01 दिसंबर, 2016

मच्छर, पतंग, मस्ती, वसंत

पंच काका को आखिर बैंक से दो हजार का एक नोट मिल ही गया है। नोट तो मिल गया, पर वे अब भी परेशान है। पहले जब नोट नहीं मिला तो भी परेशान थे। काका कहते हैं कि जब बैंक वालों के पास ही नोटों की इतनी तंगी है तो हमारा क्या होगा। यह तो ऊंट के मुंह में जीरा है। ना मालूम क्या हो गया है और क्या होने वाला है। बैंक में पैसे हमारे हैं, और माजरा यह कि हमीं काम में नहीं ले सकते हैं। अरे भाई, खून-पसीने की कमाई है। अब जब अपनी रकम निकालने के सांसें पड़ जाए, तो इसे क्या कहेंगे ! काका की बड़ी परेशानी यह है कि कोई दो हजार रुपये के खुल्ले नहीं देता। काका का काम है बीड़ी पीना और पाना खाना। पान वाले के पास खुल्ले नहीं है। दूसरा काम पंच काका का सब्जी लाना है। पर माजरा यह है कि सब्जी वाले के पास भी खुल्ले नहीं है। हालत अब यह हो गई है कि पंच काका मांग मांग कर बीड़ी पीने को मजबूर हैं। कोई बीड़ी पी रहा हो तो मांग कर काम चलाया जा सकता है, पर पान का क्या करे? क्या पान खा रहे किसी भतीजे से कहे कि थोड़ा-सा तोड़ कर पान मुझे भी दे दे। पंच काका आजकल दो हजार का नोट दिखा कर हर छोटी-बड़ी दुकान में पूछते घूमते हैं- ‘खुल्ले मिलेंग क्या?’ कोई छोटे से सौदे के लिए या फिर ऐसे ही दो हजार रुपये के खुल्ले क्यों देने लगा। मुझ डर है कि ऐसे में ‘खुल्ले मिलेंगे क्या?’ कहीं उनका तकिया कलाम ना बन जाए।
केवल पंच काका एक नहीं है, ऐसे बहुत से लोग है जो खुल्लों की समस्या से परेशान है। जरूर कुछ घोटाला है। जिनके पास बहुत खुल्ले हैं, उनसे यह परेशानी है कि गिन-गिन कर पैसे लेने में समय लगता है। यह तो बाजार मंदा है इसलिए समय है और खुल्ले गिन कर सौदा दे देते हैं। मुझे लगाता है कि बंधों और खुल्लों का एक गणित। यह गणित सत्ता से बंधे और खुल्ले नेताओं द्वारा संचालित है। आम आदमी के नजरिये से देखें तो वह बंधे नेताओं यानी सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा लगाए नियमों से संचालित होता है। खुल्ले नेता सत्ता में नहीं है तो उनका स्थान विपक्ष है। खुल्लों का जो बंधे हैं उनका विरोध करना अधिकार है। यह सारा खेल वोटों से होता है। भोली जनता के पास सत्ता की दुकानदारी है। वह किसी को बांधने का अधिकार सौंपती है, बाकी खुल्ले रह जाते हैं। बंधे और खुल्लों का चक्कर पहले गुपचुप चलता था। अब नोटबंदी के कारण सब के समाने आ गया है। खुल्लों के खल्ले यानी विपक्ष के जूते, आवाज करने लगे हैं। कितना अच्छा हो समस्याओं में सब साथ साथ चलें। कोई हिसाब है तो उसे बंधे और खुल्ले दोनों मिल करें। यह बात तो छोटी सी है। सार की बात है। छोटे लोगों को समझ आ रही है, तो बड़ों को भी आनी चाहिए। खींचातान से प्रेम बड़ा होता है। प्रेम तो हर जगह हर किसी से सदा बड़ा ही होता है। प्रेम को छोटा करने वाले, और कहने वाले खुद छोटे हुआ करते हैं। किसी समस्या का हल देश बंद का आह्वाहन नहीं हुआ करता है। सभी खुल्ले दलों का स्वार्थ है कि बंद को घेर रहे हैं। यह सत्ता का मोह है। कहते हैं कि मोह और प्रेम अंधा होता है। यह अंधा शोर है- बंद करो, भाई बंद करो। बंद ही बंद होना चाहिए। नहीं होना चाहिए?
पंच काका का कहना है कि यह विपक्ष का नितांत निजी स्वार्थ है। वे आज तक जनता के असली मुद्दों पर मौन बैठे थे। यकायक वे क्यों जागे हैं। विपक्ष का जागरण, खुद पर चोट लगने से हुआ है। गनीमत है कि अब होश में आने का समय आ गया है। अपने होने का अहसास कराने के लिए कोई काम बंद नहीं होना चाहिए। आम जनता के बहाने भड़ास निकालने और जनता को उल्लू बनाने का यह सुनहरा मौका मिल गया तो देश के घाटे और आम आदमी की तकलीफ का क्या होगा?
 
० नीरज दइया 

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