06 जनवरी, 2017

अपनी धरा और धारा के विशिष्ट कहानीकार : बुलाकी शर्मा

भारतीय साहित्य में अपने विपुल लोक साहित्य के बल पर राजस्थानी साहित्य अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। आधुनिक युग में आरंभ के बहुत वर्षों तक यहां के कुछ रचनाकारों ने लोककथाओं के संरक्षण के लिए जहां लोककथाओं को लिपिबद्ध किया, वहीं कुछ रचनाकारों ने समकालीन भारतीय कहानी के समानांतर राजस्थानी कहानी के विकार की दिशा में कदम बढ़ाए। वहीं आगे चलकर अपनी परंपरा और लोक धरोहर को कुछ कहानीकारों ने आधुनिक संदर्भों में प्रयुक्त किया, जिससे राजस्थानी साहित्य की श्रीवृद्धि हुई।
इसी क्रम में वर्ष 2016 के लिए साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत कहानीकार बुलाकी शर्मा की बात करें, जिन्हें दूसरे कहानी संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ (2013) के लिए हाल ही में पुरस्कार की घोषणा हुई है। एक प्रसिद्ध लोककथा का स्मरण कराना चाहूंगा- “जसमल ओडण”। इस लोककथा का एक पाठ राणी लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत के संग्रह “माझळ रात” में भी देखा जा सकता है। इसी पाठ के बिलकुल समानांतर बुलाकी शर्मा के प्रथम कहानी-संग्रह “हिलोरो” (1994) की शीर्षक कहाणी को देखेंगे तो लगेगा कि जसमल ओडण के स्थान पर नायिका चिड़कली को कहणीकार ने युग-संदर्भों से सहजते हुए जैसे नवीन सृजना के धरातल पर सृजित किया है।
लोकथा में जसमल पर राव खंगार रीझता है और इस कहाणी में नायिका चिड़कली पर ठेकेदार हमीद रीझता है। यह महज संजोग है कि लोककथा में राव खंगार ने जसमल का हाथ पकड़ा और बुलाकी शर्मा की कहाणी में चाय के कप के साथ ही हमीद ने चिड़कली का हाथ पकड़ लिया। स्त्रि की कहानी वर्षों बाद भी एक जैसी नजर आती है। राजा के नए रूप में ठेकेदार जैसे चरित्र हमारे समाज में हैं। लोककथा में जसमल अपने सत की डोर से बंधी अंततः स्वयं को अग्नि के सुपर्द कर प्राण होमती है, और कहाणी की नायिका चिड़कली चूंकि किसी लोककथा की नायिका नहीं है इसलिए उस के हृदय में कहानी की अंतिम पंक्ति में कहानीकार एक हिलोर उठते दिखाता है कि ठेकेदारजी इन दिनों एक बार भी नहीं आए, क्या हुआ होगा उन्हें.... एक बार आए तो कितना अच्छा रहे। यह पूरे समय और संदर्भों का बदल जाना है।
अपने समय और संदर्भों को स्वर देने वाले बुलाकी शर्मा इसी मार्मिकता के लिए राजस्थानी कहानी के क्षेत्र में पहचाने जाते हैं। राजस्थानी कहानी में परंपरा विस्तार का श्रेय बुलाकी शर्मा जैसे कहानीकारों को दिया जाएगा। जसमल का चिड़कली के रूप में अवतरण प्रगतिशील सोच का परिणाम भी कहा जा सकता है। कवि मनीषी कन्हैयालाल सेठिया के इस कहानी के संदर्भ में विचार देखें- “हिलोरो राजस्थानी भाषा की कहानी विधा को बहुत आगे बढ़ाती है और यह कहाणी कहानीकार बुलाकी शर्मा को अमर करने वाली रचना है।” अब यह उक्ति किसी बड़े पुरस्कार से कमतर नहीं है। बुलाकी शर्मा वर्ष 1978 से निरंतर राजस्थानी और हिंदी में सृजनरत हैं। आपके हिंदी में दो कहानी संग्रह और चार व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हैं। वहीं बाल साहित्य की भी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। मौकिक साहित्य की राजस्थानी में छः पुस्तकें प्रकाशित हैं। संपादन और अनुवाद का कार्य भी आपने किया है। गत वर्ष आपका साहित्य अकादेमी से राजस्थानी अनुवाद ‘रवीन्द्रनाथ रो बाल-साहित्य’ दो खंडों में प्रकाशित हुआ है। 
समाज के मध्यम वर्ग के घर-संसार, उनके क्रिया-कलापों और परस्पर संबंधों को उजागर करती बुलाकी शर्मा की कहानियों की दुनिया उनकी अपनी निजी दुनिया से जुड़ी है। अपने जीवन-जगत और राजस्थानी पर्यावरण को कहानी के रूप में ढालते हुए वे कुछ परिवर्तन जरूर करते हैं फिर भी मूल सत्य और वास्तविकताएं कहीं न कहीं कहानी के पाठ में झांकती है। अगर कहा जाए कि कहानियों की संवेदना में शर्मा का व्यंग्यकार होना बेहद असरकारक रहता है तो बात अधिक स्पष्ट होगी। वे उन सामाजिक पीड़ाओं और अव्यवस्थाओं को चुनते हैं जिन से उन्हें लगता है कि यह ठीक नहीं हो रहा। शब्द ही वह साधना है जिसके माध्यम से कोई लेखक अपना प्रतिकार और प्रतिरोध प्रस्तुत करता है।
किसी रचनाकार के समग्र मूल्यांकन में उसके लेखन-ग्राफ को देखा जाना चाहिए। समाज के बदलाव को आज हम जिस रूप में देखते हैं उसका अहसास अथवा संकेत बहुत से रचनाकार अपनी रचनाओं में बहुत पहले ही कर दिया करते हैं। बुलाकी शर्मा ऐसे ही रचनाकार हैं। पुरस्कृत संग्रह की कहानियां- मरजात, घाव और बर्थ डे प्रजेंट की नायिकाएं समय के सामने हार नहीं मानती हैं। इन नायिकाओं का प्रतिरोध और विश्वास ही पूरे बदलाव के उपरांत भी कहीं कुछ गहरे संस्कारों और आदर्शों पर आस्था बनाए रखने का परचम थामें हैं। हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं, जो किसी भी हमले को आत्मसात करने में सक्षम है। संपूर्ण जातिय अस्मिता से जुड़ी इन कहानियों में कहानीकार जीवन मूल्यों की बात असरदार ढंग से करता है, वहीं इन कहानियों में नवीन भाषा और शिल्प में सधे अनेक चेहरों को साफ देखा जा सकता है। अनेक चरित्रों को हमारी स्मृति में स्थान मिलता है। कहानियों में जहां परंपरा है तो राजस्थानी रीति-रिवाजों में उलझा समाज है। कहानी “ऐब” में केंद्रिय विषय तो दहेज है किंतु इसका विचित्र मानसिक आधार भी यहां रेखांकित हुआ है। समधी ने मांग से अधिक दहेज दे दिया तो संतोष नहीं वरन ऐसी शंका है कि जरूर कहीं कोई लड़की में दोष है। इसी के रहते अपनी नई बहू में कमियों को ढूंढ़ने के प्रयासों में नई व्यंजनाएं कहानी उद्धाटित करती है। कुछ कहानियों में व्यंग्य और बाल मनोविग्यान के रंग दिखाई देते हैं तो कुछ में प्रयोग भी हैं। कहानियों में संस्मरण और डायरी विधा का भी सुंदर प्रयोग कहानीकार ने किया है। कोई रचनाकार जब विविध विधाओं में लिखता है तो उसकी विधाओं में दूसरी विधाएं भी अपना असर छोड़ती है।
बुलाकी शर्मा री कहानियों को यदि हम एक उक्ति में समेटना चाहे तो कहा जा सकता है कि इन में बनते-बिगड़ते संबंधों और संबंधों के ठंडे और निरस होते जाने की पीड़ाएं उजागर होती है। कहानी के माध्यम से वे जीवन में ऊर्जा, उष्मा और उत्साह के लिए प्रयासरत है। उल्लेखनीय है कि शर्मा अपनी कहानियों में कहीं कोई रास्ता अथवा समास्याओं का हल आरोपित नहीं करते। सहज-सरल प्रवाहमयी भाषा में अंतर्द्वंद्वों को उजागर करती इन कहानियों की विशिष्टता के रहते अलग से पहचाना जा सकता है। संभवतः साहित्य अकादेमी पुरस्कार इन कहानियों का अपनी धरा और धारा में विशिष्ट होने का प्रमाण है।
० नीरज दइया

(दुनिया इन दिनों पाक्षिक 15 जनवरी, 2017 संपादक श्री सुधीर सक्सेना)



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