31 दिसंबर, 2016

हमारा डिजिटल-युग में प्रवेश

जो कोई लेख लिखता है, वह लेखक होता है। जो सुलेख लिखता है, वह सुलेखक होता है। जो कुछ भी नहीं लिखता उसे क्या कहेंगे? सोचने की बात है कि अगर ऐसे लेखक, सुलेखक और अलेखक मानेंगे तो चारों तरफ लेखक ही लेखक हो जाएंगे। हो जाएंगे नहीं, हो गए हैं। पूरा इंडिया डिजिटल युग में प्रवेश कर रहा है। करना कुछ नहीं है, बस मोबाइल-क्रांति से पूरा देश जुड़ गया है। पूरे देश में लेखकों और विचारकों के साथ क्रांतिकारियों की फौज खड़ी हो गई है। आस-पास के भाई-बंधुओं में भले सोशल रिलेशन कम हुआ हो पर नेट और नोट की इस नई दुनिया में हम पूरे विश्व से बातें कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आपके बस ‘गुड मोर्निग’ लिखने की देर है कि कुछ ही मिनटों में वहां मोर्निग को तुरंत गुड करने वाले आ जाएंगे। यह डिजिटल युग है, आप घर के बाहर खड़े हो कर जोर से बोलिए- ‘गुड मोर्निग।’ देखिए कितनों का जबाब आता है। आपने जोर से बोला तो संभव है कोई डांट दे, या लड़ाई कर ले। आपके ‘गुड मोर्निग’ का जबाब तो आता सा आएगा, पहले सामने वाला पूछेगा- ‘हम बहरे हैं क्या? ये सुबह सुबह काहे की गुड मोर्निग, गुड मोर्निग लगा रखी है।’ आपके ही घर वाले आपको पागल हो गए तक कह जाएंगे कि गली में जाकर आपने गुड मोर्निंग बोलने का अपराध क्यों किया। वह पुराना युग था, जब आप अपने घर-परिवार और गली-मौहल्ले को कुछ पूछा करते, कुछ कहा करते थे। अब अगर कुछ पूछना-कहना है तो पूरा देश आपको बताने-सुनने को तैयार है। एक से बढ़कर एक हुनरमंद मित्र मौजूद है। बस आप एक लाइन लिख दें- ‘मोबाइल खरीदना है कौनसा लूं?’ फिर देखिए कि आप को बताने वाले कहां-कहां से और क्या-क्या ज्ञान देने लगेंगे। यह तो बस एक उदाहरण है। आप इन-बॉक्स में भी बहुत कुछ पूछ सकते हैं।
यह नेट-क्रांति ऐसी है कि यहां सब कुछ मिलता है। सब कुछ यानी आपकी अपनी पसंद। आप कुछ भी गूगल बाबा में सर्च करो। एक विज्ञापन आता था- सब कुछ दिखता है। जी हां, यहां सब कुछ दिखता है। बस आप देखने बैठ जाएं, निराश नहीं होंगे। एक पेन के विज्ञापन में पंक्ति आई थी- लिखते-लिखते लव हो जाए। पर मैं तो बरसों से लिख रहा हूं, और किसी ने लव नहीं किया। यह भी हो सकता है किसी ने किया हो और मुझ मूर्ख को खबर ही नहीं हुई हो। इंटरनेट का कमाल है कि वह ऐसा-वैसा खुद फैसला नहीं करता, आप जो चाहे वह तो बस उपलब्ध करता है। इतना सुख है फिर भी क्या आप बाबा आदम के युग में रहना पसंद करेंगे। मर्जी आपकी, जैसा चाहे करें। नियम है- अब तो देश को डिजिट-युग में आना ही है।
एक मास्टर जी का डिजिटल-युग में प्रवेश हुआ। ई-मेल और फेसबुक के साथ-साथ इंटरनेट के माध्यम से फी-मेल और कामसूत्र-बुक भी देखने में खो गए। जब मास्टर जी भी यही सब कुछ करने लगेंगे तो फिर शिष्यों और शिष्याओं को दोष देना गलत है। जीओ का कमाल है कि छोटे-छोटे बच्चे इंटरनेट-फ्रेंडली हो चुके हैं। इस डिजिटल इंडिया में ऐसे रंग-रोगन देख रहे हैं कि देश खड़ा हो रहा है। बच्चे जल्दी से जल्दी समझदार हो रहे हैं तो देश बहुत आगे नहीं बढ़ गया क्या?
डिजिटल-युग में मैंने और पंच काका ने भी दाखिला ले लिया है। अब हम हैं, और हमारे फोन, कंप्यूटर, इंटरनेट है। साथ बैठने की जरूरत नहीं, हमने परिवार-ग्रुप बना लिया है। मोर्निग से लेकर नाइट तक सब लिख कर बातें होती हैं। एक दूसरों को कुछ का कुछ भेजते रहते हैं। सच जानिए कि लिखने-पढ़ने से मुक्ति मिल गई। यहां सब कुछ रेडिमेड है। साहित्य की गंभीरता और किताबों को अब कौन सूंधता है? साहब कुछ जब हाथ में इंटरनेट है तो गोर्की-प्रेमचंद के साथ साहित्य का पूरा कुनबा यहीं उपलब्ध है ना।

० नीरज दइया
 

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