अपना भला करता है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि जो खुद अपना भला नहीं कर सकता, वह भला किसी दूसरे का क्या भला करेगा। कहने को तो साहित्य में तो पूरे देश-समाज, घर-परिवार और खुद की अनेक बातें की जाती है। इसमें भला क्या, और किस का भला? इस सीधे अर्थ की व्याख्या बिना साहित्य माफिया के नहीं हो सकती। कुछ भी लिखने के लिए मूड का होना परम आवश्यक है। फिर मूड बना कर अगर लिख लिया, तो छपना आवश्यक होता है। यह छपना ही आजकल प्रकाशित होने में बदल गया है। अपने-अपने शब्दों को प्रकाशित करने के अनेक मार्ग है, किंतु इसमें वोल्टेज और पावर बढ़ाने की दक्षता माफिया के पास है। यहां संबंधों की भूमिका अहम होती है। यह ठीक वैसा ही है- जैसे बोलने वाला तो कमा कर खा लेता है, और चुपचाप बैठने वाला भूख से मरता है। साहित्य-माफिया हमारे मौन को मुखरित करता है। हमें मंच देता है। दांव-पेच देता है। सबसे बड़ी बात कि हमारे पास जो-जो नहीं होता है, वह सब देता है। बस मांगने भर की देरी है। आप कहें पाठक चाहिए तो पाठक हाजिर, आप कहें श्रोता तो श्रोता हाजिर, आप कहें तालियां बजाने वाले चाहिए तो वह भी मिलेंगे। किसी को हूट कराना हो, तो ऐसी सेवाओं के लिए माफिया सदा तत्पर है। फर्श से अर्श और अर्श से फर्श पर पहुंचाने-पटकने का काम बड़े हुनर से करते-कराते हैं कि कानों-कान खबर नहीं होती कि क्या हुआ। संस्थाओं के पदाधिकारी और मान-सम्मान आदि हर प्रकार की सेवाएं यहां उपलब्ध और सुलभ है। ‘सुलभ’ शब्द आते ही जो दूसरा शब्द साथ-साथ बंधा आता है, ठीक वैसे ही माफिया के साथ-साथ इसके कार्यकर्ताओं की फौज भी बंधी-बंधाई रकम की तरह चलती है।
ये जो सब कुछ विचार है, पंच काका के हैं। देनहार कोई ओर है की भांति वे अपने प्रवचन आपको भेज रहे हैं। मुझ पर शक करने की जरूरत नहीं है। मैं तो एकदम शरीफ हूं। इतना शरीफ कि ‘साहित्य-माफिया’ का नाम ही आज पहली बार सुना है। आपको यकीन करना होगा। मेरा मानना है कि ये माफिया का केवल नाम-नाम होता है। असल में होता कुछ नहीं। लोगों की बनाई हुई फालतू बातें और मनगढ़त किस्से हैं। आज इतना समय किसे है कि साहित्य जैसे पक्कड़ धंधे में कोई हाथ अजमाएगा। यह तो मेरे जैसे कुछ सिरफिर हैं, जिनको लिखने-पढ़ने की लत लगी है। भला आज दौड़-भाग के इस युग में कुछ पढ़ने-लिखने की आदत कोई क्यों डालेगा। क्या मिलता है? दूसरे बहुत से काम हैं। क्या सारे काम खत्म हो गए हैं कि ये नौबत आ पहुंची है। ये तो फालतू का काम है। अब अगर गिनती के लोगों में आपका शुमार है, तो आपकी इच्छा है। मेरा तो मानना है अब लिखना-पढ़ना और माफिया बस फैशन बन गया है।
नीरज दइया