04 जनवरी, 2017

साहित्य में माफिया

माफिया कोई भी हो, घातक होता है। साहित्य माफिया भी कम घातक नहीं होता। भू-माफिया, खनन-माफिया आदि अनेक माफिया के साथ साहित्यिक-माफिया के सक्रिय होने की चर्चा इन दिनों जोर-शोर से है। पंच काका का मानना है कि सारे माफियाओं में साहित्य-माफिया सबसे खतरनाक होता है, इसके आगे सारे माफिया पानी भरते हैं। जिस प्रकार कर में परोक्ष-अपरोक्ष दो प्रकार के कर होते हैं, वैसे ही साहित-माफिया एक प्रकार का परोक्ष माफिया होता है। इस माफिया के अनेक विभेद है। गांव से लेकर शहर और महानगरों में इसकी अनेक स्वतंत्र-परतंत्र शाखाएं खुली हुई है। कहीं-कहीं लाभ के लिए गठबंधन बंध चुके हैं, और कहीं तैयारिया चल रही है। इस माफिया का धेय वाक्य है ‘अपना उल्लू सीधा करो।’ वैसे आज हर कोई केवल और केवल अपना उल्लू सीधा करने में लगा है, तब कोई कैसे मान ले कि साहित्य लिख कर कोई किसी दूसरे का उल्लू सीधा करेगा। जो कुछ भी कोई करता है, तो सबसे पहले अपना भला करता है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि जो खुद अपना भला नहीं कर सकता, वह भला किसी दूसरे का क्या भला करेगा। कहने को तो साहित्य में तो पूरे देश-समाज, घर-परिवार और खुद की अनेक बातें की जाती है। इसमें भला क्या, और किस का भला? इस सीधे अर्थ की व्याख्या बिना साहित्य माफिया के नहीं हो सकती। कुछ भी लिखने के लिए मूड का होना परम आवश्यक है। फिर मूड बना कर अगर लिख लिया, तो छपना आवश्यक होता है। यह छपना ही आजकल प्रकाशित होने में बदल गया है। अपने-अपने शब्दों को प्रकाशित करने के अनेक मार्ग है, किंतु इसमें वोल्टेज और पावर बढ़ाने की दक्षता माफिया के पास है। यहां संबंधों की भूमिका अहम होती है। यह ठीक वैसा ही है- जैसे बोलने वाला तो कमा कर खा लेता है, और चुपचाप बैठने वाला भूख से मरता है। साहित्य-माफिया हमारे मौन को मुखरित करता है। हमें मंच देता है। दांव-पेच देता है। सबसे बड़ी बात कि हमारे पास जो-जो नहीं होता है, वह सब देता है। बस मांगने भर की देरी है। आप कहें पाठक चाहिए तो पाठक हाजिर, आप कहें श्रोता तो श्रोता हाजिर, आप कहें तालियां बजाने वाले चाहिए तो वह भी मिलेंगे। किसी को हूट कराना हो, तो ऐसी सेवाओं के लिए माफिया सदा तत्पर है। फर्श से अर्श और अर्श से फर्श पर पहुंचाने-पटकने का काम बड़े हुनर से करते-कराते हैं कि कानों-कान खबर नहीं होती कि क्या हुआ। संस्थाओं के पदाधिकारी और मान-सम्मान आदि हर प्रकार की सेवाएं यहां उपलब्ध और सुलभ है। ‘सुलभ’ शब्द आते ही जो दूसरा शब्द साथ-साथ बंधा आता है, ठीक वैसे ही माफिया के साथ-साथ इसके कार्यकर्ताओं की फौज भी बंधी-बंधाई रकम की तरह चलती है।
ये जो सब कुछ विचार है, पंच काका के हैं। देनहार कोई ओर है की भांति वे अपने प्रवचन आपको भेज रहे हैं। मुझ पर शक करने की जरूरत नहीं है। मैं तो एकदम शरीफ हूं। इतना शरीफ कि ‘साहित्य-माफिया’ का नाम ही आज पहली बार सुना है। आपको यकीन करना होगा। मेरा मानना है कि ये माफिया का केवल नाम-नाम होता है। असल में होता कुछ नहीं। लोगों की बनाई हुई फालतू बातें और मनगढ़त किस्से हैं। आज इतना समय किसे है कि साहित्य जैसे पक्कड़ धंधे में कोई हाथ अजमाएगा। यह तो मेरे जैसे कुछ सिरफिर हैं, जिनको लिखने-पढ़ने की लत लगी है। भला आज दौड़-भाग के इस युग में कुछ पढ़ने-लिखने की आदत कोई क्यों डालेगा। क्या मिलता है? दूसरे बहुत से काम हैं। क्या सारे काम खत्म हो गए हैं कि ये नौबत आ पहुंची है। ये तो फालतू का काम है। अब अगर गिनती के लोगों में आपका शुमार है, तो आपकी इच्छा है। मेरा तो मानना है अब लिखना-पढ़ना और माफिया बस फैशन बन गया है।
नीरज दइया
 

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