03 नवंबर, 2016

शुद्ध चीजों का गणित

जैसे-जैसे हमारे देश ने विकास किया है, वैसे-वैसे चीजों की शुद्धता दर घटती गई है। जहां देखो वहीं कुछ न कुछ चर्चा होती रहती है। चर्चा का क्या है? अच्छी और बुरी दोनों ही प्रकार की चर्चाएं होती हैं। क्या सच में अब ना तो पहले जैसा दूध रहा है, ना धी। समय के साथ सब कुछ बदल गया, तब दूध-धी को भी तो बदलना था कि नहीं? फिर भी बहुत लोग पुराना राग क्यों आलापते हैं? यह तो अच्छा हुआ कि चीजों के भाव अब आसमान छूने लगे हैं। पहले जैसे भाव अब नहीं रहे। पर लोग है कि पहले के भावों को याद करते रहते हैं। कहते हैं- अब पहले जैसे भाव नहीं रहे। अगर आज के इस दौर में पहले जैसे भाव हो जाए तो शामत किसकी आएगी। मरेगा तो बेचारा गरीब आदमी ही। वह तो पहले से ही अधमरा है, उसे क्यों पूरा मारने की मन में लिए बैठे हो?
पहले की बातें अब भूल भी जाएं। अरे भाई पहले तो भाव को पकड़ने और परखने वाले बहुत भले लोग हुआ करते थे। ऐसे लेखक भी होते थे, जो लोक प्रचलित अनेक बातों को खुद का मिर्च-मसाल और अपना मौलिक तेल का फौवा लगाकर ऐसी खुशबू जोड़ते थे कि सब कुछ अपने नाम के ब्रांड में बदल देने का हुनर जो जानते थे। पुराने माल को नया बनाकर वे बेचने में उस्ताद थे। बिना उदाहरण के तो आप को कोई बात समझ ही आती नहीं। नया जमाना है तो समझ भी विकसित होनी चाहिए। पर नहीं आप तो जरा सी बात क्या सुनते हैं कि अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाकर न जाने क्या का क्या अर्थ निकाल लेते हैं।
‘रायां रा भाव रातै ई गया’ जैसी सामान्य-सी अनेक लोक-उक्तियों से कथाओं का जन्म क्या कोई मामूली बात है। उससे भी गैर मामूली बात है कि लोक की बातों पर अपनी मुहर लगा कर अपनी मौलिक कहना और अपने नाम से बेचना। आम कहां से आए? यह बात आम खाने वाले को बताए या नहीं बताएं, क्या इससे आम के स्वाद में कोई फर्क पड़ता है? आप बस आम खाएं, और बगीचा चाहे मेरा हो मेरे पिता का हो या फिर पंच चाचा का आपको क्या मतलब। अगर आपमें भी कुछ करने का ऐसा हुनर छिपा है तो कीजिए। कौन कलम या हाथ पकड़ रहा है? कहा ना, यह काम हर कोई कहां कर सकता है? और कोई इसे करता है तो उसकी आत्मा जानती है कि किस कदर लोक का चीरहरण कर अपने शब्दों में पिरोने का महान कार्य किया जाता है।
सब कुछ रेडिमेड बरतने वालों को खबर ही कहां कि कौनसी चीजें कहां से आती है। शुद्ध चीजों का गणित समझना कोई आसान काम नहीं। आपको पता है कि मिर्च कितने प्रकार की होती हैं? चलिए आप तो बस यह बताएं कि मिर्च कितने रंगों में पाई जाती है? छोड़िए, यह तो पता होगा कि किसी को मिर्ची लगाई कैसे जाती है? अरे क्या कभी आपने मिर्च लगाने का महत्त्वपूर्ण काम नहीं किया। आपको कुछ तो अनुभव होगा ही, क्यों किसी को मिर्ची लगती है? पंच काका मिर्च की थेली लाएं हैं और उनके कुछ भतीजे खंख से परेशान हो रहे हैं। शुद्ध चीजों का गणित इतना गड़बड़ा गया है कि अब शुद्ध चीजों को हजम करना मुश्किल हो गया है। अरे किसी को कोई शुद्ध बात कह कर देख लो, तुरंत मिर्ची लगने लगेगी। समय के बहाव में हम और हमारे स्वार्थ इस कदर हम पर हावी हो चुके हैं कि कहीं भी हमें हमारे फायदे और नाम में कुछ किंतु-परंतु दिखाई देता है, या कोई अलग झलक नजर आए तो हम तुरंत बेचैन हो जाते हैं। सही को सही और गलत को गलत स्वीकार करने की शुद्धता का गणित हमारे पास अब बचा नहीं है। अब तो ‘अहो रूपम, अहो ध्वनि!’ का युग है।
० नीरज दइया

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें