16 जनवरी, 2017

मेक-अप का महत्त्व

जो है जैसा है उसे वैसा देखना-दिखाना अपराध माना जाना चाहिए। यह तो आइना दिखाना हुआ। समय की मांग है- वास्तविकता कुछ भी हो, पर उसे बढ़ा चढ़ा के बताया-दिखाया जाना चाहिए। आजकल पैकिंग का और ऊपरी दिखावे रंग-रोगन का जमाना है। बाहर और ऊपर सब कुछ अच्छा दिखना चाहिए, भीतर चाहे जो जैसा हो। बाहरी आकर्षण से ही तो यह दुनिया इतनी हसीन लगती है। हसीनाओं की तो बात ही क्या करें, वे तो बिना लिपाई-पुताई के कुछ की कुछ दिखाई देंगी। रंग-रोगन का कमाल है कि भैंस को गाय और गधे को घोड़े दिखाया जा सकता है। इस दुनिया में सभी का अपना-अपना महत्त्व है, पर यह बात कोई मानने को तैयार नहीं है। पूरी दुनिया की भैंसे गाएं बनना चाहती हैं और सारे गधे घोड़े हो जाना चाहते हैं। कहा गया है कि चाहने से क्या नहीं हो सकता है, यह हमारी चाहत है कि पत्थर को भगवान बना देती है। यह सारी माया मेक-अप की है। असलियत भले जो हो, पर असलियत छुपाना और अच्छा-अच्छा देखिए कितना भला लगता है।
कई खास मौकों पर चेहरे की सुंदरता को निखारने के लिए या फिर रोजाना लाइफ में मेक-अप करना कोई नई बात नहीं है। मन में बैठी ब्यूटी के इस कमाल को दुकानदारों और उनके विज्ञापनों ने बखूबी पकड़ा है। ये मर्दों वाली क्रीम और त्वचा के अलग-अलग प्रकार की क्रीम बताते हुए उनकी हर संभव कोशिश होती है कि हमारी जेब सदा साफ रहे। कितने भले हैं ये दुकानदार कि फिलहाल तंगी के दौर में सब कुछ फ्री और जीरो डाउनपेमेंट पर हमारे घरों तक पहुंचाने को राजी हैं। बाजार ठप्प है पर फिर भी किसी न किसी प्रकार से दुकानदार मिल कर इस मिशन में लगे हैं। दुकानदारी का असूल है कि मुनाफा होना चाहिए, भले कैसे भी हो। कभी कम और कभी ज्यादा। धंधे में धंधे की कसर निकाल ली जाती है। आपने अगर कसर निकालने की कला सीख ली, तो आप सफल हैं। कोई आपको रोक नहीं सकता। आप कसर निकाल देंगे बस ऐसा विश्वास बनाएं रखें। चेहरे-मोहरे की कसर निकालने के लिए मेक-अप बहुत जरूरी है।
बिना मेक-अप के सब कुछ डाउन-डाउन सा लगता है। क्या अब भी आपको सादा जीवन और उच्च विचार पर यकीन है? अरे ये तो वर्षों पुरानी घिसी-पिटी उक्ति है। आज इक्कीसवीं सदी के जीवन और उस पुराने जीवन में कितना फासला है। पंच काका का जमाना था- जब लड़का-लड़की शादी से पहले एक दूसरे को देखने नहीं जाया करते थे। जो भी परिणाम निकला होता, वह पहली रात को ही उनके सामने आता। अब की बात अलग है। लड़के और लड़की को देखना-दिखाना बिना मेक-अप के भला कैसे संभव है। इस समय की नियति है कि एक को राजकुमार और दूसरी को राजकुमारी बना कर पेश किया जाए। ग्लैमरी दुनिया में चट मंगनी पट शादी के दिन लद गए। पहले लड़का-लड़की अपने पैरों पर खड़े होने की बात कहेंगे। फिर एक दूसरे को देखेंगे-समझेगे। विचारों को जाने-समझे पूरी जिंदगी का फैसला कोई इक्कीसवीं सदी में कैसे ले सकता है। सारे घोड़े अरबी घोड़े बनें फिरते हैं, और सारे गधे भी जैसे तैसे घोड़ों की शक्ल लिए घूमते हैं। पंच काका कहते हैं कि दुनिया वही हमारे वाली है या पूरी बदल गई है। ये जगह-जगह हाथ-मुंह-पैर मारने वाले क्या इसी पृथ्वीलोक के हैं? इस संसार में खलनायक नायक बने घूमते हैं। ऐसे बिरले होते हैं जो यह कह सकने की हिम्मत रखते हैं- ‘नायक नहीं खलनायक हूं मैं।’ बाकी तो सत्यानाश हो इस मेक-अप और बदली हुई दुनिया का, कि लड़का-लड़की दोनों एक से दिखते हैं।
० नीरज दइया  

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