20 जनवरी, 2017

पारे का पराक्रम

मौसम के अनुसार कभी ऊपर चढ़ना और कभी नीचे उतरना पारे की नियति है। मौसम बदले तो पारे के विश्राम में खलल पड़ता है। पारे और मौसम का गणित तो समझा जा सकता है, परंतु श्रीमती जी और उनके पारे का गणित दुनिया के किसी कोने में आज तक नहीं समझा जा सका है। यह केवल भारत की बात नहीं, दुनिया के सारे वैज्ञानिक पतियों-गणितज्ञयों के यहां यही हालात है, तो सामान्य पतियों की तो बात ही क्या करें। पारे का गणित समझने में अब तक असफलता का एक कारण यह भी है कि जरा सी बात पर इनका पत्नियों का पारा सीधे सातवें आसामान तक जा पहुंचता है। पारे की गति का रहस्य बना हुआ है। अब कल की ही बात है, मैंने कह दिया कि आज दाल में शायद कुछ कमी रह गई। इतनी सी बात कहने पर श्रीमती जी न केवल नाराज हुई, बल्कि अपने पारे को सातवें आसमान पर ले गईं। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन ऑफिस जाने से पहले मुझे ही रोटी-सब्जी बनानी पड़ी। सीधे मुंह जब पत्नियां पतियों से बात नहीं करती हैं, तो उन बेचारों का पूरा दिन खराब जाता है। मूड का बाजा बजा हुआ हो तो कहीं मन नहीं लगता। बार बार चिंता सताती है कि पारा सातवें असमान से नीचे आया कि नहीं। फिर चाहे खुद के मोबाइल से फोन करो या ऑफिस के सरकारी फोन से। पत्नी फोन नहीं उठाए तो समझ लिजिए, अभी स्थिति अनियंत्रित है और पारा सातवें आसमान पर ही है। वर्ना बहुत बार ऐसा होता है कि सरकारी फोन पर पत्नियों से बतियाने में जो दोनों तरफ सुख का अहसास होता है, वह मोबाइल में भला कहां। घर बिल आता है, तो दिल जलता है पर फ्री के फोन का समय-ग्राफ जैसे-जैसे ऊपर उठता है वैसे वैसे प्रेम में श्रीवृद्धि होती है।
मैंने अनुभवी पतियों से पूछा- पारे को सातवें आसमान से नीचे कैसे उतारा जाए। सभी ने हाथ खड़े कर दिए कि इसका कोई तयसुदा फार्मूला नहीं है। ऐसी परिस्थियों में कुछ भी हो सकता है। बात किसी उपहार से बन सकती है, या फिर एक-दो दिन घर में दोनों सिफ्ट काम करने से हालत सुधरने की संभावना बनेगी। दिन-रात ऐसे अवसर को खोजना होगा जिससे कि पारे को जरा राहत की स्थिति में लाया जा सके। पंच काका घर में होते हैं तब उनके लिहाज का असर रहता है। अपनी उपस्थित मात्र से स्थितियों को वे सामान्य बना देते हैं। घर में शीत-युद्ध होता है किंतु भीतर ही भीतर। अब जब पंच काका कहीं गए हुए हैं, तो हालत सुधार में देरी की संभावना दिख रही है। मैंने फोन कर पूछा कि अब क्या करूं? पंच काका ठहरे पारखी और दुनिया देखे हुए। बोले- कुछ नहीं करना, शाम का खाना बाजार से पैक करा के ले जाना और खूब खर्चा कर डाल। मंहगी साड़ी खरीद कर ले जा। कोई विदेशी इत्र या फिर गहने तक की औकात हो तो कहने ही क्या। सोने की रकम देखते ही हर पत्नी का पारा फटाक से नीचे आ जाता है। तुरंत राहत का यह अचूक नुस्खा है। नोट बंदी और तंगी के इन हालात में जैसे-तैसे मैंने कुछ खर्चा किया। बजट को इतना सेट किया कि पत्नी का पारा कहीं रहे, पर मेरी दाल जरा सी गल जाए। सारा खेल दाल से ही तो शुरू हुआ था, इसलिए जैसे ही दाल गलेगी पारा नीचे आ जाएगा।
० नीरज दइया

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