31 जनवरी, 2017

‘हां’ कहने के हजार दुःख

क्सर माइक पर जिसे बुलाया जाता है उस से ‘दो शब्द’ कहने का अनुनय होता है, फिर भी बोलने वाला सीमा का उलंधन करता हुआ अधिकादिक शब्द बोलता है। काफी बार तो यह अधिकता जानलेवा होती है। यह तो गनीमत है कि हम हमारी सहनशीलता और संवेदनशीलता के कारण ‘दो शब्द’ के नाम पर लंबे-चौड़े भाषण और शब्दों का रायता पचा जाते हैं। हां तो कहानी यह है कि एक बार मुझे भी ‘दो शब्द’ कहने के लिए आमंत्रित किया गया। वैसे तो मुझे गिनती हमेशा याद रहती है। अब मैं ‘दो शब्द’ के लिए बुलाया गया हूं, तो तीसरा-चौथा और बहुत सारे शब्दों की जमात को एक के बाद एक कैसे परोस दूं। ‘दो शब्द’ का मर्म केवल दो शब्द नहीं होता। कुछ शब्द को अगर दो शब्द कहा जाता है तो फिर यह प्रचलन कैसे चल निकला। इस विषय पर शोध-खोज होनी चाहिए।
          मंच पर पहुंचते ही मैंने एक आइडिया लगाया, संभव है यह आपके भी काम आए। यही सोच कर मैं साझा करता हूं। मेरी आदत है कि मैं मंच पर पहुंचते ही माइक पकड़ लेता हूं, और कुछ ऐसे भी वक्ता होते हैं जिनको माइक पकड़ लेता है। तो मैंने माइक पकड़ कर कहा- ‘मैं दो शब्द कहना चाहता हूं और साथ में अपने कहे दो शब्दों की तीन कहानियां। ‘दो शब्द’ कह रहा हूं, ध्यान से सुनिएगा- पहला शब्द है ‘हां’- और दूसरा है ‘ना’। हो गए ‘दो शब्द’। ये दो शब्द तो आपने सुने ही हैं, पर इनकी जो चार कहानियां मैं बताने जा रहा हूं, वे संभवत: आपके लिए नई हो सकती है।
          इन दो शब्दों से हमारा पूरा घर-संसार और परिवार जुड़ा है। यहां तक कि मैं और आप सब भी इन दो शब्दों से ही जुड़े हैं। मुझे बुलाया, मैं ‘हां’ कह कर आया। आप सुन रहे हैं- ‘हां’ कह कर ही सुनना होता है। मेरा मानना है कि हमारे जीवन में ‘हां’ और ‘ना’ का गहरा सरोकार है। ये दो शब्द हमारे भीतर-बाहर, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे यहां तक कि आमने-सामने आते-जाते रहते हैं। दोनों में बरंबार लड़ाई होती है। तकरार है छोटा-मोटा तो प्यार भी बहुत है। आखिर है तो दोनों शब्द भाई-भाई, पर ऐसा लगता है कि कभी-कभी दोनों जानी दुश्मन बन गए हैं। आपने देखा होगा, देखा क्या हम सब महसूस करते हैं कि जब भी आपका मन ‘हां’ कहने को करता है, सोचते हैं ‘ना’ कह दूं और बहुत बार ‘ना’ कहते कहते ‘हां’ कहने को मन करता है। हमारा मन इन दो किनारों पर झुलता है।
          पंच चाचा की फिलोसफी का आधार बस ये दो शब्द ‘हां’ और ‘ना’ है। ‘हां-ना’ को पूरे संसार का जनक कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे कहते हैं- ‘इस संसार का आगाज़ हां-ना से हुआ, और अंजाम भी हां-ना से होगा। बाकी जो कुछ संसार में है, वह छलावा और भ्रम है।’ चाचा पहुंचे हुए आदमी हैं। उनकी बातें कम से कम मुझे तो समझ में आती नहीं। मैंने पूछ ही लिया- ‘चाचा अंजाम तो होगा तब देखा जाएगा, अंजाम के बारे में भले ना बताएं पर यह तो कहिए कि ‘हां-ना’ से आगाज कैसे होगा?’
          चाचा ने दांत दिखाएं और बोले- ‘इत्ती-सी बात नहीं जानते। अरे बाबा आदम का असली नाम ना था।’
          ‘अच्छा। तब तो हां नाम हव्वा का होगा।’
          ‘सही पकड़े हो।’
          मैंने आगे कुछ कहा नहीं, पर सच है कि हम हमारे चाचा जैसे कहां-कब सही पकड़ पाते हैं। इस ‘हां-ना’ के बीच चाचाजी के चक्कर में वे मेरी चार कहानियां कहीं पीछे ना छूट जाए। सो सीधे-सीधे अब कहानियों पर आता हूं। इन कहानियां के पूरी होते ही समझ लिजिएगा कि मेरे ‘दो शब्द’ की व्याख्या और यह आमंत्रण मेरा पूरा हुआ।
          चार दिन की हमारी छोटी-सी जिंदगी है। पेश है चार छोटी-छोटी मौलिक कहानियां।
          मैं पंच चाचा के साथ रहता जरूर हूं, पर यह वहम करने की जरूरत नहीं है कि ये कहानियां मेरी नहीं पंच चाचा की है। वैसे करो वहम, मेरा क्या मेरे पास तो हस्तलिखित है। मेरी खुद की राइटिंग में है। जब प्रमाण की जरूरत होगी पेश कर दी जाएंगी।

पहली कहानी : ‘हां’ की कहानी
          ‘हां’ तो यह हां की कहानी है। हां से ही मिलता-जुलता इसका जुड़वा भाई है- ‘हूं’। जो लोग ‘हां-हूं’ के मंत्र का जाप करते हैं, और भीतर ही भीतर ‘ना-नूं’ को याद करते हैं.... वे सदा सुखी रहते हैं। ‘हां’ की कहानी में कोई सुख नहीं है। ‘हां’ कहने के हजार दुःख पहले भी थे, और अब भी हैं। इतने वर्षों बाद भी इन दुःखों में कोई कमी-बेसी नहीं हुई है। अगर हुई भी है तो उसे स्वीकारा नहीं गया है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि साहित्य में हजार का मलतब हजार नहीं होता। भैया मेरा मानना है कि बाजार में तो हजार का मतलब हजार ही होता है। अब आप साहित्य वाले ‘हजार’ का मतलब छोटा-बड़ा कुछ भी करते रहो। कहानी अगर दुःख की हो तो ऐसी कहानी का क्या कहना और क्या सुनना। आज दुःख को कोई सुनना ही नहीं चाहता। दुःख नहीं सुनने का बड़ा कारण यह है कि दुःख सुनाने-सुनने से कम होता है। हमें फुर्सत हो तब ना, क्या हम अपना दुःख लेकर बैठेंगे और किसी को पूछेंगे- ‘भैया टाइम है क्या?’ हर सुनने वाला कहेगा- ‘ना।’
लोकतंत्र में कोई किसी का दुःख कम करे भी तो कैसे? फुर्सत ही नहीं है अपने ही काम करने से। यहां तो खुद के ही काम कम नहीं है। फिर फ्री में क्यों किसी का दुःख हल्का करें। हर काम में जब हिसाब-किताब है तो इसमें भी होना चाहिए।
          हां तो ‘हां’ की यही कहानी है कि आज हर व्यक्ति अपना दुःख लिए फिरता है। सार की बात यह है कि यह दुःख असल में हर काम के लिए ‘हां-हां’ कहने से जन्म लेता है। सुख पाना है तो ‘हां’ बोलने से परहेज करो। जैसे डॉक्टर ने ‘हां’ बोलने के लिए मना कर रखा हो। कभी मुश्किल में ‘हां’ कहना भी पड़े तो मन से ‘हां’ मत कहो। नेता जी की भांति बार-बार मुंडी हिलाओ। मुख पर भले ही ‘हां-हां’ हजार बार कहो पर मुंडी हिला हिलाकर साथ में ‘ना-ना’ कहना भी जारी रखो। ‘हां’ को मारने वाली अमोघ शक्ति ‘ना’ के पास है। नेता जी के सुख का मूल मंत्र है- हजार लोगों को ‘हां-हां’ कह कर भी कभी कोई काम नहीं करते। यह कहानी वैसे तो बहुत लंबी और बहुत विस्तार से कही जाती है, फिलहाल इसे यहीं विराम देता हूं। समझने वालो के लिए तो जरा सा संकेत ही काफी होता है। तो आखिर में सब बोलो- ‘हां’। अरे खोपड़िया हिला कर साथ में ‘ना’ भी बोल दो।

दूसरी कहानी : ‘ना’ की कहानी
          ‘ना’ कहने के हजार सुख है। सुख कौन नहीं पाना चाहता है। ‘ना’ का सुख इतना प्रभावशाली है कि दो बार ‘ना’-‘ना’ बोलते हैं, तो ‘नाना’ की याद आने लगती है। नाना हमारे सुख की ‘पूरी’ खान है, अगर किसी को अहसमति हो तो बोलो- ‘ना’। देखिए किसी ने नहीं बोला ‘ना’। अस्तु यह तय हुआ कि ‘ना’ में हमारे सुख की ‘आधी’ खान है। इसी ज्ञान से कुछ कहने वाले कहते हैं कि कुछ ना कहना ही बेहतर कहना है। तो कहिए ‘ना’ किसने रोका है। ‘ना’ कहने से हर काम से मुक्ति रहती है। ‘हां’ की हजार बीमारियां एक ‘ना’ कहते ही छू-मंतर हो जाती हैं। वैसे सज्जनों के लिए ‘ना’ कहना जरा कठिन है किंतु अगर आप ने एक बार ‘ना’ कहना सीख लिया तो मजा आ जाएगा, और फिर आगे हमेशा के लिए ‘ना’ और ‘ना’ के साथ एकदम ‘ना’ फिर साफ ‘ना’ बोलना सीख जाएंगे। आप किसी बात की चिंता-विंता ना करें। हर काम होगा। बस इतना जान लें कि कोई काम रुकता नहीं है। अरे भाई ऐसा नहीं है कि आप नहीं करेंगे तो होगा ही नहीं। पूरा बोझ आप जो लिए फिरते हैं, इसे धड़ाम से नीचे पटक कर मुक्त हो जाएं। सब हो जाएगा। आप के और हमारे मरने पर भी यह संसार चलेगा कि थम जाएगा। इतने गए इतने आए। कोई हिसाब है क्या आने जाने का। चला चली का खेला है भाई। ‘ना’ कहने का यह गुरु-ज्ञान जानते हुए भी हमारे देश में मूर्खों की कमी नहीं है। ऐसे मूर्ख ही हमारे सारे काम करेंगे और हमारा यह देश निरंतर आगे बढ़ेगा।

तीसरी कहानी : ‘हां-ना’ की कहानी
          अंततः हर ‘हां’ का ‘ना’ में रूपांतरण हो जाता है। जीवन में जहां भी ‘हां’ है, वहां ‘ना’ को स्थान देना अनिवार्य है। यह प्रकृति का नियम है, जैसे एक सिक्के के जैसे दो पहलू हुआ करते हैं। दोनों साथ-साथ रहेंगे। अगल-बगल रहेंगे। बार-बार हां-हां कह कह कर जब कोई बोर हो जाता है तो ना-ना कहना स्वीकार लेता है। जीवन का मूल दर्शन है कि हर प्राणी सदैव ‘हां’ या ‘ना’ की दिशा में चलता है। हमारा जन्म-मरण भी ‘हां’ और ‘ना’ से जुड़ा है। गहरे अर्थों में हर किसी का जन्म ‘हां’ रूपी प्रेम-प्याले अथवा ‘ना’ की जबरदस्ती नाव में किसी अनचाहे सवार के चढ़ जाने से हुआ है। जिनका आगाज ‘हां’ से हुआ वे अनंतः ‘ना’ कि दिशा में गमन करते हैं, और जिनका आगाज ‘ना’ से हुआ है जाहिर है वे ‘हां’ की दिशा में गमन करते हैं अथवा करना चाहते हैं।
          तो बंधुओ! हमारे जीवन का सार है- ‘हां’ और ‘ना’।
          हां यदि जीवन है, तो ना मृत्यु और फिर से हां ही हमारा पुनर्जन्म है।
          यह ‘हां-ना’ का चक्कर ही भवसागर है प्यारे।

चौथी कहानी : ‘ना-हां’ की कहानी
          एक दिन ‘हां’ और ‘ना’ में लड़ाई हो गई। दोनों खाना खा रहे थे।
          हां ने कहा- ‘पहली रोटी मैं खाऊंगा’ और ना ने कहा- ‘मैं खाऊंगा।’ दोनों की लड़ाई बढ़ गई पर परोसने वाल सयाना आलोचक था। वह बोला- ‘जीवन में तुम दोनों का होना जरूरी है। एक के बिना दूसरे का महत्त्व नहीं। अब मुझे फैसला करना है तो मैं पहले ना को रोटी दूंगा।’
          इस पर तुरंत ‘हां’ ने प्रतिवाद किया तो आलोचक ने उसे माकूल जबाब दिया- ‘इसमें मेरा कोई दोष नहीं। शब्दकोश में तुम्हारा स्थान मेरे प्यारे हां भैया बाद में आता है। इसलिए यहां भी तुम को बाद में रहना पड़ेगा। अकादि क्रम समझते हो कि नहीं’
          ऐसा झगड़ा सुलझाना सरल नहीं होता। कोई सयाना संपादक होता तो कहता- ‘दोनों आपस में लड़ाई मत करो। मैं दोनों को रोटी पहले खिला सकता हूं। ये लो आधी रोटी ना तुम्हारी और ये लो आधी हां तुम्हारी।’ मैं भी कोई कम हूं क्या? मुझे ‘दो शब्द’ कहने को आमंत्रित किया, तो मैंने ‘दो शब्द’ ही कहे हैं- ‘हां’-‘ना’। है ना? आपको मेरे ये ‘दो शब्द’ सदा याद रहेंगे। ये देखिए आपने बोला- ‘हां’। बोला ‘ना’ हां?
नीरज दइया
 
 

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