06 जनवरी, 2017

अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक

ह सत्य नहीं है कि जो लिखता है, लेखक उसे कहते हैं। लिखते तो बहुत हैं, सभी लिखने वाले लेखक नहीं कहलाते। लेखक कहलाने के लिए केवल लिखना जरूरी नहीं, कुछ दिखना और दिखाना भी होता है। हमें जो कुछ दिखाते और दिखते हैं लेखक, वे प्रायः वैसे नहीं होते हैं। दिखना और वास्तविकता अक्सर अलग होती है। जो असलियत नहीं है उसे दिखाना और हमारा देखते रहना ही हमारी समस्या है। एक अखबार द्वारा एक लेखक को मानदेय दिया जाता था और वह लेखक इसे प्रचारित भी करता था। वह कहता रहता मुझे इतने रुपये मिलते हैं। यह पर्याप्त मानदेय है। इसे संयोग कहें या मेरा प्रयास कहिए कि मेरा भी नंबर उस अखबार लग गया। मैं छपा तो मानदेय का इंतजार करने लगा। यह मेरे भाग्य का ही दोष रहा होगा कि मुझे मानदेय भिजवाना वे भूल गए। भूल सुधार करने के प्रयास में एक दिन समय निकाल कर अखबार के दफ्तर पहुंचा और मानदेय का जिक्र किया। सामने बैठे महोदय को सांप सूंघ गया। पहले तो चुप्पी साधे रहे। मैं इंतजार करता रहा कि कुछ कहेंगे। मेरी दाल नहीं गली तो मैंने पूरी कहानी परोस दी कि अमुख साहब लेखक को मानदेय दिया जाता हैं। मुझे भी मिलना चाहिए। मैंने देखा कि पूरी कहानी सुनकर उनकी सांसें लौट गई। बोले- आप जिन अमुख लेखक की बात कर रहे हैं, वे सच में ही अमुख लेखक है। यहां अमुख साहब यहां आते हैं। हमारे ना ना करते हुए भी अमुख साहब बहुत खर्चा कर जाते हैं। अमुख जी छापने की मिन्नतें करते हैं। मैंने प्रतिप्रश्न किया- अमुख का मतलब क्या है? वे बोले- अमुख से हमारा अभिप्राय है कि उनका मुख नहीं है। वैसे तो मुख सभी के होता है, उनके भी है। वे बोलते बहुत हैं। साफ शब्दों में कहें तो हमारे गरीब और जरूरतमंद मित्र हैं। ऐसे तो वे हमसे मांग नहीं सकते और मांगेंगे भी कब तक। उन्हें मांगने में शर्म और हमें देने में शर्म। इसलिए कभी कभार अमुख को हम कुछ मुख के लिए दे दिया करते हैं। आप अपने अमुख को कुछ देंगे और हम जो खुद को प्रमुख मान बैठे हैं, हमें कुछ नहीं देंगे। वे भड़क गए। बोले- आप प्रमुख कब से हो गए। और आपके पास देने को क्या है? रचनाएं लिखना और भेज देना इसमें प्रमुख क्या है? प्रमुख होता है- मुखिया। बहुत से लेखकों को साथ लेकर जो चलता है और दो-चार संस्थाएं जिसकी जेब हो। कुछ पुरस्कार और सम्मान भी हाथ में होने चाहिए। पत्रिकाओं पर होल्ड होना चाहिए या खुद की अपनी पत्रिका होनी चाहिए। जो उठा-पटक और अखाड़ेबाज होता है, उसे हम प्रमुख कहते हैं। आप हमारे लिए ना तो अमुख हैं और ना प्रमुख। बोला- आप मुझे जानते नहीं। मैं क्या हूं। ये तो आप अपने अमुख और प्रमुख लेखकों से पूछ लेना। फिलहाल आपको बता देना जरूरी है कि इन तथाकथित अमुख और प्रमुख लेखकों की किताबों के आमुख मैं ही लिखा करता हूं। उन्हें ठीक करता हूं। वे मेरे सुझाव मानते हैं। मैं क्या सड़कछाप लेखक हूं? मानदेय नहीं देना तो मना कर सकते हैं। मैं तो मानदेय केवल अपने मान को ही मानता हूं। आपका मुझे मान देना यानी लेखन मान लेना ही मेरा मानदेय है। पर एक को देना और दूसरे को नहीं देना, यह सरासर गलत है। वे मुस्कुराते हुए बोले- सही-गलत की बात आप कर रहे हैं? हम अखबारवाले कभी गलत नहीं होते। हमें बहुत काम रहते हैं। आपकी गलतफहमी दूर किए देते हैं कि हमने आपको क्यों छापा? आप समझते होंगे कि आपकी रचना में दम था इसलिए छपा। ऐसा नहीं है बंधु ! यह तो हमें पंच काका ने कहा था कि कि आप अच्छा लिखते हैं। आपको अवसर मिलना चाहिए। तब मिल गया। समझे आप। 
० नीरज दइया 

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