21 नवंबर, 2016

पाई-पाई का हिसाब

पंच काका ने मुझे से पूछा- तुम्हें पता है पाई का मतलब? मैं सिर हिलाकर पूछा- आप कौनसी पाई की बात कर रहे हो? क्या आर्यभट्ट वाली पाई, जिसका मान बाइस बट्टा सात होता है। काका बोले- नहीं मैं तो उस पाई की बात कर रहा हूं जो मुझे बचपन में मेरे दादाजी दिया करते थे। तुम लोग क्या जानो उस समय हम क्या का क्या कर देते थे एक पाई में। इतना सुन मैं बीच में बोल- हां समझ गया, बापू जब इंग्लैण्ड गए थे तब वहां वे पाई-पाई का हिसाब रखते थे। मैंने ना तो बापू वाली पाई कभी देखी है और ना ही आपने आप वाली दिखाई है। मैं तो गणित का विद्यार्थी रहा हूं और बस इतना जानता हूं कि ज्यामिती में किसी वृत्त की परिधि की लंबाई और व्यास की लंबाई के अनुपात को पाई कहते हैं।
पंच चाचा तुनक गए। बोले- आग लगे इस ‘गणित’ को। यह गणित ही है जो बेड़ा गर्क कर देती है। सबकी पोल खोलने वाली गणित को मैं पसंद नहीं करता। अब सुन हमारे पीएम माननीय नरेंद्र मोदीजी ने महाराष्ट्र के सिंधखेड़ा में कह तो दिया है कि साठ महीने की पाई-पाई का हिसाब दूंगा। पर देंगे कैसे? इतना बड़ा देश और हिसाब भी इतना बड़ा। भला किसी से हो सकता है क्या? चाचा कुछ आगे कहते, मुझे बीच में बोलना पड़ा- देखिए चाचाजी, मैं आपसे साफ-साफ शब्दों में कहे देता हूं कि मैं ऐसी-वैसी कोई बात नहीं करना चाहता, जिस पर बाद में कोई बखेड़ा हो। कोई क्या करता है और क्या कहता है, उस से मुझे तनिक भी मतलब नहीं है। मैं तो बस अपने काम को देखूंगा कि मैं क्या करता हूं, क्या कर सकता हूं। आजकल कुछ भी कहना खतरनाक है। मैं तो इसी हिसाब में फसा रहता हूं कि क्या कुछ बोलना ठीक है। डर लगता है कि कहीं कुछ गलत बोल गया तो कौन-सी का कब-कहां आ कर कोई हिसाब मांग ले। मैं भला और मेरी चुप्पी भली। हम देशवासियों पर बहुत से नियम लगते हैं। हम नियमों के जाल में फसे हुए हैं।
पंच चाचा मुस्कुराए और बोले- यह तो बहुत समझदारी दिखाई तुमने। तुम सोचते बहुत अच्छा हो, ऐसा सोचते रहो। सोचने-समझने पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगा सकता है। मैंने खुश हो कर सहमति में सिर हिलाया तो वे बोले- सुनो! देश में इतनी उथल-पुथल हो रही है और तुम जो अपने आप को बुद्धिजीवी कहे या पढ़-लिखे लोग, कहें जिन्हें लोकतंत्र पर भरोसा है। तुम्हारा-हमारा वर्ग बड़ा शक्तिशाली माना जाता है। पर क्या करें तुमने तो चुप बैठने का निर्णय ले लिया है। पंच चाचा ने गहरी मार कर दी तो मुझे मजबूरी में फिर बोलना पड़ा- देखिए, आप समझते नहीं। मैंने आपसे जो कहना था कह दिया और पूरे सोच-विचार के बाद ही जो कुछ कहा है.... ठीक कहा है। मुझे अपनी जिंदगी बसर करनी है और काम-धंधा करना है। घर-परिवार और बच्चों की सरी जिम्मेदारियां अभी सामने पड़ी है। आप तो अपनी पारी खेल चुके हैं। इसलिए मैं झमेलों में पड़ना ही नहीं चाहता। मुझे माफ कर दीजिए।
पंच चाचा बोले- मैं तो माफ कर दूंगा पर यह देश और जनता कभी किसी को माफ नहीं करती। इस देश का कर्ज है हमारे ऊपर। तुझे पता है कि नहीं अभी एक रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायमसिंह यादव का संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ विकास के मामले में लगातार पिछड़ता जा रहा है। इसके साथ ही गणित यह भी सामने है कि हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और विपक्षी दल कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधीजी का अमेठी भी पिछड़ता जा रहा है। ये पाई-पाई का हिसाब तो सभी को करना चाहिए। बहुत अच्छी बात है, पर क्या सबसे पहले सभी को अपनों-अपनों का हिसाब भी तो मिला लेना चाहिए। जहां से हम आगे बढ़ते हैं, उनका भी बड़ा ऋण होता है।

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