14 नवंबर, 2016

बाल की खाल निकालना

‘बाल की खाल निकालना’ का अर्थ आप के लिए भले ‘व्यर्थ तर्क करना’ अथवा ‘व्यर्थ का दोष निकालना रहे’, पर मेरे लिए कुछ अलग है। यह मेरे अनुभव की बात है। मेरे बाल बहुत कम है और जो बाल मेरा साथ छोड़कर चले गए हैं उनमें से कोई भी बाल अपनी खाल साथ लेकर नहीं गया। कोई गया भी है तो मुझे इसकी खबर नहीं। शायद यही कारण है कि मैं कभी किसी के बाल की खाल नहीं निकालता। बाल शब्द बाल-गोपाल से जुड़ कर मुझे आनंदित करता है। बो कृष्ण कन्हैया, माखनचोर मटकीफोड़ जैसे भीतर ही भीतर गुदगुदाता है। अब वैसे बाल-गोपाल और आनंद कहां।
आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे भारत देश में वर्ष 5 से 14 तक के बाल-गोपालों की संख्यां 25.96 करोड़ है, और इनमें से 1.01 करोड़ बालक-बालिकाओं की खाल दिन-प्रतिदिन निकाली जा रही है। अब तक तो बाल की खाल निकालने वालों की इस संख्या में निश्चित रूप से काफी बढ़ोत्तरी हो गई होगी।
मैं तो किसी एक बाल-गोपाल की खाल आंखों के सामने निकलते देखता हूं तो मेरा खून खोल उठता है। मेरे जैसे भाई-बंधुओं का खून इतना खौला और खौलता है फिर भी आलम यह है कि अब तक हम कुछ भी कर नहीं सके हैं। किसी होटल, ढाबे, मैकेनिक, दुकान अथवा सार्वजनिक संस्थान में काम करते हुए देश के नन्हें-नन्हें बालक-बालिकाएं जीवन की आग में समय से पहले ही पक रहे हैं। हम इन काम करने वाले बालों-गोपालों और गोपिकाओं की खाल इतनी निकाल लेंगे कि वे खाल रहित हो जाएंगे। मोटी चमड़ी और खाल रहित लोग देश को कहां से कहां तक पहुंचाएंगे यह कहने-सुनने का विषय नहीं है। अब अगर आपकी समझ पर इतना भी शक करूं तो हो गया बेड़ा गर्क। शिक्षा और साक्षरता का भले असर नहीं हो पर आपक इस देश में रहने का अनुभव क्या काफी नहीं है, इन सब बातों के लिए।
बचपन में ही हम इतनी बड़ी आबादी के इतने बड़े हिस्से को बिना खाल का बना देंगे तो ये बिना खाल वाले भावी नौजवान देश के लिए कैसे सपने और भविष्य की कल्पना करेंगे। कवि राजेश जोशी ने अपनी कविता में लिखा- “सारी चीज़ें हस्बवमामूल/ पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए/ बच्चेा, बहुत छोटे-छोटे बच्चेज/ काम पर जा रहे हैं।” बच्चे काम पर जा नहीं रहे उनको जाना पड़ रहा है। कवि की भांति मेरा भी यह कहना है कि अब दुनिया में शायद कुछ भी बचा नहीं है। दया-शर्म, प्रेम-सद्भवाना, नियम-कानून सब जैसे होते हुए भी बेअसर हो गए हैं। बालश्रम के सारे कानून धरे के धरे रहते हैं और माता-पिता बच्चों को काम पर भेज रहे हैं। और जिनके काम है वे इस बात से बेपरवाह कि कभी कहीं उनकी भी खाल कोई तो निकालेगा ही। मान लिया कि आपके पास ऐसा हुनर है कि कोई अपाका बाल तक बाँका नहीं कर सकता।
हे लक्ष्मी पुत्रों हम आपसे अनुनय करते हैं कि बाल की खाल निकालना बंद करो। माना सब की अपनी अपनी मजबूरियां हैं। गरीबी, बेरोजगारी के इस आलम में जब पढ़े-लिखें और समझदार लोग अपना शोषण कराने के लिए विवश है तो ऐसे बाल-गोपालों को तो अपने भविष्य के बारे में पूरा पता भी नहीं है।
हमारे सब के अपने अपने काम है। समय ही कहां है। इस दौड़-भाग में बस फुर्सत इतनी है कि ऐसे बाल-गोपाल जहां कहीं मिलते हैं उन्हें देख भर लेते हैं। हमारे मशीन होते शरीर में बची-खुची थोड़ी संवेदनाएं जाग्रत हुई तो बस उनके बल पर अधिक से अधिक छोटा सा संवाद भर होता है।
- बेटा तू कितने बरस का है?
या भाषा भी ऐसी कि ‘ऐ तेरी उम्र कितनी है?’
हमारे देश और उनके सपनों से हमें क्या लेना-देना। इतने हमारे काम-काज के बीच हम मन में यह जो इतना सोचते भर है वह बहुत है। किसी से बैर करने में क्या फायदा। हम बिना मतलब के फजीहत करने में विश्वास नहीं रखते। हां हमारा मतलब हो तो हम हमारे दो रुपये के लिए फजीहत कर सकते हैं।
देश का जो कानून है वह अपने आप चल-फिर भी नहीं सकता। उसे चलाने-फिराने वाले कानून को घुमाने-फिराने के ऐसे लेन-देन में उलझे हैं कि कोई उम्मीद की किरण दिखाई नहीं देती है। आखिर उनका भी तो अपना घर-परिवार है और महंगाई है जो देश में इस कदर बढ़ती चली जा रही है। कभी कोई सिरफिरा कुछ करता भी है तो कहानी का अंत सभी पक्षों की तरफ बस एक-सा ही होता है कि यार बाल-बाल बच गए। वर्ना लपेटने वाले बहुत है। हम बाल-बाल बचते आएं है और मेरे बारे में तो आपको बता दूं कि मेरे तो बाल भी बहुत कम बचे हैं। जो भी बचे हुए बाल है उनको बाल-बाल बचाना बहुत जरूरी है।
पंच काका कहते हैं कि जो कोई समाजसुधारक बनकर समाज को सुधारने चलता है, तो उसे यह समाज और इसके कानूनों से यह संसार अपने पहले ही अनुभव में इतना कुछ सुधार कर ठीक कर देता है कि फिर आगे कभी वह किसी सुधार का नाम लेने की हिम्मत नहीं करता। काका तो बड़े अनुभवी हैं। कहते हैं- बच्चों, हमें बस अपना ध्यान रखना है। यह हमारा मसला कभी नहीं होना चाहिए कि क्यों कोई किसी बाल की खाल निकाल रहा है? अगर ऐसा विचार आए तो मेरे पास विगत घटनाओं का भंडार है। जान लें सभी बाल बाल बचे हैं। उन कहानियों को सुनकर आपके रोंगटे खड़े नहीं हो जाए तो कहना।
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