01 फ़रवरी, 2017

लोक देवता का देवत्व

लोक पर किसी एक की मिल्कियत नहीं होती, फिर भी कुछ मुगालते में रहते हैं। उन्होंने लोक को अपनी बपोती बना लिया है। हमारा लोक भी ऐसा भोला-भोला कि वह बपोती बन जाता है। हम सभी के लोक को कुछ धोक कर और कुछ धोखा दे कर खुद का मानवाने लगते हैं। कुछ भाई-बंधु जो वर्षों से लोक पर धणियाप जमाए हुए हैं तो कुछ इस संसार से इसे काख में लिए-लिए कूच कर गए। जब वे इस असार संसार को छोड़ गए तो लोक पीछे छूट गया। वे ले कर जाना चाहते थे पर अपने साथ लोक को नहीं ले जा सके। उनके पक्षधर कहते हैं कि उनके चले जाने से लोक अनाथ हो गया। यह तो गनीमत है कि लोक अनेक खांचे में बंटा हुआ है। खांचे भी ऐसे कि कोई कहीं भी खुद को फिट कर सकता है। लोक कलाओं के छद्म-मर्मज्ञ और लोकगीतों-लोककथाओं के हत्यारे-डाकू लोक की दुकानें चलाने के लिए समाज की आंखों में धूल झोंकते रहेंगे। बिना धूल झोंके तो नजारा साफ साफ नजर आ जाता है। यह इस धूलि की तासीर है जो वर्षों से फायदेमंद रही है और रहेगी। रहे भी क्यों नहीं, हम इस माटी के जाये-जनमें हैं, और इसी माटी से बने हैं। लोक तो हमारे रक्त में है। जो इस हमारे इस लोक को नहीं जानता, उसके लिए हमारा पाखंड पाखंड नहीं सर्वोत्तम सत्य है।
लोक में हीरे-नगीने-जवारात बरसों से गुमशुदा पड़े थे। एक काल खंड ऐसा आया कि उनको हमारे एक महान लेखक ने खोज-खोज कर निकाला और सभी लोककथाओं में लोककथाओं को सुनाने वाले सुजान का नाम भी ससम्मान ग्रंथों में अंकित किया। किंतु आगे चलकर लोककथाओं का मन मचलने लगा। लोककथाओं ने कहा कि हमें तो मौलिकता के खांचे में डाल दो। फिर क्या था, कहने और सुनने भर की देरी थी। सारी लोक संपदा को अपने नाम के मौलिकता के खाते में डालना आरंभ किया गया। साथ कर लिए कुछ लठैत कि कोई ‘चूं’ नहीं करे। जिसकी जरा भी ‘चूं-चा’ की, उसे चुप करा दिया गया। इस सब के बीच बड़े मान-सम्मान और बड़ी-बड़ी दुकानों से गठबंधन हुआ। जितना लाभ बटोरा जा सकता था, बटोर लिया गया। शेष रहा खाली बर्तन। पर यह बर्तन भी अक्षय-पात्र निकला। अब भी वैसी ही परंपरा निभा रहा है।
इस सदी में एक नए पद ‘लोक देवता’ का आविष्कार किया गया है। शास्त्र और लोक के अनुसार तो कोई मरने पर ही देवता या दानवों की श्रेणी में जाता है। जीते-जी देवता और दानवों की श्रेणी में गमन का सूत्रपात हो चुका है। लोक देवता के पद पर देश के महान से महान बुद्धिजीवी, लेखक, दार्शनिक और बैज्ञानिक बिराजने को आतुर और उत्सुक हैं। पंच काका ने एक लोक देवता की खोज कर उन्हें इस पदबीं से सम्मानित कर दिया और भला हो उस घड़ी का कि जिस घड़ी उन्होंने लोक देवता जैसा पद स्वीकार कर लिया। वैसे वे महान आत्मा के धनी लोक देवता से भी उच्च पद के अधिकारी हैं। वे कारीगर ऐसे हैं कि अच्छे भले मिनख को गधा बना कर उसके आगे गाजर बांध देते हैं। गधा गाजर के लिए पीछे-पीछे फिरता है, पर गाजर है कि उसके आगे-आगे चलती है। यह गुण ही लोक-देवता का देवत्व है कि गधों को वे चाहे जितना फिराते हैं और गाजर को भी बचाए रखते हैं। तो बोलिए इस सदी के स्वनामधन्य लोक-देवता फलाणचंद जी की जय। 
-नीरज दइया

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