09 जनवरी, 2017

हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार

        सुबह सुबह एक लेखक मित्र अपने साजो सामान के साथ मेरे घर पहुंच गए। गले में झोला और हाथ में बैग उठाए वे अपने शॉल को ठीक करते बाहर खड़े थे। मैं पहुंचा तो मुस्कुराते हुए बोले- “नमस्कार। बहुत दिनों से सोच रहा था कि पंच काका से मिलना है। संयोग ऐसा बना कि आज बिना बताए आ ही गया हूं। काका है तो घर में ही?” मैंने मुस्कुरा कर हां कहा और बिन बुलाए मेहमान को भीतर लिया। यह सुखद आश्चर्य था कि वे थे तो मेरे मित्र, और मिलने आए थे काका से। खैर उन्हें मैंने काका जी से मिलवाया। वे ऐसे मिले जैसे उन्हें बरसों से जानते हो। पांव-धोक के बाद उन्होंने अपने श्रद्धा-सुमनों के तौर पर पंच काका के समक्ष किसी मदारी की भांति अपने झोले और बैग से ना जाने क्या-क्या निकाल कर जैसे पूरी दुकान ही सजा डाली। उनका इतना प्रेम और आदर देखकर शुक्र है कि मेरी आंखें नहीं झलझालाई। चाय के बाद उन्हीं के प्रसाद से हमने सुबह का नाश्ता किया। मैंने सोचा अब ठीक मौका है, पूछ लूं कि भैया कैसे आना हुआ। मैंने पूछा तो उन्होंने फिर वही रटा-रटाया जबाब दिया कि बहुत दिनों से सोच रहा था कि पंच काका से मिलना है। सो बिना बताए आ गया। मैं कब हार मानने वाला था। दोस्तों में कभी हार माननी भी नहीं चाहिए। सीधे पूछ लिया- “आए हो तो काका जी से कुछ काम होगा, तभी तो आए हो।” वे बोले- “हां, तो फिर क्या हुआ। जिससे काम होगा करेंगे। तुमसे मतलब।”
          मुझे इतने रुखे जबाब की उम्मीद नहीं थी। मैंने सोचा बच्चू तू भले मत बता। बाद में काका जी से पता कर लूंगा। मैं अपने काम का कह कर दूसरे कमरे में आ गया। सोचा ये मेरा मित्र हो न हो किसी अटके काम के लिए ही आया है। वे कुछ बाते कर रहे हैं, तब तक कुछ लिख लूं। कल रात दोस्तों के साथ बातें करते हुए हाल ही घोषित पुरस्कार पर कुछ पीड़ाएं और चिंताएं पता चली थी। सोचा वैसे तो पुरस्कार विषय नया नहीं है। इस पर बहुत कुछ लिखा गया है। फिर भी यह विषय हरि अनंत हरिकथा अनंता की भांति लिखने लायक और समसामयिक है। पहले सोचा कि गीत लिखता हूं। तो मुखड़ा बनाया- ‘हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार’। पर मेरी छवि तो गीतकार वाली है नहीं इसलिए गीत लिखने का विचार त्याग दिया। लिखना आसान काम नहीं है। पहले तो क्या लिखूं और फिर किस विधा में लिखूं का तनाव झेलना पड़ता है। ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं ये लेखक भाई आया है वह किसी पुरस्कार की अभिलाषा में ही आया हो। पंच काका कहीं किसी पुरस्कार में निर्णायक तो नहीं बना दिए गए हैं। ‘हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार’ मुखड़ा ऐसे मुखों पर फबता है, जिन्हे पुरस्कार की लालसा थी पर नहीं मिला। जिन्हें पुरस्कार मिल गया है वे थोड़े समय बाद इसे अपने मुख की शोभा बना सकते हैं। रहस्य यह है कि इस गीत के बिना साहित्यकारों का साहित्यकार होना बेकार है। कहने को कहा कुछ भी जाए। जैसे कि मैं पुरस्कार के लिए नहीं लिखता हूं। पुरस्कार तो बस लॉटरी है। पुरस्कार श्रेष्ठ लेखन का पैमान नहीं है। ऐसे अनेक हैडिंग हैं, पर सच्चाई यह है कि ऐसा कोई बिरला ही होगा जो पुरस्कारों के लिए नहीं लिखता। मैं इतना लिख कर पंच काका को दिखाने गया तो देखा मेरे मेहमान मित्र पंच काका के पैर दबा रहे हैं। मित्र संकुचाए, मैंने संकोच किया तो काका ने कहा- “आ जाओ। अब जब आ ही गए हो तो।” “मैंने अपनी नई रचना आरंभ की सोचा आपसे सलाह ले लूं।” पर यह क्या मेरे लिखे को सुनकर दोस्त कपड़ों से बाहर हो गया। बोला- “तुम बड़े बेशर्म हो। छुप-छुप कर हमारी बातें सुनते हो। व्यंग्य लिखते हो। कोई दूसरा नहीं मिला क्या? अरे पुरस्कार के लिए मरते हैं तो यह हक है हमारा। चाचा जी और मेरी बात पक्की है।”
० नीरज दइया 
 

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