28 नवंबर, 2016

बईमानों पर बरसी बड़ी मार

प ईमानदार है या बईमान? ये मैं आप सरकार की पार्टी नहीं, मैं तो आपकी यानी तुम्हारी बात कर रहा हूं। कितना कठिन समय है कि मैं कहना कुछ चाहता हूं और समझा कुछ और जाता है। यहां यह भी लिखना कितना कठिन है कि आप समझते कुछ है। असल बात तो यही है कि बाप बेटे को नहीं समझता और बेटा बाप को फिर ये आप और हम-तुम है ही किस खेत की मूली। भाषा में मुहवारों का प्रयोग भी खतरनाक हो गया है। पंच काका तो लोक से जुड़े है सो बात बात में उनके लोकोक्तियां और मुहावरे स्वाभाविक रूप से आते रहते हैं पर लोग है कि कुछ का कुछ समझ लेते हैं और नाराज हो जाते हैं। मैं उन्हें मना करता हूं कि ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों करते हैं कि किसी को नाराजगी हो। उन्होंने कहा बाप ने मारी मेढ़की और बेटा तीरंदाज। मैंने प्रसंग को तो नहीं सुना पर उन्हें यह मेरे बेटे के सामने बोलते जब सुना तो मुझे अच्छा नहीं लगा। माना कि मेरे काका है। घर के आका हैं तो क्या हुआ। क्या किसी को बस आका होने से कुछ भी करने, कहने और सुनने का अवसर मिल जाता है।
हां तो पूछना चाहता हूं कि हमारी ईमानदारी कितने प्रतिशत है? कहा जा सकता है कि हमारे देश में बस पांच फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे ईमानदार हैं। आजकल ये जो काला धन वाली बेईमानी की बाते है उनकी संख्या तो पांच फीसदी से भी बहुत कम होगी। अब ठीक ठीक तो पता नहीं पर देश में जब इतने ईमानदार है तब क्या आटे में नमक की तरह यह जो बईमान और काली कमाई बाले हमारे भाई-बहन है जो खुद को हमारे भाई-बहन समझते ही नहीं। इसके भी बहुत कारण है। पहला तो ये कि ये अपनी काली-सफेद सारी कमाई विदेशी बैंकों में रखते हैं। छिपा कर रखने वाले और छिप छिप कर देश के साथ गद्दारी करने वाले ये हमारे भाई ही अधिक है। मैंने तो पहले ही कह दिया कि मतलब आप कुछ भी निकालें और भले ही किसी भाई को बुरा लगे। और हां आप यदि किसी भाई के चमचे हैं तो हुए तो भाई ही। चलिए मान लेता हूं कि आप कभी स्कूल नहीं गए और आपने कभी प्रतिज्ञा नहीं की। फिर भी जब भारत आपका देश है तो समस्त भारतीय इस नाते से भाई-बहन ही कहे जाते हैं। होने और कहे जाने के साथ माने जाने के बीच भी बहुत दूरियां है। होने को तो पंच काका सभी के काका हैं और कहे भी जाते हैं पर उनको दिल से काका मानने वाले बहुत कम है। कहते हैं मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली बात हो गई। आप काका को भले काका नहीं माने और आका को आका। इसके कुछ फर्क नहीं पड़ता। काका तो सदा काका ही रहेंगे और आका का फैसला पांच साल में होता ही है। पंच काका कहते हैं कि अबकी बार बईमानों पर बरसी बड़ी मार। पर मुझे यह आकलन समझ में नहीं आता। अरे मारते क्यों हो वे भी तो हमारे ही भाई बंधु है। करना यह था तो फिर पूरे देश को लाइन में क्यों खड़ा कर दिया। बचपन में स्कूल में लाइन में खड़े होने वाले अब कम से कम लाइन बनाना सीख गए। कमाल यह कि इतनी लाइन पक्की बनना सीख गए हैं कि कुछ भी हो जाए फिर भी लाइन की गरिमा भंग नहीं करते। कोई मरे, खपे, लड़े, भीड़े या कुछ भी हो अपना नंबर लाइन का नहीं छोड़ना है। आप भले इसे संवेदनहीनता कहें और बड़ा शब्द काम में लेना चाहे तो अमानवीयता कह ले पर ऐसे शब्दों और कोरे भाषणों का हम पर हम असर होने ही नहीं देंगे। नोट और वोट बदलवाने के लिए क्या क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। पंच काका भी कमाल के हैं। वे कहते हैं कि बेरुत की दिवाली आ गई है। पूरे देश में लोग काली कमाई पर सफेद करने में जुटे हैं। पांच सौ रुपये की पेंशन पाने वाला बूढ़ा डरता है कि मेरे सात हजार बैंक में जमा करा दिए तो कहीं पेंशन बंद नहीं हो जाए।
० नीरज दइया

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