31 जनवरी, 2017

गुट, गुटका और गुटकी

हते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। अगर बहुत सारे चने मिल जाए तो संभव है कि भाड़ को फोड़ दें। यहां यह समझना जरूरी है कि आखिर भाड़ को फोड़ने पर इतना जोर क्यों दिया जाता है। क्या बिना किसी तोड़-फोड़ के शांतिपूर्वक कुछ नहीं किया जा सकता है। अगर कोई अकेला चना कुछ नहीं कर सकता है तो वह शांति से बैठ तो सकता है। पर जब जब भी कोई चना शांति से चुप-चाप बैठ कर चिंतन करता है, तो दूसरे साथी चने उसे कहते हैं- तू भाड़ में जा। हम जा रहे हैं भाड़ फोड़ने। चने की नियति भाड़ है और भाड़ की चना इसी प्रकार साहित्य और साहित्यकार का अंतर्संबंध है। जो लोग साहित्य के महत्त्व को नहीं समझते वे साहित्य लेखक को चना और साहित्य लेखन को भाड़ समझते हैं। अस्तु दुनिया ने भड़भूंजे की भांति साहित्यकारों को भाड़ के हवाल कर दिया है।
             एक अकेला साहित्यकार लिखता है तो उसे दूसरे और तीसरे के साथ अपने मित्र साहित्यकारों की संगत बल देती है। वह सलाह करता है और चिंतन पर परामर्श करता है। ऐसे में ऐसे गतिशील साहित्यकारों के समूह को अगतिशील और जंग खाए लेखकों द्वारा दूसरे किस्म की जंग छेड़ी जाती है। जो लिखेगा वह छपेगा और जो लिखेगा-छपेगा उसे कभी पुरस्कार-सम्मान भी मिलेगा। समस्या यहीं से आरंभ होती है। एक गुट विशेष की चर्चा शहर से गांव तक खुशबू की भांति फैलती और हर तरफ चर्चा होती है। जो लेखन के ताप को झेल नहीं सकते वे ठंडे लेखक ऐसे गुट से परेशान होते हैं और हानिकार होते हुए भी गुटका खाते है। समय गुजारने के लिए और लेखन की तलब मिटाने में गुटका मददगार होता है। प्रतिबंध के बाद भी गुटका खाने वाले ऐसे ही कुछ मित्रों के बीच बैठ कर गुट की गाथा को बारंबार सुनते-सुनाते हैं। वे चाहते हैं कि धोबी बन कर पछाड़-पछाड़ कर सभी को धो-पौंछ कर गुट से तितर-बितर कर दें। एक बार जो गुट बन जाता है उसे तितर-बितर करना सहज नहीं होता। उनकी इस सहजता से दुखी गम गलत करने वाले गुटका खाते खाते गुटकी की शरण में जाते हैं। गुटकी और गुटकी के शौकीन मिल बैठ जाते हैं तो अनेक समझौतों पर अलिखित हस्ताक्षर होते हैं।
             गैर-गुट वाले गुटका-गुटकी के नशे में लड़खड़ाते हैं। साहित्य के ऐसे सूरमाओं के मुख पर ऐसे-ऐसे शब्द से मिश्रित वाक्य और आप्त कथन आते हैं कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं। वे दो-चार गुटकी भरते ही पीढ़ियों तक को शुभोषित करते हुए ज्ञान को घोड़ों पर सवार हो जाते हैं और बहुत आगे निकल जाते हैं। न जाने कहां कहां की कौड़िया लाते हैं। कहीं की ईंट और कहीं का पत्थर भानूमति ने कुनबा जोड़ा की तर्ज पर यह कुनवा रात के अंधेरे-अंधेरे में पूरी दुनिया का कायाकल्प कर डालता है किंतु सवेरा होते ही सारे संकल्प और योजनाएं धरी रह जाती है। सूरज के साथ थोड़ा सा चलते ही शाम का स्मरण हो जाता है और पूरे दिन शाम की रंगीन के साजो-सामान की व्यवस्था योजना में दिन का देहांत हो जाता है। पंच काका कहते हैं कि ऐसे गुटनिर्पेक्ष, निर्दलीय और संत साहित्यकार कहे जाने वालों के जीवन में जाल और माल ऐसा होता है कि हर किसी को फासने-गिराने, चीरने-फाड़ने और उठाने-पटकने की रणनीति के अलावा कुछ कर ही नहीं सकते। अगर इन गुटका-गुटकी वालों का बस चले तो ये चौबीसों घंटे दिन का देहांत करने को तैयार है। 

- नीरज दइया

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