28 नवंबर, 2016

आज की युवा कविता / डॉ. नीरज दइया

किसी भी समय की कविता को उसकी काव्य-परंपरा में देखा जाना अनिवार्य है। बिना परंपरा अथवा विगत की बात किए वर्तमान की बात आधारहीन है और इसके अभाव में सुनहरे भविष्य के सपने बुने नहीं जा सकते।
    समकालीन राजस्थानी युवा कविता एक ऐसी काव्य-परंपरा की कविता से जुड़ी है जिसमें युद्धों का शंखनाद है, कविता में कीर्ति वर्णन के साथ शत्रु से ‘लड़ जा-भीड़ जा’ का स्थाई स्वर रहा है। ऐसी सुदीर्घ परंपरा में प्रथमत: कवि सत्यप्रकाश जोशी (1926-1990) ने ‘राधा’ काव्य-कृति में राधा के श्रीमुख से मन के मीत कान्हा से गुहार की ‘मुडज़ा फौजां नै पाछी मोड़ ले...’ यह एक नवीन सूत्रपात है। जहां महाकवि सूर्यमल्ल मीसण (1815-1868) जैसे अनेक कवियों का स्वर था-
‘इळा न देणी आपणी, हालरियै हुलराय। पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥’
    इस  स्वर से अलहदा शांति के लिए युद्ध रोके जाने का स्वर समय की मांग और अनिवार्यता थी।
    देश की आजादी के समय राजस्थान ने अपनी जुबान काट कर राष्ट्रभाषा हिंदी के चरणों में अर्पित कर दी और जहां रजवाड़ों में राजकाज की भाषा राजस्थानी थी, राजस्थानियों ने हिंदी सीख कर देश हित के सवाल पर हिंदी को अपनाया। विड़बना है कि ऐसे बलिदानी राजस्थान राज्य को अब तक अपने भाषाई-हक से महरूम रखा गया है, और संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषा को शामिल किए जाने का संघर्ष समकालीन पीढ़ी को करना पड़ रहा है।
    महाकवि कन्हैयालाल सेठिया (1919-2008) भारतीय कवि के रूप में विख्यात है, भाषा प्रेम में रची कविताओं का संकलन आपकी काव्य कृति ‘मायड़ रो हेलो’ है। आज की युवा कविता को इसी पृष्ठभूमि के साथ नवीन कथ्य और शिल्प की विविधताओं को सहेजते-संवारते हुए अपनी रासो काव्य परंपरा से चली आ रही विरासत लिए गर्व भारतीय कविता के हमकदम चलते देखा जा सकता है।
    वर्तमान समय में अन्य भारतीय भाषाओं की भांति ही नए तकनीकी माध्यमों के बल पर कविता को जल्द से जल्द प्रस्तुत कर देने की गतिशीलता राजस्थानी में भी है। काव्य-भाषा, विषय और शिल्प के साथ कविता की बारीक बातों में जाने का अवकाश युवा पीढ़ी में निसंदेह कम देखा जा रहा है किंतु पूरे परिदृश्य को पूर्ण निराशा जनक नहीं कहा जा सकता है।
    जहां परंपरा के मोह या जुड़ाव से छंद-बद्ध कविताओं का दौर युवा कवियों में अब भी चल रहा है। भारतीय भाषाओं की रचनाओं और संदर्भों से अनविज्ञ अपने राग में खोए अनुभवों को बेहद सामान्य ढंग से अपने आनंद और आह्लाद में डूबे युवा कवि देखे जा सकते हैं। इन कवियों में कुछ सजग और गंभीर स्वर लिए ऐसे कवि भी हैं, जिनको हम भारतीय कविता के प्रांगण में गर्व से साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के प्रयासों में संलग्न पाते हैं।
    ‘मंडाण’ के संपादकीय में लिखी कुछ बाते यहां दोहराना चाहता हूं। किसी रचनाकार के लिए अपनी मातृभाषा को अंगीकार करना और सृजनरत होना बड़ी बात है। कुछ मित्र सिर्फ और सिर्फ राजस्थानी कविता की दरिद्रता का रोना रोते हैं और मुझे लगता है कि वे सोचते हैं कि उनके ऐसे प्रलापों से यह दरिद्रता दूर हो जाएगी। जिम्मेदारी और जबाबदेही पुरानी पीढ़ी की भी बनती है कि वे नई पीढ़ी के लिए क्या कुछ कर रहे हैं। दोष देना तो बेहद सरल है आवश्यकता आज इस बात कि है कि नई पौध में जो संभावनाएं हैं उन्हें सहेजा-संवारा जाए। प्रकाशन और पत्र-पत्रिकाओं के संकट के चलते अनेक रचनाकारों की सक्रियता समय के साथ अपने आवेग को क्षीण होते जाने की त्रासदी झेलती है।
    कविता से सतत संलग्नता के लिए कहीं विदेश जाने की आवश्यकता नहीं होती है। युवा कवि को अपने आस-पास के घर-संसार को देखना, समझना और परखना है। घर-परिवार-समाज से सजी कवि की दुनिया ही उसके सृजन की जमीन हो सकती है। कवि की निजता और क्षेत्रीयता में अकूत संभावनाएं हैं। कवि को कविता में क्या लिखना है और किसे छोड़ देना है, यह विचार भी उस के लिए अनिवार्य है।
    किसी कवि को कविता लिखने से पहले खुद से सवाल करना चाहिए कि मैं कविता क्यों और किस के लिए लिखता हूं? ऐसे कुछ अन्य सवाल जरूरी है, जिनके जबाब हर युवा कवि को खोजने होते हैं। यहां यह कहना भी अनिवार्य लगता है कि आरंभिक मोह के चलते युवा कवियों को अपनी लिखी प्रत्येक पंक्ति में भरपूर कविता का अहसास होता है, परंतु समय के साथ अपनी संभावनाओं और सीमाओं को वह जान लेता है। यह सतत अभ्यास का विषय है कि कविता का प्रत्येक शब्द और उसे दिया जा रहा स्थान-क्रम भी महत्त्वपूर्ण होता है। यह कोरा ज्ञान नहीं सत्य है कि कवि को अपने भीतर काव्य मर्मज्ञ के साथ ही आलोचकीय दृष्टि का उत्थान करना चाहिए।
    कवि और कविता की कोई हद नहीं होती। जहां-जहां तक शब्दों के माध्यम से वह पहुंच सकता है, उस यात्रा और अनुभव को कागज पर मूर्त करना आसान नहीं है। ऐसे में कुछ जाहिर करते हुए भी, बहुत कुछ जाहिर होने से रह जाता है। कुछ छूट जाता है। यह हद से अनहद की यात्रा है। राजस्थानी के युवा कवि कुछ संकेतों से बात साधने का प्रयास करते हैं। रसिक कविता को पढ़ अथवा सुन कर उस अनहद तक पहुंच सकते हैं। कुछ हमारी अपनी सीमाओं को पहचानते हुए इन दोनों के बारे में बात शब्दों की सीमाओं में ही संभव है। कवि और कविता के लिए पूर्व ज्ञान कुछ भी काम नहीं आता, उसे तो हर बार हर कविता में एक नई मुठभेड़ करनी होती है।
    विज्ञान भले लाख तरक्की का दाव करे, पर कोई मशीन कविता लिखने की इजाद नहीं कर सकता। कविता को कोई किसी निश्चित सांचे या प्रारूप में स्थापित नहीं कर सकता। कविता के रूप में कवि जैसे अपनी रचना संभव करता है। रचना के लिए पीड़ा की आवश्यकता होती है। क्या बिना किसी पीड़ा या प्रसव के किसी रचना का जन्म असंभव है? क्या रचना पीड़ा का ही पर्याय है, या फिर सुख का पार्याय भी संभव है। यह गहरी और गंभीर बात इस में संलग्न रहने वाले ही जान सकेंगे।
    अब तक गाए जा रहे रागों-सुरों और साधना में कुछ नए राग-आयाम और साधक भारतीय कविता के प्रांगण में देखे जा सकते हैं। कुछ राजस्थानी के कवि निश्चय ही बड़े गर्व के साथ इसी परंपरा में देख सकते हैं।
    नई पीढ़ी से नए स्वरों की आशाएं है। इनकी नवीनता में पुरानी पीढिय़ों की भांति वयण-सगाई, छंद अथवा उपमा का मोह नहीं, समकालीन युवा कविता में नवीन शब्दावली, बदलती भाषा और अपने भावों को पहुंचाने का नवीन कौशल देखने के लिए गत वर्षों प्रकाशित युवा कवियों के कुछ संकलन देखे जा सकते हैं। जैसे- जळ-विरह, कविता देवै दीठ,  म्हारै पांती री चिंतावां, उजाळो बारणै सूं पाछो नीं मुड़ जावै, रणखार, एंजेलिना जोली अर समेस्ता, चाल भतूळिया रेत रमां, संजीवणी, जद बी माँडबा बैठूँ छू कविता, सपनां संजोवती हीरां आदि।
    राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्वारा प्रकाशित 55 युवा कवियों की कविताओं का संकलन ‘मंडाण’ (सं.- नीरज दइया) युवा कविता के संदर्भ और अप्रकाशित रहे कवियों को प्रकाश में लाने की दृष्टि से ‘थार-सप्तक’ (सं.- ओम पुरोहित ‘कागद’) जैसे उल्लेखनीय-सराहनीय कदम राजस्थानी काव्य-धारा में नए स्वरों का शुक्लपक्ष माना जाएगा।
    इस क्षेत्र में ये कृतियां सर्वाधिक प्रतिभाओं को उजागर करने वाली हैं। मंडाण की कविताओं के संदर्भ में संपादक का कथन है- ‘इन कविताओं में सरलता, सहजता, भाषा-कौशल एवं शिल्प की नवीन दृष्टि से ये ऊर्जावान कवि अपनी पृथक पहचान बनाने में सक्षम हैं।’
    राजस्थानी युवा कविता ही नहीं पूरी कविता यात्रा में अनेक कवि ऐसे हैं जिनकी स्वतंत्र पुस्तकें अब तक सामने नहीं आ सकी है। ऐसी ही पीड़ा को लेकर कवि-संपादक ओम पुरोहित ‘कागद’ ने संग्रह के रूप में अब तक अप्रकाशित कवियों की कविताओं का संकलन-संपादन ‘थार सप्तक’ के सात भागों में किया।
    थार-सप्तकों द्वारा 49 कवियों की कविताएं सामने आई जिनमें संभावनाशील अनेक युवा कवि भी सामने आए, जैसे- गौतम अरोड़ा, राजू सारसर, मनोज पुरोहित, राजूराम बिजारणियां, अंकिता पुरोहित, गौरीशंकर, पृथ्वी परिहार, सतीश गोल्याण, संजय पुरोहित, कुंजन आचार्य, मोहन पुरी, सिया चौधरी, ऋतुप्रिया, नरेंद्र व्यास, अजय कुमार सोनी, हरीश हैरी, धनपत स्वामी, जितेंद्र कुमार सोनी, ओम अंकुर, मनमीत सोनी आदि।
    पुरानी और नई कविता में मूलभूत अंतर के कारणों पर विचार करते हुए हमें आस-पास की दुनिया और देशों पर भी विचार करना होगा। आज जब पूरी दुनिया की परिकल्पना एक गांव के रूप में समझी जाने लगी है तब हमारे अपने ही घर में अथवा पास-पड़ोस से होती जा रही दूरियों के बारे में भी विचार करना होगा। लगता है इस शताब्दी में हम दौड़ते-भगते किसी युद्ध का हिस्सा बन गए हैं- यह युद्ध मनुष्य और मशीन के बीच का तो है ही, साथ ही साथ मनुष्य से मनुष्य का युद्ध भी यह है। घर, परिवार, समाज और देश-दुनिया की अथाह भीड़ में आदमी नितांत अकेला होता जा रहा है।
    कितना बेहतर होता यदि यह युद्ध किसी युद्ध के मैदान में होता। ऐसे में किसी दिन उसके अंत की संभावना तो होती, किंतु इस नित्य के युद्ध को शांति कैसे मिले। अंतस-अतंस और आंगन-आंगन चलते युद्ध से जीवन-रस के स्वर ही भंग हो गए हैं। शायद यही सब कारण है, या ऐसे ही कुछ अन्य कारण हैं, जिन के रहते नई चुनौतियों और संभावनाओं के साथ नई पीढ़ी (जिसे युवा पीढ़ी कहा जा रहा है) की नजर में सब कुछ देखने की संभावना विकल्पों के साथ मौजूद है।
    राजस्थानी कविता के क्षेत्र में अनेक संभावनाशील युवा कवियों के नामों के बीच कवयित्री संतोष मायामोहन (1974) की चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि आपको अपने प्रथम संग्रह ‘सिमरण’ (1999) के लिए वर्ष 2003 का साहित्य अकादेमी सम्मान मिला, यह युवा राजस्थानी कविता का सम्मान था। साहित्य अकादेमी के लिए भी यह ऐतिहासिक घटना है कि तीस वर्ष से कम उम्र की कवयित्री को यह सम्मान मिला, इससे पूर्व यह कीर्तिमान डोगरी की पद्मा सचदेव के नाम दर्ज था।
    राजस्थानी की अन्य कवयित्रियों में किरण राजपुरोहित, मोनिका गौड़, रचना शेखावत, गीता सामौर, सिया चौधरी, रीना मेनारिया, ऋतुप्रिया, अंकिता पुरोहित आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। कवियों की तुलना में कवयित्रियां संख्या में कम है और उनमें प्रयोगशीलता के प्रति आग्रह भी कम है।
    सभी का उल्लेख संभव नहीं है फिर भी युवा कविता के क्षेत्र में साहित्य अकादेमी द्वारा युवा पुरस्कार से सम्मानित कवियों के नाम हैं- ओम नागर, कुमार अजय, राजू राम बिजारणियां और ऋतुप्रिया के अलावा प्रमुख युवा कवियों में राजेश कुमार व्यास, डॉ. मदन गोपाल लढ़ा, दुष्यत, जितेंद्र कुमार सोनी, हरीश बी. शर्मा, पृथ्वी परिहार, शिवदानसिंह जोलावास, सतीश छिम्पा, किशोर कुमार निर्वाण, संजय आचार्य, विनोद स्वामी, महेंद्र मील, सुनील गज्जाणी, कुंजन आचार्य, गौतम अरोड़ा, जय नारयाण त्रिपाठी, गौरीशंकर और गंगासागर शर्मा आदि के नाम लिए जा सकते हैं।    
    समग्र रूप से राजस्थानी की युवा कविता के लिए कहा जा सकता है कि युवा कवियों के रचाव में समकालीनता से जुड़े आज के यथार्थ की प्रस्तुतियां हैं तो कुछ नए सवालों के साथ दुनिया को बदलने के उमंग भरे सपने और हौसले भी है।
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