29 मार्च, 2014

तेरी उम्मीद तेरा इंतजार....

मूल कहानीकार : डॉ. प्रकाश अमरावत
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया
------------

बीकानेर के डूंगर कॉलेज में राजस्थानी स्नातकोत्तर विभाग की अध्यक्ष डॉ. प्रकाश अमरावत कहानीकार के रूप में अपनी पहचान रखती हैं, वही शोध-संपादन के क्षेत्र में “आजादी री अलख” और “शक्ति लीला सागर” कृतियां उल्लेखनीय कही गई हैं। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा नवोदय योजना के अंतर्गत राजस्थानी कहानी संग्रह “हियै रा हरफ” प्रकाशित। आपकी कहानियों में हमारे लोक-जीवन में सांस्कृतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति हुई है। प्रस्तुत कहानी में स्त्री के धैर्य, स्वयं को समायोजिय कर लेने के पारंपरारिक विकल्प की सांकेतिक प्रस्तुति मिलती है।


------------

दफ्तर से सीधे आज मैं मेरे सहकर्मी के घर गया। वह काफी दिनों से वह रट लगाए था कि एक दिन मैं उसके साथ घर चलूं। आखिर आज मन बना ही लिया। दफ्तर से छूटते ही उसके संग हो लिया वर्ना रास्ता ढूंढ़ने में काफी झंझट होता। वह घर पहुंचते ही पहले सीधा भीतर गया और ड्राईंगरूम का दरवाजा खोला। मुझे अंदर आने का संकेत किया तो मैं अंदर पहुंचा और कमरे में इधर-उधर ऊपर-नीचे देखा। शानदार सजावट से लकदक, दीवारों पर लगी तश्वीेरों में लोक-जीवन, पारंपारिक संस्कारों की छवियों के साथ आधुनिकता के मनोहर चित्र सजे थे। पेंटिंग देखकर लगता नहीं था कि ये घर पर ही बनाई गई है, यह तो मेरे पूछने से रहस्य उद्धाटित हुआ वर्ना मेरा अंदाजा कुछ और ही रहता। मैं काफी समय तक उन कला-कृतियों को निहारता रहा। एक कला-कृति पर मेरी नजर जैसे ठहर-सी गई। यह किसने बनाई होगी, क्या इस दृश्य के पीछे कोई कहानी है, क्या शीर्षक हो सकता है... इन सब बातों में खोया मैं उसको देखता रहा। बेहद सहज, स्वभाविक और बोधगम्य। परंतु कितना दर्द संजोये थी वह कलाकृति... उसमें चहरे के भावों में दर्द देख रहा था... हल्के रंगों में भावों की गहराई मुखरित हो रही थी। इसे किसने बनाया होगा ? मेरा सहकर्मी दोस्त चाय-नाश्ते को लिए भीतर आया। टेबल पर ट्रे रखते हुए बोला- "इतनी देर से क्या सोचने में लगे थे... चलो थोड़ा नाश्ता कर लो।"
- "हूं... क्या कहा आपने?" मैं तंद्रा से बाहर आया।
वह बोला- "किस सोच में खो गए....?"
मैंने अपना सवाल दाग दिया- "यह पेंटिंग किसने बनाई है ? मैं तो इसे देखने में ही खो गया... कितना गहरा दर्द छुपा है इसमें। इसको देखकर तो कोई कहानी लिखी जा सकती है।" मेरे इतना कहने पर भी जब कोई जबाब नहीं आया तो मैंने उसके चेहरे पर गौर किया कि उसकी आंखें भर आईं थी। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा- "क्या हुआ... मैंने तो बस इस तश्वी.र के बारे में कह रहा था...."
वह रुंआसे स्वर में बोला- "यह तश्वी.र भी किसी के जीवन का सच है.. बस और क्या कहूं।" यह तो मैंने भी सोचा था कि इसमें कोई गहरा सच छुपा है पर किसका, मैंने पूछा- "किसके जीवन का सच है और तुम्हारी आंखें नम क्यों हो गई ? बोलो यह किसके जीवन का सच है..."
- "यह मेरी भाभी के जीवन का सच है।"
- "क्या.... !"
- "हां... यार। मैं सच कह रहा हूं। यह दस वर्ष पुराना किस्सा है जब मेरे भाई का विवाह हुआ था। घर में लक्ष्मी जैसी भाभी के आते ही भैया की बैंक में नौकरी लग गई। उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां थी और यह देख कर हम सब खुश थे... मां, पिताजी, मेरी बहनें और मैं.....। भाभी ने तो जैसे आते ही पूरे घर का काम-काज संभाल लिया था। समय गुजरता गया और ऐसी संस्कारवार गुणवान बहू पा कर मां-पिताजी निश्चिंत हो गए। मैं बड़े आनंद में था, चाचा जो बनने वाला था। घर में हंसी-खुशी के साथ मजाक मस्ती का माहौल था।"  
एक दिन न जाने वह कौनसी सांझ थी कि भाई साहब बैंक से आए चाय पीने के बाद बोले- “मां मेरे सभी दोस्त सपत्नीक घूमने जा रहे हैं.... जिनकी शादी हुए साल-दो साल हुए उनकी यह विशेष मंडली है। तुम कहो तो तुम्हारी बहू और मैं भी घुमने साथ-साथ चले जाते हैं।”
मां ने समझाया- “बेटा ! बहू ऐसी हालत में कैसे जा सकती है ? कहीं कोई बात हो गई तो लोग कहेंगे- सास की मति मारी गई थी जो ऐसी हालत में बहू को भटकने भेज दिया।”
भाई ने कहा- “मां ! तुम भी किस जमाने की बात लेकर बैठ गई हो। अब तो कदम-कदम पर अस्पताल है और हर जगह साधन-सुविधाएं है.. फिर हम क्या कोई गांव-ढाणियों में थोड़े ही जा रहे हैं ?”
“नहीं बेटा ! मेरा मन नहीं मानता .... मैं बहू को ऐसी हालत में नहीं भेज सकती। तुझे जाना है तो तू जा” और मां के इतना कहने पर घर में किसी की क्या हिम्मत थी। सन्नाटा छा गया तो भाभी ने ही कहा- “आप मन क्यों छोटा करते हैं.. इस बार अकेले अपने साथियों के संग घूम आओ... अगली बार सभी साथ चलेंगे।” ऐसा कहते हुए भाभी ने अपने पेट की तरफ संकेत किया तो भाई साहब के चेहरे की मघुर मुस्कान किसी भी छुप नहीं सकी।
- “पंद्राह दिन लग ही जाएंगे, इसी रविवार को रवाना होना है और पंद्रहवें दिन वापस आ जाऊंगा। ऐसा कहने वाले भाई साहब अपने पंद्राह-बीस दोस्तों के संग उत्तरी भारत के बर्फीले टीलों की सैर के लिए रवाना तो हो गया पर... आज तक नहीं लौटे।”
- “क्यों... क्या हुआ ?”
- “ उनके साथियों से पता चला कि वे साथ थे पर न जाने कहां से रास्ता भटक गए... और लौटे ही नहीं। नजरों से दूर गए किसी की खबर आती है पर उसकी खबर का क्या जो कह कर गया हो कि मेरा इंतजार करना....!!
- “तुम्हारी भाभी...?”
- “उन्होंने समय के साथ समझौता कर लिया है। पास के स्कूल में पढ़ाने जाती हैं और कभी ऐसी पेंटिंग में मन रमाते हुए किसी उम्मीद इंतजार में अब भी वैसी ही हैं... वह जो उस वक्त पेट में था आज दस बरस का होने को आया है.... क्या करें.. ।”
मेरी नजर टेबल पर गई जहां चाय ठंडे पानी जैसी हो चुकी थी। मेरे भीतर स्वर-लहरी की गूंज मैंने महसूस की... कोई बरफीलां धोरां सूं आवै संदेश / जी श्यामा प्यारी ऐ.../ मूमल चालै तो ले चालूं....।
उस कलाकृति को फिर से देख कर भीतर देखने की कोशिश की.... तेरी उम्मीद तेरा इंतजार से बेहतर उस पेंटिंग का नाम मुझसे सोचा नहीं जा सकता था।                                                      
(मूल शीर्षक : उडीक)


02 फ़रवरी, 2014

कोई आवाज सुनाई दी है

राजस्थानी कहानी :  भंवरलाल ‘भ्रमर’
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया


“क्या लाऊं सरजी ?”
“एक कप चाय और एक कैवेंडर सिगरेट।”
    नजर चारों तरफ दौड़ाते हुए सरजी ने सिगरेट-कश खींच कर घुंए से गोल-गोल चक्कर बनाने लगे। वह घुंए के बादलों में खो गए। उन्हें स्कूल की बातें याद आने लगी। ओफ्फ यह भी कोई नौकरी है ? रोजना लड़ाई-झगड़ा। कभी टाइम-टेबल का झगड़ा तो कभी ट्यूशन का और कभी परीक्षा का। हेडमास्टर भी साला खुद को खुदा समझता है।
    पिछले तीन-चार दिन रो रोज सिर खाता है कि रिजल्ट सुधारिए.. रिजल्ट सुधारिए। यह क्या मेरे बस की बात है ! लड़कों को पूरा क भी नहीं आता लेकिन आदेश दे देते हैं रिजल्ट अच्छा रहना चाहिए। वे कुछ न कुछ लिखेंगे तभी यह होगा। मैं खाली कापी में तो नम्बर देने से रहा। ऐसे तो देश गर्त में जा रहा है और रसातल में चला जाएगा।
    हुंह ! टारगेट प्रतिशत वाली बात भी सिरदर्दी है। मास्टरों को बांध देते हैं कि इतना तो परिणाम रहना ही चाहिए। नहीं तो वेतन-वृद्धि बंद। तब हमें भी जबरदस्ती नम्बर बढ़ा कर पास करना पड़ता है लड़कों को।
    हेडमास्टर भी कहता है- “सभी का भला हो ऐसा काम ही करना चाहिए, बच्चों का परिणाम अच्छा तो बच्चे खुश और उनके मां-बाप भी खुश। हेडमास्टर खुश और इस्पैक्टर खुश मतलब सभी खुश। हमारा क्या ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य।
    बुद्धि निकल गई है साले की, कहता है कि हमारा क्या लिया ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य। अरे उनका कैसा दुर्भाग्य ? दुर्भाग्य तो इस देश का है जिसमें ऐसे मास्टर और ऐसे हेडमास्टर हैं।
    मैंने तो जालिम को साफ कह दिया कि मैं कापियों में अंक-वृद्धि नहीं करूंगा। लेकिन आज सभी साथियों के कहने से एक के दस और दो के बीस करने पड़े, रिजल्ट जो सुधारना था। आपसदारी में साथ वालों का तो कहना मानना ही पड़ता है।
    परिणाम सुन कर सभी लड़के हंस रहे थे। हेडमास्टर और स्टाफ भी खुश नजर आ रहा था। परीक्षा-परिणाम सुनने आए अभिभावक भी खुश थे। देखिए परिणाम कितना अच्छा रहा। यहां के मास्टर मेहनती हैं। परंतु मेरा तो कलेजा जल रहा था। घायल की गति घायल जाने, दूसरे किसी को क्या समझ। इस प्रकार जबरदस्ती पास हुए लड़के आगे चलकर देश का क्या भला करेंगे ? यदि यही सब कुछ चलता रहा तो इस देश को फिर से गुलाम होना पड़ सकता है।
    इन बच्चों को जबरदस्ती पास करवा कर उनके साथ भी अन्याय करवाया गया है। स्कूल प्रशासन ने उनकी जिंदगियां बर्बाद की है। इससे बढ़ कर और क्या अपराध हो सकता है ?
    “सर ! चाय लिजिए....।” आवाज सुनकर वह चौंका। चाय की चुस्कियां लेते हुए उसने चारों तरफ गौर किया। पास ही दो-तीन आदमी ऊन की कूटाई वाले आए हुए थे और चाय पी रहे थे। वे आपसी बातों में मशगूल थे। इस कहानी के कथा-नायक सरजी का ध्यान उनकी तरफ चला गया।
“यार तूने वह वूलन मील वाली नौकरी छोड़ कर भूल ही कर दी। वहां मशीनों पर आराम का काम था। अब हाथ में कामड़ी लिए दिनभर माथा-फोड़ी करनी पड़ती है। बंधी-बंधाई नौकरी की कोई होड थोड़े ही होती है।”
    उसने गर्वोन्नत जबाब दिया, “दोस्त मैं दबता क्यों रहूं ? मैनेजर का बच्चा कोई मुझे उधार तोलता है क्या ? पगार फ्री की तो देता नहीं.... बिना काम की गालियां किस बात की सुनता ? मेहनत कर कमता-खाता हूं। हाथ में काम हो तो काम की किसे कमी ? लोग पीछे भाग भाग कर काम करवाते हैं। अब ऊन कूट के कमाई करता हूं तो किसी की सुननी तो नहीं पड़ती ना ?” यह कह कर वह रुक गया। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था और कानों के पास की नशे तन हुई थी।
    वह आगे बोला, “मैं मेरे हिसाब से जितनी ऊन तोलवाता हूं उतनी कूट कर दे देता हूं। वह यदि गड़बड करेगा या अक्कड़ दिखाएगा तो दूसरे बहुतेरे काम है। काम में सुनना किस बात का। यह तो मैं आठवीं पास हूं। यदि बी.ए. पास होता तो भी क्या हुआ ? इज्जत गिरवी रख कर मैं काम नहीं कर सकता। भला... आत्मा को कोई बेचा जा सकता है।”   
    इन बातों के हवाले मास्टर ने सोचा कि यह एक मजदूर आदमी है, पर कितना स्वाभिमानी है ! कितनी सच्ची बात कहता है। इसे नौकरी की कोई परवाह ही नहीं.. और एक मैं हूं जो जान-बूझ कर भी इतना अधीन हो गया। जैसे समझदारी में रेत गिर गई।
    फिर मन ही मन विचार किया कि यदि मैं नौकरी छोड़ देता तो करता क्या ? मेरे घर तो खाने-पीने का संकट हो जाएगा। इन हाथों को कोई काम करना ही नहीं आता। और अगर थोड़ा कुछ आता भी है तो अब कैसे करूंगा ? मास्टर हूं मैं तो... अच्छा लगेगा क्या ? मन ही मन मुस्कुरा कर वह उठ गए और चाय-सिगरेट के पैसे चुका कर बाहर निकल गए।
००००
राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा ‘सातूं सुख’ कहानी संग्रह के लिए पुरस्कृत भंवरलाल ‘भ्रमर’ का जन्म 22 अक्टूबर, 1946 को बीकानेर में हुआ। आप राजस्थानी नई कहानी के प्रमुख काहनीकारों में से एक हैं, साथ ही राजस्थानी भाषा में कहानी केंद्रित पहली पत्रिका ‘मरवण’ के संपादक भी रहे हैं। आपके तीन मौलिक कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक संपादित कहानी संग्रह और एक उपन्यस प्रकाशित हैं।